संसद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संसद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

20 जुलाई 2026

हाथ अगरबत्ती, पैर मोमबत्ती...

कॉलेज टाइम में सींकिया टाइप लौंडों को रंगबाजी दिखाते समय काव्य-पंक्तियाँ स्वतः ही उभरती थीं....

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

......"

आज ये पंक्तियाँ फिर अनायास ही उभर आईं, जब कोकरोचों के विरोध प्रदर्शन में देखने-सुनने को मिला कि संसद को उखाड़ देंगे, देश को नेपाल बना देंगे, प्रधानमंत्री को संसद में घुस कर मारेंगे, रंडुओं को देश कैसे दे दिया आदि-आदि. ऐसे विचार रखने वाले कथित प्रेशर ग्रुप के सामने शिक्षा मंत्री का ही क्या, किसी छात्र-संघ के पदाधिकारी का भी इस्तीफ़ा नहीं होना चाहिए. विपक्षी दलों की चाल एक बार फिर सरकारी दृढ़ता के सामने विफल हुई, ये अच्छी बात है. कम से कम पढ़े-लिखे लोगों को इस बात को समझना चाहिए.

 

एक तरफ इसरो जैसी सरकारी, स्थायी नौकरी को छोड़कर 35-36 वर्ष के दो युवकों ने अन्तरिक्ष में अपनी उड़ान को सिद्ध किया, दूसरी तरफ ऐसे युवा हैं जिनको कोकरोच बने रहने में गर्व हो रहा है; संसद उखाड़ने के मंसूबे हैं; देश को नेपाल बनाने की मानसिकता है. ऐसे युवाओं में पुलिस की लाठी के साथ-साथ जनमानस के जूते भी पड़ने चाहिए थे.

 

इन्हीं के लिए फिर कहेंगे...

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

19 अप्रैल 2026

परिसीमन के जाल में उलझा महिला आरक्षण

लोकसभा में दो तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित न हो सका. केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन के उद्देश्य से इस विधेयक को लोकसभा में रखा गया था. इस विधेयक के द्वारा लोकसभा की सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करना था. देखा जाये तो इस विधेयक का उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को बदलना नहीं बल्कि लोकसभा की सीटों को अधिक करना था. ऐसा करने के पीछे का मंतव्य 2023 में पारित किये जा चुके नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने की अनिवार्य शर्त के रूप में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना था. 2023 में पारित इस अधिनियम के द्वारा महिलाओं को लोकसभा एवं राज्य की विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण प्रदान किया जाना है लेकिन इसके लागू होने के सन्दर्भ में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना अनिवार्य शर्त के रूप में है. लोकसभा में परिसीमन विधेयक के पारित न होने ने भारतीय संघवाद, क्षेत्रीय संतुलन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के आपसी संकटों को उजागर कर दिया है.

 

प्रथम दृष्टया देखा जाये तो इस विधेयक के पारित न हो पाने को लोकसभा सीटों के न बढ़ने के रूप में, देश पर आर्थिक बोझ न बढ़ने के रूप में देखा जा रहा है. इसके सापेक्ष यदि महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर विचार की दृष्टि से देखा जाये तो इस विधेयक का पारित न होना महिला आरक्षण के प्रति नकारात्मक भाव को उत्पन्न करता है. इस विधेयक के गिरने से 2029 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत भागीदारी मिलने की उम्मीदें लगभग समाप्त हो गई है. इसे एक तरह के संवैधानिक धोखे के रूप में देखा जाना चाहिए जो महिलाओं को राजनैतिक प्रतिनिधित्व देने का सपना दिखाता है किन्तु उसके क्रियान्वयन को परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रिया से आबद्ध कर देता है.

 

लोकसभा सीटों का परिसीमन सदैव से एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील संवैधानिक मुद्दा रहा है. यही कारण है कि वर्तमान समय में भी लोकसभा की सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बना हुआ है. 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन को 2000 तक के लिए रोक दिया गया था. कालांतर में इस रोक को 2001 में 84वें संविधान संशोधन के द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया था. ऐसा करते समय तर्क दिया गया था कि 2026 तक देश में जनसंख्या वृद्धि की दर स्थिर हो जाएगी जिससे सीटों के बँटवारे में किसी राज्य को अन्याय महसूस नहीं होगा. ऐसे में यदि संविधान संशोधन के द्वारा परिसीमन पर लगी रोक को आगे न बढ़ाया गया तो 2026 के बाद संवैधानिक रूप से परिसीमन करवाना होगा. सीटों के बँटवारे को लेकर अन्याय जैसा भाव उत्तर और दक्षिण राज्यों के मध्य सदैव से बना रहा है. उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच जनसंख्या वृद्धि का असंतुलन है. दक्षिण भारतीय राज्यों ने दशकों तक प्रभावी ढंग से परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को लागू किया जबकि उत्तर भारतीय राज्यों की जनसंख्या निरन्तर बढ़ती रही. वर्तमान परिसीमन विधेयक के आने पर दक्षिण राज्यों का यही कहना था कि यदि आज की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन लागू किया गया जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों की संसद में हिस्सेदारी कम हो जाएगी.

 

विधेयक के पारित न होने ने जहाँ महिला आरक्षण की गति को अवरोधित किया है वहीं निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन रुकना भी एक प्रकार के नुकसान के रूप में सामने आया है. कई शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व का अधिक होना, ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत छोटी सीटों का होना भी लोकतान्त्रिक प्रणाली में एक तरह की बाधा है. इससे एक वोट, एक मूल्य का लोकतांत्रिक सिद्धांत कमजोर प्रतीत हो रहा है. वर्तमान में एक-एक सांसद बहुत बड़ी संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो कई बार सांसदों की संसदीय जवाबदेही को कम करता है. इस दृष्टि से लोकसभा में सीटों की संख्या न बढ़ना एक प्रकार की प्रशासनिक हानि है क्योंकि लोकसभा सीट न बढ़ने की स्थिति में मतदाताओं और उनके प्रतिनिधि के बीच की दूरी को कम करने का एक अवसर हाल-फ़िलहाल कम हुआ है.

 

परिसीमन विधेयक के लोकसभा में पारित न होने ने महिलाओं के राजनैतिक अधिकारों की प्राप्ति की राह में एक अवरोध उत्पन्न किया है. यहाँ इस विफलता के पीछे से एक सवाल उपजता है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के पारित होने के समय लोकसभा सीट का परिसीमन होना अनिवार्य शर्त के रूप में परिलक्षित था तो अब परिसीमन विधेयक का विरोध क्यों? 2023 में महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक सभी संसद सदस्यों के पास पहुँचा होगा, उसी समय परिसीमन का विरोध न करके महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक को पारित करवा देना अलग ही कहानी कहता है. बहरहाल, महिला आरक्षण के भविष्य और लोकसभा सीटों के परिसीमन पर लगी रोक की समय-सीमा को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि परिसीमन केवल सीटों का गणित न बनकर भारतीय संघ के सभी घटकों के बीच विश्वास का आधार बने. वर्तमान स्थिति में परिसीमन विधेयक के गिरने को तात्कालिक राजनीतिक लाभ के स्थान पर दीर्घकालिक संवैधानिक हितों के सन्दर्भ में देखने और सँवारने की आवश्यकता है.

14 फ़रवरी 2026

देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?

देश के लोकतंत्र का एक दुर्भाग्य ये रहा कि इसे लोकतंत्र अचानक ही मिल गया, जिसके लिए वह कभी तैयार ही नहीं था. गौर करिए, देश अपनी आज़ादी के ठीक पहले अंग्रेजों का गुलाम था, उसके पहले मुगलों सहित अनेक आक्रमणकारियों, विदेशी आक्रान्ताओं की गुलामी को सहा है. इस स्थिति से पहले भी देश में रियासत, कबीलाई संस्कृति देखने को मिलती थी. लोकतान्त्रिक स्वरूप की अवधारणा आज़ादी से पहले देखने को नहीं मिलती है. (विभिन्न साम्राज्यों की जो भी स्थिति थी वो लोकतान्त्रिक नहीं थी) ऐसे में आज़ादी के बाद भी हम लोग दो मानसिकताओं में जीते रहे, एक मालिक वाली और दूसरी नौकर-दास वाली. ये स्थिति संसद से लेकर निम्न स्तर तक देखने को मिलती है.




