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28 मार्च 2023

प्याज भी खाए और जूते भी

कभी-कभी कुछ लोग सयाना बनने-दिखाने के चक्कर में कुछ ज्यादा ही सयानापन दिखा जाते हैं और फिर हाल ये होता है कि वे कहीं के नहीं रहते हैं, हँसी का पात्र बनते हैं, सो अलग से. ऐसे लोगों के सम्बन्ध में एक कथा बड़ी प्रचलित है, जिसके अनुसार कहा जाता है कि प्याज भी खाया, जूते भी खाए और अंत में रुपये भी देने पड़े. इसके पीछे की जो कहानी है वो है तो बहुत छोटी सी मगर बड़ी ही रोचक है.

 

ऐसा कहा जाता है कि किसी समय में एक राज्य में एक अपराधी को किसी अपराध के लिए पकड़ा गया. वहाँ के नियमानुसार उसे दंड के लिए राजा के सामने पेश किया गया. जिस तरह का अपराध उस अपराधी का था, उसे देखते हुए राजा ने सज़ा सुनाई कि वह व्यक्ति सौ प्याज़ खाए या सौ जूते या फिर सौ रुपये दंड स्वरूप कोष में जमा करे. अपराधी को ये अवसर दिया गया कि वह अपने मनमाफिक सजा को चुन ले.

 

अपराध करने वाला व्यक्ति खुद को बहुत ही सयाना समझता था. उसने सोचा कि आखिर सौ रुपये क्यों बेकार में खर्च किये जाएँ. वह रोज ही भोजन में चार-छह प्याज खा लेता है, तो धीरे-धीरे खाते हुए सौ तो खा ही लेगा. उसे सौ जूते खाने या सौ रुपये देने से ज्यादा आसान प्याज़ खाना लगा. ऐसा सोच कर उसने सौ प्याज़ खाने की सज़ा चुन ली. अभी वह दस-बारह प्याज़ प्याज ही खा सका था कि उसकी कड़वाहट से मुँह में जलन होने लगी. उसके लिए अब एक और प्याज खाना बहुत ही मुश्किल समझ आ रहा था. उसे लगने लगा कि यदि अब एक और प्याज खाया तो मर जायेगा.

 

अब उसने विचार किया कि इससे बेहतर है कि जूते खा लिए जाएँ तो उसने कहा कि उसे जूते मारे जाएँ. अभी उसको दस-बारह जूते ही पड़े होंगे कि वह दर्द से बिलबिला उठा. अगले पल उसे लगा कि प्याज या जूते खाने से कहीं ज्यादा सहज है कि सौ रुपये दंड के तौर पर कोष में जमा कर दिए जाएँ. जूते मारने वाले से उसने विनती करके जूते न मारने को कहा और झटपट जेब से सौ रुपये निकाल कर जमा कर दिए.

 

सयानेपन के चक्कर में उस अपराधी ने प्याज भी खाए, जूते भी खाए और अंत में उसे सौ रुपये देने पड़ गए. 





 

18 मई 2020

गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा

संभव हो आप सभी ने ये चुटकुला सुन रखा हो. अरे, सुन भी रखा हो तो एक बार सुनकर हँसने में क्या समस्या है. आखिर हम किसी एक दुःख पर को जितनी बार देखते-सुनते हैं, उदास हो जाते हैं तो एक चुटकुला कई-कई बार सुन कर हँस नहीं सकते. इधर कुछ दिनों से लोगों ने माहौल को बद से बदतर बनाने की कोशिश करनी शुरू कर दी है. बेवजह की समस्याओं का अम्बार लोगों के घरों में ठूँसना आरम्भ कर दिया है. इससे लोगों में निराशा, हताशा देखने को मिलने लगी है. बहरहाल, सबकी अपनी-अपनी कहानी है. हम सबकी कोशिश इस समय छोटी-छोटी बातों से भी बड़ी-बड़ी खुशियाँ निकालने की होनी चाहिए मगर कुछ लोग हैं जो सिर्फ समस्याओं का, दुखों का, निराशा का, हताशा का ही रोना रोते रहते हैं. खैर, आगे बढ़ते हैं.


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एक लड़का था जो ऐसी ही किसी घनघोर बंदी का शिकार हो गया और उसके बाद एक ही बात की रट लगाए रहता, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा. उसकी इस रट को दूर करने का बहुत प्रयास किया गया. कई-कई बार सेनेटाइज किया गया, कई-कई दिन के लॉकडाउन में रखा गया, क्वारंटाइन किया गया मगर नहीं उसकी यही एक रट लगातार बनी रही, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

घर वालों ने बहुत इलाज करवाया. तमाम जगह उसके सैम्पल भेजे गए मगर हर बार रिपोर्ट पॉजिटिव ही आ जाती. हर बार लगता कुछ सही हो रहा है मगर दिमागी संक्रमण फिर बढ़ जाता और वही एक बात, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

कहते हैं न कि करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, सो एक दिन घरवालों को एक बेहतरीन डॉक्टर का पता चल गया. मालूम चला कि उसके पास कोई इलाज है जो इस संक्रमण को ख़त्म कर सकता है. मरता क्या न करता वाली स्थिति में घरवाले उस लड़के को लेकर उस डॉक्टर के पास पहुँचे. डॉक्टर ने लड़के का पूरा मौका-मुआयना किया और फिर चौदह दिन के इलाज के बाद एकदम ठीक हो जाने का दावा किया. घर वालों को विश्वास तो न हुआ मगर यही सोचकर कि शायद लाभ हो जाये, लड़के को डॉक्टर के नर्सिंग होम में भर्ती करवा दिया.

