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29 जुलाई 2016

बेटियों के लिए जागना होगा

यह अपने आपमें शर्मनाक है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता की आदर्शवादिता दिखाने वाले समाज में खुलेआम भ्रूण लिंग जाँच जैसा कुकृत्य किया जा रहा है. इससे भी अधिक शर्मनाक ये है कि इस तरह के कुकृत्यों में वो चिकित्सक सम्मिलित हैं जिनको समाज में भगवान का स्थान प्राप्त है. इस तरह के आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के हौसले कितने बुलंद हैं कि इसके निरोध के लिए बने अधिनियम (PCPNDT Act) का कोई भी खौफ इनके मन-मष्तिष्क पर नहीं है. यदि कानून का ही डर होता तो देश भर में लिंगानुपात में गिरावट देखने को न मिल रही होती. वर्ष 2011 की जनगणना में वर्ष 2001 की जनगणना के मुकाबले लिंगानुपात में किंचित मात्र सुधार होता दिखा है किन्तु ये संतुष्ट करने वाला नहीं कहा जायेगा क्योंकि इसी अवधि में शिशु लिंगानुपात में व्यापक कमी आई है. 



चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि लगातार होते गर्भपात से महिला के गर्भाशय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस बात की भी आशंका रहती है कि महिला भविष्य में गर्भधारण न कर सके. पुत्र की लालसा में बार-बार गर्भपात करवाते रहने से गर्भाशय के कैंसर अथवा अन्य गम्भीर बीमारियां होने से महिला भविष्य में माँ बनने की अपनी प्राकृतिक क्षमता भी खो देती है. इसके साथ ही महिला के गर्भाशय से रक्त का रिसाव होने की आशंका भी बनी रहती है, जिसके परिणामस्वरूप महिला के शरीर में खून की कमी होने से अधिसंख्यक मामलों में गर्भवती होने पर अथवा प्रसव के दौरान महिला की मृत्यु हो जाती है. इसके अतिरिक्त एक सत्य यह भी है कि जिन परिवारों में एक पुत्र की लालसा में कई-कई बच्चियों जन्म ले लेती हैं वहाँ उनकी सही ढंग से परवरिश नहीं हो पाती है. उनकी शिक्षा, उनके लालन-पालन, उनके स्वास्थ्य, उनके खान-पान पर भी उचित रूप से ध्यान नहीं दिया जाता है. इसके चलते वे कम उम्र में ही मृत्यु की शिकार हो जाती हैं अथवा कुपोषण का शिकार होकर कमजोर बनी रहती हैं. इसके अलावा समाज में अनेक विषमताओं के उत्पन्न होने का खतरा भी है. विवाह योग्य लड़कियों का कम मिलना, महिलाओं की खरीद-फरोख्त, जबरन महिलाओं को उठाया जाना, बलात्कार, बहु-पति प्रथा आदि विषम स्थितियों से इतर कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. समाज में महिलाओं की संख्या कम हो जाने से शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु महिलाओं की खरीद-फरोख्त होना, एक महिला से अधिक पुरुषों के शारीरिक संबंधों के बनने की आशंका, इससे यौन-जनित रोगों के होने की सम्भावना बनती है. सवाल खड़ा होता है तो इनको रोका कैसे जाए? इनके अपराध पर अंकुश कैसे लगाया जाये? इनकी कुप्रवृत्ति को समाप्त कैसे किया जाये?

इस विकृति से निपटने के लिए हर बार जन-जागरूकता की बात की जाती है किन्तु लगता है कि जनता ने जागरूकता से किनारा करना शुरू कर दिया है. जनसहयोग के साथ-साथ प्रशासन को सख्ती से कार्य करने की जरूरत है. सरकारी, गैर-सरकारी चिकित्सालयों में इस बात की व्यवस्था की जाये कि प्रत्येक गर्भवती का रिकॉर्ड बनाया जाये और उसे समय-समय पर प्रशासन को उपलब्ध करवाया जाये. ध्यान देने योग्य ये तथ्य है कि एक महिला जो गर्भवती है, उसे नौ माह बाद प्रसव होना ही होना है, यदि कुछ असहज स्थितियाँ उसके साथ उत्पन्न नहीं होती हैं. ऐसे में यदि नौ माह बाद प्रसव संपन्न नहीं हुआ तो इसकी जाँच हो और सम्पूर्ण तथ्यों, स्थितियों की पड़ताल की जाये. यदि किसी भी रूप में भ्रूण हत्या जैसा आपराधिक कृत्य सामने आता है तो परिवार-डॉक्टर को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. ऐसे परिवारों को किसी भी सरकारी सुविधा का लाभ लेने से वंचित कर दिया जाये, चिकित्सक का लाइसेंस आजीवन के लिए रद्द कर दिया जाये, ऐसे सेंटर्स तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिए जाएँ और दंड का प्रावधान भी साथ में रखा जाये. कुछ समय तक कठोर से कठोर क़दमों की जद्दोजहद किये जाने की जरूरत है.


