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24 जुलाई 2024

ये विषय आस्था का है

व्रत-उपवास-पूजन आदि की सामग्री को लेकर बहुसंख्यक हिन्दू परिवारों में सदैव से एक अलग स्थिति रही है. दुकान पर मिठाई अथवा अन्य पूजन सामग्री वाला भले ही दो दिन से न नहाया हो, मुँह में गुटखा भरे हो मगर वही सामग्री घर में आने के बाद पूज्य हो जाती है. उसे बिना नहाए छुआ नहीं जा सकता है, बिना पूजन के उसे खाया नहीं जा सकता है, जूठे मुँह उसका स्पर्श नहीं किया जा सकता है. ये सब कोई ढकोसला नहीं बल्कि एक विश्वास है, एक आस्था है. ये अलग बात है कि आधुनिक बनने के चक्कर में, वामपंथ को चचोरते रहने के कारण बहुतेरे हिन्दू इन सब बातों को सार्वजनिक रूप से नहीं मानते. (ये और बात है कि ऐसे बहुतेरे हिन्दू अंदरूनी रूप में कहीं न कहीं ऐसी बातों का पालन करते हैं.)

 

यदि कांवड़ मार्ग में हिन्दू श्रद्धालुओं के भोज्य पदार्थों के साथ शुचिता बनाये रखने के लिए कोई आदेश आया था तो मुसलमानों को उसका स्वागत करना चाहिए था. ऐसा नहीं हुआ क्योंकि इनका मूल कर्म हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुँचाना है, हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों, कृत्यों पर हमला बोलना है. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश सरकार के इस आदेश पर मुसलमानों से ज्यादा वे लोग उचकने में लगे हैं जो मुस्लिम वोटों के कारण जिंदा हैं. ऐसे लोग भी जानते हैं कि हिन्दू आस्था, श्रद्धा का तात्पर्य क्या है, मगर वे अपनी मानसिकता के हाथों बंदी बने हुए हैं.

 


