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17 सितंबर 2015

धार्मिक कट्टर होते जा रहे हम


आप सभी को गणेश चतुर्थी पर्व की शुभकामनायें. वर्तमान में हमारे समाज का ताना-बाना कुछ इस तरह का हो गया है कि धार्मिक अनुष्ठानों-पर्वों-आयोजनों आदि पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान भी विवाद की विषयवस्तु बन जाता है. ऐसा किसी एक धर्म विशेष के प्रति न होकर कमोबेश सभी धर्मों के साथ हो रहा है. किसी भी धार्मिक दिवस के, पर्व के आने की आहट मात्र ही उन फिरकापरस्त तत्त्वों को सक्रिय कर देती है जो समाज में विघटन का, अलगाव का, हिंसा का, भय का, उन्माद का वातावरण बनाने की फिराक में लगे रहते हैं. इसमें सबसे बड़ी विडम्बना देखिये कि समाज का वो वर्ग जो अपने आपको बुद्धिजीवी कहता है, सोशल मीडिया का जमकर उपयोग करता है, खुद को किसी धार्मिक खाँचे से मुक्त बताता है, जो अपने आपको राजनैतिक रूप से भी निरपेक्षता का सबसे बड़ा संवाहक सिद्ध करता है वो भी कहीं न कहीं इन तत्त्वों की चपेट में आ जाता है. इसके बाद शुरू होता है अफवाहों का इधर से उधर प्रसारण, विभेदकारी विचारों का आदान-प्रदान और उसके बाद जन्म लेता उन्माद अलगाववादी ताकतों को सड़कों पर उतार भय, हिंसा के वातावरण का निर्माण करता है; समाज से स्नेह, प्रेम, सौहार्द्र, समन्वय की हत्या करता है.
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बहुत पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता नहीं है, हाल ही में कुछ प्रदेशों में सरकारों द्वारा धार्मिक आयोजन के अवसर पर मीट के प्रतिबन्ध जैसा कदम उठाया. इसके बाद क्या हुआ इसको कहने की, बताने की आवश्यकता नहीं है. जहाँ एक तरफ हम विश्व बंधुत्व की बात करते हैं; तकनीकी के चलते सम्पूर्ण विश्व को एक ग्राम के रूप में परिभाषित करते हैं; वसुधैव कुटुम्बकम पर गर्व करते हैं वहीं अपने पड़ोसी के धार्मिक आयोजन का मखौल उड़ाते हैं; अपने सहयोगी के धार्मिक विचारों की अवहेलना करते हैं; अपने परिचित के धार्मिक क्रियाकलापों में व्यवधान पैदा करते हैं. आखिर ये कैसी बंधुत्व की भावना है? आखिर ये कौन सा अपनापन है? आखिर ये किस तरह की धार्मिक सहिष्णुता है? आखिर ये किस तरह की धर्मनिरपेक्षता है?
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वास्तविकता ये है कि तकनीकी रूप से, वैज्ञानिक रूप से सक्षम होते जाने के कारण हम सबने अपने अन्दर एक तरह के अहं को जन्म दे दिया है. ‘सबसे उत्कृष्ट हम, हमारा धर्म, हमारे विचार, हमारे क्रियाकलाप’ आदि ने इंसान इंसान के बीच की दूरी को अदृश्य रूप से बढ़ा दिया है. सामने होते हुए भी हम सामने वाले व्यक्ति से बहुत-बहुत दूर होते जा रहे हैं; धार्मिक रूप से सहिष्णु बनने के बाद भी हम धार्मिक रूप से अत्यंत कट्टर होते जा रहे हैं. एक दूसरे का सम्मान करने के साथ-साथ उसका घनघोर अपमान करते जा रहे हैं. देखा जाये तो कहीं न कहीं हम तकनीकी समाज विकसित करते रहने के साथ-साथ मानवीयता भरा, इंसानियत भरा समाज मिटाते जा रहे हैं.
