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16 नवंबर 2025

अराजकता पैदा करने का मंसूबा?

‘देश के युवा, देश के छात्र, देश के जेन-जी संविधान को बचाएँगे. लोकतंत्र की रक्षा करेंगे और वोट चोरी को रोकेंगे. मैं उनके साथ हमेशा खड़ा हूँ. जय हिन्द.’ सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर ये विचार पोस्ट करने वाला व्यक्ति कोई आम नागरिक नहीं बल्कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी हैं. 18 सितम्बर 2025 को पोस्ट इस विचार का उत्प्रेरक नेपाल की अराजकता के लिए जिम्मेदार जेन-जी पीढ़ी को माना जा रहा है. इस पोस्ट के माध्यम से उन्होंने न केवल देश के युवाओं को उकसाने का काम किया बल्कि वोट चोरी जैसे मुद्दे के द्वारा संवैधानिक संस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने का काम किया है.

 

ईवीएम का मुद्दा हो या अब वोट चोरी का, इनके द्वारा राहुल गांधी किसी तरह की सुधारवादी व्यवस्था का सहयोग नहीं करते बल्कि निर्वाचन आयोग पर सवालिया निशान लगाते हैं. भाजपा की जीत पर ईवीएम से छेड़छाड़ करने, उसे हैक कर लेने का आरोप लगा देना तथा विपक्षी दलों की जीत को लोकतंत्र की जीत बताने लगना आम बात हो गई है. ईवीएम से छेड़छाड़ किये जाने के आरोप भाजपा पर लगातार लगाते रहने के बाद भी विपक्षी दलों द्वारा उसे सही सिद्ध न कर पाने से मतदाताओं ने इसके पीछे की मंशा को भली-भांति समझ लिया. ये सहज रूप में समझ में आता है कि विपक्षी दलों द्वारा अपनी हार का ठीकरा ईवीएम और निर्वाचन आयोग के ऊपर फोड़कर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा करना रहा है. कुछ इसी तरह का काम अब राहुल गांधी करते नजर आ रहे हैं वोट चोरी के नाम पर.

 



बिहार में पहले चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस के द्वारा हरियाणा में वोट चोरी होने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि पिछले साल हरियाणा के विधानसभा चुनाव में 25 लाख फर्जी वोटों का इस्तेमाल किया गया जो कुल वोटों का लगभग 12.5 प्रतिशत है. निर्वाचन आयोग और भाजपा पर मिलीभगत का आरोप लगाने वाले राहुल का मानना है कि इसके चलते कांग्रेस हार गई. वोट चोरी के सन्दर्भ में उनके द्वारा एक महिला, जो ब्राजील की मॉडल निकली, की अनेकानेक फोटो के माध्यम से अपने आरोपों को सही साबित करने का भी प्रयास किया गया. यहाँ एक बात समझ से परे है कि यदि राहुल गांधी को लगता है कि भाजपा और निर्वाचन आयोग की मिलीभगत से वाकई वोट चोरी जैसा कदम उठाया जाता है तो इसके समाधान के लिए वे अदालत की मदद क्यों नहीं ले रहे? उनको कम से कम इसका भान तो होना ही चाहिए कि इसी देश में 12 जून 1975 को एक ऐतिहासिक फैसले में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने उनकी दादी इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी पाया था. जिसके चलते न्यायालय ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित करते हुए उन्हें छह साल तक अन्य दूसरा कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया था. इस निर्णय के पश्चात् लागू आपातकाल 1977 में समाप्त होने पर चुनाव सम्पन्न हुए. इन चुनावों में मतदाताओं ने तानाशाही, चुनावी धाँधली के विरोध में न केवल कांग्रेस को बल्कि रायबरेली से इंदिरा गांधी को भी हराया. आज संभवतः अराजकता फ़ैलाने की मंशा रखने के कारण राहुल गांधी मतदाताओं की, न्यायालय की असल ताकत को स्वीकारना नहीं चाह रहे हैं.

 

दरअसल राहुल गांधी को वोट चोरी, निर्वाचन आयोग की मिलीभगत को लेकर न्यायालय जाने से ज्यादा आसान लगता है आरोप लगाना. इसमें न किसी तरह के सबूतों को न्यायालय में प्रस्तुत करना है और न ही किसी तरह के तथ्यों की पुष्टि करना है. विगत वर्षों में अनेक मामलों में न्यायालय की तरफ से उनको समझाए जाने के, सजा सुनाये जाने के दृष्टान्त भी सबके सामने हैं मगर ऐसा लगता है जैसे उन्होंने इनसे कोई सीख नहीं लेने का मन बना रखा है. इसके अलावा लगता है जैसे राहुल गांधी भारत में उसके पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि की तरह का अराजक माहौल देखने का मंसूबा रखते हैं. यही कारण है कि वे कभी यहाँ की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर, संवैधानिक संस्थाओं पर, संविधान पर आरोप लगाते हैं तो कभी इंडियन स्टेट के नाम पर, सेना के नाम पर, आतंकियों के नाम पर, वोट चोरी के आरोपों द्वारा, जेन-जी पीढ़ी की क्रांति के रूप में अनर्गल बयानबाजी करते नजर आते हैं.

 

बिहार चुनावों के परिणामों ने साबित किया है कि यहाँ के मतदाताओं ने न केवल विशेष गहन पुनरीक्षण को अपनी स्वीकार्यता प्रदान की है बल्कि राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोपों की भी हवा निकाल दी है. ईवीएम सम्बन्धी गड़बड़ियों में मुँह की खाने के बाद, अनेक चुनावों में लगातार हारने के बाद अब बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण और वोट चोरी आरोपों के नकारे जाने के बाद राहुल गांधी को स्वयं का विश्लेषण करने की आवश्यकता है. उनको अपने उन मार्गदर्शकों का आकलन करने की आवश्यकता है जो निरर्थक मुद्दों के द्वारा उनके प्रधानमंत्री बनने के सपने को हवा देते रहने के साथ-साथ देश को अराजकता की तरफ ले जाना चाहते हैं. उनको ऐसे बयानवीरों से दूर रहने की आवश्यकता है जो उनके कपोल-कल्पित बयानों को नाइट्रोजन बम, हाइड्रोजन बम साबित करने की कोशिश में राहुल गांधी को ही मजाकिया पात्र बना दे रहे हैं.

 

ये बात न केवल राहुल गांधी को ही बल्कि कांग्रेस पार्टी को भी समझनी होगी कि वे वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और उनके तमाम अनर्गल बयान न केवल उनकी छवि को धूमिल करते हैं बल्कि देश की राजनीति को भी विवादास्पद बनाने के साथ-साथ देश की संवैधानिक संस्थाओं को संशय के घेरे में खड़ा करते हैं. ऐसी राजनीति भले ही उनके सन्दर्भ में उचित हो मगर देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, संवैधानिक संस्थाओं के लिए कतई उचित नहीं है.


05 फ़रवरी 2025

दिल्ली विधानसभा चुनाव का खेल

दिल्ली विधानसभा चुनाव का मतदान समाप्त होते ही कई एजेंसियों ने अपने एग्जिट पोल जारी किये. कुछ प्रमुख एजेंसियों में से सात ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और दो ने आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार का अनुमान दिखाया है. कांग्रेस को किसी ने गम्भीरता से नहीं लिया है. देखा जाये तो कांग्रेस पिछले चुनाव से ही दिल्ली में हाशिए पर है. वर्तमान चुनावों का अंतिम परिणाम क्या होगा ये मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा किन्तु दिल्ली विधानसभा चुनाव की स्थिति का आकलन करने के लिए कांग्रेस का भी आकलन करना होगा, बिना इसके विधानसभा चुनावों की सही तस्वीर सामने नहीं आएगी. इसके लिए विगत तीन विधानसभा चुनावों का आकलन करना होगा.

 

दिल्ली विधानसभा 2015 और 2019 के चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस पूरे परिदृश्य से गायब हुई उसे देख कहा जाने लगा कि कांग्रेस का विकल्प आप है. 2013 में आप ने अन्ना आन्दोलन लहर के साथ पहली बार चुनाव में उतरते ही सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा. 70 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 32 सीटों के साथ पहले स्थान पर, आप 28 सीटों के साथ दूसरे और सत्ताधारी कांग्रेस महज 08 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर आई. भाजपा विरोधी मानसिकता के कारण कांग्रेस ने आप को समर्थन देकर सरकार बनवाई जबकि अन्ना आन्दोलन से जन्मी आप का सबसे बड़ा विरोधी दल कांग्रेस ही बना था.

 



पहली बार में ही अपनी उपस्थिति को इस रूप में देखकर अरविन्द केजरीवाल को भ्रम हो गया कि वे भ्रष्टाचार के नाम पर कहीं भी, कैसी भी जीत, किसी के खिलाफ प्राप्त कर सकते हैं. विधानसभा में भी उनकी जीत कांग्रेस की सशक्त नेता और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ थी. इसी सोच के चलते महज 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल लोकसभा चुनाव की तरफ मुड़ गए. लोकसभा चुनावों के पश्चात् दिल्ली ने 2015 में दोबारा चुनावों का मुँह देखा. दिल्ली विधानसभा 2015 चुनाव परिणाम सोचने वाले थे कि आप या अरविन्द केजरीवाल ने महज 49 दिन में ऐसे कौन से काम कर डाले थे कि 2013 चुनाव में 28 सीटें जीतने वाली आप ने इन चुनावों में 63 सीटें हासिल कीं? यह भी सोचने वाली बात थी कि जिस भाजपा की स्थिति कांग्रेस या शीला दीक्षित के कार्यकाल में बुरी नहीं रही, उसने महज 49 दिन में ऐसे कौन-कौन से गलत कदम उठाए कि उसे मात्र तीन सीट पर सिमटना पड़ा?

 

इन सभी सवालों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी अनदेखा किया गया. 2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आप को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस को 2013 के चुनाव के मुकाबले 2015 में दो सीटों, मंगोलपुरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत मिले. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत सी सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही. इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा ने 2013 के मुकाबले 2015 में महज 17 सीटों पर कम मत प्राप्त किये. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?