चौदह दिन बाद घरवाले आये. डॉक्टर ने कहा कि अब आपका लड़का एकदम सही है. इसका दिमागी संक्रमण ठीक हो गया है. अब कोई समस्या नहीं.

घर वालों ने अपनी तसल्ली के लिए डॉक्टर के सामने ही इसका परीक्षण करना चाहा. उन्होंने लड़के से पूछा, अब कैसा लग रहा है?

लड़के ने जवाब दिया, अब अच्छा महसूस हो रहा है.

बहुत दिनों बाद लड़के के मुँह से किसी बात का सही जवाब मिले पर घरवाले ख़ुशी से झूम उठे न तो अभी तक वह हर बात का एक ही जवाब देता था, गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

लड़का बोला, मुझे घर ले चलो.

घरवालों ने उसके ठीक होने को और जाँचने के लिए पूछा, घर जाकर क्या करोगे?

लड़का बोला, अब अपनी छूटी पढ़ाई करूँगा.

लड़के के मुँह से ऐसी बातें देख घरवालों का हौसला बढ़ा. वे बड़े खुश हुए. वे लड़के की बात को आगे पूछते जाते और लड़का जवाब देता जाता. (अब घरवालों के सवालों के बजाय सीधे लड़के की कही बातें लिखते हैं. क्योंकि जिनको ये चुटकुला मालूम है, वे बोर होने लगेंगे और जिनको नहीं मालूम वे भी बोर होंगे)


घरवालों की बातों का जवाब देते हुए लड़का बोलता रहा, खूब पढ़ाई करूँगा. उसके बाद विदेश जाऊँगा. वहाँ कोई नौकरी करूँगा या फिर अपना बिजनेस करूँगा. उससे खूब पैसा कमाऊँगा. फिर खूब बड़ा घर खरीदूँगा. बड़ी सी कार खरीदूँगा. जब सब चीजें हो जाएँगी तो फिर एक विदेशी मेम से शादी करूँगा.

घरवाले झूम-झूम जा रहे थे कि लड़का अब इतनी बातें करने लगा. पढ़ाई से लेकर शादी तक आ गया. उधर डॉक्टर भी अपने इलाज पर इतरा रहा था.

लड़के से घरवालों ने पूछा, शादी के बाद?

लड़का चुप रहा फिर बहुत धीरे से बोला, शादी के बाद पार्टी होगी. सब लोग आयेंगे. गिफ्ट लायेंगे, पार्टी करेंगे. फिर हम लोग रात को घर आ जायेंगे. उसके बाद हम दोनों सुहागरात मनाएंगे.
इसके बाद लड़का शरमाते हुए बोला, फिर कमरे की लाइट बंद कर दूंगा. उसके बाद मैं उस गोरी मेम के एक-एक करके कपड़े उतारूँगा. फिर... फिर...

घरवालों ने सोचा कि आगे की बात बताने में शरमा रहा है. उन्होंने डॉक्टर का बहुत-बहुत आभार व्यक्त किया और लड़के से घर चलने को कहा.

लड़के ने जोश में कहा, पूरी बात तो सुन लो. गोरी मेम के कपडे उतारने के बाद उसके अंडरगारमेंट्स में से इलास्टिक निकालूँगा. उससे गुलेल बनाऊँगा, चिड़िया मारूँगा.

अब घरवाले भौचक्के से कभी लड़के को देखते, कभी डॉक्टर को. डॉक्टर भी अब इलाज को अगले चौदह-इक्कीस दिन बढ़ाने पर विचार करने लगा.

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कहिये, कुछ लोगों का हाल ऐसा ही है न? चाहे कितना भी इलाज करो, करवाओ मगर रट एक बात की ही मचाए हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

26 अप्रैल 2020

फिर अन्दर काहे ऐसी-तैसी करा रहे थे?

कुछ लोगों की आदत होती है दूसरे की नक़ल करने की. उनके जैसी हरकतें करने की. दूसरों की देखा-देखी वैसे ही काम करने की. इस चक्कर में बहुत बार नकलची को मुँह की खानी पड़ जाती है. नकलचियों द्वारा जब ऐसा कदम उठा लिया जाता है, तब उन्हें आभास होता है कि वे कर क्या गए. बिना बिचारे काम कर जाना, कदम उठा जाना और फिर पछताना. इसका परिणाम यह होता है कि नकलचियों को भुगतना पड़ता है क्योंकि पछताने का कोई फायदा नहीं होता है.


इस बारे में आज कुछ कहने का विचार नहीं. एक चुटकुला जैसी कथा याद या गई, आप लघुकथा भी कह सकते हैं उसे. उसी को पढ़िए और आनंद लीजिये.


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एक हवाई जहाज आसमान में अपनी रफ़्तार से उड़ान भर रहा था. उसके अन्दर सभी सवारियाँ अपने-अपने में मगन गंतव्य तक पहुँचने का इंतजार भी कर रही थीं. उन्हीं सवारियों में एक तोता भी बैठा हुआ था. किसी बड़े रंगबाज़ का तोता था सो उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने के लिए हवाई यात्रा का सहारा लिया गया था.