संसद की तरफ देखें तो यहाँ भी यही स्थिति दिखाई देती है. किसी और की चर्चा न करते हुए नेता पक्ष नरेन्द्र मोदी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ही देखें तो सब साफ़ हो जाता है. राहुल गांधी की पारिवारिक पृष्ठभूमि जिस तरह की रही है वे उसका दृश्य लगभग रोज ही संसद में प्रस्तुत कर देते हैं. सदन को वे अपने घर का आँगन ही समझते हैं. सदन की कार्यवाही के बीच में खड़े होकर चाय पीने लगना, प्रधानमंत्री के गले लग जाना, आन मारना, नॉनसेन्स जैसा शब्द बोलने के बाद भी मुकर जाना, तथ्यात्मक रूप से गलती करना, सदन के नियमों की अवहेलना करना इसका उदाहरण है. पीठासीन अधिकारी को वे अपने घर-परिवार का कोई कर्मी ही समझते हैं तभी आसन को अपने दल का पूर्व सदस्य बताने लगना, बार-बार टोकने के बाद भी विषय पर न बोलना दर्शाता है कि राहुल गांधी सदन को, पीठ को आज भी खुद से नीचे समझते हैं. इसके पीछे वही कबीलाई सोच कि वे किसी रियासत जैसे परिवार से आते हैं, उनके परिवार ने देश को प्रधानमंत्री दिए हैं.


यहाँ देश के प्रधानमंत्री, पक्ष के नेता नरेन्द्र मोदी को भी कटघरे में खड़े करने से मुक्त नहीं किया जा सकता है. जैसा कि पहले बताया कि मलिक और नौकर वाली मानसिकता ही आज भी काम करती है. यदि नेता प्रतिपक्ष मालिक वाली मानसिकता से अपने कृत्य करते हैं तो नेता पक्ष खुद को नौकर वाली स्थिति में दर्शाने से नहीं चूकते हैं. गाहे-बगाहे वे खुद को चाय बेचने वाला, गरीब माँ का बेटा, पिछड़े वर्ग का घोषित कर ही देते हैं. यहाँ सिर्फ एक बड़ा अंतर उनको राहुल गांधी से अलग करता है कि वे सदन का, लोकतंत्र का सम्मान करते हैं; सदन की गरिमा का ध्यान रखते हैं; अपने कृत्य से सदन का-पीठ का अपमान नहीं करते हैं.


बावजूद इसके, कहा जा सकता है कि देश संक्रमणकाल से गुजरने के साथ-साथ दुर्भाग्य के दौर से भी गुजर रहा है जहाँ इसके नागरिकों में समझ विकसित नहीं हो सकी है. आज भी वे सही और गलत का अंतर कर पाने समर्थ नहीं हो सके हैं. आज भी वे एक फोटो, एक वीडियो, एक फाइल के सहारे किसी और के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं.


पता नहीं देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?


09 अगस्त 2025

ऑपरेशन सिन्दूर पर संसद में चर्चा

ऑपरेशन सिन्दूर पर संसद में क्या चर्चा हुई, क्या बहस हुई इसे न देखा और न ही सुना क्योंकि पिछले सप्ताह की हरकतें देखकर समझ आ गया था कि चर्चा तो बस एक बहाना है, असल में लाइव टीवी के माध्यम से विपक्ष को अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं को, अपने समर्थकों को ये दिखाना है कि उनका प्रतिनिधि कितने चिल्ला-चिल्ला के संसद में बहस कर लेता है. ऑपरेशन सिन्दूर, जो लगभग साफ़-साफ़ तस्वीर दिखा रहा है, उसके लिए बहस-चर्चा करने वाले विपक्ष ने कभी भी कुछ विषयों पर खुली बहस-चर्चा करने की हिम्मत नहीं जुटाई.

 

==>> नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से सम्बंधित कई-कई आयोगों के बनाये जाने के बाद भी आज के विपक्ष ने संसद में इसकी चर्चा करवाने की हिम्मत न जुटाई.

 

==>> देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विदेश में मृत्यु होना आज तक संदेहास्पद है मगर इस पर संसद में चर्चा करवाने के लिए आज के विपक्ष ने कभी जोर न लगाया.

 

==>> देश की एक और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही आवास पर, उनके ही सुरक्षा गार्डों द्वारा कर दी गई. सुरक्षा की दृष्टि से आजतक की सबसे बड़ी चूक पर कांग्रेस ने, आज के विपक्ष ने कभी संसद में बहस करवाने के बारे में विचार नहीं किया.

 

==>> देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या होना भी सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी चूक कही जाएगी मगर इस पर कांग्रेस या आज के विपक्ष ने कभी संसद में चर्चा करवाए जाने पर संसद की कार्यवाही को बाधित नहीं किया.

 

क्या कभी इन घटनाओं पर विचार किया जायेगा? क्या इनके लिए संसद में बहस की कोई गुंजाइश नहीं? क्या आज के विपक्ष की जिम्मेवारी नहीं बनती कि वो इन घटनाओं की सत्यता को देश की जनता के सामने संसद के माध्यम से लाये? आज का विपक्ष भी कभी सरकार में था. इन घटनाओं से मुँह मोड़ लेने से और सिर्फ शोर मचाने की मानसिकता से संसद की कार्यवाही को बाधित कर देने से वे लोग अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते.


26 जुलाई 2025

ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा की जिद

संसद की कार्यवाही और ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा की जिद.

++++++++

संसद में लगातार बहस मची हुई है ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा किये जाने की. इस ऑपरेशन के बारे में सबकुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है, उसके लिए बहस-चर्चा करने वाले विपक्ष ने कभी भी कुछ विषयों पर खुली बहस-चर्चा करने की हिम्मत नहीं जुटाई. ऐसे विषयों की सूची लम्बी हो सकती है किन्तु संक्षेप में इसे निम्न बिन्दुओं के सापेक्ष समझा जा सकता है. काश! सदन के अन्दर बैठे जनप्रतिनिधियों ने कभी इन विषयों पर भी चर्चा करने पर विचार किया होता.

 

==>> नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से सम्बंधित कई-कई आयोगों के बनाये जाने के बाद भी आज के विपक्ष ने संसद में इसकी चर्चा करवाने की हिम्मत न जुटाई.

 

==>> देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विदेश में मृत्यु होना आज तक संदेहास्पद है मगर इस पर संसद में चर्चा करवाने के लिए आज के विपक्ष ने कभी जोर न लगाया.

 

==>> देश की एक और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही आवास पर, उनके ही सुरक्षा गार्डों द्वारा कर दी गई. सुरक्षा की दृष्टि से आजतक की सबसे बड़ी चूक पर कांग्रेस ने, आज के विपक्ष ने कभी संसद में बहस करवाने के बारे में विचार नहीं किया.

 

==>> देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या होना भी सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी चूक कही जाएगी मगर इस पर कांग्रेस या आज के विपक्ष ने कभी संसद में चर्चा करवाए जाने पर संसद की कार्यवाही को बाधित नहीं किया.

 

क्या कभी इन घटनाओं पर विचार किया जायेगा? क्या इनके लिए संसद में बहस की कोई गुंजाइश नहीं? क्या आज के विपक्ष की जिम्मेवारी नहीं बनती कि वो इन घटनाओं की सत्यता को देश की जनता के सामने संसद के माध्यम से लायेआज का विपक्ष भी कभी सरकार में था. इन घटनाओं से मुँह मोड़ लेने से और सिर्फ शोर मचाने की मानसिकता से संसद की कार्यवाही को बाधित कर देने से वे लोग अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते.

04 अप्रैल 2025

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 पारित

संसद ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 को पारित कर दिया है. लोकसभा के बाद यह विधेयक राज्यसभा में भी पारित हो गया. राज्यसभा में विधेयक पर लगभग बारह घंटे तक चली चर्चा के बाद देर रात दो बजे के बाद मत-विभाजन करवाया गया. इसमें विधेयक के पक्ष में 128 सदस्यों ने मतदान किया जबकि 95 सदस्यों ने विधेयक के विरोध में मतदान किया. लोकसभा पहले ही विधेयक को मंजूरी दे चुकी है. यहाँ इस विधेयक के पक्ष में 288 और विरोध में 232 मत पड़े.

 



अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने ये संशोधन बिल पेश किया था. विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि इस कानून से करोड़ों गरीब मुसलमानों को फायदा होगा और किसी भी तरह से यह किसी भी मुसलमान को नुकसान नहीं पहुँचाएगा. उन्होंने कहा कि यह कानून वक्फ संपत्तियों में हस्तक्षेप नहीं करता है. वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना है, जिसमें विरासत स्थलों की सुरक्षा और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने के प्रावधान हैं. इस विधेयक का उद्देश्य संपत्ति प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ाकर, वक्फ बोर्ड और स्थानीय अधिकारियों के बीच समन्वय को सुव्यवस्थित करके और हितधारकों के अधिकारों की रक्षा करके शासन में सुधार करना भी है. इस विधेयक का उद्देश्य वक्फ बोर्ड को अधिक समावेशी बनाना है.

