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29 मई 2025

चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का उत्साह??

22 अप्रैल 2025 को प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया की सबसे बड़ी चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है. भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी इस बड़ी छलांग को लगाते हुए जापान को पीछे छोड़ दिया है. आईएमएफ की रिपोर्ट के बाद इसकी पुष्टि करते हुए नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रमण्यम ने बताया कि देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वर्तमान में चार ट्रिलियन डॉलर से अधिक का हो गया है. इसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था अब विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो गई ही. आईएमएफ की रिपोर्ट की पुष्टि करने के साथ-साथ उन्होंने बताया कि यदि देश की नीतियाँ ऐसे ही काम करती रहीं तो आने वाले कुछ वर्षों में हमारा देश जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है.

 



जीडीपी के आधार पर वर्ष 2023 के आँकड़ों में विश्व की प्रथम दस अर्थव्यवस्थाओं में देश की अर्थव्यवस्था पाँचवें स्थान पर थी. तब हमारे देश की अर्थव्यवस्था 3.56 ट्रिलियन डॉलर थी. तत्कालीन आँकड़ों के अनुसार भारत से आगे विश्व अर्थव्यवस्थाओं में चार देश अमेरिका (27.72 ट्रिलियन डॉलर), चीन (17.79 ट्रिलियन डॉलर), जर्मनी (4.52 ट्रिलियन डॉलर) और जापान (4.20 ट्रिलियन डॉलर) ही थे. इस वर्ष जारी की गई रिपोर्ट में आईएमएफ का कहना यह भी है कि वर्ष 2025 में भारत की विकास दर 6.2 प्रतिशत और वर्ष 2026 में 6.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक है. इन आँकड़ों का आईएमएफ की तरफ से जारी होने के कारण भी देश के आर्थिक क्षेत्र में तथा सत्ता पक्ष में उत्साह दिखाई दे रहा है.

 

वैश्विक स्तर पर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का प्रभाव न केवल देश की आंतरिक स्थिति पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी दिखाई देगा. ऐसी स्थिति के चलते अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक मंचों जैसे जी-20, विश्व बैंक, आईएमएफ आदि में भारतीय छवि का सकारात्मक स्वरूप नजर आएगा. इसके चलते विदेशी निवेश बढ़ने की भी सम्भावना है. विश्व स्तर की बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ वैसे भी भारतीय बाजार में अपने उत्पादों के लिए ग्राहकों को लगातार तलाशती रही हैं. अब उनको भारत में एक आकर्षक बाजार नजर आ रहा होगा. देखा जाये तो भारत दक्षिण एशिया में लम्बे समय से नेतृत्वकर्ता की भूमिका में रहा है और विगत कुछ वर्षों में उसके क्षेत्र और विश्वास में भी वृद्धि हुई है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेकानेक मंचों पर, महाशक्ति समझे जाने वाले देशों में भारत की सकारात्मक एवं सशक्त छवि बनी है. देश की वर्तमान आर्थिक उपलब्धि के बाद उसके आर्थिक नेतृत्वकर्ता के रूप में भी आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता दिखता है. भारतीय अर्थव्यवस्था के चौथे स्थान पर आने के अपने-अपने सन्दर्भ तलाशे जा रहे हैं. इनको तलाशा भी जाना चाहिए, आखिर आम जनमानस को भी इसके सन्दर्भों से परिचित होने की आवश्यकता है. एक तरफ आर्थिक क्षेत्र में, सत्ता के गलियारों में उत्साह दिख रहा है, दूसरी तरफ आम नागरिक अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य, मँहगाई, बेरोजगारी, गरीबी आदि से जूझ रहा है.