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आइये इस समाज के मिटने को रोकने का काम करें; समाज को विखंडित करने वालों को समाप्त करने का काम करें; दिलों के बीच बढ़ती दूरियों को मिटाकर स्नेह, प्रेम पैदा करने का काम करे. कामना करें कि आदिदेव श्री गणेश जी इसके लिए शक्ति प्रदान करें.  
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17 जुलाई 2015

इफ्तार के नाम पर तुष्टिकरण


माह-ए-रमज़ान अलविदा कहने को तैयार है और बहुत से चर्चा-प्रेमी नागरिक किसी का इफ्तार पार्टी की दावत देना, किसी का इफ्तार की दावत न देना, किसी का इफ्तार पार्टी में शामिल होना, किसी का शामिल न होना आदि-आदि की चर्चाएँ करने में लगे हैं. रमजान के आरम्भ होते ही तमाम राजनैतिक दलों की तरफ से, तमाम राजनेताओं द्वारा, अनेक सामाजिक प्रबुद्ध किस्म के लोगों की तरफ से इफ्तार का आयोजन किया जाने लगता है. इस तरह के आयोजनों के मूल में कहीं से भी धार्मिक भावना के दर्शन नहीं होते. देखा जाये तो नितांत धार्मिक कृत्य कतिपय तुष्टिकरण की नीति के चलते राजनैतिक बना दिया गया है. इफ्तार के आयोजन करने वालों की मानसिकता में मजहबी सोच, धार्मिक पावनता के स्थान पर विशुद्ध राजनीति दिखाई पड़ती है. कौन किस नजरिये से शामिल हुआ, कौन किसके बगल में बैठा, किसने किसकी प्लेट से खाद्य सामग्री उठाई, किसने टोपी पहनी, किसने टोपी पहनने से मना किया, किसने किसको गले लगाया आदि ऐसी दावतों के केंद्र में छिपा होता है. एक सबसे बड़ी बात जो यहाँ सामने निकल कर आती है वो ये कि इन दावतों का आयोजन करने वालों में मुस्लिम समुदाय से कहीं अधिक हिन्दू समुदाय के लोग शामिल रहते हैं.
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भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में, सर्वधर्म सदभाव की भावना वाले इस देश में ये अच्छी बात है कि आपसी सदभाव बढ़ाने हेतु ऐसे आयोजन होते रहें. इस अच्छाई के साथ एक बुराई ये भी दिखती है कि ऐसे सदभाव पसंद राजनैतिक दल, राजनेता, सामाजिक व्यक्तित्व एक धर्म विशेष पर ही अपनी सद्भावना प्रकट करने आ जाते हैं. ऐसे में सवाल उठाना लाजिमी है कि धार्मिक सद्भावना दिखाने के लिए किसी भी राजनैतिक दल को, किसी भी राजनेता को मात्र मुस्लिम समुदाय ही क्यों दिखाई देता है? किसी भी तरह के धार्मिक आयोजन के लिए मुस्लिम त्योहारों पर ही सबकी निगाह क्यों होती है? आखिर क्यों सभी दलों के लोग, समाज के प्रबुद्ध माने जाने वाले लोग मस्जिद के पास बधाइयाँ देने को अलस्सुबह से एकत्र होने लगते हैं? क्यों इन सबमें मुस्लिम समुदाय के लोगों से पहले-पहल गले मिलने की बेताबी दिखाई देने लगती है? क्यों ऐसे लोगों के लिए एक रोजेदार पावनता का सूचक होता है? कहीं न कहीं भेदभावपूर्ण ये कदम इन्हीं के द्वारा घोषित गंगा-जमुनी विरासत को खोखला करने का काम करता है. आखिर हिन्दुओं के तथा अन्य धर्मों के त्योहारों पर ऐसी तत्परता किसी भी दल में, किसी भी व्यक्ति में नहीं दिखाई देती है. विजयादशमी, नवदुर्गा, होली आदि हिन्दू पर्वों पर भी लोगों द्वारा व्रत-उपवास रहा जाता है; मेलों, पर्वों का आयोजन किया जाता है किन्तु किसी भी दल द्वारा, किसी भी राजनैतिक व्यक्ति द्वारा उनसे गले लगने की, व्रत के पारण करवाए जाने की तत्परता नहीं दिखाई जाती है. लंगर के आयोजनों में, क्रिसमस के दिन अथवा अन्य गैर-मुस्लिम पर्व-त्योहारों पर इन सदभाव-प्रेमियों की सक्रियता, सद्भावना कहाँ गायब हो जाती है?  