 

दरअसल ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का था. मतदाताओं का एक दल से दूसरे दल की तरफ, एक प्रत्याशी से दूसरे प्रत्याशी की तरफ स्विंग कर जाना कोई नई घटना नहीं थी मगर समूची विधानसभा के मतदाताओं का स्विंग कर जाना साधारण घटना नहीं थी. भाजपा या कि मोदी विरोधियों ने एहसास कर लिया कि अन्ना आन्दोलन से मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में आप को कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे. अरविन्द केजरीवाल के वे सारे सबूत कहीं गायब हो गए जो शीला दीक्षित के खिलाफ मंचों से दिखाए जाते रहे थे. इस खेल में किसी तरह की कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की गई. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध किया गया.

 

इसके बाद भी विधानसभा 2019 में आप अपना पिछला कारनामा दोहराने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार मात्र 35 सीटों पर ही ज्यादा मत प्राप्त हुए. भाजपा को 201के मुकाबले 57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुएउनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी. 

 

आप की बढ़ती सीटों के पीछे भाजपा की कार्यप्रणाली, उसके नेतृत्व की स्थितियाँ भी प्रभावी रही होंगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसकी चर्चा किये बिना, परिणामों के आपसी सह-सम्बन्ध को परखे बिना आप को कांग्रेस का विकल्प बता देना अभी जल्दबाजी होगी. आप विशुद्ध रूप से कांग्रेस की टीम बी के रूप में देखी जा सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि जहाँ-जहाँ कांग्रेस चुनावों में पराजित हुई है वहाँ उसके द्वारा ईवीएम पर ऊँगली उठाई गई, केन्द्र सरकार पर आरोप लगाये गए लेकिन दिल्ली के दो विधानसभा चुनावों में शून्य सीटें लाने के बाद भी उसकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया. कांग्रेस का विरोध करके जमीन बनाने वाली आम आदमी पार्टी को पहली बार में ही समर्थन देकर सरकार बनवाना, एक भी सीटें न मिलने के बाद भी ईवीएम पर हो-हल्ला न मचाना, एकाएक कांग्रेस के मतों में जबरदस्त गिरावट आना और उसी अनुपात में आम आदमी पार्टी के मतों का बढ़ना इसे कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि अवसरवादी राजनीति सिद्ध करता है.

 


28 जनवरी 2025

हिन्दुओं की आस्था पर फिर आघात

एक तरफ बहुसंख्यक देशवासी प्रयागराज में चल रहे महाकुम्भ की पावनता का एहसास कर रहे हैं वहीं कुछ राजनैतिक पक्ष इसको मलिन बनाने में लगे हैं. महाकुम्भ की पावनता को राजनैतिक रंग देने से राजनैतिक दल, व्यक्तित्व चूक नहीं रहे हैं. इसके आरम्भ होने के पहले से ही भाजपा-विरोधी, हिंदुत्व-विरोधी मानसिकता वालों द्वारा अनर्गल प्रलाप किया जा रहा है. इसी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के एक बयान ने विवाद पैदा कर दिया है. उन्होंने कहा कि बीजेपी नेताओं के बीच गंगा स्नान की होड़ लगी हुई है, हालांकि इससे कोई गरीबी दूर होने वाली नहीं है. कांग्रेस पार्टी धर्म के नाम पर शोषण को कभी बर्दाश्त नहीं करने वाली. कांग्रेस अध्यक्ष को संभवतः जानकारी नहीं रही होगी कि कांग्रेस के पुराने नेता, जिसमें कि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी भी शामिल हैं, कुम्भ में स्नान कर चुके हैं. देखा जाये तो यह बयान राजनैतिक विरोध के साथ-साथ धार्मिक आस्था के विरोध का भी है.  

 



विगत कुछ वर्षों से अनेक राजनैतिक दलों, व्यक्तियों का मुख्य उद्देश्य राजनैतिक विरोध के नाम पर हिंदुत्व पर, हिन्दुओं की आस्था पर चोट करना है. अवसर मिलते ही उनके द्वारा ऐसा कर लिया जाता है. कांग्रेस अध्यक्ष को यदि भाजपा नेताओं के स्नान करने से आपत्ति थी तो उनको किसी अन्य विषय के सन्दर्भ सहित भाजपा की, उनके नेताओं की आलोचना करनी चाहिए थी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. दरअसल गैर-भाजपाई दलों की दृष्टि में महाकुम्भ हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का केन्द्र होने से ज्यादा भाजपा की राजनीति को सशक्त करने वाला मंच बनता जा रहा है. महाकुम्भ में जिस तरह से हिन्दू आस्था का सैलाब उमड़ रहा है उससे इन दलों को अपने राजनैतिक अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगता समझ आ रहा है. यही कारण है कि अनेक दलों द्वारा लगातार किसी न किसी रूप में महाकुम्भ की आलोचना का अवसर खोजा जा रहा है. यह अवसर खड़गे को भाजपा नेताओं के गंगा स्नान करने के रूप में हाथ लगा.

 

धर्म, गंगा स्नान, महाकुम्भ आदि किसी व्यक्ति की आस्था से जुड़े विषय हैं. पिछले कुछ समय से व्यक्ति की धार्मिक आस्था को, विशेष रूप से हिन्दुओं की धार्मिक आस्था को रोजगार, आजीविका, अमीरी-गरीबी आदि से जोड़ कर देखा जाने लगा है. इसका जीता-जागता उदाहरण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर रहा है. उसे लेकर अनर्गल प्रलाप बराबर बना रहता था. मंदिर के स्थान पर कोई अस्पताल बनवाने की बात करता था, कोई विद्यालय बनाये जाने की वकालत करता था. मंदिर निर्माण को रोजगार से, आजीविका से जोड़कर भी लगातार सवाल उठाये गए. यहाँ सवाल उठाये जाने वालों की नीयत में किसी व्यक्ति का भला करना नहीं, किसी वर्ग-विशेष को लाभ पहुँचाना नहीं वरन हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ करना रहा है. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि हिन्दुओं की आस्था पर, उनके धार्मिक स्थलों पर, उनके धार्मिक कृत्यों पर प्रश्न खड़े करते लोगों द्वारा कभी भी किसी अन्य धर्म, मजहब के लिए ऐसे प्रश्न नहीं किये गए. कभी इस पर बयान नहीं दिए गए कि किसी दरगाह, मजार पर चादर चढ़ाने से किसी गरीब के नंगे बदन को वस्त्र नहीं मिल जाता. कभी सवाल नहीं उठाया गया कि मोमबत्तियाँ जलाकर प्रार्थना करने से किसी गरीब के घर रौशनी हो जाती. ऐसा नहीं है कि देश में सिर्फ हिन्दुओं के धार्मिक क्रिया-कलाप ही संचालित होते हों, अन्य धर्मों के क्रिया-कलाप भी यहाँ पूरे उत्साह के साथ संचालित होते हैं, अन्य धर्मों के स्थल यहाँ अपनी पूरी आभा के साथ स्थापित हैं. ऐसी स्थिति होने के बाद भी हिन्दुओं की आस्था पर सवाल उठाना ऐसे लोगों की कुत्सित मानसिकता का परिचायक है.

 



ये बात राजनैतिक लोगों को समझ में नहीं आती है कि धर्म किसी भी व्यक्ति के आंतरिक विश्वास का विषय है. इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल स्वयं को सुरक्षित समझता है बल्कि सकारात्मक रूप से प्रभावित भी होता है. वर्तमान में राजनैतिक दलों द्वारा संवैधानिक अनुच्छेदों का कथित रूप से फायदा उठाकर धर्म के द्वारा राजनीति को चमकाया जा रहा है. सार्वजानिक स्थलों पर धार्मिक कृत्यों को समर्थन देना, शैक्षणिक संस्थानों की आड़ में मजहबी शिक्षा प्रदान करना, अल्पसंख्यकों के नाम पर दबाव समूह के रूप में राजनीति करना इन्हीं अनुच्छेदों की आड़ लेकर किया जाने लगता है. समय-समय पर अलग राज्य की माँग, धार्मिक स्थलों का उपयोग राजनीतिक कार्यों के लिए करने जैसे कदम उठाये जाते रहते हैं.

 

जहाँ तक सवाल हिन्दुओं का है तो इस देश में सदैव से ही हिन्दुओं को साम्प्रदायिक घोषित करने का काम किया जाता रहा है. धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के नाम पर बार-बार समाज में हिन्दुओं को बदनाम करने की कोशिश की जाती रही है. हिन्दुओं को बदनाम करने की आड़ में भारत देश में भगवा आतंकवादहिन्दू आतंकवाद का प्रचार किया जाता रहा है. कुछ इसी तरह की हरकत खड़गे के बयान को कहा जायेगा. ये सोचने-समझने वाली बात है कि धार्मिक कृत्य मनोभावों को, संस्कारों को, पारिवारिक मूल्यों को सहेजने का, पल्लवित-पुष्पित करने का कार्य करते हैं. आस्था में, धार्मिक विश्वास में, कृत्य में कभी भी आर्थिक दृष्टिकोण को हावी नहीं होने दिया गया है. पता नहीं राजनैतिक रूप से खुद को सशक्त समझने वाले लोग धार्मिक, सामाजिक रूप से इतने कंगाल क्यों हो जाते हैं कि वे व्यक्तियों की आस्था, भावना से खेलने का काम करने लगते हैं?  


02 जुलाई 2020

आज ओपीएस भाईसाहब नहीं रोकेंगे ज़िन्दाबाद कहने पर

आज ओपीएस भाईसाहब किसी को नहीं रोक रहे होंगे ज़िन्दाबाद कहने पर...



