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15 अप्रैल 2026

सोशल मीडिया उपयोग का दबाव क्यों?

सरकार द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों को विभिन्न कार्यक्रम संपन्न करवाए जाने सम्बन्धी प्रस्ताव भेजा जाना समझ आता है. इन कार्यक्रमों की रिपोर्ट बनाना, उसको जियो-टैगिंग फोटो-वीडियो के साथ सम्बंधित कार्यालय को भेजना भी समझ आता है. इस समझ आने वाली स्थिति के बीच समझ ना आने वाली स्थिति ये है कि इन कार्यक्रमों की फोटो, वीडियो को सोशल साइट्स (फेसबुक,  इन्स्टाग्राम, यूट्यूब आदि) पर अपलोड करके उसकी लिंक भी उपलब्ध करवाना होता है. आखिर ऐसा क्यों? ये सोशल साइट्स न तो आधिकारिक रूप से सरकार के अंग हैं, न ही इनको किसी भी प्राध्यापक, संस्थान द्वारा उपयोग में लाना जाना अनिवार्य बनाया गया है.

 

सरकार की इस तरह की अनावश्यक गतिविधि ही किसी भी संस्थान के तानाशाह प्रवृत्ति की मानसिकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती है. यही कारण है कि विश्वविद्यालय स्तर पर, महाविद्यालय स्तर पर, विभागीय स्तर पर व्हाट्सएप ग्रुप की भरमार है. इस तरह के जी के जंजाल से कभी मुक्ति मिलेगी या फिर ये जंजाल किसी दिन सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था की जान लेकर ही मानेगा?


31 जनवरी 2026

शोध परियोजनाओं हेतु गैर-सरकारी संस्थाओं से वित्तीय सहायता

Research Funding Opportunities (Non-Government Agencies)

 

1. Tata Trusts

https://www.tatatrusts.org

Areas Supported: Education, Rural development, Social innovation, Public policy, Community development

Funding is provided for research projects and social impact studies.

 

2. Infosys Foundation

https://www.infosys.com/infosys-foundation

Areas Supported: Education, Indian culture and literatur, Social development, Community projects

Research projects related to education and society may receive support.

 

3. Azim Premji Foundation/Azim Premji University

https://azimpremjiuniversity.edu.in

Areas Supported: Education policy, School education, Social development, Rural studies, Governance

 

4. Ford Foundation

https://www.fordfoundation.org

Areas Supported: Social justice, Gender equality, Human Rights,  Public policy, Cultural studies

International collaborations are also possible.

 

5. British Council Research Grants

https://www.britishcouncil.org

Areas Supported: Higher education research, Cultural relation, English language education, International academic collaboration

This is especially useful for English and Humanities faculty.

 

6. India Foundation for the Arts (IFA)

https://indiaifa.org

Areas Supported: Literature, Cultural studies, Arts and humanities, Documentation and archives

 

7. Wellcome Trust (UK)

https://wellcome.org

Areas Supported: Humanities, Health and society, Medical humanities, Social sciences related to health

27 जनवरी 2026

शोध परियोजनाओं हेतु केन्द्रीय सरकारी एजेंसियों द्वारा वित्तीय सहायता

विभिन्न केंद्रीय सरकारी एजेंसियां अलग-अलग विषयों में वित्तीय सहायता (फंडिंग) के लिए शोध प्रस्ताव (Research Proposals) आमंत्रित कर रही हैं. शोध प्रस्ताव नैक (NAAC) के अनुसंधान और नवाचार मापदंडों के लिए भी महत्वपूर्ण है.

 

The following major funding agencies and portals may be explored:

 

1. ICSSR (Indian Council of Social Science Research)

https://icssr.org

Relevant Areas: Social Sciences, Literature, Education, Gender Studies, Governance, Culture, Public Policy, Society.

Major Research Project

Minor Research Project

Collaborative Research Projects

 

2. ANRF (Anusandhan National Research Foundation) – EarlierSERB

https://www.anrfonline.in

Relevant Areas: Science, Technology, Interdisciplinary Research, and Innovation.

Core Research Grant (CRG)

Advanced Research Grant

Early Career Research Grants

 

3. ICPR (Indian Council of Philosophical Research)

https://icpr.in

Relevant Areas: Philosophy, Ethics, Indian Knowledge Systems, Religious and Cultural Studies.

 

4. ICHR (Indian Council of Historical Research)

https://ichr.ac.in

Relevant Areas: Indian history, culture, civilization, archives, historical studies.

 

5. Ministry of Culture Research Grants

https://indiaculture.gov.in

Relevant Areas: Indian heritage, literature, culture, traditions, art and cultural studies.

18 जनवरी 2026

भेदभाव उन्मूलन में दूसरे संग भेदभाव न हो

उच्च शिक्षा के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय की भावना के प्रति सकारात्मकता पैदा करने का कार्य करने के साथ-साथ इंसानों में संवेदनशीलता, मानवीयता गुणों का विकास किया जाता है. इसी उद्देश्य को लेकर ही देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की स्थापना की गई थी. अपनी स्थापना से लेकर अद्यतन यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों लोकतांत्रिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक आधारशिला निर्मित करने का प्रयास किया जाता रहा है. आयोग द्वारा इसी 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए समता के संवर्द्धन हेतु विनिमय 2026 को अधिसूचित कर दिया गया. ये विनियम 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप है. यूजीसी द्वारा यह अद्यतन रूप भी अचानक से लागू नहीं कर दिया गया. इसका प्रारूप फरवरी 2025 में जारी हुआ था. लगभग 11 महीने की प्रक्रिया, जिसमें नागरिकों की सहमति, असहमति संसदीय समिति के विचार आदि के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया.

 



इस अधिनियम के लक्ष्य में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन देना. यदि इस उद्देश्य पर विचार किया जाये तो यह किसी एक वर्ग के प्रति भेदभाव जैसी स्थिति नहीं दिखाता है. इसके बाद भी इसे सामान्य वर्ग के विरुद्ध बताया जा रहा है, जिसके चलते देशभर में यह बिल चर्चा के केन्द्र में है. चर्चा के दौरान जो बात उभर कर सामने आई है वो दर्शाती है कि अधिनियम में जिस तरह के प्रावधान किये गए हैं उसके अनुसार इस विचार को मजबूती मिलती है कि सामान्य वर्ग के लोग भेदभाव के शिकार नहीं हो सकते बल्कि वे सिर्फ भेदभाव ही कर सकते हैं. इस सोच के पीछे वे तमाम अधिनियम हैं जिनका दुरूपयोग करके सामान्य वर्ग को परेशान किया जाता रहा है.

 



यह पूर्णतः सत्य है कि किसी भी समाज में, संस्था में किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान नहीं होना चाहिए और इससे भी किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि समाज से भेदभाव कम करने के प्रयास ज्यादा से ज्यादा होने चाहिए. इस सन्दर्भ में आयोग द्वारा जारी अधिसूचना को भी समझना आवश्यक हो जाता है. अधिनियम के बिन्दु 3 के अन्तर्गत विभिन्न सन्दर्भों को परिभाषित किया गया है, जिसमें 3ख में पीड़ित का सन्दर्भ ऐसे व्यक्ति से लगाया गया है जिसके पास इन विनियमों के अंतर्गत शिकायतों से सम्बंधित या जुड़े मामलों में कोई शिकायत है. इसमें भी जातिगत उल्लेख नहीं है अर्थात पीड़ित व्यक्ति किसी भी वर्ग का हो सकता है. इसके अतिरिक्त 3थ में हितधारक का अर्थ स्पष्ट किया गया है कि इसमें छात्र, संकाय सदस्यों, कर्मचारी और प्रबंध समिति के सदस्य, जिनमें उच्च शिक्षा संस्थान का प्रमुख भी शामिल है. एक बिन्दु 3ग अवश्य ऐसा है जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव को परिभाषित करता है. इस सम्बन्ध में शिकायत मिलने पर 24 घंटे में प्राथमिक कार्रवाई करनी होगी और 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होगी. आरोपी विद्यार्थी पर संस्थागत अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में पहले उसे चेतावनी दी जाएगी, इसके पश्चात् जुर्माना भी लगाया जा सकता है. गम्भीर मामलों में विद्यार्थी को शिक्षण संस्थान से निष्कासित भी किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त सामान्य भेदभाव में नस्ल, लिंग, धर्म, दिव्यांगता, जन्म-स्थान आदि को शामिल किया गया है. सामान्य वर्ग का व्यक्ति इस आधार पर अपने साथ होने वाले भेदभाव की शिकायत कर सकता है.

