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31 अक्टूबर 2021

हम सबके गौरव हैं सरदार बल्लभ भाई पटेल

उस दिन सरदार पटेल की विशालकाय प्रतिमा को भव्यता प्रदान करने का काम किया जा रहा था. हमारा पारिवारिक दौरा हुआ गुजरात का तो लोभ संवरण नहीं किया जा सका उस गौरवशाली व्यक्तित्व के दर्शन करने का. एक ऐसी शख्सियत को साक्षात् तो देखना हुआ नहीं था, उसकी प्रतिमा के दर्शन से ही खुद को धन्य कर लेने का मन बना हुआ था. प्रतिमा को अंतिम रूप प्रदान किया जा रहा था क्योंकि कोई हफ्ते भर बाद ही उसका अनावरण किया जाना था. 


31 अक्टूबर न केवल देश के लिए बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए ऐतिहासिक दिन रहा है. इस दिन विश्व की सबके ऊंची प्रतिमा का लोकार्पण किया गया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गुजरात के नर्मदा जिले में स्थापित सरदार बल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊँची प्रतिमा का लोकार्पण किया गया. ये गर्व की बात है कि जिन सरदार पटेल के प्रयासों से देश की आज़ादी के तुरंत बाद पाँच सौ से अधिक रियासतें देश में शामिल होने को तैयार हुईं, उनको आज तक पर्याप्त सम्मान न मिल सका. वर्तमान केंद्र सरकार ने सरदार साहब की प्रतिमा के बारे में न केवल विचार किया वरन रिकॉर्ड समय में उसका निर्माण करवाकर देश की जनता को लोकार्पित भी करवा दिया. 


ये अपने आपमें इसलिए गौरव का विषय है कि इससे पहले सभी सरकारें सरदार पटेल के योगदान को याद करती रहीं मगर किसी ने आगे बढ़कर उनको सम्मानित करने का मन नहीं बनाया. वर्तमान केंद्र सरकार ने न केवल इस बारे में विचार किया बल्कि आमजन को इससे जोड़ा. यही कारण है कि इस प्रतिमा के निर्माण के लिए देश भर से लोहा एकत्र हुआ. स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी दीवार के लिए सभी राज्यों की मिट्टी एकत्र की गई. सरदार पटेल की प्रतिमा पर अर्पण करने के लिए देश भर की नदियों से जल एकत्र किया गया. 



आज़ादी के इतने लम्बे समय बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल को सम्मान मिला है वह गौरव का विषय है. ये इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अब जब भी वैश्विक स्तर पर सबसे ऊंची प्रतिमा की चर्चा होगी तो उसके लिए देश का नाम लिया जायेगा. इसके साथ-साथ सरदार बल्लभ भाई पटेल का नाम लिया जायेगा. ये अपने आपमें गौरवान्वित करने वाला विषय है.

12 नवंबर 2018

स्टेच्यू ऑफ यूनिटी देखने आती संख्या सिद्ध कर रही सरदार पटेल का कद

गुजरात के नर्मदा जिले में विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा के रूप में स्टेच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण पूरा हुआ. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका अनावरण 31 अक्टूबर को किया. इसके निर्माण में लगी लगभग तीन हजार करोड़ से बनी यह प्रतिमा अब विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा के रूप में स्थापित है. इसके निर्माण के लिए जब घोषणा हुई थी, उसके बाद से लोकार्पण तक किसी न किसी रूप में इसको आलोचना का शिकार होना पड़ा. मोदी विरोधियों ने लगातार इसके निर्माण को धन का अपव्यय बताया. इसके साथ-साथ इस प्रतिमा के पक्ष में समर्थन देने वाले भी बहुत से लोग थे. जो लोग तथ्यात्मक रूप से पर्यटन की संभावनाएं देखते रहे हैं वे लगातार अपेक्षा जता रहे थे कि ये प्रतिमा पर्यटन का व्यापक केंद्र बनेगी ही साथ ही आय का स्त्रोत भी बनेगी.


इसी को ध्यान में रखते हुए प्रतिमा देखने के लिए टिकट की व्यवस्था की गई. जैसी कि अपेक्षा थी कि सरदार पटेल के व्यक्तित्व के कारण यह प्रतिमा लोगों के आकर्षण का केंद्र बनेगी वैसा हुआ भी. प्रशासन की तरफ से इस विशालकाय प्रतिमा को सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक देखा जा सकता है. पर्यटकों को 350 रुपए और 30 रुपए अलग से बस राइड के चुकाने होंगे. स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नाम से जाने जाने वाले सरदार पटेल की प्रतिमा की टिकट की ऑनलाइन बुकिंग होगी. इसके लिए राज्य सरकार ने https://soutickets.in नाम से वेबसाइट शुरू की है. कुल 380 रुपए में पर्यटक वैली ऑफ फ्लॉवर, मेमोरियल, म्यूजियम, सरदार सरोवर बांध और ऑडियो-वीडियो गैलरी देख सकेंगे. 31 अक्टूबर को प्रतिमा के लोकार्पण के अगले दिन से ही इसे जनता के लिए खोल दिया गया. प्रशासन द्वारा दिए गए आँकड़ों के अनुसार 1 नवंबर को कुल 27 सौ 37 लोगों पटेल की प्रतिमा देखने पहुंचे, जिनमें 24 सौ 97 वयस्क और 240 बच्चे थे. इनसे 5 लाख 46 हजार 50 रुपये के राजस्व की आमदनी हुई.2 नवंबर को कुल 22 सौ 99 लोग इस प्रतिमा देखने पहुंचे. इनमें 2 हजार 83 वयस्क और 206 बच्चे थे. इस दिन आए पर्यटकों से 4 लाख 7 हजार 6 सौ पचास रुपये प्राप्त हुए.