 

देश के चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाने के बाद भी क्या भारतीय समाज की, सामान्य जन-जीवन की, भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविकता से मुँह मोड़ा जा सकता है? अर्थव्यवस्था सम्बन्धी आँकड़ों को सामने लाने का कार्य मुख्य रूप से जीडीपी को आधार बनाकर किया जाता है. जीवन-शैली और आर्थिकी के सन्दर्भ में जीडीपी और जन-जीवन दो अलग-अलग स्थितियाँ हैं, दोनों के अलग-अलग स्वरूप हैं. जीडीपी से देश की अर्थव्यवस्था का आकार तो मापा जा सकता है किन्तु उसके द्वारा सामान्य जनजीवन के बारे में, आय और संपत्ति के वितरण के बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. इसे इस तरह समझा जा सकता है कि चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाने के बाद भी प्रति व्यक्ति आय के सन्दर्भ में देश वैश्विक स्तर पर 144वें स्थान पर आता है. यह विडम्बनापूर्ण ही है कि अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में भारत से आगे मात्र तीन देश हैं लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में 143 देश हमसे आगे हैं. यदि जापान के सन्दर्भ में ही आँकड़ों को देखें तो भारत में प्रति व्यक्ति आय तीन हजार डॉलर से कम है जबकि जापान की प्रति व्यक्ति आय 34 हजार डॉलर है. जीडीपी के सन्दर्भ में हम भले ही जापान से आगे निकल आये हों किन्तु प्रति व्यक्ति आय, जीवन प्रत्याशा, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, तकनीक आदि जैसे क्षेत्रों में जापान हमसे बहुत आगे है.

 

किसी भी देश के विकास में शिक्षा की गुणवता, नागरिकों का स्वास्थ्य, उनकी जीवन प्रत्याशा, जीवन-शैली, प्रति व्यक्ति आय आदि का बहुत बड़ा योगदान होता है. इनका सकारात्मक रूप और इसका स्तर किसी भी देश के सामाजिक जीवन में नवाचार को दर्शाता है. अपने देश की साक्षरता दर भले ही 75 प्रतिशत से अधिक की है लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास में कमी बनी हुई है. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति अत्यंत जटिल है. इसी तरह स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी सुखद नहीं कही जा सकती है. आय और सम्पत्ति के वितरण में भी व्यापक असमानता दिखाई देती है. देश के संसाधनों की बहुलता मुट्ठी भर लोगों के पास है और अधिसंख्यक नागरिकों के पास अत्यल्प संसाधन हैं. ऐसे में आँकड़ों के सन्दर्भ में, जीडीपी के आधार पर, वैश्विक स्थिति में वृद्धि होने को लेकर भले ही उत्साह दिखा लिया जाये मगर सामाजिक स्थिति के सन्दर्भ में, आम जनमानस के आधार पर आईएमएफ की इस रिपोर्ट पर अत्यधिक उत्साहित होने की, गर्वोन्नत होने की आवश्यकता नहीं है.

 

31 अगस्त 2022

मँहगाई को भी पचा लेंगे

आजकल सुबह आँख खुलने से लेकर देर आँख बंद होने तक चारों तरफ हाय-हाय सुनाई देती है. आपको भी सुनाई देती होगी ये हाय-हाय? अब आपको लगेगा कि आखिर ये हाय-हाय है क्या, किसकी? ये जो है हाय! ये एक तरह की आह है, जो एकमात्र हमारी नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो बाजार के कुअवसरों से दो-चार हो रहा है. बाजार के कुअवसर ऐसे हैं कि न कहते बनता है और न ही सुनते. बताने का तो कोई अर्थ ही नहीं. इधर कोरोना के कारण ध्वस्त जैसी हो चुकी अर्थव्यवस्था का नाम ले-लेकर आये दिन बाजार का नजारा ही बदल दिया जाता है. आपको नहीं लगता कि बाजार का नजारा बदलता रहता है.

 

बाजार का नजारा अलग है और इस नजारे के बीच सामानों के दामों का आसमान पर चढ़े होना सबको दिखाई दे रहा है. सबको दिखाई देने वाला ये नजारा बस उनको नहीं दिखाई दे रहा, जिनको असल में दिखना चाहिए था. इधर सामानों के मूल्य दो-चार दिन ही स्थिर जैसे दिखाई देते हैं, वैसे ही कोई न कोई टैक्स उसके ऊपर लादकर उसके मूल्य में गति भर दी जाती है. यदि कोई टैक्स दिखाई नहीं पड़ता है तो जीएसटी है न. अब तो इसे एक-एक सामान पर छाँट-छाँट कर लगाया जा रहा है. ऐसा करने के पीछे मंशा मँहगाई लाना नहीं बल्कि वस्तुओं के मूल्यों को गति प्रदान करनी है. अरे! जब मूल्य में गति होगी तो अर्थव्यवस्था को स्वतः ही गति मिल सकेगी.