 



अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने की दृष्टि से प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समान अवसर केन्द्र की स्थापना करनी होगी. इसका कार्य वंचित समूहों के लिए नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रखना; शैक्षणिक, वित्तीय, सामाजिक एवं अन्य मामलों में मार्गदर्शन एवं परामर्श प्रदान करना; तथा परिसर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित करना होगा. प्रत्येक समान अवसर केन्द्र एक समता समिति के माध्यम से कार्य करेगा. यदि इस अधिनियम में बिन्दु 3ग के अलावा बिन्दु 7 खटकता है, जो कहता है कि समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. यह बिन्दु भी इनके होने की अनिवार्यता की बात नहीं करता है. इस अधिनियम का दुर्भाग्यपूर्ण बिन्दु यह माना जाना चाहिए कि झूठी शिकायत मिलने पर सम्बंधित व्यक्ति के लिए किसी भी तरह की सजा, जुर्माना अथवा कार्यवाही का प्रावधान नहीं किया गया है. यद्यपि मसौदा नियमों में इसका प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हतोत्साहित किया जाए और इसके लिए जुर्माने का भी प्रावधान रखा गया था तथापि अंतिम अधिसूचित नियमों में यूजीसी ने इस प्रावधान को हटा दिया और अन्य पिछड़ा वर्ग को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल कर लिया. इस कारण यूजीसी का वर्तमान अधिनियम न केवल बेहद सख्त हो जाता है बल्कि अन्यायपूर्ण भी समझ आने लगता है.

 




अतः आवश्यकता इस बात की है कि इस अधिनियम पर जल्दबाजी अथवा उतावलेपन में विरोध के बजाय व्यापक विमर्श, पारदर्शिता और हितधारकों से संवाद के साथ इसका स्वरूप निर्धारित किया जाए. शिक्षा सुधार का लक्ष्य जाति-आधारित भेदभाव नहीं बल्कि स्वतंत्र, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. यूजीसी को भी जनमानस के विचारों का सम्मान करते हुए इस पर पुनर्विचार करना चाहिए. यह न केवल वर्तमान समय की माँग है बल्कि देश के शैक्षणिक भविष्य के लिए आवश्यक भी है. ध्यान रखना चाहिए कि एक वर्ग के साथ सम्भावित भेदभाव को दूर करने के प्रयास में दूसरा वर्ग भेदभाव का शिकार न हो जाये.

 


05 नवंबर 2025

नैक के प्रति सुस्त चाल

भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों (कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि) का मूल्यांकन और प्रमाणन का कार्य राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (National Assessment and Accreditation Council) द्वारा किया जाता है. संक्षेप में इसे नैक से सम्बोधित किया जाता है. यह यूजीसी का एक स्वायत्त निकाय है जिसकी स्थापना 1994 में हुई थी. नैक के द्वारा गुणवत्ता के मानकों के अनुरूप संस्थानों की ग्रेडिंग करना है. ऐसा किये जाने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि विद्यार्थियों को सही संस्थान चुनने में मदद मिले.

 

नैक के मुख्य कार्यों और उद्देश्यों में शैक्षणिक संस्थाओं की मान्यता को उनके मूल्यांकन के आधार पर की गई ग्रेडिंग से किया जाना है. शिक्षण क्षेत्र में उच्च शिक्षा से सम्बंधित संस्थाओं, चाहे वे महाविद्यालय हों अथवा विश्वविद्यालय सभी का मूल्यांकन नैक द्वारा किया जाता है.

 

इसके माध्यम से सुनिश्चित किया जाता है कि संस्थान गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं अथवा नहीं. इन मानकों में पाठ्यक्रम, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, अनुसंधान, बुनियादी ढाँचा आदि के साथ-साथ अध्यापकों और विद्यार्थियों से सम्बंधित सुविधाओं और मूलभूत ढाँचे को शामिल किया जाता है.

 



विगत वर्षों में नैक को लेकर लगातार उठाये जाने वाले कदमों के बाद भी उच्च शिक्षण संस्थाओं में नैक मूल्यांकन करवाने को लेकर जागरूकता न के बराबर है. नैक मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कदम उठा रहा है. इसके लिए उसके द्वारा ऑनलाइन और हाइब्रिड मॉडल जैसी नई रणनीतियाँ शामिल हैं किन्तु निजी संस्थाएँ हों अथवा सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएँ, सभी नैक करवाने में अभी बहुत पीछे हैं. उत्तर प्रदेश में यह स्थिति तो और भी सोचनीय है. 

 


01 नवंबर 2025

MMTTP के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान

MMTTP के द्वारा करवाये जाने कोर्स/प्रोग्राम के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान यूजीसी की तरफ़ से किया गया है.



मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम (MMTTP) का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण पद्धतियों और नेतृत्व कौशल से सशक्त बनाना है. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की सिफारिशों को लागू करने पर केन्द्रित है. इस प्रशिक्षण का लक्ष्य शिक्षकों की क्षमताओं को बढ़ाना और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है. इसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह के प्रशिक्षण शामिल किये गए हैं. 


बहुत सी संस्थाओं में देखने में आ रहा है कि इस कोर्स में सहभागिता करने वाले प्राध्यापकों को उन उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्राचार्यों द्वारा अवकाश प्रदान नहीं किया जा रहा है. ऐसे में प्राध्यापकों द्वारा अध्यापन कार्य के लिए संस्था में उपस्थित रहने के दौरान ही इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करना पड़ता है. ऐसे में जहाँ अध्यापन कार्य भी प्रभावित होता है वहीं इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्देश्य में भी बाधा उत्पन्न होती है. 


इसी को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करने पर अवकाश का प्रावधान किया गया है. 


05 मई 2025

शासनादेश के नाम पर तुगलकी फरमान

लाल बुझक्कड़ का नाम तो सुना होगा? ऐसे ही एक नाम और सुना होगा चतुर सुजान? इन दोनों नामों के साथ अनगिनत किस्से जुड़े हुए हैं, बेवकूफी भरे.

 

ऐसे ही एक महाशय हैं, इन दोनों नामों का संयुक्त उपक्रम/उद्यम (वैसे संयुक्त ऊधम भी कहा जा सकता है). वैश्विक स्तर की अचूक बेइज्जती सहने वाले इन चतुर सुजान-लाल बुझक्कड़ को आये दिन भसड़ करने की आदत है. इस भसड़ में इसे आये दिन 'मौखिक आदेश' भी मिल जाता है.

 

आजकल एक ऐसी ही भसड़ फैला रखी है. चित्र में दर्शाया गया पत्र सात पेज का है. यह पत्र दिनांक 10 फरवरी 2025 को उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव की ओर से उत्तर प्रदेश शासन के समस्त अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को लिखा गया है. प्रतिलिपि जिन दस लोगों को की गई है, उसमें कहीं भी निदेशालय का जिक्र नहीं है.

 

बहरहाल, लाल बुझक्कड़-चतुर सुजान की मिक्स ब्रीड (वर्णसंकर प्रजाति) खेलने में लगी है.

 



12 फ़रवरी 2025

यूजीसी केयर लिस्ट की समाप्ति

शोध पत्रिकाओं (रिसर्च जर्नल्स) की यूजीसी केयर सूची को बंद करने और सहकर्मी-समीक्षित पत्रिकाओं के लिए पैरामीटर विकसित करने के संबंध में यूजीसी की सार्वजनिक सूचना




14 दिसंबर 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लेकर गम्भीरता नहीं

नई शिक्षा नीति 2020 (NEP) के लागू होने के साथ ही महाविद्यालय में क्रियान्वयन समिति के प्रभारी का दायित्व मिला था. तत्कालीन प्राचार्य डॉ. ए.के. सक्सेना जी द्वारा सदस्यों के चयन और नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन हेतु यथोचित कदम अपनाए जाने हेतु पूरी स्वतंत्रता प्रदान की गई थी. उस समय NEP का पूरी समिति द्वारा पर्याप्त अध्ययन किया गया. महाविद्यालय स्तर पर उसके क्रियान्वयन, पाठ्यक्रम सम्बन्धी बदलाव, परीक्षा सम्बन्धी प्रक्रिया आदि पर पूरी समिति द्वारा गहन मंत्रणा, विचार-विमर्श के आधार पर समझ आया कि एक अच्छी शिक्षा नीति विद्यार्थियों के लिए व्यावहारिक रूप में सामने आई है.

