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06 नवंबर 2014

गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है



          सिनेमा, फिल्म के नाम से हमारे मन-मष्तिष्क में एक तस्वीर उभरती है बड़े से हॉल की, एक पर्दे की, पर्दे पर हीरो-हीरोइन के प्यार और इसके समानान्तर चलती हिंसा-मारपीट-सेक्स-अश्लीलता की दुनिया की। वर्तमान फिल्मों में कॉलेज का माहौल जहाँ अध्यापन से ज्यादा इश्कबाजी और उससे ज्यादा गुंडागर्दी का प्रदर्शन, कॉलेज कैम्पस में ही निपटाए जाते दो-चार फूहड़ गीत और फिल्म अन्ततः हिंसा-मारपीट-बलात्कार-हत्या जैसी स्थितियों से गुजरती हुई हीरो-हीरोइन के सुखद मिलन पर समाप्त हो जाती है। देखा जाये तो फिल्मों का यह स्वरूप जन-भावनाओं के अनुसार निर्मित होता जा रहा है। फिल्मकार भली-भांति जानते हैं कि सिनेमा में लोगों को देखने को चाहिए क्या है। उनका उद्देश्य फिल्म के द्वारा अधिक से अधिक धन कमाना रहता है और इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। अधिक से अधिक धन प्राप्ति की अभिलाषा में फिल्मकार वह सब दिखाने को तत्पर रहता है जिसकी लालसा समाज का मध्यम वर्ग करता है और कहीं न कहीं इसको अश्लील भी मानता है। इस नैराश्य में अभी भी ऐसे फिल्मकार हैं जो सामायिक और गंभीर विषयों को महत्व देते हुए अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के लिए फिल्म निर्माण कर रहे हैं। इन फिल्मकारों के मन में वे संस्कार हैं जिन्हें पिछले दशकों में एक बेहतर पीढ़ी छोड़ गई है। रमाशंकर चौधरी, देवकी बोस, शांताराम, सोहराब मोदी, जयंत देसाई, चेतन आनंद, विमल राय, गुरुदत्त, सत्यजीत रे, राजकपूर आदि की फिल्मों को देखकर स्वस्थ-स्वच्छ, मनोरंजक फिल्मों की धारणा-अवधारणा बेहतर तरीके से पुष्ट होती है। नये फिल्मकारों में से अधिकांश न तो इस तरह की स्वस्थ, स्वस्थ, मनोरंजक, संदेशप्रधान फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं और न ही इन फिल्मकारों को अपना आदर्श बनाना चाहते हैं।
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          आज निर्माता-निर्देशक जीवन की सच्चाई दिखाने के नाम पर जीवन के गोपन को उभारने लगे हैं। सेक्स, देह का खुला प्रदर्शन, अश्लीलतम गीतों-नृत्यों-भावभंगिमाओं के साथ अश्लील संवाद फिल्मों में स्थान सहज भाव से पाने लगे हैं। चोली के पीछे क्या है’ एक चुम्मा तू मुझको उधार दे दे’ सरकाय लेओ खटिया’ ए गनपत चल दारू लगा’ ‘भाग डी के बोस’ ‘चार बोतल बोदका’ जैसे गानों के बोल और संवाद अदायगी ने फिल्मों को वाचाल स्वरूप प्रदान किया। फिल्मों के बँधे-बँधाये, निश्चित विषयों को कम्प्यूटर तकनीक, विेदशी लोकेशन की तड़क-भड़क और मसालेदार गीत-संगीत, सेक्स-अश्लीलता का तड़का लगाकर कुछ अलग सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है पर कोई संदेश देने में असफलता ही मिली है। हीरो-हीरोइन का सेक्समय प्रेम, दो-चार गीत-नृत्य, मारपीट-हिंसा और अंत में हीरो-हीरोइन का मिलन... लगभग सभी फिल्मों की इतनी सी कहानी है जो फार्मूलाबद्ध रूप से हमारे सामने आ रही है। फिल्मकारों के साहित्य के प्रति उपेक्षित भाव से ऐसी स्थिति निर्मित हुई है। मुंशी प्रेमचन्द ने फिल्मों के सवाक् होने पर लिखा था कि ‘अक्सर लोगों को ख्याल है कि जब से सिनेमा सवाक्हो गया है, वह साहित्य का अंग हो गया है और साहित्य सेवियों के लिए कार्य का एक नया क्षेत्र खुल गया है। साहित्य भावों को जगाता है, सिनेमा भी भावों को जगाता है इसलिए वह भी साहित्य है।’
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वर्तमान में जहाँ रंग दे बसंती’ तारे जमीं पर’ थ्री ईडियट्स’ वेलकम टू सज्जनपुर’ न्यूयॉर्क’ जैसी साफ सुथरी और विषय-विशेष पर आधारित फिल्मों से सुखद अनुभूति होती है वहीं कमीने’ कम्पनी’ जैसी फिल्मों की प्रेतछाया डराती भी है। फिल्मों के द्वारा प्रेम का, अश्लीलता का, देहयष्टि का, ठुमकेदार नृत्य-गीतों का नाटक रचकर एक पूरी की पूरी पीढ़ी को गुमराह किया जा रहा है। फिल्म की इस तरह की नकारात्मक सशक्तता युवा पीढ़ी में कामलोलुपता, फ्री सेक्स, आधुनिक जीवनशैली, भौतिकतावादी संस्कृति की बीजारोपण कर चुकी है। बुद्धिजीवी सुसुप्तावस्था में पड़े फिल्मों की वाचालता देख समाज में होता व्याभिचार देख रहे हैं। खामोशी समाज के जागरूक वर्ग के होठों पर है और समाज की वास्तविकता का मायाजाल दिखाकर समाज को भरमाने वाले फिल्मकारों की जुबान बोलती है और कहती है-“गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है....।”
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13 फ़रवरी 2010