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इस लोकतान्त्रिक देश की विडंबना देखिये कि यहाँ मुस्लिम-समर्थन में किये जाने वाले काम धर्मनिरपेक्षता से परिभाषित किये जाते हैं. राजनैतिक दलों द्वारा, राजनेताओं द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाये जाने की अपनी ही मजबूरी समझी जा सकती है किन्तु संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा इस तरह के आयोजन किये जाने के पीछे की मंशा स्पष्ट नहीं होती है. यदि उसके द्वारा मुस्लिमों के लिए इफ्तार दावत का आयोजन सामाजिक-धार्मिक सदभाव को बढ़ावा देने में कारगर सिद्ध होता है तो शेष गैर-मुस्लिम धर्मों के लिए भी उसके द्वारा ऐसे आयोजन किये जाने चाहिए. अब जबकि देश के राष्ट्रपति द्वारा भी इस तरह के कदम उठाये जा रहे हों तब एक आतंकवादी की फांसी को भी धार्मिक आधार पर, दलगत आधार पर विवादित किया जाना कोई आश्चर्य का विषय नहीं. कहा तो जाता है कि आतंकवाद का कोई धर्म, कोई मजहब नहीं होता, यदि ये ही अंतिम और पूर्ण सत्य है तो फिर एक आतंकवादी का कोई धर्म या मजहब कैसे हो जाता है? इस सवाल के साथ एक कामना उस परमशक्ति से यह कि माह रमजान मुस्लिम समुदाय के उन सभी लोगों को सद्बुद्धि दे जो राजनैतिक दलों के, व्यक्तित्व के हाथों में खेल रहे हैं. उन्हें इन राजनैतिक दलों के हाथों की कठपुतली बनने से रोके. काश! वे इस बात को समझ सकें तो....

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05 अप्रैल 2014

मुस्लिम बोले तो धर्मनिरपेक्ष..हिन्दू बोले तो सांप्रदायिक...




धर्मनिरपेक्षता का दम भरने वाले किस कदर साम्प्रदायिकता के रंग में रंगे नज़र आते हैं, ये चुनावों को देखकर समझा जा सकता है. देश के सभी राजनैतिक दलों द्वारा भाजपा पर साम्प्रदायिकता फ़ैलाने का आरोप लगाया जाता है लेकिन उन सभी दलों की तरफ से किस तरह की साम्प्रदायिकता फैलाई जा रही है, इसको ध्यान में नहीं रखा जाता है. इधर चुनावी मौसम शुरू हुआ, उधर नेताओं की जीभ कतरनी की तरफ चालू हो गई और चालू हो गया सांप्रदायिक बयान देने का सिलसिला. एक हैं जो कुछ मिनट मांगते हैं सफाए के लिए, एक हैं जो बोटी-बोटी करने को तैयार बैठे हैं; एक महोदय खुद को मुसलमानों का पहरेदार बताते हैं तो एक दूसरे हैं जो हत्यारा, भेड़िया जैसे शब्दों से परिभाषित करते हैं. समझना होगा कि साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता में अंतर क्या है, कौन है जो वाकई इनकी अहमियत को समझता है. एक हिन्दू नेता द्वारा टोपी न लगाना साम्प्रदायिकता हो सकती है तो फिर एक मुस्लिम नेता द्वारा तिलक न लगाना अथवा आरती न करना धर्मनिरपेक्षता कहाँ से हो गई? यदि मुस्लिमों से मजहब के नाम पर, साम्प्रदायिकता के नाम पर, किसी एक पदासीन व्यक्ति के कहने से किसी दल विशेष को वोट करना धर्मनिरपेक्षता हो सकती है तो हिन्दुओं से वोट देने की अपील सांप्रदायिक कैसे हो सकती है?