 



विगत चार वर्षों की शासन-प्रशासन की कार्य-शैली, प्रणाली को देखकर लग रहा है कि ऐसी नीति को वास्तविक रूप प्रदान करने लायक वातावरण अभी बुन्देलखण्ड क्षेत्र में नहीं है. न केवल विश्वविद्यालय स्तर से बल्कि महाविद्यालय स्तर से भी किसी भी तरह की गम्भीरता नहीं दिखाई जा रही है. विद्यार्थियों के प्रवेश, पाठ्यक्रम, माइनर विषय, मिड टर्म परीक्षा, सेमेस्टर परीक्षा आदि को लेकर किसी भी तरह का सकारात्मक माहौल नहीं है. एक अच्छी, सकारात्मक शिक्षा नीति की दुर्दशा होते हुए अपने क्षेत्र में देखी जा रही है, देखने की विवशता भी है. उच्चाधिकारियों को कई बार लिखा भी है, सुझाव भी दिए हैं, कमियों से परिचित करवाया है मगर सिवाय अनदेखी के, आलोचना के, दोषारोपण के कुछ नहीं मिला है.

 

विषम सेमेस्टर के प्रवेश, परीक्षा को लेकर खिलवाड़ जारी है.

 


13 अक्टूबर 2024

शोध-आलेखों में सन्दर्भ लेखन

अकादमिक क्षेत्र में लेखन का बहुत महत्त्व है. वर्तमान में अनेक नीतियों के चलते न केवल शोधार्थियों के लिए बल्कि प्राध्यापकों के लिए भी लेखन महत्त्वपूर्ण हो गया है. जहाँ शोधार्थियों के शोध-कार्य हेतु शोधपरक लेखन को अनिवार्य जैसा किया गया है वहीं उच्च शिक्षा क्षेत्र से सम्बंधित प्राध्यापकों के लिए शोधपरक लेखन को उनकी अकादमिक योग्यता से जोड़ दिया गया है. शोध कर रहे विद्यार्थियों के लिए तो अपने शोध ग्रन्थ को लिखते समय उनसे अपेक्षा ही की जाती थी कि वे शोधपरक आलेख लिखेंगे. अब प्राध्यापक वर्ग के लिए भी एक तरह की अनिवार्यता लगा दी गई है कि वे अपनी अकादमिक प्रोन्नति हेतु स्वयं भी शोधपरक लेखन हेतु तत्पर रहेंगे. शोधपरक लेखन को, उसके प्रकाशन को प्राध्यापक वर्ग हेतु उनके मूल्यांकन से जोड़ दिया गया है. अब इनकी अकादमिक प्रोन्नति हेतु, उनकी अकादमिक योग्यता के लिए एपीआई के लिए लेखन को, शोधपरक लेखन को वरीयता दी जा रही है.

 

आलेख और शोध-आलेख में बहुत बड़ा अंतर नहीं है. इसे मात्र इतने से परिचयात्मक रूप में समझा जा सकता है कि जिस आलेख के साथ सन्दर्भ जुड़े हुए हैं, उसे शोध-आलेख कहते हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि उस आलेख में अपनी बात को प्रामाणिक ढंग से कहा गया है अथवा किसी तरह की शोध का उल्लेख किया गया है. इसके अलावा सन्दर्भ रहने पर आलेख विश्वसनीय बन जाता है. किसी आलेख में सन्दर्भों का होना उस लेखक के शोध कार्य को भी प्रमाणित करते हुए विश्वसनीय बनाता है. इसके साथ-साथ आलेख में सन्दर्भों का होना लेखक की लेखकीय योग्यता को, उसकी क्षमता को, प्रतिभा को, मेहनत को भी प्रदर्शित करता है.

 



सन्दर्भों के होने की स्थिति के साथ-साथ अक्सर न केवल शोधार्थियों में बल्कि प्राध्यापकों में भी इसे लेकर संशय की स्थिति रहती है कि उनके द्वारा सन्दर्भों का उल्लेख कहाँ किया जाये, किस तरह किया जाये? ये समस्या अब और जटिल होती समझ आने लगी है जबकि शोध कार्यों को लेकर, शोध-प्रबंधों को लेकर, शोध-आलेखों को लेकर लगातार एकसमान नीति पर जोर दिया जाने लगा है. शोध-आलेख के साथ सन्दर्भ लिखने के कुछ अलग-अलग तरीके लेखकों द्वारा प्रयोग में लाये जाते रहे हैं. कुछ लेखक आलेख में यथास्थान सन्दर्भों का उल्लेख करते हैं. ऐसा करने पर पाठकों के लिए अवरोध उत्पन्न होता है. इस अवरोध का बचाव करने के लिए सन्दर्भों को शोध-आलेख के अंत में अथवा प्रत्येक पृष्ठ पर सबसे नीचे दिए जाने की व्यवस्था को एकसमान रूप से स्वीकार किया गया. ऐसे सन्दर्भ जो प्रत्येक पृष्ठ पर नीचे दिए जाते हैं, उन्हें पाद-टिप्पणी/फुटनोट (Footnote) कहते हैं और जो सन्दर्भ आलेख के अन्त में एक ही जगह दिए जाते हैं उनको अन्त-टिप्पणी/एंडनोट (Endnote) कहते हैं. शोध-आलेखों की प्रमाणिकता, महत्ता के लिए इस तरह के दो सन्दर्भों में से किसी एक सन्दर्भ का होना आवश्यक है. बिना सन्दर्भ के लिखे गए लेख को शोध-आलेख के रूप में मान्यता नहीं मिलती है. ऐसे आलेख की कोई विश्वसनीयता भी नहीं होती है.

 

किसी भी शोध-आलेख में सन्दर्भों को कई जगहों से एकत्र किया जाता है. कई सन्दर्भ पुस्तकों से लिए जाते हैं तो बहुत से सन्दर्भों को शोध-पत्रिकाओं से लिया जाता है. वर्तमान में इंटरनेट का बहुतायत उपयोग होने के कारण से अनेक वेबसाइट भी सामग्री संग्रहण के काम आती हैं. शोध-आलेखों में उनका भी सन्दर्भ देना आवश्यक होता है. ऐसी स्थिति में कई बार शोधार्थियों के समक्ष, लेखकों के समक्ष, प्राध्यापकों के समक्ष समस्या आती है कि इन विभिन्न माध्यमों से एकत्र किये गए सन्दर्भों का उल्लेख कैसे किया जाये? एकरूपता की दृष्टि से भी ये आवश्यक हो जाता है कि शोध-आलेख में सन्दर्भों को एकसमान रूप से लिखा जाये.

 

यहाँ पुस्तकों, शोध-पत्रिकाओं, इंटरनेट पर उपलब्ध वेबसाइट से ली गई सामग्री, आँकड़ों आदि के सन्दर्भ को लिखने का ढंग कुछ इस प्रकार से अपनाया जा सकता है. यदि सन्दर्भ पुस्तक से लिए गए हैं तो उनके लिखने का तरीका इस प्रकार होगा. सबसे पहले पुस्तक के लेखक का नाम लिखा जायेगा, इसमें भी उपनाम पहले लिखा जायेगा फिर नाम. इसके बाद पुस्तक के प्रकाशन का वर्ष लिखा जाता है. प्रकाशन वर्ष लिखने के बाद बोल्ड फॉर्मेट में पुस्तक का नाम दिया जायेगा. इसके पश्चात् पुस्तक के प्रकाशन का स्थान और फिर पुस्तक के प्रकाशक का नाम आता है. सन्दर्भ लिखने के क्रम में सबसे अंत में पृष्ठ संख्या लिखना होता है. इसे इस उदाहरण से और आसानी से समझा जा सकता है.

सेंगर, कुमारेन्द्र सिंह (डॉ.), 2009, पत्रकारिता के सन्दर्भ, उरई (उ.प्र.), बुन्देलखण्ड प्रकाशन, पृ. 97

 

पुस्तकों के साथ-साथ शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेखों से भी सामग्री को लिया जाता है. ऐसे में इनका सन्दर्भ देने में क्रम कुछ इस तरह से रखते हैं. पुस्तक की तरह ही यहाँ सबसे पहले लेखक का नाम लिखा जाता है, इसमें भी उपनाम को पहले लिखते हैं फिर लेखक का नाम, इसके बाद आलेख के प्रकाशन का वर्ष लिखा जाता है. प्रकाशन वर्ष लिखने के बाद सम्बंधित आलेख का शीर्षक लिखा जाता है, जिससे सामग्री को लिया गया है. जिस पत्र, पत्रिका अथवा संकलन में वह आलेख प्रकाशित है उसका नाम वोल्ड फॉर्मेट में लिखा जाता है. इसके बाद पत्रिका की अंक संख्या, पत्रिका प्रकाशक का नाम और फिर पत्रिका के प्रकाशन का स्थान लिखा जाता है. क्रम लिखने में सबसे अंत में पृष्ठ संख्या लिखते हैं. इसे निम्न उदाहरण से सहजता से समझा जा सकता है.