 

इसी के साथ संसद ने मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2025 को भी मंजूरी दे दी है. यह विधेयक मुसलमान वक्फ अधिनियम 1923 को निरस्त करता है, जिसे राज्यसभा ने मंजूरी दे दी है. लोकसभा में पहले ही इस विधेयक को पारित किया जा चुका है.


02 जुलाई 2024

अब तो परिपक्वता दिखाएँ राहुल गांधी

दस साल के बाद वर्तमान लोकसभा को नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी का मिलना हुआ. नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने के एक नियम के कारण विगत दस वर्षों से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष नहीं था. इस नियम के चलते किसी भी विपक्षी दल के पास लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या का कम से कम दस प्रतिशत सदस्य होने चाहिए. 2014 और 2019 की लोकसभा में किसी भी विपक्षी दल के पास आवश्यक दस प्रतिशत सदस्य नहीं थे अर्थात लोकसभा के कुल 543 सांसदों में से किसी के पास 55 सांसद नहीं थे. 2014 में सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस के पास सिर्फ 44 सांसद थे. इसी तरह 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र 52 सांसदों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल था. अब 2024 लोकसभा में कांग्रेस 99 सीटों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल है. इसीलिए राहुल गांधी संसद में नेता प्रतिपक्ष के रूप में हैं.   

 



राहुल गांधी अपने राजनैतिक जीवन में पहली बार कोई संवैधानिक पद सँभालेंगे. संसद में विपक्षी नेता अधिनियम 1977 के अन्तर्गत नेता प्रतिपक्ष केन्द्रीय मंत्री के समान होता है. नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल को कई शक्तियाँ और अधिकार भी मिलेंगे. वे भारत सरकार की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष होने के अलावा प्रधानमंत्री के साथ मुख्य निर्वाचन आयुक्त सहित चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों का चयन करने वाले पैनल का हिस्सा होंगे. इसके अलावा वे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में लोकपाल, ईडी-सीबीआई निदेशक, केंद्रीय सतर्कता आयोग, केन्द्रीय सूचना आयुक्त, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग प्रमुख को चुनने वाली समितियों के सदस्य होंगे. गांधी परिवार की दृष्टि से देखें तो वे इस परिवार के तीसरे सदस्य हैं, जिनको नेता प्रतिपक्ष का संवैधानिक पद प्राप्त हुआ है. इससे पहले उनके पिता और माँ क्रमशः राजीव गांधी और सोनिया गांधी इस पद पर रह चुके हैं.

 

पिछले कुछ वर्षों में राजनैतिक हलकों में राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में लगातार प्रोजेक्ट किया जा रहा है. कांग्रेस सहित उनके अन्य सहयोगियों द्वारा इस तरह से प्रचार भी किया जाता रहा है. भारत जोड़ो यात्रा को उनके परिपक्व होने के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है. ऐसी स्थिति में जबकि किसी नेता को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया जाता हो तब भी और अब जबकि वही नेता सदन में संवैधानिक पद का प्रतिनिधित्व कर रहा हो, तब उससे परिपक्वता की अपेक्षा की जाती है. यह अपेक्षा तब विवादों के, हंगामे के घेरे में फँस गई जबकि 18वीं लोकसभा के पहले सत्र में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपने पहले भाषण में ही राहुल गांधी हिन्दुओं को चौबीस घंटे हिंसा, नफरत, असत्य फ़ैलाने वाला कह गए. ये और बात है कि खुद राहुल गांधी और उनके बचाव में उतरे नेताओं द्वारा बार-बार कहा जा रहा है कि हिन्दुओं से उनका अर्थ सम्पूर्ण हिन्दू समाज से नहीं वरन भाजपा से था.

 

नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनके लगभग नब्बे मिनट तक चले भाषण से ऐसा लगा कि वे अभी भी चुनावी मोड में हैं. एकबारगी भी नहीं लगा कि सदन के अन्दर किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति भाषण दे रहा है. विगत वर्षों में जिस तरह से उनका लहजा रहा है, उसमें किसी तरह का बदलाव नहीं आया. लम्बे राजनैतिक सफ़र के बाद भी उनके हाव-भाव, भाषा-शैली, बर्ताव, आचरण आदि में परिपक्वता की कमी दिखी, भले ही स्थिति सदन में हो, सदन के बाहर हो, मंच पर हो या फिर पदयात्रा में हो. संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गले लगने के बाद आँख मारना, निलंबित किए विपक्षी सांसदों के विरोध प्रदर्शन के समय राज्यसभा के सभापति की मिमिक्री करने का वीडियो खुद राहुल गांधी बनाते दिखे. इसी तरह भाजपा के केन्द्र में आने के बाद राहुल गांधी ने जब भी अपने भाषणों में, प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जिक्र किया तो उनके लिए अशालीन, अमर्यादित शब्दावली का ही प्रयोग किया. प्रधानमंत्री के लिए पनौती, जेबकतरा, हत्यारा, भाग जायेगा, नरेंद्र मोदी कांपने लगा, वो झूठ बोलना शुरू कर देता है आदि शब्दावली का प्रयोग करना राहुल गांधी के लिए आम बात है.

 

एक मिनट को मान लिया जाये कि अभी तक की शब्दावली, राहुल की गतिविधि महज एक सांसद के तौर पर थी. तब किसी संवैधानिक पद पर न होने के कारण संभवतः वे उसकी गरिमा, महत्ता को न समझ पाते हों. हालाँकि ऐसा समझना भी अपने आपमें एक भूल होगी क्योंकि उनके परिवार ने मात्र सांसद ही नहीं दिए हैं बल्कि प्रधानमंत्री दिए हैं. अब जबकि वे खुद एक संवैधानिक पद पर हैं, संवैधानिक पद की गरिमा को, उसके आचरण को उन्होंने अपने परिवार में ही देखा है तब कम से कम ये अपेक्षा बनती ही है कि वे मर्यादित आचरण का परिचय देंगे. कहीं ऐसा न हो कि उनसे मर्यादित आचरण की अपेक्षा रखने वाले देशवासी उनके पिता की तरह कहें कि हमें देखना है, हम देख रहे हैं, हम देखेंगे. देश की संसद को भी एक मजबूत नेता प्रतिपक्ष की आवश्यक्ता है. आखिर वो उनकी आवाज और प्रतिनिधि है जो सत्ता और सरकार से मतभेद रखते हैं; जो सत्तारूढ़ दल की नीतियों, कार्यशैली में विश्वास नहीं करते. लोकतंत्र में विरोध भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि समर्थन. आशा है राहुल गांधी उस परिपक्वता को प्रदर्शित करेंगे जिससे असहमति और विरोध का स्वर भी सदन में सम्मान और उचित स्थान पा सके.

09 जून 2024

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी.


आज नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है. हम सभी हर्षित, उत्साहित हैं. यहाँ अति-उत्साह, हर्ष में अपनी-अपनी पोस्ट में उनके तीसरी बार प्रधानमंत्री की शपथ लेने की बात लिख रहे हैं, वे थोड़ा सा संशोधन करते हुए उसे 'लगातार तीसरी बार' लिखें.

 

तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वालों में जवाहर लाल नेहरू के बाद अटल बिहारी वाजपेयी भी रहे हैं. ये बात और है कि अटल जी लगातार तीन बार शपथ लेने वालों में नहीं थे, जैसे कि नेहरू जी रहे और अब मोदी जी हैं.

 



अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार निम्न समयावधि में रहे.

पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए

दूसरी बार 1998 में 13 महीने की अवधि के लिए

तीसरी बार 1999 में पूर्ण कार्यकाल पाँच वर्ष के लिए...

06 जून 2024

लोकसभा चुनाव परिणाम पश्चात् विपक्ष

लोकसभा चुनाव का अंतिम परिणाम सामने आ चुका है. पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने दावों-वादों से कहीं अलग इस बार का चुनाव परिणाम सामने आया है. भाजपा के चार सौ पार के नारे ने असर न दिखाया तो गठबंधन के दावे कि चार जून को नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे ने भी असर न दिखाया. देश-प्रदेश स्तर पर चुनावी स्थितियाँ अलग रहीं और उसी के हिसाब से परिणाम भी सामने आये. चुनाव परिणामों ने कहीं ख़ुशी का माहौल बनाया तो कहीं दुःख भी प्रकट हुआ. इसमें सबके अपने-अपने भाव, अपनी-अपनी मानसिकता ने भी काम किया.