03 दिसंबर 2015

स्त्री और धर्म


स्त्री और मंदिर फिर विवादों के केन्द्र में है. कहीं मंदिर में प्रवेश को लेकर, कहीं शनि देव पर तेल चढ़ाने को लेकर. आदिमानव से मानव बन चुके समाज में, आधुनिक से उत्तर-आधुनिक हो चुके समाज में, पुरातन को कब का विस्मृत कर इक्कीसवीं सदी की आधुनिकता में प्रविष्ट हो चुके समाज में आज भी बहुतायत में ऐसी घटनाएँ सुनाई दे जाती हैं जिनके केन्द्र में धर्म होता है, महिला होती है. कभी धर्म के नाम पर महिलाओं द्वारा किये जाते कथित अधर्म को रोकने की चर्चा होती है, तो कभी उसी महिला को अधर्मी बताकर उस पर ज़ुल्म ढाने का कथित धर्म निर्वहन का कार्य समाज के कथित ठेकेदारों द्वारा किया जाता है. धर्म के नाम पर महिलाओं को केन्द्र में रखने की मानसिकता पूरे समाज में कमोबेश एकजैसी ही दिखती है. कहीं मंदिर प्रबंधन के नाम पर पुरुष वर्ग द्वारा उसे केंद्र में रखा जाता है तो कहीं पारिवारिक संस्कारों की दुहाई देते हुए महिलाओं द्वारा ही महिला को निशाना बनाया जाता है. एक तरफ एक मंदिर प्रबंधन ने महिलाओं के ‘सही समय’ की जाँच किये बिना उसे मंदिर में प्रवेश देने से प्रतिबंधित कर रखा है वहीं कुछ इसी तरह का कार्य परिवार में दीर्घकाल से महिलाओं द्वारा ही महिलाओं को माहवारी के दिनों में रसोई में न जाने देने, धार्मिक कार्य करने से रोकने आदि के द्वारा किया जा रहा है.
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अब जबकि प्रगतिशील लोगों द्वारा महिलाओं के मंदिर में प्रवेश सम्बन्धी प्रतिबन्ध को लेकर विरोधी स्वर उठाये गए हैं, महिलाओं के समर्थन में कई-कई आवाजें उठाई गईं हैं तो आवश्यकता इसकी है कि ऐसे मामलों का सार्थक और सर्व-स्वीकार्य समाधान निकाला जाये. यहाँ समझने की बात है कि जिस धार्मिकता को खुद महिलाओं द्वारा गुलामी वाला कदम बताया जाता है; अनेक व्रतों, अनुष्ठानों, धार्मिक कृत्यों को महिलाओं द्वारा ही उनकी गुलामी बढ़ाने वाला सिद्ध किया जाता है; पारिवारिक धार्मिक अनुष्ठानों तक को पुरुष वर्ग की चाल बताया जाता हो तो ऐसे में समाज में स्त्रियों द्वारा मंदिर में प्रवेश को लेकर इतनी आकुलता क्यों दिखाई जा रही है? जिन धार्मिक कृत्यों, अनुष्ठानों को पुरुष द्वारा महिलाओं को गुलाम बनाने वाला सुनियोजित प्रयास बताया जाता हो उन्हें संपन्न करने की इतनी व्यग्रता महिलाओं में क्यों? जिन मंदिरों, धार्मिक स्थलों को महिलाओं द्वारा ये कहकर आरोपित किया जाता है कि ये महिलाओं को दैहिक रूप से शोषित किये जाने वाले अड्डे हैं तो ऐसे अड्डों पर प्रवेश करने की आतुरता महिलाओं में क्यों है? जिन देवताओं को महज पाखंड का, स्त्री-गुलामी का, स्त्री-देह भोग का पर्याय बताकर समय-समय पर महिलाओं द्वारा अपमानित किया जाता रहता है तो उन्हीं देवताओं को पूजने की तत्परता इन महिलाओं में क्यों है?
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ऐसा नहीं कि महिलाओं का प्रवेश मंदिर में नहीं होना चाहिए; ऐसा भी नहीं कि माहवारी के दिनों में किसी धार्मिक कृत्य में उनके सहभागी बनने से कोई विध्न आता हो; ऐसा भी नहीं कि महिलाओं द्वारा किसी देव विशेष के पूजन कर लेने से समाज में प्रलय आ जाएगी किन्तु महज प्रचार की, आत्ममुग्धता की दृष्टि से किये ऐसा जाने की मंशा को अवश्य निषेध किया जाना चाहिए. देखा जाये तो अभी हाल में हुई ऐसी घटनाओं पर विरोधी स्वरों के पीछे यही मंशा स्पष्ट हो रही है. एक तरफ धार्मिक कृत्यों को महिलाओं की स्वतंत्रता में बाधक सिद्ध करना और दूसरी तरफ धार्मिकता की माँग करना; एक तरफ खुद महिलाओं को महिलाओं द्वारा माहवारी के समय धार्मिक कृत्य करने से रोकना और दूसरी तरफ ऐसा किये जाने को पुरुष वर्ग की साजिश बताना; एक तरफ मंदिर में प्रवेश को लेकर आंदोलित होना दूसरी तरफ विरोध के लिए खुद को दैहिक रूप से स्वतंत्र बना देना कहीं न कहीं आंदोलनरत महिलाओं के दोहरेपन के रवैये को रेखांकित करता है. समाज में किसी भी गलत कार्य का विरोध होना चाहिए, किसी भी अमान्य स्थिति के विरोध में आन्दोलन होना चाहिए मगर महज विरोध की राजनीति के लिए विरोध नितांत भ्रम की स्थिति है, सर्वथा गलत है. मंदिर में महिलाओं के प्रवेश निषेध को लेकर यदि महिलाओं द्वारा हैप्पी टू ब्लीड जैसा अभियान छेड़ा जा सकता है तो इन्हीं जागरूक महिलाओं द्वारा उन महिलाओं के पक्ष में अभियान क्यों नहीं छेड़ा जाता जो आज भी खुले में शौच को मजबूर हैं; जो असमय अपनी शिक्षा को छोड़ दिए जाने को बाध्य कर दी जाती हैं; जो कम उम्र में कई-कई बच्चों की माँ बना दी जाती हैं; जो आज भी दहेज़ के नाम पर आये दिन प्रताड़ित की जा रही हैं; जो आज भी कार्यक्षेत्रों में अपने सहकर्मियों द्वारा शोषित की जा रही हैं; जो आज भी लोकतान्त्रिक रूप से प्रतिनिधि बनने के बाद भी पारिवारिक पुरुषों की गुलाम बनी हुई हैं; जो समान कार्य करने के बाद भी पुरुषों के समान अवसरों से वंचित रह जा रही हैं. सोचना होगा कि एक मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिलने से, एक देवता को पूजने की आज़ादी मिलने से, माहवारी के दिनों में धार्मिक अनुष्ठान करने की स्वतंत्रता मिलने से महिलाएँ वाकई स्वतंत्र हो जाएँगी?