 



ऐसा नहीं है कि ऊपरी स्तर से मँहगाई कम करने के प्रयास नहीं किये गए. प्रयास किये गए मगर कहाँ और कैसे किये गए ये दिखाई नहीं दिए. आपने फिर वही बात कर दी. अरे आपको जीएसटी दिखती है, नहीं ना? बस ऐसे ही प्रयास हैं जो दिख नहीं रहे हैं. और हाँ, कोरोना के कारण देश भर में बाँटी जा रही रेवड़ियों की व्यवस्था भी उन्हीं के द्वारा की जानी है जो इन रेवड़ियों का स्वाद नहीं चख रहे हैं. अब तो आपको गर्व होना चाहिए मँहगे होते जा रहे सामानों को, वस्तुओं को खरीदने का. आखिर आप ही तो हैं जिन्होंने लॉकडाउन के बाद बहती धार से अर्थव्यवस्था को धार दी थी, अब आसमान की तरफ उड़ान भरती कीमतों के सहयोगी बनकर अर्थव्यवस्था को तो गति दे ही रहे हैं, रेवड़ियों को भी स्वाद-युक्त बना रहे हैं.

 

बढ़ते जा रहे दामों के कारण स्थिति ये बनी है कि बेचारे सामान दुकान में ग्राहकों के इंतजार में सजे-सजे सूख रहे हैं. वस्तुओं ने जीएसटी का आभूषण पहन कर खुद की कीमत बढ़ा ली है, अब वे अपनी बढ़ी कीमत से कोई समझौता करने को तैयार नहीं. इस मंहगाई के दौर में सामानों से पटे बाजार और दामों के ऊपर आसमान में जा बसने पर ऐसा लग रहा है जैसे किसी गठबन्धन सरकार के घटक तत्वों में कहा-सुनी हो गई हो. सामान बेचारे अपने आपको बिकवाना चाहते हैं पर कीमत है कि उनका साथ न देकर उन्हें अनबिका कर दे रही है. उस पर भी उन कीमतों ने विपक्षी जीएसटी से हाथ मिला लिया है. अब ऐसी हालत में सबसे ज्यादा मुश्किल में बेचारा उपभोक्ता है, ग्राहक है. इसमें भी वो ग्राहक ज्यादा कष्ट का अनुभव कर रहा है जो मँहगी, लक्जरी ज़िन्दगी को बस फिल्मों में देखता आया है.

 

ऐसे ही लक्जरी उपभोक्ताओं की तरह के हमारे सरकारी महानुभाव हैं. अब वे बाजार तो घूमते नहीं हैं कि उनको कीमतों का अंदाजा हो. अब चूँकि वे बाजार घूमने-टहलने से रूबरू तो होते नहीं हैं, इस कारण उनके पास किसी तरह की तथ्यात्मक जानकारी तो होती नहीं है. अब बताइये आप, जब जानकारी नहीं तो बेचारे कीमतों को कम करने का कैसे सोच पाते? इस महानुभावों का तो हाल ये है कि एक आदेश दिया तो इनको भोजन उपलब्ध. गाड़ी में तेल डलवाने का पैसा तो देना नहीं है, रसोई के लिए गैस का इंतजाम भी नहीं करना है और न ही लाइन में खड़े होकर किसी वस्तु के लिए मारा-मारी करनी है. अब इतने कुअवसर खोने के बाद वे बेचारे कैसे जान सकते हैं कि कीमतों में वृद्धि हो रही है.


ये दोष तो उस बेचारे आम आदमी का है जो दिन-रात खटते हुए बाजार को निहारा करता है. वही बाजार के कुअवसरों से दो-चार होता है. वही लगातार मँहगाई की मार खा-खाकर पिलपिला हो जाता है. इस पिलपिलेपन का कोई इलाज भी नहीं है. यह किसी जमाने में चुटकुले की तरह प्रयोग होता था किन्तु आज सत्य है कि अब आदमी झोले में रुपये लेकर जाता है और जेब में सामान लेकर लौटता है.


