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17 नवंबर 2018

पंजाब केसरी को सादर नमन


आज की तारीख का भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में विशेष महत्त्व है. आज, 17 नवम्बर को देश के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय का निधन हुआ था. उनका निधन सामान्य स्थितियों में नहीं हुआ था और इसी कारण आज की तिथि विशेष रूप से स्मरणीय होनी चाहिए. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल के तीन प्रमुख नेताओं लाल-बाल-पाल में से एक थे. सन् 1928 में साइमन कमीशन के विरुद्ध एक प्रदर्शन में हुए लाठीचार्ज में बुरी तरह से घायल हो गये थे. उन्होंने उसी समय कहा था कि मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी. 17 नवम्बर 1928 को इसी लाठीचार्ज में आई चोटों के कारण इनका निधन हो गया. इनकी मृत्यु से सारा देश उत्तेजित हो उठा. चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने का निर्णय किया. इन जाँबाज देशभक्तों ने लालाजी की मौत के ठीक एक महीने बाद 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफ़सर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया. लालाजी की मौत के बदले सांडर्स की हत्या के मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी.


लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के मोगा जिले में हुआ था. बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ इस त्रिमूर्ति को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता था. इन्हीं तीनों नेताओं ने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की थी. बाद में समूचा देश इनके साथ हो गया. लाला हंसराज के साथ दयानन्द एंग्लो वैदिक विद्यालयों का प्रसार किया जिन्हें आजकल डीएवी के नाम से जाना जाता है. इन्होंने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की स्थापना भी की थी. हिन्दी के लिए भी आपके कार्य अतुलनीय रहे. लोग आपको सम्मान से पंजाब केसरी नाम से भी पुकारते हैं. आपकी पुण्यतिथि पर सादर नमन. 


09 अगस्त 2018

काकोरी कांड की स्मृति

आज, अगस्त काकोरी काण्ड दिवस के रूप में याद किया जाता है. भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड ऐसी घटना है जिसने अंग्रेजी शासन को हिला कर रख दिया था. यह घटना भारत के वीर क्रांतिकारियों द्वारा अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध जैसा विगुल था जिसे खिसियाये अंग्रेजों ने काकोरी डकैती का नाम दे दिया था. आज़ादी के मस्तानों - आजादबिस्मिलअशफाकराजेंद्र लाहिड़ीरोशन सिंह सहित दस क्रांतिकारियों द्वारा 9 अगस्त 1925 को लखनऊ से कुछ दूर स्थित काकोरी में ट्रेन से जा रहे अंग्रेजी खजाने को लूट लिया. क्रांतिकारी इस धन का उपयोग हथियार खरीदने तथा आजादी के आंदोलन के लिए करना चाहते थे. काकोरी कांड से अंग्रेजी सरकार बुरी तरह तिलमिला उठी और उसने क्रांतिकारियों के खिलाफ अपनी बर्बरता को और तेज कर दिया. 


क्रांतिकारियों के बीच रह रहे कुछ गद्दारों के चलते चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर इस घटना में शामिल शेष सभी क्रांतिकारी पकडे़ गए. रामप्रसाद बिस्मिलअशफाक उल्लाराजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई. अंग्रेजों में क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुना देने के बाद भी इतना खौफ था कि राजेंद्र लाहिड़ी की फांसी की सजा 19 दिसंबर 1927 को निर्धारित की गई थी लेकिन उनको इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी दे दी गई. 19 दिसंबर 1927 को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में तथा अशफाक उल्ला को फैजाबाद जेल में फांसी दी गई. आज़ादी के परवाने वीर क्रांतिकारियों के चेहरे पर किसी तरह का डरभय नहीं था. वे हंसते-हंसतेभारत माता की जय-जयकार करते हुए फांसी के फंदे को चूम गए. अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुनाकर भले ही उनको मौत की नींद सुला दिया था किन्तु उनके इस निर्णय की बहुत निंदा हुई. इसके पीछे कारण यह था कि डकैती जैसे मामले में फांसी की सजा सुनाना अपने आप में एक अनोखी घटना थी. 

