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21 अगस्त 2026

आरक्षण पर हो पुनर्विचार

इन दिनों आरक्षण एक ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा हुआ है. विगत कई दशकों से यह एक ऐसा विषय बना हुआ है जिस पर बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर लगातार बहस होती रही है. एक सवाल बार-बार उठता रहा है कि क्या आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था अपने मूल उद्देश्यों को पूरा करने में सफल हो सकी है? आरक्षण की विगत यात्रा पर नजर डालें तो स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि इसके कारण अब समाज में असंतोष और विभेद पनपने लगा है. स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारतीय समाज एक तरह की विषमता और भेदभाव में जकड़ा हुआ था. हाशिये पर खड़े वर्गों को समानता दिलाने के लिए, उनको मुख्यधारा में जोड़ने के लिए संविधान निर्माताओं ने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर समावेशी प्रावधान की कल्पना की. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4) और 16(4ए) में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण की व्यवस्था लागू की. सामाजिक विभेद को दूर करने के साथ-साथ आर्थिक विषमता को दूर करने के उद्देश्य से 103वाँ संविधान संशोधन (2019) लागू करके आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण का नया प्रावधान जोड़ा गया.

 



कालांतर में आरक्षण सम्बन्धी स्थिति में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग को भी शामिल किया गया. आरक्षण सम्बन्धी व्यवस्था को लेकर, इसके क्रियान्वयन को लेकर समाज में असंतोष भी उपजता रहा. ऐसे में न्यायालयों द्वारा भी समय-समय पर इसकी समीक्षा की गई. इंद्र साहनी बनाम भारत संघ (1992) के ऐतिहासिक निर्णय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक तय की तथा क्रीमीलेयर की अवधारणा को जन्म दिया. इसके अलावा एम. नागराज (2006)  मामले में स्पष्ट किया गया कि प्रमोशन में आरक्षण देते समय प्रशासनिक दक्षता को बनाए रखना आवश्यक है. इसके बावजूद अनेक विसंगतियों ने इस व्यवस्था को आलोचनाओं के घेरे में खड़ा कर दिया है. प्रवेश परीक्षाओं, नौकरियों में सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों को अत्यधिक अंक लाने के बावजूद बाहर होना पड़ता है जबकि कम अथवा ऋणात्मक अंक पाने के बाद भी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी चयनित हो जाते हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रीमीलेयर सीमा निर्धारित किये जाने के बाद भी सम्पन्न परिवारों की कई पीढ़ियाँ ही लाभान्वित हो रही हैं. एससी/एसटी वर्ग में क्रीमीलेयर व्यवस्था लागू न होने के कारण इस वर्ग के उच्च पदस्थ परिवार ही आरक्षण का दोहन कर रहे हैं. ऐसी स्थिति के कारण यह व्यवस्था न्यायसंगत प्रतीत नहीं हो रही. आरक्षण का जो उद्देश्य निर्धारित किया गया था वह समस्त जरूरतमंदों तक पहुँचने के स्थान पर सीमित परिवारों तक सिमट गया है. ऐसी अनेकानेक विसंगतियों के कारण आरक्षण की व्यापक और निष्पक्ष समीक्षा होने की माँग उठने लगी है. आलोचकों का सुझाव है कि जाति आधारित आरक्षण को धीरे-धीरे समाप्त करके उसके स्थान पर आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू किया जाये.

 

यदि सैद्धांतिक अथवा व्यावहारिक रूप से केन्द्र सरकार कभी आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह हटाने का विचार करती है तो यह राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी दृष्टि में एक अभूतपूर्व चुनौती होगी. इसके लिए सरकार को अनेक स्तरों पर चरणबद्ध कानूनी, विधायी कदम उठाने होंगे. सरकार को सबसे पहले संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन विधेयक पारित कराना अनिवार्य होगा. यहाँ ध्यान रखना होगा कि संविधान के अनुच्छेद 368(2) के अनुसार यदि कोई ऐसा संशोधन किया जाता है जो देश के संघीय स्वरूप को प्रभावित करता है तो उसे देश की कम से कम आधी विधानसभाओं से साधारण बहुमत द्वारा अनुमोदित कराना पड़ता है. चूँकि राजनीतिक रूप से देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों, विभिन्न विचारधाराओं की सरकारें कार्य करती हैं इसलिए राज्य स्तर पर इस प्रकार की सहमति प्राप्त करना केन्द्र सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी.

