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28 मार्च 2019

अन्तरिक्ष तक सर्जिकल स्ट्राइक संभव


कल, 27 मार्च को जब डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम आईलैंड लॉन्च कॉम्पलेक्स से रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक मिसाइल ने बतौर परीक्षण एक सैटेलाइट को मार गिराया तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जो अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता रखते हैं. भारत से पहले अभी तक यह क्षमता रूस, अमेरिका और चीन के पास थी. यह एक एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण था, जिसे मिशन शक्ति नाम दिया गया. इसके लिए DRDO के बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया गया. यह मौजूदा बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का हिस्सा है. इस मिशन में जिस सैटेलाइट को निशाना बनाया गया, वह निचली कक्षा में घूम रहा था. यह परीक्षण इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने इसके जरिये यह साबित किया है कि वह अपनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से बाहरी अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को निशाना बना सकता है. चूँकि हमारा पड़ोसी देश चीन बहुत पहले यह क्षमता विकसित कर चुका है ऐसे में भारत पर काफी दबाव था. यह सत्य किसी से छिपा नहीं है कि आज की दुनिया में पारंपरिक हथियारों से शत्रु का मुकाबला नहीं किया जा सकता है और वह भी तब जबकि पड़ोसी देशों से आपके संबंध अच्छे नहीं हों. ऐसे में देश की तरफ से किया गया यह परीक्षण भारतीय रक्षा शक्ति को कई गुना मजबूत करता है. 


यह सफलता केवल उल्लेखनीय नहीं वरन गौरवपूर्ण है. इस सफल परीक्षण के द्वारा भारत जमीन, हवा, पानी के साथ-साथ अन्तरिक्ष में भी अपने दुश्मनों से निपटने में सक्षम हो गया है. ऐसी आशंका लम्बे अरसे से जताई जाती रही है कि आगामी युद्ध, यदि कभी हुआ तो, वह धरती, हवा या जल में लड़ने के बजाय बहुत हद तक संभावित है कि अन्तरिक्ष में हो. ऐसा नहीं कि युद्ध करने वाले देशों के द्वारा अन्तरिक्ष में सेना भेजकर वहाँ युद्ध किया जायेगा वरन जिस तरह से सम्पूर्ण विश्व आज तकनीक के हाथों से संचालित होने लगा है, आम आदमी से लेकर सरकारों तक के कार्यों में अन्तरिक्ष में तैर रहे सेटेलाईट मददगार बन रहे हैं उस स्थिति में किसी भी देश को सैकड़ों वर्ष पीछे भेजने के लिए उसके उपग्रह को नष्ट कर देना ही बहुत है. इस तरह की सम्भावना कपोल-कल्पना नहीं और न ही टीवी पर दिखाए जाने वाले स्टार वार्स जैसे कार्यक्रम हैं बल्कि वास्तविकता है. इस वास्तविकता को समझने की आवश्यकता है, जिसे भारत ने समय रहते समझने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि उस पर अमल भी किया.

इस परीक्षण के बाद जैसी कि अपेक्षा थी, विपक्ष ने सरकार पर धावा सा बोल दिया. ऐसा दावा किया जाने लगा कि इस तरह का परीक्षण पिछली सरकार में किया जा चुका है, अब मोदी ऐसा बस चुनावों में लाभ लेने के लिए खोखला सन्देश दे रहे हैं. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि पिछली सरकार में ऐसे किसी परीक्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया था. इसे खुद रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन के आला अधिकारियों द्वारा भी सामने लाया गया. बहरहाल, वर्तमान समय राजनीति के जाल में देश की इस उपलब्धि को फँसाना नहीं है वरन सभी वैज्ञानिकों को बधाई देने का है. वैश्विक स्तर पर आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए सभी देश किसी न किसी तरह के कदमों को उठाते रहते हैं, ऐसे में भारत द्वारा महाशक्ति बनने की राह में उठाया गया यह कदम निश्चित ही भारतीय सामरिक शक्ति को विश्वसनीय पहचान देगा.