आज से लगभग तीन दशक पहले ऐसी स्थिति नहीं थी. तब ओपीएस भाईसाहब हम लोगों को रोकते थे अपने नाम की ज़िन्दाबाद बोलने पर. साइंस कॉलेज, ग्वालियर हॉस्टल का अपना स्वर्णिम इतिहास रहा है, उतना ही जगमगाता हुआ वर्तमान भी है. ये और बात है कि वर्तमान में हॉस्टल संचालित नहीं है मगर इसके आरम्भ होने से लेकर इसके चलने तक के सभी भाई आज भी एकसूत्र में बंधे हुए हैं.

वो 1990-91 का दौर था जबकि भाईसाहब को NSUI के जिलाध्यक्ष की जिम्मेवारी सौंपी गई थी. हम हॉस्टल के सभी भाइयों को कांग्रेस और भाजपा से मतलब होते हुए भी व्यक्तिगत स्तर पर राजनैतिक दलों से कोई मतलब नहीं था, आज भी नहीं है. राजनैतिक स्थितियाँ सदैव किसी एक व्यक्ति के पक्ष में नहीं रहती हैं, कुछ ऐसा ही भाईसाहब के साथ भी था. वे तब माधवराव सिंधिया जी के बहुत करीब थे और उनका जिलाध्यक्ष बन जाना सिंधिया जी के अन्य बहुत से करीबियों को पसंद नहीं आया.

बहरहाल, हम लोगों के लिए यह प्रसन्नता का विषय था कि हमारे बड़े भाई को बड़ी जिम्मेवारी मिली है. हम सभी तत्परता से उनके साथ लगे हुए थे. उन्हीं दिनों माधवराव सिंधिया जी का ग्वालियर आना शताब्दी ट्रेन से होता था. हम सभी हॉस्टल के भाई ओपीएस भाईसाहब के निर्देशन में रेलवे स्टेशन सिंधिया जी के स्वागत में पहुँच जाते.

ट्रेन आने के बहुत पहले से लेकर ट्रेन आने तक तमाम बड़े-बड़े नेताओं की ज़िन्दाबाद होती रहती. हॉस्टल में चीखने-चिल्लाने के मामले में एमपीसिंह कुशवाह भाईसाहब और हमारा कोई जोड़ नहीं था. परीक्षाओं में बहुविकल्पीय की नक़ल के लिए बनाये गए रोलनंबर के लिए हम दो लोगों को कार्य सौंपा जाता था. (इस बारे में बाद में)

रेलवे स्टेशन पर बहुत सारे बड़े-बड़े नेताओं की ज़िन्दाबाद के बीच हम हॉस्टल के भाई ओपीएस भाईसाहब का नाम लेकर ज़िन्दाबाद के नारे लगाना शुरू कर देते. हम सभी भाइयों की समवेत आवाज़ इतनी तेज होती कि पूरा स्टेशन भाईसाहब के नाम से गूँज उठता.

उस समय भाईसाहब दौड़ते-दौड़ते हम सबको शांत करने की कोशिश करते. चूँकि उनका जिलाध्यक्ष बनना बहुत से बड़े नेताओं को रास नहीं आ रहा था, वे सब भाईसाहब को हटवाने के लिए लगे हुए थे. ऐसे में भाईसाहब को डर लगता होगा कि हम भाइयों का उत्साह उनके लिए नकारात्मक न हो जाये.

ऐसा कभी नहीं हुआ. ओपीएस भाईसाहब ने जिस तरह धैर्य का परिचय दिया, अपनी लड़ाई को बीच में नहीं छोड़ा, उसका सुफल अब लगभग तीन दशक बाद उनको मिला. हम सब बहुत प्रसन्न हैं कि ये प्रतिफल अकेला उनका नहीं, हम भी हॉस्टल भाइयों का है. हम सबने भाईसाहब के संघर्ष को देखा है, उनकी सक्रियता को देखा है.

आज रेलवे स्टेशन पर नहीं बल्कि इस सार्वजनिक मंच से चिल्लाकर कहते हैं ओपीएस भदौरिया..... ज़िन्दाबाद..... भले ही इस आवाज़ में एमपीसिंह भाईसाहब स्वर नदारद है... मगर हम हॉस्टल के सभी भाई आवाज़ कम न होने देंगे, आज भाईसाहब भी अपनी ज़िन्दाबाद बोलने के लिए हमें क्या किसी को नहीं रोकेंगे.

हम सभी भाइयों की तरफ से.... ओपीएस भदौरिया भाईसाहब.... ज़िन्दाबाद.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

11 मार्च 2020

एकमात्र ध्येय सत्ता-सुख, कार्यकर्त्ता मरता हो तो मर जाए

ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाना भले ही आश्चर्यचकित करने वाला न हो पर ऐसा कदम अवश्य है जिसने न केवल कांग्रेस के लोगों को बल्कि भाजपा के लोगों को उकसाने का काम किया है. ऐसा नहीं है कि किसी नेता के पार्टी छोड़ने सम्बन्धी ये कोई पहला मामला हो मगर इस मामले ने सबका ध्यान आकर्षित किया. तात्कालिक लाभ तो इस कदम का ये मिला कि सिंधिया जी को राज्यसभा से भाजपा ने टिकट दे दिया. अगले लाभ के रूप में संभव है कि मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार हो जाये. पहले लाभ से सिंधिया समर्थकों को प्रसन्न होना चाहिए और दूसरा लाभ भाजपा समर्थकों को प्रसन्न होने का मौका देता है. इस प्रसन्नता के साथ-साथ बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है, दोनों तरफ के लोगों को, खासतौर से निपट कार्यकर्त्ता समझे जाने वालों को. सिंधिया जी के इस कदम से आज भाजपाई भले ही खुश हों मगर वे याद करें जबकि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भाजपा छोड़कर गए थे. उन्होंने बयान दिया था कि वे भाजपा के ताबूत में आखिरी कील लगाने का काम करेंगे. वे कील तो न लगा पाए पर अपने पोर्टफोलियो में राज्यपाल पद जरूर लगा बैठे.

कुछ ऐसा ही काम सिंधिया जी करेंगे. आज पहला दिन है उनका, इसलिए अभी कील लगाने, उखाड़ फेंकने जैसा कोई बयान नहीं आया है. समय के साथ पता चलेगा कि उनके साथ निकले विधायकों की क्या स्थिति बनती है? उनको भी विधायकी छोड़ने का कोई लाभ मिलता है या बस श्रीमंत की ज़िन्दाबाद करनी पड़ेगी? नेता तो पार्टी से भागने का लाभ ले जाता है. ये बात भले ही कल्याण सिंह के साथ लागू न हो पाई हो क्योंकि वे किसी तरह का लाभ गैर-भाजपाइयों से नहीं ले सके थे. बाबरी ढाँचा ध्वस्त काण्ड के बाद कल्याण सिंह हीरो बनकर उभरे तो उन्हें लगा कि वे दल से बहुत ऊपर हैं. ऐसे में संभवतः वे अन्य दलों से अपने भागने को लेकर कोई चर्चा नहीं कर पाए होंगे. खैर, कल्याण सिंह वापस आए और उनके भाजपा समर्थकों ने राहत की साँस ली. इसी तरह एक काण्ड और हुआ उत्तर प्रदेश की राजनीति में जबकि हिन्दुओं को, हिन्दू देवी-देवताओं को अखंड गाली देने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य को पार्टी सत्ता-हित में अपनाना पड़ा.

ऐसी स्थिति में जरा उस कार्यकर्त्ता के बारे में भी विचार जो निष्पक्ष भाव से पार्टी के साथ जुड़ा होता है. कल उसने कल्याण सिंह की जय बोली. फिर उनके निकलने पर उनके गाली देने का काम किया. उनकी वापसी के बाद फिर उनकी जय-जयकार करने लगा. इसी तरह स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर कार्यकर्ताओं में भयंकर झड़प हुईं. कई पर तो हरिजन एक्ट के तहत मुक़दमे लगे. फिर अचानक मौर्य साहब भाजपाई हो गए. अब, अब हरिजन एक्ट में मुकदमा लड़ने वाले अपने मुक़दमे लड़ रहे हैं, वकील से जूझ रहे हैं, फीस-जमानत का इंतजाम करने में लगे हैं और शेष कार्यकर्त्ता स्वामी प्रसाद ज़िन्दाबाद के नारे लगाने में गर्व महसूस कर रहे हैं. कुछ ऐसा ही आज से सिंधिया जी के लिए किया जायेगा. कल तक गद्दार सिंधिया परिवार आज अचानक से भाजपाई गोते लगाने के बाद खुद्दार हो गया. किसी भी दल का शीर्ष नेतृत्व इसे सहज रूप में लेता है. सिंधिया के इस कदम के तुरंत बाद ही उनकी मुलाकात सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी से हो जाए तो वे हँसकर मिलेंगे मगर कार्यकर्त्ता एक-दूसरे की हत्या करने की नीयत से मिलता है. आज की घटना के बाद यदि कल को सिंधिया जी को कांग्रेस में ही सत्ता-सुख दिखाई दिया तो वे वापसी भी मार सकते हैं. इस वापसी को घर वापसी कही जाएगी. (उरई के लोग अभी हाल में इस मौसम का आनंद उठा चुके हैं, नगर पालिका चुनाव में)


बहरहाल, जिस-जिस की नजर से ये पोस्ट निकले और यदि उनके सम्बन्ध किसी भी स्तर से राज्य के, राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व से हैं तो एक निवेदन है कि कम से कम ऐसे कदम उठाने के पहले अपने उस कार्यकर्त्ता के बारे में अवश्य विचार कर लिया करें जो आपके लिए, आपके दल के लिए जान देने की हद तक लगा रहता है. क्या आप शीर्ष के लोग बस जान लेना ही जानते हैं? 
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

20 फ़रवरी 2020

कांग्रेस का विकल्प नहीं उसकी टीम बी बनकर उभरी है आम आदमी पार्टी


दिल्ली एक बार फिर आम आदमी पार्टी की हो गई. विधानसभा निर्वाचन 2020 के आरम्भ होने के समय से ही इस चुनाव को आआपा के पक्ष में माना जा रहा था. परिणाम भी कमोवेश उसी तरह का आया. चुनाव परिणाम घोषित होते ही विश्लेषकों द्वारा आम आदमी पार्टी को कांग्रेस का विकल्प बताया जाने लगा. असल में वर्तमान चुनाव परिणामों की समीक्षा, विश्लेषण गंभीरता से नहीं किया जा रहा है. इसे सीधे-सीधे आम आदमी पार्टी की एकतरफा जीत बताकर और भाजपा की हानि बता कर प्रसारित किया जा रहा है. ऐसा यदि एक आम समर्थक द्वारा किया जाये, एक भावुक मतदाता के द्वारा किया जाये तो बात समझ आती है कि वह किसी भावना के वशीभूत अपना आक्रोश निकाल रहा है. इसके उलट जब खुद को बौद्धिक कहने वाले लोगों के द्वारा आम आदमी पार्टी की वर्तमान जीत का अथवा विगत विधानसभा की जीत का सतही आकलन किया जाये तो लगता है कि अभी निष्पक्षता की बहुत आवश्यकता है. देश में लोकतंत्र की वकालत भले ही की जाये मगर अभी वैचारिक स्तर पर ही लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सका है.