 

संविधान संशोधन सम्बन्धी कदम के साथ-साथ न्यायिक स्तर पर भी सरकार को जवाबदेह होना पड़ेगा. देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनिश्चित किया जाता है कि संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय का सिद्धांत आहत न हो. यदि कोई कानून अथवा संशोधन समानता के मूल अधिकार की अवधारणा को पूरी तरह समाप्त करने का प्रयास करता है तो उसे न्यायिक समीक्षा के द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है. ऐसे में केन्द्र सरकार को न्यायालय के समक्ष यह सिद्ध करना होगा कि यह कदम देश के हित में किस प्रकार आवश्यक है और इसके विकल्प के रूप में अन्य कौन सी नीतियाँ क्रियान्वित की जाएँगी. इन औपचारिक और विधायी कदमों के अलावा सरकार को देश की सामाजिक, राजनीतिक स्थिति पर भी विचार करना होगा. आरक्षण अब सामाजिक स्तर सुधारने, वंचित वर्गों को लाभान्वित करने की दृष्टि से कम, राजनीतिक लाभ के लिए ज्यादा प्रभावी माना जाने लगा है. ऐसे में आरक्षण हटाने मात्र के विचार से ही सामाजिक असंतोष, हिंसक प्रदर्शन, राजनीतिक अस्थिरता देश को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है, देश में गम्भीर आंतरिक अशांति फैल सकती है. जातिगत आरक्षण को हटाना, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करना केन्द्र सरकार और नीति निर्माताओं के लिए संवेदनशील संतुलन साधने जैसी चुनौती है.

 

विगत वर्षों की लगभग असफल आरक्षण व्यवस्था को देखने के बाद सामान्य वर्ग के, प्रतिभावान युवाओं की आकांक्षाओं, वैश्विक मानकों, योग्यता आधारित व्यवस्था की माँग को दरकिनार नहीं किया जा सकता वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय के संवैधानिक संकल्प को भी नहीं छोड़ा जा सकता है. ऐसे में आरक्षण व्यवस्था को गतिशील और पारदर्शी बनाया जाए, क्रीमीलेयर नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए ताकि वास्तविक जरूरतमंदों को इसका लाभ मिले. शिक्षा, नौकरी के लिए आरक्षण के साथ-साथ प्रतिभाओं को भी अवसर दिया जाये. नीति-नियंताओं को, राजनीतिज्ञों को ध्यान रखना होगा कि अब समय आ गया है कि राजनीतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर ऐसी राष्ट्रीय नीति पर विचार किया जाए जो योग्यता का सम्मान करे और वंचितों को संबल प्रदान करे.


03 अगस्त 2018

सवर्ण राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं

उच्चतम न्यायालय द्वारा एससी-एसटी एक्ट के सम्बन्ध में दिए गए निर्णय के खिलाफ जाते हुए सरकार संशोधन विधेयक वर्तमान सत्र में ला रही है. इसकी तैयारी के बीच पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा दे दिया गया है. दलितों-पिछड़ों के लिए उठाये जाते इन कदमों के बीच आरक्षण सम्बन्धी तमाम सारे और भी कदम इस दौरान उठाये जाते रहे हैं. शिक्षा, नौकरी के साथ-साथ पदोन्नति में भी आरक्षण यथावत रखा गया है. केंद्र सरकार के दलितों-पिछड़ों को लेकर किये जा रहे तमाम सारे कार्यों में से शायद ही किसी का इतना विरोध हुआ जो जितना कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर हो रहा है. यह स्थिति तब है जबकि इस एक्ट में कोई आमूल-चूल परिवर्तन करने के बजाय उच्चतम न्यायालय द्वारा महज इतनी व्यवस्था की गई थी कि आरोपी सवर्ण की गिरफ़्तारी बिना जाँच के नहीं होगी. इस आदेश को मोदी सरकार की मंशा बताते हुए विपक्षियों ने उपद्रवी माहौल बना डाला. इसका नकारात्मक असर यह हुआ कि केंद्र सरकार संशोधन बिल लाने को तैयार हो गई.