बहुत देर से अन्दर बैठे-बैठे वह तोता ऊबने लगा. जब उसे कुछ समझ नहीं आया तो उसने सीट के सामने लगा स्विच दबा दिया. अगले ही पल एयर होस्टेस उपस्थित हुई और बोली, जी सर. क्या सेवा कर सकती हूँ?

तोता मुस्कुराया और बोला, कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहा हूँ.

एयर होस्टेस को बुरा लगा मगर यात्री का सम्मान करते हुए वह वापस लौट गई. कुछ देर बाद उस तोते ने फिर से स्विच दबाया. एयर होस्टेस आई, फिर वही सवाल किया. तोते ने भी वही जवाब दिया, कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहा हूँ.

एयर होस्टेस फिर वापस लौट गई.

तोते को ऐसा करते देख बगल वाले एक ठरकी यात्री ने पूछा, ये क्या कर रहे हो?

तोता बोला, बहुत मौज आती है. करके देखो.

अब उस ठरकी यात्री ने स्विच दबाया. एयर होस्टेस आई और अपना सवाल दोहराया. अबकी यात्री ने तोते वाला जवाब दिया, कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहा हूँ. एयर होस्टेस को बहुत गुस्सा आया.

अब वो तोता और ठरकी यात्री मिलकर ऐसा करने लगे. उन दोनों ने दो-तीन बार ऐसा फिर किया तो एयर होस्टेस ने पायलट से शिकायत की. पायलट ने कहा, अगली बार दोनों ऐसा करें तो जहाज के बाहर फेंक देना.

बस, फिर क्या था. जैसे ही तोते और ठरकी ने स्विच दबाया. एयर होस्टेस के आने पर जवाब दिया कि कुछ नहीं, बस ऐसी-तैसी करा रहे. एयर होस्टेस ने दोनों को बाहर फिंकवा दिया.

अब वे दोनों जहाज से बाहर आसमान में थे, बिना पैराशूट के. तोता बहुत जोर से हँसा और बोला, क्यों प्यारे, उड़ लेते हो?

ठरकी यात्री बोला, नहीं.

तोता और तेज हँसा और बोला, फिर अन्दर काहे ऐसी-तैसी करा रहे थे?



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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

14 दिसंबर 2018

गुलेल बनाऊंगा चिड़िया मारूँगा

एक लड़का किसी कारणवश मतिभ्रम का शिकार हो गया. उसे कोई सनक सी सवार हो गई. वो बस हर समय एक ही बात की रट लगाये रहता कि गुलेल बनाऊंगा, चिड़िया मारूंगा. उसके घरवालों ने उसका बहुत इलाज करवाया, बहुत जगह उसे दिखाया मगर कहीं भी लाभ न मिला. वो तो चौबीस घंटे बस यही दोहराता रहता कि गुलेल बनाऊंगा, चिड़िया मारूँगा.


उसके परिजनों को मालूम चला कि कहीं कोई बड़े नामी विशेषज्ञ चिकित्सक ऐसे रोगियों का इलाज सफलतापूर्वक कर लेते हैं. उस लड़के को उनके यहाँ उपचार के लिए एडमिट कर दिया गया. कुछ दिनों के इलाज के बाद एक दिन जब उस चिकित्सक को लगा कि लड़के में कुछ सुधार हो रहा है तो उसके परिजनों को बुलाकर सबके सामने लड़के का परीक्षण किया गया.

चिकित्सक ने लड़के से पूछा कि कैसा लग रहा है?
लड़के ने बड़े ही शांत भाव से जवाब दिया कि अच्छा लग रहा है. यह जवाब सुनकर सभी परिजन प्रसन्न हो गए क्योंकि आज के पहले अभी तक वह लड़का किसी भी बात का एक ही जवाब देता था कि गुलेल बनाऊंगा चिड़िया मारूँगा.

इस एक सवाल के बाद चिकित्सक ने पूछा कि अब अच्छा लगने के बाद क्या करोगे?
लड़के ने कहा कि अब अपनी छूटी हुई पढ़ाई करूँगा.
चिकित्सक - पढ़ने के बाद क्या करोगे?
लड़का – अच्छी सी नौकरी करूँगा.
चिकित्सक – नौकरी करने के बाद क्या करोगे?
लड़का – खूब पैसे कमाऊंगा.
लड़के के परिजन बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने इससे पहले कभी इस तरह लड़के को जवाब देते नहीं सुना था.

चिकित्सक ने आगे जानना चाहा – खूब पैसे कमाकर क्या करोगे?
लड़का – विदेश जाकर नौकरी करूँगा, वहां खूब धन कमाऊंगा, नाम करूँगा.
चिकित्सक – फिर?
लड़का – फिर विदेश की किसी लड़की से शादी करूँगा.
चिकित्सक – शादी करके क्या करोगे?
लड़का – फिर उसके साथ हनीमून पर जाऊंगा. उसके साथ सुहागरात मनाऊंगा.
चिकित्सक – कैसे?
लड़का – पहले एक-एक करके अपने कपड़े उतारूंगा, फिर उसके कपड़े उतारूंगा. उसकी ड्रेस उतारूंगा. अपनी शर्ट उतारूंगा, फिर उसकी ब्रा खोलूँगा. अपनी पैंट उतारूंगा फिर उसकी पैंटी उतारूंगा.

