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23 अप्रैल 2025

हिन्दुओं के विरुद्ध सुनियोजित साजिश

पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा उठाये गए नृशंस कदम को प्रथम दृष्टया भले ही आतंकी हमला कहा जाये, भले ही इसे पर्यटकों पर हमला कहा जाये मगर आतंकियों द्वारा जिस तरह से कलमा पढ़वा कर, खतना देख कर, मजहबी पहचान करने के बाद हत्याएँ की हैं वो अलग कहानी कह रहा है. हमले से स्पष्ट है कि आतंकियों का उद्देश्य पर्यटकों को मारना नहीं था, पहलगाम में दहशत फैलाना नहीं था बल्कि उनका उद्देश्य सिर्फ हिन्दुओं की हत्या करना था. इस हमले को पुलवामा आतंकी हमले के बाद बड़ा हमला बताकर पहलगाम की घटना के सन्दर्भों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है.

 

पहलगाम की इस घटना के सन्दर्भ तलाशने के लिए कुछ वर्ष पूर्व की स्थितियों का आकलन किया जाना भी आवश्यक है. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार के ठोस और दृढ़ निर्णयों के बाद से भारतीय सेना ने, यहाँ के वीर जवानों ने अपने पूरे पराक्रम, पूरे साहस के साथ पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की, आतंकवादियों की कमर तोड़ी है, वह अपने आपमें बेमिसाल है. इसके साथ ही अगस्त 2019 में केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया था. इसको समाप्त करने के साथ ही राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित करके दोनों को केन्द्रशासित राज्य घोषित कर दिया था. अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में आतंकी घटनाओं में कमी देखने को मिली. यहाँ के सामान्य नागरिकों, विशेष रूप से हिन्दुओं ने सहजता का अनुभव किया. विगत के कुछ वर्षों में हिन्दू जनसंख्या द्वारा हर्षोल्लास के साथ अपने पर्व-त्योहारों का मनाया जाना आरम्भ हो गया. किसी समय मौत की कहानी कहते, सन्नाटों में रहने वाले लाल चौक ने भी शान से भारतीय तिरंगे को लहराते हुए देखा. यदि ऐसी अनेकानेक घटनाओं का सार निकाला जाये, उनका आकलन करके निष्कर्ष निकाला जाये तो कहीं न कहीं एहसास होगा कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति से जहाँ जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल होने लगी थी, वहीं हिन्दुओं में भी सुरक्षा का भाव आने लगा था.

 



जम्मू-कश्मीर की ऐसी स्थिति कम से कम उनके लिए असुविधाजनक तो है ही जो यहाँ पर आतंकवाद को फलते-फूलते देखना चाहते हैं. जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं की सहजता उन कट्टर ताकतों के लिए असहज हो गई होगी जिनके हाथ कश्मीरी हिन्दुओं के खून से रँगे हैं. यहाँ की शांति पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के पैरोकारों के लिए, उनके कट्टरपंथी आकाओं के लिए भी चुभने वाली रही होगी. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार की रणनीति जम्मू-कश्मीर क्षेत्र को लेकर स्पष्ट रही है, जिस तरह से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को लेकर, बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को लेकर भारतीय कूटनीतिज्ञ कदम सामने आते रहते हैं, उससे भी इस क्षेत्र के और सीमा-पार के आतंकवादियों में निश्चित रूप से बेचैनी रही होगी. ऐसी स्थितियों के बीच में जहाँ जम्मू-कश्मीर लगातार शांति, सुरक्षा की राह पर बढ़ता दिख रहा है वहीं पाकिस्तान की हालत लगातार अस्थिर होती जा रही है. यह किसी से भी छिपा नहीं है कि पाकिस्तान की, वहाँ की सरकार की अस्थिरता को रोकने का एकमात्र कदम भारत-विरोध, हिन्दू-विरोध रहा है. यह आज से नहीं बल्कि पाकिस्तान के निर्माण से ही उनका प्रमुख हथियार बना हुआ है. इस हथियार का प्रयोग पिछले सप्ताह इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने किया था. पाकिस्तानी सेना प्रमुख द्वारा उस कार्यक्रम में बयान अनायास ही नहीं दिए गए हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की उपस्थिति में पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कश्मीर को पाकिस्तान की गर्दन की नस बताया. इसके साथ-साथ उन्होंने परम्पराओं, रीति-रिवाजों, धर्म आदि को अलग-अलग मानते हुए हिन्दू-मुसलमानों को भी अलग बताया. सीमा-पार से आये इस तरह के अलगाववादी बयानों के बाद धार्मिक पहचान के आधार पर किये जाने वाला हमला न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि चिंताजनक है.