न्यायालय के आदेश के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार का इस तरह से संशोधन विधेयक लाने के मूल में विशुद्ध राजनीति है. यह कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं है वरन केंद्र सरकार के कदमों से बराबर सिद्ध होता रहा है कि वह किसी भी रूप में सवर्णों को मददकारी हो या न हो मगर दलितों-पिछड़ों के लिए मददगार अवश्य रहेगी. देश के सवर्णों को सरकार के इस कदम से आपत्ति या निराशा जैसा कुछ नहीं लगना चाहिए क्योंकि सिर्फ यही सरकार नहीं वरन देश की सभी सरकारों का एकमात्र उद्देश्य ऐसे कदमों से दलितों-पिछड़ों का वोट प्राप्त करना है. यदि गंभीरता से देखा जाये तो दलित-पिछड़े किसी भी राजनैतिक दल के लिए आज मुख्यधारा के लोग हैं. सवर्ण अपने आपको किसी भी रूप में मुख्यधारा में न माने, राजनीति के लिए खुद को अहम् न माने. आज न सरकारों को और न ही विपक्ष को सवर्णों की, उनके वोट की आवश्यकता है. यदि सामाजिक प्रस्थिति के रूप में इस बिंदु पर निगाह डाली जाये तो नब्बे के दशक से राजनीति की मुख्यधारा से सवर्णों का पतन किया जाना आरम्भ हो गया था. हिन्दू धर्म की छुआछूत की भावना को, विभेद की भावना को समस्त राजनैतिक दलों द्वारा बुरी तरह से अपने पक्ष में दोहन किया गया. यही कारण है कि जाति का विरोध करने वाले इन राजनैतिक दलों द्वारा जाति-विहीन समाज की बात भले ही की जाती हो मगर समाज से जाति दूर करने की बात नहीं की जाती है. इसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि राजनीति में जातिगत आधार पर न केवल राजनैतिक दलों का गठन हुआ वरन वे सत्ता में भी काबिज होने लगे.

यहाँ आकर सवर्णों को समझना होगा कि वे अब राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं हैं. अर्थशास्त्र का माँग और आपूर्ति का नियम सिर्फ अर्थशास्त्र में ही लागू नहीं होता बल्कि समाज के प्रत्येक हिस्से में लागू होता है. आज देश की राजनीति की माँग दलित हैं, पिछड़े हैं तो सत्ता पक्ष द्वारा, विपक्ष द्वारा, राजनैतिक दलों द्वारा उनकी माँग को स्वीकार किया जा रहा है. सवर्णों को यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि वे किसी भी रूप में प्रभावकारी मतदाता हैं. कायदे से देखा जाये तो सवर्ण आज भी निपट कबीलों में बंटा हुआ है. अतीत की छोटी-छोटी रियासतों की तरह वह आज भी छोटे-छोटे से वर्गों में विभक्त है. यही कारण है कि उसके पक्ष में एक आदेश के साथ किसी भी राजनैतिक दल के सवर्ण जनप्रतिनिधि भी आकर नहीं खड़े हुए. देश में वर्तमान में हो रही राजनीति की चाल को समझने की आवश्यकता है. यहाँ सभी राजनैतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य सत्ता की प्राप्ति होता है, वह कैसे हो यह उसका विचार-बिंदु होता है. उन्हें न सवर्णों के हितार्थ कोई कदम उठाना है और न ही दलितों-पिछड़ों के हितार्थ. सत्ता की खातिर उन्हें कब कौन सा कदम उठाना पड़ सकता है, ये उन्हें खुद नहीं मालूम होता है.