‘खातव्यम् तो मरतव्यम्, न खातव्यम् तो मरतव्यम्, ताक धिना-धिन क्यों करतव्यम्

चलिए, देश के सिर पर आया एक बहुत बड़ा संकट टल गया। शाहरुख खान की फिल्म माई नेम इज खान शिवसेना के लाख विरोध के बाद भी आखिरकार रिलीज हो ही गई।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)
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हम सभी के लिए यह गौरवशाली क्षण है क्योंकि यदि यह फिल्म अपने समय पर रिलीज नहीं हो पाती तो देश के बहुसंख्यकों के समकक्ष होने के बाद भी अल्पसंख्यक के रूप में देश में चिन्हित एक बहुत बड़े वर्ग के दिल को ठेस लगती। हम प्रसन्न हैं कि देश में चाहे आम आदमी की सुरक्षा न हो पाये किन्तु वर्ग विशेष के, धर्म विशेष के किसी भी एक व्यक्ति के पोस्टर तक को कोई न फाड़ सके।

यही तो हम भारतवासियों की दरियादिली है कि अपने दर्द को भले ही कम न कर सकें किन्तु दुनिया जहान के दर्द को कम करने का दम भरते घूमते हैं।


विडम्बना देखिये, जिस व्यक्ति की फिल्म की रिलीज के लिए मुम्बई में हंगामा कटा रहा, महाराष्ट्र सरकार के साथ-साथ देश की सरकार के प्राण भी हलकान रहे, लोगों की नींद उड़ी रही, फिल्म अभिनेता शाहरुख खान की पुत्री को तो देश तक छोड़ने की चिन्ता हो गई थी, वह व्यक्ति अपनी फिल्म की रिलीज के समय इस देश में नहीं था। फोन करके उसने इस देश के बेवकूफ प्रशंसकों से कह दिया कि वह सभी मुम्बईकरों से माफी माँगता है कि उन्हें कष्ट हुआ पर स्वयं इतने कष्ट के बाद भी विदेश से धन की ज्यादा से ज्यादा उगाही में लगा हुआ है।