अब तक चिकित्सक सहित सभी परिजन बहुत उत्साहित हो चुके थे. सब प्रसन्न भी थे. उसी समय चिकित्सक ने आगे पूछ दिया कि कपड़े ही उतारते रहोगे या आगे भी कुछ करोगे. यह सुनकर लड़का बोला – करूँगा-करूँगा, आगे भी करूँगा.
चिकित्सक – क्या?
लड़का बोला – जो पैंटी उतारूंगा, उसकी इलास्टिक निकालूँगा उससे गुलेल बनाऊंगा, चिड़िया मारूँगा.

ऐसा सुनते ही चिकित्सक और सभी परिजन अपना सिर पकड़ पर बैठ गए.

11 अप्रैल 2011

लालू को ड्राइवर बना रखा है


आज अपने शहर के एक बड़े उद्योगपति को अपनी कार स्वयं चलाते देखा तो बहुत पुराना और चलन में भी काफी रहा एक चुटकुला याद आ गया।


चित्र गूगल छवियों से साभार

एक बार एक कार यातयात नियम का उल्लंघन करने के कारण यातायात पुलिस के सिपाही ने रोक लिया। सिपाही ने जब उसके चालक को देखा तो उसकी घिग्घी बंध गई। उसने तुरन्त डर के मारे अपने अफसर को फोन लगाया।

अफसर ने पूछा कि क्या बात है, इतना घबराया हुआ क्यों है?

इस पर उस सिपाही ने जवाब दिया कि सा आप जल्दी से जाओ, यह कोई बहुत बड़ा आदमी है। इसने लालू को अपना चालक बना रखा है।

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आज काम कुछ ज्यादा है और मन भी नहीं कर रहा है कि किसी मुद्दे पर कुछ लिखा जाये। वैसे भी हमने असल मुद्दों पर चर्चा करना बन्द कर दिया है। हम घर में घुसे रहते हैं और दूसरों के किसी भी कदम पर, उसके कार्य पर अपनी टीका-टिप्पणी करना अधिक पसंद करते हैं। शायद काम करने से, कोई कदम उठाने से बहुत आसान यही होता है।

कृपया इस बात को अन्ना हजारे के अनशन से, बाबा रामदेव के बयानों से जोड़कर देखा जाये क्योंकि आजकल कुछ भी लिखा जाये, कुछ भी कहा जाये सभी कुछ अन्ना, बाबा से जोड़कर देख लिया जाता है।


24 अप्रैल 2010

मेरे बच्चे...तुम्हारे बच्चे....हमारे बच्चे....




ब्लॉग पर तैर रही साम्प्रदायिकता और तनाव से कुछ बाहर आने की कोशिश करिए जनाब.... लीजिये अभी कुछ और नहीं एक हल्का-फुल्का चुटकुला ही पढ़िए.....
ठीक है न॥!!!
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एक महिला के दो बच्चे थे और उसका पति नहीं था। एक पुरुष के दो बच्चे थे और उसकी पत्नी नहीं थी। दोनों ने एक-दूसरे को साथ देने के लिए आपस में शादी कर ली।

दोनों के सम्बन्ध मधुरता से चलने लगे और उनके आपसी मिलन से भी दो बच्चे हुए।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)

एक दिन पुरुष अपने ऑफिस में बैठा काम कर रहा था तभी उसकी पत्नी का फोन उसके पास पहुँचा। वह बड़ी ही घबराई हुई थी।

उसने अपने पति से लगभग चीखते-चिल्लाते हुए कहा-‘‘सुनते हो जी, जल्दी घर जाओ।’’

अपनी पत्नी की घबराहट और हड़बड़ाहट को देखकर पति भी घबरा गया और उतनी ही तेजी से चीखते-चिल्लाते हुए बोला-‘‘क्यों क्या बात हो गई?’’

पत्नी ने फिर उसी अंदाज में कहा-‘‘कुछ नहीं, बस जल्दी घर जाओ क्योंकि मेरे बच्चे और तुम्हारे बच्चे मिलकर हमारे बच्चों को पीट रहे हैं।’’


01 दिसंबर 2009

अपना कान अपने दांतों से दबाने की तरकीब - थोड़ी सी मस्ती हो जाए!!!

कई बार ऐसा होता है और सभी के साथ ही ऐसा होता होगा कि जब मन में मस्ती करने का ख्याल आता होगा। अपने कार्य, अपने पद, अपनी प्रतिष्ठा, सामाजिक प्रस्थिति के कारण कई बार हम अपनी जीवन-शैली को कृत्रिमता का आवरण ओढ़ा देते हैं।


खुल कर, मुँह फाड़कर हँसना चाहते हैं, पर नहीं हँस सकते, लोग क्या कहेंगे, यही सोच कर होंठों को इधर-उधर करके ही हँसने की औपचारिकता कर लेते हैं।

