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14 मई 2024

अटकी हुई कृपा दूर कर दी

एक सप्ताह से अधिक हो गया था क्रेडिट कार्ड बनकर आए हुए. तबसे कल रात तक छह अलग-अलग जगहों पर उसी क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने की प्रक्रिया अपनाई. हर बार भुगतान प्रक्रिया पूर्ण न हो सकी. किसी न किसी कारण से भुगतान न हो पाता.

कई बार लगा कि पहली बार उपयोग कर रहे हैं सम्भव है कि ग़लत तरीक़े से कर रहे हों. कभी लगा कि नया कार्ड है हो सकता है बैंक से कुछ अलग एक्टिवेट करवाना पड़ता हो. अनुभवी लोगों से जानकारी की तो पता चला कि हम भुगतान की सही प्रक्रिया अपना रहे हैं, कोई गलती नहीं कर रहे हैं.

इसके बाद कल रात दिमाग़ घुमाया तो समझ आ गया कि कृपा कहाँ एक जगह अटकी हुई है, तभी भुगतान सफल न हो रहा. बस, आज सुबह ख़रीददारी मुहूर्त में दो फ़ाउण्टेन पेनऔर दो पुस्तकोंके ऑर्डर दिए, तत्काल भुगतान हो गया.

कल समझ आ गया था कि क्रेडिट कार्ड का पहला भुगतना अत्यंत मनपसंद सामग्री पेन या पुस्तक पर होना है. सो पेन और पुस्तक दोनों को वरीयता देते हुए अटकी कृपाको दूर किया.

 





 

26 जनवरी 2024

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व : हमारा प्यारा तिरंगा


तिरंगा हम सबकी शान है. उन्मुक्त गगन में लहराते तिरंगे को नमन करने के साथ ही याद आया अपना लेखकीय तिरंगा. ये वो तिरंगा है जो हमें ताकत देता है, सच कहने की, असत्य के खिलाफ लिखने की, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की. 

इस तिरंगे को भी नमन. 

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व
हमारा प्यारा तिरंगा.... 
❤ ❤ ❤
26 जनवरी 2024


08 जनवरी 2023

पेन की दीवानगी और बचपन के मँहगे पेन

फेसबुक पर अतिसक्रियता दिखाने वाले राम द्विवेदी, जो अक्सर हलकी-फुलकी पोस्ट के बीच गंभीर पोस्ट लगाकर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करते रहते हैं. आज भी उनके द्वारा कुछ ऐसा ही किया गया. Luxor Pilot पेन से सम्बंधित एक पोस्ट लगाई और उसमें हमें भी टैग कर दिया. चूँकि पेन का जबरदस्त शौक हमें हैं, ये बात न केवल राम जानते हैं बल्कि हमारे सभी परिचित भी जानते हैं, इसी कारण से उस पोस्ट में हमें टैग किया गया था. पोस्ट देखी तो वो Luxor Pilot Pen से सम्बंधित थी. आज की पोस्ट के द्वारा बीते दिनों की सैर करवाई जा रही थी. जिस पेन की फोटो राम ने लगाईं थी, अस्सी-नब्बे के दौर में किसी भी साधारण विद्यार्थी के लिए उसे खरीदना संभव नहीं था. उसी साधारण विद्यार्थी वाली स्थिति में हम भी थे. 




पेन का शौक आज से नहीं बल्कि बचपन से रहा है. अपनी कक्षा के कुछ धनवीर मित्रों के हाथों में इस तरह के पेन देखकर मन ललचाता तो था किन्तु परिवार में जिस तरह का माहौल था, उसके द्वारा संतोषम परम सुखम वाली भावना सर्वोपरि थी. जब खुद कमाना, तब शौक करना वाली घुट्टी तो बचपन से ही पिलाई जाने लगी थी. खुद कमाओगे तब पैसे का मोल समझ में आएगा की धमकी भी समय-समय पर मिलती रहती थी. बहुत अच्छे से याद है कि कक्षा छह में आने के बाद ही अकेले में बाजार घूमने का अवसर मिला था. इसी कक्षा में आने के बाद ही अपने घर से लगभग डेढ़-दो किमी दूर स्थित राजकीय इंटर कॉलेज में जाने का मौका मिला. जैसा कि आज का दौर है बच्चों को रेशम में लपेट कर पालने की, वैसा माहौल उस समय हमें नहीं मिला. ऐसा नहीं था कि हम बच्चों की देख-रेख नहीं होती थी किन्तु उस समय बहुत छोटे-छोटे कदमों के द्वारा हमें आत्मनिर्भर होने के, परिस्थितियों से खुद लड़ने के अवसर भी परिवार की तरफ से दिए जा रहे थे.


