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26 मार्च 2025

पुरानी उरई को खोजते दो अफलातून

कई वर्षों के बाद संदीप का उरई आना हुआ. प्रयागराज से सरप्राइज यात्रा के साथ रात को लगभग नौ बजे उसका उरई आना हुआ. घर पहुँचकर सामान्य हाल-चाल का आदान-प्रदान होने के बाद, चाय-जलपान के बाद दस बजे करीब स्कूटर उठाकर अपने समय की उरई को खोजने निकला गया. दोनों मित्र रात को बहुत देर तक उरई की सड़कों-गलियों में स्कूटर को दौड़ाते हुए पुराने दिनों में घूमते रहे, बीती बातें याद करते रहे. अबकी चमकती, रौशनी से जगमगाती, सीसी रोड पर दौड़ती उरई में वो बात नजर नहीं आती जो हमारे समय की उस उरई में थी. 


बहरहाल, नवीनता का स्वागत करते हुए, विगत को याद करते हुए बजाय तमाम सारी फोटोग्राफी करने के हम दोनों मित्र घूमते-बतियाते-ठहाके लगाते उरई के रंग में रँगे रहे.




14 अप्रैल 2024

रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा के साथ अन्याय



रानी लक्ष्मीबाई की यह प्रतिमा उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में उरई नगर में लगी हुई है. शहर के मध्य में स्थित टाउनहॉल के सामने स्थित इस प्रतिमा के साथ इस तरह का अन्याय, अशोभनीय हरकत लगभग प्रत्येक पर्व, त्यौहार, जयंती आदि पर की जाती है. सजावट के नाम पर कभी घोड़े का सहारा लिया जाता है तो कभी रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा सहारा बनती है. 

कई-कई बार इस बारे में सम्बंधित व्यक्तियों को जानकारी भी दी गई, सुधार भी करवाया गया मगर ये हर बार की कहानी बनी हुई है. ये नया हाल इसी 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती के अवसर पर किया गया है. प्रतिमा सजाने के चक्कर में बिजली की झालर को घोड़े के कान से बाँध दिया गया है. 

अब इसके साथ-साथ आप लोग रानी लक्ष्मीबाई की तलवार को न देखने लगिएगा. अंग्रेजों द्वारा झुकाई न जा सकी तलवार को प्रशासन द्वारा बराबर झुकाए रखा गया है, तोड़े रखा गया है. इस बारे में कई बार लिखित रूप से शिकायत की जा चुकी है मगर प्रशासन के कानों में जूँ नहीं रेंगती है. 

स्वतंत्र देश में हम लोग अभिशप्त हैं शायद अपने महानुभावों की ये दुर्दशा, अपमान देखने को. 



 

29 अक्टूबर 2023

हर कदम पर प्रोत्साहित करते अभय अंकल

आज, 29.10.2023 को अभय अंकल की स्मृति में संगीत निशा का आयोजन वातायन, उरई द्वारा किया गया था. इस एक पंक्ति में दो-तीन शब्द हमारे ब्लॉग के पाठकों के अलावा बहुत सारे लोगों के लिए एकदम नए और अपरिचित होंगे. इसमें पहला शब्द है अभय अंकल, देश-विदेश के वे सारे लोग जो हमसे परिचित हैं, वे सहज ही अभय अंकल से समझ लेंगे कि किस व्यक्तित्व के लिए ये लिखा गया है. हमसे अपरिचित लोगों के लिए एक संक्षिप्त परिचय देना तो बनता ही है. यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि यदि विस्तीर्ण परिचय देना शुरू कर दें तो यह पोस्ट बहुत ही अधिक लम्बी हो जाएगी. साइंस कॉलेज, ग्वालियर से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे उरई के दयानंद वैदिक महाविद्यालय में रक्षा अध्ययन विभाग में अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे. इसके अलावा जनपद की अनेकानेक सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाओं में पदाधिकारी के रूप में भी सक्रिय रहे. 



पहली पंक्ति में जिस दूसरे अनजान शब्द वातायन का जिक्र है, उसके जन्म के पीछे दो लोगों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. इसमें एक तो अभय अंकल हैं ही और दूसरे थे ब्रजेश अंकल यानि कि डॉ. ब्रजेश कुमार जी. (ब्रजेश अंकल के बारे में एक पोस्ट अलग से) अभय अंकल वातायन के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में रहे. इस सांस्कृतिक संस्था द्वारा अनेकानेक नाट्य-प्रस्तुतियाँ जनपद में और जनपद के बाहर भी दी गईं. नाट्य-प्रस्तुतियों के अलावा अनेकानेक सांस्कृतिक कार्यक्रम वातायन के बैनर पर होते रहे. अभय अंकल के बारे में एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि वे नैसर्गिक रूप से बहुत बेहतरीन संयोजक थे. किसी भी तरह का कार्यक्रम हो, उनके द्वारा ऐसे संयोजन किया जाता मानो वह कार्यक्रम उनकी उँगलियों पर नाच रहा हो.


इस संयोजन क्षमता के पीछे उनका बुद्धि कौशल तो था ही, उससे बड़ी थी टीम भावना. यहाँ बहुत सारी बातों का जिक्र न करने स्वयं अपने अनुभव से गुजरी एक घटना का जिक्र करना चाहेंगे, जिसने सिद्ध किया कि अभय अंकल किस तरह अद्भुत नेतृत्व क्षमता से परिपूर्ण थे. वर्ष 2004 की बात है. एक दिन दोपहर में अभय अंकल का फोन आया कि तुरंत विभाग में आओ. अगले क्षण हम डीवी कॉलेज में रक्षा अध्ययन विभाग में उपस्थित थे. एक पत्र उन्होंने हमारे सामने रखते हुए कहा कि एक नेशनल सेमीनार करवाना है. तुम बताओ क्या काम करोगे इसमें? हमने कहा कि जो भी काम हमारे लायक समझें. इस पर अंकल ने कहा कि हमें पता है कि तुम सभी काम बेहतर ढंग से कर सकते हो पर जिसमें तुम्हारी रुचि हो वो बताओ. हमने पूरी बात अंकल पर ही डाल दी.


कुछ देर इधर-उधर की बातों के बाद अंकल ने कहा कि तुम स्मारिका का काम देख लो. इंकार का कोई मतलब ही नहीं था. स्मारिका पर काम अगले दिन से ही शुरू हो गया. अंकल द्वारा बस इतना बताया गया कि इस पर इतना बजट खर्च करना है और इतने पेज की बनना है. इसके बाद उनके द्वारा किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया गया. हम प्रतिदिन अपने काम के बारे में अंकल को बताते तो वे कहते कि जब फाइनल हो जाये तभी बताना. हमें विश्वास है कि तुम बेहतर स्मारिका निकाल दोगे. फाइनल होते-होते एक समस्या एकदम अंत में आ गई. अभय अंकल द्वारा बताये गए पेज से एक पेज अधिक हो रहा था. इसका कारण भी अभय अंकल द्वारा दिया गया सन्देश था. एक दिन बड़े झिझकते हुए उनको बताया तो बोले कि जब पूरा सम्पादकीय अधिकार तुम्हारे पास है तो झिझको नहीं, अपना काम करो. बस फिर क्या था, अभय अंकल के सन्देश पर भी सम्पादकीय कैंची चला दी गई.