चलिए कोई बात नहीं, फिल्म रिलीज हो गई और मीडिया की निगाह में शिवसेना हार गई। अब फिल्म की नहीं कुछ मीडिया की बात हो जाये जो देश के विकासपरक कदमों में अपना भी कदम मिलाने का प्रयास करता है किन्तु उसके अनाड़ीपन से वह कदम तो नहीं मिल पाता, हाँ समाज के विकासपरक कदमों में अड़ंगा जरूर लग जाता है।

मीडिया अब कहती घूम रही है कि शिवसेना जीत गई और खान जीत गया। यदि इस रिलीज के समय कोई हादसा हो जाता तो मीडिया शिवसेना की नाक में दम तो करती ही, देश के तमाम सारे हिन्दुओं की (जो अपने देश में ही अल्पसंख्यकों से बदतर हैं, इसी मीडिया के कारण) खाट खड़ी कर देती। भला हो कि ऐसा कुछ नहीं हुआ।

मीडिया स्वयं में हमेशा ऊहापोह की स्थिति में रहती है कि क्या करे और क्या न करे? क्या कहे और क्या न कहे? 6 दिसम्बर आता है और आराम से गुजर जाये तो उसकी बकवास शुरू कि भाजपा, विहिप और अन्य हिन्दू संगठन शान्त रह गये, वे सभी मंदिर मुद्दे को भूल गये, आदि-आदि।

कुल मिला कर कहने का तात्पर्य यह कि कुछ करो तो मरना है और न करो तो मरना है। इसी स्थिति को कहा जाता है ‘खातव्यम् तो मरतव्यम्, न खातव्यम् तो मरतव्यम्, ताक धिना-धिन क्यों करतव्यम्।’

जो हुआ अच्छा हुआ, तुष्टिकरण की नीति फिर सफल रही। इस नीति से तो अभी तक देश में सरकारें कायम हैं तो फिर एक फिल्म के कायम रहने में किसे संशय था। शाहरुख खान इसी से तो देश के बाहर कमाई में मगन है क्योंकि उसे मालूम हैं कि उसके प्रशंसक जान लड़ा देंगे, जान गँवा देंगे और यह सब भी सफल नहीं हो पाया तो फिर सरकार तो है ही जो तुष्टिकरण के नाम पर एक फिल्म तो रिलीज करवा ही देगी।

जय हो.............जय हो......... (स्लमडाग का गाना नहीं गा रहे हैं, जय-जय मना रहे हैं)



23 दिसंबर 2009

यदि चित्र देखने की इच्छा है तो इन्हें भी देख लें

आज हमारी छोटी बहिन सोनिया ने एक मेल करके अमिताभ बच्चन की वे तस्वीरें भेजीं जो उनको "पा" फिल्म का "औरों" बनातीं हैं
हमने सोचा कि आपको भी इन तस्वीरों से रूबरू करा दें, संभव हो कि आप लोगों ने इन्हें देख रखा हो, फिर भी......
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11 जुलाई 2009

आज बड़े कमीने लग रहे हो ! ! ! !