 

इधर जाँच में सामने आया है कि आतंकियों ने इस हमले की पूरी रणनीति पहले से तैयार कर रखी थी. पहलगाम पर्यटन स्थल को चुनने के पीछे उनका उद्देश्य गैर-कश्मीरियों को निशाना बनाना था. इसमें भी उनके निशाने पर हिन्दू नागरिक ही थे. स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में अशांति, आतंकवाद चाहने वालों का उद्देश्य यह दिखाना है कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद भी स्थितियाँ सुधरी नहीं हैं. यहाँ पर हिन्दू अभी भी असुरक्षित है. अब जबकि इस जघन्य और सुनियोजित इस्लामिक आतंकी हत्याकांड के बाद सेना सर्च ऑपरेशन चला रही है तो निश्चित रूप से इस घटना के साजिशकर्ता भी बेनकाब होंगे किन्तु केन्द्र सरकार को और अधिक कठोरता से, दृढ़ता से सैन्य कार्यवाही के लिए भारतीय सेना को अधिकाधिक अधिकार प्रदान करने होंगे. कठोर सैन्य कार्यवाई के द्वारा आतंकवादियों के, कट्टरपंथियों के आकाओं को, सीमा-पार पाकिस्तानी आतंकवाद को नेस्तनाबूद करना चाहिए. जम्मू-कश्मीर से विस्थापित हो चुके हिन्दुओं के मन में यह विश्वास जगाना होगा कि वे अब पूरी सुरक्षा, सहजता के साथ वापस लौट सकते हैं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह सन्देश देना होगा कि जम्मू-कश्मीर यहाँ के नागरिकों के लिए, पर्यटकों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है.


11 दिसंबर 2023

देश का अभिन्न अंग है जम्मू-कश्मीर

अनुच्छेद 370 को हटाने के सम्बन्ध में पाँच अगस्त 2019 की तरह ही 11 दिसम्बर 2023 का दिन ऐतिहासिक माना जायेगा. चार वर्ष पूर्व पाँच अगस्त को केन्द्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 और 35-ए को हटाने का साहसिक निर्णय लिया गया था. देश में एक विभाजक रेखा खींचने वाले अनुच्छेद के हटाये जाने के बाद भी उसकी बहाली को लेकर दिवास्वप्न देख रहे तमाम नेताओं द्वारा जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को लगातार बरगलाया जा रहा था. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णय के द्वारा ऐसी विभाजनकारी मानसिकता रखने वालों को आइना दिखाया गया है. इस निर्णय से सम्पूर्ण घाटी में और वहाँ के लोगों को झूठी तसल्ली देने वाले नेताओं तक स्पष्ट सन्देश पहुँच गया है कि अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था, जिसे हटाने का निर्णय विधिसम्मत था. पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की. सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है. इसकी कोई आंतरिक सम्प्रभुता नहीं है. 




सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से देश की अखंडता, सम्प्रभुता को वास्तविक आयाम मिला है. इससे विरोधियों द्वारा समाज में फैलाया जा रहा यह दुष्प्रचार गलत साबित हुआ कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने का निर्णय विघटनकारी है. इस निर्णय ने विगत सत्तर वर्षों के एक ऐसे काँटे को सदा के लिए देश की देह से अलग कर दिया है जो सम्पूर्ण देश के लिए नासूर बना हुआ था. देश की आज़ादी के समय काल-परिस्थितियों के वशीभूत कुछ इस तरह का घटनाक्रम सामने आया कि राष्ट्रीय हितों को दरकिनार करके तुष्टिकरण को प्राथमिकता दी गई. तत्कालीन परिस्थितियों के हाथों में यदि मजबूरीवश अनुच्छेद 370 को लागू करना भी पड़ा था तो भी यदि उस अस्थायी प्रावधान को समय रहते समाप्त कर दिया जाता तो अपने स्वर्गिक सौन्दर्य के लिए विख्यात जम्म-कश्मीर को नारकीय यातनाओं को न सहना पड़ता.