18 जनवरी 2018

अग्नि-5 की सफलतम उड़ान

आज, 18 जनवरी 2018 को भारत ने परमाणु क्षमता से लैस अग्नि-5 मिसाइल का सफल परीक्षण किया. इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 (आईसीबीएम) का परीक्षण सुबह लगभग 10 बजे ओडिशा तट पर स्थित द्वीप से किया गया. इसे जिस आइलैंड से लॉन्च किया गया है उसका नाम है अब्दुल कलाम. इस मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद माना जा रहा है कि इसकी जद में पूरा पाकिस्तान और चीन आएंगे. परमाणु क्षमता वाली अग्नि-5 मिसाइल 5000 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तक वार कर सकती है. इस मिसाइल के साथ ही भारत 5000 से 55000 किलोमीटर की दूरी तक वार करने वाले बैलिस्टिक मिसाइल संपन्न देशों के ग्रुप में शामिल हो गया है. अभी यह क्षमता अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन के पास ही है.


अग्नि-5 को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने विकसित किया है. अत्याधुनिक तकनीक से बनी 17 मीटर लंबी और दो मीटर चौड़ी मिसाइल परमाणु हथियारों से लैस होकर 1 टन पेलोड ले जाने में सक्षम है. 5 हजार किलोमीटर तक के दायरे में इस्तेमाल की जाने वाली इस मिसाइल में तीन चरणों का प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है. इस मिसाइल की विशेषता यह है कि MIRV तकनीक से लैस है अर्थात इस तकनीक की मदद से इस मिसाइल से एक साथ कई जगहों पर वार किया जा सकता है, एक साथ कई जगहों पर गोले दागे जा सकते हैं, यहां तक कि अलग-अलग देशों के ठिकानों पर एक साथ हमले किए जा सकते हैं.

यह मिसाइल इस्तेमाल करने में बेहद आसान है. इसे रेल, सड़क या हवा कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इसे किसी भी प्लेटफॉर्म से युद्ध के दौरान संचालित किया जा सकता है. अग्नि-5 मिसाइल की कामयाबी से भारतीय सेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी क्योंकि इसकी मारक क्षमता 5 हजार किलोमीटर तो है ही साथ ही ये परमाणु हथियारों को भी ले जाने में सक्षम है. सन 2002 में जब पहली बार इसका सफल परीक्षण किया गया था तब अग्नि-1 मिसाइल मध्यम रेंज की बैलिस्टिक मिसाइल थी. इसकी मारक क्षमता 700 किलोमीटर थी और इससे 1000 किलो तक के परमाणु हथियार ढोए जा सकते थे. लगातार विकास-पथ पर अग्रसर रहते हुए रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ ने अग्नि-2, अग्नि-3 और अग्नि-4 के बाद अग्नि-5 का सफल परीक्षण कर भारतीय सैन्य क्षमता को और शक्तिशाली बना दिया है. 

