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06 जून 2025

दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे पुल

1315 मीटर लम्बे और एफिल टावर से भी ऊँचे पुल का उद्घाटन 06 जून 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया. जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बना यह पुल दुनिया का सबसे ऊँचा पुल है. यह उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. चिनाब रेल सेतु इस्पात और कंक्रीट का मेहराबदार पुल है जो जम्मू-कश्मीर के जम्मू मंडल के रियासी जिले में बक्कल और कौरी के बीच स्थित है. नदी तल से इस पुल की ऊँचाई 359 मीटर (1178 फीट) है.

 

चिनाब सेतु भूकंपीय क्षेत्र पाँच में स्थित है. यह दो पहाड़ों के बीच बना है, जहाँ तेज हवाओं की वजह से विंड टनल फिनोमेना देखा जाता है. इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए पुल को इस तरह से बनाया गया का, इस तरह से इसका डिजाइन तैयार किया गया है कि यह 260 किलोमीटर प्रति घंटा की हवा की गति का भी सामना आसानी से कर सकता है. जिसे इस तरह से बनाया गया है कि यह भूकंप और तेज हवाओं को भी झेल सकता है. 

 





22 अगस्त 2017

रेलवे प्रशासन यात्रियों की सुरक्षा को समझे

मुजफ्फरनगर में एक और ट्रेन हादसा हुआ. इसके बाद वही सरकारी लीपापोती, वही जाँच के आदेश. हर ट्रेन दुर्घटना के पीछे आतंकवादी कनेक्शन नहीं होता और हर ट्रेन हादसे के पीछे ऐसे ही कनेक्शन को तलाश करने का अर्थ है कि सरकारी तंत्र अपनी नाकामयाबी को छिपाने की कोशिश कर रहा है. मुजफ्फरनगर में हुए हालाँकि हालिया कलिंग-उत्कल ट्रेन हादसे में सरकारी तंत्र की तरफ से न तो आतंकी हाथ होने सम्बन्धी बयान आया और न ही उस दिशा में जाने जैसे कोई संकेत दिए गए. इस हादसे में प्रथम दृष्टया मानवीय चूक ही नजर आती है और हादसे के तुरंत बाद फौरी तौर पर कदम उठाते हुए सम्बंधित कर्मियों पर कार्यवाही भी कर दी गई है. इसके बाद भी कई सवाल हैं कि आखिर सम्बंधित रेलकर्मी अपनी जिम्मेवारी को समझते क्यों नहीं? आखिर हादसों के बाद निलम्बन, स्थानांतरण आदि के द्वारा कागजी खानापूरी कब तक की जाती रहेगी? रेलवे प्रशासन आखिर अपने यात्रियों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह क्यों बना हुआ है?

ये ट्रेन दुर्घटना कोई पहली दुर्घटना नहीं है. अभी कुछ माह पूर्व उत्तर प्रदेश के पुखरायाँ रेलवे स्टेशन के पास हुए भीषण हादसे में सैकड़ों लोगों की जान गई थी. उसके चंद दिनों बाद कानपूर के नजदीक रूरा रेलवे स्टेशन के पास भी ट्रेन पटरी से उतर कर पलट गई थी. शुक्र था भगवान का कि रूरा ट्रेन हादसे में बहुत जान-माल की क्षति नहीं हुई थी. यहाँ पुखरायाँ हादसे की जाँच में आतंकी कनेक्शन मिलने के सूत्र हासिल हुए हैं. उसके बाद पकडे गए कुछ आतंकियों ने उस हादसे के बारे में सबूत भी दिए थे लेकिन सभी ट्रेन हादसे आतंकी गतिविधियों के कारण नहीं हो रहे हैं. वर्तमान कलिंग-उत्कल ट्रेन हादसे में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ट्रेन पटरी पर काम चल रहा था, जिसमें घनघोर दर्जे की लापरवाही की गई. जो कुछ घटनास्थल पर दिखाई दे रहा है उसको और उजागर करने का काम मुजफ्फरनगर ट्रेन हादसे के बाद सामने आई वो ऑडियो क्लिप है जिसमें दो रेलवे कर्मचारियों की टेलीफोन पर हुई बातचीत है. इस बातचीत में ट्रेन दुर्घटना में लापरवाही के संकेत मिले हैं. बातचीत के आधार पर जैसा कि एक रेलवे कर्मचारी दूसरे से कह रहा है कि रेलवे ट्रैक के एक भाग पर वेल्डिंग का काम चल रहा था. लेकिन मजदूरों ने ट्रैक के टुकड़े को जोड़ा नहीं और इसे ढीला छोड़ दिया. क्रासिंग के पास गेट बंद था. ट्रैक का एक टुकड़ा लगाया नहीं जा सका था और जब उत्कल एक्सप्रेस पहुंची तो इसके कई कोच पटरी से उतर गए. इसके साथ ही यह भी कहा गया कि जिस लाइन पर काम चल रहा था, न तो उसे ठीक किया गया और न ही कोई झंडा या ट्रेन रोकने को कोई साइनबोर्ड लगाया गया. यह दुर्घटना लापरवाही की वजह से हुई. ऐसा लगता है कि सभी लोग निलंबित होंगे.