सभी जांबाज क्रांतिकारियों को सादर नमन

14 अप्रैल 2018

जलियाँवाला बाग़ हत्याकाण्ड


उस दिन सभी लोग बैसाखी का पर्व पूरे उत्साह से मना रहे थे. जी हैं, 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का दिन था। वैसे तो यह पूरे भारत का एक प्रमुख त्योहार है परंतु पंजाब और हरियाणा के किसान रबी की फसल काट लेने के बाद नए साल की ख़ुशी के रूप में इसे विशेष रूप से मनाते हैं. इसी दिन, 13 अप्रैल 1699 को दसवें और अंतिम गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी. इसीलिए भी बैसाखी पंजाब और आसपास के क्षेत्र में सबसे बड़े त्योहार के रूप में मनाया जाता है.


सन 1918 में एक ब्रिटिश जज सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक सेडीशन समिति नियुक्त की गई थी, जिसकी ज़िम्मेदारी ये अध्ययन करना था कि पंजाब और बंगाल में ब्रिटिशों का विरोध किन विदेशी शक्तियों की सहायता से हो रहा था. इस समिति के सुझावों के अनुसार भारत प्रतिरक्षा विधान (1915) का विस्तार करके भारत में रॉलट एक्ट लागू किया गया था जो आजादी के लिए चल रहे आंदोलन पर रोक लगाने के लिए था. इस एक्ट के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार को और अधिक अधिकार दिए गए थे जिससे वह प्रेस पर सेंसरशिप लगा सकती थी, नेताओं को बिना मुकदमे के जेल में रख सकती थी, लोगों को बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तार कर सकती थी. इसके विरोध में पूरा भारत उठ खड़ा हुआ और देश भर में लोग गिरफ्तारियां दे रहे थे. रोलेट एक्ट का विरोध करने के कारण ब्रिटिश सरकार ने और अधिक नेताओं तथा जनता को इसी एक्ट के अंतर्गत गिरफ़्तार कर लिया और कड़ी सजाएँ दीं. इससे जनता का आक्रोश बढ़ गया और लोगों ने रेल और डाक-तार-संचार सेवाओं को बाधित किया. ब्रिटिश सरकार को यह स्थिति 1857 के गदर की पुनरावृत्ति जैसी लग रही थी, जिसे कुचलने के लिए वे कुछ भी करने के लिए तैयार थे.


इस आंदोलन के दो नेताओं सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर कालापानी की सजा दे दी गई. 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर के उप कमिश्नर के घर पर इन दोनों नेताओं को रिहा करने की माँग की गई किन्तु अंग्रेजों ने शांतिप्रिय और सभ्य तरीके से विरोध प्रकट कर रही जनता पर गोलियाँ चलवा दीं. इससे तनाव और बढ़ गया तथा उस दिन जनता ने कई बैंकों, सरकारी भवनों, टाउन हॉल, रेलवे स्टेशन में आगज़नी की गई. इसी कड़ी में बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे. शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था इसके बाद भी लगभग पाँच हजार लोग सभास्थल जा पहुंचे. जब नेता बाग में भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया. उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं. नेताओं ने सैनिकों को देखा, तो उन्होंने वहां मौजूद लोगों से शांत बैठे रहने के लिए कहा. सैनिकों ने बाग को घेर कर बिना किसी चेतावनी के निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं. दस मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं. जलियांवाला बाग तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे. सैनिकों ने उसी रास्ते को बंद कर रखा था. जनता को भागने का कोई मौका नहीं मिल रहा था. कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में बने एक कुएं में कूद गए और देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया.


बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुंए से ही मिले. शहर में क‌र्फ्यू लगे होने के कारण घायलों को इलाज के लिए भी कहीं नहीं ले जाया गया. लोगों ने तड़प-तड़प कर वहीं दम तोड़ दिया. अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल 388 शहीदों की सूची है. ब्रिटिश राज के अभिलेख में इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने का जिक्र है. जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6 सप्ताह का बच्चा था. अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए जबकि आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई. अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी.