‘कमीना’.....‘कमीने’....चौंक गये आप? जी हाँ चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि हमारे समाज में ये शब्द एक गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अभी शायद (शायद की जरूरत है?) ऐसी स्थिति आई नहीं है कि इस शब्द को भद्रजनों की भाषा-शैली में शामिल किया जाये।
गाली तो गाली ही होती है या समय के साथ उसका भी परिष्कृत रूप सामने आता है? यह सवाल एक हमारे मन में ही अकेले नहीं घुमड़ता होगा, कभी न कभी, कहीं न कहीं आपको भी परेशान करता होगा। अब करता रहे परेशान तो करे जिसको ये शब्द समाज में प्रचलित करने हैं वे तो कर ही रहे हैं।
इस बात से थोड़ा सा इतर....आपको ‘सेक्सी’ शब्द के बारे में क्या विचार आता है? कुछ सालों तक इस शब्द के मायने कुछ अलग थे। इस शब्द के उच्चारण में एक प्रकार की झिझक देखने को मिलती थी। आज.....आज ये शब्द हम बड़े हि बेधड़क होकर इस्तेमाल करते हैं। बड़े बैठें हों या फिर छोटे इस शब्द ‘सेक्सी’ के प्रयोग में कोई शर्म किसी को नहीं है।
और तो और सेक्सी शब्द के मायने अब इस रूप में बदले हैं कि हम अपने नन्हे-मुन्नों के लिए भी इस शब्द को प्रयोग करने लगे हैं। कोई विशेष ड्रेस पहना देख कर, किसी विशेष प्रकार के करतब दिखाने पर हम अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए अकसर कह देते हैं कि इस ड्रेस में बड़ा सेक्सी लग रहा है, लगता है। अकसर हम इस शब्द को मजाक के रूप में भी इस्तेमाल कर लेते हैं ‘और क्या हाल है, बड़े सेक्सी बने घूम रहे हो?’
इस शब्द की सहज स्वीकार्यता के सापेक्ष देखा जाये तो क्या ‘कमीना’ शब्द इतना सहज स्वीकार्य है? या हो पायेगा? हो पायेगा का जवाब शायद कोई भी न दे पाये क्योंकि हमारे फिल्मी संसार ने लगभग स्वीकार्यता की स्थिति में तो इस शब्द को लाकर खड़ा कर दिया है। याद है वो गाना - ‘मुश्किल कर दे जीना, इश्क कमीना’, यह गाना बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा था, चढ़ा है।
अब इस गाने का विकास-क्रम बढ़ा। अब एक फिल्म आ गई है ‘कमीने’....। स्वीकार्यता की ओर एक और कदम। जैसे हमारे विचार से सेक्सी शब्द की स्वीकार्यता बढ़ी थी ‘मेरी पैंट भी सेक्सी, मेरी शर्ट भी सेक्सी........’ से। अब मित्रों में आपस में चर्चा होगी चल कमीने देख आते हैं। माँ के पूछने पर बेटी-बेटे कहेंगे-माँ दोस्तों के साथ कमीने देखने जा रहे हैं।
कई बार इस तरह के शब्दों के प्रयोग करने में उसका अर्थ न मालूम होने की स्थिति होती है पर यह भी उनके लिए होती है जो कम पढ़े-लिखे या निरक्षर होते हैं। जैसे हमारे एक मित्र के घर काम वाली बाई आती थी। वह जब भी अपने सात-आठ साल के बच्चे की कोई शरारत या फिर किसी हरकत का बखान करती तो बड़े ही गर्वोक्ति भरे अंदाज में कहती ‘लला ने ऐसो कर दओ, बड़ो हरामी है.....या बड़ो हरामी होत जा रओ, अपयें मन की करन लगो है अब’.....बगैरह-बगैरह। जब एक दिन उसको बताया कि इस शब्द का क्या अर्थ होता है तो उसने फिर इसका इस्तेमाल करना बन्द कर दिया।
क्या काम वाली बाई की तरह ही इन फिल्म वालों की स्थिति है? क्या ये लोग भी इन शब्दों के अर्थ नहीं समझते? क्या अब समाज में विकृत मानसिकता को ही फैलाने का चलन काम करेगा?
हो कुछ भी अब आने वाले समय में इस तरह के वाक्यों से भी रू-ब-रू होने की सम्भावना है ‘‘देखो-देखो मेरे बेटे को, इस ड्रेस में कितना कमीना लग रहा है।’’ ‘‘आज गजब हो गया, तुम्हारे कमीनेपन ने तो मजा बाँध दिया।’’
क्या आप इसके लिए तैयार हैं?

