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17 अप्रैल 2019

बर्फ सा न पिघलने दें बचपन को


बच्चों को सुबह जगाने, स्कूल के लिए तैयार करने के नाम पर चीखना-चिल्लाना; उनको नाश्ता कराने-भोजन करवाने के नाम पर क्रोधित होना; उनको पढ़ाने के नाम पर, होमवर्क करवाने के नाम पर खीझना जैसे अभिभावकों के बीच सामान्य गतिविधि होती जा रही है. संभव है कि ऐसा सभी घरों में न होता हो मगर जिस तरह से अभिभावक अपनी मनोच्छाओं को अपने बच्चों पर लाद रहे हैं, उसे देखते हुए ये बातें लगभग सभी घरों में नित्य ही देखने को मिलती हैं. असल में अभिभावकों ने ज़िन्दगी की आपाधापी में चल रही अंधी दौड़ में अपने बच्चों को भी शामिल कर लिया है. उनके लिए उनके बच्चे भले ही उनकी संतान हों, वे अवश्य ही उससे प्यार-दुलार करते हों मगर इन सबके ऊपर अपने बच्चों को सर्वोत्कृष्ट देखने का भाव उनके प्रति तीखी प्रतिक्रिया करने को प्रेरित करता है. वर्तमान औद्योगीकरण, वैश्वीकरण के दौर में जिस तरह से धन को किसी भी रिश्ते, किसी भी सम्बन्ध पर वरीयता दी जाने लगी है, उसने संबंधों-रिश्तों में एक तरह का खोखलापन तो भरा ही है, बचपन को भी शुष्क कर दिया है. अभिभावकों में अपने बच्चों पर अधिक से अधिक अंक लाने की, किसी न किसी खेल में, गीत-संगीत में, कला में भी अपना सर्वोच्च देने का दवाब बनाया जाने लगा है. खेलना-कूदना, शरारत करना जैसे फूहड़पन की बातें हो गई हैं.


किसी अभिभावक द्वारा अपने बच्चों के साथ इस तरह की कठोरता दिखाना, तेज आवाज़ में चिल्लाना, बात-बात पर टोकना आदि का उद्देश्य उनकी बेइज्जती करना नहीं होता है. असल में आज भी बहुसंख्यक अभिभावकों में आम धारणा बनी हुई है कि उनका अपने बच्चों के साथ इस तरह की गतिविधियों को अंजाम देना एक तरह का अनुशासन बनाना है. वे समझते हैं कि इस तरह से बच्चों की सुबह जागने से लेकर रात सोने तक की सभी गतिविधियों पर टोका-टाकी करके, उसमें कठोरता दिखाकर वे बच्चों को अनुशासित बना रहे हैं. यदि देखा जाये तो उनकी ऐसी सोच बहुत हद तक गलत है. संभव है अपने माता-पिता की टोका-टाकी करने से, उनके डांटने से, उनके तेज चिल्लाने से बच्चा कुछ हद तक शांत रह जाए मगर इससे वह अनुशासित नहीं हो सकता है. कई बार ऐसे मामलों में अभिभावक अपना, अपने समय का उदाहरण दिया करते हैं. इस तरह के उदाहरण देते समय वे भूल जाते हैं कि तब न वे अकेले हुआ करते थे और न ही परिवार अकेले हुआ करते थे. संयुक्त परिवार की अवधारणा के चलते कई पारिवारिक सदस्य एकसाथ रहा करते थे. ऐसे में किसी बच्चे की डांट पड़ने पर, उसके साथ सख्ती दिखाने पर उसे अकेलापन महसूस नहीं हुआ करता था. ऐसे में पारिवारिक सदस्य ही उसकी गलती बताते हुए उसे सुधारने की कोशिश कर लिया करते थे. अब जबकि परिवार एकल हो गए हैं, बच्चे भी बहुतायत परिवारों में एक ही हैं तब उनके साथ सख्ती बरतना उनको अनुशासित करना नहीं वरन उनको चिड़चिड़ा बनाना है. 

आज बच्चों को बाहर खुले में खेलने की न तो जगह दिखती है और न ही उनको बाहर खेलने की अनुमति मिलती है. स्कूल के काम, पढ़ाई के बोझ में वे खुद को दबा हुआ पाते हैं, अभिभावकों द्वारा अधिक से अधिक अंक लाने का दवाब भी उनके ऊपर होता है, खेलने के लिए भी कंप्यूटर या मोबाइल गेम उनके सामने होते हैं ऐसे में स्वाभाविक है कि उनका नैसर्गिक विकास नहीं हो पाता है. ऐसे में प्रतिदिन की सुबह से शाम तक की टोका-टाकी में बच्चे अपने आपको कमतर समझने लगते हैं. किसी एक ही काम के लिए भी बार-बार टोकने से उनको उस काम के प्रति वितृष्णा सी होने लगती है. इससे न केवल बच्चे काम करने से दूर भागने लगते हैं बल्कि अपने ही अभिभावकों के प्रति नकारात्मकता का एहसास पालने लगते हैं. यह स्थिति बच्चों के विकास को अवरुद्ध करती है. आज की स्थितियों में माता-पिता को बच्चों के साथ न सही एक दोस्त की तरह पर दोस्ताना माहौल में काम करने की आवश्यकता है. यदि माता-पिता इस तरह का वातावरण अपने परिवार में, घर में बना पाते हैं तो बच्चों का स्वाभाविक विकास करने के प्रति एक कदम बढ़ा सकते हैं. ऐसा न हो पाने की दशा में बच्चों में चिड़चिड़ापन आना, गुस्सा आना, नकारात्मक भावना का विकसित होना शुरू हो जाता है.

17 फ़रवरी 2019

तुममे और राष्ट्रीय पप्पू में अंतर क्या फिर...