इस हत्याकाण्ड की विश्वव्यापी निंदा हुई जिसके दबाव में भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट एडविन मॉण्टेगू ने 1919 के अंत में इसकी जाँच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया. कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चला कर लोगों को मार देने का निर्णय पहले से ही करके वहाँ गया था. उसने एक भयावह सत्य भी बताया कि वह उन लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था जो उस संकरे रास्ते के कारण अन्दर नहीं जा पाई थीं. हंटर कमीशन की रिपोर्ट आने पर 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को पदावनत कर के कर्नल बना दिया गया और उसे भारत में पोस्ट न देने का निर्णय लिया गया. बाद में उसे स्वास्थ्य कारणों से ब्रिटेन वापस भेज दिया गया. हाउस ऑफ़ कॉमन्स ने उसका निंदा प्रस्ताव पारित किया परंतु हाउस ऑफ़ लॉर्ड ने इस हत्याकाण्ड की प्रशंसा करते हुये उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया. हालाँकि विश्वव्यापी निंदा के दबाव में ब्रिटिश सरकार को उसका निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा. सन 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफ़ा देना पड़ा. 1927 में प्राकृतिक कारणों से उसकी मृत्यु हुई. जब जलियांवाला बाग में यह हत्याकांड हो रहा था, उस समय उधमसिंह वहीं मौजूद थे और उन्हें भी गोली लगी थी. उन्होंने तय किया कि वह इसका बदला लेंगे. 13 मार्च 1940 को उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर माइकल ओ डायर को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया.

आजादी के लिए लोगों का हौसला ऐसी भयावह घटना के बाद भी पस्त नहीं हुआ बल्कि इस घटना के बाद आजादी हासिल करने की चाहत लोगों में और जोर से उफान मारने लगी. उन दिनों संचार व्यवस्था न होने के बाद भी यह खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई. आजादी की चाह न केवल पंजाब, बल्कि पूरे देश के बच्चे-बच्चे के सिर चढ़ कर बोलने लगी. उस दौर के हजारों भारतीयों ने जलियांवाला बाग की मिट्टी को माथे से लगाकर देश को आजाद कराने का दृढ़ संकल्प लिया.

यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था. माना जाता है कि यह घटना ही भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत बनी. सन 1997 में महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी. सन 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आए थे. उन्होंने विजिटर्स बुक में लिखा कि ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी.

23 मार्च 2018

परिचय के मोहताज न रहें हमारे वीर शहीद


देश की आज़ादी के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले असंख्य वीर क्रांतिकारियों में अनेकानेक युवा भी रहे. उन्हीं युवाओं में से तीन युवाओं ने, जिनकी उम्र २३-२४ वर्ष रही थी, आज ही के दिन आज़ादी के हवनकुंड में अपने प्राणों की आहुति दी थी. भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के क्रांतिकारी कदम की देशवासियों को जानकारी होगी, ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. क्रांति की अलख में युवा शक्ति के द्योतक बन चुके इन तीन नामों के सन्दर्भ में आज दशकों बाद भी एक सामान्य जानकारी ही सबके बीच है. असेम्बली में बम फेंकना, गिरफ़्तारी के भय से मुक्त रहते हुए वहाँ गिरफ़्तारी देना, मुक़दमे में भारत माता की आज़ादी के लिए अपने आपको कर्तव्यनिष्ठ दिखाना, इनकी फांसी की सजा रुकवाने के सम्बन्ध में महात्मा गाँधी का इंकार करना, सजा के पूर्व भगत सिंह का लेनिन की जीवनी पढ़ना, शहीद होने के पूर्व अपने परिजनों, मित्रों को पत्रों द्वारा देश की आज़ादी के लिए संघर्षरत रहने की बात समझाना, अंग्रेजी सरकार द्वारा नियत समय से पहले ही इनको फांसी की सजा दे देना आदि-आदि जानकारियाँ ही हम सबके बीच बराबर तैरती रहती हैं. इन तमाम सारी बातों के बीच ये तीनों युवा या कहें कि विशेष रूप से भगत सिंह को बम, बन्दूक, रिवाल्वर का पर्याय बना दिया गया है. उनके विचारों को विशेष-विचारधारा की चादर ओढ़ाकर भगत सिंह को कभी कामरेड, कभी मार्क्सवादी, कभी समाजवादी बनाया जाने लगता है. उनके आलेख विशेष का सन्दर्भ लेते हुए उन्हें ईश्वरीय-सत्ता विरोधी, नास्तिक बताये जाने की कवायद चलती रहती है. ऐसे लोगों के लिए आज का दिन सर्वाधिक उपयुक्त होता है, जबकि वे इन तीनों क्रांतिकारियों को याद करते हुए अपनी विचारधारा से इतर लोगों को कोसने का काम करने लग जाते हैं.