स्टेच्यू ऑफ यूनिटी को देखने के लिए हर रोज हजारों लोग पहुंच रहे हैं. अभी तक करीब 1.8 लाख लोग पटेल की प्रतिमा देख चुके हैं. इससे कुल मिलाकर लगभग 2.1 करोड़ रुपए की कमाई हो चुकी है. शनिवार, 10 नवम्बर को मात्र एक दिन में ही 27,000 लोग मूर्ति देखने पहुंचे. मूर्ति देखने के लिए लोगों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि 10 किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम तक लग गया. दीपावली के दिन यहां 16 हजार पर्यटक आए थे, भाईदूज के दिन 20 हजार लोग पहुँचे. यह संख्या शनिवार को बढ़कर 27 हजार पहुंच गई. रविवार, 11 नवम्बर को 33,576 लोगों ने स्टेच्यू ऑफ यूनिटी को देखा. इसमें से सिर्फ 10,361 लोग ही गैलरी देख सके, क्योंकि गैलरी की क्षमता सिर्फ 5000 तक की है. इसी एक दिन में ही टिकट से 3362860 रुपए की कमाई हुई.

दर्शकों की यह संख्या उन लोगों के मुँह पर तमाचा ही है जो इस प्रतिमा पर हुए व्यय को अपव्यय बता रहे थे. प्रतिमा देखने आ रहे लोगों ने सरदार पटेल के व्यक्तित्व को सहज रूप में स्वीकार कर उनके कद के साथ न्याय ही किया है.

01 नवंबर 2018

देश के गौरव की प्रतिमा पर भी विवाद


कल रात सपने में कथित और व्यथित गांधी with नेहरू आए. उन्होंने एक नया ख़ुलासा किया, मूर्ति स्थापना को लेकर. तब स्थिति स्पष्ट हुई कि उनकी मूर्तियाँ स्थापित नहीं की गईं बल्कि प्रकट हुईं हैं.

कुछ आसमानी किताब की तरह से.
कुछ इनकी पसीने की बूँद से.
कुछ उस पेय पदार्थ से भी, जिसे पीने के लिए लोग लाइन लगाए खड़े रहते थे. इसलिए इन पर धन ख़र्च हुआ ही नहीं. धन इस प्रतिमा पर पहली बार ख़र्च हुआ है.

पूरा देश भौचक्का है... खास तौर से कांग्रेसी और बसपाई...
इसलिए क्योंकि देश की पहली मूर्ति आज लोकार्पित की गई. ये दोनों चापलूस समझ ही नहीं पाए कि ये है क्या? कांग्रेसियों ने कभी अपने अम्मा-बाप के चित्र न लगाये. बसपाइयों ने कभी बहिन जी के न लगाये और मोदी को देखो मूर्ति बनवा दी. सब आश्चर्य में कि ये क्या बनवा दिया विशालकाय. एक गलत परम्परा का सूत्रपात करवा दिया. अब हर गली-चराहे-पार्क में नेहरु-गाँधी की मूर्ति लगेगी. पार्क के नाम पर हाथी लगेंगे. जिंदा रहते खुद की मूर्ति लगेगी.

मोदी तुम बहुत बुरे हो. अच्छा-खासा देश उन्नति कर रहा था. मूर्तियों की राजनीति से बाहर था. अभी तक ऐसे धन का उपयोग चिकित्सालय बनवाने में, शिक्षण संस्था बनवाने में, गरीबों की मदद करने में किया जाता रहा है, सो इसी कारण से कोई बीमार नहीं था. सभी पैदा होते ही इंजीनियर-डॉक्टर-वैज्ञानिक आदि बन जाते थे. अब आज के बाद से विशुद्ध गरीब पैदा होंगे. नंगे-भुखमरी के शिकार पैदा होंगे. अशिक्षित पैदा होंगे. तुमने देश को सदियों पीछे धकेल दिया एक मूर्ति लगा कर. सरदार पटेल के समर्थक भले तुम्हें माफ़ कर दें मगर देश में मूर्ति स्थापना की नवीन परम्परा डालने के कारण कांग्रेसी तुमको माफ़ न करेंगे.

+
विश्व के सात अजूबों में एक ताजमहल शामिल है (जो एक कब्र के रूप में प्रचारित है... भले ही उसमें शंकर जी का मंदिर माना जाता हो, तेजोमहालय माना जाता हो) उस ताजमहल के लिए कूद-कूद मरे जाते हो मगर जब विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति की बात आई, स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी की तो सबको पेचिश लगने लगी, वो भी बौद्धिक और खूनी. अपने-अपने दिमाग गुलामी से बाहर निकालो. पैसा तुम्हारे बाप का ही खर्च हुआ था ताजमहल में, यहाँ भी तुम्हारे बाप का, तुम्हारा खर्च हुआ है पर ये गुलामी का नहीं बल्कि गौरव का पर्याय है.