सामाजिक प्राणी होने के नाते हर जागरूक नागरिक की जिम्मेवारी बनती है कि वो कन्या भ्रूण हत्या निवारण हेतु सक्रिय रूप से अपना योगदान दे. अपने परिवार के बुजुर्गों को समझाने का काम करें कि किसी भी वंश का नाम बेटियों के द्वारा भी चलता रहता है. उनको महारानी लक्ष्मीबाई, इंदिरा गाँधी का उदाहरण देना होगा. समाज के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं को आदर्श रूप में प्रस्तुत करके बच्चियों के साथ-साथ उनके माता-पिता के मन में भी महिलाओं के प्रति आदर-सम्मान का भाव जाग्रत करना होगा. इधर देखने में आया है कि दलालों की मदद से बहुत से लालची और कुत्सित प्रवृत्ति के चिकित्सक अपनी मोबाइल मशीन के द्वारा निर्धारित सीमा का उल्लंघन करके भ्रूण लिंग की जाँच अवैध तरीके से करने निकल पड़ते हैं. जागरूकता के साथ ऐसी किसी भी घटना पर, मशीन पर, अपने क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित अल्ट्रासाउंड मशीन की पड़ताल भी करते रहें और कुछ भी संदिग्ध दिखाई देने पर प्रशासन को सूचित करें. इसके साथ-साथ जन्मी बच्चियों के साथ होने वाले भेदभाव को भी रोकने हेतु हमें आगे आना होगा. उनके खान-पान, रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य-चिकित्सा आदि की स्थितियों पर भी ध्यान देना होगा कि कहीं वे किसी तरह के भेदभाव का, दुर्व्यवहार का शिकार तो नहीं हो रही हैं. यदि इस तरह के कुछ छोटे-छोटे कदम उठाये जाएँ तो संभव है कि आने वाले समय में बेटियाँ भी समाज में खिलखिलाकर अपना भविष्य संवार सकती हैं. यदि ऐसा नहीं किया गया तो धूर्त और कुप्रवृत्ति के चिकित्सकों के प्रतिनिधि घर-घर जाकर लोगों को भ्रूण लिंग जाँच, कन्या भ्रूण हत्या के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित करेंगे. इसके साथ वह दिन भी दूर नहीं होगा जबकि बेटों के विवाह के लिए बेटियाँ मिलनी बंद हो जाएँगी और समाज एक तरह की कबीलाई संस्कृति में परिवर्तित हो जायेगा. 

चित्र गूगल छवियों से साभार 

17 नवंबर 2015

भ्रूण हत्या रोकने को अनिवार्य रूप से सख्ती हो

          भ्रूण लिंग जाँच और अवैध गर्भपात को रोकने के लिए पीसीपीएनडीटी एक्ट होने के बाद भी ऐसा कुकृत्य करने वालों में किसी प्रकार का भय व्याप्त नहीं है. सरकार द्वारा, विभिन्न गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा लगातार जागरूकता कार्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं किन्तु आज आवश्यकता जागरूकता कार्यक्रमों की कम क्रियान्वयन कार्यक्रमों की अधिक है. देखा जाये तो समाज में शहरी क्षेत्र हो अथवा ग्रामीण क्षेत्र, सभी को भली-भांति मालूम है कि भ्रूण लिंग जाँच करवाना गैर-कानूनी है, ये सभी को ज्ञात है कि ऐसे मामलों में गर्भपात करवाना भी गैर-कानूनी है, सबको इसकी भी जानकारी है कि ऐसा कृत्य करने पर कानूनी रूप से सजा का प्रावधान है. यदि भ्रूण लिंग जाँच में अथवा भ्रूण हत्या में संलिप्त लोगों को उक्त जानकारियाँ नहीं होती तो वे ऐसे कृत्य खुलेआम करने-करवाने का कार्य कर रहे होते, जबकि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. ऐसे कार्य गोपनीय तरीके से किये-करवाए जा रहे हैं. ये अपने आपमें शर्मनाक है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता की संकल्पना रचने वाले समाज में भ्रूण लिंग जाँच/हत्या में लोगों की संलिप्तता आज भी है. इससे भी अधिक शर्मनाक ये है कि इस तरह के कुकृत्यों में वो चिकित्सक भी सम्मिलित हैं जिनको समाज में भगवान का स्थान प्राप्त है. कमोवेश ये स्थिति अकेले किसी एक स्थान विशेष की नहीं वरन देश के बहुतायत भागों की है. ऐसे में सवाल उठता है कि इनको रोका कैसे जाए? इनके अपराध पर अंकुश कैसे लगाया जाये? इस कुप्रवृत्ति को समाप्त कैसे किया जाये? ऐसे सवालों का जवाब कई बार खुद ऐसे हालात ही बन जाते हैं. स्पष्ट है कि यदि कानून का ही डर होता तो देश भर में लिंगानुपात में भयंकर गिरावट देखने को न मिल रही होती. वर्ष 2011 की जनगणना में भले ही वर्ष 2001 की जनगणना के मुकाबले लिंगानुपात में किंचित मात्र सुधार होता दिखा है किन्तु ये भी संतुष्ट करने वाला नहीं कहा जायेगा क्योंकि इसी अवधि में शिशु लिंगानुपात में व्यापक कमी आई है.
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ऐसी स्थिति में जबकि लिंगानुपात में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, सरकारें बेटी बचाओ अभियान के द्वारा जागरूकता लाने में लगी हुई हैं, गैर-सरकारी संगठन और अनेक व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर बेटियों के हितार्थ कार्य करने में लगे हैं इसके बाद भी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. इसका उदाहरण इससे लगाया जा सकता है कि आये दिन कहीं नालियों में, कहीं झाड़ियों में, कहीं कूड़े के ढेरों पर नवजात शिशु, भ्रूण आदि मिलने की खबरें सामने आती हैं. ऐसी घटनाओं के लगातार बढ़ने से आशंका इसकी भी बलबती है कि संभव हो कि विविध चिकित्सालयों में कार्य करने वाले व्यक्तियों द्वारा, दाइयों द्वारा, अथवा सरकारी चिकित्सा सेवा में संलग्न विभिन्न कर्मियों द्वारा अवैध रूप से ऐसे कार्यों को अंजाम दिया जा रहा हो? ये आशंका इस कारण से उठती है कि यदि एक सुविधा-संपन्न चिकित्सालय, नर्सिंग होम ऐसे कार्य को अंजाम देता है तो उसके पास भ्रूण को पूर्णतः नष्ट करने के साधन उपलब्ध रहते हैं. संभव है कि ऐसे कुकृत्य प्रशिक्षित अथवा अप्रशिक्षित व्यक्तियों की देखरेख में किसी अवैध स्थान पर किये जा रहे हों.  
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वर्तमान में लगातार ऐसी घटनाओं के सामने आने से जनसहयोग के साथ-साथ प्रशासन को सख्ती से कार्य करने की जरूरत है. सरकारी, गैर-सरकारी चिकित्सालयों में इस बात की व्यवस्था की जाये कि प्रत्येक गर्भवती का रिकॉर्ड बनाया जाये और उसे समय-समय पर प्रशासन को उपलब्ध करवाया जाये. ध्यान देने योग्य ये तथ्य है कि एक महिला जो गर्भवती है, उसे नौ माह बाद प्रसव होना ही होना है, यदि कुछ असहज स्थितियाँ उसके साथ उत्पन्न नहीं होती हैं. ऐसे में यदि नौ माह बाद प्रसव संपन्न नहीं हुआ तो इसकी जाँच हो और सम्पूर्ण तथ्यों, स्थितियों की पड़ताल की जाये. इसके साथ-साथ निजी रूप से संचालित अल्ट्रासाउंड सेंटर्स, निजी चिकित्सालयों में, नर्सिंग होम में, निजी प्रैक्टिस कर रहे चिकित्सकों के साथ-साथ सरकारी चिकित्सा सेवा के कार्य कर रहे विभिन्न कर्मियों में से संदिग्ध लोगों को तलाशने का कार्य किया जाए क्योंकि ऐसा कुकृत्य बिना चिकित्सकीय मदद के संभव नहीं है. यदि किसी भी रूप में भ्रूण हत्या जैसा आपराधिक कृत्य सामने आता है तो परिवार-डॉक्टर को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. ऐसे परिवारों को किसी भी सरकारी सुविधा का लाभ लेने से वंचित कर दिया जाये, चिकित्सक का लाइसेंस आजीवन के लिए रद्द कर दिया जाये, ऐसे सेंटर्स तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिए जाएँ और दंड का प्रावधान भी साथ में रखा जाये.
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इतने सालों की जद्दोजहद से ये स्पष्ट हो चुका है कि बेटी होने पर किसी योजना का लाभ देने का मंतव्य, सरकारी योजनाओं से लाभान्वित किये जाने सम्बन्धी प्रयासों, कानूनी प्रक्रियाओं आदि से सुधार होने के आसार दिख नहीं रहे हैं. ऐसे में कुछ समय तक कठोर से कठोर क़दमों की जद्दोजहद किये जाने की जरूरत है. यदि ऐसा नहीं किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब कि धूर्त और कुप्रवृत्ति के चिकित्सकों के प्रतिनिधि घर-घर जाकर लोगों को भ्रूण लिंग जाँच-कन्या भ्रूण हत्या के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित करेंगे. इसके साथ वह दिन भी दूर नहीं होगा जबकि बेटों के विवाह के लिए बेटियाँ मिलनी बंद हो जाएँगी और समाज एक तरह की कबीलाई संस्कृति में परिवर्तित हो जायेगा. 
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12 फ़रवरी 2015