हर हादसे के बाद और सतर्कता से काम करने के निर्देश जारी कर दिए जाते हैं. जनता को आश्वासन और हताहतों को मुआवजा दे दिया जाता है. इतनी सी कार्यवाही के बाद रेलवे प्रशासन अपनी जिम्मेवारी को पूर्ण मान लेता है. ऐसे में क्या ये समझ लिया जाये कि रेलवे प्रशासन मान बैठा है कि ट्रेन हादसों को रोका नहीं जा सकता? आखिर एक तरफ देश को बुलेट ट्रेन के सपने दिखाए जा रहे हैं. ट्वीट के जरिये यात्रियों को मदद दिए जाने के रेल मंत्री सुरेश प्रभु के सकारात्मक कार्यों का बखान किया जा रहा है. रेलवे को सर्वाधिक सक्षम, संवेदनशील, सक्रिय विभाग माना जा रहा है. तब मानवीय लापरवाही का दिखाई पड़ना किसी और बात के संकेत देता है. साफ़ सी बात है कि केन्द्रीय स्तर पर प्रशासनिक नियंत्रण कार्य नहीं कर रहा है. निचले स्तर के कर्मचारी भी कार्य करने में कोताही बरतने के साथ-साथ मनमानी करने में लगे हुए हैं. यदि ऐसा न होता तो विगत तीन वर्षों में हुए ट्रेन हादसों में बहुतायत में पटरी का टूटा मिलना बहुत बड़ा कारण रहा है. मुजफ्फरनगर दुर्घटना में तो टूटी पटरी के टुकड़े को बिना बैल्डिंग जोड़ देना घनघोर लापरवाही ही कही जाएगी. 


रेलवे की तरफ से आये दिन किसी न किसी रूप में यात्रियों पर किराये में भार ही डाला जा रहा है और इसके पीछे का उद्देश्य सुगम, सुरक्षित यात्रा का होना बताया जा रहा है. इसके बाद भी ट्रेनों में बादइन्तजामी ज्यों की त्यों है. खाने में गन्दगी, कपड़ों में गन्दगी, ट्रेनों का देरी से चलना, ट्रेनों में आपराधिक घटनाएँ होना आदि ज्यों का त्यों बना हुआ है. वर्तमान मोदी सरकार का रवैया भी वैसा ही है जैसा कि पूर्ववर्ती सरकारों का होता था. ऐसे में बदलाव की उम्मीद कैसे की जा सकती है? कैसे उम्मीद की जा सकती है कि एक दिन इस देश का नागरिक बुलेट ट्रेन में यात्रा करेगा? कैसे कोई यात्री ट्रेन में चढ़ने पर विश्वास के साथ यात्रा करेगा कि वह अपने गंतव्य पर सही-सलामत उतरेगा? किसी अधिकारी-कर्मचारी का निलम्बन अथवा अन्य कोई कार्यवाही दुर्घटनाओं से बचने का अंतिम विकल्प नहीं हैं. अब रेलवे के कर्मियों को अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा. स्वयं रेलमंत्री को अपने कर्तव्यों दायित्वों का एहसास करना होगा. उन्हें समझना होगा कि उनके ऊपर लाखों यात्रियों की जान-माल की सुरक्षा की जिम्मेवारी है. उनको भविष्य की कार्ययोजना और आगे की कार्रवाई को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है. आखिर कोई ट्रेन यात्री इतनी अपेक्षा तो कर ही सकता है कि वह उचित किराया देकर ट्रेन में सफ़र कर रहा है तो अपनी मंजिल पर सुरक्षित पहुँच सके. इस तरह की दुर्घटनाओं से मुँह चुराने की नहीं वरन इनसे सबक लेते सीखने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ट्रेन हादसों को रोका जा सके.