कई बार मन में विचार आता है कि आखिर ऐसा क्या चला होगा उस समय के युवाओं के मन में जो वे सब अपने प्राणों की परवाह न करते हुए तत्कालीन सरकार के खिलाफ खड़े हो गए थे? ऐसे ही युवाओं में ये तीनों युवा भी शामिल हैं. क्या इनके मन में कभी भी एक पल को अपनी मौत का, अंग्रेजी शासन के अत्याचारों का खौफ नहीं जागा होगा? ऐसा विचार इसलिए भी आता है कि आखिर २३-२४ वर्ष की उम्र होती ही कितनी है. आज इतने वर्ष का युवा अपने कैरियर के बारे में सोच रहा होता है. उसे न तो अपने परिवार की समस्याओं को दूर करने की फ़िक्र होती है और न ही उसे समाज की समस्याओं की तरफ ध्यान देने की फुर्सत होती है. क्या उस समय उन युवाओं के मन में या इन तीनों युवाओं के मन में अपने कैरियर, अपने परिवार, अपने भविष्य के प्रति कोई मोह नहीं जागा होगा? ऐसी कौन सी शक्ति इनके अन्दर उत्पन्न हो गई होगी जिससे ये शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने की हिम्मत जुटा सके थे? ऐसी कौन सी शिक्षा इनको मिली थी जो महज दो दशक के जीवन में वैचारिकी का उत्कृष्ट उदाहरण सम्पूर्ण देश के लिए ये लोग छोड़ गए? युवा तो आज भी हैं. शिक्षा-व्यवस्था तो आज तत्कालीन समाज से बेहतर है. अव्यवस्थाएँ तो आज भी बनी हुई हैं. प्रशासनिक निरंकुशता, सरकारी अव्यवस्था तो आज भी दिखाई देती है. फिर आज का युवा इनके खिलाफ विद्रोह का बिगुल क्यों नहीं फूंक पाती है? आज का युवा अपने कैरियर का मोह त्याग कर क्यों नहीं सरकार के खिलाफ आन्दोलन खड़ा करता है?

जब-जब भी इन सवालों के जवाब भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के इंकलाब के सापेक्ष खोजने का काम किया जाता है तो लगता है कि इनकी वैचारिकी के प्रचार के स्थान पर इनके उस बम को ज्यादा प्रचारित किया गया है जिसे फेंकने के समय उछाले गए पर्चों का पहला ही वाक्य था कि बहरों को सुनाने के लिये विस्फोट के बहुत ऊँचे शब्द की आवश्यकता होती है. आज भी भगत सिंह और उनके साथियों को आज़ादी के संघर्ष में हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेने वाला बताया जाता है. उनकी क्रांति को सीधे-सीधे बन्दूक से, हत्या से, धमाके से जोड़ दिया गया है. उनके इंकलाब जिंदाबाद को भी विशुद्ध रूप से अराजकता का द्योतक बताया जाने लगा है. किसी समय यह उद्घोष अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लोगों को एकजुट करने का प्रतीक माना जाता था तो आज इसके द्वारा हिंसात्मक गतिविधि का सञ्चालन करना माना जाने लगा है. ऐसे में जबकि हमारे ही देश में हमारे देश के इन क्रांतिकारी युवाओं के बारे में संकुचित मानसिकता के साथ जानकारी दी जा रही हो, भावी पीढ़ी को इनके बारे में कम से कम या कहें कि अत्यल्प रूप से पढ़ाया जा रहा हो तो कैसे अपेक्षा की जाये कि आज का युवा किसी अव्यवस्था के खिलाफ, किसी अराजकता के विरुद्ध उठ खड़ा होगा. देखा जाये तो आज भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, आतंकवाद, नक्सलवाद, सामाजिक अपराध, राजनैतिक अपराध, लूटमार, हत्याएँ, हिंसा, जातिगत विभेग, लिंगभेद आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जो भले ही देशवासियों को गुलाम न बनाये हों मगर गुलामों जैसा व्यवहार करती दिखती हैं. इसके बाद भी आज का समाज, विशेष रूप से युवा इनके प्रति अनभिज्ञ बना हुआ बस अपने आपमें ही खोया हुआ है. उसके लिए उसके आसपास की दुनिया ही उसका अपना देश है. उसके लिए अपना कैरियर ही उसकी आज़ादी है. उसके लिए स्वार्थपूर्ति के लिए उठाया गया कोई भी कदम राष्ट्रहित में उठाया गया कदम है.