अनुच्छेद 370 के द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार प्रदान किये गए थे. यह भारतीय संविधान का एक अस्थायी प्रावधान है. इस अस्थायी प्रावधान के द्वारा ऐसी व्यवस्था की गई थी कि जम्मू-कश्मीर में केन्द्र सरकार को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के क्षेत्र में कानून बनाने का अधिकार होगा. इसके अलावा किसी अन्य क्षेत्र, किसी अन्य विषय के बारे में कानून बनाने के बाद वह जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण देश पर लागू होता था. उस कानून को जम्मू–कश्मीर में लागू करने के लिए केन्द्र सरकार को जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार से अनुमोदन लेना पड़ता था. इसी तरह यहाँ के निवासियों को दोहरी नागरिकता (भारतीय एवं कश्मीरी) भी प्राप्त थी. यहाँ की महिला से विवाह करने वाला पाकिस्तानी नागरिक यदि कश्मीर में आकर रहने लगता है तो उसको स्वतः ही भारत की नागरिकता मिल जाती है. जम्मू-कश्मीर का अपना राष्ट्रीय ध्वज होता था और तो और यहाँ का मुख्यमंत्री वही नागरिक बन सकता था जो यहाँ का मूल निवासी होता था. ये स्थितियाँ एक देश में ही दो देश होने जैसी स्थिति का आभास कराती रही हैं. अनुच्छेद 370 की तरह 35ए के द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त था. इसके द्वारा यहाँ के नागरिकों को कुछ विशेष अधिकार प्रदान किये गए थे. इसे 1954 में पारित किया गया था.


जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान होने के कारण अभी तक एक देश में दो संविधान चलते आये हैं. अनुच्छेद 370 और 35ए के समाप्त किये जाने के बाद जम्मू-कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग बना. इसके बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग राज्यों के रूप में मान्यता प्रदान की गई. निश्चित ही इससे यहाँ निवेश के रास्ते खुले और यहाँ के युवकों को भी रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए. केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार अभी तक जम्मू-कश्मीर के बाहर के 34 लोगों ने केन्द्रशासित प्रदेश में सम्पत्ति खरीदी है. वहीं जम्मू-कश्मीर में सऊदी अरब की तीन कम्पनियाँ भारी निवेश कर रही हैं. इसके अलावा वहाँ 890 केन्द्रीय कानूनों को लागू किया गया है. इससे वहाँ की कानून व्यवस्था और कई नियम देश के अन्य राज्यों की तरह हो गए हैं. केन्द्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को केन्द्रशासित राज्य का दर्जा दिए जाने के बाद यहाँ पर विकास के लिए अनेक योजनाओं को लागू किया. सरकार की ओर से बजट आवंटन में यहाँ का विशेष ध्यान रखा गया है. लगभग 28400 करोड़ रुपये औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए बजट में उपलब्ध कराये गये. इसके साथ ही 2020-21 में उद्योगों के लिए 29030 हजार कैनाल लैंड बैंक बनाए गए हैं. अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद सरकार के द्वारा जम्मू-कश्मीर में ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट भी करवाई गई थी. इसमें 13,732 करोड़ रुपये के एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे.


ये स्थितियाँ निश्चित ही अब और तेजी से विकास की राह पकड़ेंगी जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए वर्ष 2024 में जम्मू-कश्मीर में चुनाव करवाने और जल्द से जल्द इसे स्वतंत्र राज्य घोषित करने का निर्देश दिया है. निश्चित ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने एक भारत, श्रेष्ठ भारत की अवधारणा को मजबूत ही किया है. देखा जाए तो सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने एक पुराने और जटिल विवाद को सुलझाने का मार्ग प्रशस्त किया है. अब जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को समग्र देश के साथ आगे बढ़ने को एक मजबूत रास्ता मिला है. उम्मीद यही की जा सकती है कि अब पूर्वाग्रह, विवाद को त्यागते हुए सभी पक्ष राज्य को शांतिपरक, सर्वश्रेष्ठ बनाने की दिशा में अपना पूरा योगदान देंगे. 



 

16 अगस्त 2019

स्वतंत्रता और सुरक्षा का संयोग

स्वतंत्रता दिवस की और पावन पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

इस वर्ष का सावन माह अपने आपमें अभूतपूर्व घटनाओं का गवाह रहा है. इस अभूतपूर्व स्थिति में इए सुखद और पावन संयोग ही कहा जायेगा कि स्वतंत्रता का महोत्सव और भाई-बहिनों के स्नेह का पर्व एक दिन ही मनाया जा रहा है. इसी को किसी न किसी रूप में हम सभी संयोग कहते हैं, सितारों की चाल कहते हैं, सौभाग्य कहते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि यदि हम सावन माह की गतिविधियों को देखें तो देशहित में कई सारे निर्णय संपन्न हुए.