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उक्त आलेख आज दिनांक 22-08-2017 के डेली न्यूज़ के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.

23 मार्च 2015

लापरवाह रेलवे


जनता एक्सप्रेस दुर्घटना रेलवे दुर्घटना इतिहास में कोई पहली घटना नहीं है और आखिरी तो कतई नहीं है. जिस तेजी से रेलवे के विकास की बात करते हुए सरकार बुलेट ट्रेन तक आ पहुँची है, उसी उलटी रफ़्तार से दुर्घटनाओं में वृद्धि होती आई है. मानवीय चूक के नाम पर, कमजोर व्यवस्थाओं के नाम पर, रेलवे में फैली विसंगतियों के नाम पर यात्रियों की जान से होते आ रहे खिलवाड़ को नजरंदाज़ नहीं किया जा सकता है. जिस तरह से समाचारों के माध्यम से सामने आया कि इंजन के ब्रेक फेल हो जाने का दुष्परिणाम इस दुर्घटना के रूप में सामने आया. इस तरह की लापरवाही को क्या समझा जाए? ऐसी एक-दो नहीं अनेक घटनाएँ सामने आती रही हैं, जिनके द्वारा रेलवे की लापरवाही उजागर होती रही है. कभी पटरी से ट्रेन के डिब्बों का उतर जाना, कभी टूटी-चटकी पटरियों से ट्रेन का गुजर जाना, कभी इंजन से बाकी डिब्बों का अलग हो जाना, कभी सिगनल के चक्कर में ट्रेन का आपस में टकरा जाना, कभी रेलवे के कर्मचारियों का नियमों की अवहेलना करते हुए ट्रेन सञ्चालन को जारी रखना आदि-आदि ऐसी स्थितियां हैं जो रेलवे प्रशासन की विशुद्ध लापरवाही को दर्शाती हैं. रेलवे ऐसी लापरवाही के साथ-साथ अपनी विसंगतियों के लिए भी विख्यात हो चुकी है.
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रेल विसंगतियों की जब भी बात आती है तो जेहन में स्टेशनों, प्लेटफार्म पर बढ़ती भीड़, रेल के भीतर यात्रियों की आपाधापी, रेलवे के तमाम सारे कर्मचारियों का समय से उपस्थित न होना, रेलों के आवागमन में भयंकर तरीके से होने वाली लेटलतीफी, रेलों के रखरखाव आदि की छवि उभर कर आती है. यदि इसे अन्यथा के रूप में न लिया जाये तो ये सारी स्थितियाँ वर्तमान में रेल की विसंगतियाँ नहीं वरन् उसकी पहचान बन गईं हैं. रेल के यात्रियों ने भी इन स्थितियों को आत्मसात् कर लिया है और आसानी से स्वीकार कर लिया है कि रेल यात्रा के समय इस तरह की स्थितियाँ तो सामने आयेंगी ही. रेलवे