ऐसी विद्रूप स्थितियों में हम शहीदी दिवस मनाने की औपचारिकता का निर्वहन कर लेते हैं. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की प्रतिमाओं, चित्रों पर माल्यार्पण कर लेते हैं. उनके बारे में चलन में बनी सामान्य सी जानकारी को चंद लोगों के बीच गोष्ठी रूप में बार-बार प्रसारित करते रहते हैं. भगत सिंह को केंद्र में रखकर, उनको कामरेड, मार्क्सवादी, समाजवादी बनाकर दक्षिणपंथी विचारधारा वालों को गरियाने का काम कर लेते हैं. भगवा और लाल रंग का विभेद कर देश के लिए प्राण न्योछावर कर देने वाले युवाओं का भी बंटवारा कर लेते हैं. इन सबके बीच कभी किसी ने विचार करने का प्रयास किया है कि उस दिन असेम्बली में बम फेंकने की घटना के समय भगत सिंह के साथ राजगुरु, सुखदेव तो थे नहीं फिर इन दोनों वीरों को भगत सिंह के साथ फाँसी क्यों? उस दिन भगत सिंह के साथ एक अन्य युवक जो साथ था, उन बटुकेश्वर दत्त को आज कौन याद कर रहा है? उस वीर नौजवान के साथ क्या हुआ? आज भले ही शहीद भगत सिंह अपने अन्य साथियों के सापेक्ष बहुत बड़े कद के दिखाई देते हों पर हम सभी का कर्तव्य है कि देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर देने वालों के चित्र यदि एकसाथ रखे हों तो हम सबको पहचान सकें. इनके विचारों को किसी विचारधारा विशेष के खाँचे में बाँधकर प्रसारित न करें. आने वाली पीढ़ी को समझाएं कि आज वे जिस आज़ाद हवा-पानी में अपना जीवन गुजार रहे हैं वह ऐसे युवाओं के कारण संभव है. आज की पीढ़ी को बताना होगा कि भगत सिंह सहित अन्य युवा क्रांतिकारी हिंसा का, बन्दूक का, बम का पर्याय नहीं हैं. ऐसे वीर युवकों के विचारों की सान पर आज की पीढ़ी को तैयार करना होगा ताकि वह भी आज के समस्यारुपी शासकों के खिलाफ बिगुल फूंक सके.

यदि हम सब मिलकर खुद जाग सकें, आज की पीढ़ी को जगा सकें, आने वाली पीढ़ी को इन वीरों के बारे में समझा सकें, इन सबकी पहचान करवा सकें तो भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु सहित अनेकानेक ज्ञात-अज्ञात वीरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

23 जुलाई 2016

जालौन की पहली महिला क्रांतिकारी : ताईबाई - (1000वीं पोस्ट)