कहीं महिला-विहीन न हो जाये समाज



‘गर्भ में मात्र दस सप्ताह की मासूम बालिका. माँ की कोख में उसकी सामान्य हलचलों को देखा जा सकता है. दिल की धड़कन सामान्य रूप से चल रही है, तभी किसी अंदेशे से मासूम बालिका अपने में सिमट जाती है. एक औजार बच्ची के अंग काट-काट कर उसके अस्तित्व को मिटा रहा है. बच्ची मुँह खोलने की कोशिश कर रही है, उसके दिल की धड़कन दो सौ की सीमा तक पहुँच चुकी है लेकिन इन सबसे इतर वह यंत्र गर्भस्थ बच्ची के टुकड़े-टुकड़े कर मात्र पंद्रह मिनट में उसका अस्तित्व जन्म से पूर्व ही समाप्त कर देता है.’ ये कोई फ़िल्मी विज्ञान पटकथा का सीन न होकर वास्तविक जीवन की सच्चाई है, अल्ट्रासाउंड मूवी का दृश्य है, जिसे महज कौतूहलवश गर्भपात कर रहे चिकित्सक बर्नाड नैथेन्स ने बनवाया था. इस फिल्म को देख अनेकानेक गर्भपात कर चुके उस चिकित्सक के भी रोंगटे खड़े हो गए और इस सत्य को ‘साइलेंट स्क्रीम’ (मूक चीख) नाम देकर उसने सदा-सदा को चिकित्सा क्षेत्र का त्याग कर दिया. ये वास्तविक फ़िल्मी दृश्य भले ही सन 1984 का हो किन्तु ये स्थिति आज भी हमारे समाज में और अधिक वीभत्स रूप में मौजूद है. गर्भ में कन्या भ्रूण हत्या की समस्या एकाएक उपजी समस्या नहीं है. लगभग 85 वर्ष पूर्व हिन्दी साहित्य प्रेस द्वारा शीतला सहाय की पुस्तक ‘शिशु हत्या तथा परमेध प्रथा’ को प्रकाशित किया गया था, जिसमें इस बेरहम प्रथा का जिक्र किया गया था. वैसे इतिहास इससे भी कहीं और अधिक समय पहले से कन्याओं को मारे जाने के प्रमाण अपने में कैद किये हुए है. 

महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की घटनाओं के साथ-साथ बेटियों की हत्याओं का अपना क्या इतिहास रहा है, क्या कारण रहे हैं  वह एक अलग विषय है. वर्तमान अतीत की तरह भयावह नहीं है, परिणामस्वरूप इस जघन्य कृत्य पर विचार किया जाना अत्यावश्यक है. हमारा भविष्य कैसा होगा ये वर्तमान पर ही निर्भर करेगा. यदि वर्तमान का चित्र आँकड़ों के आईने में देखें तो स्थितियाँ कहीं से भी सुखद प्रतीत नहीं होती हैं. यहाँ हम इस समस्या को देखें तो स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि 2011 की जनगणना में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया कि 2001 की जनगणना की तुलना में 2011 में महिलाओं की संख्या बढ़ी है. यह सत्य भी दिखता है क्योंकि 2001 में प्रति एक हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 933 थी जो 2011 में बढ़कर 940 तक जा पहुँची. यह आँकड़ा एक पल को भले ही प्रसन्न करता हो किन्तु इसके पीछे छिपे कड़वे सत्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. 2001 की जनगणना में छह वर्ष तक की बच्चियों की संख्या 927 (प्रति हजार पुरुषों पर) थी जो 2011 में घटकर 914 रह गई है. यही वो आँकड़ा है जो हमें महिलाओं की बढ़ी हुई संख्या पर प्रसन्न होने की अनुमति नहीं देता है. सोचने की बात है कि जब इस आयु वर्ग की बच्चियों की संख्या में बढ़ोत्तरी नहीं हो सकी है तो महिलाओं की संख्या में इस वृद्धि का कारण क्या रहा? यदि 2011 की जनगणना के आँकड़े बच्चियों के संदर्भ में देखें तो उनके भविष्य के प्रति एक शंका हमें दिखाई देती है. 2001 की जनगणना में जहाँ देश के 29 राज्यों में शून्य से छह वर्ष तक की आयुवर्ग की बच्चियों की संख्या 900 से अधिक थी वहीं 2011 में ऐसे राज्यों की संख्या 25 रह गई. राज्यों में बच्चियों के प्रति सजगता की स्थिति यह रही कि मात्र आठ राज्य ही ऐसे रहे जिनमें बच्चियों की संख्या में 2001 के मुकाबले 2011 में वृद्धि देखने को मिली. इनमें भी चार राज्यों में बच्चियों की संख्या 900 की संख्या को छू भी नहीं पाई. पंजाब (798 से 846), चंडीगढ़ (845 से 867), हरियाणा (819 से 830), हिमाचल प्रदेश (896 से 906), अंडमान-निकाबार (957 से 966), मिजोरम (964 से 971), तमिलनाडु (942 से 946) तथा गुजरात (883 से 886) में ही वृद्धि देखने को मिली शेष सभी राज्यों में शिशु लिंगानुपात में कमी ही देखने को मिली है. बालिकाओं की जनसंख्या के ये आँकड़े हमें किसी भी रूप में सुखद एहसास नहीं कराते हैं, यहाँ हमें ये ध्यान रखना होगा कि यही बेटियाँ भविष्य की माताएँ हैं. 

कितना हास्यास्पद लगता है कि एक तरफ इसी समाज में नवरात्रि पर कन्याओं का पूजन किया जाता है, कन्या-भोज किया जाता है और दूसरी तरफ कन्याओं को गर्भ में ही मारा जाता है. ये दुखद है और उससे ज्यादा दुखद है हमारा अमानवीय रूप से असंवेदनशील होना. समाज में पुत्रों की लालसा, मोक्ष प्राप्ति, अंतिम संस्कार की मानसिकता, पुत्री के विवाह में भारी-भरकम दहेज़ की व्यवस्था करना, बेटी के जन्म को क़र्ज़ जैसा समझने की कुप्रवृत्ति आदि के चलते गर्भपात को बढ़ावा मिला है. ऐसी स्थितियाँ तब हैं जबकि सरकार की तरफ से लगातार कानून बनाये जा रहे हैं, लोगों को सरकारी, गैर-सरकारी तौर पर जागरूक किया जा रहा है. दरअसल समाज में कानून की आड़ लेकर ही कानून से खिलवाड़ करने की मानसिकता सदा से व्याप्त रही है. सरकार द्वारा पीसीपीएनडीटी अधिनियम के द्वारा इस तरह के प्रावधान किये हैं कि गर्भस्थ शिशु के लिंग की जाँच नहीं की जाएगी. ऐसा करना अथवा गर्भपात करवाना कानूनन अपराध माना जायेगा किन्तु इसी अधिनियम में कुछ विशिष्ट उद्देश्यों के लिए प्रसव पूर्व जाँच की अनुमति मिल जाती है. इन उद्देश्यों में गुणसूत्रों की असमानता, आनुवांशिक, शारीरिक, लिंग सम्बन्धी बीमारियों, जन्मजात विकलांगता आदि को ज्ञात करना है किन्तु इसके साथ भी कुछ सुरक्षात्मक व्यवस्था की गई है. जैसा कि शिक्षित समाज में होता आया है, कानून की सहूलियतों का दुरूपयोग ही किया गया है, वैसा ही यहाँ भी हुआ. मेडिकल टर्मिनेशन एक्ट ऑफ़ प्रेगनेंसी (एमटीपी) 1971 में वर्णित प्रावधानों जैसे किसी पंजीकृत चिकित्सक द्वारा निर्देशित होने पर, गर्भवती स्त्री की जान को खतरा होने पर, गर्भस्थ शिशु के विकलांग होने की आशंका पर, बलात्कार के कारण गर्भ ठहरने पर, पति-पत्नी द्वारा अपनाये गर्भ निरोधक उपायों के असफल होने आदि स्थितियों में गर्भपात करवाया जा सकता है. यहाँ सवाल ये हैं कि पंजीकृत चिकित्सक के निर्देश को चुनौती कौन देगा? ये कौन निर्धारित करेगा कि पति-पत्नी द्वारा अपनाया गर्भ निरोधक उपाय असफल रहा? कानून के प्रभावी होने से पहले ही उसको निष्प्रभावी करने की रणनीति अपना ली जाती है. 

चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि लगातार होते गर्भपात से महिला के गर्भाशय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस बात की भी आशंका रहती है कि महिला भविष्य में गर्भधारण न कर सके. पुत्र की लालसा में बार-बार गर्भपात करवाते रहने से गर्भाशय के कैंसर अथवा अन्य गम्भीर बीमारियाँ होने से महिला भविष्य में माँ बनने की अपनी प्राकृतिक क्षमता भी खो देती है. परिणामतः वह आने वाले समय में परिवार के लिए न तो पुत्र ही पैदा कर पाती है और न ही पुत्री. बार-बार गर्भपात करवाने से महिला के गर्भाशय से रक्त का रिसाव होने की आशंका बनी रहती है. इससे महिला के शरीर में खून की कमी हो जाती है और अधिसंख्यक मामलों में गर्भवती होने पर अथवा प्रसव के दौरान महिला की मृत्यु इसी वजह से हो जाती है. इसके अतिरिक्त एक सत्य यह भी है कि जिन परिवारों में एक पुत्र की लालसा में कई-कई बच्चियाँ जन्म ले लेती हैं वहाँ उनकी सही ढंग से परवरिश नहीं हो पाती है. उनकी शिक्षा, उनके लालन-पालन, उनके स्वास्थ्य, उनके खान-पान पर भी उचित रूप से ध्यान नहीं दिया जाता है. इसके चलते वे कम उम्र में ही मृत्यु की शिकार हो जाती हैं अथवा कुपोषण का शिकार होकर कमजोर बनी रहती हैं.

देखा जाये तो वर्तमान में कानूनी उपायों से ज्यादा सामाजिक जागरूकता ही प्रभावी होगी. लोगों का अपनी सोच को बदलना ही ज्यादा उपयुक्त होगा. पुत्र ही मोक्ष दिलाएगा, वंश-वृद्धि कराएगा जैसी पुरातनपंथी सोच को बदलने की जरूरत है. एक पुत्र की लालसा में कई-कई बेटियों को मौत की नींद सुला देना उचित नहीं. घर-परिवार के लोगों को समझाए जाने की आवश्यकता है, समाज की स्थापित महिलाओं को रोल-मॉडल बनाकर सामने लाने की आवश्यकता है. रानी लक्ष्मीबाई, इंदिरा गाँधी, किरण बेदी, कल्पना चावला आदि जैसी महिलाओं के बारे में बताये जाने की आवश्यकता है. कानूनी उपायों के साथ-साथ बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच को बचपन से ही जगाने की आवश्यकता है. संवेदनशीलता बढ़ाने के उद्देश्य से ऐसे नियमों, कानूनों आदि को प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक पाठ्यक्रम बनाये जाने की जरूरत है. समाज को बताये जाने की जरूरत है कि समाज जब लिंगानुपात की समस्या को भोगेगा, स्त्रियों की संख्या में गिरावट को सहेगा तो उसका स्वरूप क्या होगा. 

हमारी वंश-वृद्धि के लिए बहुएँ कहाँ से आएँगी, पुत्र-जन्म के लिए माताएँ कहाँ से आएँगी, मुखाग्नि देने वाले बेटे किसकी कोख से पैदा होंगे? लिंगानुपात सम्बन्धी आँकड़ों की असलियत को ध्यान में रखकर इस स्थिति पर विचार करना ही होगा कि कहीं महिलाएँ इतिहास के पन्नों में ही दर्ज होकर न रह जाएँ. बेटियों का अपहरण किया जाना, गैंग-रेप, लड़कों का अविवाहित रह जाना, महिलाओं की खरीद-फरोख्त, यौन संक्रमण, यौन बीमारियों का फैलना आदि बुराइयाँ तो दिखने ही लगी हैं; ये हास्य का नहीं वरन सचेत होने का विषय है कि जिस गति से पुत्र-मोह का शिकार होकर समाज में कन्या भ्रूण हत्याएँ बढ़ती जा रही हैं उनसे कदाचित किसी दिन हमारा समाज महिला-विहीन न हो जाये. भविष्य में ऐसी भयावह स्थिति से दो-चार न होने के लिए हम सभी को वर्तमान में इस भीषण समस्या से दो-चार हाथ करने ही होंगे.
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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, १२ फरवरी २०१५ के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.