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इन राजनैतिक दलों ने पूरे देश को इसी तरह के छोटे-बड़े मामलों में बाँट रखा है और इससे उत्पन्न होने वाली किसी भी समस्या को सुलझाने से बजाय वे और उलझाने में लगे हैं. इस उलझन को बढ़ाने में राजनैतिक दलों के साथ-साथ देश का तथाकथित धर्मनिरपेक्ष समूह, तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी महती भूमिका निभा रहा है. एक राजनीतिज्ञ मंच से कारसेवकों पर करवाई गई गोलीबारी को याद दिलाते हुए धमकाते सा हैं तो एक दूसरे महाशय हैं जो देश भर में फैलते जा रहे इस्लामिक आतंकवाद को १९९२ के बाबरी विध्वंस से जोड़ते हैं और उस घटना की प्रतिक्रिया बताते हैं. कितना हास्यास्पद है, यदि बाबरी ध्वंस की प्रतिक्रिया आज २२ साल बाद भी हिंसा, आतंक, बम-विस्फोट से व्यक्त की जा रही है तो फिर गोधरा-कांड से उपजी एकमात्र प्रतिक्रिया ‘गुजरात दंगे’ को भी जायज़ ठहराना पड़ेगा. यदि आठ माह पुराने बयान पर जेल जाने वाले का विरोध करना और उस बयान को भुलाते हुए महोदय को चुनाव लड़ने की अपील चुनाव आयोग करना धर्मनिरपेक्षता है तो फिर २२ वर्ष पुराने अयोध्या मामले को, १२ साल पुराने गुजरात दंगों को भी भुलाकर धर्मनिरपेक्षता का परिचय इन नेताओं को देना चाहिए. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो रहा, इन दो मामलों का नाम ले-लेकर न सिर्फ भाजपा को बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज को सांप्रदायिक बताया जाने लगता है.
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वोट की राजनीति में राजनैतिक दल बुरी तरह से घिरे हैं और मतदाता आज़ादी के छह दशक से ज्यादा गुजर जाने के बाद भी स्वप्न के आधार पर. कपोल-कल्पनाओं के आधार पर, मुफ्तखोरी के आधार पर मतदान करने निकल पड़ता है. मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त लैपटॉप, मुफ्त टेबलेट, बेरोजगारी भत्ता आदि के चक्कर में मतदाता अपना वोट कहीं भी पटक देने को तैयार रहता है. ऐसे मतदाताओं से धर्म-मजहब-जाति से ऊपर उठकर वोट देने की बात सोचना भी बेमानी है. राजनैतिक दल इस बात को बखूबी समझते हैं, इसी कारण एक मौलाना का वोट देने की अपील धर्मनिरपेक्ष बनी रहती है जबकि किसी छोटे से मंदिर के पुजारी का हिन्दू शब्द बोलना भी घनघोर सांप्रदायिक हो जाता है.