ऊपर बैठे महानुभाव भी भली-भांति समझते हैं कि आम आदमी की ऐसी ग्राह्य क्षमता है कि वह मँहगाई को भी आसानी से ग्राह्य कर जायेगा. ऐसे में परेशानी कैसी? देश की जनता तो पिसती ही रही है, चाहे वह नेताओं के आपसी गठबन्धन को लेकर पिसे अथवा सामानों और दामों के आपसी समन्वय को लेकर. सत्ता के लिए किसी का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, टूट सकता है ठीक उसी तरह मंहगाई का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, दामों और सामानों का गठबन्धन टूट भी सकता है. इस छोटी सी और भारतीय राजनीति की सार्वभौम सत्यता को ध्यान में रखते हुए सरकार की नादान कोशिशों को क्षमा किया जा सकता है. 




 

11 जुलाई 2014

मोदी का पहला बजट : जन-भावनाएँ और देश-हित




जैसा कि तय था, आम बजट पर सत्ता पक्ष की तरफ से सकारात्मक और विपक्ष की तरफ से नकारात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. विपक्ष जो विगत दस वर्षों से इसी तरह की आँकड़ेबाज़ी करने में लगा था, तो उसको इस बजट से आपत्ति क्यों है, ये समझ से परे है? यदि वर्तमान सरकार भी उसी की नीतियों को आगे बढ़ा रही है, तो उनका रोना किस कारण से? क्या महज इसलिए कि इस बजट में गाँधी नाम से, नेहरू नाम से किसी योजना का सूत्रपात नहीं किया गया. बजाय गाँधी-नेहरू की मूर्तियों की स्थापना के सरदार पटेल की मूर्ति बनाये जाने की बात कही गई. बहरहाल, ये चर्चा का विषय नहीं है, चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि क्या वाकई इस बजट से देश की आर्थिक दशा सुधरेगी? क्या वाकई ये विकास की राह पर ले जाने वाला बजट है?
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जिस तरह का बहुमत पाकर भाजपा सत्तासीन हुई है, उससे न केवल आम आदमी में बल्कि खुद विपक्ष के बहुसंख्यक लोगों में इस बात की उम्मीद जागी थी कि इस बार का बजट कुछ अलग हटकर होगा. जिस तरह से मोदी ने अपने आरंभिक भाषण में कड़वी दवा देने की बात कही थी, उससे लगा था कि कुछ न कुछ कठोर कदम अवश्य उठाये जायेंगे किन्तु ऐसा नहीं हुआ. विस्तार में यहाँ बजट की चर्चा करना संभव नहीं है किन्तु बजट की सकारात्मकता को इस बात से समझा जा सकता है कि महज राजनैतिक स्टंटबाज़ी न करते हुए महिलाओं की सुरक्षा हेतु, बेटियों के भविष्य हेतु, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, कृषि हेतु अलग से व्यवस्थाएं की गई हैं, प्रावधान किये गए हैं. रसोई गैस सिलेण्डर की संख्या की कटौती न करके गृहणियों को राहत दी है तो आयकर सीमा में बहुत थोड़ी सी वृद्धि करके और छूटयोग्य निवेश सीमा में भी अल्प वृद्धि करके आम आदमियों को देश से विकास से जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया है. मनरेगा को कृषि से सम्बद्ध करने के प्रयास से इसे बजाय समाप्त करने के और बेहतर बनाये जाने पर बल दिया है. और भी ऐसे प्रावधान हैं जो एक उम्मीद जगाते हैं, विकास की आस बंधाते हैं.
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बजट पेश हो जाने के बाद सवाल खड़ा होता है कि इन योजनाओं का क्रियान्वयन कैसे होगा, कौन करेगा, कितना करेगा. योजनाओं का बना देना काफी नहीं होता, अब जरूरी है उसके क्रियान्वयन हेतु समुचित कदम उठाये जाने की, आर्थिक आधार जुटाए जाने की. जिस एफडीआई का विरोध लगातार होता रहा, उसी को लागू करने की बात सामने आई. यहाँ इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है. निवेश आवश्यक हो किन्तु अनिवार्य नहीं, ऐसी मानसिकता के साथ यदि निवेश होगा तो अवश्य ही देश-हित में होगा. सब्सिडी के सहारे देश की अर्थव्यवस्था नहीं चलाई जा सकती, ये एक अल्पकालिक व्यवस्था है और यदि आर्थिक मोर्चे पर दीर्घकालिक सफलता चाहिए है तो सब्सिडी से बचने की आदत डालनी ही होगी, जनता को भी, सरकार को भी. नई सरकार से उम्मीद लगाये बैठे लोगों को समझना होगा कि करों के भरोसे ही कोई भी सरकार देश के लिए धन का वन्दोबस्त करती है. ऐसे में व्यक्ति अपनी आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ देश को कर देने में कोताही बरतेगा तो आर्थिक मोर्चे पर कहीं न कहीं उसी को चपत लगनी तय है. सरकार को भी ऐसा नहीं कि समस्त करों का बोझ आम आदमी पर, नौकरीपेशा पर, छोटे उद्योगकर्मियों पर ही डाल दे, उसे इस तरह के प्रावधान करने होंगे जिससे बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों से अधिक से अधिक कर वसूला जाये. उनको दी जाने वाली सब्सिडी को बंद करके देश को आर्थिक समृद्ध बनाया जाये.
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सरकार अपना काम करने में लगी है, अब आम आदमी को, सामान्य नागरिक को भी देश-हित में कदम उठाये जाने की जरूरत है. सब्सिडी, छूट किसी भी रूप में हमारी विलासिता पूर्ति के लिए नहीं किये जाते; कोई भी प्रावधान बिना हमारी मदद के पूरे नहीं हो सकते; कोई भी योजना बिना हमारे सहयोग के संचालित नहीं हो सकती, ऐसे में हम सभी नागरिकों का प्रयास ये हो कि समवेत रूप में अपने-अपने क्षेत्र में संचालित सरकारी योजनाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वित कराएँ, सहयोग दें. इससे अपने क्षेत्र का विकास तो होगा ही, देश भी विकास के रास्ते पर आगे बढ़ेगा.
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चित्र गूगल छवियों से साभार