सेंगर, कुमारेन्द्र सिंह (डॉ.), 2010, वृन्दावन लाला वर्मा के साहित्य में सौन्दर्य-बोधमेनिफेस्टो (शोधपत्रिका), Vol.II, अंक- 2, समाज अध्ययन केन्द्र, उरई, पृ. 94.

 

वर्तमान दौर में तकनीक के उपयोग से इनकार नहीं किया जा सकता है. ऐसे में शोध-सामग्री को बहुत सी वेबसाइट से भी एकत्र किया जाता है. वेबसाइट से ली गई सामग्री का सन्दर्भ भी देना चाहिए. इससे शोध-आलेख की प्रमाणिकता बनी रहती है. इसके लिए सबसे पहले इस वेबसाइट की लिंक, जिसे यूआरएल कहा जाता है उसे लिखा जाता है, इसके बाद जिस तारीख को सम्बंधित वेबसाइट से सामग्री को लिया गया उसे लिखना होगा है. उदाहरण के लिए निम्नवत को देख सकते है.

https://dastawez.blogspot.com/2022/02/blog-post_28.html (दिनांक 19-09-2023 को देखा गया.)

 

हिन्दी भाषा के शोध-आलेखों के लिए पिछले कुछ समय से सर्वमान्य रूप में सन्दर्भों को इस रूप में लिखा जा रहा है, स्वीकारा जा रहा है. बावजूद इसके शोधार्थी और प्राध्यापकगण अपने-अपने क्षेत्र, शैक्षणिक संस्थान के नियमानुसार इसकी जाँच करके ही अपने शोध-आलेखों में सन्दर्भ लेखन करें.

 

ये आलेख सूचना, जानकारी मात्र के लिए है.


14 सितंबर 2024

प्राध्यापकों का अनूठा विरोध प्रदर्शन

सत्ताएँ, कुर्सियाँ, प्राधिकारी जब अपने-अपने दायित्वों से च्युत होने लगते हैं, हो जाते हैं तो उनको अपनी आवाज़ सुनाने के लिए प्रताड़ित पक्ष को कुछ न कुछ कदम उठाने ही पड़ते हैं. अक्सर प्रताड़ित पक्ष अपनी अवहेलना के कारण, अपने कार्य में प्रगति होता न देख क्षुब्ध होकर क्रोधवश ऐसे कदम उठा लेता है जिसे सहज रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है. ये जानते हुए भी कि विरोधात्मक कदम उठाने वाला पक्ष अपनी ओर से कतई गलत नहीं है मगर समाज आदर्शात्मक रूप में ऐसे किसी भी कदम का समर्थन नहीं करता है जो कि किसी भी तरह के आदर्श का ध्वंस करते हों, किसी भी तरह से सामाजिक व्यवस्था में अवरोध पैदा करते हों. यह बिन्दु उस समय और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है जबकि विरोध का मुद्दा शिक्षित वर्ग से जुड़ा हो, शिक्षकों से सम्बंधित हो. इस को ध्यान में रखते हुए गांधी महाविद्यालय, उरई के प्राध्यापकों ने व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ भी उठाई और विरोध करने का, अपनी नाराजगी को प्रदर्शित करने का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया.

 




विरोध का, नाराजगी का मामला चूँकि महाविद्यालय के प्राध्यापकों से जुड़ा हुआ था, ऐसे में उनके द्वारा ऐसे किसी भी कदम को गलत ठहराया जा सकता था, जिससे किसी व्यवस्था में अव्यवस्था उत्पन्न होने लगे. गुरुतर दायित्व-बोध का भान होने के कारण प्राध्यापकों द्वारा किये गए विरोध प्रदर्शन से महाविद्यालय के किसी भी कार्य में किसी भी तरह की रुकावट नहीं आई. महाविद्यालय में जिन कक्षाओं में अध्यापन कार्य चल रहा था, उन कक्षाओं का सञ्चालन भी सुचारू रूप से होता रहा. स्नातक और परास्नातक कक्षाओं में नवीन सत्र हेतु प्रवेश प्रक्रिया भी संचालित है, प्राध्यापकों ने इसका भी ध्यान रखा और उनके विरोधात्मक कदम के बाद भी विद्यार्थियों के प्रवेश सम्बंधित कक्षाओं में होते रहे. कार्यालयीन कार्य भी यथोचित रूप से संपन्न होते रहे.

 

आपको बताते चलें कि महाविद्यालयों में कैरियर एडवांसमेंट स्कीम के अन्तर्गत प्राध्यापकों की प्रोन्नति प्रक्रिया को अपनाया जाता है. इस प्रक्रिया के अंतर्गत प्रोन्नति के नियमों और सेवा-शर्तों को पूरा करने वाले प्राध्यापकों को निश्चित प्रारूप में अपना आवेदन समस्त अभिलेखों के साथ प्राचार्य कार्यालय में जमा करना पड़ता है. गांधी महाविद्यालय, उरई के दस प्राध्यापकों द्वारा यथोचित सेवा-शर्तों को पूरा करने के बाद अपनी प्रोन्नति सम्बन्धी आवेदन की फाइल को समस्त दस्तावेजों के साथ गत वर्ष, 2023 में 15 सितम्बर को प्राचार्य कार्यालय में जमा किया गया था. उसके बाद से अद्यतन सम्बंधित प्राधिकारी द्वारा, प्राचार्य द्वारा कोई आधिकारिक जानकारी किसी भी प्राध्यापक को नहीं दी गई और न ही इस सम्बन्ध में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा गठित साक्षात्कार पैनल को आधिकारीक ढंग से सूचित किया गया. सम्बंधित उच्चाधिकारी, प्राधिकारी की इस तरह की कार्य-संस्कृति के चलते पूरा एक वर्ष हो जाने के बाद भी वे दस प्राध्यापक अपनी प्रोन्नति की राह ताकने में लगे हैं.

 


इस तरह की कार्य-संस्कृति, कार्य-प्रणाली से क्षुब्ध होकर उन दस प्राध्यापकों के साथ-साथ अन्य जागरूक प्राध्यापकों ने विरोध का, अपनी नाराजगी प्रदर्शित करने का एक नया तरीका अपनाया. इस विरोध प्रदर्शन में सम्बंधित प्राध्यापकों ने एक वर्ष से फाइलों की स्थिति में प्रगति ने देखते हुए प्राचार्य कार्यालय में फाइल जमा करने की पहली वर्षगाँठ मनाई. अवसर भले ही विरोध करने का रहा, भले ही नाराजगी दिखाने का था, प्राचार्य की उदासीन कार्य-प्रणाली के विरुद्ध था मगर किसी भी तरह का तो शोर-शराबा किया गया, न किसी तरह की नारेबाजी की गई, न किसी तरह से कक्षाओं में अध्यापन कार्य को बाधित किया गया. नारेबाजी, शोरगुल, हंगामा आदि से उलट इस अवसर पर प्राध्यापकों द्वारा केक काट कर अपना विरोध जताया गया. केक के साथ-साथ महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापकों, कर्मचारियों को जलपान भी करवाया गया. इसमें भी प्राध्यापकों ने गंभीरतापूर्वक व्यवहार अपनाते हुए इस बात का ध्यान रखा कि महाविद्यालय का अध्यापन अथवा कार्यालयीन कार्य बाधित न हो, इसलिए सभी विभागों में जलपान पहुँचाये जाने की व्यवस्था की गई.

 





महाविद्यालय के प्राध्यापकों ने इस अवसर पर कहा कि वे लोग शिक्षित वर्ग से आते हैं, शिक्षा देने का कार्य करते हैं. और तो और शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है, ऐसे में उनके द्वारा विरोध के तरीके से एक तरह का सन्देश भी देना उनका उद्देश्य था, साथ ही विद्यार्थियों में भी चेतनात्मक विकास करवाना था. आज विरोध, अनशन के नाम पर देश की, समाज की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है, समाज में अराजकता फैलाई जाती है, यह सब नकारात्मक प्रवृत्ति का परिचायक है. उन्होंने अपने इस तरह के शालीन, सभ्य, शांत विरोधात्मक कदम के द्वारा प्रयास किया है कि अपने दायित्वों, कार्यों के प्रति उदासीन प्राचार्य, प्राधिकारी संभवतः जाग सकें. प्राध्यापकों ने कहा कि प्रोन्नति के इस मुद्दे के साथ-साथ एनपीएस का मुद्दा भी उनके महाविद्यालय में उलझा हुआ है. इसके लिए भी प्राध्यापकों और कर्मियों द्वारा इसी तरह से शालीन, सभ्य विरोध प्रदर्शन करके उदाहरण निर्मित किया जायेगा.