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13 जुलाई 2013

मुस्लिम खुद को वोट-बैंक नहीं, नागरिक समझें




“हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में सब भाई-भाई” का नारा अपने आपमें आदर्शवाद की अद्भुत संकल्पना पेश करता है. इसके बाद भी आये दिन धार्मिक उन्माद, धार्मिक विभेद से समूचे देश का सामना होता रहता है. ये सुनने में भले ही अजीब लगे और शायद देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों को बहुत ही बुरा लगे पर सत्य ये है कि आपस में भाई-भाई की संकल्पना नितांत भ्रामक है. इस देश में हिन्दू-हिन्दू, मुस्लिम-मुस्लिम, सिख-सिख, ईसाई-ईसाई आपस में ही भाई-भाई की तरह से निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं, तब इन सबका भाई-भाई की तरह निर्वाह करना कहाँ से संभव हो सकता है? देश में जिस तरह से जातिगत विभेद से अलगाव की स्थिति देखने को मिलती है उसी तरह से धर्म के नाम पर भी कटुता देखने को मिलती है और आये दिन इसे देश के राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों, धर्मनिरपेक्ष के समर्थकों, धार्मिक संगठनों द्वारा हवा दी जाती रहती है.
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धार्मिक विभेद के रूप में हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर आये दिन ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जाती रहती है. वोट-बैंक की चाह रखने वाले राजनीतिज्ञों की तरफ से मुसलमानों को अल्पसंख्यक के नाम पर हर बार यही समझाया जाता है कि वे देश की मुख्य-धारा से अलग किये जा रहे हैं. राजनीतिज्ञों की इस मानसिकता को मीडिया द्वारा, बुद्धिजीवियों द्वारा, लेखकों द्वारा भी प्रोत्साहन दिया जाता रहता है. अधिसंख्यक रूप में मुस्लिम संगठनों द्वारा, मुस्लिम नेताओं द्वारा, मुस्लिम धर्म-गुरुओं, मौलानाओं द्वारा, मुस्लिम बुद्धिजीवियों द्वारा इस बात का प्रचार-प्रसार किया जाता रहता है कि मुस्लिम इस देश में सुरक्षित नहीं है, उसके हक़ को लूटा जा रहा है, उसके साथ अन्याय किया जा रहा है, उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है. यहाँ इन्हीं लोगों को इस तथ्य को विस्मृत नहीं करना चाहिए कि इस देश के शीर्ष पदों पर मुस्लिम लोग पहुंचे हैं, राजनीति से लेकर सरकारी नौकरियों में इस धर्म के लोग बहुतायत में आसीन रहे हैं, आज भी आसीन हैं.
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मुस्लिमों को यदि आपत्ति होनी चाहिए तो उनके नाम पर राजनीति करते नेताओं से, उनके नाम पर समाज में तनावपूर्ण माहौल बनाने वाली मीडिया से किन्तु वे इससे इतर सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं को अपनी हालत का जिम्मेवार ठहराते हैं. एक पुलिस अधिकारी की हत्या पर पूरे देश भर में आन्दोलन सा छेड़ने वाले मुस्लिमों ने कभी किसी दूसरे धर्म के अधिकारी की हत्या पर ऐसा ही रोष व्यक्त किया है? किसी आतंकी की मौत हो जाने पर भी लामबंद होने वाले मुस्लिम मजहबी संगठन क्या शहीदों के स्मारक को तोड़े जाने वाली मुस्लिम भीड़ के प्रति लामबंद होते हैं? कहीं किसी कोने में हिन्दू नाम आने मात्र से ही समाज में सांप्रदायिक माहौल बनने लगता है किन्तु जब कोई मुस्लिम राजनीतिज्ञ खुले मंच से धार्मिक उन्माद पैदा कर रहा होता है तो ये लोग चुप्पी क्यों साधे रहते हैं? सरकारों की तरफ से अल्पसंख्यक के नाम पर तमाम सारी सुविधाएँ मिलने के बाद भी ये अपने आपको वोट-बैंक बनाये जाने का विरोध क्यों नहीं करते हैं? ‘दंगा कोई भी हो, घाव देकर ही जाता है’ इसके आलोक में मुस्लिम समुदाय के लोगों को ये बात भी समझनी चाहिए कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञ उनको एक दंगे के नाम पर आज तक बरगलाते आये हैं, उनके दुःख को दिखाते आये हैं, तो उन दंगों के दुखों का क्या जो कहीं न कहीं उनके समुदाय के लोगों के शामिल होने के कारण उत्पन्न हुए हैं?