 



लोकसभा के चुनाव में परिणाम क्या रहा, किसे सत्ता मिली, कौन विपक्ष में रहा ये एक अलग विषय है मगर इस बार सबसे ज्यादा प्रभावी विषय यही रहा कि किसी भी भाजपा-विरोधी दल द्वारा ईवीएम को दोषी नहीं बताया गया. कहीं के चुनाव परिणामों के चलते इस पर आरोप नहीं लगाया गया, केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया गया. ईवीएम को हैक करने जैसी किसी भी खबर ने कहीं भी स्थान नहीं पाया. इससे साफ़ समझ आता है कि भाजपा-विरोधी दल विगत दस सालों में किस कदर बौखलाए हुए हैं. तमाम तरह की जुगत बिठाने के बाद भी वे सत्ता हासिल नहीं कर पा रहे हैं. सत्ता तो बहुत दूर की बात है, विगत दो बार से वे लोकसभा में सदन के भीतर अपना नेता सदन नहीं बना पा रहे हैं. इसका एकमात्र कारण नेता प्रतिपक्ष बनाये जाने के लिए आवश्यक मतों का न मिल पाना रहा है. इसी तरह से लोकसभा उपाध्यक्ष पद भी खाली बना रहा. सामान्य सी मान्यता है कि सत्ता पक्ष को लोकसभा अध्यक्ष का और विपक्ष को लोकसभा उपाध्यक्ष का पद प्रदान किया जाता है. विपक्ष की स्थिति इस तरह की बनी रही कि लोकसभा उपाध्यक्ष का पद भी खाली बना रहा.

 

यहाँ अब विशेष ये होगा कि तमाम दलों द्वारा जो गठबंधन सरकार बनाने के लिए, खुद को सत्ता में लाने के लिए किया गया था क्या वही गठबंधन विपक्ष में होने के बाद सदन को चलने देगा? विगत वर्षों की तरह सदन के सञ्चालन में व्यवधान उत्पन्न करके देश का धन बर्बाद करने की उनकी मंशा तो इस बार भी नहीं है?


13 दिसंबर 2023

संसद भवन की सुरक्षा में सेंध : लापरवाही या चूक

बाईस साल पहले संसद पर हुए आतंकी हमले को लेकर संसद में कार्यवाही चल रही थी, उसी समय संसद की सुरक्षा में घनघोर चूक, जबरदस्त लापरवाही देखने को मिली. संसद में चलती कार्यवाही के दौरान दर्शक दीर्घा से दो युवकों ने कूद कर नारेबाजी की. सदन में कूदने के साथ ही उन युवकों ने रंगीन धुआँ फैलाने वाली कैन भी उछाली, इससे सदन में रंगीन धुआँ भर गया. इसे सामान्य घटना नहीं माना जा सकता है. संसद पर हमले वाले दिन ही दर्शक दीर्घा से युवकों का सदन में कूद जाना जहाँ सुरक्षा व्यवस्था में चूक को बताता है वहीं घनघोर लापरवाही का भी सूचक है.




कुछ वर्ष पहले हमें भी पुरानी संसद भवन में दर्शक दीर्घा में बैठकर सदन की कार्यवाही देखने का अवसर मिला था. संसद भवन में प्रवेश के साथ ही जबरदस्त चौकसी शुरू हो जाती. पहले ही प्रवेश द्वार पर व्यापक रूप से जाँच की जाती है. किसी भी व्यक्ति को अपने साथ किसी भी तरह का सामान ले जाने की अनुमति नहीं थी. उनको उसी पहले सुरक्षा स्थल पर जमा करवा लिया जाता था. हम स्वयं धोखे से अपना इयरफोन गले में लटकाए रह गए, उसे भी जमा करवा लिया गया था. इसके बाद जब संसद भवन इमारत में प्रवेश करना था, उसके ठीक पहले उस पास की जाँच हुई जो सम्बंधित सांसद ने जारी किया था. यहाँ भी मुस्तैद जाँच व्यवस्था से गुजरना पड़ा. पूरे संसद भवन में जगह-जगह अनेक तरह की जाँच मशीनें अपना काम कर रही थीं.


जिस जगह पर दर्शक दीर्घा में प्रवेश करना होता था, वहाँ पर भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उपस्थित थे. ऐसा बिलकुल भी महसूस नहीं हो रहा था कि किसी भी तरह से सुरक्षा में, जाँच में कोताही बरती जा रही है. दर्शक दीर्घा में जाने वाले नागरिकों के जूते-चप्पल तक उतरवा लिए जा रहे थे. यहाँ भी एक-एक व्यक्ति की जाँच की जा रही थी. हमने अपनी शारीरिक असमर्थता बताते हुए जूते न उतार पाने की बात कही, छड़ी को न छोड़ पाने की असमर्थता जताई तो सुरक्षा में लगे एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वयं ही व्यक्तिगत रूप से हमारी शारीरिक स्थिति की जाँच की. जूते उतार कर उनको पैर की स्थिति से अवगत कराया. इसके बाद उन्होंने छड़ी वहीं दरवाजे पर बाहर रखवा ली और एक सुरक्षाकर्मी ने हमें अपने हाथों का सहारा देकर अन्दर कुर्सी तक पहुँचाया. दर्शक दीर्घा में भी व्यवस्था चाक-चौबंद दिखी. सदन में कूदने का कोई रास्ता नहीं था क्योंकि चारों तरफ जाली लगी हुई थी. इसके बाद भी अन्दर सुरक्षाकर्मी पूरी मुस्तैदी से सभी पर निगाह रखे हुए थे. आपस में न तो किसी को बातें करने दे रहे थे और न ही अपने हाथ-पैर हिलाने की अनुमति दे रहे थे. अपनी आँखों को इधर-उधर घुमाते हुए अनुमान लगाया तो हर चौथे-पाँचवें व्यक्ति के आसपास सुरक्षाकर्मी मौजूद था.




पुराने संसद भवन में इस तरह की कड़ी चौकसी बरती जा रही थी, ऐसे में नए संसद भवन में चूक कैसे हो गई, ये गम्भीर प्रश्न है. कैसे दो युवक अन्दर कूद गए? कैसे उनके पास रंगीन धुएँ वाली कैन दर्शक दीर्घा तक बनी रही? क्या किसी सुरक्षाकर्मी के ही इसमें मिले होने का अंदेशा है? क्या किसी सांसद के करीबी का इसमें हाथ है? ऐसी आशंका इसलिए उभरती है क्योंकि उस समय भी किसी भी सांसद के नजदीकी रक्त-सम्बन्धी को, उनके सचिव को, खुद उनको मोबाइल सहित किसी भी सामान सहित संसद भवन के भीतर जाने की छूट थी. अब जबकि नया संसद भवन आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था से लैस है, अत्याधुनिक तकनीक, संसाधन वहाँ मौजूद हैं, तक ऐसी चूक बिना किसी भीतरी व्यक्ति के शामिल हुए वगैर संभव नहीं लगती.


फिलहाल तो आरम्भिक जाँच आरम्भ हो गई है. इस चूक में, लापरवाही में कौन, किस तरह शामिल था इसके बारे में तो विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद पता चलेगा. अंतिम निष्कर्ष क्या रहेगा ये तो बाद की बात है किन्तु मामला गंभीर और चिंताजनक अवश्य है. 




 

24 सितंबर 2023

नारी शक्ति वंदन द्वारा सशक्तिकरण की पहल

वर्तमान दौर में जब महिला सशक्तिकरण की चर्चा होती है तो उन घटनाओं की स्मृति मन-मष्तिष्क में नहीं उठती है जिनको महिला सशक्तिकरण का आधार कहा जाता है. विश्व स्तर पर ऐसी चार घटनाएँ हैं जिन्होंने स्त्री-विमर्श को सशक्तता, वास्तविकता प्रदान की, इनके परिदृश्य में पुरुष वर्ग का हाथ रहा है. इन घटनाओं में सन् 1789 की फ्रांसीसी क्रांति, जिसने समानता, स्वतन्त्रता, बंधुत्व के नैसर्गिक अधिकारों को लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के रूप में प्रतिष्ठित किया; सन् 1829 का राजा राममोहन राय का सती प्रथा विरोधी कानून, जिसने स्त्री को मानव रूप में स्वीकार करने का अवसर दिया; तीसरी घटना सन् 1848 में ग्रिमके बहिनों द्वारा तीन सौ स्त्री-पुरुषों की सभा के द्वारा नारी दासता को चुनौती देते हुए नारी सशक्तिकरण की आधारशिला रखना और चौथी घटना के रूप में सन् 1867 में जे.एस. मिल द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेण्ट में स्त्री के वयस्क मताधिकार का एक प्रस्ताव रखना, जिसने स्त्री को भी मिलने वाले कानूनी एवं संवैधानिक अधिकारों को बल दिया. विश्व स्तर पर इन चार घटनाओं के सापेक्ष अनेक कार्यों के द्वारा महिला सशक्तिकरण के प्रयास होते रहे. न्याय और समानता के पक्षधर लोगों द्वारा समय-समय पर किये जाने वाले कार्यों से समाज में स्त्री-पुरुष समानता की अवधारणा को बल मिलता रहा.  

