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16 दिसंबर 2014

हम तो रोते ही आ रहे हैं

आज इन बच्चों की मौत पर ही नहीं.....
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हम तो उस दिन भी रोये थे जब गोधरा में ट्रेन में आग लगी थी....
हम तो उस दिन भी रोये थे जब अक्षरधाम मंदिर में हमला हुआ था.....
हम तो उस दिन भी रोये थे जबकि हमारा प्लेन हाइजैक किया गया था.....
हम तो उस दिन भी रोये थे जबकि संसद पर हुए हमले में हमारे निर्दोष मारे गए थे.....
हम तो उन दिनों में भी रोये थे जबकि गुजरात.... मुंबई.... आदि सहित देश के अनेक भागों में बम धमाकों में हमारे मासूम.... निर्दोष नागरिक मारे गए थे.....
हम तो उस दिन भी रोये थे जबकि मुंबई काण्ड में हमारे निर्दोष मारे गए थे......
हम तो उस दिन भी रोये थे जबकि मुंबई के शिवाजी पार्क में हमारे शहीद जवानों की स्मृतियों पर गुस्सा निकाला गया था.....
हम तो उस दिन भी रोये थे जबकि देश के विभिन्न राज्यों से वहाँ के मूल निवासियों को खदेड़-खदेड़ कर मारा गया था.....
हम तो उस दिन भी रोये थे जबकि हमने तुष्टिकरण के लिए भगवा आतंकवाद.... भगवा आतंकवादी का आरोप सहा था....
हम तो उस दिन भी रोये थे जबकि हमारे लालबहादुर शास्त्री जी जिंदा वापस नहीं आये थे...
अरे... तुम लोग रोने की स्थिति... रोने की कीमत क्या जानो....
हम तो उस दिन से रोते चले आ रहे हैं जिस दिन सत्ता के लालच में तुम्हें एक अलग मुल्क दे दिया गया....
हम तो उस दिन से रोते चले आ रहे हैं जबसे अहिंसा के पुजारी ने हिंसा का बीज बो दिया था.......
हम तो उस दिन से रोते रहे हैं जिस दिन से तुम्हारे नाम से इस देश में रोटियां सेंकी जाने लगीं....
तुम एक दिन रोये तो समझ आने लगा.... निर्दोष... निरीह का अर्थ...... :( :( :( 

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पाकिस्तान में पेशावर के एक स्कूल में आतंकी हमले में मारे गए बच्चों की घटना के बाद :(

26 जनवरी 2014

भारतीय ध्वज की विकास-यात्रा और भारतीय ध्वज संहिता




भारतीय आन-बान-शान का प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज तीन रंगों से बना हुआ है इसी कारण इसे हम तिरंगा कह कर भी पुकारते हैं। ध्वज में सबसे ऊपर केसरिया रंग, बीच में सफ़ेद और सबसे नीचे गहरा हरा रंग समानुपातिक रूप में होता है। सफ़ेद पट्टी में बीचों-बीच गहरे नीले रंग का एक चक्र भी बना होता है, जिसको सारनाथ में स्थापित सिंह के शीर्षफलक के चक्र में दिखने वाले चक्र के रूप में परिभाषित किया गया है। इस चक्र में 24 तीलियाँ होती हैं। ध्‍वज को साधारण भाषा में झंडा भी कहा जाता है। झंडे की लम्‍बाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 होता है। राष्‍ट्रीय ध्‍वज को 22 जुलाई 1947 को भारत के संविधान द्वारा अपनाया गया था।
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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के संभी रंगों का अपना विशेष महत्त्व है. केसरिया रंग वैराग्य का रंग है। आज़ादी के दीवानों ने इसको अपने ध्वज में सबसे ऊपर इसी सोच के कारण स्थान दिया कि आने वाले दिनों में देश के नेता स्वार्थ छोड़ कर देश के विकास में खुद को समर्पित कर दें। तिरंगे का सफ़ेद रंग प्रकाश और शांति के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया जाता है। हरे रंग को प्रकृति से सम्बंधित करके इसके माध्यम से संपन्नता को दर्शाया गया है। तिरंगे के केंद्र में स्थित चक्र गतिशीलता के साथ-साथ  अशोक चक्र धर्म के 24 नियमों की याद दिलाता है।
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पहला भारतीय ध्वज –   सन 1906 में पहली बार भारत का गैर आधिकारिक ध्‍वज फ़हराया गया। इसे सन 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था। तत्पश्चात 7 अगस्त 1906 को बंगाल के विभाजन के विरोध में कलकत्ता में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। हमारा पहला ध्वज लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बना हुआ था। सबसे ऊपर की हरी पट्टी रखी गई थी जिसमें 8 आधे खिले हुए कमल के फूल थे। झंडे में सबसे नीचे लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वन्दे मातरम् लिखा हुआ था।