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इस देश के मुसलमानों को ये बात खुद समझनी होगी कि ये देश उनका भी है पर वे इस देश के वोट-बैंक नहीं हैं. उनको ये समझना होगा कि देश की मुख्य-धारा में शामिल होने से उन्हें हिन्दू नहीं वरन खुद उनकी सोच ही रोक रही है. एक गुजरात दंगे का नाम ले-लेकर उनकी भावनाओं से खेलने वाले, उनके दुःख को कुरेदने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों से उन्हें बचने की जरूरत है. जब तक मुस्लिम समुदाय अपनी स्वतंत्र सोच को न रखते हुए अपने आपको राजनीतिज्ञों के इशारे पर चलता रहेगा, तब तक इस तरह के विभ्रम बने ही रहेंगे. जब तक मुस्लिम समुदाय अपने आपको वोट-बैंक मानकर इस देश की मुख्य-धारा में शामिल होने का प्रयास करता रहेगा, तब तक वो इन राजनीतिज्ञों के हाथ की कठपुतली ही बना रहेगा. यदि आदर्शवादी नारे की संकल्पना को सत्य करना है तो मुस्लिम समुदाय को कुछ बातों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है.

11 जून 2013

एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ...एक काटेगा तो दूसरा डसेगा



भाजपा ने मोदी के नाम की घोषणा चुनाव प्रचार अभियान के प्रमुख के रूप में की तो तमाम गैर-भाजपाइयों के दिल पर साँप लोट गया मानो उनके हाथ से आज ही सत्ता निकल गई हो. विरोधी दलों के साथ-साथ मीडिया पूरे जोर-शोर से नरेंद्र मोदी के नाम पर सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने में लगे हैं. सबकुछ इस तरह से प्रदर्शित किया जा रहा है मानो मोदी का नाम सिर्फ और सिर्फ दंगे का सूचक हो. बहरहाल, आज देश की राजनैतिक स्थिति विभ्रम पैदा करने वाली है. किसी भी एक दल, किसी भी एक व्यक्ति के पक्ष में पूरे दावे के साथ सभी का खड़ा होना संभव सा नहीं दीखता. किसी एक की तरफ उँगली करने पर बाकी की चार उँगलियाँ वापस बाकी सभी की तरफ इशारा करती हैं. इस विभ्रम की स्थिति में वो व्यक्ति नहीं होता है जो बिना किसी विचार के सिर्फ और सिर्फ अपने समर्थक दल के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करता है. समस्या का शिकार वह व्यक्ति होता है जो सिर्फ और सिर्फ आम मतदाता है. मीडिया के द्वारा जिस तरह से मोदी का सांप्रदायिक चरित्र दिखाया जा रहा है, समूची भाजपा अछूत की भांति दिखाई जा रही है उसके बाद यदि किसी और दल को वोट करने का विचार आम मतदाता बनाये भी तो प्रमुख-प्रमुख दलों की स्थिति से और भी भ्रम के हालात बनते हैं. उसे समझ में नहीं आता कि 
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१- क्या उस कांग्रेस को वोट दिया जाए जिसके पास १९८४ के नरसंहार करवाने का अलंकरण है. उसके तत्कालीन पदाधिकारियों, वरिष्ठ नेताओं ने खुलेआम निर्दोष सिखों को खुलेआम मौत के घाट उतारा था. इस पर विद्रूपता ये कि बजाय आंसू बहाने के, कोई क्षोभ जताने के कहा ये गया कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती में कम्पन होता है. ये वही दल है जिसने किसी समय में लोंगोवाल, भिंडरावाले को पैदा किया था. स्वार्थपरक राजनीति के कारण आपातकाल जैसे कदमों को उठाया था और वर्तमान में सैकड़ों घोटालों, भ्रष्टाचार के अलंकार भी इसी दल में शोभायमान हो रहे हैं.