पूरे देश में भाजपा विरोधी माहौल बहुत लम्बे समय से बना हुआ था मगर वर्ष 2014 के बाद से सिर्फ द्विपक्षीय लहर देखने को मिल रही है. इसमें एक भाजपा के पक्ष में और दूसरी भाजपा के विरोध में. यहाँ भाजपा-विरोधियों के पास अपने-अपने विकल्प खुले हुए हैं. ऐसा न केवल मतदाताओं, समर्थकों के साथ हो रहा है वरन दलीय स्वरूप में भी ऐसा देखने को मिल रहा है. दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी यही हुआ. यहाँ मतदाताओं की, भाजपा, आम आदमी पार्टी की स्थिति का सही-सही आकलन करने के लिए एक अन्य तीसरे दल कांग्रेस का भी आकलन करना होगा. बिना उसके दिल्ली विधानसभा चुनावों की सही तस्वीर सामने नहीं आ सकेगी. इसके लिए वर्तमान विधानसभा चुनावों से इतर विगत दो विधानसभा चुनावों का भी आकलन करना पड़ेगा.

ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस का चुनावी परिणाम सम्बन्धी आकलन, विश्लेषण ही तय करेगा कि आआपा कांग्रेस का विकल्प बनकर उभरी है अथवा उसकी टीम बी बनकर. वर्तमान चुनाव परिणामों से ध्यान हटाकर यदि वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों पर दृष्टि डाली जाये जबकि आम आदमी पार्टी ने अन्ना आन्दोलन की लहर में पहली बार चुनाव मैदान में कदम रखा था. पार्टी ने पहली बार में ही सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा. 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा भाजपा, आआपा और कांग्रेस के बीच ही सिमट गई. इस चुनाव में भाजपा 32 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी जबकि आआपा 28 सीटों के साथ दूसरे और सत्ताधारी कांग्रेस महज 08 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर आई. भाजपा विरोधी मानसिकता के कारण कांग्रेस ने आआपा को समर्थन देकर सरकार बनवाई जबकि अन्ना आन्दोलन से जन्मी आआपा का सबसे बड़ा विरोधी दल कांग्रेस ही बना था.


पहली बार में ही अपनी उपस्थिति को इस रूप में देखकर अरविन्द केजरीवाल को भ्रम हो गया कि वे भ्रष्टाचार के नाम पर कहीं भी, कैसी भी जीत, किसी के खिलाफ प्राप्त कर सकते हैं. विधानसभा में भी उनकी जीत कांग्रेस की सशक्त नेता और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ थी. इसी सोच के चलते महज 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल लोकसभा चुनाव की तरफ मुड़ गए. अंततः लोकसभ चुनावों के पश्चात् दिल्ली ने 2015 में दोबारा चुनावों का मुँह देखा. यही वह स्थिति थी जबकि लोकसभा 2014 के बाद से बनी मोदी लहर और मोदी-विरोधी लहर का देशव्यापी रूप देखने को मिला. दिल्ली विधानसभा 2015 चुनाव परिणाम सोचने वाले थे, शोध करने वाले थे मगर किसी ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया. सोचने वाली बात है कि आआपा या फिर अरविन्द केजरीवाल ने महज 49 दिन में ऐसे कौन से काम कर डाले थे कि महज 28 सीटें जीतने वाली आआपा ने इन चुनावों में 63 सीटें हासिल कीं? यह भी सोचने वाली बात है कि जिस भाजपा की स्थिति कांग्रेस या शीला दीक्षित के कार्यकाल में बुरी नहीं रही, उसने महज 49 दिन में ऐसे कौन-कौन से गलत कदम उठा लिए कि उसे मात्र तीन सीट पर सिमटना पड़ा?

इन सभी सवालों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी इसलिए अनदेखा कर दिया गया क्योंकि भाजपा-विरोधी मानसिकता के आगे और कुछ देखना ही नहीं था. 2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आआपा को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस ने 2013 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2015 के चुनावों में दो सीटों, मंगोलपुरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत प्राप्त किये. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत से सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही है. यदि इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा की सीटें देखें तो भाजपा ने महज 17 सीटों पर 2013 के मुकाबले 2015 में कम मत हासिल किये. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज एक संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?

इस तरह के मतों को देखकर विश्लेषण करने वाला, सांख्यिकी सम्बन्धी आँकड़ों से खेलने वाला कोई भी विद्यार्थी प्रथम दृष्टया ही बता सकता है कि ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का है. मतदाताओं का एक दल से दूसरे दल की तरफ, एक प्रत्याशी से दूसरे प्रत्याशी की तरफ ‘स्विंग’ कर जाना कोई नई घटना नहीं थी मगर समूची विधानसभा के मतदाताओं का ‘स्विंग’ कर जाना साधारण घटना नहीं है. कोई भी साधारण से साधारण विश्लेषक इसे खेल कहने का दुस्साहस कर सकेगा क्योंकि ये मामला 2015 विधानसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रहा. भाजपा या कहें कि मोदी विरोधियों ने अपने कदम से और मतदाताओं के रुझान से इसका एहसास कर लिया कि अन्ना आन्दोलन के समय मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में आआपा को कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे.   

इस खेल में किसी भी तरह की कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की जाने लगी. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध बनाये रखा गया. समूची दिल्ली में केन्द्र सरकार के विरोध के बहाने मोदी को हराने की कोशिशें चलती रहीं. आम आदमी पार्टी के कामों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाने लगा. चुनावों में स्थिति कुछ और ही बनती, यदि परदे के पीछे की सांठ-गांठ जमीन पर न उतरती. शाहीन बाग का विरोध इसी का परिणाम कहा जा सकता है. इन सबके बाद भी विधानसभा 2020 के चुनावों में आम आदमी पार्टी जीतने के बाद भी अपना पिछला कारनामा करने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार वह मात्र 35 सीटों पर ही ज्यादा मत प्राप्त कर सकी. भाजपा को 2015 के मुकाबले  57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुए, उनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास में सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी. 

आआपा की बढ़ती सीटों के पीछे भाजपा की कार्यप्रणाली, उसके नेतृत्व की स्थितियां भी प्रभावी होंगी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु इसकी चर्चा किये बिना, परिणामों के आपसी सह-सम्बन्ध को परखे बिना आआपा को कांग्रेस का विकल्प बता देना अभी जल्दबाजी होगी. आआपा विशुद्ध रूप से कांग्रेस की टीम बी के रूप में देखी जा सकती है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि जहाँ-जहाँ कांग्रेस चुनावों में पराजित हुई है वहाँ उसके द्वारा ईवीएम पर ऊँगली उठाई गई, केन्द्र सरकार पर आरोप लगाये गए लेकिन दिल्ली के दो विधानसभा चुनावों में शून्य सीटें लाने के बाद भी उसकी तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया. कांग्रेस का विरोध करके जमीन बनाने वाली आम आदमी पार्टी को पहली बार में ही समर्थन देकर सरकार बनवाना, एक भी सीटें न मिलने के बाद भी ईवीएम पर हो-हल्ला न मचाना, एकाएक कांग्रेस के मतों में जबरदस्त गिरावट आना और उसी अनुपात में आम आदमी पार्टी के मतों का बढ़ना इसे कांग्रेस का विकल्प नहीं बल्कि अवसरवादी राजनीति सिद्ध करता है.

15 फ़रवरी 2020

कांग्रेस की टीम बी है आआपा?

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों के आने के बाद खूब बमचक मची हुई है. कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ बता रहा है. कुछ लोगों को यह सुनकर बुरा लग रहा है कि आम आदमी पार्टी को हमने कांग्रेस की टीम बी कह दिया. यह सही है. इसे एकबारगी चुनाव में मिले मतों के आधार पर खुद ही देख लीजिये. बहुत सी बातों का जवाब चुनाव परिणामों में ही छिपा हुआ था, जिसे देखकर भी इसलिए अनदेखा कर दिया गया क्योंकि भाजपा-विरोधी मानसिकता के आगे और कुछ देखना ही नहीं था. जिस सच को देखकर भी अनदेखा किया गया यदि वह सामने लाया जाता तो आआपा के कार्यों को आधार मिलना मुश्किल होता.

2013 के चुनाव परिणामों के मुकाबले आआपा को 2015 में सभी सत्तर सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. यह महज संयोग नहीं कहा जायेगा कि कांग्रेस ने 2013 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2015 के चुनावों में दो सीटों, मंगोल पूरी और मतिया महल को छोड़ शेष 68 सीटों पर बहुत ही कम मत प्राप्त किये. यहाँ कांग्रेस के मतों का कम होना उतना आश्चर्यचकित नहीं करता जितना इस बात के लिए करता है कि बहुत से सीटों पर यह कमी दो से पाँच गुनी तक रही है. यदि इस आँकड़े के परिदृश्य में भाजपा की सीटें देखें तो भाजपा ने महज 17 सीटों पर 2013 के मुकाबले 2015 में कम मत हासिल किये अर्थात उसे 53 सीटों पर पिछले चुनाव के मुकाबले अधिक मत मिले. इनमें कुछ सीटों पर यह अंतर सौ मतों से भी कम का रहा. क्या इसे महज एक संयोग कहकर अनदेखा किया जा सकता है?