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दूसरा भारतीय ध्वज-- दूसरा ध्वज भीकाजी कामा और उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा सन 1907 में फहराया गया था। कुछ लोगों मानना है कि ऐसा कार्य सन  1905 में हुआ था। बताया जाता है कि सुबह साढ़े आठ बजे इंडिया गेट पर लोगों की भीड़ ने  करतल ध्वनि के बीच यूनियन जैक को उतारकर इसी भारतीय राष्ट्रीय झंडे को फहराया था। इस दूसरे ध्वज में कुछ बदलाव भी किये गए, जिनमें सबसे ऊपर की हरी पट्टी का रंग हरे से केसरिया कर दिया गया और उसमें कमल के फूलों का स्थान सात तारों, जिन्हें सप्तऋषि के समकक्ष माना गया, ने ले लिया। सबसे नीचे की पट्टी का रंग भी लाल से परिवर्तित करके हरे में बदल दिया गया. शेष ध्वज पहले की तरह ही रहा। इस ध्‍वज को बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
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तीसरा भारतीय ध्वज -- भारतीय राजनीतिक संघर्ष सन 1917 तक आते-आते एक निश्चित मोड़ लिया। एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने अपने आंदोलन के दौरान इसे फहराया था। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियाँ एक के बाद बनी हुई थीं और सप्‍तऋषि आकृति में इस पर सात सितारे बने हुए थे। बांये हिस्से में ऊपरी किनारे पर यूनियन जैक और दूसरे दायें कोने में सफ़ेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।




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चौथा भारतीय ध्वज -- सन 1916 में एक ऐसे ध्वज की कल्पना की गई जो सभी भारतवासियों को एकसूत्र में बाँध सके। इस पहल को देखते हुए एक नेशनल फ़्लैग मिशन का गठन किया गया। सन 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बना कर महात्मा गांधी को दिया। इसमें दो रंगों को शामिल किया गया था। लाल और हरे रंग को दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम के प्रतिनिधित्‍व के रूप में प्रदर्शित किया गया था। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए। इसी के चलते ध्वज का यह चौथा रूप सामने आया।
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पाँचवाँ भारतीय ध्वज -- वर्ष 1931 को ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष कहा जा सकता है। राष्ट्रीय ध्वज में रंग को लेकर तरह-तरह के वाद-विवाद चलते रहे। काफ़ी तर्क वितर्क के बाद भी जब सब एकमत नहीं हो पाए तो सन 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस के ध्वज को मूर्त रूप देने के लिए 7 सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया। इस ध्‍वज का स्‍वरूप वर्तमान ध्वज की तरह ही (तीन रंगों – केसरिया, सफ़ेद और हरा को शामिल किया गया) रखा गया और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे को दर्शाया गया था। यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया था कि इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं है। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा।
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वर्तमान भारतीय ध्वज -- आज़ादी के परवानों ने इसी ध्वज के तले अनेक आंदोलन किए और 1947 में अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। आज़ादी की घोषणा से कुछ दिन पहले राष्ट्रीय ध्वज को नया रूप देने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई और तीन सप्ताह के भीतर ही 14 अगस्त को इस कमेटी ने अखिल भारतीय कांग्रेस के ध्वज को ही राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता देने की सिफ़ारिश की। इसमें सिर्फ इतना परिवर्तन किया गया कि बीच की सफ़ेद पट्टी में चरखे के स्थान पर चक्र को प्रतिस्थापित किया गया। 15 अगस्त 1947 को यही तिरंगा हमारी आज़ादी और हमारे देश की आज़ादी का प्रतीक बन गया।
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तिरंगे का सम्मान : ध्वज के सम्मान की बात भी स्पष्ट कर दी गई कि ध्वज फहराने के समय किस आचरण संहिता का ध्यान रखा जाना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज कभी भूमि पर नहीं गिरना चाहिए और ना ही धरातल के संपर्क में आना चाहिए। सन 2005 के पहले तक इसे वर्दियों और परिधानों में उपयोग में नहीं लाया जा सकता था, लेकिन सन 2005 में फिर एक संशोधन के साथ भारतीय नागरिकों को इसका अधिकार दिया गया लेकिन इसमें ध्यान रखने वाली बात ये है ये किसी भी वस्त्र पर कमर के नीचे नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज कभी अधोवस्त्र के रूप में नहीं पहना जा सकता है।
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भारत का राष्ट्रीय झंडा, भारत के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिरूप है। यह हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। सभी के मार्गदर्शन और हित के लिए भारतीय ध्वज संहिता-2002 में सभी नियमों, रिवाजों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया है। ध्वज संहिता-भारत के स्थान पर भारतीय ध्वज संहिता-2002 को 26 जनवरी 2002 से लागू किया गया है।
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झंडा फहराने का सही तरीका
* जब भी झंडा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे।