लापरवाही के परिदृश्य में प्लेटफार्म पर, स्टेशनों पर बढ़ती भीड़, रेलवे द्वारा मूलभूत सुविधाओं की कमी आदि-आदि विसंगतियाँ बहुत ही छोटी मालूम पड़ती हैं. पुलिसिया बदसलूकी, बदमाशों के गैंग द्वारा मारपीट आम घटनायें बन जायें तो इस प्रकार की विसंगति को प्राथमिकता में रखकर उसका निदान करना अनिवार्य प्रतीत होता है. इसके अलावा रेलवे की कार्यप्रणाली पर विचार किया जाये तो देखने में आता है कि पार्सलघर से सामान की चोरी का पता न लगना, स्टेशन से, ट्रेन से हुई चोरी का पता न चल पाना, चलती ट्रेन में जेबकतरों, जहरखुरानियों पर अंकुश न लग पाना, रेल में अवैध रूप से कार्य कर रहे वेंडरों, सामान बेचने वालों का घुस आना भी अभी नियंत्रित नहीं किया जा सका है. इन घटनाओं में भी कई बार मारपीट, छीना-झपटी आदि होने पर यात्री की जान तक चली जाती है. स्पष्ट है कि रेलवे प्रशासन की व्यवस्था कहीं न कहीं यात्रियों की जान से ही खिलवाड़ करने में लगी हुई है.
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ऐसे में सवाल यह उठता है कि रेल स्वयं में इस विसंगति को पाल रही है अथवा वह इस विसंगति से निपट नहीं पा रही है? सम्भव है कि रेलवे प्रशासन इस तरह के अराजक लोगों के सामने, अपनी व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से अमल में लाने के लिए, अपनी लापरवाहियों को रोकने के लिए इतना पंगु बन गया हो कि वह चाह कर भी कुछ कर न पा रहा हो. बहरहाल जो भी हो, जैसी भी स्थिति हो उस स्थिति में भी रेलवे को इस तरह की विसंगतियों से निपटने के उपाय करने चाहिए. मुआवजा दे देने से, सहानुभूति दर्शा देने से, किसी भी मृत यात्री की वापसी नहीं होती है. रेलवे प्रशासन को, सरकार को इस पर विचार करना ही होगा कि रेल यात्रा के सुखमय होने का प्रमाण अच्छे और भव्य रेलवे स्टेशन-प्लेटफार्म नहीं, कम्प्यूटरीकरण नहीं, उन्नत वातानुकूलन प्रणाली नहीं, मेट्रो का दौड़ना नहीं, लम्बी दूरी की सुपरफास्ट ट्रेनें नहीं, बुलेट ट्रेन की संकल्पना नहीं वरन् यात्रियों की सुरक्षा-सुविधा है. इसमें रेल प्रशासन लगातार नकारात्मक दिशा में जाता दिख रहा है.
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24 जून 2014