पुलवामा आतंकी हमले के बाद लगातार लोगों का सक्रिय होना दिखाई दे रहा है. कोई बुद्धिजीवी बनकर सक्रिय है, कोई राजनीतिज्ञ बनकर सक्रिय है. किसी को नागरिक-बोध जाग गया है, किसी को सेना से एकदम से आत्मीयता जाग गई है. इन सबके बीच लोगों में राजनीति के कीड़े भी कुलबुलाने लगे हैं. किसी को इस मामले में पाकिस्तान एकदम से बेगुनाह सा, मासूम सा दिखाई देने लगा है. किसी को वह आत्मघाती आतंकवादी भी शांतिदूत दिखाई देने लगा है. किसी को उसके आतंकवादी बनने में सेना का दोष दिखाई देने लगा है. किसी को इस हमले में चुनावी साजिश दिखाई देने लगी है. साजिश दिखनी भाई चाहिए, आखिर पढ़-लिख कर दिमाग इस काबिल इसीलिए तो बनाया गया है कि साजिशों का भंडाफोड़ कर सकें. इसके बाद भी देखने में आ रहा है कि लोग सैनिकों की मौत से ज्यादा इस हमले को राजनैतिक रंग देने में जुटे हुए हैं. लोगों के दिमाग अभी भी पूर्वाग्रह से भरे हुए हैं. उन्हें ये हमला नहीं मुठभेड़ समझ आ रही है. आखिर इसे मुठभेड़ कैसे कह सकते हैं? 


शर्म आती है ऐसे लोगों की सोच पर जो इस आत्मघाती हमले को मुठभेड़ बता रहे हैं. इसके लिए पाकिस्तान को निर्दोष बता रहे हैं. इसमें भी वर्तमान केंद्र सरकार की साजिश देख रहे हैं. ऐसे लोगों के विचार देखकर लगता है कि इनके परिजनों ने इनके पढ़ाने-लिखाने में अनावश्यक ही अपना धन बर्बाद किया है. ये वे लोग हैं जो वर्तमान सरकार से, भाजपा से, मोदी से पूर्वाग्रह रखते हैं. भले रखें, कोई समस्या नहीं मगर कम से कम अपना दिमाग तो चलाकर देखें कि सत्य क्या हो सकता है? पुलवामा हमले में जिन लोगों को ये हमला चुनावों के चलते भाजपा-संघ की साजिश नजर आता है, वे एक बार अपना गोबर भरा हुआ दिमाग इस पर भी दौड़ाएं कि पाकिस्तान जाकर यहाँ की सरकार गिराने के लिए मदद कौन माँग रहा था? कांग्रेस तो वैसे ही कई कदम पीछे है. सत्ता में आने का लालच किसे है? ऐसे में इस तरह के कृत्य करने का कदम कौन उठाएगा? बाकी रही बात साजिश की तो इस देश में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत से लेकर बेटे संजय गाँधी तक की दुर्घटना के लिए किस दल को जिम्मेवार ठहराया जाता है, किस परिवार/खानदान को दोषी ठहराया जाता है. इस पर निगाह दौड़ा लें तो उनके पूर्वाग्रह इस हमले के सम्बन्ध में दूर हो जायेंगे.

चुनावों का हाल में होना और आतंकी हमले का होना कोई सह-सम्बन्ध नहीं. और यदि है भी तो कम से कम उसके लिए होगा जो खुलेआम पड़ोसी से अपने ही देश की सरकार गिराने की मदद माँग रहा है. ऐसे में बजाय अपने दिमाग बजाय भाजपा, कांग्रेस में फँसाने के सम्पूर्ण घटनाक्रम पर निगाह डालते हुए उसका आकलन करें. आखिर आपको भी पढ़ाया गया है, दिमाग को इस काबिल बनाया गया है कि आप खुद सही-गलत का आकलन कर सकें. ऐसा नहीं कर सकते तो आपमें और उस राष्ट्रीय पप्पू में क्या अंतर?

07 दिसंबर 2018

हिंसा का मूल जनाक्रोश या मानवीय स्वभाव

अनादिकाल से समाज ने शांति, अहिंसा, सौहार्द्र, स्नेह आदि-आदि सिखाने का काम किया है और उसी के सापेक्ष समाज ने ही अशांति, हिंसा, वैमनष्यता, बैर आदि सीखने का काम किया है. यहाँ विचारणीय है कि इंसान को लगातार प्रेम, दया, करुणा आदि का पाठ पढ़ाया जाता रहा है. उसे समझाया गया कि हिंसा गलत है. उसको कदम-कदम पर बताया गया कि सबको आपस में सद्भाव से रहना चाहिए. उसे कभी हिंसा करनी नहीं सिखाई गई. उसे नहीं सिखाया गया कि बैर भावना रखनी है. उसे नहीं पढ़ाया गया कि हत्या कैसे करनी है. इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि उसे जो कुछ सदियों से पढ़ाया जाता रहा उसको कायदे से नहीं सीख पाया. इसके सापेक्ष जो कुछ किसी ने नहीं सिखाया वह उन कामों को तीव्रता से करने भी लगा है.


क्या कभी इस पर विचार किया गया कि इंसानी स्वभाव के मूल में क्या है कि उसे सदियों से प्रेम, सौहार्द्र का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है मगर वह सिर्फ और सिर्फ हिंसा की तरफ ही बढ़ता जा रहा है? आये दिन खबरें मिलती हैं मासूम बच्चियों के साथ दुराचार की, उनकी हत्या की. आये दिन देखने में आ रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले किये जा रहे हैं, उनकी जान ले ली जा रही है. लगभग नित्यप्रति की खबर बनी हुई है किसी की हत्या, कहीं लूट, कहीं अपहरण, कहीं मारपीट. इसे महज दो पक्षों के बीच की स्थिति कहकर विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए. दरअसल हिंसा, अत्याचार, क्रूरता इंसानी स्वभाव का मूल है. इसे किसी समाजविज्ञानी, मनोविज्ञानी की दृष्टि से समझने की आवश्यकता तो है ही साथ ही सामान्य इंसान के रूप में भी इसे देखा-समझा जाना चाहिए. यदि पारिवारिक माहौल में देखा जाये तो छोटे-छोटे बच्चों को अकारण ही जमीन पर रेंगने वाले कीड़े-मकोड़ों को मारते देखा जा सकता है. मोहल्ले की गलियों में जरा-जरा से बच्चों को गलियों में टहलते जानवरों के पीछे डंडा लेकर उन्हें भगाना, मारना सहज रूप में दिखाई देता है. इंसानी जीवनक्रम में मारपीट, लड़ाई, गाली-गलौज सहज रूप में उम्र बढ़ने के साथ-साथ दिखाई देने लगती है. इस व्यवहार में कमी न होकर वृद्धि ही होती रहती है.