इस तरह के मतों को देखकर विश्लेषण करने वाला, सांख्यिकी सम्बन्धी आँकड़ों से खेलने वाला कोई भी विद्यार्थी प्रथम दृष्टया ही बता सकता है कि ये पूरा खेल मत-स्थानांतरण का है. कोई भी साधारण से साधारण विश्लेषक इसे खेल कहने का दुस्साहस कर सकेगा क्योंकि ये मामला 2015 विधानसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रहा. भाजपा या कहें कि मोदी विरोधियों ने अपने कदम से और मतदाताओं के रुझान से इसका एहसास कर लिया कि आआपा को अन्ना आन्दोलन के समय मिले समर्थन और उसके बाद 2015 में मतों के ट्रांसफर से भाजपा विरोध में कांग्रेस का विकल्प अथवा उसकी टीम बी बनाया जा सकता है. इसी कारण से दिल्ली में मोदी विरोध में, भाजपा विरोध में सभी दल किसी न किसी रूप में एकजुट बने रहे. इन दलों ने खुलकर मोदी का विरोध किया, भाजपा का विरोध किया मगर आपस में एक-दूसरे का विरोध करने से बचते रहे.  

परदे के पीछे चलने वाले खेल में कमी नहीं आई बल्कि उसे और मजबूती प्रदान की जाने लगी. इसमें केन्द्र सरकार के निर्णयों को आधार बनाकर अनावश्यक विरोध बनाये रखा गया. समूची दिल्ली में केन्द्र सरकार के विरोध के बहाने मोदी को हराने की कोशिशें चलती रहीं. आम आदमी पार्टी के कामों को खूब बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाने लगा. चुनावों में स्थिति कुछ और ही बनती, यदि परदे के पीछे की सांठ-गांठ जमीन पर न उतरती. मतदाता किसी न किसी रूप में भाजपा के पक्ष में अपना मन बना चुके थे मगर शाहीन बाग का विरोध कहीं न कहीं मतदाताओं को भाजपा के, मोदी के खिलाफ करने की साजिश रचता नजर आया. इन सबके बाद भी विधानसभा 2020 के चुनावों में आम आदमी पार्टी जीतने के बाद भी अपना पिछला कारनामा करने में असफल रही. 2015 के चुनाव के मुकाबले इस बार वह मात्र 35 पर ही ज्यादा मत प्राप्त कर सकी. भाजपा को 2015 के मुकाबले  57 सीटों पर अधिक मत प्राप्त हुए. कांग्रेस ने कुल 06 सीटों पर अधिक मत प्राप्त किये. इसे भी संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता कि 70 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को मात्र 08 सीटों पर पाँच अंकों में मत प्राप्त हुए, उनमें भी महज तीन सीटों में वह बीस हजार या उसके आसपास में सिमट गई. ये और बात है कि भाजपा इसके बाद भी महज आठ सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी.

12 दिसंबर 2018

ईवीएम और राजनैतिक मसखरी


पांच राज्यों के विधानसभा नतीजे सामने आ चुके हैं. प्रमुख तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है. इस हार के साथ गैर-भाजपाई दलों के लिए ईवीएम निष्कलंक हो गई है. साथ ही साथ निर्वाचन आयोग भी निष्पक्ष हो गया है. चुनाव परिणाम क्यों ऐसे आये, उनके पीछे के कारण क्या रहे ये एक अलग विषय है. इसके अलावा ईवीएम एक विषय अवश्य है कि जब भाजपा जीतती है तो वहाँ ईवीएम हैक कर ली जाती है और जहाँ भाजपा की हार हो जाती है, कोई विपक्षी दल विजयी हो जाता है तो वहाँ से ईवीएम खराबी की, उसके हैक करने की कोई खबर नहीं आती. वर्तमान चुनावों में ही सामने आया, जिन तीन राज्यों में कांग्रेस ने भाजपा पर बढ़त बनाई तो वहाँ ईवीएम सही रही, उस पर कोई सवालिया निगाह नहीं उठाई गई किन्तु जिस राज्य से कांग्रेस का सफाया हुआ वहीं के लिए ईवीएम हैक किये जाने की शिकायत कर दी गई. सोचा जा सकता है कि राजनीति किस स्तर तक ले जाना चाहते हैं ये पढ़े-लिखे राजनीतिज्ञ? 


चुनावों में मतदान के बाद सोशल मीडिया पर वीडियो आये, खबरें आईं, चित्र भी सामने आये जिनमें दिखाया गया कि कोई पत्रकार होटल में ईवीएम लिए बैठा है. कहीं दिखाया गया कि सड़क पर सीलबंद ईवीएम पड़ी हुई है. कहीं से खबर आई कि किसी इंजीनियर को, कही किसी चुनाव अधिकारी को ईवीएम मशीन के साथ पकड़ा गया, देखा गया. आखिर इस तरह की भ्रामक खबरों के प्रचार के निहितार्थ क्या हैं? ईवीएम को उसी स्थिति में ख़राब बताने का, हैक किये जाने का प्रचालन क्यों है जबकि भाजपा के जीतने की सम्भावना होती है? इन चुनावों में भाजपा के विरोध में पर्याप्त माहौल बनाया जा चुका था. खुद भाजपा की तरफ से भी ऐसे कदम उठाये गए जिन्होंने भाजपा को एक कदम पीछे आने के संकेत दिए थे. इसके बाद भी विरोधी कहीं भी ईवीएम से छेड़छाड़ किये जाने का अंदेशा दिखाने से नहीं चूक रहे थे. उनके प्रचार में नियमित रूप से ईवीएम के प्रति संदेह व्यक्त किया जाता रहा. अब जबकि कांग्रेस तीन राज्यों में भाजपा से आगे है तब वहाँ से ईवीएम ख़राब होने, उसके संदिग्ध होने की कोई शिकायत, कोई खबर नहीं आई है.

सोचने वाली बात है कि इक्कीसवीं सदी में लगभग दो दशक की यात्रा करने के बाद भी देश का लोकतंत्र अभी भी मसखरी राजनीति का शिकार बना हुआ है. आज भी यहाँ शीर्ष राजनैतिक व्यक्तित्व मसखरी करते हुए तथ्यों से, आँकड़ों से खिलवाड़ करते हुए मतदाताओं को बेवकूफ बनाने में लगे रहते हैं. इक्कीसवीं सदी का मतदाता, जिसे जागरूक कहकर पुकारा जाने लगा है, वह भी सहजता से इस मसखरी का शिकार बनता हुआ खुद ही हँसी का पात्र बन रहा है. जहाँ स्वार्थ भरा एक कदम किसी दल को आगे खड़ा कर देता है, कहीं एक वस्तु का लालच उस व्यक्ति को सबसे आगे ला देता है, जहाँ जिसे चोर बताते थका नहीं जाता है उसी के हाथों में अपना भविष्य सौंप दिया जाता है. ऐसे में समझने का विषय है कि अभी देश के लोकतंत्र को परिपक्व होने में दशकों लगेंगे. फ़िलहाल खुश होइए कि ईवीएम निष्कलंक साबित हुई इन चुनावों में. 

17 मई 2018

कर्नाटक में भाजपा की अग्नि-परीक्षा


अंततः कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में येदियुरप्पा ने शपथ ग्रहण कर ली है. उनके शपथ लेने के बाद भी ये अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या वे सदन में बहुमत सिद्ध कर सकेंगे? चुनाव परिणामों के बाद की अंतिम स्थिति में भाजपा के पास बहुमत के आँकड़े से कम सीटें रहीं. भाजपा जहाँ खुद को सबसे बड़े दल के रूप में देखने के बाद पहले सरकार बनाने के रूप में स्वीकारोक्ति चाह रही थी वहीं दोनों विपक्षी दलों ने अपनी संयुक्त सीटों की संख्या के आधार पर सरकार पहले बनाने का दावा पेश किया. ऐसी विषम स्थिति में गेंद राज्यपाल के पाले में आ गई थी. तमाम ऊहापोह के बाद कर्नाटक के राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. कांग्रेस जैसे पहले से ही तैयार बैठी थी, राज्यपाल का फैसला भाजपा के पक्ष में आते ही उसने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. देर रात तक चली तीन सदस्यीय पीठ ने येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार करते हुए शपथ ग्रहण का रास्ता खोल दिया.


बड़े दल के रूप में उभर कर आने के कारण राज्यपाल द्वारा भाजपा को पहले सरकार बनाने का आमंत्रण देना क्या वाकई संवैधानिक त्रुटि है? क्या वाकई ये लोकतान्त्रिक मूल्यों की हत्या है? क्या वास्तव में राज्यपाल के इस कदम को नैतिकता की हार कहा जायेगा? ऐसे और भी प्रश्न हैं जो अब भारतीय राजनैतिक पटल पर उभरने लगे हैं. यहाँ संविधान विशेषज्ञों की अपनी-अपनी राय है और लगभग सभी की राय में किसी भी राज्य में राज्यपाल द्वारा सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का आमंत्रण देना गलत नहीं है. ऐसा उस स्थिति में गलत कहा जा सकता है जबकि चुनाव पूर्व गठबंधन वाले दलों की संयुक्त सीटों की अधिक संख्या होने के बाद भी उन्हें सरकार बनाने के लिए न्यौता नहीं दिया जाता है. येदियुरप्पा को आमंत्रित करने के साथ ही चिर-परिचित भाजपा-विरोधी माहौल बनता दिखाई देने लगा.