देश के वैज्ञानिकों की सफल यात्रा चंद्रयान के रूप में आरम्भ हुई. इस यात्रा की कमान देश की मातृशक्ति के हाथ में थी, यह भी अपने आपमें गौरवशाली क्षण था. इस अभियान के द्वारा जो कदम अन्तरिक्ष क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकता रखने जा रही है, वैसा आज तक किसी भी देश द्वारा उठाया नहीं गया है.


चंद्रयान से शुरू वैज्ञानिक सफलता यात्रा अभी आरम्भ ही  हुई थी, देशवासी अभी इस उमंग की सराबोर से उबरे भी न थे कि एक कदम सामाजिक भेदभाव दूर करने के लिए उठाया गया. तीन तलाक की समाप्ति भले ही एक समुदाय विशेष से संदर्भित हो मगर इसके समाप्त होने से देश की मातृशक्ति को समानता का अधिकार प्रदान किया गया, उनके व्यक्तित्त्व को एक इन्सान समझने की परिभाषा से अलंकृत किया गया.


इसके ठीक एक सप्ताह बाद ही एक देश, एक संविधान के विधान को स्पष्ट स्वरूप प्रदान किया गया. किसी समय राजनैतिक प्रतिस्थितियों के चलते उठाया गया कदम कालांतर में न केवल राजनैतिक विभेद का कारक बना बल्कि देश के भूभाग को भी एक तरह से अलग-थलग किये रहा. धारा 370 की समाप्ति के साथ ही दो राज्यों का निर्माण होने ने राजनैतिक सजगता की दिशा में कदम बढ़ाया तो देश को वास्तविक रूप में कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक होने का सन्देश दिया. यह भी देश की स्वतंत्रता के प्रति सार्थकता कही जा सकती है.


इन घटनाओं का होना शायद पूर्व-निर्धारित रहा होगा, शायद एक संयोग रहा होगा कि स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन एकसाथ, एक दिन मनाने का अवसर मिला. इसको एक सन्देश के रूप में देखने की आवश्यकता है. रक्षाबंधन को महज भाई-बहिन के पवित्र प्रेम के रूप में, सुरक्षा के रूप में देखने से इतर अब व्यापकता में देखने की आवश्यकता है. सरकारी स्तर पर स्वतंत्रता के सच्चे अर्थ स्पष्ट करते हुए वैज्ञानिकता को स्थापित किया, सामाजिकता को मान्यता दी और राष्ट्रीयता को एकता प्रदान की. अब हम सभी नागरिकों की जिम्मेवारी बनती है कि इस स्वतंत्रता को सुरक्षा प्रदान करें. अपने कार्यों से, अपनी जिम्मेवारियों से, अपने कर्तव्यों से देश को, समाज को, नागरिकों को सफलता की राह प्रदान करें, सुरक्षा की भावना का विकास करें, उनको आज़ादी का भान बना रहने दें.


आशा है कि हम सभी स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन के एकसाथ मनाये जाने के सन्देश को समझेंगे, इसमें अन्तर्निहित भावना को आपस में मिलकर और पुष्ट करेंगे. यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित ही हम सभी स्वतंत्रता का महोत्सव को सही आयाम प्रदान करेंगे, रक्षाबंधन की पवित्रता को अक्षुण्य रख सकेंगे. इसी पावन भावना के साथ आइये एक कदम समानता, भाईचारे, स्नेह, सुरक्षित स्वतंत्रता की ओर बढ़ाएं.

जय हिन्द

12 अगस्त 2019

तीन तलाक और धारा 370 : जिम्मेवारी के साथ सतर्कता आवश्यक


अगस्त का आरम्भ भारतीय राजनीति के लिए, समाज के लिए यादगार माना जायेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि सदन की तरफ से दो निर्णय ऐसे हुए जिनकी लम्बे समय से अपेक्षा ही नहीं थी वरन वे निर्णय देश के लिए, समाज के लिए अपरिहार्य भी थे. इन दो निर्णयों में तीन तलाक का मामला और धारा 370 का मामला रहे. दोनों निर्णयों को सदन में सत्ता पक्ष द्वारा बिना किसी हीलाहवाली के पारित करवाया गया. दोनों ही निर्णयों में सत्ता पक्ष का रवैया ठोस कार्यवाही करने जैसा रहा. उसके द्वारा जिस तरह से अपना पक्ष रखा गया, जिस तरह से इन दोनों मसलों के प्रति उसकी संवेदना साफ़ तौर पर दिखी वह प्रशंसनीय है. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि ये दोनों ही मामले सामाजिक रूप से और राजनैतिक रूप से बहुत ही संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दे थे. दोनों ही निर्णयों के प्रति पूर्ववर्ती सरकारों का रवैया सदैव से ढुलमुल भरा रहा है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले भाजपानीत सरकार केंद्र में नहीं थी मगर उसके द्वारा भी इस सम्बन्ध में ठोस कदम नहीं उठाया गया था. अबकी बार ऐसा साफ़-साफ़ देखने को मिला जबकि सरकार ने न केवल कठोर कदम उठाया बल्कि किसी भी तरह से विपक्ष को हावी न होने दिया.