समाज में जहाँ सम्बन्ध स्वार्थ पर आधारित होने लगे हों; लोगों की प्रतिष्ठा उसके पद, उसके आर्थिक स्तर से होने लगी हो वहां आपस में खाई बनना स्वाभाविक है. इसके चलते लोगों में आक्रोश पनपना स्वाभाविक है. यही जनाक्रोश जरा सी हवा मिलते ही हिंसात्मक हो उठता है. भीड़ को धार्मिकता नजर आने लगती है. इस जनाक्रोश में हिंसक मन-मष्तिष्क भूल जाता है कि जिसके विरूद्ध वे सब हिंसक होने जा रहे हैं वह भी इसी समाज का हिस्सा है. वह भी उन्हीं की तरह किसी परिवार का अंग है. हिंसक भीड़ वर्षों से रटती आ रही प्रेम, स्नेह, अहिंसा, शांति, सौहार्द्र का पाठ भूल जाती है. उसके दिल-दिमाग में उसका मूल स्वभाव जानवर बनकर जाग उठता है.

वर्तमान समाज इतने खाँचों में विभक्त हो चुका है कि उसे मानवीय समाज कहने के बजाय कबीलाई समाज कहना ज्यादा उचित होगा. प्रत्येक वर्ग के अपने सिद्धांत हैं, अपने आदर्श हैं, अपने विचार हैं, अपनी विचारधारा है. सबकी विचारधारा, सबके आदर्श दूसरे की विचारधारा, आदर्श से श्रेष्ठ हैं. ऐसे में श्रेष्ठता, हीनता का बोध भी इंसानी स्वभाव पर हावी हो रहा है. आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो चुकी हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है.

10 फ़रवरी 2017

आत्महत्याओं के पीछे

फिर एक आत्महत्या, फिर एक युवा का चले जाना. दुःख भी होता है, क्षोभ भी होता है मगर बहुत सारे अनुत्तरित से सवाल सामने आ जाते हैं. तमाम तरह की अनिश्चितता सामने आ जाती है. संभावनाओं के इस दौर में भी युवा-शक्ति का अनिश्चय के साये में ज़िन्दगी बिताना और फिर हताशा में मौत के आगोश में चले जाना समझ से परे है. अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है, युवाओं का मरना ज़ारी है. इस हावी रहने में, बहुत कुछ जारी रहने में सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती नहीं. इक्कीसवीं सदी को औद्योगीकरण की, भूमंडलीकरण की, वैश्वीकरण की, तकनीक की सदी घोषित कर दिया गया. इसके चलते समाज में अर्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. लोगों के लिए एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ धनोपार्जन करना बन गया है. इसके लिए जीवन को यंत्रवत सा बना लिया गया है. अब विद्रूपता ये की ये यांत्रिक ज़िन्दगी न केवल धनोपार्जन के लिए वरन बचपन, शिक्षा, घर-परिवार आदि में भी दिखने लगी है. किसी समय मौज-मस्ती, शैतानियों, शरारतों आदि के लिए बचपन को याद किया जाता था किन्तु अब ऐसा लगता है जैसे बचपन की भ्रूण हत्या कर दी गई है. हँसते-खेलते बच्चों की जगह बस्तों का बोझ लादे, थके-हारे से, मुरझाये से बच्चे दिखाई देते हैं. शरारतों, शैतानियों की जगह उनके चेहरों पर बड़ों-बुजुर्गों जैसी भाव-भंगिमा, सोच-विचार दिखाई देता है. नीले आकाश के नीचे उन्मुक्त खेलते, तितली बनकर उड़ते बच्चों को अब कमरों में बंद कर दिया गया है, उड़ान के लिए उनके हाथों में लैपटॉप, मोबाइल थमा दिए गए हैं. किसी समय में दादा-दादी, नाना-नानी के आँचल में छिपकर परियों, वीरों के किस्से-कहानियाँ सुन-सुनकर बड़े होने वाले बच्चे टीवी सीरियल्स के कथित लाइव शो को देखकर बड़े हो रहे हैं, स्मार्टफोन की इंटरनेट दुनिया के कारण समय से पहले ही स्मार्ट हो रहे हैं. 



धनोपार्जन की आपाधापी में अभिभावकों का संलिप्त रहना, युवाओं का भागमभाग में जुट जाना, अपनी आँखों के सपनों को जिंदा बनाये रखने के लिए संवेदना को मारकर आगे बढ़ते जाना आदि ऐसा कुछ हुआ जिसने समूचे समाज को उल्टा खड़ा कर दिया. अनियमित होती जीवनशैली, परिवार से दूर रहने की मजबूरी, अधिकाधिक भौतिक संसाधनों की प्राप्ति करना, चकाचौंध भरी जिंदगी को जीने की लालसा ने इंसान को इंसान की जगह मशीन बना दिया. मशीन बनते इस इंसान ने मशीन बनते ही सबसे पहले अपने भीतर की संवेदना को समाप्त कर उसकी जगह एक बाज़ार को जन्म दिया. रिश्ते, नातों, परिवार, बच्चों, दोस्तों आदि को उसने सिर्फ बाज़ार की दृष्टि से देखा. सब जगह उसने हानि-लाभ का समीकरण लगाया और उसी के अनुसार अपने आपको संबंधों-रिश्तों के साँचे में उतारा. इस यांत्रिक जीवन का दुष्परिणाम यह हुआ कि सारे रिश्ते समाप्त से होते दिखे. बच्चों के लिए माता-पिता और माता-पिता के लिए बच्चे नोट छापने की मशीन मात्र बनकर रह गए. रिश्तों का मोल महज संबोधन के लिए होता दिखने लगा. ऐसी स्थिति में अकेलापन बढ़ना स्वाभाविक ही है और वैसा हुआ भी. धन, भौतिक संसाधन, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक की भरमार हो गई और इंसान एकदम अकेला हो गया.