* सरकारी भवन पर झंडा रविवार और अन्य छुट्टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है, जिसके अलग से प्रावधान किये गए हैं।

* झंडे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।

* जब झंडा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।

* झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुँह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिने ओर हो।

* झंडा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए।

* फटा या मैला झंडा नहीं फहराया जाता है।

* झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।

* किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊँचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा।

* झंडे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।

* जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।
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आइये हम सब अपने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को सम्मान दें और देश की आज़ादी के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाले शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि प्रदान करें। जय हिन्द.... 

30 नवंबर 2013

स्वच्छंदता, दैहिक स्वतंत्रता, सेक्स का घालमेल लिव-इन-रिलेशन




माननीय न्यायालय की टिप्पणी के बाद लिव-इन-रिलेशन फिर चर्चा में है. महिला मुक्ति के समर्थक ऐसे किसी भी विषय का समर्थन करते आसानी से दिख जाते हैं जहाँ से शारीरक संबंधों की बाध्यता से स्वतंत्रता मिलती दिखती हो जबकि संस्कृति की रक्षा का झंडा उठाये घूमते लोग ऐसे विषयों के विरोध में बात करते दिखते हैं. देखा जाये तो इन दोनों पक्षों के लोग कहीं न कहीं एक तरह की कट्टरता का अनुपालन करते दिखते हैं. इन लोगों के लिए विषय की गंभीरता, उसके उद्देश्य, समाज पर उसका प्रभाव, उसकी दीर्घकालिकता का कोई अर्थ नहीं होता, वे सिर्फ और सिर्फ अपनी-अपनी बात को सिद्ध करने का अनर्गल प्रयास करने में लगे रहते हैं. लिव-इन-रिलेशन भी एक इसी तरह का विषय है जो एक तरफ स्त्री की स्वतंत्रता का आयाम तय करता है वहीं दूसरी तरफ महिलाओं की स्थिति को ही नाजुकता प्रदान करता है.
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भूमंडलीकरण के इस दौर में युवा वर्ग अपने कैरियर को बनाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है. उसके लिए वर्तमान में विवाह से अधिक महत्त्वपूर्ण जल्द से जल्द सफलता का मुकाम हासिल करना होता है; अधिक से अधिक धनार्जन करना होता है; ऐशो-आराम के समस्त संसाधनों को प्राप्त कर लेना होता है. आगे निकलने की आपाधापी में लगे युवाओं में विवाह संस्था के प्रति विश्वास भी लगभग शून्य सा होता जा रहा है. किसी तरह की सामाजिकता का भान उन्हें इस संस्था में नहीं दीखता है वरन यह एक तरह की बंदिश, प्रतिबन्ध सा दिखाई देता है. बिना किसी प्रतिबन्ध, बिना किसी जिम्मेवारी, निर्द्वन्द्व भाव से जीवन जीने की संकल्पना, अकल्पनीय स्वतंत्रता के बीच शारीरिक संबंधों की स्वीकार्यता ने ही लिव-इन-रिलेशन जैसे संबंधों को जन्म दिया. इस तरह के सम्बन्ध नितांत दैहिक आकर्षण और उसकी माँग और आपूर्ति जैसे क़दमों की देन होते हैं और यदि ये कहा जाए कि ऐसे सम्बन्ध यदि दीर्घकालिक, पूर्णकालिक नहीं हैं तो इनका सर्वाधिक नुकसान महिलाओं को ही उठाना पड़ता है, उन महिलाओं का कोपभाजन बनना होता है जो शारीरिक स्वतंत्रता को महिला-स्वतंत्रता से सम्बद्ध करके देखती हैं. जबकि सत्यता यही है कि ऐसे संबंधों में प्रत्येक रूप में महिलाओं को ही दुष्परिणाम सहने पड़ते हैं.
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प्राकृतिक रूप से स्त्री-पुरुष की शारीरिक स्थिति नितांत भिन्न रही है. सामाजिक प्रस्थिति को सफलता के बिंदु पर ले जाने के बाद भी महिलाओं का अपनी विभिन्न शारीरिक क्रियाओं, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं रहा है. यही कारण है कि जहाँ एक तरफ महिलाओं सम्बन्धी गर्भ-निरोधक साधनों की, गर्भ रोकने के उपायों की बाज़ार में भरमार हुई है वहीं दूसरी तरह गर्भपातों की, बिन-व्याही माताओं की, कूड़े के ढेर पर मिलते नवजातों की संख्या में भी अतिशय वृद्धि देखने को मिली है. ये समूची स्थितियाँ महिलाओं को अत्यधिक प्रभावित करती हैं. यदि लिव-इन-रिलेशन जैसे सम्बन्ध आपसी सामंजस्य से विवाह संस्था से बचने के लिए हैं; सामाजिकता का अनुपालन करते हुए वैवाहिक कर्मकांडों से बचने के लिए है; शारीरिक संबंधों की निर्बाध स्वीकार्यता के लिए है; अल्पकालिक दैहिक सुख के लिए है तो सहजता से कहा जा सकता है कि ऐसे सम्बन्ध असामाजिकता को ही बढ़ायेंगे. इस असामाजिकता को ध्यान में रखकर समझा जा सकता है कि भले ही ऐसे सम्बन्ध दो अविवाहितों के बीच बनें, दो विवाहितों के बीच बनें या फिर एक अविवाहित-एक विवाहित के बीच बनें वे सिर्फ और सिर्फ अनैतिकता को ही बढ़ावा देंगे. लिव-इन-रिलेशन को सामाजिक-कानूनी मान्यता-स्वीकार्यता देने के पूर्व खुले मंच से इस पर बहस हो, खुले दिल-दिमाग से इसके समस्त पहलुओं पर चर्चा हो, सकारात्मक दृष्टि से इसके नैतिक-अनैतिक रूप का आकलन हो.