सरकार की प्रशंसा इस रूप में भी की जानी चाहिए कि इन दोनों निर्णयों को सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के आरम्भ में ही लागू किया. ऐसा करने के पीछे उसकी मंशा साफ़ तौर पर ऐसे निर्णय लागू करने की दिखी. किसी भी तरह से उसके द्वारा इन निर्णयों का राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास नहीं दिखा. किसी भी सरकार द्वारा जब भी इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर कोई निर्णय लिया जाता है तो विपक्ष से, सरकार विरोधियों की तरफ से आरोप लगाया जाता है ऐसे मामलों के द्वारा चुनावी लाभ लेने का. यहाँ ऐसा कुछ नहीं है. इसके साथ-साथ सरकार के इन निर्णयों की प्रशंसा इस रूप में भी की जा सकती है कि इन दोनों मामलों में उसके द्वारा पर्याप्त सुरक्षात्मक कदम उठाये गए थे, जिसके चलते किसी भी तरह से उपद्रव नहीं हो सका. दोनों ही मुद्दे किसी न किसी रूप में मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए थे जिसमें तीन तलाक से ज्यादा संवेदित मामला जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाये जाने का था. इसमें जहाँ कश्मीर के अलगाववादियों का जुड़ा होना तो था ही साथ ही इस मामले में पाकिस्तान भी पर्याप्त रुचि दिखा रहा था. रुचि तो वह आज भी दिखा रहा है किन्तु उसके द्वारा कोई भी कदम सफल सिद्ध नहीं हो रहा है. 


जम्मू-कश्मीर मामले में सरकार की तारीफ इसके लिए भी करनी होगी कि उसके द्वारा इतने पुख्ता इंतजाम कर लिए गए थे कि न तो उस राज्य के अलगाववादी किसी तरह का उपद्रव कर सके, न पत्थरबाज़ अपने हाथ फैला सके और न ही पाकिस्तान कोई हिंसात्मक कदम उठा सका. इसके साथ-साथ सबसे बड़ी बात रही वैश्विक समुदाय का इस समूचे मुद्दे पर ख़ामोशी बनाये रखना. इससे स्पष्ट है कि विगत कार्यकाल में प्रधानमंत्री का वैश्विक नेताओं के साथ संबंधों का लाभ अब मिला है. ऐसे में पाकिस्तान बिलकुल अलग-थलग दिखाई देने लगा है. सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को उसके भौगौलिक हिसाब से दो राज्यों में बाँट देने का निर्णय भी सराहनीय कहा जायेगा. केंद्र शासित राज्यों की श्रेणी में आने से इन दोनों के केंद्र सरकार का नियंत्रण रहेगा और लद्दाख भी अपना पर्याप्त विकास कर सकेगा.

अब सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि उसने जिस तीव्रता के साथ, जिस कठोरता के साथ दोनों निर्णयों को लागू किया है उनको उसी जिम्मेवारी से सफलता की तरफ ले जाये. स्पष्ट है कि मुस्लिम समुदाय में जिस तरह से महिलाओं को लेकर, तीन तलाक को लेकर सोच बनी हुई है उसमें एकदम से उनके लिए स्वीकारना सहज नहीं होगा कि ये मामला अब गैर-कानूनी हो गया है. ऐसे में कानूनी रूप से प्रशासनिक रूप से सशक्त रहने की आवश्यकता है. मुस्लिम समुदाय की कमजोर तबके की महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान किये जाने की जिम्मेवारी भी अब सरकार की हो गई है. कुछ इसी तरह के एहतियात भरे कदम जम्मू-कश्मीर राज्य में उठाये जाने की आवश्यकता है. वहाँ के अलगाववादियों को, पाकिस्तान को ये कतई मंजूर नहीं होगा कि वहाँ किसी भी तरह से शांति बनी रहे. ऐसे में न केवल सेना को वरन वहाँ के नागरिकों को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है. यदि शुरूआती कुछ महीनों में इन दोनों निर्णयों पर सरकार, प्रशासन गंभीरता दिखाए रहा तो निश्चित ही दोनों निर्णय भारतीय समाज, राजनीति के लिए मील का पत्थर साबित होंगे.