 



इसका व्यावहारिक उदाहरण देश के नए संसद भवन में देखने को मिला जबकि महिलाओं के लिए 128वें संविधान संशोधन के द्वारा नारी शक्ति वंदन अधिनियम नामक विधेयक पारित किया गया. इस विधेयक के द्वारा लोकसभा और प्रदेश की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है. अब लोकसभा की 543 सीटों में से 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पहले से ही सीटों के आरक्षण की व्यवस्था है. इन्हीं आरक्षित सीटों में एक तिहाई सीटें अब महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. अभी लोकसभा में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए 131 सीटें आरक्षित हैं. महिला आरक्षण विधेयक के बाद इन्हीं सीटों में से 43 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएँगी. इस विधेयक को परिसीमन के बाद ही पूरी तरह से लागू किया जा सकेगा. ऐसा माना जा रहा है कि आगामी वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में महिला आरक्षण विधेयक का व्यावहारिक रूप देखने को न मिलेगा क्योंकि अभी परिसीमन होना बाकी है. चूँकि आरक्षण पश्चात् सीटों की गणना वर्तमान परिसीमन पर की गई है, ऐसे में नए परिसीमन पश्चात् इसमें वृद्धि संभव है. लागू हो जाने के बाद महिला आरक्षण केवल 15 साल के लिए ही वैध होगा लेकिन इस अवधि को संसद आगे बढ़ा सकती है. प्रति पाँच वर्ष पर महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें बदलती रहेंगी. यह उसी तरह से होगा जैसे कि स्थानीय निकाय चुनावों में होता है. यहाँ भी पंचायत और नगर पालिकाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. इनमें प्रत्येक चुनाव में सीटों का आरक्षण बदलता रहता है.

 

निश्चित ही नए संसद भवन में नारी शक्ति वंदन के रूप में सभी दलों ने महिला शक्ति का वंदन करते हुए उस महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने में समर्थन दिया, जिसका पूर्व में कई बार विरोध किया जा चुका है. 1996 में देवगौड़ा नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार द्वारा इसे लाया गया था. इसके बाद राजग और संप्रग सरकारों ने भी इसे पारित किये जाने का प्रयास किया मगर दोनों सरकारों के अनेक घटक दलों के विरोध के कारण यह पारित नहीं हो सका. वर्ष 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने इसे राज्यसभा में पारित करवा लिया था किन्तु वह लोकसभा में इसे पारित करवा पाने में असफल रही थी. ऐसे में आखिर अब अचानक से ऐसा क्या हो गया कि सभी दल इसे लागू किये जाने पर सहमत नजर आये? इसके लिए नरेन्द्र मोदी नेतृत्व वाली सरकार के विगत वर्षों के वे कार्य प्रभावी रहे जो महिलाओं का सामाजिक स्तर बढ़ाने के लिए किये जाते रहे. बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान, उज्ज्वला योजना, घर-घर शौचालय, जनधन खातों के लिए महिलाओं की भागीदारी, मुद्रा योजना, तीन तलाक के विरुद्ध कानून बनाना आदि ऐसे कार्य हैं जिनके द्वारा सरकार का महिलाओं के पक्ष में खड़े होने का देशव्यापी सन्देश गया है. नए संसद भवन में विशेष सत्र के माध्यम से केन्द्र सरकार ने स्पष्ट सन्देश देने का कार्य किया कि महिलाओं का सामाजिक, राजनैतिक उत्थान करना उसकी प्राथमिकता में है.

 

अब जबकि विधेयक पारित हो चुका है और परिसीमन पश्चात् यह अपने व्यावहारिक रूप में भी आ जायेगा तब राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तिकरण को देखा-समझा जा सकेगा. पंचायतों में लागू महिला आरक्षण का दूसरा पक्ष किसी से भी छिपा नहीं है जहाँ बड़ी संख्या में महिलाओं के चुने जाने के बाद भी उनकी जगह पर प्रधान-पति, पंचायत-पति सक्रिय रहते हैं. ऐसी निर्वाचित महिलाएँ घर की चहारदीवारी में ही कैद रहने को मजबूर हैं. देखा जाये तो पंचायत चुनावों का कार्यक्षेत्र मूलरूप से ग्रामीण अंचल होने के कारण भी महिलाओं की सक्रियता उतनी खुलकर सामने नहीं आती है जितनी कि लोकसभा-विधानसभा चुनावों में दिखाई देती है. ऐसे में संभव है कि इन चुनावों में वे महिलाएँ ज्यादा सक्रियता से अपना व्यावहारिक रूप देखा सकेंगी जिनको पुरुष मानसिकता के चलते चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिल पाता. भले ही इस विधेयक का पारित होना महिला सशक्तिकरण के लिए वैश्विक रूप से स्वीकार्य चार घटनाओं जैसा न समझा जाये किन्तु महिलाओं के राजनैतिक सशक्तिकरण की नयी कहानी अवश्य ही लिखेगा. 






 

20 सितंबर 2023

लम्बी ऐतिहासिक यात्रा पर विराम

18 सितम्बर को भारतीय संसद के लिए एक ऐतिहासिक तिथि के रूप में याद रखा जायेगा. जिस संसद भवन ने अपनी 96 वर्षों की यात्रा में बहुत से ऐतिहासिक निर्णय होते देखे, बहुत से क्रांतिकारी परिवर्तन देखे, अनेक अप्रत्याशित घटनाक्रमों की गवाही दी, उसकी वह यात्रा इस दिन थम गई. 18 जनवरी 1927 से चली आ रही अनथक यात्रा को 18 सितंबर 2023 को विश्राम देकर नए संसद भवन को आने वाले समय के लिए तैयार कर लिया गया है. 


वर्ष 1911 में ब्रिटेन के तत्कालीन राजा जॉर्ज पंचम और महारानी ने भारत आने पर देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली बनाए जाने की घोषणा की. इसके बाद वहाँ संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, राजपथ, इंडिया गेट सहित अन्य हेरिटेज इमारतों को बनाने की जिम्मेदारी दो आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर को दी गई. 1921 में संसद को बनाने का काम शुरू हुआ और 1927 में यह भवन बनकर तैयार हुआ. छह एकड़ में बने इस भवन को शुरुआत में काउंसिल हाउस के नाम से जाना जाता था. 1926 से 1931 तक भारत के वायसराय रहे लॉर्ड इरविन द्वारा इसका उद्घाटन 18 जनवरी 1927 को किया गया. बाद में वर्ष 1956 में इसमें दो फ्लोर और वर्ष 2006 में एक संग्रहालय भी बनाया गया. यह संग्रहालय ढाई सौ सालों की समृद्ध लोकतांत्रिक विरासत को दिखाता है. 




18 सितम्बर से 22 सितम्बर 2023 तक चलने वाले विशेष सत्र के पहले दिन पुरानी संसद भवन की लम्बी यात्रा को याद किया गया. पाँच दिनों तक चलने वाले विशेष सत्र के दूसरे दिन की कार्यवाही के नए भवन में आरम्भ होते ही वो पुराना संसद भवन इतिहास बन जायेगा, जो 96 वर्षों की अवधि में घटित कई घटनाओं का गवाह रहा. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की कार्यप्रणाली जिस संविधान के प्रावधानों द्वारा संचालित होती है, उस संविधान का निर्माण इसी संसद भवन में हुआ था. 26 जनवरी 1950 में जब देश का संविधान लागू हुआ और राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने तो उस ऐतिहासिक पल का साक्षी ये पुराना संसद भवन बना था. देश के संविधान को लागू किये जाने के बाद संसद भवन ने 18 जून 1951 को हुए पहले संवैधानिक संशोधन को भी देखा. इसमें धारा 15, 19, 85, 87, 174, 176, 341, 342, 372 और 376 को संशोधित किया गया. अपनी इस यात्रा में संसद भवन ने कुल 105 संवैधानिक संशोधनों को होते देखा.


संसद भवन ने जहाँ सुखद पलों को अपने में सहेज रखा है वहीं उसके पहलू में दुखद घटनाओं ने भी जगह ले रखी है. 25 जून 1975 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के द्वारा आपातकाल की घोषणा किये जाने का निर्णय हो या फिर 1996 से 1998 की दो वर्षीय अवधि में चार प्रधानमंत्रियों का आना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह है. संवैधानिक व्यवस्था के इस बुरे दौर से गुजरते हुए संसद भवन ने अपनी सुरक्षा, अपनी आन-बान-शान पर हमला होने का दर्द भी सहा है. देश की सुरक्षा व्यवस्था पर उस समय सवाल उठे जबकि संसद भवन को ही आतंकियों ने अपना निशाना बनाया. 13 दिसम्बर 2001 को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने लोकतंत्र के इस मंदिर पर हमला कर दिया. इस हमले में सुरक्षा कर्मियों और दिल्ली पुलिस के जवानों सहित कुल नौ लोग शहीद हुए. यद्यपि हमले को अंजाम देने आये सभी पाँचों आतंकवादियों को सुरक्षाबलों ने मौके पर ही मार गिराया तथापि इस हमले ने एक गहरा जख्म तो दे ही दिया.