विंगतियाँ ही इसकी पहचान हैं गर देख सको




           व्यक्ति के स्वभाव में ही घुमंतु प्रवृत्ति रही है। इसके लिए कभी उसने पिकनिक को बहाना बनाया तो कभी परिवार सहित सुरम्य स्थल की सैर के आनन्द लेने का उपाय खोजा है। कभी रिश्तेदारों से मिलने के नाम पर तो कभी शादी-समारोहों के नाम पर अपनी घुमंतु प्रवृत्ति को शान्त किया है। यात्रा के विविध संसाधनों के मध्य आज भले ही अतिविकसित हवाई-यात्रा का प्रादुर्भाव हो गया हो किन्तु रेल में सफर का अपना ही आनन्द है। विभिन्न स्थलों की सैर करवाती हुई, विविध संस्कृतियों के दर्शन करवाती हुई, विभिन्न व्यक्तियों से सम्पर्क करवाती हुई रेल हमें अपने गन्तव्य तक ले जाती है। वैसे भी हवाई-यात्रा भले ही सुखद अनुभति, आसान यात्रा और समय की बचत करवाती हो किन्तु है अत्यधिक खर्चीली। इस कारण हवाई यात्रा करना प्रत्येक व्यक्ति के वश की बात नहीं है। ऐसे में व्यक्ति अल्पव्ययी संसाधन रेल का चयन करता है। 
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वर्तमान में रेल के साथ तमाम सारी ऐसी विसंगतियाँ जुड़ गईं हैं जो किसी न किसी रूप में सभी व्यक्तियों को प्रभावित करने लगी हैं। रेल विसंगतियों की जब भी चर्चा होती है तो जेहन में तुरन्त स्टेशन, प्लेटफार्म पर बढ़ती भीड़, रेल के भीतर यात्रियों की आपाधापी, टिकट, आरक्षण आदि समय से न मिलने की समस्या, रेलवे के तमाम सारे कर्मचारियों का समय से उपस्थित न होना, रेलों के आवागमन में भयंकर तरीके से होने वाली लेटलतीफी, रेलों के रखरखाव में लापरवाही आदि की छवि उभर कर आती है। यदि इसे अन्यथा के रूप में न लिया जाये तो ये सारी स्थितियाँ वर्तमान में रेल की विसंगतियाँ नहीं वरन् उसकी पहचान बन गईं हैं। रेल यात्रियों ने भी इन स्थितियों को आत्मसात् कर लिया है और स्वीकार कर लिया है कि रेल यात्रा में इस तरह की स्थितियाँ तो सामने आयेंगी ही। इन तमाम सारी घटनाओं के अतिरिक्त यात्रियों को रेलवे स्टाफ के द्वारा परेशान करना, प्लेटफार्म पर रेलवे पुलिस की ज्यादतियाँ, चलती ट्रेन में अपराधियों को संरक्षण आदि स्थितियाँ इस तरह से निर्मित हो रहीं हैं कि इनसे निपटना आसानी से सम्भव नहीं लगता है।
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            स्वयं रेलवे की तरफ से भी सामान्य श्रेणी के यात्रियों के प्रति सुविधाओं का टोटा कर दिया जाना भी एक प्रकार की विसंगति है। किसी भी ट्रेन में कम से कम सामान्य श्रेणी के डिब्बे और उनमें चढ़ती भयंकर भीड़ अब रेलवे को दिखाई देनी बन्द हो गई है। देखा जाये तो ये विसंगतियाँ नहीं बल्कि रेलवे की लापरवाहियाँ हैं। रेल में जब एक व्यक्ति अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिए बैठा है और उसके साथ पुलिसिया बदसलूकी हो, चलते गैंग के द्वारा मारपीट आम घटनायें बन जायें तो रेलवे को इस प्रकार की विसंगति को प्राथमिकता में रखकर उसका निदान करना अनिवार्य प्रतीत होना चाहिए। रेलवे की कार्यप्रणाली की लचरता का प्रमाण है कि पार्सलघर से सामान की चोरी का पता न लगना, स्टेशन से, ट्रेन से हुई चोरी का पता न चल पाना, चलती ट्रेन में जेबकतरों, जहरखुरानियों पर अंकुश न लग पाना, रेल में अवैध रूप से कार्य कर रहे वेंडरों, सामान बेचने वालों का घुस आना बिना किसी सहयोग के सम्भव नहीं दिखता है।
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            ऐसे में सवाल यह उठता है कि रेल स्वयं में इस विसंगति को पाल रही है अथवा वह इस विसंगति से निपट नहीं पा रही है? सम्भव है कि रेलवे प्रशासन इस तरह के अराजक लोगों के सामने इतना पंगु बन गया हो कि वह चाह कर भी कुछ करन पा रहा हो अथवा यह भी सम्भव है कि स्थानीय स्तर पर रेलवे प्रशासन को भी किसी न किसी प्रकार का लोभ-लालच दिखा कर इन अराजक व्यक्तियों-संगठनों द्वारा अपना उल्लू सीधा किया जाता हो? बहरहाल जो भी हो, जैसी भी स्थिति हो उस स्थिति में भी रेलवे को इस तरह की विसंगतियों से निपटने के उपाय करने चाहिए। रेल यात्रा के सुखमय होने का प्रमाण अच्छे और भव्य रेलवे स्टेशन-प्लेटफार्म नहीं, कम्प्यूटरीकरण नहीं, उन्नत वातानुकूलन प्रणाली नहीं, लम्बी दूरी की सुपरफास्ट ट्रेनें नहीं वरन् यात्रियों की सुरक्षा-सुविधा है। इसमें रेल नकारात्मक दिशा में जाती दिख रही है।
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