बाजार से गुजरते समय कुछ दुकानें मिलती थीं स्टेशनरी की, उनमें लटके पेन देखकर मन ललचाता मगर एक दिन के जेबखर्च के रूप में मिलती चवन्नी उस लालच की तरफ उतावला न होने देती. हो सकता है कि आज के बच्चे चवन्नी का अर्थ भी न समझें. इसे हमारे पाठक समझायेंगे. उसी दौरान राम द्विवेदी द्वारा दर्शाए गए इस पेन के साथ-साथ इसी कंपनी का एक और पेन नजर के सामने से गुजरा. इन दोनों पेन में इनकी टिप का अंतर था. जो पेन राम ने दिखाया उसकी टिप स्टील की हुआ करती थी और दूसरे पेन की टिप फाइबर की. बहुत हिम्मत करके एक दिन पिताजी के सामने फाइबर टिप वाला पेन लेने की फरमाइश रख दी. स्केच की जगह पर उसके इस्तेमाल का कारण बताते ही पेन के लिए पैसे तो न मिले बल्कि जबरदस्त डांट मिली. कुछ दिनों के लिए किसी भी तरह के नए पेन की तरफ से ध्यान ही हट गया.




एक बात यहाँ बताएँ कि उस समय हमें फाउंटेन पेन से लिखने के लिए प्रेरित भी किया जाता था और धमकाया भी जाता था. बस इसी कारण से बॉल पेन के रूप में यदि कोई पेन कभी-कभार हाथ में आया तो शार्प का पारदर्शी नीला पेन और कभी-कभी चवन्नी वाली रिफिल वाला कोई सस्ता सा बॉल पेन. ऐसे में किसी दूसरे पेन की बात सोचना भी बड़ी हिम्मत का काम हुआ करता था. यद्यपि उसी समय में एक-दो रुपये तक के कुछ पेन कई-कई दिन की दस-पाँच पैसे की बचत करके भी लिए गए. शायद आप लोगों को याद हो एक स्टील का पेन आया करता था बिना कैप का.


बहरहाल, Luxor के ये दोनों पेन भी लिए गए मगर बहुत दिनों की बचत के बाद. धारे-धीरे कक्षा आगे बढती गई, घर से सख्ती भी कुछ कम होती रही. कभी ड्राइंग के लिए, कभी चार्ट के लिए, कभी परीक्षाओं के लिए पेन की जरूरत पड़ती रही तो ये पेन भी हमारी जेब की शोभा बनते रहे. उन्हीं दिनों इसी कंपनी के एक और बड़े हाई-फाई टाइप पेन से मुलाकात हुई. Pilot V5 के नाम से बाजार में आये इस पेन ने एक बार में ही अपनी तरफ ध्यान खींचा, ऐसा लगा जैसे पहली नजर का प्यार उसी से हो गया हो. उसके बाद जैसे ही दुकान पर जाकर उसका मूल्य पता किया, सारा प्यार हवा में उड़ गया. उस पेन की कीमत के आसपास का पैसा तो महीने भर में हमारे हाथ नहीं आया करता था. पेन से अपने प्यार को खाली हाथ कुछ धन्नासेठों के बच्चों के हाथ में सजा देखते रहे.




शायद आज के बच्चों को आश्चर्य हो कि उस पेन (Pilot V5) को हमने अपनी स्नातक की पढ़ाई के दौरान पैसे जोड़कर ही खरीदा. स्नातक की पढ़ाई के लिए ग्वालियर जाना हूं वहाँ हॉस्टल में रहने का कारण महीने का जेबखर्च चार सौ रुपये मिला करता था. इसी में खाना, दूध और बाकी सामान लिए जाते थे. ऐसे में कुछ महीनों की बचत के बाद V5 पेन ले लिए गया. समय के साथ बहुत कुछ बदला. बाजार ने पेन पर पेन उतार दिए, सस्ते से सस्ता पेन और मंहगे से मंहगा पेन. अब पेन की इतनी वैरायटी मौजूद है कि लेने वाला ही पागल हो जाये कि किसे ले और किसे छोड़े.


दूसरों के पागलपन की क्या बात करें, हम खुद ही पागल रहते हैं बाजार में इतने अधिक पेन देखकर. ये एक आश्चर्य हो सकता है कि पिछले लगभग पच्चीस-तीस साल से हमने किसी पेन के लिए रिफिल नहीं खरीदी है. इससे बड़ा आश्चर्य तो ये होगा कि इतने सालों में किसी पेन की रिफिल ही ख़त्म नहीं हुई है. हर महीने दो-चार नए पेन खरीद लिए जाते हैं, इस कारण रिफिल सुरक्षित बनी रहती है. हाँ, Pilot का V5 पेन जरूर नियमित रूप से पिछले बीच-पच्चीस साल से हमारे लेखन का, हमारी आर्ट का, स्केचिंग का, कैलीग्राफी का हिस्सा बना हुआ है. 