आतंकी हमले की टीस लेकर खड़े पुराने संसद भवन ने इसके अलावा बहुत सारे ऐसे ऐतिहासिक पलों को, घटनाक्रमों को घटित होते देखा है, जिनको देश की एकता, अखंडता, गौरव आदि के लिए जाना जा सकता है. किसी समय जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाओं ने वहाँ के जनजीवन को अस्त-व्यस्त करके रख दिया था. पाकिस्तान की तरफ से लगातार कश्मीर को कब्जाने के कुत्सित प्रयासों के चलते और संवैधानिक प्रावधानों के चलते जम्मू-कश्मीर देश का अभिन्न हिस्सा होने के बाद भी अलग-थलग सा दिखाई देता था. वर्तमान केन्द्र सरकार की दृढ इच्छशक्ति का सुफल भी पुराने संसद भवन ने महसूस किया जबकि 5 अगस्त 2019 को केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 पेश किया. इस अधिनियम के लागू हो जाने के बाद से  जम्मू-कश्मीर राज्य से सम्बंधित संविधान का अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी हो गया है. इसी के साथ अब देश में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केन्द्रशासित प्रदेशों की उपस्थिति भी हो गई है.




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 28 मई 2023 को नए संसद परिसर का उद्घाटन करते समय आशा व्यक्त की थी कि नया भवन सशक्तीकरण, सपनों को प्रज्वलित करने और उन्हें वास्तविकता में बदलने का उदगम स्थल बनेगा. ऐसा होना आज समय की माँग है क्योंकि विगत कुछ वर्षों से जिस तरह से पुराने संसद भवन के दोनों सदनों ने हंगामा, शोरगुल, आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाजी, सदन सञ्चालन में व्यवधान, असंवैधानिक कृत्यों को होते देखा है उससे न केवल संसद सदस्यों की साख में गिरावट आई है बल्कि संवैधानिक व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगे हैं. पुराने संसद भवन ने पाँच दिवसीय विशेष सत्र का पहला दिन अपने नाम करके नए संसद भवन को अपने उत्तराधिकारी के रूप में शेष चार दिनों को सौंप दिया है. अब नया संसद भवन देश के विकास की कहानी का साक्षी बनेगा और पुराना संसद भवन अतीत की गाथाओं को सुनाएगा. आशा है आज़ाद भारत में भारतीयों द्वारा बनाये गए इस नए ससंद भवन में हमारा लोकतंत्र अपनी श्रेष्ठता को प्राप्त करेगा. रिकॉर्ड समय में तैयार हुआ यह भवन न सिर्फ भारतीय मेधा का प्रतीक बना है बल्कि नए भारत की छवि प्रदर्शित करेगा जो अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों से आबद्ध है और उन पर गर्व करता है. नई संसद में स्थापित चोल शासकों का राजदंड सेंगोल राजशक्ति की न्याय के प्रति समर्पण का प्रतीक बनेगा और लोकतंत्र की इस कर्मभूमि को न्याय का मंदिर बनाएगा. 





 

09 अगस्त 2023

संसद बना विपक्ष का प्रचार मंच

लोकसभा में मंगलवार को विपक्ष द्वारा मणिपुर हिंसा के सन्दर्भ में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हुई. यह चर्चा आठ अगस्त से शुरू होकर दस अगस्त तक चलेगी. इसी दिन प्रधानमंत्री अपना जबाव देंगे. कांग्रेस के गौरव गोगोई द्वारा लाये गए इस अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की शुरुआत उन्होंने करते हुए मणिपुर हिंसा पर डबल इंजन सरकार को पूरी तरह विफल बताया. उनके द्वारा सवाल किए कि प्रधानमंत्री मणिपुर क्यों नहीं गए? मणिपुर के मुख्यमंत्री को क्यों नहीं हटाया गया? इस अविश्वास प्रस्ताव से मोदी सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. लोकसभा में बहुमत के लिए 272 सांसदों की ज़रूरत है. यहाँ एनडीए के पास 331 सांसद हैं, जिसमें अकेले भाजपा के पास 303 सांसद हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि भले ही सभी ग़ैर-एनडीए दल एक साथ आ जाएँ फिर भी केंद्र सरकार के पास अविश्वास प्रस्ताव से बचने के लिए पर्याप्त संख्या है. हालांकि कांग्रेस के इस प्रस्ताव का समर्थन करने वाले नवगठित गठबंधन का संख्याबल से कोई लेना देना नहीं है उनका एकमात्र उद्देश्य मणिपुर हिंसा पर प्रधानमंत्री मोदी को सदन में बोलने के लिए मजबूर करना है. मणिपुर में इसी तीन मई से हिंसा हो रही है, जिसमें डेढ़ सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. 




लोकसभा में पक्ष और विपक्ष की संख्या स्पष्ट रूप से दिखने के बाद भी विपक्ष के द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाये जाने पर भाजपा सांसद द्वारा सोनिया गांधी पर तंज कसते हुए कहा गया कि उनके लिए अविश्वास प्रस्ताव का एकमात्र मूलमंत्र है, बेटे को सेट करना और दामाद को भेंट करना. ऐसा तंज कसने के सन्दर्भ में यह भी समीचीन है कि 136 दिन बाद राहुल गांधी की लोकसभा में वापसी इसी सात अगस्त को हुई है. मोदी सरनेम मामले में सजा के बाद चली गई उनकी संसद सदस्यता को लोकसभा अध्यक्ष ने फिर से बहाल कर दिया है. ऐसे में संसद में राहुल गांधी का दोबारा आने को कांग्रेस तथा उनके सहयोगी दलों द्वारा जनता के बीच इस तरह से प्रस्तुत किया जाने का विचार हो सकता है, जिससे लगे कि वे सड़क से लेकर संसद तक लगातार संघर्ष कर रहे हैं.  विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव राहुल गांधी के संसद में दोबारा आने से संदर्भित इसलिए भी लगता है क्योंकि उनके आने और अविश्वास प्रस्ताव लाये जाने की तिथियों में समानता दिख रही है.  


यद्यपि राहुल गांधी की सदस्यता बहाल होने के बाद विपक्षी खेमा जोश में है तथापि इसी मानसून सत्र में अन्य कई विधेयकों के पारित होने के बीच दिल्ली सेवा बिल के पारित होने ने लोकसभा में विपक्ष के संख्याबल की वास्तविकता से परिचय करवा दिया है. चूँकि ना तो केंद्र सरकार को कोई खतरा है और ना ही विपक्ष संख्याबल के हिसाब से इस हैसियत में है कि सरकार को किसी भी तरह की परेशानी में डाल सके ऐसे में विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव लाने की अपनी मजबूरी को बताना पड़ा कि इसके द्वारा मणिपुर मामले पर प्रधानमंत्री का मौनव्रत तोड़ा जा सके. सोचने वाली बात ये है कि क्या मात्र प्रधानमंत्री का जबाव सुनने भर के लिए विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया होगा? यदि गंभीरता से आकलन किया जाये तो प्रस्ताव लाने की यह रणनीति अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए की जाने वाली कवायद है. इसके द्वारा एक तरफ राहुल गांधी को स्थापित करने वाला कदम भी उठाया जा रहा है, साथ ही नवगठित विपक्षी गठबंधन की मजबूती को भी जाँचा-परखा जा रहा है.


जिसे भी राजनीति की, संसद में संख्याबल की जरा सी भी जानकारी होगी उसे स्पष्ट रूप से समझ आएगा कि ये सारी कवायद विशुद्ध रूप से दिखावटी संघर्ष को दिखाने वाली है. देखा जाये तो कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल बजाय किसी तरह के सार्थक संघर्ष करने के संसद को खेल का मैदान बनाने के साथ-साथ राहुल गांधी को, अपने आपको प्रचारित-प्रसारित करने का माध्यम बनाने में लगे हैं. यदि विपक्षी दलों को वाकई संघर्ष करना है, जनता को दिखाना है तो उन्हें आपातकाल का दौर याद करना होगा. तब सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास संख्याबल आज के सत्ताधारी गठबंधन से भी बहुत ज्यादा था. पाँचवीं लोकसभा के चुनाव वर्ष 1971 में संपन्न हुए. यह स्वतंत्र आजाद भारत का पाँचवाँ आम चुनाव होने के साथ-साथ देश का पहला मध्यावधि चुनाव भी था. इसमें कुल 520 लोकसभा सीटों पर चुनाव हुए जिसमें से 352 पर कांग्रेस ने जीत हासिल की थी. यहाँ ध्यान देने योग्य एक तथ्य यह भी है कि इस चुनाव में कुल 54 पार्टियों ने अपना भाग्य आजमाया था. इसमें सीपीआई (एम) 29 सांसदों के साथ दूसरे नंबर पर रही जबकि मोरारजी देसाई की कांग्रेस (ओ) 16 सांसदों के साथ तीसरे नंबर का दल था.