सन् 1857 की क्रान्ति में सभी ने अपनी क्षमता से अधिक आहुति दी। उत्तर प्रदेश का जनपद जालौन भी किसी दृष्टि से इस संघर्ष में पीछे नहीं रहा। छोटे-छोटे संघर्षों के अतिरिक्त सन् 1857 में यह क्रान्तिकारियों की कर्मभूमि बन कर उभरा। नाना साहब, तात्या तोपे, रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर साहब आदि की रणनीति यहीं पर बनी और क्रियान्वित हुई। इन प्रसिद्ध नामों से इतर जनपद की पहली महिला क्रान्तिकारी ताईबाई ने इस आन्दोलन में सक्रियता दिखा कर क्षेत्र के क्रान्तिकारियों के मध्य एक अलख जगा दी थी। ताईबाई की स्मृति को मिटाने का कार्य तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों द्वारा शुरू कर दिया गया था। उनसे सम्बन्धित समस्त दस्तावेज, वस्तुओं यहां तक कि जालौन स्थित उनके किले को सन् 1860 में जमींदोज करवा दिया गया। अंग्रेजी सरकार की इस कायरतापूर्ण कार्यवाही के बाद भी इस वीर महिला की वीरता का वर्णन करते हुए तत्कालीन झांसी डिवीजन के एक अंग्रेज अधिकारी जे० डब्ल्यू० पिंकने ने लिखा था कि वर्ष 1858 के प्रारम्भ होते-होते दबोह और कछवाघार के कुछ भागों को छोड़ कर पूरा जालौन जिला ताईबाई के अधिकार में आ गया था।

जालौन के राजा बालाराव की मृत्यु पश्चात यहां उत्तराधिकार की समस्या सामने आई। राजा की पत्नी ने एक बालक गोद लेकर राज्य करने का विचार किया मगर उसकी अनुभवहीनता और आपसी झगड़ों में यहां की स्थिति बिगड़ गई। तब स्वर्गीय राजा की पत्नी ने अंग्रेजों से रियासत संभालने का आग्रह किया। तत्पश्चात सन् 1838 में यहां प्रशासक नियुक्त कर दिया गया। इसी दौरान सन् 1840 में गोद लिए बालक गोविन्दराव की मृत्यु हो गई। इस बार अंग्रेजों ने रानी को पुनः गोद लेने की अनुमति नहीं दी और जालौन रियासत को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया। जनपद जालौन की पहली महिला क्रान्तिकारी ताईबाई जालौन रियासत के स्वर्गीय राजा बालाराव की बहिन थीं। उनका विवाह सागर के नारायण राव से हुआ था परन्तु विवाहोपरान्त वे अपने पति सहित जालौन के किले में ही निवास करने लगीं। अंग्रेजों से बदला लेने के लिए उनके भीतर स्वाधीनता क्रान्ति का अंकुर फूटने लगा उन्होंने गुपचुप तरीके से अपनी योजना को क्रियान्वित करने का विचार बनाया।