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18 अक्टूबर 2013

करवाचौथ की दकियानूसी मान्यताओं का विरोध हो




बाज़ार करवाचौथ व्रत मनाने या कहें कि मनवाने के लिए सजकर तैयार हो चुका है. महिलाएँ, नवविवाहिताएँ व्रत से सम्बंधित खरीददारी बड़े ही मनोयोग से करती दिख रही हैं. बाजारीकरण का प्रभाव करवाचौथ व्रत पर भी व्यापक रूप से पड़ा है, कुछ फिल्मों ने भी इस व्रत को चकाचौंध से भरा है साथ ही एक नई बहस को भी जन्म दिया है. इस बहस ने पत्नियों के साथ-साथ पतियों के व्रत रहने को केंद्र में ला खड़ा किया है. ऐसी मान्यता सदियों से चली आ रही है कि पतियों की लम्बी आयु के लिए पत्नियों द्वारा यह व्रत रखा जाता है. फिल्मों से चले करवाचौथ के हीरो-हीरोइनों के भाव-प्रणय दृश्यों से निकल कर ये बहस समाज के भीतर उतर आई. व्रत रखती महिलाएँ और महिला-अधिकारों की आलम्बरदारी करते लोग चिल्ला-चिल्ला कर इस बहस को तो आगे बढ़ाने लगे कि पतियों को भी पत्नियों की लम्बी आयु के लिए व्रत रखना चाहिए; करवाचौथ का व्रत अपनी पत्नियों के साथ रहना चाहिए. इस निरर्थक बहस के पीछे कहीं से भी ये बहस नहीं उठी कि विज्ञान के इस युग में आज महज चंद्रमा की पूजा-आराधना से आयु का निर्धारण घनघोर अन्धविश्वास है.
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करवाचौथ आते-आते इस बहस को हवा दी जाएगी; तमाम आधुनिक महिलाएं व्रत रहने के साथ-साथ पुरुषों को कोसती नज़र आयेंगी; कुछ नौजवान पति अपनी-अपनी पत्नियों के साथ करवाचौथ का व्रत रहते दिखाई देंगे. करवाचौथ के साथ शुरू होने वाली अतार्किक बहस से पूर्व इन बिन्दुओं पर यदि विचार किया जाये तो संभव है कि बहस को सही दिशा में जाने का रास्ता दिखाई दे.
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१-यदि करवाचौथ व्रत रहने से पतियों की आयु में वृद्धि हो रही होती तो फिर कम से कम भारतीय समाज में कोई विधवा स्त्री नहीं दिखाई देनी चाहिए थी. यदि इस व्रत के बाद भी यदि पति का देहांत पत्नी के पहले हो जाता है तो इसका अर्थ है कि या तो इस व्रत में कोई तथ्य नहीं, कोई तत्त्व नहीं या फिर व्रत पूर्ण मनोयोग से नहीं रखा गया.
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२-व्रत रहने वाली स्त्रियाँ यदि ये मानती हैं कि उनके साथ-साथ पुरुषों को भी व्रत रखना चाहिए तो कम से कम वे पत्नियाँ व्रत न रहें जिनके पति उनके साथ व्रत न रहें. इसके साथ ही यदि इसको भी मान लिया जाये कि पति जबरन अपनी पत्नी को करवाचौथ का व्रत रखवाते हैं तो भी क्या चौबीसों घंटे उस महिला के आसपास उसका पति घूमता रहता है? क्यों नहीं वह पत्नी चोरी-छिपे ही कुछ खा-पी लेती है? क्यों नहीं वह व्रत का महज नाटक कर लेती है? किस श्रद्धा-भक्ति में वह पूरे दिन भूखी-प्यासी बनी रहती है?
