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29 जुलाई 2020

ज़िन्दगी सिर्फ वर्तमान का नाम नहीं


ज़िन्दगी कितनी भी आसानी से गुजर रही हो मगर उसमें एक लहर ही बहुत है हिलोर उठाने को. आखिर ज़िन्दगी की झील में शांति क्यों नहीं रहती है? कभी वर्तमान, कभी अतीत आकर कोई न कोई हलचल मचा जाता है. इस हलचल में ज़िन्दगी की शांत झील में उथलपुथल मच जाती है. बहुत बार ऐसा होता है जबकि सबकुछ ख़ामोशी से गुजर जाता है और कई बार ऐसा होता है कि सबकुछ आसानी से, ख़ामोशी से नहीं गुजरता है. यही स्थिति ज़िन्दगी में भी उथल पुथल मचा देती है.


ज़िन्दगी सिर्फ वर्तमान का नाम नहीं न ही सिर्फ भविष्य का रूप है बल्कि यह नितान्त अतीत के ऊपर निर्मित स्थिति है. ऐसे में अतीत का डांवाडोल होना न केवल वर्तमान को प्रभावित करता है बल्कि भविष्य की रूपरेखा को भी प्रभावित करता है. ज़िन्दगी के ऐसे उथल पुथल क्षणों को संयमित रूप से देखने की, गुजारने की आवश्यकता होती है. अतीत के इन्हीं पलों पर न केवल वर्तमान की बल्कि भविष्य की आधारशिला टिकी होती है. ऐसे में यह बहुत महत्त्वपूर्ण होता है कि अतीत का सामना वर्तमान में, भविष्य में किस तरह से किया जा सकता है. यही संवेदित होने की पहचान है, यही जागरूक होने की निशानी है.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

18 मई 2019

बलवंत भैया कोठी का भूत


उस रात राकेश भाईसाहब के हाथ की टॉर्च एकदम से बंद हो गई. पता नहीं ये टॉर्च की गलती थी या फिर भाईसाहब की घबराहट. भाईसाहब तो पहले से ही वहाँ जाने से घबरा रहे थे. वैसे डराया तो हम सभी को गया था, किसी न किसी रूप में मगर जैसे एक सनक थी वहाँ जाने की. और वहाँ पहुँचकर कुछ देर बाद जब अन्दर से पत्थरों की बारिश होने लगी तो लगा कहीं किसी गिरोह का कारनामा तो नहीं ये? फिर उसी समय सामने से आदमकद सफ़ेद छवि का सामने आना और वापस गायब हो जाना होने लगा. इससे घबराहट अकेले राकेश भाईसाहब पर हावी न हुई, घबराहट तो कहीं न कहीं हम सबमें ही थी, बस उसका अनुपात सभी में अलग-अलग रहा था. घबराहट या डर इसका नहीं था कि सामने सफ़ेद आदमकद स्वरूप दिखाई दे रहा था, थोड़ा बहुत भय इसका था कि अन्दर से होती पत्थरबाजी कहीं हम लोगों में से किसी को चोटिल न कर दे. इसके अलावा नवीन और हमारी आकुलता कि सामने वाले पर हमला बोल दो, जो होगा देखा जायेगा. हम दोनों के दोनों हाथों में ही गुप्ती और हॉकी थी. सामने लहराती हुए सफ़ेद आदमकद छवि पर हमला करने को लेकर असमंजस इसलिए भी बना हुआ था कि कहीं हम लोगों में से ही कोई साथी न हो. इस बात का भरोसा ज्यादा था कि कोई साथी ही है क्योंकि अन्दर से आते पत्थर हम लोगों पर न बरसने के बजाय आसपास गिरने में लगे थे.


इस पत्थरबाजी और उस कथित भूत के दिखने-छिपने के बीच हम लोगों ने अपनी चाय भी पी और साथ लाये गए परांठे भी खाए. चूँकि हम लोग आटा, पानी, तवा, घी आदि सहित अन्य सामानों का बोझ अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे इस कारण परांठे तो हॉस्टल में बना लिए गए, उसके बाद तय हुआ कि चाय कोठी पर ही बनाई जाएगी. ये आसान था, बस साथ में स्टोव ले जाना था, दूध और चाय-शकर. बर्तन के रूप में भगौना और गिलास. देर रात अक्षय भाईसाहब, राकेश भाईसाहब, नवीन और हम अपने हॉस्टल के पीछे स्थित पहाड़ी पर बनी बलवंत भैया की कोठी की चल दिए. हम चारों लोगों के साथ-साथ अतुल भाईसाहब का रोज शाम का नियम था बलवंत भैया की कोठी पर जाने का. एक शाम तय किया कि यहाँ आकर चाय पी जाये किसी रात में. जिस रात का निर्धारण किया गया, उसी शाम अपनी नियमित सैर के दौरान पहाड़िया पर जाकर जगह वगैरह देख ली गई, साँप-बिच्छू आदि से बचाव के साधन अपना लिए गए, जगह को पहले से साफ़ करके चिन्हित कर दिया गया ताकि देर रात पहचानने में समस्या न हो. 