इस अकेलेपन को दूर करने के लिए तनहा इंसान ने सबक न लिया; अपनी तन्हाई को दूर करने के लिए अपनों का सहारा नहीं लिया; अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए इंसानों का सहयोग नहीं लिया क्योंकि विडम्बना ये है कि आधुनिकता के बाज़ार में इंसान दिख ही नहीं रहे हैं. चारों तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन हैं, यंत्र ही यंत्र हैं. अकेलेपन का उपाय मोबाइल में, लैपटॉप में, छलकते जाम में, सिगरेट के छल्लों में, नशे के बादलों में, दैहिक आकर्षण में, बिस्तर की सिलवटों में खोजा जा रहा है. सेल्युलाइड के परदे की चकाचौंध को ही अपने जीवन की वास्तविकता मान लिया जा रहा है. आभासी दुनिया के नकलीपन को ही अपने जीवन का असलीपन बना लिया जा रहा है. इससे अकेलापन कम होने की बजे और बढ़ता जा रहा है. इंसान के भीतर एक तरह का खोखलापन बढ़ता जा रहा है. यही कारण है कि पिता अपनी ही बेटी से कुकृत्य करने में लगा है. भाई-बहिन के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन रहे हैं. इंसानी देह महज भोग की वस्तु बनती जा रही है. यौनेच्छा पूर्ति के लिए हवसी बच्चियों, वृद्धाओं, शवों तक को नहीं बख्श रहे हैं. दैहिक संबंधों को मानसिक संबंधों पर वरीयता दी जाने लगी है. ऐसी स्थिति में अंत नितांत दुखद होता है. जब आँख खुलती है तो व्यक्ति को अपने चारों तरफ आभासी दुनिया का एहसास होता है, नितांत भ्रम का एहसास होता है, सबकुछ पीछे छूट जाने के दुःख होता है, अपनों के कहीं दूर चले जाने का भाव जगता है. यही सबकुछ व्यक्ति में और अधिक दुःख, हताशा, निराशा का संचार कर देता है. ऐसे में व्यक्ति या तो अवसाद की अवस्था में चला जाता है या फिर आत्महत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठता है. ज़ाहिर है कि अकेलेपन का इलाज मशीन नहीं, बाज़ार नहीं, तकनीक नहीं वरन अपने लोग हैं, घर-परिवार है. आवश्यकता इस सत्य को समझने की है. यदि ऐसा नहीं होता है तो कारण कुछ भी बताये जाएँ, लोगों में अकेलापन हावी रहेगा, लोगों का मौत के आगोश में चलते चले जाना जारी रहेगा.

14 अक्टूबर 2015

पुरस्कार वापसी विशुद्ध राजनैतिक शिगूफा

हिन्दू धर्म के अंधविश्वासों को दूर करने की दिशा में कार्य करते हुए एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक साहित्यकार शहीद हो गए. बहुतों को इस शहीद शब्द पर आपत्ति हो सकती है, होनी भी चाहिए क्योंकि शहीद शब्द इतना मामूली नहीं कि किसी की मौत के लिए इस्तेमाल किया जाये. यहाँ भी हमारा मकसद किसी भी रूप में उक्त दो मौतों या कहें कि हत्याओं को शहीद या शहादत उच्चारित करने  का नहीं वरन वर्तमान दौर की मानसिकता को सामने लाना है. एक साहित्यकार की हत्या वर्तमान केन्द्र सरकार के कार्यकाल में होती है और दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या पिछली केन्द्र सरकार के कार्यकाल में होती है. इन दो मौतों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं सिवाय इसके कि ये दोनों ही हिन्दू धर्म के अंधविश्वासों को दूर करने का कार्य करते थे. इससे क्या अंदाज़ा लगाया जाये कि ये हिन्दू धर्म के वफादार थे अथवा हिन्दू धर्म के मानने वालों के प्रति वफादार थे? ऐसा इस कारण क्योंकि यदि ये सामाजिक हित में कार्य कर रहे होते तो न केवल हिन्दू धर्म के अंधविश्वासों के विरुद्ध कार्य करते वरन सभी धर्मों के अंधविश्वासों को दूर करने की चेष्टा करते. ऐसा कुछ भी करने का कोई प्रमाण इनके कार्यों से नहीं मिलता है. चलिए ये स्वीकार लिया जाये कि ये किसी न किसी रूप में सिर्फ और सिर्फ हिन्दू धर्म का भला चाहते थे और इसी कारण से इस एक ही धर्म के अन्धविश्वास मिटाना चाहते थे तो उन साहित्यकार महोदय द्वारा हिन्दू देव की मूर्ति पर पेशाब करने का दाम्भिक बयान देना किस तरह से अन्धविश्वास को दूर करता? संभव है कि वे सामाजिक कार्यकर्ता भी कुछ इसी तरह के क़दमों से अन्धविश्वास को दूर करने की चेष्टा करते होंगे?
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वे दोनों किस तरह से हिन्दू धर्म के अन्धविश्वास को दूर करने में लगे थे, ये वे दोनों ही जानते होंगे किन्तु सिर्फ हिन्दू धर्म के प्रति उनके ऐसे रवैये को देखकर स्पष्ट है कि वे अन्धविश्वास दूर करने की आड़ में सिर्फ और सिर्फ हिन्दू धर्म के विरुद्ध अपने कलुषित विचार सामने लाते होंगे. अब जबकि वे दोनों उन्हीं की तरह के धार्मिक कट्टर व्यक्तियों अथवा संगठन का शिकार हो गए हैं तो उनके अनुवर्ती अनेकानेक ऐसे लोग जो किसी न किसी रूप में खुद को हिन्दू धर्म के विरुद्ध खड़ा मानते हैं, उनकी मौत पर राजनीति करते दिखने लगे हैं. यहाँ उन दोनों व्यक्तियों को कट्टर कहने के पीछे का भावार्थ महज इतना है कि अपने विचारों को किसी दूसरे पर थोपना भी एक तरह की कट्टरता है. ऐसे लोग भूल जाते हैं कि वे धार्मिक अन्धविश्वास दूर करने के नाम पर अपने अन्धविश्वास को, अन्धविचार को शेष समुदाय पर थोप रहे हैं. उनके विचारों को, उनके विश्वासों को स्वीकार न करने पर वे कभी हिन्दू देवी-देवताओं को दारू पिलाते हैं, कभी उन पर थूकने का काम करते हैं, कभी उन पर पेशाब करने जैसा बयान देते हैं. बहरहाल, हिन्दू धर्म के विरुद्ध कदम उठा-उठाकर, लेखनी चला-चला कर अपनी आजीविका कमाने वाले, अपना पेट पालने वाले लोग उन दो व्यक्तियों की मौत के बहाने से हिन्दू धर्म पर, केन्द्र सरकार पर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधने का मन बनाये बैठे थे. ‘बिल्ली के भाग्य से छीका टूटने’ की भाँति ही ऐसे लोगों को दादरी का इखलाक कांड हाथ लग गया. एक साहित्यकार, एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या ने साहित्यजगत को हिलाकर रख दिया. अवसर की तलाश में बैठे लोगों ने देश में कथित रूप से शांति को, सहिष्णुता को खतरा बताते हुए साहित्य अकादमी से प्राप्त सम्मान-पुरस्कार को लौटना शुरू कर दिया.