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३-भारतीय समाज में आज इतनी आधुनिकता के बाद भी विधवा स्त्रियों को लेकर दकियानूसी विचारधाराएँ बनी हुई हैं, कहीं-कहीं बहुत ही पुष्ट होकर सामने आई हैं. ऐसे में क्या ये न समझा जाये कि महिलाएँ अपने आपको वैधव्य की जटिलता-दुरूहता से बचाने के लिए ही इस व्रत को रखकर पतियों की दीर्घायु की कामना करती रहती हैं?
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कितनी बड़ी विडंबना है कि जहाँ चंद्रमा को इन्सान ने अपने पैरों तले कुचल दिया हो; जहाँ विज्ञान ने तमाम सारे अंधविश्वासों से पर्दा उठाया है; जहाँ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एक तरफ धार्मिक क्रियाकलापों को ढकोसला बताया जाता हो; जहाँ धर्म के नाम पर वोट-बैंक की खातिर हिन्दू जीवन-पद्धति का मखौल उड़ाया जाता हो; जहाँ देवी-देवताओं को काल्पनिक बताकर उनकी उपासना पर अंकुश लगाये जाने का समर्थन किया जाता हो वहाँ ऐसे लोगों द्वारा ही करवाचौथ व्रत को पूरे आडम्बर के साथ मनाते हुए देखा जाता है. धार्मिक-विश्वास के तहत किसी भी काम को किया जाना तब तक गलत नहीं समझा जा सकता जब तक कि उससे किसी की हानि न हो किन्तु जब किसी भी धार्मिक कृत्य से समाज में विखंडन के, विभेद के, विद्वेष के स्वर उभरने लगें, पारिवारिकता में, दाम्पत्य में, संबंधों में तनाव आने लगे तो उस धार्मिक कृत्य का विरोध होना चाहिए, बहिष्कार होना चाहिए. इस बात को वे स्त्रियाँ समझें जो चंद्रमा को जल-अर्पण करके पतियों की आयु-वृद्धि की कामना करती हैं. वे नौजवान पति भी समझें जो आधुनिकता के वशीभूत करवाचौथ व्रत में तो कंधे से कन्धा मिलाते दिखते हैं बाद में उनकी सोच में स्त्री-विरोध स्पष्ट रूप से झलकता है.
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23 मार्च 2010

पर्यटन के नए और आधुनिक केन्द्र बने मंदिर




भगवान के दर पर बड़ी भीड़ लगी है, मैया के दर पर भक्तों की भारी भीड़ जमा है। वाकई आधुनिकता भरे समाज में जहाँ माता-पिता के सम्मान के लिए किसी के पास समय नहीं है, वहाँ देवी-देव के दर पर जाने वालों की भीड़ बहुत ही अधिक होती जा रही है।
संस्कृति-सभ्यता के नाम पर किये जा रहे कृत्यों को ढ़ोंग बताने वालों के पास पत्थर की मूर्तियों को पूजने का समय तो निकल ही आता है। प्रातःकाल माता-पिता के चरणों में शीश नवाने वाले भले ही न मिलें किन्तु सुबह-सुबह मंदिर में मत्था टेकने वालों की लम्बी कतार देखने को मिल सकती है। माता-पिता बीमारी से परेशान होंगे, उनके इलाज के लिए किसी को भी फुर्सत नहीं होगी किन्तु अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा भी आसान सी लगती है।