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२- इससे इतर क्या उस सपा को वोट किया जाए जिसके सामने सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम वोटबैंक प्रभावी रहता है. किसी न किसी रूप में एक तरह का सांप्रदायिक स्वरूप देश-प्रदेश में इस दल के द्वारा बनाया जाता रहा है. हाल में इस दल द्वारा उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटबैंक के लालच में आतंकवादियों से मुक़दमे वापस लेने की कवायद की जा रही है. ये तो भला हो अदालत का जिसने ऐसे सांप्रदायिक कदम को रोक दिया. यदि निर्दोषों के खून के छींटे भाजपा, कांग्रेस के दामन पर लगे हैं तो ये दल भी इससे बचा नहीं रह सका है. ये वही दल है जिसके ऊपर १९९० में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाए जाने का दाग है.
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३- अब यदि मतदाता एक बारगी बसपा को वोट देने का मन बना भी ले तो उसे बसपा में जातिगत विभेद को और बढ़ाने का आरोप दीखता है. शायद मीडिया उस बात को भूल गई हो किन्तु कोई आम भारतीय अभी तक नहीं भूला होगा कि इसी बसपा का कभी नारा हुआ करता था 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार'. वर्तमान में बसपा द्वारा भले ही दलित-ब्राह्मण, दलित-क्षत्रिय, दलित-सवर्ण गठजोड़ बनाने की कोशिश की गई हो पर वे सभी कोशिशें सिर्फ और सिर्फ सत्ता के लिए ही रहीं. इसके बाद भी बसपा का जातिगत विभेद को पाटने का काम न होकर जातिगत विभेद बढ़ाने का काम ही होता रहता है. किसी समय में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में ‘मुहर लगेगी हाथी पर वरना गोली छाती पर’ का नारा बुलंद करने वाले बसपा कार्यकर्त्ता रहे हों या फिर एससी/एसटी एक्ट में निर्दोषों को जबरन फंसाए जाने का कुचक्र रहा हो, सभी में विद्वेष की बू ही आती दिखती है.
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४- या फिर मतदाता लालू, शरद, पासवान, ममता, अजीत, जयललिता, करुणानिधि, शिबू सोरेन आदि तमाम मौकापरस्त नेताओं के लिए वोट करे, जिनका काम सिर्फ और सिर्फ मौका ताड़कर अपना उल्लू सीधा करना रहा है. इन तमाम नेताओं को, इनके दलों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि वे आपस में किस तरह का व्यवहार करते हैं. चुनाव आते ही मोर्चा बनाने की कवायद इनके द्वारा शुरू हो जाती है और सभी प्रमुख नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री बनने के सपने देखने शुरू कर दिया जाता है. इनकी मौकापरस्ती के चलते इनकी निष्ठां सिर्फ और सिर्फ कुर्सी से रहती है. कोई गठबंधन, कोई मोर्चा, कोई सरकार इनके लिए मायने नहीं रखती है. ‘अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता’ जैसा सूत्रवाक्य इनके लिए प्रमुख होता है.
ऐसे में जबकि सभी दल हमाम में नंगे की तरह से प्रतीत हो रहे हों तो क्या भाजपा, क्या कांग्रेस; क्या एनडीए, क्या यूपीए; क्या सपा, क्या बसपा; क्या सांप्रदायिक, क्या धर्मनिरपेक्ष, क्या हिन्दू, क्या मुस्लिम; क्या दलित, क्या सवर्ण....सब एक थैली के चाटते-बट्टे हैं. देखा जाये आम मतदाता के लिए ‘एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ....एक काटेगा तो दूसरा डसेगा’ वाली स्थिति में दिखते हैं ये राजनैतिक दल.
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