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पुरस्कार वापसी के कदमों के दौरान सभी ने साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और दादरी कांड को आधार बनाया. पुरस्कार वापसी के द्वारा चर्चा में जल्द से जल्द आने की होड़ में ये लोग भूल गए कि सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या पिछली केन्द्र सरकार के समय हुई थी; ये लोग भूल गए कि यदि एक दादरी कांड से देश की शांति, सहिष्णुता, एकता, सौहार्द्र आदि नष्ट हो रहे हैं तो देश में इससे पहले की सरकारों में और भी भयानक-भयानक काण्ड हुए हैं जिन्होंने एक व्यक्ति को नहीं कई-कई परिवारों को मौत की नींद सुलाया है, कई-कई शहरों को उपद्रव की आग में झुलसाया है. दरअसल पुरस्कार वापसी के ज़रिये इन लोगों का हमला हिन्दू धर्म पर है, केन्द्र सरकार पर है और साथ ही साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पर भी है. कथित रूप से साहित्यकारों की वामपंथी बिरादरी को एक हिन्दीभाषी का अकादमी का अध्यक्ष बन जाना फूटी आँख भी नहीं सुहा रहा है. ऐसे में साहित्यकार की हत्या और दादरी कांड ने उनके मन की मुराद पूरी कर दी. इसके अलावा ये लामबंदी गैर-राजनैतिक होने के बाद भी विशुद्ध राजनैतिक है. यदि पुरस्कार लौटाते इन साहित्यकारों को वर्तमान केन्द्र सरकार से इतनी ही परेशानी है, इतनी ही समस्या है तो पुरस्कार लौटाने के साथ-साथ वे सारी सुविधाएँ लेना भी बंद करें जो केन्द्र सरकार की कृपा-दृष्टि से प्राप्त हो रही हैं/उसकी कृपा से प्राप्त की जाती हैं. दरअसल इन साहित्यकारों का मकसद अपने इस विरोध से वैश्विक स्तर पर केन्द्र सरकार को बदनाम करना है; उस सरकार के पक्ष में अपनी भक्ति दर्शाना है जिसने उन्हें पुरस्कार-सम्मान से नवाजा था. यहाँ सवाल उठता है कि क्या जिस साहित्यकार की मौत से, जिस सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या से, जिस दादरी कांड से पुरस्कार वापस करते इन साहित्यकारों का दिल पसीज रहा है, उनकी सहायता के लिए इनमें से कौन-कौन से साहित्यकार जागे? ये समझना होगा कि साहित्य अकादमी अपने आपमें स्वायत्त संस्था है न कि सरकार के नियंत्रण में, ऐसे में अकादमी के पुरस्कार वापस करने के पीछे की नीयत स्पष्ट समझ आती है. ऐसे साहित्यकार पुरस्कार वापसी के द्वारा अकादमी के अध्यक्ष पर, केन्द्र सरकार पर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर, हिन्दू धर्म पर हमला कर रहे हैं, वैश्विक स्तर पर सरकार की नहीं वरन सम्पूर्ण देश की छवि ख़राब कर रहे हैं. कम से कम ऐसे लोग साहित्यकार तो नहीं ही कहे जा सकते जो समाज में विभेदकारी स्थिति को पैदा करके संवेदना का नाटक कर रहे हैं. ऐसे लोगों को यदि दादरी के इखलाक की हत्या का दर्द है और विदर्भ या बुन्देलखण्ड के किसानों की आत्महत्याओं का दुःख नहीं है तो वे साहित्यकार नहीं सिर्फ और सिर्फ राजनैतिक दलों के प्रवक्ता सरीखे हैं, ये साहित्यकार नहीं दुराग्रही राजनैतिक समर्थक हैं. 
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01 अक्टूबर 2015

पक्षपाती भावना से किया गया लाठीचार्ज


          प्रशासन का दायित्व किसी भी रूप में शांति व्यवस्था बनाये रखना होता है. इसके लिए कई बार प्रशासन की तरफ से कठोर कदम उठाये जाते हैं. इन कठोर क़दमों में अकसर प्रशासनिक स्तर पर लाठीचार्ज करना, आँसू गैस के गोले छोड़ना, पानी की बौछार करना, प्लास्टिक की गोलियां चलाया जाना आदि शामिल हो जाता है. इस तरह के कदम प्रशासन की तरफ से उस समय उठाये जाने आवश्यक प्रतीत होते हैं जबकि हालात उनके नियंत्रण से बाहर के दिखाई देते हैं. प्रशासनिक दृष्टि में महज इतना स्पष्ट होना चाहिए कि सामने खड़ी भीड़ के अनियंत्रित होने से कानून व्यवस्था को समस्या है, सम्बंधित इलाके में अराजकता फ़ैल सकती है, जान-माल को नुकसान पहुँच सकता है. ऐसे में यदि प्रशासन किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कार्य करने लगे, भीड़ का जातिगत, धार्मिक चेहरा देखकर कार्य करने लगे, किसी वर्ग विशेष को संतुष्ट करने के लिए उक्त कार्य को अंजाम देने लगे तो स्पष्ट है कि उस समय प्रशासन का उद्देश्य न तो भीड़ को नियंत्रित करना है और न ही वातावरण को सामान्य बनाना है वरन सरकार के पूर्वाग्रहों को संतुष्ट करना है. 