बच्चों के साथ खूब उठापटक करना चाहते हैं; गली में, पार्क में, छोटे-छोटे मैदानों में धमाचैकड़ी करते बच्चों के साथ हम भी अपना बचपन याद करना चाहते हैं पर नहीं कर पाते। लोग क्या कहेंगे की सोच हम पर हावी हो जाती है।
यार-दोस्तों के साथ बैठ कर वही पुराने तरीके से हँसी-ठठ्ठा कर लेते हैं पर यह भी देखते हैं कि कहीं कोई और दूसरा न देख लें, नहीं तो सारी इज्जत का कचरा हो जायेगा।

इस पर गुलाम अली द्वारा गायी हुई ग़ज़ल का एक शेर याद आ रहा है-


अंदाज अपने देखते हैं आइने में वो,
और ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो।



अपने जीने में हम क्यों इतनी औपचारिकता, कृत्रिमता लाते जा रहे हैं, बता नहीं सकते? बात-बात पर संस्कृति-सभ्यता का ज्ञान बघारा जाता है। कदम-कदम पर श्लीलता-अश्लीलता की दुहाई दी जाती है। हर काम के पीछे इज्जत खराब न हो जाये का भूत दौड़ाया जाता है। आपस में एक चुटकुला भी सुनाया जाता है तो यह सोचकर कि कहीं इससे हमारी इज्जत मिट्टी में न मिल जाये।

अरे! कभी तो किसी काम को बस आनन्द के लिए किया जाया करे। क्या आवश्यक है कि हर काम में हम आदर्श स्थापना की कोशिश करें? क्यों अपेक्षा करें कि हमारे काम हमें आदर्शवादी-सिद्धान्तवादी घोषित करते रहें?

मौका मिले तो हम भी मुँह फाड़कर हँसें। अवसर आये तो हम भी अपने आपको दूसरों को हँसाने-गुदगुदाने से चूकें नहीं। मस्ती के दो पल भी हमें काम के बोझ से मुक्ति दिलाते हैं। दिमाग में चल रहे टेंशन को दूर करने में मदद करते हैं।

यही सोचकर कि ब्लाग पर बौद्धिकता के बीच कुछ मस्ती के लिए भी समय निकालकर आप सबको अपने साथ शामिल किया जाये। (हमारे दोस्तों और सहयोगियों में तथा अन्य परिचितों में हमारी छवि हँसोड़ की बनी है और हमें कभी इस बात की चिन्ता नहीं रही कि हमारे हँसने-हँसाने के कारण हमारी स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? आज भी इतना ठठ्ठा मार के हँसते हैं कि बस........................) हमने औरों की देखादेखी एक ब्लाग बना दिया ‘‘थोड़ी सी मस्ती हो जाये!!!!’’ अपने ब्लाग पर ऐसा करते तो हमें सुधरने की सलाह भी मिलती इसलिए यह एक प्रयास, वो भी अपनी खुशी के लिए, आपके आनन्द के लिए, हम सभी की मस्ती के लिए।




एक निवेदन है कि इस ब्लाग पर बस मस्ती ही होगी, किसी तरह का बौद्धिक नहीं। इसलिए कृपया वे लोग तो इस ब्लाग पर कतई न आवें जिन्हें बात-बात पर बौद्धिकता प्रकट करने की तथा ग्रहण करने की बीमारी है। बौद्धिक, अतार्किक, श्लील-अश्लील, सांस्कृतिकता-असांस्कृतिकता, मजाक, शोभायमान-अशोभनीय जैसी विकट शब्दावली को जानने वाले भी इसपर आने से बचें। यक केवल मस्ती के लिए है, हो सकता है कि किसी न किसी दिन कोई मस्ती भरा प्रसंग आपको अश्लीलतापूर्ण लगे और बस हो जाये ब्लाग का पोस्टमार्टम और हमारा भी। यहाँ आने के पहले दिमाग को अलग रखना होगा। सोचना और विचार करने की आजादी यहाँ नहीं होगी। इसके जानकारों को यहाँ आने से खतरा हो सकता है।



एक चुटकुला और लम्बी सी बकवास बन्द-----



एक दोस्त दूसरे से-क्या तुम अपने दाँतों से अपना कान दबा सकते हो?
दूसरे ने कहा-नहीं।
पहले ने कहा कि वह ऐसा कर सकता है।
दूसरे ने पूछा-कैसे?
पहले वाले ने अपनी बत्तीसी (नकली दाँत) निकाली और कान दबा लिया।



यहाँ पहले की तरह ही चर्चा होगी, मस्ती के लिए यहाँ भी आइयेगा।

10 नवंबर 2009

कपडे तो पहनती नहीं और लौंड्री का बिल एक लाख का

एक चुटकुला, उससे पहले एक निवेदन............. इस चुटकुले को बस चुटकुले की तरह ही लें, हमारी पुरानी पोस्ट के आधार पर आकलन न करें।
अभी-अभी हमारे मोबाइल पर हमारे एक मित्र का संदेश आया, पढ़ कर हँसी आई तो सोचा आपको भी हँसवा दें
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एक इनकम टेक्स अधिकारी कुछ कागज़ देख कर हँस रहा था।

क्लर्क ने पूछा, साहब, क्यों हँस रहे हैं?
अधिकारी ने कहा - मल्लिका शेरावत का रिटर्न है.
क्लर्क बोला - तो?
अधिकारी ने कहा - कपडे तो पहनती नहीं है और लौंड्री का बिल एक लाख का दिखाया है.