हम अपने आसपास देखते हैं कि आजकल नवयुवकों-नवयुवतियों का मंदिर के प्रति, भगवान के प्रति, देवी-देवताओं के प्रति एकाएक मोह बढ़ सा गया है। पब-कल्चर को पसंद करने वाली इस पीढ़ी को भक्ति का माहौल भी पसंद आने लगा है। डिस्को, पॉप, जैज की धुनों पर थिरकती युवा पीढ़ी आज भजनों पर सिर हिलाती, ताली बजाती दिख रही है।
सवाल मन में उमड़ते हैं कि क्या वाकई युवा पीढ़ी का रुझान भारतीय संस्कृति की ओर बढ़ा है? क्या अब लोगों में भगवान के प्रति श्रद्धा-भाव अधिक पैदा हो गया है? क्या अब लोगों के पास परेशानियों का अम्बार है जिसका निपटारा वे भगवान से करवाना चाहते हैं? लोग इतनी बड़ी संख्या में देवी-देवताओं की शरण में क्यों चले जा रहे हैं?
मन ही सवाल करता है और मन ही जवाब देता है। ये सवाल ऐसे हैं जो किसी की भावनाओं को आहत करते हैं अथवा किसी को उसकी भक्ति पर सवाल सा खड़ा करते दिखते हैं। मन के सवाल किसी पर उँगली नहीं उठाते, बस उस चलन के प्रति जवाब माँगते हैं जो इस समय चल रहा है।
मन जवाब देता है कि अब मंदिर, देवी-देवताओं की भक्ति का चलन एक शौक बनता जा रहा है। कोई अपनी समस्या लेकर हो सकता जाता हो किन्तु अब अधिक से अधिक लोगों का जाना शौकिया तौर पर ही होता दिखता है। मंदिर जैसी पवित्र और पावन जगह, जहाँ किसी के मन में कलुषित विचारों के आने का सवाल ही नहीं उठता और किसी के द्वारा किसी भी तरह के हस्तक्षेप का भी सवाल नहीं उठता। आशय आप समझ ही गये होंगे....!!!!
इसके अलावा आप सभी ने देखा होगा कि आजकल मंदिरों में नामी-गिरामी लोगों के जाने का भी चलन बढ़ता जा रहा है। कभी कोई सिनेमा का कलाकार, कभी कोई उद्योगपति, कभी कोई खिलाड़ी तो कभी कोई नेता और आश्चर्य देखिये परेशानी का समाधान खोजने, सुख की तलाश में जाने वालों के साथ लाखों, करोड़ों का माल भी जाता है। मंदिरों की दान-पेटियाँ एक झटके में लखपति-करोड़पति हो जातीं हैं।
सोचिए कि लाखों के जेवरात, धन देने वालों के पास किस तरह की परेशानी होती होगी?
परेशानी तो उस के पास है जो छप्पर में लेटा है और सरदी, गरमी, बरसात को अपनी देह पर सह रहा है। परेशानी तो उसके पास है जो उसी मंदिर के बाहर पड़ा इन धनकुबेरों से दो-चार रुपये देने की गुहार कर रहा है। परेशानी में वह है जो सुबह घर से निकलता है और शाम को बापस बेरोजगारी की ही स्थिति में बापस लौटता है। परेशानी में वह है जिसकी बेटी विवाह को बैठी है और उसके पास लाखों रुपये नहीं है दहेज के लिए। परेशानी में वह है जो पानी की कमी से अपने खेतों की फसल को सूखता हुआ देख रहा है। परेशानी उसके पास है जो एक समय के भोजन की व्यवस्था भी अपने बच्चों के लिए नहीं कर सकता है। परेशानी में वह है जो अभी जन्मी ही नहीं और उसको मौत देने की तैयारी होने लगी है।
क्या अब भी आपको लगता है कि ये धनकुबेर और हाथों में हाथ डाले घूमती हमारी युवा पीढ़ी किसी भक्ति-भाव से देवी-देवताओं के दर्शनों के लिए मंदिर आदि में जाते हैं? वर्तमान आधुनिक युग में मंदिर आदि भी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो गये हैं। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि पर्यटन स्थलों का आधुनिक रूप मंदिर हो गये हैं।






04 नवंबर 2009

आस्था के बदले डर का सैलाब??