23 जून 2013

जिज्ञासा जगाता है गाँधी का ब्रह्मचर्य प्रयोग



मनुबेन की डायरी से मोहनदास करमचंद गाँधी नामक व्यक्ति, जिसे देश ने महात्मा, बापू, राष्ट्रपिता जैसे सम्मानीय संबोधनों से पुकारा, के ब्रह्मचर्य के प्रयोग की सत्यता प्रकट हुई. जितना कुछ मीडिया के माध्यम से सामने आया है उसमें कुछ नया नहीं है, पहले भी इस सम्बन्ध में कई तरह के विचार सामने आकर विवाद की स्थिति पैदा करते रहे हैं. आज विचारधाराओं के साथ द्वंद्व की स्थिति भले ही बनी रहती हो पर तकनीकी के दौर में, ज्ञान-विज्ञान के इस युग में किसी भी बात को तथ्यहीन रूप में स्वीकार लेना सहज नहीं रह गया है. ये बात सभी जानते हैं कि चाहे विज्ञान हो अथवा कला, सभी में प्रयोगों के लिए कुछ आधारभूत नियम हैं, संकल्पनाएँ हैं, बिना इनके किसी भी प्रयोग की सम्भावना नहीं बनती है. गाँधी जी ने भी इस प्रयोग का आरम्भ किया होगा तो कोई न कोई संकल्पना, कोई न कोई अवधारणा उनके मन में भी रही होगी या फिर ये नितांत मनोवैज्ञानिक बीमारी ही थी. यदि उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोग को केवल प्रयोग मानकर ही देखा जाये तो भी निम्न जिज्ञासाएं मन में उठती हैं, जिनका निदान आवश्यक है. 
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१-कोई भी प्रयोग उस स्थिति में आरम्भ किया जाता है जबकि उसकी कोई न कोई समस्या होती है. उसी समस्या के निस्तारण के लिए प्रयोग आगे बढ़ाया जाता है. गाँधी जी के सामने ऐसी कौन सी समस्या आई कि उन्हें ब्रह्मचर्य के प्रयोग को करने की आवश्यकता पड़ी?
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२-गाँधी जी ने अपने इस प्रयोग के लिए कौन-कौन सी परिकल्पनाओं (हायपोथेसिस) का निर्माण किया था. प्रयोग चाहे विज्ञान के क्षेत्र में हों या कला के क्षेत्र में, सभी में परिकल्पनाओं की जरूरत होती है. और यदि उनके द्वारा परिकल्पनाओं का निर्माण किया गया तो उन परिकल्पना/परिकल्पनाओं का परिणाम क्या हुआ? वे सार्थक निकली या नहीं?
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३- अब जबकि प्रयोग किया गया और लगातार किया गया तो उसका कोई न कोई परिणाम आया ही होगा. आखिर सभी प्रयोग कोई न कोई परिणाम देते ही देते हैं, भले ही वे नकारात्मक हों  या सकारात्मक. ऐसे में सवाल ये उठता है कि गाँधी जी के इस प्रयोग का परिणाम क्या निकला? इसके अलावा आखिर गाँधी जी ने इस प्रयोग से (भले ही वो असफल रहा हो या सफल) क्या निष्कर्ष निकाले? 
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४- जैसा कि सभी प्रयोगों में होता है कि उसके लिए कोई न कोई सीमांकन किया जाता है. क्या गाँधी जी ने अपने ब्रह्मचर्य के प्रयोग की कोई सीमा निर्धारित कर रखी थी? किस उम्र की महिलाओं के साथ ये प्रयोग किया जाना है; किस महिला के साथ कितने दिन/रात प्रयोग करना है; प्रयोग में सिर्फ नग्न लेटना/नहाना ही था या कोई और शारीरिक क्रिया की जाती थी आदि. गाँधी जी ने अपने प्रयोग के लिए जिन महिलाओं का इस्तेमाल किया, उनका क्या हुआ? आखिर वे कोई बेजान वस्तु नहीं वरन जीती-जागती इन्सान थी, उनमें भी संवेदनाएं थी, इच्छाएं थी.
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५- १९०६ में ब्रह्मचर्य का व्रत लेने वाले गाँधी जी ने अपने प्रयोग के लिए अपनी वृद्धावस्था का इंतज़ार क्यों किया? जैसा कि गांधी जी का मानना था कि युवतियों के साथ सोना ब्रह्मचर्य के विस्तार का अगला चरण है. वह इससे खुद को नियंत्रित करने का अभ्यास करते हैं. इससे क्या ये अर्थ लगाया जाये कि ब्रह्मचर्य का व्रत लेने के बाद भी उनकी यौनेच्छा कम नहीं हुई और वे अपनी इच्छा को प्रयोग के रूप में तुष्ट करने लगे. यहाँ ये कहने का आशय कतई नहीं है कि गाँधी जी इस अवस्था में व्याभिचार की तरफ मुड़ रहे थे पर प्रयोग करने की उनकी अवस्था अवश्य ही तमाम सारे सवालों को जन्म देती है क्योंकि युवावस्था में यह प्रयोग उनके नियंत्रण को और बेहतर तरीके प्रदर्शित कर सकता था.
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६- आज़ादी की लड़ाई में गाँधी जी के योगदान को कमतर नहीं आँका जा सकता. उनके सत्य, अहिंसा, प्रेम, सत्याग्रह का कोई न कोई औचित्य रहा है. उनका लाभ समाज को मिला है. ऐसे में ये जानना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि आखिर गाँधी जी के इस प्रयोग का औचित्य क्या था? समाज को इसका क्या लाभ मिलना था अथवा क्या लाभ मिला? आखिर गाँधी जी इस ब्रह्मचर्य के प्रयोग के माध्यम से तत्कालीन युवाओं को, वृद्धों को, महिलाओं को क्या सन्देश देना चाहते थे और आज के लोगों को उनके इस प्रयोग से क्या सीखना चाहिए?
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ये अपने आपमें विचारणीय है कि सन १९०६ में बिना अपनी पत्नी की सहमति के ब्रह्मचर्य की शुरुआत करने वाले महात्मा को आखिर इस तरह के प्रयोग की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? क्यों अपने आश्रम की कई महिलाओं, अपनी सहयोगी महिलाओं के साथ उनकी निर्वस्त्र अवस्था में, यहाँ तक कि अपनी नातिन के साथ निर्वस्त्र होकर सोते थे? उनके आश्रम के कड़े नियम कायदों के अनुसार उन युवतियों को अपने पति के साथ सोने की इजाजत नहीं थी. वे युवतियां न केवल गांधी के साथ नग्नावस्था में सोती थीं बल्कि उनके साथ नहाती भी थीं. इतना ही नहीं, वे उनके सामने ही अपने कपड़े उतारती थीं क्योंकि मोहमाया से मुक्त जीवन का रास्‍ता यहीं से जाता है. एक पल को महात्मा गाँधी के इस प्रयोग में उनकी आध्यात्मिकता को स्वीकार कर लिया जाए और उनके चरित्र पर बिना किसी तरह की ऊँगली उठाये ब्रह्मचर्य प्रयोग पर ही विचार किया जाए तब भी इस प्रयोग के औचित्य तथा उसकी प्रासंगिकता पर, गाँधी जी की मानसिकता पर, उनकी मनोवैज्ञानिक स्थिति पर भी सवाल खड़े होते हैं. सिर्फ इस कारण से कि वे विश्व के महान व्यक्तियों की श्रेणी में शामिल होते हैं, उनके किसी भी कदम को सहज रूप में स्वीकार लेना घनघोर अंध-भक्ति ही कही जाएगी. 
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20 अक्टूबर 2008