इस विरोध के बीच कई घटनाओं, स्थितियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही बहुत से विश्लेषकों ने लगभग साबित कर दिया था कि वहां भाजपा को लाभ मिलने वाला नहीं है. असल में 2014 से लेकर अभी तक प्रत्येक छोटे-बड़े चुनाव में राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा, चुनाव सर्वेक्षणों द्वारा मोदी छवि को ही आधार बनाया गया है. उनके इस तरह के विश्लेषण के पीछे पेट्रोल, डीजल की कीमतों की वृद्धि को, रुपये की कीमत में आती गिरावट को आधार बनाया जा रहा था. केंद्र सरकार को असफल दिखाने वाले विश्लेषकों ने रोजगार देने के मामले में भी केंद्र सरकार को पिछड़े पायदान पर दिखाया था. कोशिश ये रही कि कैसे न कैसे करके इन स्थितियों को कर्नाटक चुनाव से जोड़ते हुए ये साबित किया जाये कि वहां भाजपा की पराजय सुनिश्चित है.

ऐसे विश्लेषक जिनका विश्लेषण सिर्फ और सिर्फ पूर्वाग्रह पर आधारित रहता है वे किसी न किसी तरह भाजपा को कर्नाटक में हराते दिख रहे थे. इस तरह के विश्लेषणों के बाद कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस इसके लिए आश्वस्त हो गई थी कि कर्नाटक में वहां के मतदाता उसे ही चुनेंगे. कांग्रेस राज्य में अपनी पुनर्वापसी को लेकर पूर्णतः आश्वस्त हो गई थी. कर्नाटक में इन विश्लेषणों के उलट असलियत ये रही कि राज्य में विगत पांच वर्ष के शासन में ऐसी तमाम विसंगतियाँ उभर कर सामने आईं जिनसे जनता का मोह कांग्रेस से भंग हो गया था. मोदी छवि के सहारे भाजपा कर्नाटक में भले ही बहुमत का जादुई आँकड़ा न छू सकी हो किन्तु अपने पिछले प्रदर्शन से कहीं अधिक अच्छा प्रदर्शन कर सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई है.

राज्यपाल ने सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को आमंत्रित किया. येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी ले ली. इसके बाद भी सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर 104 की संख्या को बढ़ाकर कैसे बहुमत के जादुई अंक तक ले जाया जायेगा? फ़िलहाल तो अभी सदन में बहुमत सिद्ध करने का कार्य बाकी है और जेडीएस की तरफ से भाजपा पर प्रति विधायक सौ करोड़ रुपये की पेशकश का आरोप भी लगाया जा चुका है. संवैधानिक विशेषज्ञों की राय के अनुसार कर्नाटक के राज्यपाल ने भले ही सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को बुलाकर संवैधानिक कदम ही उठाया है किन्तु कहीं न कहीं बहुमत के आँकड़े को छूने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त का अवसर भी तो उपलब्ध करवाया है. ये कहकर कि पूर्व में कांग्रेस की ओर से भी इसी तरह की स्थितियाँ उत्पन्न करके सरकारें बनाई जाती रही हैं, विपक्षियों को रोका जाता रहा है कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है. सदन में भाजपा, येदियुरप्पा क्या सिद्ध करते हैं, ये समय के गर्भ में है पर कुल मिलाकर उनकी अग्नि-परीक्षा शुरू हो चुकी है.  

20 दिसंबर 2017

गुजरात विजय से मंथन की आवश्यकता है भाजपा को

समूची मीडिया और राजनैतिक विश्लेषकों के सामने गुजरात राज्य विधानसभा चुनाव परिणाम छाया रहा. आमजनमानस और राजनैतिक लोगों के लिए भी इसके परिणाम को लेकर उत्सुकता थी. ये चुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए परीक्षा की घड़ी था. भाजपा के लिए एक तरफ प्रतिष्ठा का प्रश्न तो बना ही हुआ था, दूसरी तरफ इसी चुनाव के आधार पर उसके लिए आगामी लोकसभा का खाका भी तैयार किया जाना अपेक्षित था. इसी तरह कांग्रेस के लिए भी गुजरात चुनाव एक तरह की प्रतिष्ठा का सवाल था. यहाँ कांग्रेस की हार या जीत का प्रश्न उतना बड़ा नहीं था जितना कि हार्दिक पटेल के साथ उनका गठबंधन का असर बड़ा बना हुआ था. लगभग दो दशकों से भाजपा की सत्ता होने के कारण वर्तमान चुनावों को एंटी इनकम्बेंसी के रूप में देखा-सोचा जा रहा था. इसके अलावा नोटबंदी, जीएसटी से वहां के व्यापारियों में रोष, पाटीदारों का आन्दोलन, हार्दिक पटेल की छवि का उभरना, उसके पक्ष में कांग्रेस का आना आदि ऐसे बिंदु थे जिनसे कि माना जा रहा था कि वर्तमान चुनाव भाजपा को मुश्किल में ले जायेगा.


इस चुनाव में भाजपा की प्रतिष्ठा से ज्यादा नरेन्द्र मोदी की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी थी. विगत लोकसभा चुनाव में जिस प्रचंड जीत का सेहरा देश के मतदाताओं ने उनके सिर पर बाँधा था, उसका आधार गुजरात विकास मॉडल था. विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के आने पर उनको गुजरात भ्रमण करवाना, वैश्विक आर्थिक जगत के सामने गुजरात के आर्थिक स्वरूप को आँकड़ों सहित प्रस्तुत करना, सम्पूर्ण विश्व में गुजरात को एक विकसित राज्य के रूप में प्रदर्शित करना आदि भले ही भाजपा को सम्पूर्ण देश में विधानसभा चुनाव जीतने में मददगार बन रहा था मगर इन चुनावों में यही उसके लिए अवरोधक के रूप में दिखाई पड़ने लगा. एक तो गुजरात उनका गृह राज्य है यहाँ भाजपा की हार को नरेन्द्र मोदी की ही हार के रूप में प्रचारित किया जाता. दूसरे, जिस गुजरात विकास मॉडल की सर्वत्र चर्चा की जाती है यदि इस चुनाव में वही असफल साबित कर दिया गया तो यह स्वयं मोदी जी की छवि के लिए उचित नहीं रहता.

भाजपा के लिए चिंता इसलिए भी थी क्योंकि व्यापारिक विरोध गुजरात में स्पष्ट दिखाई दे रहा था. आरक्षण के नाम पर भी लोग जगह-जगह लामबंद हो रहे थे. मोदी के बाद के दोनों मुख्यमंत्री उतने प्रभावी नजर नहीं आ रहे थे कि उनके सहारे विधानसभा चुनाव जीता जा सकता. कांग्रेस-हार्दिक पटेल जुगलबंदी भी भाजपा की विजय राह में बाधक बन रही थी. इसके अलावा जिस सोशल मीडिया, तकनीक का बेइंतिहा उपयोग-प्रयोग करके भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के सहारे जीत के रास्ते पर बढ़ना सीख लिया था, अब उसी विद्या में उनके विरोधी भी निपुणता हासिल करने लगे थे. गुजरात की कमियों को नियमित रूप से सोशल मीडिया के द्वारा आम मतदाताओं तक पहुँचाया जा रहा था. गुजरात की शिक्षा व्यवस्था, रोजगार, व्यापार, विकास आदि के नाम पर व्याप्त समस्याओं को भाजपा-विरोधियों द्वारा चर्चा में लाकर मतदाताओं को भाजपा के विरोध में तैयार किया जा रहा था. ऐसे में गुजरात में चुनाव प्रचार की जिम्मेवारी मोदी जी के कंधों पर स्वतः ही आनी थी.

कई बार खुद की मेहनत या ताकत के बजाय विरोधी की कमजोरी, उसकी रणनीति की कमजोरी के कारण जीत मिलती है. इस चुनाव में कुछ ऐसा ही भाजपा के साथ हुआ. नरेन्द्र मोदी की रैलियों से ज्यादा लाभ उनके विरोधियों ने भाजपा को पहुँचाया. कांग्रेस की तरफ से राहुल गाँधी जाने-अनजाने भाजपा के लिए राह आसान कर रहे थे. यही कारण था कि जातिवाद के मुद्दे से शुरू हुआ उनका चुनाव प्रचार ब्राह्मण, जनेऊ, सोमनाथ मंदिर में गैर-हिन्दू के रूप में दर्ज हुए उनके विवरण से गुजरने लगा. राहुल गाँधी की छवि वैसे भी मतदाताओं के बीच गंभीर नेतृत्व के रूप में उभर कर सामने नहीं आ सकी है. इस चुनाव के मध्य में ही ये निर्धारित हो गया था कि वे कांग्रेस के आगामी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, उसके बाद भी उनकी छवि में उस तरह की परिपक्वता और गंभीरता दिखाई नहीं दी, जिसके सहारे वे गुजरात के उन मतदाताओं को अपने पक्ष में मोड़ पाते जो किसी न किसी रूप में भाजपा से नाराज हैं.

जहाँ राहुल गाँधी लगातार रैलियाँ, जनसभाएँ आदि करने में लगे थे वहीं दूसरी तरफ उनके दल के ही लोग भाजपा को जीत की तरफ धकेल रहे थे. कपिल सिब्बल का अयोध्या मुद्दे को ऐसे समय में उठाया जाना उल्टा कदम सिद्ध हुआ. इसी तरफ मणिशंकर अय्यर का मोदी को संबोधित करके बोला गया नीच शब्द भी कहीं न कहीं कांग्रेस की समूची चुनावी मेहनत पर पानी फेरता दिखाई दिया. रणनीतिक कौशल में जबरदस्त पारंगतता हासिल किये नरेन्द्र मोदी ने अय्यर के एक शब्द नीच को पूरी तरह से गुजराती जातीय अस्मिता की तरफ, गुजरात की सांस्कृतिक अस्मिता की तरफ मोड़ दिया. ये और बात है कि अय्यर के उस बयान के तुरंत बाद ही कांग्रेस ने उनके पार्टी ने निकाल दिया किन्तु तब तक एक शब्द भाजपा की राह काफी कुछ आसान कर गया था.