रात को पहुँच भी गए अपने तय स्थान पर. स्टोव जलाकर चाय का बनाना शुरू हुआ. चाय बनी, फिर गिलासों में निकाल कर उसका और परांठों का आनंद लिया जाने लगा. उसी समय बलवंत भैया की कोठी के अन्दर से पत्थरों का बरसना शुरू हुआ. इक्का-दुक्का पत्थरों के गिरने तक तो हम लोग आपस में बतियाते हुए चाय-परांठों का स्वाद लेते रहे मगर जब पत्थरों के गिरने की रफ़्तार और संख्या बढ़ गई तो आशंका उठी. आशंका इसकी कि कहीं कोठी के अन्दर कोई गैंग तो नहीं जो हम लोगों के यहाँ होने से अपने को असुरक्षित महसूस करने लगा हो और उसने ये पत्थरबाजी शुरू कर दी हो. इस संशय के बीच अचानक से कोठी के भीतर से एक सफ़ेद छवि सामने आई और कुछ सेकेण्ड के बाद गायब हो गई. गायब क्या हुई होगी, कोठी के पीछे चली गई होगी. इसी दौरान टॉर्च बंद हुई और हम लोगों के हमलावर होने को अक्षय भाईसाहब ने रोका. उसी दौरान वह सफ़ेद छवि फिर प्रकट हुई. इस बार हम लोगों ने उस पर पत्थरों से हमला बोल दिया. इसके बाद वो छवि स्थायी रूप से गायब हो गई.

उसके कुछ देर बाद हम लोग बलवंत भैया की कोठी के आसपास टहल कर, अपनी ही तरह की जासूसी सी करके हॉस्टल वापस लौट आये. उस रात हम लोगों के लौटने पर हमारे कुछ साथी बड़े मूड में दिखे, जिससे एहसास हो गया था कि कोई और नहीं ये सारी शरारत हॉस्टल के ही भाइयों की रही. हालाँकि व्यक्तिगत हमसे कभी किसी ने सीधे तौर पर नहीं बताया मगर उस सफ़ेद छवि के पीछे पप्पू भाईसाहब का होना हम सबके विश्वास में रहा. फिलहाल, उस रात का अपना ही एक अलग रोमांच आज तक गुदगुदा जाता है.

25 फ़रवरी 2019

नसैला का भूत और विज्ञान


अपनी नियमित घुमक्कड़ी और मित्रों की बैठकी के बीच आज अचानक से कुछ परिचितों के बीमार होने की चर्चा छिड़ गई. विगत कुछ दिनों से कुछ परिचितों के बीमार होने, कुछ के दुर्घटना में घायल होने, कुछ के इस लोक से चले जाने की खबरें लगातार मिलती रही हैं. परिचितों, जान-पहचान वालों के सम्बन्ध में ऐसी खबरों का मिलना परेशान कर जाता है. कुछ परिचित लोगों के इस दौरान स्वाइन फ्लू से पीड़ित होने की खबर मिली. इसी बीमारी से एक मित्र का असमय जाना भी हम सभी मित्रों को दुखी कर गया. मित्रों की आपसी चर्चा के दौरान बात उठी कि हम लोग जितना शिक्षित होते जा रहे हैं, चिकित्सा विज्ञान जितना तरक्की करता जा रहा है, उतना ही बीमारियों का विकास भी होता जा रहा है. इसके सापेक्ष ऐसा भी कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे तकनीक का, चिकित्सा विज्ञान का विकास होता गया वैसे-वैसे हम सभी लोग बीमारियों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी लेते रहे, उनसे परिचित होते रहे. अन्यथा की स्थिति में कई वर्षों पहले तक बीमारी को किसी न किसी भूत-प्रेत से, किसी न किसी जादू-टोने से, किसी न किसी तंत्र-मन्त्र से जोड़कर देखा जाने लगता था.