कल एक काम से अपने मित्र के घर जाना हुआ, रास्ते में एक मंदिर पड़ता है हनुमान जी का। मूर्ति का दक्षिण मुख होने के कारण मंदिर के प्रति लोगों की अपनर श्रृद्धा है। मंगलवार तथा शनिवार को बहुत अधिक भीड़ रहती है।
इसी तरह से भीड़ को भक्तिभाव में लीन 2 तारीख को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर भी देखा। एक दो नहीं पूरे वर्ष में कई अवसर ऐसे आते हैं जब भक्तिभाव पूरे जोरों पर रहता है। देश के मंदिर तथा पवित्र स्थानों पर भयंकर भीड़ जमा होती है।
यह नजारा केवल हिन्दुओं के पर्व, त्यौहारों पर ही देखने को नहीं मिलता है वरन् सभी धर्मों के लोगों के साथ ऐसा है।
यह सब देखकर मन में हमेशा से एक विचार आता रहा है कि ये लोग किस कारण से भगवान की इतनी भक्ति करते दिखते हैं; पूजा? इबादत करने में लगे रहते हैं? क्या किसी बात का डर है? अपने प्रियजनों के बिछोह का डर है? कुछ पाने की लालसा है? क्या है.....?
भगवान जैसे किसी भी अस्तित्व के पीछे यदि इतनी श्रृद्धा है तो फिर उससे डरकर अपराध कम क्यों नहीं करता इंसान? हत्यायें हो ही रहीं हैं! बलात्कार हो ही रहे हैं! कन्याओं की हत्यायें हो ही रहीं हैं! आतंकवाद है ही! लूटमार है ही! शोषण हो ही रहा है! कालाबाजारी चल ही रही है! और तो और अब तो मंदिरों तक से भगवान की मूर्तियों को, जेवरों को चुराया जाने लगा है।
यदि यह सब चल ही रहा है तो इतनी पूजा, आराधना, इबादत किस लिये? तीर्थ, हज किस लिए? कहीं ये आस्था के बदले डर का सैलाब तो नहीं?