 

22 दिसंबर 2020

बॉल पेन की पहेली का समाधान

उस दौर में जबकि जीवनशैली एकदम सामान्य थी, न बहुत तामझाम, न बहुत चमक-धमक, न बहुत शोर-शराबा, उस समय कोई भी नई चीज अजूबा सी दिखाई पड़ती थी. आप लोगों से इस बारे में एक बार कायनेटिक होंडा स्कूटर के बारे में अपना मजेदार अनुभव शेयर कर ही चुके हैं. उस समय बचपना भी था जो आज के बच्चों की तरह नहीं था. उन दिनों के लोग, समाज, आसपास का परिवेश भी एकदम पारिवारिक हुआ करता था. खैर, बात इसकी नहीं, यहाँ आज बात एक अजूबे से पेन की. जी हाँ, पेन मगर फाउंटेन पेन नहीं बल्कि एक बॉल पेन की.


उन दिनों फाउंटेन पेन से ही लिखना हो रहा था. यदि बॉल पेन मिलता था तो एक शार्प का बॉल पेन आया करता था, पूरी बॉडी पारदर्शी होती थी और उस पर नीले रंग का ढक्कन लगा हुआ करता था. इसके अलावा एक और बॉल पेन का उपयोग हमें करने की याद है जो रंगीन (कोई एक रंग का) बॉडी का हुआ करता था. एक पेन कभी-कभी चाचा या पिताजी का, घर में उपयोग कर लेते थे, शायद Jotter पेन था. यह पेन ऊपर से क्लिक करके खुलता और बंद होता था. इनके अलावा बाजार में और भी अच्छे बॉल पेन हुआ करते थे मगर उन दिनों इतना जेबखर्च भी नहीं मिलता था कि हम खुद कोई पेन खरीद सकें. इसके लिए घर पर निर्भरता बनी हुई थी. ऐसे में बॉल पेन की माँग होने पर इन्हीं दो पेन की सहायता से आपूर्ति की जाती थी.




शायद कक्षा छह में होंगे, एक दिन हमारे मित्र अभिनव ने एक बॉल पेन दिखाया जो अभी तक हमारे द्वारा उपयोग किये गए पेन से एकदम अलग. खिलते हुए रंग में (था ये भी एक ही रंग का) बॉल पेन मगर उसमें कोई ढक्कन नहीं, न खींच कर खोलने के लिए, न चूड़ीदार. इसके ऊपर आमतौर पर देखी जाने वाली क्लिक बटन भी नहीं थी, जिसे चटर-पटर करके रिफिल निकाली जा सके, लिखा जा सके. इसमें ऊपर एक बटन जिसे दबाने से वह वहीं बने छेद में फँस जाती और रिफिल निकल आती. बाद में उसी को दबाने से रिफिल अन्दर चली जाती अर्थात पेन बंद हो जाता. यह बहुत अजूबा सा नहीं लगा. अजूबा इसमें रिफिल डालने-निकालने वाला सिस्टम लगा.


इस पेन में कहीं से भी ऐसी जगह नहीं दिख रही थी जिसे खोलकर उसमें से रिफिल निकाली जा सके, रिफिल डाली जा सके. यह हमारे लिए आश्चर्य की बात थी. अभिनव ने कहा कि ये बताओ कि इसमें रिफिल कहाँ से डलेगी? पेन के मामले में हम बचपन से ही नशेबाज जैसी स्थिति में रहे हैं. उससे कहा कि बस पाँच मिनट को पेन हमारे हवाले करो, अभी इसकी पूरी साइंस तुम्हारे सामने रखते हैं. ये तो मालूम था कि रिफिल इसमें डली है तो कहीं का कहीं से डाली ही गई होगी. उस समय तक हमारा सामना यूज़ एंड थ्रो पेन से नहीं पड़ा था, इसलिए ये समझते थे कि पेन फेंका नहीं जायेगा.


उस अजूबा से पेन को हमने अपने हाथ में लिया. दो-चार बार इधर-उधर पलता. दो-चार बार उसकी क्लिक बटन को दबाया. इसी में समझ आ गया कि इसमें रिफिल कहाँ से डाली जाएगी. बस एक झटके में उस क्लिक बटन के उस हिस्से को जो छेद में फँसता था, अँगूठे से दबाकर ऊपर खींच दिया. क्लिक बटन बाहर और उसी से रिफिल डालने की जगह बन गई. शायद कम्फर्ट कंपनी का बॉल पेन था वह. उस पेन के बाद उसके बहुत से पेन उसी तरह के निकले, खूब सारे पेन धीरे-धीरे करके इकट्ठे भी कर लिए गए जो समय के साथ काल-कलवित हो गए. एक बॉल पेन बचा रह गया जो बॉल पेन, फाउंटेन पेन की सफाई के दौरान मिला. उसे देखकर वे दिन फिर याद आ गए.


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वंदेमातरम्