इन्हीं बातों के क्रम में हमें अपने बचपन की कई ऐसी बातें याद आईं जिनमें हम लोगों ने भूत-प्रेत से सिर्फ बातों में ही साक्षात्कार किया. हालाँकि हर बार घटित होती किसी भी घटना में सिर्फ बातें ही बातें सामने आती रहीं, किसी बार भी भूत से सामना नहीं हुआ. ऐसी ही एक घटना का जिक्र आज दोस्तों की महफ़िल में हुआ. हमारी ननिहाल जनपद जालौन में ही कुसमरा गाँव में है और उसके जाने के लिए उसके नजदीक के एक अन्य गाँव इटौरा होते हुए जाना पड़ता है. कुसमरा और इटौरा के बीच बहुत ज्यादा दूरी न होने के कारण अक्सर हम बच्चे लोग दिन की मस्ती में दौड़ते-भागते गाँव से इटौरा तक आ जाया करते थे. बम्बा में तैरते हुए, बगीचों में दौड़ लगाते हुए, खेतों की मिट्टी फांकते हुए दिन भर में कितनी बार कुसमरा से इटौरा आना-जाना हो जाया करता था, पता ही नहीं चलता था. उसी रास्ते के बीच एक नामी भूतिया बगीचा पड़ा करता था. दिन की कितनी भी चमकदार रौशनी हो या फिर रात का घना अँधियारा, जब भी उस बगीचे के करीब से निकलना होता तो लगता कि उस बगीचे का वह नामी भूत हम लोगों को अपनी चपेट में लेने को निकल आया है.

नसैला नामक उसी भूत के नाम पर वह बगीचा आज तक प्रसिद्द है. उस समय हम बच्चों की पलटन में चाहे कितने लोग रहें मगर नसैला की बगिया के पास से निकलते ही चलने-दौड़ने की रफ़्तार अपने आप बढ़ जाया करती थी. गाँव के कई लोगों से अजीब-अजीब तरह के किस्से सुन-सुन कर भी नसैला के बारे में कल्पना लोक से न जाने कैसे-कैसे ख्याल दिमाग में आते रहते थे. गाँव के किसी  व्यक्ति को उसने तम्बाकू खिलाई होती थी, किसी से उसने बीड़ी माँग कर पी होती थी, किसी की बैलगाड़ी इसके कारण आगे नहीं बढ़ पा रही होती थी, किसी के कंधे पर कोई आकर बैठ गया होता था, किसी की साईकिल पर बैठने के लिए नसैला ने हाथ दिया होता था. कहने का मतलब, जितने लोग उतनी बातें. अब भी अक्सर अपने ननिहाल जाना होता है. अब नसैला की बगिया भी जिंदा नहीं है और शायद नसैला के भूत भी निधन हो गया है क्योंकि अब उस रास्ते में जाने पर किसी तरह की बगिया नहीं दिखाई देती और गाँव में भी अब कोई नसैला के किस्से नहीं सुनाता है. ऐसा लगता है जैसे आज की भागदौड़ और भीडभाड वाली दुनिया से बचने के लिए नसैला ने कहीं और अपनी दुनिया बना ली है. आज भी नसैला के साथ-साथ उस राजकुमारी की कहानी याद आती है जो तकुआ की सुई लगने से कई सालों के लिए सो गई थी और फिर एक राजकुमार के आने से उसकी नींद टूटी थी. 

चिकित्सा विज्ञान ने हमें इतना पढ़ा-लिखा दिया कि अब इन्सान समझने लगा है कि क्या भूत है, क्या बेहोशी है, क्या डेंगू है, क्या स्वाइन फ्लू है. इसके साथ-साथ इसी विज्ञान ने हम सबके भीतर से आध्यात्मिक, प्राकृतिक, ईश्वरीय डर, श्रद्धा को भी समाप्त किया है. इसने यदि हमें साक्षर बनाया है तो आपस में विद्वेष भी बढ़ाया है. आखिर अब हम पढ़-लिख कर समझने लगे हैं कि ईश्वरीय शक्ति जैसा कुछ नहीं, भगवान जैसा कुछ नहीं जो है सो सब विज्ञान है, सब इन्सान है. इसी ने आपस के प्रेम, सौहार्द्र को समाप्त किया है, आपस में कटुता का विस्तार किया है. अब लगता है इससे बढ़िया तो वह नसैला का भूत था जो इंसानों को भले डराता था मगर उ सबको एकजुट तो रखता था.