22 जनवरी 2015

बेटियों की संख्या नहीं बढ़ा पाए



इधर इन दिनों एकाएक कुछ लोगों में प्रसन्नता सी दिखने लगी है और ये प्रसन्नता किसी राजनैतिक अथवा आर्थिक कारणों से नहीं वरन देश में बाघों की संख्या बढ़ जाने से उत्पन्न हुई है. विगत वर्षों में बाघों की गिरती संख्या पर चिंता व्यक्त की गई थी, देश के अनेक जागरूक लोग बाघों को बचाने के लिए, उनकी संख्या बढ़ाने के लिए निकल पड़े थे. हास्यास्पद तो ये था कि ऐसे-ऐसे क्षेत्रों से लोग जागरूक हो गए थे जहाँ बाघ नामक कोई भी प्राणी सदियों से पाया नहीं गया; ऐसे लोग सक्रिय हो गए थे बाघों की संख्या बढ़ाने में जो इंसानों की संख्या कम करने में आगे रहे. बहरहाल ऐसे लोगों की मेहनत काम आई या फिर प्रकृति की अपनी मेहनत कि इस बार की गणना में बाघों की संख्या में वृद्धि दिखी. इसमें मीडिया से लेकर सामाजिक तबकों तक, जो बाघ बचाओ अभियान के अंग बने थे, ख़ुशी की लहर दौड़ी मगर अफ़सोस इस बात का रहा कि कोई भी बेटियों की संख्या बढ़ाने के प्रति इतना जागरूक नजर नहीं आया.
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ये अपने आपमें शर्म का विषय हो सकता है कि एक तरफ हम बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए आंदोलित हैं और दूसरी तरफ बेटियों की गिरती संख्या के लिए महज औपचारिक गोष्ठियाँ करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं. ये दुःख प्रकट करने का नहीं, अफ़सोस ज़ाहिर करने का नहीं, एक-दूसरे को जागरूक करने का नहीं वरन सत्य को स्वीकार करने का अवसर है. बेटियों की लगातार गिरती संख्या हमारे लिए जिस तरह से चिंता का विषय होना चाहिए था, उस तरह से नहीं है. हम जनगणना की आंकड़ेबाजी में फँसकर प्रसन्नता महसूस करने में लगे हैं. वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर स्पष्ट किया गया कि देश में प्रति एक हजार पुरुषों पर 943 महिलाएं हैं, जो वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर निर्धारित महिलाओं की संख्या 933 से अधिक है. इसी चंद बढ़ोत्तरी की आंकड़ेबाजी में देश की जनता मुग्ध है, सामाजिक जागरूक लोग प्रसन्न हैं मगर क्या इसी आँकड़े के साथ छिपे छह वर्ष तक की बालिकाओं की संख्या पर निगाह दौड़ाई गई है? इसी बिंदु पर आकर समूचे आँकड़े की असलियत सामने आती है. वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर शून्य से छह वर्ष तक की बालिकाओं की संख्या प्रति एक हजार बालकों पर 919 है, जो वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर 927 थी. सोचने की बात है कि इस एक दशक में बालिकाओं की संख्या में वृद्धि नहीं हुई है तो फिर महिलाओं की संख्या में वृद्धि कैसे हो गई? इस आंकड़ेबाजी का अपना ही एक शिगूफा है, जिसे दूसरी तरह से समझने की आवश्यकता है.
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यदि बेटियों की संख्या के सन्दर्भ में वर्ष 2011 की जनगणना को आधार बनाया जाये तो स्पष्ट है कि 26 प्रदेशों में छह वर्ष तक की बालिकाओं की संख्या 900 से अधिक रही जबकि वर्ष 2001 की जनगणना में ऐसे प्रदेशों की संख्या 29 थी. इसी तरह से कुल 13 राज्य ही ऐसे रहे जहाँ पर वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर वर्ष 2011 में छह वर्ष तक की बालिकाओं की संख्या में वृद्धि हुई है जबकि 22 राज्य ऐसे रहे जहाँ पर वर्ष 2001 के मुकाबले वर्ष 2011 में बालिकाओं की संख्या में गिरावट दर्ज की गई. आश्चर्य की बात ये रही कि गिरावट दिखाने वाले सभी राज्यों में वर्ष 2001 में बालिकाओं की संख्या 900 से अधिक थी. ऐसे में स्वयं इसका आकलन किया जा सकता है कि हमारे राज्य किस मुस्तैदी के साथ बेटियों की संख्या में वृद्धि करने हेतु तत्पर हैं. ये आँकड़े हमें अब विचलित नहीं करते और शायद कभी भी विचलित नहीं करते थे क्योंकि बेटियों की संख्या में गिरावट आना कोई प्राकृतिक कारण नहीं वरन मानवजनित है. कन्या भ्रूण हत्या करना, जन्म के बाद बेटियों से भेदभाव ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण बेटियों की संख्या में गिरावट आ रही है.
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इसके लिए जागरूकता तो आवश्यक है ही साथ ही समाज में कानून का भय भी आवश्यक है. आये दिन जिस तरह से बच्चियों को गर्भ में मारने की घटनाएँ सामने आ रही हैं, बेटियों के साथ भेदभाव और दुर्व्यवहार की घटनाएँ सामने आ रही हैं उन्हें देखकर लगता है कि लोगों में कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है. अल्ट्रासाउंड सेंटर वाले अथवा चंद चिकित्सकों द्वारा भले ही इसका दुरूपयोग किया जा रहा हो किन्तु खुद अभिभावक भी बेटियों को मारने में कहाँ पीछे रह रहे हैं. पूरे देश, प्रदेशों में चंद घटनाएँ ही सामने आई हैं जहाँ कि कन्या भ्रूण हत्या करने वालों, करवाने वालों को सख्त से सख्त सजा दी गई हो. बिना सख्ती दिखाए समाज में इस कुकृत्य के खिलाफ भय व्याप्त नहीं किया जा सकता है. लोगों को जागना होगा, कानून को जागना होगा वर्ना आने वाले समय में हम सब बाघ तो बचाते रहेंगे किन्तु बेटियों को पूरी तरह से खो देंगे.