 




विरोध प्रदर्शन के इस अवसर पर शिक्षक संघ अध्यक्ष रोहित कुमार पाठक, महामंत्री डॉ. धर्मेन्द्र कुमार, पूर्व नैक प्रभारी डॉ. ऋचा सिंह राठौर, पूर्व आईक्यूएसी संयोजक डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर, डॉ. सुनीता गुप्ता, डॉ. ऋचा पटैरिया, प्रीति परमार, डॉ. मोनू मिश्रा, डॉ. के.के. गुप्ता, डॉ. के.के. त्रिपाठी, डॉ. मसऊद अंसारी, डॉ. कंचन दीक्षित, डॉ. इन्द्रमणि दूबे, डॉ. संदीप श्रीवास्तव, डॉ. शिवसंपत्त द्विवेदी, डॉ. वंदना सिंह, डॉ. विश्वप्रभा त्रिपाठी, कश्यप पालीवाल, महेन्द्र सिंह आदि उपस्थित रहे.         




23 जून 2024

प्राचार्य समस्या के सम्बन्ध में पत्र

दिनांक 06.05.2024 के इस पत्र को मिलने के बाद कुछ कार्यवाहक ऐसे नाचने में मगन हैं जैसे उनके नाम वसीयत कर दी गई हो. उनसे ज्यादा उनके लगुआ-भगुआ ठुमके मार रहे हैं. 


पत्र को पढ़ें, कम से कम जो हिस्से रंगीन किये गए हैं, उनको विशेष रूप से पढ़ें.


==>> आवश्यक/अनिवार्य............. इसका अर्थ क्या निकाला जाये?

==>> प्राचार्यों की नियुक्ति के बारे में दो बार साफ़-साफ़ लिखा गया है. स्पष्ट है कि कार्यवाहक/अस्थायी टाइप के प्राचार्य उचकने का प्रयास न करें.

==>> पाँच घंटे की बैठकी तो लगभग सभी लोग कर रहे हैं. हाँ, कार्यवाहक प्राचार्य की ही गैंग के कुछ लोग ऐसा नहीं कर रहे थे. (कहो तो नाम लिख दें?)

==>> बाकी परीक्षा समय में बायोमैट्रिक सम्बन्धी या पाँच घंटे सम्बन्धी कोई नियम इस पत्र में नहीं है. इसलिए परीक्षा समय में अनावश्यक बकबकाने की कोशिश न की जाये.

==>> और अंत में, यह पत्र किसी तरह का आदेश नहीं बल्कि प्राचार्य परिषद् के अध्यक्ष/महामंत्री के लिए एक तरह से सूचनार्थ लिखा गया है. इसके साथ-साथ क्षेत्रीय अधिकारियों को यह पत्र बायोमैट्रिक उपस्थिति और छात्र-निधि सम्बन्धी निर्गत शासनादेशों का अनुपालन करवाए जाने के सम्बन्ध में लिखा गया है.

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उक्त के सम्बन्ध में कार्यवाहक प्राचार्य खुद को खुदा न समझें और कमजोर दिल के प्राध्यापक घबरा कर कार्डियोलोजी में भर्ती होने न चले जाएँ. 




27 अप्रैल 2024

शोध कार्य में गुणवत्ता की सम्भावना?

उच्च शिक्षा क्षेत्र में सक्रियता से अपनी भूमिका का निर्वहन करता विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) इस क्षेत्र में गुणवत्ता बनाये रखने हेतु कदम उठाता रहता है. शोध कार्य को लेकर यूजीसी द्वारा विशेष रूप से कार्य किया जा रहा है. उच्च शिक्षा से सम्बद्ध संस्थानों में अध्यापन के साथ-साथ शोध कार्य को लेकर अनेक सुधार किये गए. अनेक सुधारात्मक उपायों के बीच अभी हाल ही में यूजीसी द्वारा एक बड़ा निर्णय लेते हुए पी-एच.डी. के लिए अब राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है. अभी तक नेट परीक्षा के माध्यम से दो श्रेणियों में परीक्षार्थी उत्तीर्ण होते थे. इसके माध्यम से एक तरफ जेआरएफ के लिए विद्यार्थी चयनित किये जाते थे, दूसरी तरफ उत्तीर्ण विद्यार्थी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर पद की पात्रता प्राप्त कर लेते थे. यूजीसी के इस नए बदलाव के बाद नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों की एक तीसरी श्रेणी भी अस्तित्व में आ गई है. अब नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों को पी-एच.डी. करने की पात्रता भी प्राप्त हो सकेगी. जून 2024 की नेट परीक्षा के लिए यूजीसी द्वारा जारी अधिसूचना में इस बदलाव को शामिल किया गया है.

 

विगत कुछ वर्षों से पी-एच.डी. में नामांकन हेतु विश्वविद्यालय स्तर पर प्रवेश परीक्षा का आयोजन करवाया जा रहा है. इसमें चयनित विद्यार्थी ही पी-एच.डी. हेतु अपना नामांकन करवा पाता है. इधर देखने में आ रहा था कि बहुत से विश्वविद्यालय समय से पी-एच.डी. हेतु परीक्षा का आयोजन नहीं करवा रहे हैं. इसके अलावा यह भी देखने में आया कि पी-एच.डी. में प्रवेश को लेकर यथोचित मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है. इससे ऐसे लोगों द्वारा अनावश्यक रूप से प्रवेश लिया जा रहा है जिनका न तो शोध से कोई लेना-देना है और न ही उच्च शिक्षा से. ऐसी स्थिति के चलते यूजीसी शोध कार्य में गुणवत्ता और उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार की जिस व्यवस्था को लागू करना चाह रही है, वह भी पूरी नहीं हो पा रही है. इसे देखते हुए नेट परीक्षा के माध्यम से पी-एच.डी. करने की नई व्यवस्था लागू किये जाने के साथ ही यूजीसी ने विश्वविद्यालयों द्वारा ली जाने वाली प्रवेश परीक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है.

 



यूजीसी द्वारा नेट के माध्यम से पी-एच.डी. हेतु नामांकन की व्यवस्था किये जाने से निश्चित रूप से उन विद्यार्थियों को प्रोत्साहन मिलेगा जो वास्तविकता में इसके लिए अपना नामांकन चाहते हैं. इस व्यवस्था से उन विद्यार्थियों का विभिन्न विश्वविद्यालयों की पी-एच.डी. सम्बन्धी प्रवेश परीक्षाओं हेतु भटकने से बचना होगा जो वास्तविक रूप में उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन कार्य को अपना लक्ष्य बनाये हुए हैं. नेट परीक्षा के माध्यम से जहाँ वे असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने की पात्रता प्राप्त कर लेंगे वहीं पी-एच.डी. हेतु भी अपना नामांकन करवा सकेंगे. इस व्यवस्था के लागू होने के बाद भी यह निर्विवाद रूप से नहीं कहा जा सकता है कि इसके द्वारा शोध कार्यों में गुणवत्ता का विकास होगा. यूजीसी द्वारा भले ही पी-एच.डी. को शोध कार्य हेतु एक प्रक्रिया माना जाता हो मगर समाज में आज भी इसे महज एक उपाधि मानकर औपचारिकता को पूरा किया जाता है. मौलिक शोध कार्य को वरीयता देने से अधिक महत्त्व नाम के साथ डॉक्टरेट उपाधि का लग जाना रहता है.

 

देखा जाये तो आज भी कला, साहित्य, मानविकी आदि विषयों में इस प्रकार के शोध कार्य नहीं हो रहे हैं जिनके द्वारा समाज को एक दिशा दी जा सके. समाज के मुख्य बिन्दुओं, समाज की समस्याओं, दैनिक जीवन में सहयोगी होने वाले विषयों आदि से सम्बंधित शोध कार्य हेतु प्रोत्साहन भी नहीं दिया जाता है. ऐसे में इन क्षेत्रों में शोध कार्य को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता है. पी-एच.डी. के लिए किया जाने वाला शोध कार्य महज एक पुस्तकीय संस्करण बन कर रह जाता है. यदि शोध कार्य व्यक्ति के कैरियर के लिए होगा, उसकी एपीआई बढ़ाने के लिए होगा, उसकी प्रोन्नति के लिए आवश्यक होगा तो शोध कार्य में गुणवत्ता कैसे आएगी?  बावजूद इसके, इस नई व्यवस्था से शोध कार्य में गुणवत्ता के, योग्यता के आने की सम्भावना देखनी चाहिए लेकिन उसके लिए यूजीसी को कुछ सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है.