          इस बार इस पूर्वाग्रह का शिकार बने गंगा नदी में मूर्ति विसर्जित करने निकले साधु-संत-बाबा और साथ में नन्हे-नन्हे, मासूम बटुक. देश की धार्मिक नगरी वाराणसी में रात के अंधियारे में प्रशासन द्वारा महज इस कारण से जबरदस्त लाठीचार्ज किया गया क्योंकि ये साधु-संत पावन नदी गंगा में गणेश विसर्जन करना चाहते थे. इन लोगों द्वारा मूर्ति विसर्जन की जिद सही थी या गलत, ये आकलन बाद का विषय है. प्रथम दृष्टया इसका आकलन होना चाहिए कि जिस तरह से बर्बरतापूर्ण ढंग से, गलियों में दौड़ा-दौड़ा कर पुलिसकर्मियों द्वारा इनको पीटा गया क्या वो सही था? ये सही है कि विगत कई वर्षों से लगातार सरकारी स्तर पर देश में नदियों के साफ़-सफाई हेतु ध्यान दिया जा रहा है; कल-कारखानों के गंदे पानी को, नगरों के मलमूत्र अपशिष्ट आदि को नदियों में जाने से रोकने के प्रबंध किये जा रहे हैं किन्तु जिस तरह से मूर्ति विसर्जन रोकने के नाम पर वहाँ उपस्थित लोगों को जिस तरह से पीटा गया, वो निंदनीय है. 

          स्थानीय प्रशासन को इस बात का जवाब देना होगा कि क्या उसके द्वारा गंगा नदी में गंदगी फ़ैलाने वाले सभी कारकों का निस्तारण कर दिया गया है? क्या किसी भी रूप में गंगा में आसपास स्थित कल-कारखानों, घरों, बाज़ार आदि के अपशिष्ट आदि का गिरना नहीं हो रहा है? क्या प्रशासन गंगा में किसी भी तरह से गंदगी फ़ैलाने वालों के विरुद्ध भी इसी तरह की कठोर कार्यवाही करता है? यदि प्रशासन द्वारा किसी भी रूप में सत्ताधारी राजनीति की अपनी किसी मजबूरी के चलते, सत्ताधारी राजनीति की तुष्टिकरण की नीति के चलते ऐसा कदम उठाया गया है तो ये प्रशासन की अक्षमता है. ऐसे में सरकार को समझाना चाहिए कि क्या उसके द्वारा प्रदेश में नदियों की स्वच्छता सम्बन्धी आवश्यक और अनिवार्य कदमों को पूर्ण रूप से उठाया जा चुका है? क्या गंगा नदी के सन्दर्भ में ही स्वच्छता सम्बन्धी नियमों का सख्ती से पालन किया जा रहा है? क्या जहाँ-जहाँ से गंगा नदी प्रवाहित हो रही है वहाँ-वहाँ उसके आसपास बने कल-कारखानों का गन्दा पानी, अपशिष्ट आदि को गंगा नदी में गिरने से पूरी तरह से रोका जा सका है? सम्पूर्ण प्रदेश न सही, क्या सरकार ने वाराणसी में ही गंगा नदी को उच्च स्तरीय रूप से स्थापित करने हेतु कोई ठोस कदम उठाया है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर मूर्ति विसर्जन के नाम पर एकाएक सख्ती को दिखाने के पीछे का मंतव्य आसानी से समझ में आ सकता है. उत्तर प्रदेश में वर्तमान सरकार के कार्यकाल में ये कोई पहला अवसर नहीं है जबकि हिन्दू धर्मावलम्बियों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया गया है. अनेक अवसरों पर एक वर्ग विशेष के प्रति तुष्टिकरण सम्बन्धी नीति अपनाकर प्रशासन द्वारा कठोर एवं सख्त कदम उठाये गए. स्पष्ट है कि सरकार कहीं न कहीं खुद को एक धर्म विशेष का, एक वर्ग विशेष का समर्थक दिखाना चाहती है जो उसके लिए चुनावी मौसम में वोट-बैंक के रूप में सफल सिद्ध हो.

यहाँ एक बात और कि सरकारी स्तर पर, प्रशासनिक स्तर पर नदियों में गिरती गन्दगी को रोकने के लिए भले ही बहुत सकारात्मक कार्य न किये गए हों; भले ही वर्तमान परिदृश्य में गंगा नदी में उसके आसपास स्थित कल-कारखानों, नगरीय इलाकों, बस्तियों आदि से अपशिष्ट, मलमूत्र, गंदगी, कचरा आदि लगातार गिराया जा रहा हो किन्तु इसके चलते किसी भी रूप में गंदगी फ़ैलाने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती है. सामाजिक रूप से नागरिकों को भी इसके लिए सचेत और जागरूक होने की आवश्यकता है और इसकी महती आवश्यकता उस समय प्रतीत होती है जबकि यह प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र की घटना हो. आवश्यक नहीं कि जो कार्य सदियों से होता आ रहा हो उसे काल-परिस्थिति के अनुसार बदला न जा सके. किसी समय में नदियों में जल-प्रवाह तेजी से हुआ करता था, उनके आसपास कल-कारखानों की इतनी बड़ी संख्या नहीं थी, नदियों में गिरने वाले अपशिष्ट की मात्र भी इतनी अधिक नहीं थी जैसी कि आज है. उस समय नदियों में मूर्ति-विसर्जन इस कारण भी सहजता से संपन्न हो जाता था क्योंकि मूर्तियों के रंगों में रासायनिक तत्त्वों का प्रयोग नहीं किया जाता था. अब जबकि मूर्तियों को सजाने-संवारने में अनेकानेक रासायनिक तत्त्वों का प्रयोग किया जा रहा है; मूर्तियों के साथ में उपयोग की गई सहायक सामग्री आदि को भी भरपूर मात्रा में प्रवाहित किया जा रहा है तब नागरिकों को, धर्मावलंबियों को, साधु-संतों को स्वयं गंगा नदी की स्वच्छता के प्रति, नदियों की स्वच्छता के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है.