23 फ़रवरी 2009

भोले शंकर कराएँगे परीक्षा पास

यह खबर निश्चय ही उन लोगों को अधिक सुकून पहुँचायेगी जो अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर बड़े ही चिन्तित रहते हैं। बच्चों को भी निश्चित ही प्रसन्नता देगी जो पढ़ने के नाम पर कचकते हैं। अब परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने के लिए पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। अब पास होने के लिए भी इतनी उठापटक करने की आवश्यकता भी नहीं है। नही......नहीं किसी तरह की कोई वैज्ञानिक पद्वति का विकास नहीं हुआ है वरन् चमत्कार हमारी पूजा विधि का है। आपको आश्चर्य लग रहा होगा कि पढ़ाई या परीक्षा के लिए भी पूजा? जी हाँ ये सत्य है.....
दरअसल आज महादेव शंकर का दिन ‘महाशिवरात्रि’ है। तमाम सारे पत्र-पत्रिकाएँ और इलेक्ट्रानिक चैनल भगवान शंकर की आराधना का तरीका बता रहे हैं और साथ ही बता रहे हैं कि किस तरह की पूजा विधि किसको लाभ पहुँचायेगी। आज के दौर में मानव अब लगता है भागते-भागते थक गया है इसी कारण वह अपने अलावा किसी दूसरी शक्ति के सहारे भी सफलता प्राप्त करना चाहता है।
हाँ तो बात हो रही थी भगवान शंकर के सहारे से सफलता प्राप्त करने की। अभी तक तो देखने में आता कि ज्यादा आयुवर्ग के लोग जिनके सामने समय व्यतीत करने की समस्या होती थी, अपना अकेलापन दूर करने की समस्या होती थी वे लोग भगवान और पूजा-पाठ में अपने आपको रमा कर समय व्यतीत करने की चेष्टा करते थे। इधर कुछ समय से देखने में आया है कि पूजा-आराधना के प्रति उस युवा वर्ग, विद्यार्थी वर्ग का रुझान बढ़ता जा रहा है जिसे अपने कर्म से अपना भगवान स्वयं बनाना चाहिए। पर नहीं यह वर्ग अपने कर्म से अधिक पूजा-भगवान-देवी-देवताओं के सहारे से सफलता प्राप्त करना चाहता है। अपने कर्म से ज्यादा, अपनी मेहनत से ज्यादा मिट्टी के देवताओं पर भरोसा कर रहा है। (वे लोग क्षमा करेंगे जिनको अपने से ज्यादा देवताओ-देवियों पर भरोसा होता है।)
कुछ इसी तरह का झूठा विश्वास आज के दिन का लाभ उठाकर विद्यार्थियों को दिया जा रहा है। एक समाचार-पत्र में परीक्षा में अच्छे अंक लाने के कुछ भागवानिक उपाय बताये गये हैं। यदि आप भी अपने बच्चों को बिना पढ़ाई के ही अच्छे अंकों में पास होते देखना चाहते हैं तो उस समाचार-पत्र में दिए गये उपायों को जरूर आजमाइयेगा।
उपाय इस तरह से दिये गये हैं-
परीक्षा के इस दौर में छात्रों के लिए महामृत्युंजय मंत्र विशेष फल प्रदान कर सकता है। मंत्र यदि शुद्ध न बोल सकें तो मन ही मन इसका जाप कर लें। कुछ उपाय इस प्रकार हैं-
1. फिजिक्स के छात्र-धतूरा और सात बेल पत्र (बिना कटे हुए) शंकर जी को अर्पित करें।
2. कैमिस्ट्री के छात्र-शहद से भगवान शंकर को जलाभिषेक करें।
3. गणित के विद्यार्थी- पंचाक्षर ऊँ नमः शिवायः की एक या दो करमाला (उंगलियों पर गिनना) करें।
4. कामर्स के विद्यार्थी- गंगाजल से परिपूर्ण लोटे में सवा रुपया, सफेद पुष्प डालकर भगवान शंकर को जलाभिषेक करें।
5. विद्यार्थियों को चाहिए कि वह भगवान शंकर को पंचमेवा या खीर का भोग लगाएं। इससे उनके दोनो कारक सिद्ध होंगे। माँ सरस्वती की आराधना भी और शंकर जी का पूजन भी।
विद्यार्थियों को चाहिए कि वह गंगाजल, दूध, दही, शहद से भगवान शंकर का जलाभिषेक करें औश्र उसके बाद माँ सरस्वती का पूजन करें।
(समाचार-पत्र में इतनी ही विधि दी है जो छात्र-छात्राओं और माता-पिता के हितार्थ एवं जनहित में जारी की जा रही है। कृपया समाचार-पत्र इसे अन्यथा न ले।)
कहिए काम की विधि दी है? अब आप सब अपने-अपने बच्चों के भविष्य को संवारने में जुट जायें। हाँ, एक चेतावनी हमारी तरफ से न...न....न.... चेतावनी नहीं बस थोड़ा सा ध्यान खींचना है कि इस पूरी अनुष्ठानिक विधि में कला वर्ग के विद्यार्थियों के लिए कोई विधि नहीं दी गयी है। अतः कला वर्ग के विद्यार्थी अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे। भगवान शंकर केवल विज्ञान वर्ग और वाणिज्य वर्ग का भला करेंगे। (आखिर ये समय भी इन्हीं दोनो का चल रहा है।) एक बात और कि इस पूरे प्रकरण में पूजा-अर्चना के साथ कहीं भी छात्र-छात्राओं को पढ़ने के लिए नहीं कहा गया है, तो आप लोग भी नहीं कहेगे उनसे पढ़ने को। यदि कहेगे तो अनुष्ठान असफल हो सकता है और फल प्राप्ति में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
तो बोलो हर-हर महादेव.........जय शिव शंकर