02 नवंबर 2014

भ्रूण लिंग जाँच, कन्या भ्रूण हत्या का खेल चालू आहे



ये अपने आपमें अत्यंत शर्मनाक है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता की आदर्शवादिता दिखाने वाले समाज में खुलेआम भ्रूण लिंग जाँच जैसा कुकृत्य किया जा रहा है; गर्भ में बालिका की पहचान होने के पश्चात् उसका जीवन समाप्त किया जा रहा है. इससे भी अधिक शर्मनाक ये है कि इस तरह के कुकृत्यों में वो चिकित्सक भी सम्मिलित हैं जिनको समाज में भगवान का स्थान प्राप्त है. इधर हाल में देश की राजधानी में जिस तरह से खुलेआम वहाँ के नर्सिंग होम द्वारा एक महिला को अल्ट्रासाउंड सेंटर का पता बताया जाता है, जहाँ आसानी से भ्रूण लिंग जाँच की जाती है, तो ये कन्या भ्रूण हत्या निवारण की कोशिशों की गंभीरता को दर्शाता है. खुलेआम इस तरह के सेंटर के बारे में बताया जाना ये सिद्ध करता है कि इस तरह के आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के हौसले कितने बुलंद हैं और इसके निरोध के लिए बने अधिनियम (PCPNDT Act) का कोई भी खौफ इनके मन-मष्तिष्क पर नहीं है. कमोवेश ये स्थिति अकेले दिल्ली में ही नहीं है वरन देश के बहुतायत भागों में है. लेकिन ये कहकर कि इस कानून की धज्जियाँ उड़ाने वाले, इसका मखौल बनाने वाले, भ्रूण लिंग जाँच करवाने वाले, कन्या भ्रूण हत्या करने/करवाने वाले सम्पूर्ण देश में हैं, दिल्ली के अथवा देश भर के ऐसे अपराधियों को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता है, नज़रअंदाज़ किया भी नहीं जाना चाहिए. इसी के साथ सवाल खड़ा होता है तो इनको रोका कैसे जाए, इनके अपराध पर अंकुश कैसे लगाया जाये, इनकी कुप्रवृत्ति को समाप्त कैसे किया जाये. ऐसे सवालों का जवाब कई बार खुद ऐसे हालात ही बन जाते हैं. स्पष्ट है कि यदि कानून का ही डर होता तो देश भर में लिंगानुपात में भयंकर गिरावट देखने को न मिल रही होती. वर्ष २०११ की जनगणना में भले ही वर्ष २००१ की जनगणना के मुकाबले लिंगानुपात में किंचित मात्र सुधार होता दिखा है किन्तु ये भी संतुष्ट करने वाला नहीं कहा जायेगा क्योंकि इसी अवधि में शिशु लिंगानुपात में व्यापक कमी आई है.
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ऐसी स्थिति में जबकि लिंगानुपात में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, सरकारें बेटी बचाओ अभियान के द्वारा जागरूकता लाने में लगी हुई हैं, गैर-सरकारी संगठन और अनेक व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर बेटियों के हितार्थ कार्य करने में लगे हैं इसके बाद भी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. इस विकृति से निपटने के लिए हर बार जन-जागरूकता की बात की जाती है किन्तु अब जबकि खुलेआम ऐसे सेंटर की जानकारी दिए जाने से लगता है कि जनता ने भी जागरूकता से किनारा करना शुरू कर दिया है. जनसहयोग के साथ-साथ प्रशासन को सख्ती से कार्य करने की जरूरत है. सरकारी, गैर-सरकारी चिकित्सालयों में इस बात की व्यवस्था की जाये कि प्रत्येक गर्भवती का रिकॉर्ड बनाया जाये और उसे समय-समय पर प्रशासन को उपलब्ध करवाया जाये. ध्यान देने योग्य ये तथ्य है कि एक महिला जो गर्भवती है, उसे नौ माह बाद प्रसव होना ही होना है, यदि कुछ असहज स्थितियाँ उसके साथ उत्पन्न नहीं होती हैं. ऐसे में यदि नौ माह बाद प्रसव संपन्न नहीं हुआ तो इसकी जाँच हो और सम्पूर्ण तथ्यों, स्थितियों की पड़ताल की जाये. यदि किसी भी रूप में भ्रूण हत्या जैसा आपराधिक कृत्य सामने आता है तो परिवार-डॉक्टर को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. ऐसे परिवारों को किसी भी सरकारी सुविधा का लाभ लेने से वंचित कर दिया जाये, चिकित्सक का लाइसेंस आजीवन के लिए रद्द कर दिया जाये, ऐसे सेंटर्स तत्काल प्रभाव से बंद करवा दिए जाएँ और दंड का प्रावधान भी साथ में रखा जाये.
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इतने सालों की जद्दोजहद से ये स्पष्ट हो चुका है कि बेटी होने पर किसी योजना का लाभ देने का मंतव्य, सरकारी योजनाओं से लाभान्वित किये जाने सम्बन्धी प्रयासों, कानूनी प्रक्रियाओं आदि से सुधार होने के आसार दिख नहीं रहे हैं. ऐसे में कुछ समय तक कठोर से कठोर क़दमों की जद्दोजहद किये जाने की जरूरत है. यदि ऐसा नहीं किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब कि ऐसे धूर्त और कुप्रवृत्ति के चिकित्सकों के प्रतिनिधि घर-घर जाकर लोगों को भ्रूण लिंग जाँच-कन्या भ्रूण हत्या के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित करेंगे. इसके साथ वह दिन भी दूर नहीं होगा जबकि बेटों के विवाह के लिए बेटियाँ मिलनी बंद हो जाएँगी और समाज एक तरह की कबीलाई संस्कृति में परिवर्तित हो जायेगा. 
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10 सितंबर 2014

