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16 मई 2025

अनावश्यक तुलनात्मक विवेचन

ऐसा माना जा सकता है कि सभी को ये बात मालूम होगी कि तुलनात्मक अध्ययन उन्हीं दो वस्तुओं, व्यक्तियों, स्थितियों के मध्य किया जा सकता है, जहाँ उनके चर एकसमान सम्भावना रखते हों.


सीजफायर के बाद कांग्रेसी आईटी सेल से एकदम इंदिरा गांधी बाहर निकल आईं और अनचाहे ही समाज में एक तुलनात्मक विवेचन किया जाने लगा. तुलना होनी भी चाहिए, आलोचना होनी भी चाहिए मगर पूर्वाग्रह से रहित. इंदिरा गांधी के सन्दर्भ में तत्कालीन स्थितियों को ध्यान रखने के साथ-साथ वर्तमान स्थितियों को भी ध्यान रखना आवश्यक है. प्रत्येक कालखंड के, समय के अपने-अपने सत्य होते हैं जिसे उसी समय के अनुरूप समझा जा सकता है.


फिलहाल देश का एक जवान पाकिस्तानी कैद से रिहा होकर वापस आ चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा विगत वर्षों में, आयरन सत्ता में, मौनी-रिमोट सरकार में ऐसा क्यों नहीं हो सका? आयरन की मात्रा और वजन बताने वाले भी इस पर विचार करेंगे तो और ज्यादा सटीक निष्कर्ष मिल सकते हैं.

 

25 जून 2024

आपातकाल का सच और वर्तमान दौर

भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है. रेडियो पर लगभग आधी सदी पूर्व गूँजी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इस आवाज़ ने देश में हलचल मचा दी थी. तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने सरकार की सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत देश में आपातकाल घोषणा किया था. 25 और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करने के साथ ही यह लागू हो गया था. 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक देश में 21 महीने तक आपातकाल लागू रहा. इस कदम को आज भी लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जाता है.

 

आपातकाल की व्यवस्था किसी तरह की असंवैधानिक व्यवस्था नहीं है. देश के संविधान में ही आपातकाल लागू किये जाने की व्यवस्था है. संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार है. आपातकाल में नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं. ऐसी स्थिति उस समय व्यवहार में लाई जाती है जबकि सम्पूर्ण देश अथवा किसी राज्य पर अकाल, बाहरी देशों के आक्रमण, आंतरिक प्रशासनिक अव्यवस्था अथवा अस्थिरता आदि जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाए. इस तरह की विषम स्थिति में समस्त राजनैतिक और प्रशासनिक  शक्तियाँ राष्ट्रपति के हाथों में चली जाती हैं. 1975 के पूर्व वर्ष 1962 तथा वर्ष 1971 में राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया था.

 



देश में पहली बार आपातकाल 26 अक्टूबर 1962 से 10 जनवरी 1968 के बीच लगा जबकि उस समय भारत और चीन के बीच युद्ध चल रहा था. दूसरी बार 3 से 17 दिसंबर 1971 के बीच आपातकाल लगाये जाने का कारण भारत-पाकिस्तान युद्ध था. दोनों स्थितियों में देश की सुरक्षा को खतरा देखते हुए ऐसी घोषणा की गई थी. इन दो वास्तविक विषम परिस्थितियों के सापेक्ष वर्ष 1975 की स्थितियों को देखा जाये तो आपातकाल लागू किये जाने का तार्किक आधार नजर नहीं आता है. बावजूद इसके आपातकाल लागू किया गया. अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ-साथ नागरिकों के जीवन का अधिकार भी छीन लिया गया था. 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ. प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई. प्रत्येक मीडिया सेंटर पर सेंसर अधिकारी नियुक्त कर दिया गया. उसकी अनुमति के बाद ही समाचार का प्रकाशन हो रहा था. सरकार विरोधी समाचार छापने पर गिरफ्तारी हो रही थी.