इसके अलावा नरेन्द्र मोदी ने एक रैली में कांग्रेस पार्टी के नेता सलमान निजामी पर हमला बोलते हुए कहा था कि वह मूलत: कश्मीर के रहने वाले हैं और कहते हैं आजाद कश्मीर चाहिए, घर घर से अफजल निकलेगा. इसके बाद जैसे समूचे चुनावी माहौल में कांग्रेस बैकफुट पर दिखाई देने लगी. कांग्रेस द्वारा इस प्रकरण पर सफाई दी गई कि निजामी पार्टी के सदस्य ही नहीं हैं. भले ही यह विवाद पूरे चुनाव भर न छाया रहा हो किन्तु मतदाताओं के मन में एक छवि यह घर कर गई कि कांग्रेस द्वारा राष्ट्रविरोधी के साथ मिलकर प्रचार किया जा रहा है. यही सब कारक मिलकर भाजपा के पक्ष में मतदान को प्रभावित करते गए. भाजपा नेतृत्व द्वारा छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, मुख्यमंत्रियों द्वारा अनेकानेक आन्दोलनों को सफलता से समाप्त न करवा पाना, पाटीदार-पटेल आन्दोलनों का समय-समय पर सिर उठाते रहना, रोजगार, शिक्षा, आरक्षण आदि के मुद्दे पर जब-तब सरकार का घिर जाना आदि ऐसे मुद्दे रहे जिनको देखकर भाजपा को जीतना मुश्किल ही लग रहा था.


इसके बाद भी स्पष्ट है कि कांग्रेस को जितना लाभ मिलना चाहिए था उतना नहीं मिला या कहें कि भाजपा को जितना नुकसान होना चाहिए था उतना नहीं हुआ. इसे चुनाव परिणामों पर सरसरी निगाह डालने से भी समझा जा सकता है. पूरे चुनाव को मतदाताओं ने भाजपा और कांग्रेस के मध्य बाँट दिया था. यदि चुनाव परिणामों को सीटों के सापेक्ष दोनों दलों के सन्दर्भ में देखा जाये तो 2002 विधानसभा चुनावों के बाद से कांग्रेस बहुत ही धीमे गति से अपनी सीटों में वृद्धि करने में लगी है. इसके उलट भाजपा की सीटों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. चुनाव परिणामों के दौर में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह प्रेस वार्ता में भले ही अपनी सीटों की गिरती संख्या को मात्र आठ प्रतिशत के बढ़े हुए मत प्रतिशत से समायोजित करने का प्रयास करें किन्तु भाजपा को समझना होगा कि आने वाली राह उसके लिए आसान नहीं हैं. हाँ, गुजरात विधानसभा की वर्तमान विजय को भाजपा द्वारा आगामी चार राज्यों के विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में अवश्य ही भुनाया जायेगा. आखिर भुनाया भी क्यों न जाये क्योंकि भाजपा जहाँ एक तरफ आज देश के 19 राज्यों में अपनी सरकार बनाकर इतिहास रच ही चुकी है वहीं दूसरी तरफ गुजरात में अपनी लगातार छठवीं जीत के साथ सफलता के घोड़े पर सवार है.

13 अक्टूबर 2017

बड़ी जिम्मेवारी के लिए हिन्दू क्रियाकलापों की राह पर

देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का कथित दावा करने वाले आजकल खुद को संभाल नहीं पा रहे हैं और दावा करने में लगे हैं कि देश संभालेंगे. पिछले कुछ महीनों से उसी पार्टी के पारिवारिक अध्यक्ष पद पर बैठने को लालायित उनके पारिवारिक उपाध्यक्ष कह भी चुके हैं कि वे बड़ी जिम्मेवारी लेने को तैयार हैं. पार्टी उपाध्यक्ष से अध्यक्ष पद पर स्थानांतरित होने को उत्सुक वे ये समझते हैं कि देश के प्रधानमंत्री का पद भी इसी तरह स्थानांतरित होकर झोली में चला आता है. हाँ, कुछ समय पहले तक अवश्य ही ऐसा होता रहा है. परिवार के अलावा वे लोग भी उच्च पदों पर शोभायमान हुए जो उस महाशय के परिवार की एक सदस्य की पेटीकोट सरकार को, किचेन कैबिनेट को शोभित कर चुके हैं. महाशय भूल गए कि वो दौर कुछ और था, ये दौर कुछ और है. तब  न तो तकनीक का इतना अधिक प्रसार-प्रचार था और न ही आम आदमी इतना जागरूक था. तब देश के सर्वोच्च पद पद पर पारिवारिक मुहर लग जाती थी. इधर आदमी भी जागरूक हुआ है, अब उसका काम सिर्फ मतदान करना भर नहीं रह गया है. अब वो सक्रियता के साथ अपनी उपस्थिति को दर्शाता भी है और सही-गलत के निर्णयों में सहभागी भी बनता है.


इन सब बातों से बेखबर पार्टी के स्व-घोषित युवराज बिना सिर-पैर की बातें करने में लगे हैं. पहले तो वे खुद को पार्टी की बड़ी जिम्मेवारी लेने के योग्य बताते हुए तमाम तरह के बयान देने में लगे थे. इसी तत्परता, आकुलता में वे देश के सर्वोच्च पद को भी पार्टी अध्यक्ष की तरह मान बैठे. अति-उत्साह में एक जगह कह बैठे कि मोदी जी पद छोड़, वे छह माह में रोजगार उपलब्ध करा देंगे. ये बयान सिवाय हास्य पैदा करने के और कुछ नहीं करता है. वे अपने आपको ये दर्शाने में लगे हैं कि उनको अपनी जिम्मेवारी का भान है, वे बड़ी से बड़ी जिम्मेवारी को उठाने में अब सक्षम हो गए हैं. इस एक बयान की बात नहीं है. उनके बयान और उनके कृत्य सदैव भारतीय राजनीति में या तो विवाद पैदा करते रहे हैं या फिर हास्य उत्पन्न करते रहे हैं. आप सभी को याद होगा कुछ माह पूर्व उन्होंने बयान दिया था कि मंदिर जाने वाले लड़कियाँ छेड़ने जाते हैं. ज़ाहिर सी बात है कि इस बयान के द्वारा वे हिंदुत्व को निशाना बनाते हुए अनेकानेक हिन्दुओं की भावनाओं को भी संदिग्ध बना रहे थे. इसके बाद अभी कुछ दिन पहले यही महानुभाव मंदिर में माथा टेकते दिखाई दिए. इनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या आप लड़कियाँ छेड़ने गए थे? स्पष्ट है कि चुनावी आहट ने उनको सचेत कर दिया है. विगत कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में जिस तरह से मुस्लिम तुष्टिकरण के विरोध के चलते हिन्दुओं में एकजुटता बढ़ी है, उसने तमाम राजनैतिक दलों को अचंभित कर दिया है. इसी अचम्भे को अपने पक्ष में करने की मानसिकता के चलते पुराने दल के वर्तमान युवराज मंदिर की शरण में चले गए. और तो और जोश में वे एक दिन अपने आपको जन्मजात हिन्दू भी घोषित कर चुके.


उनका मन इतने से भी नहीं माना तो वे हिन्दुओं के कृत्यों की तरफ एक कदम और बढ़ गए. पिछले दिनों हुई जघन्य घटना आप में से कोई नहीं भूला होगा. बीफ के विरोध में उनके दल के कार्यकर्ताओं ने खुलेआम सड़क पर एक गाय को काट डाला. इस जघन्य वारदात पर किसी तरह का विरोध नहीं आया क्योंकि तब उनके दिमाग में अनेकानेक जगहों के वोट-बैंक के रूप में बीफ-प्रेमी दिखाई दे रहे थे. अब जबकि गुजरात में चुनाव की आहट सुनाई दे रही है तब यही बीफ समर्थक, गाय को काटने के मूक समर्थक गाय को चारा खिलाने पहुँच गए. हालाँकि वे ऐसा करते हुए भी हिन्दुओं पर, संघ पर हमला करना नहीं भूले. इस हमले में वे संघ की शाखाओं में महिलाओं को शॉर्ट्स में देखने की इच्छा व्यक्त कर गए. ये मानसिकता कहीं न कहीं उनकी पार्टी की ही मानसिकता है. कभी उनके नेता महिला को टंच माल कहते हैं तो कभी अफ़सोस व्यक्त करते हैं कि पुरानी बीवी मजा नहीं देती है. शायद ऐसी ही किसी मानसिकता के वशीभूत वे महिला शौचालय में घुस गए.


बहरहाल, देश की पुरानी पार्टी का दम भरने वालों को अपनी हरकतों को सुधारना होगा. उनके पूर्ववर्ती क्या-क्या कर गए, उनके पुरखे क्या उपलब्धियां देश को दे गए वो एक इतिहास है. उन उपलब्धियों पर, उनके सकारात्मक कार्यों पर वर्तमान के लोगों ने किस तरह का पलीता लगाया है, किस तरह भ्रष्टाचार का दीमक लगाया है इसे कोई नहीं भूल सकता है. बड़ी जिम्मेवारी लेने को आकुल युवराज यदि जल्द ही अपने कृत्यों, बयानों को न सुधारा, उन पर अंकुश न लगाया तो जल्द ही वे और उनकी पार्टी पुरानी के साथ-साथ विलुप्त होने की तरफ चल देगी. 