01 मार्च 2009

फ़िल्म महोत्सव, स्लम डॉग और हमारी फिल्में

हमारे शहर में पिछले तीन दिनों से अकादमिक और सांस्कृतिक माहौल बना हुआ था, जो आज रात समाप्त हुआ। यहाँ स्थानीय महाविद्यालय-दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय-में बी0 एड0 विभाग में एक सेमीनार था और इसी महाविद्यालय में तीन दिनों तक फिल्म महोत्सव का भी आयोजन किया गया था। फिल्म महोत्सव का शुभारम्भ 27 फरवरी को हुआ था और उसी दिन आस्कर पुरस्कारों से लदी-फदी फिल्म स्लम डाग मिलेनियम को दर्शकों की बेहद जबरदस्त मांग पर चलाया गया था। साथ में स्थानीय स्तर पर बनाई गयी लघु फिल्म का भी प्रदर्शन किया गया था। इस लघु फिल्म में उरई शहर के इतिहास और कालपी शहर के एतिहासिक महत्व के अतिरिक्त डा0 हरिमोहन पुरवार द्वारा अपनी मेहनत और लगन से तैयार किया गया ‘बुन्देलखण्ड संग्रहालय’ का सौन्दर्यपरक चित्रण किया गया था। अगले दो दिनों में कुछ पुरानी फिल्मों के साथ-साथ वृत्त चित्र एवं लघु फिल्मों को भी दिखाया गया।
इस मौके पर दर्शकों की प्रतिक्रिया स्लमडाग को लेकर जानने की उत्सुकता अधिक रही। हमें तो फिल्म में कुछ इस तरह का नहीं दिखा कि उसे इतने सारे आस्कर पुरस्कारों से लाद दिया गया (परिणाम तय करने वाले हमसे अधिक जानकार हैं)। कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया अन्य दर्शकों की भी रही। कहानी कुल मिला कर वही पर एक नये कलेवर में लिपटी दिखी। हाँ एक बात ये खास दिखी कि पूरी फिल्म को कौन बनेगा करोडपति के सवालों के साथ में गूँथ कर दिखाया गया। बस इसके अलावा हमें तो कुछ खास नहीं दिखा।
दो भाइयों के बीच एक लड़की की कहानी, एक अच्छे और एक बुरे की कहानी, प्यार की जीत की कहानी, अच्छे की विजय और बुरे की पराजय की कहानी। सब कुछ उसी भारतीय स्टाइल में जिसके लिए भारतीय निर्माता निर्देशकों को, कलाकारों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लताड़ा जाता रहा है। फिल्म का खास हिस्सा (भारतीयों के लिए) ‘जय हो’ गाना पूरी फिल्म समाप्त हो जाने के बाद दिखाया जाता है। फिल्म समाप्त हो जाती है, कास्टिंग चालू है, अब यदि प्यार उमड़ रहा है ‘जय हो’ के लिए तो रुको वरना जाओ अपने-अपने घर। पुरस्कार न मिलता तो शायद कोई भी इस गाने को सुनने के लिए नहीं रुकता, पर अब रुकेंगे। (याद हो आपको भारत सरकार ने राष्ट्रीयता जगाने के लिए फिल्मों के अन्त में राष्ट्रगान दिखाना अनिवार्य कर दिया था, कितने लोग खड़े होकर उसका सम्मान करते थे? जब फिल्म के बाद अपने राष्ट्रगान का सम्मान नहीं हो सका तो साधारण से गीत का क्या करते?)
बहरहाल, हम लोगों द्वारा आयोजित करवाया गया सेमीनार और फिल्म महोत्सव बहुत ही खुशगवार मौसम में समाप्त हुआ और आने वाले दिनों के लिए एक नई चेतना का सूत्रपात कर गया।