चाँद के पार चलो

चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो. ये पुरानी फ़िल्म पाकीजा का गाना हम नहीं गुनगुना रहे हैं...........ये गाना तो याद आया तब जब देश ने चंद्रयान की तैयारी कर ली. चंद्रमा पर जाने की तैयारी इस हद तक है कि अब चाँद की धरती हमारे क़दमों तले होगी. बेचारा चाँद अब घबरा रहा होगा कि अब यहाँ की शान्ति भी भंग हुई, इस देश में तो अब उपद्रव करने की कोई जगह तो बची ही नहीं है और विदेश में तमाम लोग ऐसे हैं जो उपद्रव मचा रहे हैं तो कहाँ उपद्रव किया जाए, शायद यही सोच कर चाँद पर जाने की तैयारी है.
आप लोग देख रहे हैं अपने देश की तरक्की.........अपने देश में बेघरों को घर नहीं पर जमीन तलाश रहे हैं चाँद पर.........अपने देश का पानी पूरी तरह समाप्ति पर ला दिया और अब तलाश है चाँद-मंगल पर पानी की..............देश के हालत काबू में नहीं हैं पर आतंक काबू करेंगे श्रीलंका में जाकर. आप सोच रहे होंगे कि ये श्रीलंका कहाँ से बीच में आ गया..........बात इस समय ये नहीं कि चाँद की चर्चा हो या श्रीलंका की.......चर्चा हो बस हमारी उपलब्धियों की. इस चर्चा (श्रीलंका वाली) से याद आयी एक कहावत - "अपना फटा सी न पायें, दूजे के फटे में टांग घुसाएँ."
कुछ भी हो बस हौसला न खो जाए ये ध्यान रखना होगा.......कुछ भी हो पर इंसानियत न खोये ये ध्यान रखना होगा. यदि पिछले महीने के वैज्ञानिक परीक्षण "महाप्रयोग" को याद करें तो देश का करोड़ों रुपये इसमें लगा और परिणाम क्या मिला? इसी तरह वर्तमान में देश के हालातों को ध्यान कर इस तरह के प्रयोग होने चाहिए....पर नहीं यहाँ तो शेयर कि गिरावट, मंदी, महंगाई के कारण लोगों के बाल बन रहे है. यदि सरकार न चेती तो चाँद तो दिखने ही लगेगी. तब चंद्रयान परीक्षण शत-प्रतिशत सफल सिद्ध होगा..........