 

भले ही नेट की परीक्षा उत्तीर्ण करना विद्यार्थियों के लिए सदैव से चुनौती रहा हो मगर इसके द्वारा गुणवत्ता को बढ़ाने वाली योग्यता का चयन ही होगा, ऐसा कहना मुश्किल है. शोध कार्य की गुणवत्ता के लिए ऐसे योग्य विद्यार्थियों का चयन किये जाने की आवश्यकता है जिनकी रुचि शोध कार्य में हो. नेट परीक्षा आरम्भ से ही असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने की पात्रता मात्र रही है, अब यह पी-एच.डी. करवाने की पात्रता भी बन गई है. इससे शोध कार्य में गुणवत्ता के आने की, उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार की सम्भावना न के बराबर ही है. यदि यूजीसी वाकई शोध कार्य में गुणवत्ता चाहती है तो उसे शोध कार्य हेतु एक अलग मार्ग निर्धारित करना होगा. जहाँ किताबी शोध कार्य के बजाय समाज के बीच जाकर शोध कार्य करवाया जाये. शोध कार्य इस तरह का हो जिससे आमजन के जीवन में सकारात्मकता आये, लोगों को एक दिशा मिले, कार्योंन्मुख जीवन-शैली का विकास हो, तब तो शोध कार्य की सार्थकता समझ आती है. यदि ऐसा करने में कोई भी शोध कार्य सफल नहीं होता है तो निस्संदेह वह कार्य महज उपाधि प्राप्ति का ही साधन मात्र बना रहेगा फिर भले ही उसे नेट परीक्षा के माध्यम से करवाया जाये या किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षा के द्वारा.  





 

18 फ़रवरी 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ खिलवाड़

बँधी-बँधाई लकीर पीटने वाले, मूढ़ बुद्धि वाले, ख़ुद को एकमात्र ज्ञानवान समझने वाले यदि किसी भी नीति, योजना आदि को क्रियान्वित करने वाले हों तो किसी भी अच्छी से अच्छी नीति, योजना का बंटाधार होना निश्चित है. कुछ ऐसा ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ हो रहा है.


बाक़ी जगहों की बहुत ज़्यादा व्यावहारिक जानकारी नहीं मगर बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में ऐसा ही हो रहा है. आये दिन एनईपी 2020 से सम्बन्धित आने वाले आदेशों, नियमों, दिशा-निर्देशों में किसी भी रूप में स्पष्टता देखने को नहीं मिलती. व्यावहारिक रूप से इनका पालन करना कठिन होता है. इस कठिनाई को बहुसंख्यक महाविद्यालयों के प्राचार्य और भी बढ़ा देते हैं.




पिछले वर्ष एक आदेश आया था, सतत आंतरिक मूल्यांकन में विद्यार्थी को न्यूनतम 15 अंक अनिवार्यतः देने के सम्बन्ध में. इस पर तबसे लेकर आजतक विवाद, भ्रम की स्थिति बनी है. बहुतेरे महाविद्यालयों में अनुपस्थित विद्यार्थियों को भी 15 अंक देने का दबाव प्राचार्यों द्वारा बनाया जा रहा है. इस बारे में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है कि आख़िर अनुपस्थित विद्यार्थी को अंक कैसे दिये जाएँ?


इस तरह के आदेश प्रोजेक्ट को लेकर, लघु शोध प्रबंध को लेकर, क्षेत्रीय भ्रमण/सर्वेक्षण को लेकर, माइनर विषयों को लेकर भी आते रहे हैं, जो भ्रम, विवाद ही पैदा करते आ रहे हैं. इस बारे में न तो बहुत से प्राचार्यों द्वारा कोई जानकारी ली जा रही है और न ही विश्वविद्यालय द्वारा स्पष्ट नीति बनाई जा रही है.


वैसे, देखने में आ रहा है कि अब अपने उच्चाधिकारियों से चर्चा करने में, विमर्श करने में शिक्षक भी घबराने लगे हैं. अपने आपको विश्वासी, सक्षम बनाने में असफल ऐसे अनेकानेक शिक्षक विद्यार्थियों को कैसे विश्वासी, सक्षम बना सकेंगे?

 






 

10 फ़रवरी 2024

मित्रों की ताकत से चलती उठापटक

आज एक बहुत पुराने मित्र से मुलाक़ात हुई. यहाँ उनसे मिलना विशेष नहीं क्योंकि हम लोग एक ही शहर में हैं, एक ही कार्यक्षेत्र में हैं, इसके अलावा विशेष बात ये है कि हम दोनों मित्र हैं, इस कारण मुलाकात होती ही रहती है. आज मुलाकात में और भी तमाम बातों के साथ-साथ अपने-अपने कार्यक्षेत्र के बारे में चर्चा चल पड़ी. जनपद के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों में आलम ये है कि कहीं-कहीं प्रबंधकों की मनमर्जी है तो कहीं प्राचार्यों की. कहीं-कहीं तो अतिशय स्थिति है, वहाँ चपरासियों, बाबुओं का बोलबाला है. बहरहाल, हम मित्रों की बातचीत में अनायास ही परीक्षाओं, ड्यूटी, शिक्षा, महाविद्यालय, विद्यार्थियों की उपस्थिति, प्राचार्यों के क्रियाकलापों, एनईपी 2020, माइनर विषयों आदि-आदि का जिक्र चल गया.

 

अपने-अपने कॉलेज के अपने-अपने कार्यों की चर्चा हुई. चूँकि वे हमारे मित्र हैं बहुत पुराने, इसलिए हमारी आदतों, स्वभाव से परिचित हैं. हमारी स्थिति ये है कि गलत बात, निर्णय बर्दाश्त नहीं होते और यही कारण है कि आये दिन न केवल अपने संस्थान में बल्कि समाज में भी कई जगह पर तनातनी की स्थिति आ जाती है. हमारे संस्थान में भी पिछले कुछ समय से बड़ी उठापटक मची हुई है, जिसके चलते विद्रोही तेवरों के साथ काम करना हो रहा है. हमारे अनेक कांडों, कदमों, बर्ताव, व्यवहार आदि को सुनने-समझने के बाद बोले कि कुमारेन्द्र, अपनी नौकरी बचा के चलो. उस मित्र की इसी बात पर हमने ठहाका लगाया तो अगले ने भी उसमें साथ दिया और बोला कि तुम न सुधरोगे. वैसे आज की स्थिति में तुम जैसे कुछ लोगों की जरूरत है. हमने कहा, बस यही विश्वास बनाए रहना. नौकरी ही ज़िन्दगी नहीं. एक जाएगी तो अनेक आएँगी मगर किसी की गुलामी बर्दाश्त नहीं.

 

उस मित्र ने पूर्ववत मित्रवत व्यवहार दिखाया. ऐसे ही मित्र हमारी ताकत हैं. गुलामी नहीं हो सकती, नौकरी कल जाती हो तो आज-अभी हाल चली जाए मगर नकारात्मकता फैलाने वाले को सबक सिखाया ही जायेगा. समय के फेर में कुछ दिन तो ख़ामोशी अपनाई जा सकती है, दया का भाव दिखाया जा सकता है किन्तु लगातार अन्याय को सहते रहना खुद को आरोपी बनाता है, खुद को खुद की निगाह में अपराधी बनाता है, अपराध-बोध जगाता है.


30 जनवरी 2024

ग्रेडिंग प्रणाली समाप्त करना समाधान नहीं

देश की शैक्षणिक व्यवस्था में लगातार किसी न किसी रूप में सुधारात्मक कदम उठाये जाते रहे हैं. समयानुसार ऐसा किया जाना एक सतत प्रक्रिया है. उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधारात्मक क़दमों के रूप में राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (नैक) की कार्यकारी परिषद की बैठक में निर्णय लिया गया कि अब देश में उच्च शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रणाली (एक्रीडिटेशन सिस्टम) के द्वारा ग्रेड नहीं दिया जाएगा. अब महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को ए डबल प्लस से लेकर डी तक किसी भी प्रकार का ग्रेड नहीं मिलेगा. इसके स्थान पर उच्च शिक्षण संस्थानों को द्विआधारी मान्यता पद्वति के द्वारा मान्यता प्राप्त या मान्यता प्राप्त नहीं के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा. यह व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2024-25 से लागू हो जाएगी.