उन्होंने और राजेन्द्र निगम अंकल ने स्मारिका प्रकाशित होने के ठीक एक दिन पहले उसका फाइनल रूप देखा और बहुत आशीर्वाद दिया. स्मारिका का कवर पेज, उसके अन्दर की सामग्री, उसका क्रम आदि सबकुछ हमारे द्वारा ही निर्धारित किया गया. इस पूरे काम को करके इतनी ख़ुशी मिली जो व्यक्त नहीं की जा सकती. इसका कारण काम करने की पूरी स्वतंत्रता मिलना था. इस घटना ने एक सीख दी कि यदि काम सहज रूप में सफलता के साथ पूर्ण करवाना है तो अपनी टीम पर विश्वास करते हुए उसे पूरी तरह से स्वतंत्र कर देना चाहिए. अभय अंकल द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से मिली इस सीख ने आज तक अपना असर दिखाया है. टीम के साथ किये जाने वाले कोई भी काम आजतक असफल नहीं हुए हैं.


आज उनकी स्मृति में आयोजित संगीत निशा के दौरान अभय अंकल बार-बार स्मृति-पटल पर उभरते रहे, आँखों को नम करते रहे, होंठों पर मुस्कान लाते रहे. अभय अंकल को सादर नमन. 





 

07 जुलाई 2023

डिवाइडर का खेल

विगत कई वर्षों से उरई नगर पालिका की राजनीति में उतार-चढ़ाव जैसी स्थिति बनी रही. न तो राजनैतिक दल समझ सके कि ये हो क्या रहा है और न ही मतदाताओं की समझ में आया कि वे करते क्या हैं? मतदाताओं ने मूड बनाया तो किसी एक दल को जिता दिया और अगली ही बार दूसरे दल के हाथ में अध्यक्ष पद को सौंप दिया. नामांकन, मतदान से लेकर मतगणना तक के शोर-शराबे के बाद मतदाता एक आवाज़ नहीं उठाते कि क्या सही हो रहा, क्या गलत हो रहा.




वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष के कार्यकाल को शुरू हुए अभी एक-दो महीने ही बीते हैं कि उठापटक शुरू हो गई है. पिछले अध्यक्ष द्वारा शहर की बहुत सी सड़कों पर डिवाइडर का निर्माण करवाया गया था. इन सड़कों में विशेष रूप से कालपी रोड था, जहाँ पहले तो अपनी मनमर्जी से सड़क पर गड्ढे खुदवा कर डिवाइडर बनवाने का विचार था. बाद में ऊपर से हथौड़ा चला तो अध्यक्ष जी अपना हथौड़ा भूल गए. बावजूद इसके न्यायालय को छोड़कर शेष सड़क पर डिवाइडर का निर्माण करवा दिया गया. आज देखने को मिला कि वे सारे के सारे डिवाइडर उखड़े पड़े हुए हैं. सड़क के किनारे टूटे-उखाड़े हुए डिवाइडर का पड़ा होना अपने आपमें कहानी है.


इस समय शहर में सुन्दरीकरण के नाम पर तोड़-फोड़ मची हुई है. कहीं प्रशासन द्वारा पिछले बजट को ठिकाने लगाया जा रहा है, कहीं वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष द्वारा नए बजट की जुगाड़ की जा रही है. इस पूरे प्रकरण में, पूरी प्रक्रिया में कोई नहीं पूछ रहा कि आखिर बने-बनाए उचित निर्माण को क्यों तोड़ा जा रहा है? यदि इन्हीं डिवाइडर की बात करें तो कहीं से कोई सवाल नहीं उछला कि ये क्यों तोड़े जा रहे? यदि पिछले अध्यक्ष द्वारा बनवाए गए डिवाइडर गलत थे तो तत्कालीन जिलाधिकारी अथवा उच्चाधिकारियों ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? इसका अर्थ यही लगाया जाये कि उनका निर्माण सही था. यदि निर्माण सही था तो अब तोड़े जाने का किसी उच्चाधिकारी द्वारा विरोध क्यों नहीं किया गया? क्या माना जाये कि बजट को ठिकाने लगाने में ऊपर से नीचे तक सब मिले हुए हैं?




वैसे देखा जाये तो उरई में डिवाइडर का खेल कोई नया नहीं है. सबसे पहले लोहे के डिवाइडर लाये गए थे, जो अस्थायी थे और उनको उपयोगिता के अनुसार कहीं भी लगाया जा सकता था. सैकड़ों की संख्या में बने वे डिवाइडर कब कबाड़ में बदल गए पता ही नहीं चला. उनकी जगह पत्थर के डिवाइडर बनवाए गए, जो छोटे-छोटे हिस्सों में थे. वे भी लोहे वालों की तरह की टूट-फूट का शिकार होते हुए कबाड़ का हिस्सा बनते रहे. अभी कुछ पत्थर के डिवाइडर कोंच रोड पर अंतिम साँसें भरते देखे जा सकते हैं. लोहे के बने डिवाइडर में से कुछ अपनी अंतिम साँसें गिनते हुए कभी मेडिकल पर, कभी किसी चौराहे पर अपने अस्तित्व को दिखाते मिल जाते हैं.




बहरहाल, नगर पालिका अध्यक्ष हों या फिर प्रशासनिक उच्चाधिकारी, सभी अपने आपमें प्रशासन हैं. इसलिए जो हो रहा वो सही. हम जैसे लोग तो वैसे भी अडंगा लगाने वाले, उँगली करने वाले कहे जाते हैं. आगे भी कहे जाते रहेंगे मगर खामोश नहीं बैठेंगे.

 






 

01 दिसंबर 2021

उरई टाउन हॉल परिसर में विशाल तिरंगा : वीडियो

उरई (जालौन) टाउन हॉल परिसर में विशाल तिरंगा 
01.12.2021




 


उरई में फहराया विशालकाय तिरंगा

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा कहीं भी लहरा रहा हो, किसी भी आकार का हो हमें व्यक्तिगत रूप से बहुत आकर्षित करता है. किसी भी जगह पर लहराते, फहराते ध्वज को देखकर लगता है कि बस उसे देखते रहा जाये. दिल-दिमाग जैसे झंकृत होते रहते हैं और मन मंत्रमुग्ध सा होकर बस उसे ही देखता रहता है. किसी समय में राष्ट्रीय ध्वज का लहराना-फहराना सिर्फ राष्ट्रीय पर्वों पर ही होता था और वो भी शासकीय भवनों, इमारतों पर. कालांतर में कुछ कानूनी विषयों के उठाये जाने के बाद आम आदमी को भी ध्वज फहराने का अधिकार मिला. सरकारी इमारतों के साथ-साथ निजी भवनों में राष्ट्रीय ध्वज को फहराए जाने की छूट मिली. इसी क्रम में देश के विभिन्न शहरों में पार्कों में, किसी विशाल जगह पर, मुख्य स्थलों पर बड़े-बड़े ऊँचे पोल के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का भव्य स्वरूप लहराता-फहराता दिखाई देने लगा.