30 अक्टूबर 2009

किफायती दिवस पर किफायती पोस्ट - एक पंक्ति का चुटकुला

समाचार-पत्रों के माध्यम से पता चला कि आज किफायती दिवस है। (सही क्या ग़लत क्या, पता नहीं?) इस कारण ये किफायती पोस्ट - एक चुटकुला -

"एक बुढ़िया बचपन में ही मर गई."

28 अक्टूबर 2009

गाँव में चलते हैं छः तथा सात रुपये के नोट

इस बार गंभीर सा नहीं, कुछ हल्का-फुल्का हो जाए.......

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एक गाँव में रात के समय एक शहरी ठग पहुँचा। उसने सोचा कि रात के अँधेरे में गाँव के किसी बूढ़े व्यक्ति को ठगा जाये। ऐसा सोच वह एक छोटी सी दुकान पर पहुँचा, दुकान पर एक बहुत ही बुजुर्ग व्यक्ति बैठा था।
उस शहरी युवक ने एक नोट देकर उस बूढ़े व्यक्ति से कहा-‘‘बाबा, छुट्टे दे दो।’’
बूढ़े ने देखा कि नोट तेरह रुपये का है। उसने कहा-‘‘बेटा ये नोट तो नकली है। अभी तक तेरह रुपये का नोट आया ही नहीं है।’’

युवक ने कहा-‘‘बाबा, नोट तो असली है। सरकार ने ये नया नोट चलाया है। अभी शहर में ही आ पाया है, गाँव तक आने में कुछ समय लगेगा।’’
बूढ़े व्यक्ति ने सहमति में सिर हिलाया और अंदर से दो नोट लाकर उस शहरी ठग को दिये। युवक ने नोट देखे और कहा-‘‘बाबा, ये क्या? एक नोट छह रुपये का और एक नोट सात रुपये का। ये तो नकली हैं।’’
बूढ़े ने कहा-‘‘नहीं बेटा, ये दोनों नोट असली हैं, अभी सरकार ने नये-नये चलाये हैं। गाँव में आ गये, शहर तक आने में समय लगेगा।’’

12 सितंबर 2009

रिश्तों की उठापटक, ऐसे में पागल तो होना ही था

अमृतसर के पागलखाने में नया मरीज भर्ती किया गया। उसका चेकअप करते हुऐ एक डाक्टर ने कहा कि आप मानसिक रूप से तौ ठीक ठाक लग रहे हैं..... फिर यहां कैसे आ गये?
मरीज बोला डाक्टर मैं ठीक हूं पर बात यह है कि कुछ समय पहले मैंने एक विधवा से शादी की...... उसके एक जवान बेटी थी..... मेरे पिता जी ने उससे शादी कर ली और फिर मेरी पत्नी मेरे पिता जी की सास बन गई।
कुछ समय बाद मेरे पिता जी के घर बेटी पैदा हुई और वह मेरी सौतेली बहन बन गई।
इसके अलावा वह मेरी नवासी भी थी। क्योंकि मैं उसकी नानी का पति था।
अब मेरे घर बेटा हुआ। एक तरफ मेरी सौतेली मां मेरे बेटे की बहन लगती थी क्योंकि वह उसकी मां का बेटा था।
दूसरी तरफ वह उसकी दादी लगती थी क्योंकि वह मेरी मां भी थी। इस तरह मेरा बेटा मेरी मां का भाई बन गया।
डाक्टर साहब आप सोचो मेरे पिताजी मेरे दामाद और मैं उनका ससुर....
इतना ही नहीं मेरी सौतेली मां मेरे बेटे की बहन यानि मेरा बेटा मेरा मामा और मैं अपने बेटे का भांजा......
तभी अचानक डाक्टर जोर-जोर से रोने लगा और उसने मरीज से पूछा कि मेरे बाप मैं कौन हूं?

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ये पोस्ट हमारी नहीं है, इसे हमारे एक मित्र श्री भगीरथ जी ने मेल से हमें भेजा था। उन्हीं की अनुमति से आप सभी के लिए इसे यहाँ लगाया है। अब आप इसे चाहे चुटकुला कहें या फ़िर कुछ और हमें तो पढ़ के बड़ा मजा आया। आप भी मजा लें।

30 जुलाई 2009

बात-बेबात राय देने वालों का क्या करें?