 



उच्च शिक्षण संस्थानों में ग्रेडिंग के स्थान पर मान्यता प्रणाली को दो चरणों में लागू किया जायेगा. पहले चरण में बताया जाएगा कि संस्थान मान्यता प्राप्त है अथवा मान्यता प्राप्त नहीं है. पहले चरण की इस प्रक्रिया के पश्चात दूसरे चरण में संस्थानों को एक से लेकर पाँच तक के स्तर पर आँका जायेगा. इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों को अच्छा करते रहने के लिए प्रेरित करना होगा. जिस संस्थान का प्रदर्शन जिस क्षेत्र में जितना अच्छा होगा, उसे उसी के अनुसार एक से पाँच तक की रेटिंग दी जाएगी. नैक की कार्यकारी परिषद् का मानना है कि इस द्विआधारी व्यवस्था से अभिभावकों और विद्यार्थियों के लिए यह पहचानना सहज हो जायेगा कि कौन सा संस्थान मान्यता प्राप्त है और कौन सा नहीं. इसी के साथ उस शैक्षणिक संस्थान की एक से पाँच तक की रेटिंग के अनुसार वे उसे अपने अध्ययन हेतु चयनित कर सकेंगे.

 

अभी तक की संचालित व्यवस्था में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के दिशानिर्देशों के अन्तर्गत नैक द्वारा पूरे देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को ग्रेड प्रदान किये जाते हैं. जो विश्वविद्यालय और महाविद्यालय नैक टीम के निरीक्षण के दौरान उनके द्वारा निर्धारित मापदंडों पर खरे नहीं उतरते हैं, उनको ग्रेड प्राप्त करने में मुश्किल होती है. यूजीसी के अनुसार देश के कुल 1113 विश्वविद्यालयों में से 437 के पास ही नैक मूल्यांकन ग्रेडिंग है जबकि बाकी 676 के पास नैक मूल्यांकन नहीं है. इसी तरह देश में 43796 महाविद्यालयों में से 9335 के पास ही नैक मूल्यांकन ग्रेडिंग है जबकि 34461 कॉलेज अभी तक मूल्यांकन नहीं करवा सके या असफल हुए हैं. नैक एक स्वायत्त संस्था है, जिसे 1994 में यूजीसी द्वारा स्थापित किया गया था. इसका काम देश भर के विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों, निजी शिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता को परखना, उनका मूल्यांकन करके ग्रेडिंग देना है. यूजीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नैक से मान्यता प्राप्त करना आवश्यक है. यदि किसी संस्थान द्वारा इसकी मान्यता नहीं ली जाती है तो उसे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है.

 

जैसा कि नैक की कार्यकारी समिति के अध्यक्ष भूषण पटवर्धन ने कहा कि मान्यता की द्विआधारी पद्धति यह सुनिश्चित करेगी कि ग्रेड की अस्वास्थ्यकर प्रतिस्पर्धा जड़ से समाप्त हो जाए. वह दौड़ जिसमें एक महाविद्यालय को ए डबल प्लस से सम्मानित किया गया और दूसरे को ए प्लस से सम्मानित किया जाना था, समाप्त हो, ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या वाकई ऐसा हो सकेगा? इस स्तर पर आकर विचारणीय यह है कि ऐसे संस्थान जो मान्यता प्राप्त नहीं वर्ग में आयेंगे उनके शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों का भविष्य क्या होगा? उनके कैरियर की दिशा क्या होगी? शिक्षण दायित्वों से इतर अनेकानेक कार्यों के लिए शिक्षकों को अनुमति होगी अथवा नहीं? नैक मूल्यांकन-रहित संस्थानों के भविष्य के साथ-साथ उनसे जुड़े शिक्षकों, कर्मियों, विद्यार्थियों के भविष्य पर भी समवेत रूप से विचार किया जाना महती आवश्यकता है.

 

एक लम्बे समय से यूजीसी द्वारा बार-बार निर्देशित किये जाने के बाद भी बहुसंख्यक संस्थानों द्वारा नैक मूल्यांकन नहीं करवाया गया. इसके पीछे ऐसा नहीं कि संस्थानों की मंशा मूल्यांकन करवाने की नहीं है बल्कि वास्तविकता ये है कि बहुत बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं जिनका मूलभूत ढाँचा ही नैक द्वारा निर्धारित किये गए मानदंडों के आसपास भी नहीं ठहरता है. ग्रामीण अंचलों में संचालित संस्थानों में तो स्थिति और भी दयनीय है. मूलभूत ढाँचे के अभाव के साथ-साथ शिक्षकों की कमी, विद्यार्थियों का बहुत बड़ी संख्या में अनुपस्थित रहना, पाठ्यक्रमों का रोजगारपरक न होने से प्रवेश का कम होना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भी बहुत से संस्थान नैक मूल्यांकन में सफल नहीं हुए हैं.

 

विगत कुछ वर्षों में शिक्षा के उन्नतीकरण से अधिक जोर उसके व्यवसायीकरण पर दिया गया. परिणामस्वरूप निजी संस्थानों की भरमार हो गई, जिनमें से बहुतायत में शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों, विद्यार्थियों, परीक्षा, मूल्यांकन आदि की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. ऐसे संस्थान धनबल की ताकत से किसी भी कार्य को पूर्ण करवाने का दम भरते भी हैं और रखते भी हैं. इसी के चलते माना जाने लगा था कि नैक मूल्यांकन भी अब पारदर्शी नहीं रह गया है. नवीन व्यवस्था के पहले चरण को आगामी चार महीनों में पूरा किया जाना है. ऐसे में वे संस्थान जिनका ढाँचा ही सही नहीं है, जहाँ मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, वे कैसे इस चरण के लिए आवेदन कर सकेंगे? निश्चित है कि संस्थानों द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए वही अतार्किक, असंगत उपाय अपनाए जाने की आशंका रहेगी जिनके कारण नैक मूल्यांकन को अनुपयुक्त माना जाने लगा है. यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों की मूल्यांकन प्रणाली बदलने से इतर प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि संस्थान अपने मूलभूत ढाँचे में, शैक्षणिक गुणवत्ता में, शैक्षणिक वातावरण, विद्यार्थियों की उपस्थिति में आवश्यक सुधार करें. बिना इसके किसी भी बदलाव का बहुत सारगर्भित प्रभाव नहीं होने वाला. 






 

20 अगस्त 2023

बायोमैट्रिक उपस्थिति का समर्थन

शिक्षा निदेशक (उच्च शिक्षा) की ओर से एक पत्र जारी किया गया, बायोमैट्रिक उपस्थिति की अनिवार्यता के सम्बन्ध में. इसमें महाविद्यालयों में विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमैट्रिक उपस्थिति का प्रावधान किये जाने की बात कही गई है. हम तो व्यक्तिगत रूप से इसके पक्ष में हैं मगर प्रदेश स्तर पर शिक्षक संगठन ने इसका विरोध शुरू कर दिया है. काली पट्टी बाँध कर काम करने का आदेश सा पारित कर दिया गया है.

 

बायोमैट्रिक उपस्थिति का समर्थन हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इसके लगने से महाविद्यालय में प्राचार्य और प्रबंध समिति की मनमानी, तानाशाही समाप्त हो जाएगी. कहते हैं न कि 'अँधा बाँटे रेवड़ी, चीन्ह-चीन्ह के दे' ठीक यही हाल उपस्थिति को लेकर होता है. जो इनके अपने हैं वे कभी भी आकर उपस्थिति दर्ज करवाएँ, उन पर कोई कार्यवाही नहीं होती और जो इनके पक्ष के नहीं हैं वे नोटिस पा जाते हैं, कार्यवाही के शिकार हो जाते हैं. बायोमैट्रिक उपस्थिति अकेले शिक्षकों के लिए नहीं है, वह विद्यार्थियों के लिए भी है. इसका होना अनिवार्य होना ही चाहिए ताकि विद्यार्थी महाविद्यालय में आना शुरू करें. अभी प्राचार्य की तरफ से दबाव होता है विद्यार्थियों की झूठी उपस्थिति दिखाने का. आखिर परीक्षा फॉर्म में, छात्र-वृत्ति में इनको खेल जो करना होता है.