बरसों पहले राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का भव्य, मनमोहक रूप में फहराना दिल्ली में राजीव चौक पर देखा था. उससे पहले इतने विशालकाय तिरंगे को कहीं फहराते हुए नहीं देखा था. लगभग डेढ़ सौ फीट ऊँचे पोल पर विशालकाय तिरंगा का फहराना देखकर एक पल को हम सम्मोहन की स्थिति में आ गए थे. किस काम से वहाँ आना हुआ है, भूलकर उस भव्य स्वरूप को अपने कैमरे में कैद करने लगे थे. उसे देखकर मन में विचार आया था कि क्या इस तरह विशाल स्वरूप तिरंगा हमारे उरई में नहीं फहराया जा सकता? क्या इसके लिए स्थानीय स्तर पर पहल नहीं की जा सकती है? इस बारे में कई बार चर्चा हुई, सम्बंधित व्यक्तियों तक अपनी बात पहुंचाई गई. अनेक बार तमाम सारी बैठकों, मीटिंगों में तिरंगा शहर में लगाये जाने सम्बन्धी बातें उठीं मगर कोई भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया जा सका.


आज, दोपहर बाद महाविद्यालय से वापसी हो रही थी. मौसम बहुत सुहाना बना हुआ था. हलकी-हलकी हवा भी चल रही थी. जिसे गुलाबी सर्दी कहा जाता है, उसका एहसास हो रहा था. उसी गुलाबी एहसास में एकदम से खुली आँखों के सामने स्वप्न सा तैर गया. बादलों भरे आसमान में तिरंगा शान से लहरा रहा था. एक पल को विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा उरई में देखने को मिल रहा है. स्कूटर सी दिशा में मोड़ दिया. सामने वास्तविकता होने के बाद भी वास्तविकता स्वीकार सी नहीं हो रही थी. फिलहाल, सबकुछ भूल कर अपनी पूरी भव्यता के साथ लहराते तिरंगे को कैमरे में, दिल में कैद करने लगे.




राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा उरई शहर के टाउन हॉल परिसर में सौ फीट ऊँचे पोल पर पूरी आन-बान-शान के साथ लहरा रहा था. उसके लगाये जाने के पीछे की कहानी की यहाँ चर्चा करना उचित नहीं. उस समय जानकारी हुई कि अभी उसके आसपास रौशनी बनाये रखने की दृष्टि से लाइट लगाये जाने का काम चल रहा है, जो देर रात तक पूरा होगा. रात को दस बजे के आसपास सौ फीट ऊँचाई पर लहराते तिरंगे को रौशनी में रखने के लिए उसके चारों तरफ लाइट को व्यवस्थित करने का काम पूरा हो सका. तिरंगे का या कहें कि अपने शहर में विशाल तिरंगे को फहराते देखने की अभिलाषा के पूरा होने का सम्मोहन था कि रौशनी में जगमगाते देखने की मंशा लेकर रात दस बजे भी तिरंगे के दर्शन करने पहुँच गए.




स्थानीय जिम्मेवार लोगों के द्वारा यह पुनीत कार्य करवाया जा रहा है, सो सम्बंधित व्यक्तियों से जान-पहचान भी थी. इसी के चलते लाइट की व्यवस्था सम्बन्धी कुछ स्पेशल टिप्स भी दे डाले, जिनको माना भी गया. चारों तरफ से पड़ती रौशनी में तिरंगा अपनी आभा को बिखेरने में लगा था. किसी समय दिल्ली के राजीव चौक पर लहराते तिरंगे को देखकर मन में उपजी अभिलाषा आज पूरी हुई. उरई शहरवासियों के लिए यह गौरव का विषय है, अब हम भारतीयों की शान, गर्व के प्रतीक तिरंगे की आन-बान-शान की रक्षा करना, उसकी देखभाल करने का दायित्व समस्त उरईवासियों का है. 





24 मई 2021

यार की यारी और रात की आवारगी

उस शाम अचानक से एक मित्रवर प्रकट हुए घर पर. लगभग सोलह-सत्रह साल बाद राहुल को अपने सामने देखकर आश्चर्य ही हुआ. बरसों-बरस की बातें शुरू हुईं तो फिर उस रात उसे उरई में रह रहे उसके रिश्तेदार के घर वापस न जाने दिया. अगली सुबह किसी जरूरी काम को निपटाने के बाद शाम को आने का कहकर महाशय चले गए.


उस शाम अगले का आना न हुआ. चूँकि जब महाशय उरई में पढ़ते थे तो उरई में जितनी जनसंख्या थीउससे कहीं ज्यादा उनकी रिश्तेदारियाँ थीं. यही सोचकर कि पता नहीं किसके साथ अड्डेबाजी कर रहे होंगे, उसे फोन न किया. अगला दिन भी खाली निकल गया तो रात को लगभग दस बजे उसे फोन किया.


जैसा कि एक ही लँगोटी बाँधने वाले दोस्तों के साथ बातचीत होती है, वैसे ही अत्यंत शालीन (इतने शालीन कि उन शब्दों को यहाँ लिख नहीं सकते) शब्दों में उसके न आने का कारण पूछा तो अगले ने कहा कि बस दस मिनट में बताते हैं.


पाँच मिनट बाद ही राहुल का फोन आया कि हम घर आ रहे हैं मगर घर में न बैठेंगे. उरई घूमेंगे. हमने हामी भर दी और लगभग पंद्रह मिनट बाद अपनी चिर-परिचित मुस्कान, हड़बड़ी के साथ महाशय घर के दरवाजे पर थे. एक मिनट को भी न बैठने की जिद के साथ बस उरई घूमने की रट लगी हुई थी.




बिना एक पल की देरी किये हम दोनों स्कूटर पर सवार हो निकल लिए रात लगभग साढ़े दस बजे उरई की सड़कों पर. अभी अपनी गली से निकल कर सड़क पर आये ही थे कि महाशय ने अगली रट लगाईं हमारा स्कूटर चलाने की. अगल-बगल पहिये लगे होने के कारण स्कूटर एक तरफ को भागता है. हर एक के लिए चलाना सहज नहीं होता है. कुछ ऐसा ही राहुल के साथ हो रहा था मगर प्रत्येक काम को कुशलता से कर लेने के हुनर के चलते वह धीमी गति से स्कूटर को एक तरह से सड़क पर इधर-उधर लहराते हुए लुड़का सा रहा था. देर रात सुनसान सड़क पर ऐसे लहराते हुए स्कूटर चलाते देख कुछ दूर तक पुलिस की एक जीप हम लोगों के पीछे लग गई. किसी तरह की आपत्तिजनक स्थिति न देखकर जीप कुछ देर बाद आगे निकल गई.


इसके बाद स्कूटर की ड्राइविंग सीट पर बैठे हम और स्कूटर ने उरई की सड़कों को नापना शुरू किया. इधर-उधर की जगहों को घुमाने के बाद रेलवे स्टेशन की सैर करने पहुँच गए. वहाँ की चाय, रसगुल्ले के साथ हंगामा चलता रहा. ट्रेन के साथ फोटो, वीडियो बनाये गए तो प्लेटफ़ॉर्म पर मस्ती की जाती रही. लगभग चार बजे के आसपास राहुल ने उस ट्रेन की आने की स्थिति मालूम की, जिससे उसे जाना था. जानकारी मिली कि ट्रेन एक घंटे लेट है. उसके बाद वापस घर लौटना हुआ. घर की एक कप गरमागरम चाय को डकार कर राहुल अपने रिश्तेदार के घर को निकल पड़ा. हमने कहा कि रुको छोड़ आते हैं तो वो बोला, न रहने दो. अभी दौड़ते हुए जाकर बापू को उठाएँगे और कहेंगे कि देखो हम मॉर्निंग वाक करके भी लौट आये, आप अभी तक सो रहे हैं.