 

दरअसल आपातकाल लगाये जाने के पीछे किसी बाहरी शक्ति से खतरा होने से ज्यादा इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता जाने का खतरा दिखाई देने लगा था. 1971 में तत्कालीन भारत-पाकिस्तान युद्ध में जबरदस्त विजय और बांग्लादेश निर्माण के बाद से इंदिरा गांधी की लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. इसी के चलते उन्होंने 1971 का लोकसभा चुनाव भी प्रचंड बहुमत से जीतकर विपक्ष का लगभग सफाया कर दिया था. दरअसल 1971 में बांग्लादेश बन जाने से भले ही इंदिरा गांधी को लोकप्रियता मिली मगर उसके साथ बांगलादेशी शरणार्थियों के आने से देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा. गुजरात और बिहार में इस नकारात्मकता ने आन्दोलन का रूप ले लिया. इन दोनों राज्यों से विद्यार्थियों की जबरदस्त एकजुटता को आन्दोलन की शक्ल में बदलने का काम किया बिहार के जयप्रकाश नारायण ने. उनके नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति का नारा देते हुए आन्दोलन तेज होने लगा. इसके साथ ही इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत में अपनी याचिका में आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है. उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर 12 जून 1975 को फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द करते हुए अगले छह साल तक चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध लगा दिया. जगह-जगह उनके इस्तीफे की माँग उठने लगी. इसी से आक्रोशित होकर आपातकाल जैसा कदम उठाया गया.  

 

विगत कुछ वर्षों से विपक्ष द्वारा लगातार प्रचार किया जा रहा है कि वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा आपातकाल जैसी स्थितियाँ पैदा कर दी गई हैं. अभी हाल में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों में संविधान बदल देने, आरक्षण समाप्त कर देने, भविष्य में चुनाव न होने देने जैसा दुष्प्रचार किया गया. यहाँ विशेष बात यह है कि 1975 में आपातकाल की नींव रखने वाला दल आज विपक्ष में है और आपातकाल के ज़ुल्मों को सहने वाले सरकार में हैं. ऐसे में मीडिया और सोशल मीडिया के पर्याप्त स्वतंत्र होने की स्थिति में किसी भी प्रचार-दुष्प्रचार का आकलन राष्ट्रीय हितों को देखते हुए किया जाना चाहिए. वर्तमान पीढ़ी के बहुसंख्यक नागरिकों ने आपातकाल में प्रशासन, पुलिस की ज्यादतियों को पढ़ ही रखा है, इसके उलट बड़ी संख्या में ऐसे नागरिक भी हैं जिन्होंने आपातकाल की क्रूरता को न केवल देखा है बल्कि सहा भी है. ऐसे में उन लोगों, भले ही वे राजनीति में नहीं हैं, का भी दायित्व बनता है कि वर्तमान पीढ़ी को सत्य से परिचित करवाते रहें. आपातकाल के दौर में भुक्तभोगी रही मीडिया को भी यथोचित स्थितियों के सच के साथ सामने आने की आवश्यकता है. यदि लगता है कि वर्तमान केन्द्र सरकार के कार्य, नीतियाँ इस तरह की हैं जो घोषित अथवा अघोषित आपातकाल की पीठिका निर्मित करती हैं, तो उनका मुखर विरोध किया जाना चाहिए. जिस तरह से विगत वर्षों में संसद में पक्ष और विपक्ष की भूमिकाएँ देखने को मिली हैं वे प्रशंसनीय नहीं कही जा सकती हैं. देश के धन और समय के अपव्यय के बीच समाप्त होते निष्फल संसद सत्रों के बीच घोषित अथवा अघोषित आपातकाल देश को नुकसान ही पहुँचायेगा.   