20 जुलाई 2013

आर्थिक सुधार पर नहीं, राजनैतिक प्रचार पर ध्यान




जब देश का प्रधानमंत्री ही यहाँ की आर्थिक स्थिति के बारे में गलत बयानबाज़ी करने लगे तो फिर किस केन्द्रीय नेतृत्व से आशा की जाये कि वो सही तस्वीर प्रस्तुत करेगा. पिछले नौ वर्षों की आर्थिक स्थितियों के आकलन में महज पिछला एक वर्ष ही निराशाजनक बताने वाले प्रधानमंत्री के बयान से निराशा इस कारण से ज्यादा हुई कि वे अपने आपमें प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री हैं. एक ऐसे मंच से, जो समूचे उद्योग जगत की निगाह में होने के अलावा मीडिया के माध्यम से, संचार साधनों के माध्यम से देश के प्रबुद्ध वर्ग की निगाह में रहता है, राजनैतिक बयानबाज़ी करते प्रधानमंत्री सरकारी प्रवक्ता ही नजर आते हैं. राजग और संप्रग के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था की तुलना करना और अपने संप्रग कार्यकाल की अर्थव्यवस्था को बेहतर बताना उनकी छवि को किसी छोटे स्तर के नेता की तरह चित्रित करता है. प्रधानमंत्री जी जब देश की आर्थिक दशा का वर्णन कर रहे थे तो कुछ ऐसे प्रतीत हो रहा था जैसे कि वे सदन में राष्ट्रपति के लिए सरकार द्वारा तैयार अभिभाषण का पाठ कर रहे हों. अर्थव्यवस्था का आधा-अधूरा आकलन, आंकड़ों की बाजीगरी, आर्थिक स्थिति की भयावहता को चुनावी मुलम्मे में लपेटने की कोशिश उनको अपने आपमें ही असफल सिद्ध कर रही थी.
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इस असफलता को ऐसे भी समझा जा सकता है कि संप्रग सरकार के मुखिया बने बैठे प्रधानमंत्री जी अपनी ही केंद्र सरकार की उपलब्धियों को बताने में परेशानी का अनुभव कर रहे थे. घोटालों पर घोटालों का होते जाना, आर्थिक स्थिति का लगातार डांवाडोल होना, विकास दर का अपेक्षित गति को प्राप्त न कर पाना, रुपये का लगातार कमजोर पड़ते जाना, विदेशी मुद्रा का संकट खड़ा होते दिखना, मंदी-मंहगाई की जुगलबंदी से घबराहट का उपजना, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भी आर्थिक स्तर का न सुधरना आदि-आदि वे स्थितियां हैं जो सरकार को कई कदम पीछे धकेलती हैं. सरकार की इन नाकामियों के लिए विपक्षी दल तो उसको घेरने के मूड में हैं ही, इस बार जनता भी पीछे हटती नहीं दिख रही है. आये दिन मंहगाई को लेकर होते आन्दोलनों को सरकार भली-भांति देख रही है, ऐसे में ये सोचना भी अपने आपमें मूर्खता होगी कि प्रधानमंत्री जी को देश के आर्थिक हालातों की वास्तविकता पता ही नहीं है.
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प्रधानमंत्री जी का बयान इस कारण से और भी निराशा पैदा करता है कि उद्योग के एक बड़े मंच को भी वे आम राजनैतिक रैलियों के मंच की तरह प्रयोग करते दिखे. कम से कम उनसे तो ये अपेक्षा की ही जा रही होगी कि वे देश की आर्थिक गति की कोई नई योजना पेश करेंगे, कुछ ऐसी राह सुझायेंगे जहाँ से रुपये को मजबूत किया जा सकेगा, कोई ऐसा सूत्र बताएँगे जिससे मंहगाई को नियंत्रित करके आम आदमी को राहत दी जा सकेगी, औद्योगिक विकास का वैश्विक फार्मूला समूचे देश के सामने रखकर आर्थिक विकास को अपेक्षित दर प्राप्त करने देंगे किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. लगातार मौन के बाद की टूटती चुप्पी ने भी कोई सकारात्मकता प्रदर्शित नहीं की, जिससे स्पष्ट सन्देश जाता है संप्रग सरकार अब बजाय कोई आर्थिक सुधार करने के राजनैतिक प्रचार में जुट गई है.
 

07 जुलाई 2013

खाद्य सुरक्षा बिल : केंद्र सरकार की नौटंकी


खाद्य सुरक्षा बिल पर आनन-फानन केंद्र सरकार ने अपनी जल्दबाजी दिखाकर कहीं न कहीं ये संकेत दे दिया है कि लोकसभा चुनाव किसी भी समय हो सकते हैं. मानसून सत्र के महज चंद दिनों पहले ही अध्यादेश के रूप में इस महत्वपूर्ण बिल को लाने की मंशा सिर्फ और सिर्फ मतदाताओं को लुभाने की है. जिस अतिशय तत्परता से अब केंद्र सरकार इस बिल के लिए प्रतिबद्ध दिख रही है, उसका क्षणांश भी पिछले नौ वर्ष में रही होती तो अभी तक देश को उसका लाभ (यदि मिलना होता) मिलना शुरू हो गया होता. भोजन-रोटी से महरूम लोगों के भोजन की गारंटी देने वाले इस बिल को केंद्र सरकार ने कभी भी प्राथमिकता में नहीं रखा. अब केंद्र सरकार इस बिल के माध्यम से अपनी धूमिल होती छवि को सुधारने का प्रयास कर रही है; आकंठ भ्रष्टाचार में डूब चुकी कांग्रेस को उबारने के लिए पतवार का काम कर रही है.
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बहुत से लोगों के लिए ये विवाद का विषय हो सकता है किन्तु ये सत्य है कि भारतीय मतदाताओं की याददाश्त वाकई में कमजोर होती है. इस बात में कोई शंका (कम से कम लेखक को) नहीं है कि आने वाले समय में जैसे-जैसे चुनाव की आहट और तेज़ होती जाएगी, केंद्र सरकार की तरफ से पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस आदि के दामों में कमी की जाती रहेगी. इससे मतदान के समय तक आम मतदाता अभी तक के तमाम भ्रष्टाचार को, मंत्रियों के घोटालों को भुलाकर इस तरह की लोक-लुभावनी योजनाओं के वशीभूत होकर उनके पक्ष में मत दे सकता है. इस समय खाद्य सुरक्षा बिल को अध्यादेश के रूप में सामने लाने के पीछे भी यही एक महत्वपूर्ण कारक है. इस बिल से किसको कितना लाभ मिलेगा, ये अभी भविष्य के गर्भ में है किन्तु पिछले कई महत्वपूर्ण बिलों, योजनाओं का परिणाम देखकर ये आसानी से कहा जा सकता है कि ये बिल भी कहीं न कहीं भ्रष्टाचार, निकम्मापन, काहिली आदि को विस्तार देगा. इससे पूर्व की मात्र दो योजनाओं, मनरेगा और मिड डे मील, का ही आकलन कर लिया जाए तो स्पष्ट रूप से पता चलेगा कि देश का करोड़ों रुपया सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है. मजदूरों, बच्चों में एक तरह का निकम्मापन भर दिया है. वे शिक्षक जो सादगी और ईमानदारी के पर्याय माने जाते थे, भ्रष्ट बना दिए गए.
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बहरहाल, केंद्र सरकार या कहें कि कांग्रेस ने अपना दांव खेल दिया है. गरीबों, भूखों, मजबूरों से उसे कभी कोई वास्ता नहीं रहा है. आम आदमी आज भी दाल, रोटी, सब्जी, रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, बिजली, सड़क, पानी आदि के लिए रो रहा है. देश भयंकर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, ऐसे में बजाय आर्थिक संकट सुलझाने के इस बिल को थोपने का काम करना अदूरदर्शिता का, स्वार्थपरकता का सबूत है. केंद्र सरकार की इस सोच की कीमत आने वाले समय में देश को, आम आदमी को ही चुकानी पड़ेगी.

12 मार्च 2010

मंहगाई पर वित्त-मंत्री की नादान कोशिशों के लिए उन्हें माफ़ करिए

हाय! ये आह एक हमारी नहीं, हर उस व्यक्ति की है जो बाजार के कुअवसरों से दो-चार होता है। बाजार का नजारा और इस नजारे के बीच सामानों के दामों का आसमान पर चढ़े होना। बहुत प्रयास किया गया हमारे वित्त-मंत्री जी की ओर से किन्तु सामानों के दाम हैं कि नीचे आने को तैयार नहीं हैं। बेचारे........(न न न वित्त-मंत्री जी बेचारे नहीं बल्कि सामानों के लिए है यह शब्द) हाँ तो, बेचारे सामान नीचे दुकान में सजे-सजे ग्राहक के आने की राह देख रहे हैं और दाम हैं कि नीचे आकर उनकी मदद करने को तैयार नहीं।


इस मंहगाई के दौर में सामानों से पटे बाजार और दामों के ऊपर आसमान में जा बसने पर लगा कि जैसे गठबन्धन सरकार के घटक तत्वों में कहा-सुनी हो गई है। सामान बेचारे अपने आपको बिकवाना चाहते हैं पर दाम हैं कि उनका साथ न देकर उन्हें अनबिका कर दे रहे हैं। क्या हो ऐसे में? वित्त-मंत्री जी ने बहुत समझाया पर बेकार..........।

फिर लगा कि ऐसा तो नहीं कि हमारे देश की संसद और विधानसभाओं में बैठे महानुभाव चूँकि बाजार घूमने-टहलने से रूबरू तो होते नहीं हैं, इस कारण उनके पास किसी तरह की तथ्यात्मक जानकारी तो होती नहीं है। अब बताइये आप, जब जानकारी नहीं तो बेचारे (हाँ, अबकी बार हमारे महानुभाव) कैसे कीमतों को कम करने का सोचते?

इस महानुभावों का तो हाल ये है कि आदेश मारा तो दाल हाजिर, आदेश दिया तो चीनी हाजिर (पता नहीं डायबिटीज के कारण चीनी खाते भी हैं या नहीं?), गाड़ी में तेल डलवाने का पैसा तो देना नहीं है, रसोई के लिए गैस का इंतजाम भी नहीं करना है और न ही लाइन में खड़े होकर सिलेंडर के लिए मारा-मारी करनी है। अब इतने कुअवसर खोने के बाद कोई कैसे जान सकता है कि कीमतों में वृद्धि हो रही है।

बाजार के कुअवसरों से तो आम आदमी ही दो-चार होता है जो लगातार मार खा-खाकर पिलपिला हो जाता है। इस पिलपिलेपन का कोई इलाज भी नहीं है। यह किसी जमाने में चुटकुले की तरह प्रयोग होता था किन्तु आज सत्य है कि अब आदमी झोले में रुपये लेकर जाता है और जेब में सामान लेकर लौटता है। (नहीं भाई, गाड़ी, कम्प्यूटर, लैपटाप आदि तो यहाँ अपवाद हैं। वैसे भी ये सारी आवश्यक वस्तुएँ आम से पिलपिले होते लोगों के लिए हैं भी नहीं, तभी तो इनके दामों में कमी है।)

आये दिन मंहगाई पर देश में कोई न कोई अपना शिगूफा छोड़ देता है और बैठ जाता है धरने आदि पर। अरे आप देखो इस सत्र में महिला आरक्षण पर ही चर्चा हुई है और मंहगाई को तो दोयम दर्जे का मुद्दा मानकर किनारे लगा दिया गया है। जैसे समाज ने भ्रष्टाचार को, रिश्वतखोरी को दैनिक चर्या में शामिल कर लिया है, उसी तरह मंहगाई को लेकर भी वातावरण तैयार किया जा रहा है। जिस तरह से भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी के प्रति अब हम आन्दोलित नहीं होते बल्कि बिना रिश्वत के किसी काम के पूरा न होने को सहजता से स्वीकार चुके हैं उसी तरह से मंहगाई को भी अंगीकार करने के लिए बाँहे फैलाये खड़े हैं।

यदि ऐसी ग्राह्य क्षमता है हम आम जनता की तो मंहगाई को भी आसानी से ग्राह्य कर जायेंगे, परेशानी कैसी। इस पूरी मगजमारी करने के पीछे मात्र इतनी ही सोच है कि फिर क्यों हम बेचारे वित्त-मंत्री जी को कोसने में लगे हैं? सामानों और दामों का आपसी समन्वय, गठबन्धन समाप्त सा लग रहा है इस कारण दोनों में दूरियाँ दिख रहीं हैं। देश की जनता तो पिसती ही रही है, चाहे वह नेताओं के आपसी गठबन्धन को लेकर पिसे अथवा सामानों और दामों के आपसी समन्वय को लेकर। सत्ता के लिए किसी का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, टूट सकता है ठीक उसी तरह मंहगाई का किसी से भी गठबन्धन हो सकता है, दामों और सामानों का गठबन्धन टूट भी सकता है।

इस छोटी सी और भारतीय राजनीति की सार्वभौम सत्यता को ध्यान में रखते हुए कृपया वित्त-मंत्री जी को उनकी नादान कोशिशों के लिए क्षमा कर दीजिए।

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चित्र गूगल छवियों से साभार

05 दिसंबर 2009

मंहगाई के कारण बदला मुहावरा - माईक्रो पोस्ट

मंहगी होती दाल और सस्ते होते चिकन के कारण बहु-प्रचलितए लोकप्रिय मुहावरे ‘‘घर की मुर्गी दाल बराबर’’ को बदलने का मन करता है। अब यह मुहावरा इस प्रकार होना चाहिए---

‘‘घर की दाल मुर्गी बराबर’’

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कहिए सही है न!!!!
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चित्र गूगल से साभार

02 अगस्त 2009

अब तो दाल-रोटी खाने की औकात भी नहीं

अकसर बातचीत में यह सुनने में आता था कि चिन्ता की क्या बात है। इतना तो कर ही लेते हैं कि दो वक्त दाल-रोटी तो खा ही सकते हैं।
यह भी कह दिया जाता था कि गरीब का क्या है सूखी रोटी और प्याज-नमक के सहारे जिन्दगी काट लेता है।
अब क्या ऐसा सम्भव दिखता है?
कारण 96 रु0 किलो अरहर की दाल और 26 रु0 किलो प्याज। (यह आँकड़ा घटता-बढ़ता रहता है, घट कम ही रहा है।)
आज कोई विस्तार नहीं, कोई चर्चा नहीं। एक प्रकार का मौन..........।