हँसी का ठहाका लगाते हुए महाशय भोर के धुंधलके में गुम हो गए. बाद में अगले का फोन आया जबकि ट्रेन ने उसको अपने अन्दर बिठा कर दौड़ना शुरू कर दिया था.


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11 अक्टूबर 2020

तीन रुपए की उधारी ने रोका रिश्ते का रास्ता

फिल्मों के सीक्वेल बनने के दौर में बर्थडे का सीक्वेल बनाया जाना वर्ल्ड रिकॉर्ड हो सकता है. इसके लिए सारिका को और धर्मेन्द्र को ही श्रेय दिया जाना चाहिए. आपको आश्चर्य लग रहा होगा न? लगना भी चाहिए आखिर अवसर भी ऐसा है. अमिता दीदी के स्नेहिल सान्निध्य में सारिका की बर्थडे के अवसर पर धर्मेन्द्र द्वारा सप्रेम प्रदान किया गया गिफ्ट सभी के लिए सरप्राइज बना हुआ था. इस सरप्राइज को दूर करने के लिए ही बर्थडे का सीक्वेल बनाया गया.



अब पार्टी के नाम पर जो-जो होना था वो तो हुआ ही. लज़ीज़
, सुस्वादु व्यंजन की तस्वीरें भोजनात्मक हिंसा को रोकने की दृष्टि से सार्वजनिक नहीं की जा रही हैं. बस अदरख वाली मजेदार चाय की चुस्की, वो भी कुल्ल्हड़ की सोंधी महक और स्वाद के संग, वाली तस्वीरें ही सार्वजनिक करने के अधिकार दिए गए हैं. इस चुस्की के बीच तीन रुपये की उधारी के कारण सम्बन्ध का आगे न बढ़ना, चुहलबाजी करते हुए मित्र की ससुराल में देर रात अपने बेधड़क अंदाज़ से ग्रामवासियों में अनजाना सा भय भर आना, मित्र के सम्बन्धी संग षड्यंत्रकारी विवाह के अवसर को पैदा करवाने की असफल कोशिशों के साथ न जाने कितनी-कितनी कहानियों ने ड्राइंग रूम को ठहाकों से भर दिया.




सीक्वेल को सफल बनाने में मिलनसार
, हँसमुख विवेक जी अपने जोशीले-फुर्तीले अंदाज में उसका निर्देशन करने से नहीं चूके. मुन्नू भाईसाहब और चच्चू की जुगलबंदी सदैव की तरह माहौल को जीवंत बनाती रही. राकेश द्विवेदी जी और सत्येन्द्र पस्तोर जी उसमें अपना तड़का लगाकर वहाँ की फिजाओं में बिखरती कहानियों के क्रम को और विस्तार देते रहे. शेष लोग तो फोटो में दिख ही रहे हैं, जो नहीं दिख रहे वे इस सीक्वेल में अपनी-अपनी भूमिका निभा कर निकल लिए. इसमें अपने दायित्व बोध का ईमानदारी से निर्वहन करने वाले शिवेश भाईसाहब के साथ अंकुर शुक्ला का नाम लिया जा सकता है. धर्मेन्द्र भी अपनी भूमिका को निभाते हुए गायब हो गए. उनसे अगली पार्टी में आपसे मुलाक़ात करवाई जाएगी क्योंकि अभी तो पार्टी शुरू हुई है.


अब आज की सबसे अधिक पसंद की गई कहानियों में तीन रुपए की उधारी के कारण सम्बन्ध का आगे न बढ़ पाने की कुछ चर्चा. हम सबके बीच के, सबके चहेते भाईसाहब की युवावस्था के दिन थे. उरई के प्रसिद्द व्यंजन का स्वाद उनको किशोरावस्था में लग गया था. यह व्यंजन ऐसा है जिसका आनंद बहुतायत नागरिक उठा रहे हैं और बहुत से ऐसे हैं जो दीवारों, सड़कों, कपड़ों आदि को लाल भी करने की कलाकारी दिखाते रहते हैं.


फिलहाल, आगे की मूल चर्चा. उनकी उम्र हो गई थी विवाह योग्य सो एक परिवार खोजबीन करते हुए उनके घर तक पहुँचा. अब पता नहीं उनका सम्बन्ध वहाँ नहीं होना था अथवा हम लोगों को एक मजेदार संस्मरण प्राप्त होना था सो लड़की वालों की मुलाकात सीधे उन्हीं भाईसाहब से हो गई. घर में कोई और बड़ा न होने के कारण बातचीत का अगला क्रम चलता उसके पहले ही तीन रुपये की उधारी का धमाका हो गया.


मेहमाननवाजी के क्रम में पानी वगैरह के साथ बात आगे बढ़ने से पहले ही उरई के प्रसिद्द व्यंजन को खाने की इच्छा व्यक्त की गई. उनके खुद के और उनके अभिन्न मित्र के पास न तो वह व्यंजन पुड़िया निकली और न ही उसे मँगवाने के लिए समुचित धन निकला. समुचित धन से तात्पर्य आप लोग हजार-लाख रुपयों से न लगा लीजिएगा. व्यंजनविहीन और धनविहीन जेबों को देखने के बाद घर आये हुए सम्बन्धियों ने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाल कर व्यंजन मँगवाने की आतुरता दिखाई.


बस, अब आप समझे समुचित धन. ये उस दौर की बात चल रही है जबकि व्यंजन-पुड़िया चवन्नी-अठन्नी के भाव मिला करती थी. भावी दूल्हा बनने का ख्वाब आँखों में लगभग सजा चुके भाईसाहब ने अपने किसी चेले लला को रुतबे सहित आवाज़ दी. लला प्रकट हुए तो मेहमानों की जेब से निकले पाँच रुपये भाईसाहब के हाथों से गुजरते हुए लला की हथेलियों तक पहुँच गए. भावी दूल्हे ने लला को आदेश सुनाया, दुकान पर जाकर दो रुपइया के मौनी गुटका ले अइयो और तीन रुपइया उधार हैं बे चुका दइयो.