17 दिसंबर 2018

पाकिस्तान पर विजय का दिवस

भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों की जब भी चर्चा होती है तो प्रत्येक देशवासी के मन में यही भावना रहती है कि देश पाकिस्तान से सदैव आगे ही आगे रहे. खेल के मैदान से लेकर राजनीति के अखाड़े तक कहीं भी पाकिस्तान को आगे बढ़ते देख पाना देशवासियों के लिए संभव नहीं होता है. एकाधिक अवसरों पर देखा गया है जबकि पाकिस्तान पर विजय का उल्लास कई-कई दिनों तक बना रहा. जीत की ख़ुशी में जश्न लम्बे समय तक चलते रहे. जब खेल के मैदान की यह स्थिति होती है तो सोचा जा सकता है हमारे सैनिकों, हमारी सेना द्वारा उसको युद्ध में हराये जाने का जश्न कितना-कितना लम्बा और गौरवान्वित करने वाला रहा होगा. सन 1971 के युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर जीत का जश्न आज भी पूरा देश विजय दिवस के रूप में मनाता है. विजय दिवस प्रति वर्ष 16 दिसम्बर को मनाया जाता है. इस युद्ध का अंत पाकिस्तानी सेना के 93,000 सैनिकों के आत्मसमर्पण के द्वारा हुआ था. इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हुआ जो आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. इस युद्ध में लगभग 3900 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे. 


इस युद्ध की पृष्ठजभूमि वर्ष 1971 के शुरू होते ही बनने लगी थी. पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ां ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान को सैनिक ताकत कब्जे में कर लिया. शेख़ मुजीब को गिरफ़्तार कर लिया गया. वहाँ पर सैनिकों के अत्याचारों के चलते वहां से शरणार्थी लगातार भारत आने लगे. ऐसा होने पर वैश्विक समुदाय की तरफ से भारत पर यह दबाव पड़ने लगा कि वह वहां पर सेना के जरिए हस्तक्षेप करे. इस सम्बन्ध में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने थलसेनाध्यक्ष जनरल मानेक शॉ से विचार-विमर्श किया. तब की प्राकृतिक स्थिति के चलते भारतीय सेना लगातार युद्ध करने में सक्षम नहीं समझ आ रही थी. ऐसे में मानेक शॉ ने इंदिरा गांधी से स्पष्ट कहा कि वे पूरी तैयारी के साथ ही युद्ध के मैदान में उतरना चाहते हैं. असल में इंदिरा गाँधी उसी समय अप्रैल में ही हमला करना चाहती थीं.

दिसंबर 1971 में एक शाम पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने भारतीय वायुसीमा को पार करके पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए. इंदिरा गांधी ने मंत्रिमंडल की आपात बैठक की और भारतीय सेना हमले के लिए तैयार हो गई. युद्ध शुरू होने के बाद 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं. उसी दौरान ही भारतीय सेना के मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी. भारतीय सेना लगातार आगे बढ़ती जा रही थी. पाकिस्तानी जनरल जैकब की हालत बिगड़ रही थी. भारतीय सेना ने युद्ध पर पूरी तरह से अपनी पकड़ बना ली थी. 16 दिसंबर की सुबह मानेकशॉ का संदेश जनरल जैकब को मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुंचें. शाम के साढ़े चार बजे जनरल अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे. पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी बलों के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल ए०ए०के० नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. दोनों ने आत्मसमर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए. नियाज़ी ने अपनी वर्दी से अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया. उस समय नियाज़ी की आंखों में आंसू आ गए थे. सम्पूर्ण घटनाक्रम वहाँ के स्थानीय नागरिकों के संज्ञान में भी था. वे लोग नियाजी की हत्या़ पर उतारू थे. भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी को सुरक्षित रूप से बाहर निकाला. जिसके बाद 17 दिसम्बर को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया.

जब पाकिस्तान पर विजय की खबर जनरल मानेक शॉ ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को दी तो उनकी घोषणा के बाद पूरा देश जश्नज में डूब गया. इस ऐतिहासिक जीत को खुशी आज भी हर देशवासी के मन को उमंग से भर देती है.