उधर कानपुर में क्रान्ति की शुरूआत होने की सूचना 6 जून 1857 को उरई पहुंची। इसके पश्चात यहां भी क्रान्तिकारियों ने कार्यवाही प्रारम्भ कर दी। क्रान्ति का आरम्भ होते ही जालौन के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन ब्राउन ने भागने में ही अपनी भलाई समझी। कैप्टन ने भागते समय गुरसराय के राजा केशवदास को पत्र लिख कर जालौन में शांति स्थापित करने में सरकारी अधिकारियों की सहायता करने को कहा। राजा केशवदास मौकापरस्त व्यक्ति था, उसने ताईबाई तथा अन्य क्रान्तिकारियों के तेवर देखे तो उसने ताईबाई का साथ देने में ही अपनी बधाई समझी। केशवदास ने अपने दोनों पुत्रों के साथ जालौन आकर अन्य सरकारी अधिकारियों को भगा कर किले पर अधिकार कर लिया। केशवदास के इस कृत्य को ताईबाई आदि ने क्रान्तिकारियों का सहयोग समझकर धन-बल से उसकी सहायता की। इस क्रान्ति में दो अंग्रेजी डिप्टी कलेक्टर पशन्हा और ग्रिफिथ को बन्दी बना लिया गया था। जिन्हें क्रान्तिकारियों की पराजय के साथ ही केशवदास ने परिवार सहित सकुशल कानपुर पहुंचा दिया। इस घटना के बाद से ताईबाई को विश्वास हो गया कि केशवदास अंग्रेजों के लिए कुछ भी कर सकता है।
पराजित क्रान्तिकारी कानपुर से भागकर कालपी आ गये। ताईबाई ने तात्या तोपे के साथ मिलकर केशवदास को वापस गुरसराय जाने पर विवश कर दिया। इस घटना के बाद तात्या ने ताईबाई के पांच वर्षीय पुत्र गोविन्द राव को जालौन की गद्दी पर बिठा कर उनको संरक्षिका घोषित कर दिया। इस कार्यवाही से जालौन में क्रान्तिकारियों की सरकार का गठन हो गया और पेशवाई राज्य की स्थापना हुई। क्रान्तिकारियों की सरकार बन चुकी थी और ताईबाई ने सफल संचालन के लिए प्रधानमंत्री तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की। उन्होंने अद्भुत क्षमता से अत्यल्प समय में एक बड़ी सेना का गठन किया। अपनी सूझबूझ और कुशल नेतृत्व क्षमता के कारण सम्पूर्ण जनपद में अंग्रेजों का नामोनिशान भी न रहने दिया। उनकी बढ़ती शक्ति से अंग्रेज भी परेशान थे। एक ओर क्रान्तिकारी घटनाएं हो रही थीं और रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब आदि की गतिविधियों के साथ-साथ ताईबाई का शासन अंग्रेजों को रास नहीं आ रहा था। इस समय तक कालपी क्रान्तिकारी घटनाओं के संचालन का केन्द्र बन चुका था। अंग्रेज भी जालौन के स्थान पर कालपी किले पर कब्जा करना चाह रहे थे। इसका कारण एक तो वे क्रान्तिकारियों की शक्ति को सीधे तौर पर कम करना चाहते थे और दूसरी ओर ताईबाई के साथ संघर्ष में अंग्रेज अपनी शक्ति को कम नहीं करना चाहते थे। अंग्रेजों ने नई कूटनीति का इस्तेमाल करते हुए उनके सहयोगियों को मिटाना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने युद्ध का नहीं वरन् नरसंहार का सहारा लिया। सबसे पहले हरदोई के जमींदार अंग्रेजी सेना के कोपभाजन बने। एक दर्जन से अधिक क्रान्तिकारियों को खुलेआम पेड़ से लटका दिया गया। अंग्रेजों का नरसंहार जारी रहा। अन्ततः ताईबाई ने नरसंहार रोकने के लिए मई 1858 को अपने पति और पुत्र के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेजों ने उनकी समस्त सम्पत्ति जब्त कर ली। राजद्रोह और विद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें तथा उनके सहयोगियों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। ताईबाई की लोकप्रियता और शक्ति से घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें जालौन से बहुत दूर मुंगेर-बिहार- भेज दिया गया। यहीं पर कैदी जीवन बिताते हुए उनकी मृत्यु सन् 1870 में हो गई। उनकी मृत्यु के बाद भी अंग्रेज उनकी लोकप्रियता और शक्ति से घबराते रहे। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके कैदी बेटे को पढ़ने के लिए तो इलाहाबाद भेज दिया गया किन्तु उनके बंदी पति को जालौन में रहने की आज्ञा नहीं दी गई।


छोटे से स्थान पर ताईबाई ने अपनी कार्यक्षमता और कुशल सैन्य संचालन से अक्टूबर 57 से मई 58 तक, सात माह, स्वतन्त्र सरकार की स्थापना कर उसका संचालन किया। जनपद जालौन की इस क्रान्तिकारी महिला को लोग इस कारण से भी नहीं पहचानते हैं कि अंग्रेजों ने यथासम्भव जालौन से उनसे सम्बन्धित सभी वस्तुओं, दस्तावेजों आदि को समूल नष्ट कर दिया था। अंग्रेजों द्वारा लिखे गये भ्रामक इतिहास को पुनः लिखने और सामने लाने की आवश्यकता है, कुछ इसी तरह की पहल की आवश्यकता ताईबाई के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने की है। जनपद जालौन की पहली महिला क्रान्तिकारी को इन्हीं समवेत प्रयासों के माध्यम से ही देशवासियों के सामने लाया जा सकता है, तभी हम सभी अन्य वीर-वीरांगनाओं की तरह ही ताईबाई को भी याद रख सकेंगे।