समझ सकते होंगे आप, मेहमान के पाँच रुपयों से ही उनके लिए व्यंजन-पुड़िया (अब तो आप समझ ही गए होंगे इसे, ये है गुटखा) मँगवाना और अपने तीन रुपए उधार चुका देना संबंधों को आगे न ले जा सका. हमें तो लगता है कि बेचारे लड़की वाले यहाँ चूक कर गए. उन भाईसाहब ने जिस अधिकार से पाँच रुपयों से खातिरदारी और अपनी उधारी को निपटा दिया, वैसा अधिकार जताने वाला लड़का मिलना गौरव की बात होती उन लड़की वालों के लिए. बहरहाल, वे लोग इस गौरव से वंचित रह गए और हम लोगों को एक रोचक संस्मरण के साथ ठहाके लगाने का मौका अवश्य दे गए.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

26 जुलाई 2020

बीते दिनों की याद दिलाता खामोश शहर

आजकल हमारे जनपद में बाज़ार शाम चार बजे बंद हो रहा है. बंद हुए बाजार में इसके बाद सिर्फ दवा-दारू की दुकानों के खुले रहने की अनुमति है. ये दवा-दारू वह संयुक्त शब्द नहीं जो आमतौर पर किसी बीमार के इलाज के लिए बोला जाता है. यहाँ इस शब्द का तात्पर्य दो तरह की दुकानों से ही है. एक दुकान दवाओं की और दूसरी दुकान शराब की. बाजार बंद होने के बाद यही दो दुकानें खुली मिलतीं हैं. बाजार खुले रहने की स्थिति में दिन भर दिखाई पड़ने वाली भीड़ शाम को गायब रहती है. दिन की तुलना में कहा जाये तो लगभग न के बराबर. कई-कई दिन की घर-बंदी के बाद शाम को अपने स्कूटर पर बैठे-बैठे शहर का आदतन एक चक्कर लगाने के दौरान अथवा शाम के समय किसी अत्यावश्यक काम से निकलने के दौरान या फिर सप्ताह में होने वाले दो दिनों के लॉकडाउन के दौरान मेडिकल कार्य से निकलने पर शहर की जो स्थिति दिखाई देती है वह बीते दिनों को याद करवा देती है.



गिनी-चुनी संख्या में वाहनों का चलना, इक्का-दुक्का व्यक्तियों का टहलना, न के बराबर चार पहिया वाहनों का गुजरना, कोई शोर नहीं, गाड़ियों-दोपहिया वाहनों के हॉर्न का शोर नहीं, इंसानों की चीख-पुकार नहीं, कोई धक्का-मुक्की नहीं. ये सबकुछ देखकर अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं. 80 के दशक में अपने घर से जीआईसी पढ़ने के लिए जाने पर सड़कें कुछ इसी तरह की दिखाई देती थीं. दिन को खुले बाजार में भी उस समय लगभग ऐसी ही भीड़ हुआ करती थी. गिने चुने वाहन सड़कों पर अपना रोब दिखा रहे होते थे. सड़क पर उस समय साइकिल और रिक्शा का ही साम्राज्य हुआ करता था. दिन के अलावा कई बार रात को परिवार के साथ किसी कार्यक्रम में अथवा उरई की टाकीज में कोई फिल्म देखने जाने को मिल जाया करता था तो लगभग ऐसा ही सन्नाटा पसरा हुआ दिखाई देता था. अच्छे से याद है कि उन दिनों में भी गलियाँ निपट सूनी रहती थीं, आजकल भी सूनी दिख रही हैं. उस समय भी इक्का-दुक्का लोग सड़कों पर टहलते दिखते थे, आज भी वैसा ही मंजर दिखाई दे रहा है. उस समय भी शांत वातावरण मन को सुकून देता था कुछ ऐसा ही आज हो रहा है. वातावरण की ख़ामोशी, सन्नाटा, शोर-रहित सड़कें एक अलग तरह का आनंद दे रहीं हैं.

हमारे कुछ व्यापारी मित्र इस व्यवस्था से प्रसन्न दिखाई दे रहे हैं. उनका कहना है कि कोरोना काल के पहले आपस में व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता होने के कारण दुकान खोले रखने की मजबूरी भी थी. आर्थिक लाभ को अधिकाधिक प्राप्त कर लेने की मानसिकता के कारण भी दुकान को खोलना आवश्यक समझ आता था. आज जबकि नियम के अनुसार सभी दुकानों को एक निश्चित समय पर बंद होना ही है. ऐसे में शाम का बहुत बड़ा भाग उनको अपने संबंधों का निर्वहन करने के लिए मिल रहा है. ये बात और है कि कोरोना काल चलने के कारण किसी तरह के बड़े आयोजन नहीं हो रहे हैं, शादी-विवाह संपन्न नहीं हो रहे हैं मगर मिलने-जुलने की व्यवस्था तो संपन्न हो ही जा रही है. मोहल्ले में आपस में शारीरिक दूरी का पालन करते हुए मिलना हो ही रहा है.

निश्चित ही ऐसी व्यवस्था से आर्थिक रूप से कुछ घाटा अवश्य ही व्यापारिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को होगा मगर यदि इस व्यवस्था को एक नियम बनाकर चला जाये तो भविष्य में इसके सुखद परिणाम देखने को मिलेंगे.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

04 जून 2020

समाजोपयोगी हो सकती है यह व्यवस्था

अनलॉक के दौरान बाजार में भीड़ अब अपने पुराने रूप में आती दिख रही है. उरई में शाम पाँच बजे तक बाजार खोलने की अनुमति है. जैसा कि ऊपर से आदेश हैं, उसके अनुसार रात नौ बजे तक नागरिकों के आवागमन पर प्रतिबन्ध नहीं है. एक आवश्यक काम से शाम को सात बजे के बाद निकलना हुआ. उस समय बाजार पूरी तरह से बंद हो चुका था. इक्का-दुक्का दवाओं की दुकानें खुली हुईं थीं. दुकानें बंद करने के नियम का पालन था अथवा प्रशासन का भय कि छोटी-छोटी सी दुकानें भी बंद थीं. ठिलिया वाले भी नहीं दिखाई दे रहे थे. चाय-पान की गुमटियाँ भी बंद मिलीं. सुनसान रास्तों पर चंद वाहनों की लाइट थी, सड़क के खम्बों पर जगमगाती रौशनी थी और शांत सा माहौल. लगा नहीं कि उरई के उसी बाजार में हम चले जा रहे हैं, जहाँ रात को नौ-दस बजे तक बस शोर-शराबा बना रहता था. दुकानों का बंद होना होते-होते भी देर रात कर ली जाया करती थी. गाड़ियों का शोर, हॉर्न का अनावश्यक बजना, तेज रफ़्तार से लोगों को डरातीं बाइक्स तब उरई की सड़कों की पहचान बनी थीं.


अब जो स्थिति दिखाई दे रही है वह किसी छोटे से कसबे से देर रात निकलने का एहसास करवा रही थी. एहसास ऐसा भी हो रहा था जैसा कि भोर में टहलने के लिए निकलते समय हुआ करता था. हलकी-हलकी ठंडी हवा, खम्बों, घरों, दुकानों से झांकती रौशनी और इक्का-दुक्का वाहनों के इंजन की आवाज़. न लोगों की भागदौड़, न अंधाधुंध रफ़्तार, न धक्का-मुक्की, न शोर, न धुआँ, न प्रदूषण बस एक चरम शांति, एक मधुर सा एहसास. लगा कि ऐसा नियम हमेशा के लिए बना दिया जाना चाहिए. किसी भी शहर को सुबह आठ-नौ बजे से शाम छह-सात बजे तक के लिए ही खोलना चाहिए. इससे न केवल कई तरह का प्रदूषण दूर होगा बल्कि समाज में फैली बहुत सी अराजकता अपने आप समाप्त हो जाएगी.