03 मई 2016

गिरता राजनैतिक स्तर

जिस तरह से विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस कार्य कर रही है, उससे स्पष्ट है कि उसके पास सिवाय हताशा-निराशा के कुछ शेष नहीं रहा है. अपनी लोकसभा पराजय को वे लोग अभी तक भुला नहीं सके हैं. देश की सबसे पुरानी पार्टी का अहंकार उनमें इस कदर भरा हुआ है कि घोटालों में नाम आने के बाद भी पूरी हनक के साथ किसी से न डरने की बात कही जाती है. ये शर्मसार करने वाली नहीं वरन लोकतान्त्रिक व्यवस्था को हिला देने वाली स्थिति है, जहाँ कि आधा सैकड़ा से कम सदस्य पूरे सदन को बंधक बना लेते हैं. जहाँ किसी भी कांग्रेसी के घोटालों में लिप्त होने की खबर मात्र से सदन से सड़क तक हंगामा मचा दिया जाता है. पिछले घोटालों के खुलासे पर अकसर इसकी आशंका व्यक्त कर ली जाती है कि सत्ता-पक्ष द्वारा शायद अपनी ताकत का दुरुपयोग किया जा रहा हो. शायद उसके द्वारा विरोधियों को फँसाने की साजिश रची जा रही हो. ये सारी आशंकाएँ, सारी साजिशों की बातें उस समय बेमानी साबित हो जाती हैं जबकि किसी घोटाले का खुलासा किसी विदेशी अदालत द्वारा किया जाता है. अगस्ता मामले में हुआ खुलासा इस देश में नहीं हुआ, इस सरकार के कहने से नहीं हुआ वरन एक विदेशी अदालत द्वारा ऐसा किया गया है. ऐसे में क्या समझा जाये कि सत्ता-पक्ष ने, भाजपा ने या फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विदेशी अदालत तक को इसके लिए प्रभावित कर लिया अथवा दबाव में ले लिए कि वो भी कांग्रेसियों के खिलाफ अपने निर्णय में प्रश्न-चिन्ह लगा बैठे?

देखा जाये तो विरोधियों, विशेष रूप से कांग्रेस की तमाम हरकतें अब हास्यास्पद स्थिति में पहुँच चुकी हैं. अपने आपको विभिन्न आरोपों में, घोटालों में घिरा देखकर वे उससे निकलने के स्थान पर अपने आपको सर्वोत्कृष्ट समझकर सत्ताधीशों की तरह से व्यवहार करने में लगे हैं. आरोपों, घोटालों के बीच नरेन्द्र मोदी के लगातार सामने आते कार्यों, उनके दृष्टिकोण, लगातार मिलती प्रसिद्धि से भी कांग्रेसी बौखलाए हुए हैं. जिस तरह से कई-कई मुद्दों पर सकारात्मक रूप से सत्ता-पक्ष कार्य करने में लगा हुआ है, उससे भी कांग्रेसियों में निराशा बढ़ती जा रही है. इसी निराशा का परिणाम है कि कांग्रेस के एक युवा सांसद आरोप लगाते हैं कि पठानकोट हमलों की जाँच करने आई पाकिस्तानी टीम में एक सदस्य आईएसआई का भी था. इस तरह के बयान से पहले क्या उसकी तथ्यात्मकता की जाँच सम्बंधित सांसद ने कर ली थी? उनके पास ऐसे कौन से सबूत हैं जिनके आधार पर उनको ज्ञात हुआ कि उस टीम में इस तरह का एक सदस्य है? यदि एक पल को इसे सत्य भी मान लिया जाये तो एक सांसद होने के नाते, एक भारतीय नागरिक होने के नाते उन्होंने इसकी जानकारी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को क्यों नहीं दी और यदि दी भी तो कब? जाहिर सी बात है कि इन लोगों का एकमात्र उद्देश्य इस समय मोदी सरकार को बदनाम करने का है.


कांग्रेस यदि अपने आपको देश की सबसे पुरानी पार्टी, सबसे बलिदानी पार्टी कहने से नहीं चूकती तो उसे अपने विपक्षी होने का धर्म निर्वहन करना चाहिए. उसे इसे स्वीकारना चाहिए कि वे वर्तमान में विपक्ष में हैं और नितांत निम्न स्तर पर हैं. उन्हें ये भी मानना होगा कि उनके शासनकाल के अंतिम दस वर्षों में जिस तरह से घोटाले हुए, भ्रष्टाचार के मामले सामने आये उन्होंने ने केवल उनकी प्रतिष्ठा को गिराया है बल्कि देश के सम्मान को भी कम किया है. अब जबकि सत्ताधारी दल, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने प्रयासों से देश की छवि को पुनः सुदृढ़ बनाने का प्रयास करने में लगे हैं तब कांग्रेसियों का भी दायित्व बनता है कि वे न सही भाजपा के समर्थन में वरन देशहित में ही कार्य करने का प्रयास करें. उनके घोटालों, भ्रष्टाचारों का यही पश्चाताप होगा कि वे ऐसे मामलों के आरोपियों को सामने लाकर इनकी जाँच में मदद करें. देखने वाली बात ये है कि उत्तराखंड में जिस स्टिंग को गलत बताने में यही कांग्रेसी लगे हुए थे, उसी को स्वयं उसी राजनीतिज्ञ ने सच कह दिया. विरोध करना विपक्ष का कार्य है, होना भी चाहिए किन्तु वह इस तरह का हो कि उससे सत्ता-पक्ष को निरंकुश होने का मौका न मिले. विरोध के नाम पर अब यदि विरोधी दलों द्वारा अंकपत्रों, डिग्रियों की जाँच की माँग की जाने लगेगी तो सोचा जा सकता है कि इनके विरोध का स्तर क्या है. 

10 दिसंबर 2015

पारिवारिक चाटुकारिता में लिप्त राजनीति


लोकतान्त्रिक व्यवस्था होने के बाद भी देश में राजशाही के लक्षण नियमित रूप से देखने को मिलते हैं. इसका ताजातरीन उदाहरण सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को न्यायालय में उपस्थित होने के आदेश मिलने के बाद दिखाई दिया. नेशनल हेराल्ड मामले को लेकर नयायालय के आदेश के बाद संसद से लेकर सड़क तक जिस तरह से कांग्रेसियों ने अपना प्रदर्शन किया है वो चाटुकारिता का जीता-जागता उदाहरण है. यदि एक पल को नेशनल हेराल्ड मामले पर नजर डाली जाये तो वित्तीय अनियमितता का समझ आता भी है. एक कंपनी का अधिग्रहण, कंपनी के शेयरों का हस्तांतरण, कांग्रेस द्वारा कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व की एक नई कंपनी को ऋण उपलब्ध करवाया जाना आदि ऐसा कुछ है जो संदेह उत्पन्न करता है. ऐसे में यदि शीर्ष नेतृत्व पर संदेह के बादल दिख रहे हों और न्यायालय द्वारा उनकी उपस्थिति के पश्चात् मामले को स्पष्ट करने का अवसर दिया जा रहा है, तो किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिए? सोनिया गाँधी को संभवतः स्मरण नहीं होगा अब कि वे जिन इंदिरा गाँधी की बहू होने का दंभ भरा बयान देकर ‘किसी से न डरने वाली’ धौंस जैसी शब्दावली का प्रयोग कर रही हैं, वे इंदिरा गाँधी भी न्यायालय में उपस्थित होती रही थी.
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सोनिया, राहुल के उपस्थिति के आदेश के बाद से जिस तरह से संसद से लेकर सड़क तक प्रदर्शन किये गए वे शर्मनाक कहे जा सकते हैं. पिछले संसद सत्र में जिस तरह का रवैया कांग्रेसी सांसदों का, उनके उपाध्यक्ष का रहा वो वर्तमान सत्र में भी यथावत कायम है. विपक्ष का काम करना कांग्रेस का राजधर्म हो सकता है मगर यहाँ जिस तरह से कार्य किया जा रहा है वो राजधर्म कम और परिवारधर्म ज्यादा लग रहा है. ये समझने की बात है कि किसी मामले में सत्य-असत्य की जाँच के लिए यदि न्यायालय ने सम्मन भेज दिया है तो इस पर इतना बवाल मचने की आवश्यकता क्या है? अभी सोनिया, राहुल पर न तो आरोपों का निर्धारण हुआ है और न ही सजा हुई है. इसके अलावा न्यायालय में उपस्थिति मात्र को लेकर जो हंगामा किया जा रहा है, उसके लिए प्रदर्शन करते लोग बताएँ कि ये दोनों लोग किस संवैधानिक पद पर आसीन हैं कि इन्हें न्यायालय में उपस्थित होने के आदेश से किसी तरह से संविधान की मर्यादा का हनन हुआ है? सोनिया और राहुल महज सांसद हैं और किसी भी सांसद के न्यायालय में उपस्थित होने से किसी राष्ट्रीय शर्म की स्थिति नहीं बनती है. इसके उलट राष्ट्रीय शर्म इस बात पर है कि देश के दो सांसदों को न्यायालय में उपस्थिति मात्र के आदेश से समूची संसद को बंधक सा बना लिया गया है.
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दरअसल कांग्रेस वर्तमान लोकसभा में अपनी सर्वाधिक दुर्गति वाली स्थिति में है और उसके पास कोई ऐसा मुद्दा भी नहीं है, जिसके आधार पर केन्द्र सरकार को बदनाम किया जा सके. ऐसे में देश भर में फैले समूचे कांग्रेसी समर्थकों द्वारा अपने प्रदर्शन से, बयानबाजियों से ऐसा दिखाने का प्रयास किया जा रहा है कि ये सब राजनैतिक षड्यंत्र रचकर किया जा रहा है. स्पष्ट है कि कांग्रेसी शीर्ष नेतृत्व के साथ-साथ उनके समूचे तंत्र में राजशाही के कीटाणु पर्याप्त रूप से पनप चुके हैं. वे अभी भी इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि आधी सदी से अधिक समय तक देश की सत्ता सँभालने वाली पार्टी, एक परिवार के सदस्य अब महज सांसद के रूप में विराजमान हैं. इसी दंभ के चलते इन लोगों के लिए न्यायालय के प्रति कोई सम्मान नहीं है. एक परिवार के प्रति अपनी चाटुकारिता दर्शाने वालों से कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे देश के लोकतंत्र को सुरक्षित रखने को प्रतिबद्ध रहेंगे? जिनके मन-मष्तिष्क में सिर्फ राजशाही जैसी स्थिति हो, जिनके मन में न्यायालय के प्रति सम्मान न हो, संवैधानिक मर्यादा न हो, संसद के प्रति आदरभाव न हो, देश की मान-मर्यादा का ख्याल न हो, जनता के धन के दुरुपयोग किये जाने का भय न हो, उनसे किसी तरह की सकारात्मकता की उम्मीद रखना बेमानी है.

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