अधिकतर देखने में आता है कि किसी भी बात को, वस्तु को, व्यवस्था को बनाने में बहुत मेहनत लगती है। इस मेहनत के ठीक उलट उस व्यवस्था अथवा निर्मित वस्तु को बिगाड़ने में, उसमें कमी निकालने में किसी प्रकार का समय नहीं लगता है। इसी तरह जितने जतन से उस व्यवस्था का निर्माण होता है, उसी के ठीक उलट बड़ी ही आसानी से सलाहों की पेटी थमा दी जाती है।
देखा जाये तो यह हमारे देश की व्यवस्था की पहचान बन गई है। राजनीति हो या समाज के किसी भी छोटे से तबके का सवाल, सभी जगह इस स्थिति को देखा जा सकता है। वृहद स्तर पर राजनीति में देखा गया है कि किसी प्रकार की विदेश नीति सम्बन्धी, देश हित सम्बन्धी, बजट सम्बन्धी निर्णय हों या फिर कोई भी बात, वे लोग भी अपनी राय देते दिखते हैं जिन्हें इन सबका ककहरा भी ज्ञात नहीं होता है।
अहम से अहम मुद्दों पर ऐसी राय दी जाती है मानो हम से अच्छा विचारक कोई है ही नहीं। ऐसा ही समाज में होता है। आपको कोई काम करना है मिस्टर फलां से पूछिए चाहे न पूछिये, उन्हें तो अपनी राय देनी है। घर का बड़े से कड़ा सामान आना हो या फिर छोटे से छोटा कोई काम हो ये रायचन्द टाइप (जिसका नाम रायचन्द हो वो क्षमा करे) लोग अपनी राय देने हाजिर।
अब आप मानो या न मानो ये तो राय देते ही रहेंगे। आपकी किस्मत कि इनकी राय से आपको कितना लाभ और कितनी हानि हो रही है। बहुत कुछ न कहेंगे, इन्हीं रायचन्दी टाइप लोगों के कारण किस तरह की स्थिति बनती है, इसका एक छोटा सा उदाहरण।

एक आदमी ने मिठाई की दुकान खोली। दुकान के ऊपर बोर्ड लगाया - ‘‘यहाँ ताजी मिठाई मिलती है।’’
उद्घाटन हुआ नहीं कि एक रायचन्द जी पधार गये। बोर्ड पर निगाह मारी और बोले - ‘‘क्यों, इस बोर्ड पर यह ‘यहाँ’ क्यों लिखा रखा है? जब दुकान यहीं है तो यहाँ की क्या जरूरत? इसे मिटवाओ।
दुकान वाले को लगा कि बात तो सही है। जब दुकान यहीं है तो यहाँ लिखा होने की क्या जरूरत? उसने बोर्ड से यहाँ मिटवा दिया।
दो-तीन दिनों में एक और राय देने वाले आ पहुँचे। बोर्ड पर निगाह गई। अब लिखा था - ताजी मिठाई मिलती है।
बोले - ‘‘ये ताजी क्या होता है? क्या मिठाई बासी भी बेचते हो? या दूसरे लोग बासी मिठाई बेचते हैं? मिठाई तो तुम ताजी ही बेचते हो, इस शब्द को मिटवाओ।
दुकान वाले ने सोचा कि बात तो सही है। मिठाई तो ताजी ही बेच रहे हैं फिर ताजी लिखने की क्या जरूरत? उसने उस शब्द को भी मिटवा दिया।
अब बोर्ड पर लिखा था -‘‘मिठाई मिलती है।’’
दो-चार दिन बाद एक और महाशय पधारे राय देने। बोर्ड देखा और बोले -‘‘क्या भाई! तुम केवल मिठाई ही तो बेचते हो फिर इसे लिखने की क्या जरूरत है? हाँ, मिठाई के अलावा और भी कुछ बेच रहे होते तो लोगों को बताने की जरूरत थी। इसे हटवाओ।’’
मिठाई वाले ने सोचा कि ये बात भी सही है। हम तो केवल मिठाई ही बेचते हैं तो इसे लिखवाने की क्या जरूरत? उसने मिठाई शब्द भी मिटवा दिया। अब बोर्ड पर लिखा था -‘‘मिलती है।’’
कुछ दिन बीते एक और राय देने के लिए आ टपके। बोर्ड की ओर ताकते ही बोले -‘‘इतना बड़ा बोर्ड और केवल इतना लिखा है ‘मिलती है।’ अरे! मालूम भी तो चले कि क्या मिलता है। इस बोर्ड पर लिखवा दो ‘‘यहाँ ताजी मिठाई मिलती है।’’

दुकानदार अपना सिर पीट कर रह गया। अब आप ही बताओ कि वो क्या करे ऐसे रायचन्दों का या फिर हम क्या करें, देश क्या करे ऐसे महान राय देने वालों का?