11 सितंबर 2008

पहले सामजिक स्थिति को सुधारना होगा

आज दो-तीन दिन बाद ब्लॉग पर लौटना हुआ. इधर कुछ अजीब तरह की व्यस्तता रही. इसी बीच कुछ काम मिला लोगों से मिलने-जुलने का, वो भी अजीब से विषय को लेकर. सरगर्मी हर तरफ़ छाई रही कि दस तारीख को वैज्ञानिक परीक्षणों के कारण प्रलय आने वाली है, सारी धरती नष्ट हो जायेगी. अपनी सामाजिक शोध संस्था "समाज अध्ययन केन्द्र" (SOCIETY STUDY CENTRE) के द्वारा एक छोटा सा सर्वे करने में लग गए. आश्चर्य तो तब हुआ कि पढ़े-लिखे समाज में आज भी ऎसी बातों पर जयादा ध्यान दिया जाता है जिनका कोई भी सर-पैर नहीं होता है। इससे अधिक आश्चर्य की बात तो ये है कि एक ओर तो हम पढ़े-लिखे होने का दम भरते हैं और दूसरी तरफ़ किसी भी आपदा से बचने के लिए उपाय न करके पूजा-अर्चना या फ़िर ज्योतिष के चक्कर में पड़ जाते हैं.

इस वैज्ञानिक घटना को लेकर भी यही सब होता रहा. लोगों में भय रहा और पंडितों-पुरोहितों ने नक्षत्रों का भय दिखा कर अपना उल्लू सीधा किया. यहाँ पंडितों को बढावा देने का काम हमारे तेज-तर्रार मीडिया ने भी किया. समाचार-पत्रों में ख़बरों के अनुसार एक-दो स्थानों पर बच्चों ने डर के कारण आत्महत्या कर ली. मीडिया ने यह दिखाने के कि वैज्ञानिकों के परीक्षण के क्या परिणाम होंगे यह दिखाने में अधिक दिलचस्पी दिखाई कि धरती किस समय नष्ट होगी, कैसे नष्ट होगी?

इस तरह के वैज्ञानिक परीक्षण क्या सिद्ध करेंगे ये तो वैज्ञानिक ही बता पाएंगे पर जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि भारत जैसे देशों को अभी कई वर्षों तक ऐसे परीक्षणों से दूर रहने की जरूरत है. बताया जा रहा है कि इस परीक्षण में भारत ने भी चार करोड़ डालर की धनराशी खर्च की है. यदि एक पल को मान लिया जाए कि इस महाप्रयोग से ज्ञात हो जाएगा कि धरती का जन्म कैसे हुआ, किस तरह अन्य चीजों का विकास हुआ तो उससे किस तरह की तरक्की हो सकती है? एक ऐसे देश में जहाँ अभी भी एक बड़ी आबादी खाने-पीने की समस्या से जूझ रही है, एक बहुत बड़ा भाग अपनी आजीविका के लिए भाग-दौड़ कर रहा है, एक बहुत बड़ा भाग बीमारियों से लड़ रहा है, पोलियो, एड्स, कैंसर आदि जैसी अनेकानेक बीमारियाँ प्रतिदिन जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा समाप्त कर रहीं हो वहाँ इस तरह के प्रयोग पर करोड़ों डालर की रकम खर्च कर देना मेरी दृष्टि में उपयोगी नहीं है।

यदि हम अपने देश की स्थिति पर नजर डालें तो पता चलेगा कि जितना भाग स्वस्थ लोगों का है उससे अधिक बड़ा भाग विकलांगों, परेशानो, बीमारों, भ्रष्टाचारियों, घूसखोरों आदि का है पहले सरकार इस तरफ़ ध्यान दे कि इनकी उत्पत्ति कैसे हुई? इनके जन्म कहाँ से हुआ और इनको रोकने का उपाय क्या हैं? यदि हम स्वस्थ समाज देने के प्रयोग में सफल हो सके तो उसके बाद धरती-आकाश-चाँद-तारों-मंगल आदि के रहस्यों को खोजना सुखद प्रतीत होगा. तब तक हम किसी भी प्रयोग पर प्रलय आने की आशंका से ही डर कर जीवन जीते रहेगे.