जब जल्दी बाजार बंद होगा तो ज़ाहिर सी बात है कि दुकानदारों को जल्द ही अपने घर पहुँचने का समय मिला करेगा. इससे देर रात पहुँचने के कारण अस्त-व्यस्त होने वाली उनकी दिनचर्या भी नियंत्रित हो सकेगी. बहुत से व्यापारिक परिवारों के बच्चों में इसकी समस्या देखने को मिलती है कि वे अपने पिता, भाई अथवा अन्य पुरुष परिजनों से समय से नहीं मिल पाते हैं. कई बार व्यापारिक अवसरों पर बच्चों को भी अपने परिजनों की सहायता के लिए दुकान पर जाना पड़ जाता है. इस तरह की स्थितियों पर बहुत हद तक लगाम लग सकती है.

इसके साथ-साथ जल्दी दुकान बंद होने के कारण लूट-पाट, छीना-झपटी जैसी घटनाओं पर भी अंकुश लगने की सम्भावना है. लगभग सभी दुकानदार, व्यापारी रात को अपनी-अपनी दुकान बंद करने के बाद बहुत सारा धन, दिन भर की आय अपने साथ लेकर ही घर जाते हैं. कई-कई दुकानदार देर तक दुकान खोले रहते हैं. ऐसे में अँधेरे में अकेले जाने वाले दुकानदारों पर, देर तक खुली दुकानों पर अराजक तत्त्वों का हमला भी हो जाया करता है. उनके साथ लूटपाट हो जाती है. जल्दी बाजार बंद होने से इस पर भी नियंत्रण लग सकता है.

इसी तरह यदि बाजार जल्द बंद होगा तो देर रात तक जलने वाली लाइट को भी रोका जा सकता है. इससे विद्युत ऊर्जा की खपत पर नियंत्रण होने से ऊर्जा की बचत की जा सकती है. लाइट चले जाने की स्थिति में जेनरेटर चलने की स्थिति में होने वाले प्रदूषण को भी रोका जा सकता है.

इनके अलावा बहुत से बिंदु ऐसे हैं जो समाजोपयोगी सिद्ध हो सकते हैं. इस तरह के निर्णय को लागू करने के लिए सरकार से ज्यादा सहयोग नागरिकों का, व्यापारियों का चाहिए है. इसके लिए बहुत से ऐसे व्यावसायिक कार्यों का हवाला दिया जा सकता है जो रात को ही संचालित होते हैं. यदि वाकई ऐसा होता है तो ऐसे व्यापारिक कृत्यों को कुछ निश्चित शर्तों के साथ रात में निश्चित अवधि तक के लिए खोलने की अनुमति दी जा सकती है. देखा जाये तो अभी भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. बाजार को शाम पाँच बजे बंद करने का नियम है मगर शराब की दुकानों को रात नौ बजे तक खोलने की अनुमति मिली है. वर्तमान की भयावहता और उसके सन्दर्भ में लगाई गई बंदी के बाद प्रकृति में आये सकारात्मक बदलाव को देखते हुए भविष्य की मजबूत इमारत के लिए ऐसे निर्णयों का पालन किया जाना अनिवार्य होना चाहिए. नागरिकों और व्यापारियों को भी इसके लिए अपनी सहमति देनी चाहिए.  

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29 जनवरी 2020

शहीदों का सम्मान बचाये रहना भी है श्रद्धांजलि


गणतंत्र दिवस हो या फिर स्वतंत्रता दिवस, इन राष्ट्रीय पर्वों पर दिल-दिमाग पर एक अजब तरह की खुमारी चढ़ी रहती है. ऐसे माहौल में, जबकि देह का रोम-रोम देशभक्ति के एहसास में डूबा रहता है किसी भी देशभक्त के प्रति अनादर जैसी स्थिति देख मन विचलित हो जाता है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी उस समय हुआ जबकि अपनी नियमित संध्या घुमक्कड़ी में बाजार में टहलना हो रहा था. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर शहर को तिरंगे से सजाया जा रहा था. कहीं कपड़ों के द्वारा सजावट हो रही थी तो कहीं गुब्बारों के द्वारा तो कहीं बिजली की झालरें तीन रंग बिखेरने में लगी थीं. आज़ादी के मतवालों को याद करते हुए, मन ही मन में देशभक्ति के तराने गुनगुनाते हुए जैसे ही रानी लक्ष्मीबाई चौराहे के नजदीक पहुँचना हुआ तो दिमाग एकदम से झनझना उठा.


रानी लक्ष्मीबाई की मूर्ति जी घेरे के भीतर लगी हुई थी, उसे तिरंगे कपड़ों से सजाया गया था. चारों तरफ से झालरनुमा सजावट करने के प्रयास में तिरंगे कपड़ों को रानी लक्ष्मीबाई के बांये हाथ पर आकर तमाम कपड़े बाँध दिए गए थे. अपनी कतिपय शारीरिक दिक्कतों के चलते वहाँ तक पहुँच कर उन गाँठों को खोल पाना हमारे लिए संभव नहीं हो पा रहा था. उरई नगर पालिका परिषद् की ओर से ये सजावट करवाई जा रही थी. रात के लगभग नौ बजने को आये थे. कुछ जिम्मेवार लोगों को फोन करके उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए कहा कि आवश्यक नहीं कि इन क्रांतिकारियों की तरह कोई क्रांति ही करो मगर कम से कम इनका सम्मान तो करते रहो. गुस्सा इसलिए भी था क्योंकि कुछ दिनों पहले ऐसे ही एक सजावट के क्रम में रानी झाँसी के घोड़े की पूँछ को किसी खूंटे की तरह इस्तेमाल कर लिया गया था, अबकी ऐसा बर्ताव रानी झाँसी के हाथ के साथ किया गया.


फिलहाल, कुछ फोन, सोशल मीडिया पर फोटो के लगाने और थोड़ी सी भागदौड़ के बाद उस विचित्र सी स्थिति को सुधार दिया गया. आज़ादी के लिए अपनी जान की परवाह न करने वाले इन शहीदों का सम्मान बचा रहे,यही इनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.



28 अप्रैल 2019

ऐसे जागरूक मतदाताओं के सहारे जिंदा है हमारा लोकतंत्र


इस बार निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव को देश का महापर्व घोषित कर दिया गया है. शासन-प्रशासन अपने-अपने स्तर पर पूरा दम लगाकर अधिक से अधिक मतदान करवाने की कोशिश में लगा हुआ है. ऐसे में मतदान कितना होगा ये बाद की बात है मगर जैसा कि पहले भी कहा था कि मतदाता जागरूकता किसी के कहने से नहीं होती वरन यह स्व-स्फूर्त प्रक्रिया है जो अंतःकरण से उपजती है. जिसे भी जरा सा भी भान है अपनी जिम्मेवारी का, अपने कर्तव्य का, देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली के प्रति विश्वास का, देश की सरकार के कार्यों के प्रति सकारात्मकता का वह अपने आपको मतदान के लिए प्रेरित कर ही लेता है. मतदान के लिए खुद को तैयार कर ही लेता है. उसे न तो प्रशासन की गोष्ठियों की आवश्यकता होती है, न रैलियों की, न नारे लिखी तख्तियों की, न आदर्श बूथ की. ऐसे लोग अपने आप मतदान के लिए सतर्क रहते हैं, जागरूक रहते हैं.