01 अक्टूबर 2008

देवी की भक्ति, मन की शक्ति

मन्दिर में भगदड़ मची और कई सारे लोग घायल हो गए कुछ तो इस दुनिया से ही विदा हो गए. अपने पीछे अपने परिवार, मित्रों को रोता-बिलखता छोड़ कर चले गए. दुःख इसका भी है कि इस घटना में मारे और घायलों में बच्चे भी हैं. क्या मंदिरों, देवी-देवताओं में अब शक्ति नहीं रही कि वे अपने भक्तों को बचा सकें या फ़िर भक्तों में पहले जैसी भक्ति नहीं रही कि भगवान् स्वयं आकर उनके कष्ट हर सके? फिलहाल ये प्रश्न तो बड़े ही ज्ञानी महात्मा ही हल कर सकते हैं, हम ठहरे अदना से आम आदमी. अब आम आदमी किसी भी घटना के दुःख से थोड़ी देर ही दुखी होता है और किसी घटना के सुख से थोड़ी ही देर सुखी होता है. कुछ ऐसा ही सबके साथ होता है, हमारे साथ भी हुआ. तो इस बात का जवाब खोजे बिना कि क्या किसके कारण हो रहा है अपने आम अंदाज़ में जो भक्ति देख रहे हैं उसी को बताते हैं.
शारदीय नवरात्रि का पर्व शुरू हो गया है. जगह-जगह देवी दुर्गा की झांकियां लगीं हैं (यहाँ माँ नहीं कहा है क्योंकि अब दुर्गाजी में माँ का रूप न देख कर लोग देवी का रूप देख रहे हैं). झांकियां बड़े ही सुंदर ढंग से सजाईं जा रहीं हैं. यदि गौर किया हो तो विगत चार-पाँच वर्षों से इस तरह के आयोजनों की बाढ़ सी आ गई है. किसी भी शहर के गली मुहल्ले में, चौराहों, नुक्कडों पर झांकियां लगीं दिखाई देंगी. इसमें सबसे ख़ास बात यदि आपने देखी हो तो वो है युवा वर्ग के लोगों का ज्यादा से ज्यादा भाग लेना. कभी-कभी बड़ा आश्चर्य लगता है ये देख कर कि जिस उमर में लड़कों को अपने भविष्य की चिंता होनी चाहिए, अधिक से अधिक समय अपनी पढाई में देना चाहिए वो समय वे झांकियों में भजन गाते दिखते हैं, देवी का श्रृंगार करते दिखते हैं. क्या हो गया है इन युवाओं को? क्या वाकई ये भक्ति है या फ़िर अपनी असफलता से भागने का एक धार्मिक रास्ता?
ये सवाल किसी ज्ञानी-महात्मा के स्तर के नहीं वरन किसी भी आम भारतीय के स्तर के हैं. इसी वजह से हमें भी इनके जवाब आसानी से मिल गए. आज का युवा इन दस दिनों में किसी न किसी रूप में देवियों के रूप से जुडा रहना चाहता है. इस कारण कोई पूजा के लिए, कोई आराधना के लिए आता है. कोई आरती के होने पर वहां होता है तो कोई अर्चना के समय आता है. किसी को श्रद्धा, किसी को आस्था यहाँ लाती है. सबके अपने-अपने तरीके हैं, सबकी अपनी-अपनी भक्ति है, सबकी अपनी-अपनी देवी है। अब इस तरह की भक्ति, इस तरह के भक्त के लिए देवी या देवता क्यों आने लगे?
(जो अपनी भक्ति, अपनी पूजा-आराधना में लगे हैं लगे रहें, किसी को व्यवधान पहुँचाने का हमारा इरादा नहीं है. जय माँ दुर्गा या जय देवी?)