11 अक्टूबर 2013

हाय सचिन, तुम बड़ी जल्दी चले गए, हमें छोड़ के




हाय सचिन! (हाय-हाय नहीं कहा है...)
हाँ तो, हाय सचिन! तुम इतनी जल्दी चले गए, हमें छोड़ के...(छोड़ने का गलत अर्थ न लगिएगा..). अभी कुछ दिन तो और रुकना था...हमारे लिए न सही तो अपने रिकॉर्ड के लिए ही रुक लेते (हमारे लिए तो वैसे तुम अब मैदान में रुक ही नहीं पा रहे थे) अभी तो टीम-प्रबंधन तुमको कई-कई वर्षों तक ढोने के मूड में दिख रहा था. बाहर वालों का क्या है, वे तो बकबकाते ही रहते हैं...बकबकाते रहेंगे...पर तुमको भगवान के चोले में लिपटे रहकर अभी कुछ और रिकॉर्ड के लिए रुकना था. ‘रिकॉर्ड पर मेरी नज़र नहीं रहती’ का रिकॉर्ड बार-बार बजा कर तुम अपने को महान साबित करने में लगे रहे और उम्र को बल्ले पर हावी करते रहे. यदि रिकॉर्ड पर तुम्हारी नज़र नहीं रही होती तो अपनी असल महानता के समय संन्यास की चर्चा की होती. इसके लिए भी तुम दो सौ टेस्ट की आंकड़ेबाजी में न फंसे होते. तुमको शायद लिटिल मास्टर याद होंगे, जिनके संन्यास की घोषणा पर समूचे क्रिकेट-प्रेमियों ने समवेत स्वर में उनसे वापसी की गुहार लगाई थी. याद आया....पर तुम्हारे संन्यास से बहुतों ने राहत की सांस ली होगी, कि चलो अब किसी नए को मौका मिलेगा. बार-बार तुम्हारा ही शून्य देखने को नहीं मिलेगा.
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ओ सचिन! तुम्हारे इस तन्हा-शांत-शांत से संन्यासी माहौल को देख कपिल देव का संन्यास याद आ गया. वे भी रिकॉर्ड आंकड़ेबाजी के लिए एक-एक विकेट को हाँफते-जूझते रहे और श्रीनाथ बाहर बैठे-बैठे अपनी गेंद को अपनी पेंट पर रगड़ने के साथ-साथ अपनी एडियाँ भी रगड़ते रहे. इसमें कोई शक नहीं कि तुमने हपक के अपना बल्ला चमकाया...क्रिकेट को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया...अनछुए रिकॉर्ड को छूने लायक बनाया....पर समय के साथ गेंद की चमक की तरह तुम्हारी बल्लेबाज़ी की चमक-धार चली गई थी. यदा-कदा तो भीगे कारतूस भी फट पड़ते हैं...तुम भी कुछ वैसी ही हरकतें करने लगे थे. कभी एकाएक फट पड़ते और भगवान की कुर्सी से गिरते-गिरते फिर उस पर चिपक लेते. वैसे इसमें तुम्हारा भी कोई कसूर नहीं था, ये तो विज्ञापन सम्बन्धी क्रिकेट-व्यावसायिकता कही जाएगी जो तुम्हारे गीलेपन को धूप बनकर सुखाने में लगी थी.  इसी क्रिकेट-व्यावसायिकता के चलते तुम अपने पिता की मृत्यु पर भी नहीं थमे और ये भोले-नादान-पागल क्रिकेट-प्रेमी, तुम्हारे भक्त समझते हैं कि तुम क्रिकेट के प्रति अपना समर्पण दिखाने को अपना कष्ट भुलाकर चले गए थे. वाह रे समर्पण! वाह री दीवानगी! अनुबंधों पर टिकी व्यावसायिकता की दुनिया में सम्बन्ध-कष्ट-रिश्ते-सुख कैसे हवा हो जाते हैं, ये बात ये नादान क्या जानें.