उस दौर में सरकार ने न केवल संवैधानिक शक्तियों का दुरुपयोग किया बल्कि प्रशासनिक बल का भी दुरुपयोग किया. विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करने जबरन जेलों में डाला गया. अनावश्यक मुकदमेबाजी शुरू हुई. ऐसे तानाशाही भरे, क्रूरता भरे दौर में भी विपक्ष ने हार नहीं मानी. उसके नेताओं द्वारा बातों के बताशे नहीं फोड़े गए. जनता के सामने अपना संघर्ष दिखाने को संसद में शाब्दिक दुर्व्यवहार नहीं किया गया, टीवी, मीडिया का सहारा नहीं लिया गया, न आँख मारी गई, न फ़्लाइंग किस उछाली गई. उस समय के विपक्ष ने संख्याबल में कम होने के बाद भी सम्पूर्ण देश की जनता को सत्ताधारी दल के विरुद्ध अपनी ताकत बना लिया था. व्यावहारिक और वास्तविक संघर्ष उसी दौर में देखने को मिला था. उसी का परिणाम था कि जबकि समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण विपक्ष ने चुनाव लड़ा और 298 सीटें जीतीं. वर्ष 1977 की जनवरी को इंदिरा गांधी ने अचानक से आकाशवाणी के जरिए देश में आम चुनाव की घोषणा की. मात्र तीन दिन, 16 मार्च से 19 मार्च के बीच चुनाव संपन्न हुए. इस लोकसभा चुनाव में जनता ने विपक्ष के संघर्ष का साथ देते हुए कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया. कांग्रेस गठबंधन को मात्र 153 सीटें ही मिलीं.


यहाँ संसद को अपने नेताओं का, अपने प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाये बैठे विपक्षी दलों को यह तथ्य भी स्मरण रखना होगा कि संसद जनता के धन से संचालित हो रही है, जिस पर एक दिन का खर्च कई करोड़ रुपये आता है. संसद की कार्यवाही सामान्यतया एक सप्ताह में पाँच दिन चलती है. प्रतिदिन की कार्यवाही सात घंटे चलाने की परम्परा बनी हुई है. एक रिपोर्ट के अनुसार संसद में एक घंटे का खर्च डेढ़ से दो करोड़ रुपए बैठता है. ऐसे में यदि एक दिन का आकलन किया जाये तो यह खर्च बढ़कर बारह-तेरह करोड़ रुपए से अधिक होता है. सोचा जा सकता है कि कैसे देश के धन का अपव्यय उसी स्थान से किया जा रहा है जहाँ देश के नीति-नियंता विराजमान हैं. विपक्षी दलों को अपने व्यवहार में, अपने चाल-चलन में सकारात्मकता लानी होगी. वातानुकूलित सदन में बैठकर महज प्रधानमंत्री के मौनव्रत को तुड़वाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव को लाने, राहुल गांधी को संघर्षशील नेता के रूप में स्थापित करने जैसे संकुचित कदमों को छोड़ना होगा. उनको अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारी जनता के बीच जाकर करनी चाहिए. यदि विपक्षी दल वाकई मणिपुर मामले में संवेदित है तो वह उस हिंसा को लेकर वास्तविकता में जनता के बीच उतरे. सरकार की गैर-जिम्मेवारी को बुलंद आवाज़ में उठाये. सड़कों से लेकर जेलों तक आंदोलित रूप में नजर आये. 






 

28 मई 2023

नया संसद भवन देश को समर्पित

देश आज़ादी का अमृतकाल मना रहा है और इसी काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को स्वदेशी, नया संसद भवन समर्पित किया. पारंपरिक पूजा-पाठ के द्वारा नए संसद भवन का उद्घाटन समारोह आरम्भ हुआ. इसमें प्रधानमंत्री द्वारा ऐतिहासिक और धार्मिक सेंगोल को भी स्थापित किया गया. इस नए संसद भवन की आधारशिला 10 दिसंबर 2020 को रखी गई थी. इस भवन को आर्किटेक्ट बिमल पटेल ने डिजाइन किया और निर्धारित समयसीमा के भीतर यह बनकर तैयार भी हो गया. 




देश को मिला नया संसद भवन चार मंजिला है. 64 हजार 500 वर्ग मीटर में बने इस नए संसद भवन में तीन द्वार हैं, इन्हें ज्ञान द्वार, शक्ति द्वार और कर्म द्वार नाम दिया गया है. लोकतंत्र का प्रतीक संसद भवन 862 करोड़ रुपये की लागत में बनकर तैयार हुआ है. इस नए संसद भवन में संविधान हॉल है. इसी हॉल में संविधान की प्रति रखी जाएगी. संविधान हॉल के एक तरफ लोकसभा और दूसरी तरफ राज्यसभा है. नए संसद भवन में लोकसभा को 3015 वर्ग मीटर के क्षेत्र में तैयार किया गया है. इसे राष्ट्रीय पक्षी मयूर थीम पर बनाया गया है. राज्यसभा कुल 3,220 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में राष्ट्रीय फूल कमल थीम पर बनाया गया है.




भारत की प्रगति और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले नए संसद भवन के लिए एक विश्व स्तरीय बुनियादी ढाँचा निर्मित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले कारीगरों को स्किल इंडिया ने प्रमाणित किया है. इनके द्वारा नए संसद भवन का फर्नीचर ऐसे तैयार किया है कि लोकसभा में 888 और राज्यसभा में 384 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है. संयुक्त सत्र के दौरान लोकसभा भवन में 1272 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है. नए संसद भवन के लोकसभा में सेंगोल की स्थापना की गई है. इसे लोकसभा स्पीकर के आसन के पास लगाया गया है. सेंगोल राजदंड सिर्फ सत्ता का प्रतीक नहीं बल्कि राजा के सामने हमेशा न्यायशील बने रहने और जनता के प्रति समर्पित रहने का भी प्रतीक रहा है. 






 

31 मार्च 2023

अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है व्यक्तिगत टिप्पणी

भारतीय राजनीति में पिछले कुछ दिनों से राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द किये जाने का मामला तूल पकड़े हुए है. मानहानि सम्बन्धी एक मामले में राहुल गांधी को अदालत ने दो साल की सज़ा सुनाई. सज़ा मिलने के अगले दिन ही लोकसभा सचिवालय ने अधिसूचना जारी कर उनकी सदस्यता रद्द कर दी. अधिसूचना में बताया गया है कि केरल की वायनाड लोकसभा सीट के सांसद राहुल गांधी को सज़ा सुनाए जाने के दिन, 23 मार्च  2023 से अयोग्य करार दिया जाता है. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कर्नाटक में एक सभा को सम्बोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि सारे मोदी चोर हैं. इसके बाद गुजरात के भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी ने उनके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर किया था. राहुल गांधी को इसी मामले में सजा मिली है. उनकी सदस्यता रद्द करने का कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 102(1) और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अंतर्गत उठाया गया है. सदस्यता रद्द करने के मामले को एक मुद्दा बना दिया गया है. इसे केन्द्र सरकार द्वारा तानाशाही, विद्वेष की राजनीति बताया जा रहा है.


वैसे किसी भी सदन के सदस्य की सदस्यता रद्द किये जाने का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी लालू यादव, जयललिता जैसे वरिष्ठ नेताओं सहित कई सदस्यों की सदस्यता रद्द की जा चुकी है. इन सदस्यों को सरकारी काम में बाधा डालने, हत्या सम्बन्धी मामले, घोटाले में, हिंसा आदि के मामलों में अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी. इन मामले में दो साल की सज़ा मिलने पर सांसदों और विधायकों की सदस्यता रद्द हुई है, लेकिन मानहानि मामले में संभवत: यह पहला मामला है जब किसी सदस्य की सदस्यता रद्द की गई है. चूँकि वर्तमान में राजनैतिक पटल पर ऐसी मानसिकता बनी हुई है कि केन्द्र सरकार द्वारा उठाये गए किसी भी कदम को विपक्षी दलों द्वारा अधिकारों का हनन, संविधान के साथ खिलवाड़, लोकतंत्र की हत्या जैसा बताया जाने लगता है. राजनैतिक हथकंडों की कहानी कमोबेश लगभग सभी दलों और नेताओं की एक जैसी ही रहती है. एक-दूसरे पर आरोप लगाना, राजनैतिक बयानबाजी करते हुए शालीनता भूल जाना, विचारधारा का, कार्यों का विरोध करते-करते नेताओं का व्यक्तिगत आक्षेप लगाना अब आम बात होती जा रही है.