बहरहाल गंगा नदी की स्वच्छता को लेकर, नदियों में गिरते अपशिष्ट को रोकने के सम्बन्ध में सरकारी स्तर पर, नागरिक स्तर पर क्या और कैसे प्रयास किये जा रहे हैं ये किसी से छिपा नहीं है. इसके बाद भी सत्यता यही है कि वाराणसी में रात के अंधियारे में मूर्ति-विसर्जन कर रहे लोगों पर बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज किया गया. जहाँ आज भी गंगा नदी में भारी मात्रा में गिरते अपशिष्ट को रोकने में स्थानीय प्रशासन नाकाम रहा है, सरकारी स्तर पर किये जा रहे प्रयास असफल सिद्ध हो रहे हैं वहाँ एक मूर्ति-विसर्जन होने देने से कोई आफत नहीं आ रही थी. चूँकि प्रशासन सत्ताधारी राजनैतिक दल के हाथों संचालित होकर सम्पूर्ण गतिविधि को अंजाम दे रहा था और सत्ताधारी पक्ष किसी दूसरे वर्ग विशेष को आकर्षित करने की मानसिकता से संचालित था. ऐसे में ये लाठीचार्ज महज लाठीचार्ज नहीं था, ऐसे में यहाँ महज मूर्ति-विसर्जन को रोकना उद्देश्य नहीं था; यहाँ गंगा नदी की स्वच्छता मात्र का ध्यान नहीं रखा जा रहा था वरन रात के अंधियारे में किये गए लाठीचार्ज के द्वारा कई-कई निशाने साधने के प्रयास किये गए थे. सरकारी स्तर पर ऐसी सोच वाकई चिंतनीय है, निंदनीय है.

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04 जून 2015

हानिकारक खाद्य पदार्थों का विरोध हो, राजनीति न हो


बच्चों के लिए ‘बस दो मिनट’ में तैयार होने वाली मैगी संकट की स्थिति में दिख रही है. मनमाफिक घरेलू पकवानों, नाश्ते की स्वादिष्ट परम्परा को समाप्त करके मैगी विगत कई वर्षों से माताओं के लिए वरदान साबित हो रही थी. किसी भी समय नाश्ते में, भोजन में. छुट्टियों में, सुबह में, शाम में, दिन में, रात में ‘कुछ भी’ बनाकर खिलाने की बचपन की जिद का समाधान मैगी ने माताओं के हाथ में थमा दिया था. मैगी और अन्य जंक फ़ूड पारंपरिक नाश्ते पर, खाद्य पदार्थ पर भारी सिद्ध हो रहे थे. भागदौड़ भरी जिंदगी में, आपाधापी के माहौल में, शारीरिक मेहनत से बचने की कवायद में कब इन खाद्य पदार्थों ने रसोई पर कब्ज़ा कर लिया, कब हमारी मानसिकता पर कब्ज़ा कर लिया हमें पता ही नहीं चल सका. समय के साथ इन खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ता ही जा रहा है. घर हो, रेस्टोरेंट हो, होटल हो, बच्चों की पार्टी हो, वैवाहिक कार्यक्रम हो अथवा किसी भी तरह का कोई भी आयोजन सभी में ऐसे खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सहजता से मिलती है. ये जानते-समझते हुए भी कि ये खाद्य पदार्थ कहीं न कहीं हमारी जीवनशैली को, हमारे शरीर को, हमारी सोच को, हमारे बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं, इनका प्रयोग कम नहीं हुआ. रसोई को थकाऊ, उबाऊ प्रक्रिया मानने, अभिभावकों के नौकरीपेशा होने ने, जीवनशैली के अनियमित होने ने भी इन खाद्य पदार्थों को स्वीकार्यता प्रदान करवा दी. माता-पिता की मजबूरी का फायदा उठाते हुए मैगी जैसे अन्य खाद्य पदार्थों ने बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी अपना दीवाना बना दिया. इस दीवानगी का खामियाजा कहीं न कहीं अपने शरीर पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के चलते भुगतना पड़ रहा है.
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ऐसे खाद्य पदार्थों के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति अकेले हम ही चिंतित नहीं दिख रहे हैं वरन वैश्विक रूप से अनेक देश इसके प्रति चिंतित नज़र आ रहे हैं. कुछ वर्ष पहले अमेरिका, चीन सहित अनेक यूरोपीय देशों ने इन जंक फ़ूड को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी, बच्चों के शारीरिक परिवर्तनों का अध्ययन करते हुए उनके प्रतिकूल व्यवहार को सामने रखा था. अब जबकि हमारे देश में मैगी में खतरनाक तत्त्व मिलने की पुष्टि हुई है, कई-कई राज्यों में मैगी अपने परीक्षण में असफल हुई है, इससे भी इसके हानिकारक होने की पुष्टि हुई है. ऐसा नहीं है कि अकेले मैगी ही हानिकारक है और अन्य दूसरे खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ आदि सुरक्षित हैं. ये समझने वाली बात है कि जब किसी खाद्य पदार्थ को उसकी प्राकृतिक अवस्था से इतर कई-कई माह के लिए सुरक्षित रखा जाना हो तो उसको किसी न किसी रासायनिक पदार्थ के द्वारा संरक्षित करना पड़ेगा. जाहिर सी बात है कि ये रासायनिक पदार्थ भले ही खाद्य पदार्थों को, पेय पदार्थों को देखने में, स्वाद में भले ही ताजा बनाये रखते हों किन्तु इनके प्राकृतिक तत्त्वों को नष्ट करके कहीं का कहीं मानव शरीर के लिए हानिकारक बना देते हैं. स्पष्ट है कि भले ही ऐसे पदार्थ अपना दुष्प्रभाव तात्कालिक रूप में न दिखाते हों किन्तु इनके दुष्प्रभाव दीर्घकालिक अवश्य ही रहता है.
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अब जबकि किसी भी तरह से मैगी पर कार्यवाही के चलते ऐसे खाद्य पदार्थों पर अंकुश लगाये जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है तो बजाय इसका स्वागत किये जाने के दबे-छिपे स्वर में इसका विरोध किया जा रहा है. इसको भी राजनैतिक रंग दिए जाने की कोशिश की जाने लगी है. मैगी का भले ही खुलेआम समर्थन न किया जा रहा हो किन्तु अनेक अभिभावकों द्वारा अन्य दूसरे पदार्थों पर अंकुश लगाये जाने की वकालत किया जाना अप्रत्यक्ष रूप से मैगी का समर्थन ही कहा जायेगा. ऐसे मौके पर होना ये चाहिए कि समवेत रूप से ऐसे सभी पदार्थों का विरोध किया जाना चाहिए जो बचपन के साथ खिलवाड़ करने में लगे हैं, बच्चों के भविष्य को खोखला बनाने में लगे हैं. समझना होगा कि ऐसे पदार्थों के सेवन से ही बच्चों में आक्रमकता जन्म ले रही है, समय से पूर्व उनके हारमोंस विकसित होने की खबर भी आई है, मोटापा, अनिद्रा, अवसाद जैसी अनेक स्थितियों ने भी जन्म लिया है. हम सभी को अपने लिए नहीं वरन अपने बच्चों के लिए मैगी के विरुद्ध चलने वाली प्रक्रिया में सहयोग करें. मैगी पर ही ऐसी आफत क्यों आई, मैगी अकेले पर प्रतिबन्ध क्यों, अन्य नशे वाले पदार्थों पर रोक क्यों नहीं आदि-आदि कहकर मैगी का अप्रत्यक्ष सहयोग न करें. ये हम सभी कहीं न कहीं स्वीकारते ही हैं कि ये पदार्थ शरीर पर दुष्प्रभाव डालते हैं तो महज दो मिनट की सुविधा के लिए अपने बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ न हम करें न किसी और को करने दें. एक मैगी के सहारे अन्य दूसरे दूषित, हानिकारक पदार्थों का भी विरोध करें. आइये इसके लिए बिना राजनीति किये एकजुट हो जाएँ.