अमानवीयता, पाशविकता का परिचायक है नाली में बहता भ्रूण



 शहर में गंदे पानी का निकास करती नाली; कूड़ा-करकट, गंदगी, अन्य अपशिष्ट को अपने साथ बहाकर ले जाती नाली; सफाई के अभाव में बजबजाती नाली और इसी नाली में बहता मिलता है मानव भ्रूण. उत्तर-प्रदेश के बुन्देलखण्ड भूभाग का जनपद जालौन और उसका जिला मुख्यालय उरई, जहाँ कि जनपद स्तर के सभी प्रशासनिक अधिकारियों के आवास हैं, कार्यालय हैं; सभी बड़े राजनैतिक दलों के नेता-कार्यालय मौजूद हैं; राष्ट्रीय-प्रादेशिक-स्थानीय स्तर के समाचार-पत्रों के कार्यालय यहाँ हैं; इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उपस्थिति भी यहाँ है, सरकारी, गैर-सरकारी बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लेकर समाजसेवा करने वाली नामी-गिरामी गैर-सरकारी संस्थाएं भी यहाँ हैं, इसके बाद भी भ्रूण-हत्या जैसा अपराध होना, भ्रूण के नाली में बहाए जाने जैसी शर्मनाक घटना होना दर्शाता है कि अपराधी किस हद तक अपना मनोबल ऊँचा किये हुए हैं. नाली में भ्रूण मिलने की घटना मानवता को कलंकित करने वाली इस कारण से भी कही जा सकती है क्योंकि जहाँ ये भ्रूण पाया गया है वहाँ शहर के प्रतिष्ठित चिकित्सक का नर्सिंग होम है. समाज में कहीं भी भ्रूण-हत्या जैसी वारदात सामने आने पर प्रथम विचार कन्या भ्रूण हत्या का आता है, कुछ ऐसा ही इस घटना पर भी हुआ.
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नाली में सात माह के मानव भ्रूण की खबर मिलते ही सभी की आशंका कन्या भ्रूण हत्या को लेकर उपजी किन्तु ये उस समय लोगों के आश्चर्य की बात हो गई जबकि उन्हें पता चला कि नाली में मिला मानव भ्रूण बालक है. एकाएक उपजी लहर सी शांत हो गई; मीडिया के लिए स्टोरी नहीं; सामाजिक संस्थाओं के लिए आन्दोलन का मुद्दा नहीं आखिर भ्रूण बालक का है. क्या वाकई ये संवेदनशील मामला नहीं कि एक नर्सिंग होम के पास नाली में बहता हुआ सात माह का मानव भ्रूण मिलता है. सवाल यहाँ उसके बालक या बालिका होने का नहीं, सवाल मानव जाति की मानसिकता का है, मानवता का है. ये किसी तरह का अपराध नहीं है कि एक नर्सिंग होम के पास मानव भ्रूण मिलता है किन्तु इस बात की जाँच अवश्य होनी चाहिए कि आखिर वहाँ ये आया कैसे? ये आसानी से समझने वाली बात है कि इस भ्रूण हत्या में कन्या होना तत्त्व केन्द्र में नहीं है क्योंकि सात माह में किसी भी भ्रूण के लिंग की पहचान सहजता से हो जाती है. स्पष्ट है कि ये मामला कन्या भ्रूण-हत्या से सम्बंधित नहीं है. ऐसी स्पष्ट स्थिति के बाद प्रशासन को और तत्परता से वास्तविकता को सामने लाने का प्रयास करना चाहिए.
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संभव है कि ये मामला किसी अनब्याही माँ से जुड़ा हुआ हो, जिसका सामाजिक दबाव में, पारिवारिक दबाव में उसका गर्भपात करवाया गया हो? ऐसे में भी ये पता करने की आवश्यकता बनती है कि आखिर इस कृत्य में किस चिकित्सक ने मदद की है. ये एक आम शिक्षित व्यक्ति को भी पता है कि सात माह की अवस्था में चिकित्सकीय रूप से गर्भपात संभव-सुरक्षित ही नहीं है. ऐसे में ये जानना और भी आवश्यक हो जाता है कि ऐसा क्यों, कब, कहाँ और किसके द्वारा किया गया?
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एक सम्भावना ये भी बनती है कि ये किसी विवाहित महिला की ‘प्री मैच्योर डिलीवरी’ हो या फिर ‘मिसकैरिज’ जैसी कोई घटना हो जिसके लिए किसी चिकित्सक की मदद ली गई हो. यदि ऐसा है तब भी इस घटना को भुलाने योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि सम्बंधित स्त्री को चिकित्सकीय सुविधा देने के बाद, उसकी मदद करने के बाद किसी भी चिकित्सक, सम्बंधित नर्सिंग होम आदि की जिम्मेवारी बनती थी कि वे उस भ्रूण का यथोचित निपटान करते. ऐसा न किया जाना और उसे नाली में बहा देना अमानुषिक कृत्य ही कहा जायेगा, जिसके लिए न सही कानूनी किन्तु सामाजिक दंड के भागी सम्बंधित लोग बनते ही हैं.
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समाज में कई बार किसी भीख मांगने वाली महिला के साथ, मानसिक विक्षिप्त महिला के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने की घटनाएँ, उनके गर्भवती होने की घटनाएँ भी सामने आई हैं. इस मामले में भी संभव है ऐसा ही कुछ हुआ हो और सम्बंधित गर्भवती महिला के साथ समुचित चिकित्सकीय देखभाल के अभाव में ऐसा कुछ हो गया हो. यदि ऐसा भी है तो ये हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कलंक है जहाँ किसी भिखारिन, किसी मानसिक विक्षिप्त महिला को हवस का शिकार बना लिया जाता हो. ये कहीं न कहीं प्रशासनिक अक्षमता भी कही जाएगी कि उनके द्वारा आज भी ऐसे लावारिस लोगों को, अनाथ लोगों को संरक्षण, चिकित्सकीय सुविधाएँ दे पाना संभव नहीं हो सका है.
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यहाँ सवाल नाली में सात माह के भ्रूण के बालक या बालिका होने का नहीं है वरन मानव स्वभाव की मानसिकता का है. ये अपने आपमें सम्पूर्ण मानव जाति के लिए, मानवता के लिए शर्म का विषय तो है ही कि आधुनिकता में रचे-बसे समाज में आज भी भ्रूण-हत्याएं हो रही हैं किन्तु ये और भी कलंकित करने वाली घटना है कि एक भ्रूण नाली में बहते पाया जाता है. वास्तविकता क्या है इसे सामने आने में समय लगेगा, कहिये प्रशासनिक लीपापोती में सामने न भी आये किन्तु ये घटना दर्शाती है कि हम मानव आज भी जानवर ही बने हुए हैं. 
चित्र मीडिया मित्रों के सहयोग से प्राप्त... ये घटना ७ सितम्बर २०१४ की है..... चित्रों की वीभत्सता को कम करने के लिए आवरण ओढ़ा दिया गया है.....
संयोजक-बिटोली 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर