20 July 2013

आर्थिक सुधार पर नहीं, राजनैतिक प्रचार पर ध्यान




जब देश का प्रधानमंत्री ही यहाँ की आर्थिक स्थिति के बारे में गलत बयानबाज़ी करने लगे तो फिर किस केन्द्रीय नेतृत्व से आशा की जाये कि वो सही तस्वीर प्रस्तुत करेगा. पिछले नौ वर्षों की आर्थिक स्थितियों के आकलन में महज पिछला एक वर्ष ही निराशाजनक बताने वाले प्रधानमंत्री के बयान से निराशा इस कारण से ज्यादा हुई कि वे अपने आपमें प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री हैं. एक ऐसे मंच से, जो समूचे उद्योग जगत की निगाह में होने के अलावा मीडिया के माध्यम से, संचार साधनों के माध्यम से देश के प्रबुद्ध वर्ग की निगाह में रहता है, राजनैतिक बयानबाज़ी करते प्रधानमंत्री सरकारी प्रवक्ता ही नजर आते हैं. राजग और संप्रग के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था की तुलना करना और अपने संप्रग कार्यकाल की अर्थव्यवस्था को बेहतर बताना उनकी छवि को किसी छोटे स्तर के नेता की तरह चित्रित करता है. प्रधानमंत्री जी जब देश की आर्थिक दशा का वर्णन कर रहे थे तो कुछ ऐसे प्रतीत हो रहा था जैसे कि वे सदन में राष्ट्रपति के लिए सरकार द्वारा तैयार अभिभाषण का पाठ कर रहे हों. अर्थव्यवस्था का आधा-अधूरा आकलन, आंकड़ों की बाजीगरी, आर्थिक स्थिति की भयावहता को चुनावी मुलम्मे में लपेटने की कोशिश उनको अपने आपमें ही असफल सिद्ध कर रही थी.
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इस असफलता को ऐसे भी समझा जा सकता है कि संप्रग सरकार के मुखिया बने बैठे प्रधानमंत्री जी अपनी ही केंद्र सरकार की उपलब्धियों को बताने में परेशानी का अनुभव कर रहे थे. घोटालों पर घोटालों का होते जाना, आर्थिक स्थिति का लगातार डांवाडोल होना, विकास दर का अपेक्षित गति को प्राप्त न कर पाना, रुपये का लगातार कमजोर पड़ते जाना, विदेशी मुद्रा का संकट खड़ा होते दिखना, मंदी-मंहगाई की जुगलबंदी से घबराहट का उपजना, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भी आर्थिक स्तर का न सुधरना आदि-आदि वे स्थितियां हैं जो सरकार को कई कदम पीछे धकेलती हैं. सरकार की इन नाकामियों के लिए विपक्षी दल तो उसको घेरने के मूड में हैं ही, इस बार जनता भी पीछे हटती नहीं दिख रही है. आये दिन मंहगाई को लेकर होते आन्दोलनों को सरकार भली-भांति देख रही है, ऐसे में ये सोचना भी अपने आपमें मूर्खता होगी कि प्रधानमंत्री जी को देश के आर्थिक हालातों की वास्तविकता पता ही नहीं है.
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प्रधानमंत्री जी का बयान इस कारण से और भी निराशा पैदा करता है कि उद्योग के एक बड़े मंच को भी वे आम राजनैतिक रैलियों के मंच की तरह प्रयोग करते दिखे. कम से कम उनसे तो ये अपेक्षा की ही जा रही होगी कि वे देश की आर्थिक गति की कोई नई योजना पेश करेंगे, कुछ ऐसी राह सुझायेंगे जहाँ से रुपये को मजबूत किया जा सकेगा, कोई ऐसा सूत्र बताएँगे जिससे मंहगाई को नियंत्रित करके आम आदमी को राहत दी जा सकेगी, औद्योगिक विकास का वैश्विक फार्मूला समूचे देश के सामने रखकर आर्थिक विकास को अपेक्षित दर प्राप्त करने देंगे किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. लगातार मौन के बाद की टूटती चुप्पी ने भी कोई सकारात्मकता प्रदर्शित नहीं की, जिससे स्पष्ट सन्देश जाता है संप्रग सरकार अब बजाय कोई आर्थिक सुधार करने के राजनैतिक प्रचार में जुट गई है.
 

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