 

हमारा तो व्यक्तिगत अनुभव रहा है प्राचार्य और प्रबंध समिति की मनमानी, तानाशाही का. उपस्थिति को लेकर; विद्यार्थियों की फर्जी उपस्थिति को लेकर, छात्र-वृत्ति और परीक्षा फॉर्म को लेकर. स्थानीय स्तर पर सक्षम होने के कारण इस मामले में हम संघर्ष कर ले रहे हैं मगर सभी शिक्षक इस तरह से खुलकर विरोधी स्वर नहीं अपना पाते. उन सभी शिक्षकों के हितार्थ बायोमैट्रिक उपस्थिति प्रक्रिया सर्वोत्तम है, उचित है. हम व्यक्तिगत रूप से प्रदेश के, विश्वविद्यालय के, महाविद्यालय के शिक्षक संगठन द्वारा चलाये जा रहे विरोध में शामिल नहीं हैं.

 


03 अप्रैल 2023

मौलिकता, रोचकता के आधार पर एक अवसर देना सही है

एक खबर प्रकाशित हुई कि गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी लोकप्रिय साहित्य के अंतर्गत गुलशन नंदा, वेदप्रकाश, सुरेन्द्र मोहन के उपन्यास पढ़ सकेंगे. इनमें इब्ने सफी की जासूसी दुनिया, गुलशन नंदा के नीलकंठ, वेदप्रकाश शर्मा के वर्दी वाला गुंडा को स्थान दिया गया है. इस खबर के आते ही साहित्य जगत में शालीनता की खेती करने वाले बहुतेरे छुपे रुस्तमों के पेट में मरोड़ उठना शुरू हो गई. इस मरोड़ उठने का एक कारण तो ये भी है कि अभी तक हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है कि तर्ज़ पर ऐसे लेखकों ने गुलशन नंदा, वेदप्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे लेखकों-उपन्यासकारों की कृतियों को लुगदी साहित्य का नाम देकर चलन से बाहर कर रखा था. बावजूद इसके इन लेखकों की, इनके उपन्यासों की माँग जबरदस्त रूप से रहती है. इनके पाठकों की संख्या लाखों में है.




छटपटाहट से भरे ऐसे तमाम लेखकों ने इस निर्णय का विरोध किया. सामग्री, साहित्यकार, शालीनता आदि का वास्ता देकर इनको कूड़े का बताना शुरू कर दिया गया. संभव है कि लुगदी साहित्य कहे जाने वाले इन उपन्यासों में अश्लीलता जबरन ठूंसी जाती रही हो मगर सभी उपन्यासों में ऐसा होता है ऐसा नहीं है. इन्हीं में से बहुतेरे उपन्यास ऐसे हैं जिन पर हिन्दी फिल्म बनी हैं और बहुत लोकप्रिय भी रही हैं. जहाँ तक सामग्री की, शालीनता की बात है तो ऐसा लगता है कि इन विरोधी स्वर उचारते लेखकों ने, पाठकों ने उन लेखकों को नहीं पढ़ा है जो स्वयंभू रूप में साहित्य में सबसे ऊपर होने का दावा करते हैं मगर उनकी रचनाओं में रति-क्रिया का वर्णन किसी अश्लील साहित्य से कम नहीं. जिन विरोधी आवाजों ने मित्रो मरजानी, दिल्ली, चाक, पीली छतरी वाली लड़की आदि को पढ़ लिया होगा वे कहना भूल जाएँगे कि शालीनता क्या होती है.


रही बात लोकप्रियता के नाम की तो क्या ये आवश्यक है कि प्रत्येक कालखंड में सदियों पुराने, दशकों पुराने लेखकों को ही पढ़ते रहा जाए? क्या तकनीक के इस दौर में शालीनता पर वैसा ही पर्दा पड़ा हुआ है जैसा कि आज से कोई दो-तीन दशक पहले पड़ा हुआ था? फिल्मों, धारावाहिकों में सत्यता, वास्तविकता के नाम पर जिस तरह से अश्लीलता, गालियों का आना हुआ है वह ये बताने को पर्याप्त है कि अब किसी से कुछ भी गोपन नहीं है. विश्वविद्यालय के परास्नातक के विद्यार्थी किशोरावस्था के नहीं हैं. संभवतः उनमें सही-गलत को समझने का नजरिया होगा. आज हर हाथ में स्मार्ट फोन, इंटरनेट ने अश्लीलता को, पोर्नोग्राफी को सर्वसुलभ बना दिया है. ऐसे में इस साहित्य के द्वारा अश्लीलता का फैलना सिवाय गाल बजाने के कुछ और नहीं लगता है. कम से कम इन उपन्यासों की मौलिकता, रोचकता देखकर एक बार इनको अवसर दिया जाना उचित है. 





 

27 जनवरी 2023

उच्च शिक्षा सेमेस्टर प्रणाली में सीजीपीए

पिछली एक पोस्ट में आपसे चर्चा हुई थी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अन्तर्गत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा उच्च शिक्षा में क्रेडिट सिस्टम के लागू किये जाने के बारे में. (पोस्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू किये जाने के साथ ही उसे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भी लागू कर दिया गया था. यहाँ उच्च शिक्षा में इसी के साथ क्रेडिट सिस्टम (सीबीसीएस) लागू हो गया. सीबीसीएस के लागू होने से परीक्षा पूर्व वार्षिक प्रणाली व्यवस्था से हटकर सेमेस्टर प्रणाली में आ गई. सीबीसीएस में एसजीपीए अथवा जीपीए के द्वारा एक सेमेस्टर में विद्यार्थी का ग्रेड निकाला जाता है. इसी तरह से सभी सेमेस्टर की ग्रेडिंग होने के बाद सीजीपीए के द्वारा उसके द्वारा पूरी की गई डिग्री का मूल्यांकन अथवा ग्रेडिंग निर्धारित की जाती है. यहाँ एसजीपीए अथवा जीपीए (SGPA/GPA) का अर्थ Semester-wise Grade Point Average/Grade Point Average है जबकि सीजीपीए (CGPA) का अर्थ Cumulative Grade Point Average है. GPA एक-एक सेमेस्टर के लिए निकाला जाता है जबकि CGPA को दो या दो से अधिक सेमेस्टर के लिए निकाला जाता है.




इसके लिए किसी भी विद्यार्थी द्वारा उसके चुने पाठ्यक्रम के क्रेडिट और उस पाठ्यक्रम में प्राप्त अंकों के द्वारा जीपीए निकाला जाता है. इस आकलन करने वाली प्रक्रिया में दो टर्म मुख्य रूप से प्रयोग में लायी जाती हैं. एक है अर्जित अंक (Point Earned - PE) और दूसरी है सुरक्षित अंक (Point Secured - PS). Point Earned (PE) को निकालने के लिए विद्यार्थी द्वारा किसी पाठ्यक्रम में निर्धारित पूर्णांक 100 में से प्राप्त अंकों को 10 से विभाजित (PE = प्राप्तांक ÷ 10) किया जाता है. इसके बाद Point Secured (PS) को निकालने के लिए किसी पाठ्यक्रम के लिए निकाले गए PE में उस पाठ्यक्रम के क्रेडिट से गुणा (PS = PE x क्रेडिट) कर दिया जाता है.


उदाहरण के लिए मान लीजिये कि किसी पाठ्यक्रम क्रेडिट हैं 04 और पूर्णांक 100 हैं. इस पाठ्यक्रम में किसी विद्यार्थी के 70 अंक आये. अब PE = प्राप्तांक ÷ 10 फ़ॉर्मूला लगाने पर PE = 70 ÷ 10 = 7. अब PS निकालने के लिए PS = PE x क्रेडिट फ़ॉर्मूला के अनुसार PS = 7 x 4 = 28. यह एक पाठ्यक्रम का Point Secured है. इसी तरह उस विद्यार्थी के सभी पाठ्यक्रमों का PS निकालने के बाद जीपीए निकालने के लिए सभी PS के योग में सभी क्रेडिट के योग का भाग देना होता अर्थात GPA = Total of Point Secured ÷ Total of Credit. इस तरह किसी विद्यार्थी के एक सेमेस्टर का जीपीए ज्ञात हो जाता. सीजीपीए निकालने के लिए एक-एक सेमेस्टर के जीपीए और क्रेडिट के गुणनफल के योग को सभी क्रेडिट के योग से विभाजित किया जाता है. माना कि तीन सेमेस्टर का सीजीपीए निकालना है. प्रत्येक सेमेस्टर में 20 क्रेडिट हैं. ऐसी स्थिति में Sem 1 क्रेडिट x GPA + Sem 2 क्रेडिट x GPA + Sem 3 क्रेडिट x GPA के योग को तीनों सेमेस्टर के कुल क्रेडिट से विभाजित करने पर सीजीपीए प्राप्त होता है.