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11 मार्च 2015

कानूनी प्रक्रिया में विलम्ब से उत्पन्न जनाक्रोश


नागालैंड में भीड़ द्वारा एक बलात्कारी को जेल से बाहर निकाल कर सरेआम उसकी हत्या कर चौराहे पर लाश लटकाने की घटना से देश भर में न्याय-प्रक्रिया को लेकर, बलात्कार के आरोपियों की सजा को लेकर, सजा सुनाये जाने की समयावधि को लेकर बहस छिड़ गई है. इस घटना के ठीक पूर्व एक मीडिया संस्थान की दिल्ली बलात्कार कांड से सम्बंधित डॉक्युमेंट्री ने भी एक तरह की बहस शुरू हुई. सवाल देश में शुरू होने वाली बहसों का नहीं वरन उन बहसों, तर्क-वितर्कों से निकलने वाले परिणामों को लेकर खड़ा होता है. आखिर इस तरह की बहस से मिलता क्या है, निकलता क्या है? दिल्ली बलात्कार कांड के बाद देशव्यापी आन्दोलन ने भी कानूनी प्रक्रिया, बलात्कार दोषियों की सजा के सम्बन्ध में कानूनी सुधार हेतु बहस को जन्म दिया था किन्तु उसके भी अपेक्षित परिणाम सामने आते नहीं दिखे हैं. बलात्कार उसके बाद भी और तीव्र गति से होते दिखने लगे हैं; महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ और तीव्रता पकड़ गईं लगती हैं; लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार और उनकी हत्याएँ किये जाने की वारदातों में किसी भी तरह की कमी नहीं आ सकी है. ऐसे में किसी भी कानूनी सुधार का क्या अर्थ निकलता है, किसी भी देशव्यापी बहस का क्या अर्थ रह जाता है?
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नागालैंड की घटना को कानूनी अथवा सामाजिक रूप से भले ही सही न ठहराया जा सके किन्तु इस घटना ने सोचने पर मजबूर अवश्य ही किया है कि यदि कानूनी प्रक्रिया में विलम्ब होता रहेगा तो एक न एक दिन जनता स्वयं ही इस तरह के फैसले लेने को मजबूर हो जाएगी. देश भर में यहाँ तक कि विदेशों तक में छाये रहे दिल्ली बलात्कार काण्ड की चर्चा करें तो पकड़े गए आरोपी स्पष्ट रूप से दोषी पाए गए हैं. पकड़ने से लेकर सजा निर्धारण तक की स्थिति में ये समझ से परे है कि आखिर सबूत, गवाह, तारीखों आदि का क्या मकसद रहा था? इतने जघन्य काण्ड के बाद भी सजा में देरी क्यों हुई? हाँ, उन घटनाओं में जहाँ कि सबूतों, गवाहों की आवश्यकता हो; पकड़े गए आरोपियों की पहचान का संकट हो वहाँ तो कानूनी प्रक्रिया का लम्बा खिंचना समझ आता है किन्तु निरर्थक रूप से किसी भी मामले को लम्बा घसीटना जनता में विद्रोह को ही जन्म देता है.
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दिल्ली कांड पर बनी डॉक्युमेंट्री को भले ही सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया हो किन्तु इंटरनेट के ज़माने से उसके प्रचार-प्रसार को रोक पाना नामुमकिन ही है. सोचने की बात ये है कि नागालैंड की घटना की तर्ज़ पर, डॉक्युमेंट्री से आक्रोशित होकर जनता ने कुछ वैसा ही कदम इन आरोपियों के लिए उठा लिया तो क्या होगा? ऐसे एक-दो नहीं कई-कई विवादित मामले ऐसे हैं जिनके सन्दर्भ में अनावश्यक रूप से देरी की जा रही है. मामले की गंभीरता को जानते-समझते हुए भी विलम्ब करना कहाँ का इंसाफ है, कैसा न्याय है इसे कानूनविद ही भली-भांति जानते होंगे.

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