ऐसा उदाहरण आज विश्व के पहले अनाज बैंक के बुन्देलखण्ड स्थित क्षेत्रीय कार्यालय की उरई शाखा में देखने को मिला जबकि वहाँ की लाभार्थी खाताधारक महिलाएँ जनपद जालौन में 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा लेने के प्रति उत्साहित दिखीं. अनाज बैंक उरई शाखा प्रतिमाह दो बार एक महिला को पांच किलो अनाज प्रदान करता है, इस उद्देश्य के साथ कि कोई भी भूखा न सोये. सभी महिलाएं ऐसी हैं जो अकेली हैं, वृद्ध हैं, अत्यंत गरीब हैं, मजबूर हैं, निराश्रित हैं. इनमें से ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं जो शिक्षित नहीं हैं. सामान्य अक्षर-ज्ञान से भी वंचित हैं, अपने नाम को लिखना भी नहीं जानती हैं. बहुत सी महिलाएं अत्यंत वृद्ध हैं. इसके बाद भी ख़ुशी की बात यह है कि दो-चार महिलाओं को छोड़कर सभी महिलाएं अभी तक मतदान करती रही हैं. अबकी बार कुछ महिलाओं के वोट कट गए हैं; कैसे, क्यों इसकी जानकारी उनको भी नहीं है और अनाज बैंक शाखा को भी समय से नहीं हो सकी.  

अप्रैल माह के दूसरे वितरण के दौरान आज सभी महिलाओं से मतदान करने सम्बन्धी चर्चा हुई. सभी महिलाओं ने पूर्व में अपने मतदान करने की बात कही. कुछ महिलाओं ने अपने वोट के इस बार कट जाने की समस्या बताई. उनकी बातों से लग रहा था, जैसे कि उनका वोट कट जाना गलत हुआ. उन्हीं महिलाओं में से अत्यंत वृद्ध महिला ने यहाँ तक कहा कि वह कल मतदान दिवस पर अपना आधार कार्ड लेकर अपने बूथ जाएगी. वहां किसी अधिकारी से बात करके वोट डलवाने के लिए कहेगी क्योंकि वह पहले वोट डालती रही है. सोचिये, जिस देश के नागरिकों में इस तरह का ज़ज्बा होगा, वहां का लोकतंत्र खतरे में कैसे आ सकता है? ये ऐसी महिलाएं हैं जिनको सीधे-सीधे अपने किसी जनप्रतिनिधि से काम नहीं पड़ना है. इनको किसी सरकार में बालू, शराब के ठेके नहीं चाहिए हैं. ये ऐसी महिलाएं हैं जिनके किसी परिजन को कोई सिफारिश भी नहीं करवानी है. ये सभी महिलाएं बस इतना समझ सकी हैं कि देश में सरकार के बनाने-गिराने में वोट का महत्त्व है. इसी कारण वे अपना वोट देना चाहती हैं. उनके ये जानने का प्रयास नहीं किया कि वे किसे अपना वोट देना चाहती हैं और न ही उन्होंने ये बताने-पूछने की चेष्टा की. 

सुखद ये लगा जानकर कि जहाँ आज के दौर में जनप्रतिनिधियों के क्रियाकलापों से रुष्ट होकर पढ़ा-लिखा मतदाता वोट डालने से विरक्त होने लगा है वहीं ऐसी महिलाएं अपने मतदान को लेकर सजग हैं. मतदान को छुट्टी का दिन मानकर पढ़ा-लिखा मतदाता कहीं सपरिवार पिकनिक पर निकल जाता है वहीं ये महिलाएं सबह-सुबह मतदान करने के प्रति जागरूक दिखीं. शिक्षित मतदाताओं के लिए शासन-प्रशासन द्वारा आये दिन तमाम तरह की नौटंकी करते हुए उनको जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है वहीं ये महिलाएं स्व-प्रेरण से मतदान के लिए जागरूक हैं. ऐसी महिलाओं, ऐसे मतदाताओं के कारण ही इस देश का लोकतंत्र जिन्दा है, इस देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली सक्रिय है. नमन है ऐसी महिलाओं को, ऐसे जागरूक मतदाताओं को.  

08 जून 2018

अतिक्रमण खुद नगर पालिका द्वारा किया जा रहा

उरई शहर में प्रशासन और नगर पालिका द्वारा मिलकर अतिक्रमण हटाया जा रहा है. इसमें भी वही कहावत सिद्ध हो रही है, अँधा बांटे रबड़ी, चीन्ह-चीन्ह के दे. जहाँ मर्जी चल रही है वहां प्रशासन की मशीन तोड़-फोड़ मचा रही है, जहाँ मन नहीं कर रहा है वहां कुछ नहीं हो रहा. 
इसके अलावा नगर पालिका परिषद्, उरई द्वारा भी मनमौजी तरीके से काम किया जा रहा है. बगावती तेवर दिखाने के बाद विजयी हुए अध्यक्ष को लगता है कि वे जो कर रहे हैं, सब सही है. यही सोच कर उनके द्वारा शहर के फुटपाथ पर पार्किंग का ठेका उठा दिया गया है. ऐसा एक-दो जगह नहीं वरन कई जगह किया गया है. 
शहर में आलिया बने मॉलनुमा जगहों पर भी अघोषित रूप से पार्किंग का ठेका दे दिया गया है. जिला चिकित्सालय के सामने तो बाकायदा बैनर लगा हुआ है, साथ ही डंडों की मदद से जगह का निर्धारण भी कर दिया गया है. वास्तविकता ये है कि इसी जगह से कुछ वर्ष पहले जिलाधिकारी महोदय ने खुद आकर ये डंडे हटवाए थे. आज नगर पालिका उन हाथों में खेल गई, जिन्होंने चुनाव में धन-बल का लाभ दिया. 
इसके अलावा नगर पालिका द्वारा फुटपाथ पर ही निर्माण कार्य करवा दिया गया है. इससे भी सम्बंधित जगह बाधित हुई है. विडम्बना देखिये ये शौचालय क्षेत्राधिकारी कार्यालय के ठीक बगल में स्थित है. 