23 जुलाई 2009

फ्री में मिले तो दो दे दो

कल हम मित्रों की आम बैठकी लगी। इधर-उधर हल्की-फुल्की चर्चा, मनोरंजन, हँसी-ठहाके और कुछ बिन्दुओं पर गरमागरम बहस। पर इतनी ही गरम जिससे सम्बन्धों पर असर न पड़े। चर्चा होत-होते बीच-बीच में किसी का उदाहरण किसी की खिंचाई।
खिंचाई और छीछालेदर के मामले में तो देश में दो-तीन बिन्दु बड़े ही ऊँची रेटिंग वाले हैं। राखी सावंत, मल्लिका सहरावत, मीडिया और मीडिया के लिए फिल्मी गपशप।
अब नौजवानों की चर्चा हो और आज की अविवाहित महिला के स्वयंवर की बात न उठे सम्भव ही नहीं। बात चूँकि गम्भीर मुद्दे के रूप में नहीं हो रही थी, आखिर राखी ही गम्भीर नहीं है इस मुद्दे पर।
सवाल उठा कि क्या वाकई राखी शादी करेगी?
जवाब आया क्या ये भी सच का सामना है?
देखा सवाल के बदले जवाब। हा..हा...हू..हू हुई और फिर एक जुमला उछला कि चलो कम से कम एक लड़की ने कुछ लड़के वालों के दिमाग को तो ठिकाने लगा दिया।
इस पर भी एक कटाक्ष तैरा-जिनका ठिकाना नहीं था वही आये हैं इस ठिकाने पर। फिर हा..हा।
क्या सही है, क्या गलत इस पर कोई चर्चा नहीं हुई। राखी की चर्चा हो और सही गलत का आकलन किया जाये तो बस। क्या देश में मुद्दों की कमी रह गई है?
चाय-वाय पी गई और सब अपने-अपने घरों को रवाना हुए। रात को हमने सोचा कि क्या सामाजिक बदलाव इसी तरह से आता है। एक और चैनल है जहाँ पर लड़के-लड़कियाँ अपने साथी को ढँूड रहे हैं। इस तरह से शादी कितने घरों में हो रही है? कितने लड़के वाले हैं जो अपने अहम को इस कदर त्याग रहे हैं? कितनी लड़कियाँ हैं जो बोल्ड होकर शारीरिक सम्बन्धों तक की चर्चा कर ले रहीं हैं?
इस सबके बाद भी लगता है कि सामाजिक बदलाव आया है। हमारे समाज में शादी-प्यार को लेकर कुछ बदलाव भी आया है। जहाँ नहीं आया है वहाँ लाया जा रहा है। जहाँ छूट दे दी गई हैं वहाँ बदलाव अतिवाद का शिकार हुआ है।
इसी अतिवाद पर छूट पर एक चुटकुला सुनाकर बात समाप्त करते हैं।
एक बार गाँव का एक भोला-भाला आदमी शहर खरीददारी करने को आया। उसको गाँव के एक-दो पढ़े-लिखे लोगों ने बताया कि शहर में ठगी बहुत होती है। सामान का जो भी दाम बताया जाये उसके आधे पर ही उस चीज को लेना।
आदमी को सबसे अधिक जरूरत थी एक छाते की। उसने दुकान वाले से पूछा छाता कितने का?
दुकान वाले ने उसका दाम सौ रुपये बताया।
आदमी बोला कि पचास में देना हो तो दो।
दुकान वाले ने सोचा मोल-तोल से बचो, उसने छाता अस्सी रुपये में देना चाहा।
गाँव वाला बोला चालीस में देते हो तो दो।
दुकान वाले ने फिर दाम कम किये, आदमी ने फिर दाम आधे बताये। अन्त में दुकान वाला बोला बाबा तुम छाता अब दस रुपये में ही ले लो।
आदमी ने फिर कहा पाँच में देना हो तो दो।
दुकान वाला गुस्से से बाला कि बाबा ज्यादा सिर न खाओ, तुम इसे फ्री में ही ले जाओ।
आदमी ने पूरी मासूमियत से कहा तो फिर दो दे दो।

08 दिसंबर 2008

अश्लीलता-श्लीलता की रेखा

आज कल बहुत कुछ बहस श्लीलता और अश्लीलता को लेकर छिड़ जाती है. इस बारे में सभी के अपने-अपने मत हैं. सभी की अपनी-अपनी सोच है. इस विषय पर आजकल बड़ी ही बेबाकी से लोगों को बोलते सुना है. यदि अब देखा जाए तो बात करने में, हाव-भाव दिखने में, पहनावे में (ये लड़कियों के लिए नहीं है क्योंकि हमें नारी-विरोधी बात नहीं करनी-कहनी है) प्रदर्शन में अब शालीनता जैसी स्थिति कम ही दिखती है.

अब टीवी पर दिखाए जाते हास्य-व्यंग्य के कार्यक्रम देखिये. उनके चुटकुले, हाव-भाव आदि अत्यन्त ही अश्लील होते हैं. यहाँ कुछ चुटकुलों को तो बताया भी नहीं जा सकता. माँ-पिता के रिश्ते, पति-पत्नी के संबंधों को लेकर, लड़कियों को लेकर गिरी हद तक टिप्पणी चुटकुलों के रूप में की जाती है. क्या यही हास्य है? इस तरह के कार्यक्रम एक साथ बैठ कर देखने में भी शर्म आती है. पर क्या करें.........हास्य है......कभी-कभी अश्लीलता को मासूमियत का जामा पहनाया जाता है। ऐसा हमने सुना है कि "सरस्वती चन्द्र" फ़िल्म का गाना "चंदन सा बदन, चंचल चितवन, धीरे से तेरा ये मुस्काना............" अपने समय में अश्लील-प्रस्तुति के लिए जाना गया था और अब यही गाना मधुर तरानों में शामिल है.

इसी तरह आज जो अश्लीलता है कल को वो श्लीलता हो जायेगी पर आज की अश्लीलता को तो घर में आने से रोकना होगा. आज की मासूमियत भारी अश्लीलता को आप लोग यहाँ आकर देख सकते हैं. एक चुटकुला है उसे किसी कारणवश खुले रूप में यहाँ नहीं दिखा रहे हैं. जो पढ़ना चाहे वो यहाँ क्लिक कर उसको पढ़ सकता है. कुछ ऎसी ही है आजकी शालीन अश्लीलता......

आजकल थोड़ा व्यस्त हैं......कुछ देर से मिलना हुआ करेगा........पर मिलते रहेंगे..........तब तक आप लोग अश्लीलता-श्लीलता की बारीक सीमा-रेखा को समझने-देखने-विचारने का प्रयास करियेगा.