25 जून 2018

आपातकाल : भारतीय इतिहास का काला अध्याय


25 जून, भारतीय सन्दर्भों में, भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में यह मात्र एक तारीख भर नहीं है. इस तारीख का अपना ही एक इतिहास है, जिसे आज काले अध्याय के रूप में देखा-जाना जाता है. 25 जून 1975 की रात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की नींव रखी. अगले दिन सुबह-सुबह रेडियो के द्वारा देश में आपातकाल की घोषणा हो गई. सुबह छह बजे इंदिरा गाँधी ने सभी मंत्रियों को बैठक के लिए बुलाया. बैठक के तुरंत बाद ही इंदिरा गाँधी ने रेडियो पर अपने भाषण के द्वारा आपातकाल लगाये जाने की जानकारी देश को दी. उस समय फ़ख़रुद्दीन अली अहमद देश के राष्‍ट्रपति थे. कैबिनेट की बैठक में आपातकाल के प्रस्‍ताव को स्वीकृति मिल चुकी थी. उस पर अंतिम मुहर राष्‍ट्रपति को लगानी थी. इंदिरा और सिद्धार्थ शंकर ने राष्‍ट्रपति भवन पहुँच राष्‍ट्रपति को देश के हालात के बारे में अवगत कराया और आपातकाल की उपयोगिता बताई. इसके बाद राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी. यह अपने आपमें विचित्र स्थिति है कि आपातकाल की घोषणा रेडियो पर पहले कर दी गई बाद में उस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे. आपातकाल के बाद देश भर में गिरफ़्तारियों का दौर शुरू हुआ. खास बात यह रही कि महज तीन नेताओं की गिरफ़्तारी की इजाजत नहीं दी गई थी. ये तीन नेता तमिलनाडु के कामराज, बिहार के जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एसएम जोशी थे.


आपातकाल लगाये जाने के पीछे उच्च न्यायालय, इलाहाबाद का एक आदेश था. 12 जून 1975 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया. उन पर वोटरों को घूस देना, सरकारी मशनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसे चौदह आरोप लगे थे. यह मामला राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हारने के बाद दर्ज कराया था. इस फैसले के बाद इंदिरा गाँधी ने इस्तीफा देने से इन्कार करते हुए फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी. उच्चतम न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के इस आदेश को बरकरार रखा. यह आदेश 24 जून 1975 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश कृष्ण अय्यर ने दिया. इसके बाद इंदिरा गाँधी ने आपातकाल का सहारा लेकर राजनैतिक विरोधियों को नियंत्रण में लेने का प्रयास किया. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल था. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे. नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई. इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया. प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया था. उनके बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया. जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि कहा था. 


आपातकाल लागू करने के बाद इंदिरा गाँधी के राजनैतिक विरोधी और अधिक सक्रिय हो गए. विरोध की लगातार बढ़ती तीव्रता के कारण लगभग दो साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी. चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ. इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं. संसद में कांग्रेस 153 पर सिमट गई और केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ. जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली. नई सरकार ने आपातकाल के दौरान लिए गए फ़ैसलों की जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया. अपने अंदरूनी मतभेदों के कारण 1979 में जनता सरकार गिर गई. उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई लेकिन यह सरकार सिर्फ़ पाँच महीने तक ही चल सकी. इस सरकार में चौधरी चरण सिंह एक दिन के लिए भी संसद न जा सके. उनके नाम कभी संसद नहीं जाने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड दर्ज हो गया.

वैसे देखा जाये तो देश में आंतरिक अशांति का खतरा होने पर, किसी बाहरी देश के आक्रमण होने पर अथवा वित्तीय संकट की स्थिति दिखाई देने पर आपातकाल लगाया जा सकता है. देश ने 1962 में चीन के साथ एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान आपातकाल का सहा था. 25 जून 1975 की मध्यरात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच का आपातकाल विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था, जिसे आंतरिक अशांति के नाम पर अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था.