10 सितंबर 2014

अमानवीयता, पाशविकता का परिचायक है नाली में बहता भ्रूण



 शहर में गंदे पानी का निकास करती नाली; कूड़ा-करकट, गंदगी, अन्य अपशिष्ट को अपने साथ बहाकर ले जाती नाली; सफाई के अभाव में बजबजाती नाली और इसी नाली में बहता मिलता है मानव भ्रूण. उत्तर-प्रदेश के बुन्देलखण्ड भूभाग का जनपद जालौन और उसका जिला मुख्यालय उरई, जहाँ कि जनपद स्तर के सभी प्रशासनिक अधिकारियों के आवास हैं, कार्यालय हैं; सभी बड़े राजनैतिक दलों के नेता-कार्यालय मौजूद हैं; राष्ट्रीय-प्रादेशिक-स्थानीय स्तर के समाचार-पत्रों के कार्यालय यहाँ हैं; इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उपस्थिति भी यहाँ है, सरकारी, गैर-सरकारी बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लेकर समाजसेवा करने वाली नामी-गिरामी गैर-सरकारी संस्थाएं भी यहाँ हैं, इसके बाद भी भ्रूण-हत्या जैसा अपराध होना, भ्रूण के नाली में बहाए जाने जैसी शर्मनाक घटना होना दर्शाता है कि अपराधी किस हद तक अपना मनोबल ऊँचा किये हुए हैं. नाली में भ्रूण मिलने की घटना मानवता को कलंकित करने वाली इस कारण से भी कही जा सकती है क्योंकि जहाँ ये भ्रूण पाया गया है वहाँ शहर के प्रतिष्ठित चिकित्सक का नर्सिंग होम है. समाज में कहीं भी भ्रूण-हत्या जैसी वारदात सामने आने पर प्रथम विचार कन्या भ्रूण हत्या का आता है, कुछ ऐसा ही इस घटना पर भी हुआ.
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नाली में सात माह के मानव भ्रूण की खबर मिलते ही सभी की आशंका कन्या भ्रूण हत्या को लेकर उपजी किन्तु ये उस समय लोगों के आश्चर्य की बात हो गई जबकि उन्हें पता चला कि नाली में मिला मानव भ्रूण बालक है. एकाएक उपजी लहर सी शांत हो गई; मीडिया के लिए स्टोरी नहीं; सामाजिक संस्थाओं के लिए आन्दोलन का मुद्दा नहीं आखिर भ्रूण बालक का है. क्या वाकई ये संवेदनशील मामला नहीं कि एक नर्सिंग होम के पास नाली में बहता हुआ सात माह का मानव भ्रूण मिलता है. सवाल यहाँ उसके बालक या बालिका होने का नहीं, सवाल मानव जाति की मानसिकता का है, मानवता का है. ये किसी तरह का अपराध नहीं है कि एक नर्सिंग होम के पास मानव भ्रूण मिलता है किन्तु इस बात की जाँच अवश्य होनी चाहिए कि आखिर वहाँ ये आया कैसे? ये आसानी से समझने वाली बात है कि इस भ्रूण हत्या में कन्या होना तत्त्व केन्द्र में नहीं है क्योंकि सात माह में किसी भी भ्रूण के लिंग की पहचान सहजता से हो जाती है. स्पष्ट है कि ये मामला कन्या भ्रूण-हत्या से सम्बंधित नहीं है. ऐसी स्पष्ट स्थिति के बाद प्रशासन को और तत्परता से वास्तविकता को सामने लाने का प्रयास करना चाहिए.
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संभव है कि ये मामला किसी अनब्याही माँ से जुड़ा हुआ हो, जिसका सामाजिक दबाव में, पारिवारिक दबाव में उसका गर्भपात करवाया गया हो? ऐसे में भी ये पता करने की आवश्यकता बनती है कि आखिर इस कृत्य में किस चिकित्सक ने मदद की है. ये एक आम शिक्षित व्यक्ति को भी पता है कि सात माह की अवस्था में चिकित्सकीय रूप से गर्भपात संभव-सुरक्षित ही नहीं है. ऐसे में ये जानना और भी आवश्यक हो जाता है कि ऐसा क्यों, कब, कहाँ और किसके द्वारा किया गया?
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एक सम्भावना ये भी बनती है कि ये किसी विवाहित महिला की ‘प्री मैच्योर डिलीवरी’ हो या फिर ‘मिसकैरिज’ जैसी कोई घटना हो जिसके लिए किसी चिकित्सक की मदद ली गई हो. यदि ऐसा है तब भी इस घटना को भुलाने योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि सम्बंधित स्त्री को चिकित्सकीय सुविधा देने के बाद, उसकी मदद करने के बाद किसी भी चिकित्सक, सम्बंधित नर्सिंग होम आदि की जिम्मेवारी बनती थी कि वे उस भ्रूण का यथोचित निपटान करते. ऐसा न किया जाना और उसे नाली में बहा देना अमानुषिक कृत्य ही कहा जायेगा, जिसके लिए न सही कानूनी किन्तु सामाजिक दंड के भागी सम्बंधित लोग बनते ही हैं.
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समाज में कई बार किसी भीख मांगने वाली महिला के साथ, मानसिक विक्षिप्त महिला के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने की घटनाएँ, उनके गर्भवती होने की घटनाएँ भी सामने आई हैं. इस मामले में भी संभव है ऐसा ही कुछ हुआ हो और सम्बंधित गर्भवती महिला के साथ समुचित चिकित्सकीय देखभाल के अभाव में ऐसा कुछ हो गया हो. यदि ऐसा भी है तो ये हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कलंक है जहाँ किसी भिखारिन, किसी मानसिक विक्षिप्त महिला को हवस का शिकार बना लिया जाता हो. ये कहीं न कहीं प्रशासनिक अक्षमता भी कही जाएगी कि उनके द्वारा आज भी ऐसे लावारिस लोगों को, अनाथ लोगों को संरक्षण, चिकित्सकीय सुविधाएँ दे पाना संभव नहीं हो सका है.
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यहाँ सवाल नाली में सात माह के भ्रूण के बालक या बालिका होने का नहीं है वरन मानव स्वभाव की मानसिकता का है. ये अपने आपमें सम्पूर्ण मानव जाति के लिए, मानवता के लिए शर्म का विषय तो है ही कि आधुनिकता में रचे-बसे समाज में आज भी भ्रूण-हत्याएं हो रही हैं किन्तु ये और भी कलंकित करने वाली घटना है कि एक भ्रूण नाली में बहते पाया जाता है. वास्तविकता क्या है इसे सामने आने में समय लगेगा, कहिये प्रशासनिक लीपापोती में सामने न भी आये किन्तु ये घटना दर्शाती है कि हम मानव आज भी जानवर ही बने हुए हैं. 
चित्र मीडिया मित्रों के सहयोग से प्राप्त... ये घटना ७ सितम्बर २०१४ की है..... चित्रों की वीभत्सता को कम करने के लिए आवरण ओढ़ा दिया गया है.....
संयोजक-बिटोली 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

04 जनवरी 2012

जनपद जालौन की कोंच विधानसभा - पहले विधायक से अंतिम विधायक तक की सूची


जनपद जालौन में 2007 के आम चुनाव तक कुल चार विधानसभा सीटें थीं. उरई, कोंच, कालपी, माधौगड़.....इस बार के परिसीमन में एक सीट-कोंच- को समाप्त कर दिया गया. 2012 के आम चुनाव में जनपद जालौन में केवल तीन सीटों उरई, कालपी, माधौगड़ पर ही चुनाव होगा।


एक नज़र पहले आम चुनाव वर्ष 1952 से पन्द्रहवें आम चुनाव 2007 तक के कोंच विधानसभा के विधायकों की सूची..

क्र0सं0

वर्ष

विधायक का नाम

दल

1

1952

चित्तर सिंह

कांग्रेस

2

1957

चित्तर सिंह

कांग्रेस

3

1962

विजय सिंह

स्वतन्त्र पार्टी

4

1967

बसंतलाल

कांग्रेस

5

1969

बसंतलाल

कांग्रेस

6

1974

मलखान सिंह

जनसंघ

7

1977

कौशल किशोर

जनता पार्टी

8

1981

रामप्रसाद अहिरवार

कांग्रेस

9

1985

चौ0 श्यामलाल

कांग्रेस

10

1989

चैनसुख भारती

बसपा

11

1991

भानुप्रताप वर्मा

भाजपा

12

1993

चैनसुख भारती

बसपा

13

1996

दयाशंकर वर्मा

निर्दलीय

14

2002

दयाशंकर वर्मा

भाजपा

15

2007

अजय सिंह पंकज

बसपा