राहुल गांधी का ये कोई पहला बयान नहीं है जहाँ उनके द्वारा व्यक्तिगत आक्षेप, आरोप लगाये गए हों. इसके अलावा वे एकमात्र राजनैतिक व्यक्तित्व नहीं हैं जो इस तरह की अशालीन बयानबाजी करते रहे हों, व्यक्तिगत आरोप लगाते रहे हों. किसी भी रूप में यहाँ मुद्दा ये नहीं होना चाहिए कि राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करना सही है या गलत क्योंकि ऐसा कदम संवैधानिक नियमों के अनुसार ही उठाया गया है. यहाँ विचारणीय तो ये होना चाहिए कि आखिर राजनीति में अब अशालीन भाषा, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप क्यों होने लगे हैं? क्या संविधान के अनुच्छेद 19 में मौलिक अधिकार के रूप में अभिव्यक्ति की आज़ादी को रखने का ये दुष्परिणाम है? संविधान के अनुच्छेद 19(1)(A) में सभी भारतीय नागरिकों को वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है. ये अधिकार सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही मिले हैं. किसी विदेशी नागरिक को ये अधिकार नहीं दिए गए हैं. यहाँ वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ एक भारतीय नागरिक द्वारा लिखकर, बोलकर, छापकर, इशारे से या किसी अन्य तरीके से अपने विचारों को व्यक्त करने से है. अभिव्यक्ति की आज़ादी दिए जाने के साथ ही तत्कालीन नीति-नियंताओं को इसका भान रहा होगा कि इसका दुरुपयोग भी किया जा सकता है. इसी कारण से उनके द्वारा संविधान के अनुच्छेद 19(2) में इसके लिए कुछ सीमांकन भी कर दिया गया था.


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) में उन सीमाओं का उल्लेख है, जिनके द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कुछ हद तक प्रतिबन्ध लगाया गया है. इसके अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वह नहीं है जिससे देश की सुरक्षा को ख़तरा हो, विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों पर आँच आए, सार्वजनिक व्यवस्था/ क़ानून व्यवस्था खराब हो, शालीनता और नैतिकता के हित ख़राब न हों, अदालत की अवमानना हो, किसी की मानहानि हो, किसी अपराध के लिए प्रोत्साहन मिले, भारत की एकता, संप्रभुता और अखंडता को ख़तरा हो. इन सीमाओं के निर्धारण के बाद भी आये दिन नेताओं द्वारा इसका अतिक्रमण किया जाता है. कुबोल बोलते ऐसे नेता ये भूल जाते हैं कि संविधान ने उनको अभिव्यक्ति की आज़ादी इसके लिए दी है कि वे सरकार की निरंकुशता पर सवाल उठा सकें, जनहित के कार्यों के पक्ष में खुलकर बोल सकें, जनता के विरुद्ध होने वाले कार्यों का विरोध कर सकें, लोकतान्त्रिक व्यवस्था का हनन करने वालों के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर सकें. इन मूल बातों को भुलाकर उनके द्वारा व्यतिगत आक्षेप लगाये जाने लगते हैं, एक-दूसरे के निजी जीवन को सार्वजनिक रूप से कलंकित किया जाने लगता है.


हाल के दिनों में आरोप-प्रत्यारोप का, बयानबाजी करने का, सार्वजनिक सभाओं के साथ-साथ सदन में बोलने का स्तर गिरता ही नजर आया है. बिना इसका ध्यान रखे कि किसी भी भाषा, बोली, शब्दों का प्रभाव आज के इंटरनेट के दौर में वैश्विक होता है, अनर्गल बयानबाजी नियमित रूप से हो रही है. इस बयानबाजी को प्रमाणित करने का प्रयास इस रूप में किया जा रहा है कि राहुल गांधी के उस बयान को, जिसके लिए उनको न केवल दो साल की सजा मिली है बल्कि उनकी सदस्यता भी रद्द हुई है, कांग्रेस द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी बताया जा रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे लम्बे समय से सत्ता की परिधि से दूर होने के कारण, तमाम तरह के चुनावों में लगातार मिलती पराजय से, अब अपने ही एकमात्र परिवार के व्यक्ति की सदस्यता और चुनाव लड़ने पर आये संकट को देखकर कांग्रेसीजन सही और गलत का निर्णय करना भूल गए हैं.


वैसे ये अकेले कांग्रेस का मसला नहीं है, यहाँ सभी राजनैतिक दलों को, सभी जिम्मेवार राजनैतिक व्यक्तियों को आपसी सामंजस्य बनाकर विचार करना होगा कि कैसे राजनीति में भाषा की शालीनता बनी रहे. अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरुपयोग किसी भी रूप में न किया जा सके. अशालीन भाषा, घटिया शब्दावली तात्कालिक चुनावी लाभ दिलवा दे, सस्ती लोकप्रियता हासिल करवा दे किन्तु इससे न केवल लोकतान्त्रिक मर्यादा का हनन होता है बल्कि देश की छवि को भी धक्का लगता है. राहुल गांधी के मानहानि मामले में सजा और सदस्यता रद्द को किसी भड़काऊ कृत्य की तरफ मोड़ने से बेहतर है कि इसके द्वारा शालीनता की सीख लेने का प्रयास किया जाये.  

 






 

13 दिसंबर 2020

संसद हमले में शहीदों को नमन

संसद पर वर्ष 2001 में हुए आतंकी हमले को विफल करने के दौरान हुए संघर्ष में शहीद हुए सुरक्षा-कर्मियों को नमन. 



.
वंदेमातरम्

10 दिसंबर 2020

आत्मनिर्भर भारत निर्माण का गवाह बनेगा नया संसद भवन

आज, 10 दिसम्बर 2020 को भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण तिथि के रूप में स्वीकारा जायेगा. आज का दिन संसदीय लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. इस दिन वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कर-कमलों से नवीन संसद भवन का भूमि पूजन संपन्न हुआ. नौ दशक से अधिक समय से जिस भवन में देश की संसद अपना कार्य करती आ रही है यदि सब सही रहा तो सन 2022 में ये सारी गतिविधियाँ नवीन संसद भवन में संपन्न हुआ करेंगीं. वर्ष 2022 में स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगाँठ मनाये जाने के सुअवसर पर राष्ट्र को मिलने वाली यह अनूठी धरोहर निश्चित ही हमारे लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने का कार्य करेगी.




नवीन संसद भवन के साथ-साथ अनेक इमारतों का निर्माण भी किया जाना प्रस्तावित है. नए संसद भवन का भूमि पूजन करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि नए भवन का निर्माण समय और जरूरतों के हिसाब से बदलाव लाने का प्रयास है और आने वाली पीढ़ियाँ इसे देखकर गर्व करेंगी कि यह स्वतंत्र भारत में बना है. उन्होंने कहा कि पुराने संसद भवन ने स्वतंत्रता के बाद के भारत को दिशा दी है तो नया भवन आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का गवाह बनेगा. पुराने संसद भवन में देश की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए काम हुआ है तो नए भवन में 21वीं सदी के भारत की आकांक्षाएँ पूरी की जाएँगी. चार मंजिला नए संसद भवन का निर्माण 971 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से 64500 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में किए जाने का प्रस्ताव है.




प्रस्तावित भवन में लोकसभा के सदन में कुल 888 सदस्यों के बैठने की क्षमता होगी, वहीं संयुक्त सत्र में इसे 1224 सदस्यों तक बढ़ाने का विकल्प भी रखा जाएगा. राज्यसभा के सदन में कुल 384 सदस्य बैठ सकेंगे और भविष्य को ध्यान में रखते हुए इसमें भी जगह बढ़ाने का विकल्प रखा जाएगा. वर्तमान में लोकसभा सदन में कुल 543 सदस्य बैठ सकते हैं, वहीं राज्यसभा में कुल 245 सदस्य. इस नए भवन का निर्माण वर्तमान संसद के भवन की सीमित क्षमताओं के चलते किया जा रहा है. वर्तमान संसद भवन ब्रिटिश कालीन है. इसका शिलान्यास 1921 में हुआ था. वर्तमान में बहुत से सांसदों ने मॉडर्न और हाईटेक फैसिलिटी की माँग की है. वर्तमान संसद भवन को मॉडर्न कम्युनिकेशन और भूकंपरोधी सुरक्षा व्यवस्था के साथ अपग्रेड नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे इस 93 साल पुराने भवन को नुकसान पहुँच सकता है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने कहा था कि इस पुराने संसद भवन को पुरातात्विक संपत्ति के तौर पर संरक्षित किया जाएगा.



.
वंदेमातरम्