28 सितंबर 2008

रिश्तों की गरिमा

आज लगभग एक सप्ताह के बाद ब्लॉग दुनिया में लौटना हो पाया. इधर कुछ नितांत निजी कार्यों में इतना उलझ गए कि कंप्यूटर के दर्शन ही न हो सके और इसी कारण से ब्लॉग दुनिया से भी दूरी बनी रही. इस बीच बहुत कुछ ऐसा भी हुआ कि सोचते ही रहे कि कुछ न कुछ लिख दिया जाए पर व्यस्तताओं ने ऐसा करने नहीं दिया।
बहरहाल अब लौटे हैं तो कुछ कहने के लिए ही............... एक दो घटनाओं ने मन को थोड़ा विचलित किया और लगा कि क्या अब समाज में रिश्तों का कोई मोल नहीं बचा है? रिश्तों की गरिमा इस कदर ख़तम होती जा रही है कि अब भाई-भाई एक दूसरे का दुश्मन है, बाप-बेटे में रंजिश का माहौल है, माँ-बेटे के बीच तना-तनी है, बहिन-भाई के बीच रिश्तों की पवित्रता संदेहास्पद हो गई है. इसे हो सकता है कि कुछ लोग मेरे मन की बयानवाजी कहें पर आँखें खोल कर जब हम समाज में देखते हैं तो हमें परदे के पीछे छिपे ऐसे कई शैतान नजर आ जाते हैं जो रिश्तों को खोखला करने में लगे हैं।
इन्ही सब के बीच याद आ गई फ़िल्म "रंग दे वसंती", वैसे आप कहेंगे कि इस फ़िल्म में रिश्तों के सन्दर्भ में ऐसा क्या खास था. यहाँ फ़िल्म कि कहानी उतनी महत्ता नहीं रखती जितनी कि उसके भीतर छिपी एक और कहानी की महत्ता है. नौजवानों को लेकर रची-बसी इस फ़िल्म में भ्रष्टाचार से निपटने के अपने तरीके को दर्शाया गया है, यहाँ ये विचारणीय नहीं है. यदि इसके दूसरे पहलू को ध्यान दिया जाए तो ज्ञात होगा कि एक ऐसा संदेश जो शायद फ़िल्म निर्माता, कहानीकार या निर्देशक ने भी ध्यान में नहीं रखा होगा.....और वो है उन सारे दोस्तों का एक साथ मिल कर काम करना.
अपने दोस्त की मौत का बदला लेने का उन लड़कों का तरीका ग़लत हो सकता है पर ये जानते हुए कि इसका अंत जेल है (मौत भी हो सकता है) सभी दोस्तों ने एक साथ मिल कर घटना को अंजाम दिया. वैसे सभी के नजरिये अपने-अपने होते हैं और इनके बीच अपनी-अपनी सोच भी होती है. हो सकता है कि हमारी इस सोच से इत्तेफाक रखने वाले कम हों पर आज जब कि रिश्तों में खटास बुरी तरह आ गई हो उस समय इस तरह के कुछ चित्र (फिल्मों के अलावा दैनिक जीवन में भी मिल जाते हैं) आशान्वित करते हैं कि ऐसे लोग ही रिश्तों को ज़िंदा बनाए रखेंगे।
अभी इतना ही, कुछ व्यस्तता कम हुई है हो सका तो कल फ़िर मिलेंगे.

03 सितंबर 2008

कार्टूनी गब्बर-ठाकुर

अभी-अभी अपने एक मित्र के मोबाईल पर एक फ़िल्म का कार्टून संस्करण देखा. वाकई कमाल है. सोचा क्यों न आप लोगों के साथ भी उसे बाँट लिया जाए. फ़िल्म शोले के गब्बर और ठाकुर के ऊपर फिल्माया गया ये सीन आपको भी हंसायेगा। उन सभी के प्रति आभार जिन्होंने इस कार्टून वीडियो को बनाया और हम सबको दिखलाने के लिए जारी किया.