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वाह रे सचिन! तुम तो खेलते रहे, विज्ञापन करते रहे, रिकॉर्ड बनाते रहे, नोट छापते रहे और...और...और......बस. तुमने देश से सम्मान लिया, भगवान का दर्जा लिया, लाखों-करोड़ों प्रशंसक लिए, तालियों-जय-जयकारों का शोर लिया पर तुमने वापसी में क्या दिया? (चोरी-छिपे क्या किया ये तुम्हारी धरोहर है...देश की सम्पदा क्या है). तुमको महान बताया गया कि तुमने शराब के, नशीले उत्पादों के विज्ञापन नहीं किये...पर तुम्हीं वो व्यक्ति थे जिसने अपनी कार के लिए शुल्क में छूट देने की बात कही थी; वायु सेना की मानद पदवी (कैप्टन रैंक) का तुम सम्मान भी नहीं कर सके; अपने चौके-छक्के पर, एक-दो रनों पर चीखते युवाओं को देश-सेवा के लिए प्रेरित न कर सके; भ्रष्टाचार की लड़ाई में सामने न आ सके; महिलाओं-बच्चियों के साथ होते बलात्कार के विरोध में न खड़े हो सके और तो और जाते-जाते, जाने की तैयारी करते-करते आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे दल के गले लटक राज्यसभा पहुँच गए. अपनी महानता की चकाचौंध में तुम पद-लोलुपता में कैसे घिर गए...क्या यहाँ भी कोई आँकड़ा तुमको दिख रहा था; क्या यहाँ भी कोई रिकॉर्ड तुमको बनाना था?
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प्रिय सचिन! हो सकता है कि तुम्हारी हर सफलता-असफलता पर चापलूसी की हद तक उतरने वाले तुम्हारे प्रशंसकों को, मीडिया को, कमेंट्री करने वालों को अवश्य ही कुछ दिन सूना-सूना लगेगा पर तुम उदास न हो ये सब भी बहुत ही जल्द किसी और को सामने स्थापित कर लेंगे; तुम्हारे भक्त किसी दूसरे में अपना भगवान तलाश लेंगे. इस समाज को रिक्त स्थान की पूर्ति करना बहुत अच्छे से आता है और बहुत जल्दी आता है. अरे, तुम तो महज एक खेल से, खेल के मैदान से जुड़े थे, जहाँ किसी के आने या चले जाने का देश-सञ्चालन पर प्रभाव नहीं पड़ता. यहाँ तो देश ने अपने सच्चे-असली नेताओं को खोने के बाद भी खुद को जीवित बनाये रखा; अपने श्रेष्ठ राजनीतिज्ञों के अलविदा कह देने के बाद भी अपनी राजनैतिक-गतिविधियों पर विराम नहीं लगने दिया; विदेशी हमलों के बाद भी खुद को बिखरने नहीं दिया; पड़ोसी देशों की कुत्सित हरकतों के बाद भी खुद को पंगु नहीं होने दिया वो एक तुम्हारे संन्यास से रुकने वाला नहीं है. इसलिए तुम क्रिकेट के सूनेपन को लेकर उदास न होना. तुम्हारी कमाई के लिए विज्ञापन अभी भी तुम्हारे पास हैं...तुम्हारे अनुबंधों पर संन्यास का कोई असर नहीं पड़ेगा, ऐसा समाचारों में आया है. बाकी संसद-सदस्यता तुम्हारे पास है, हाथ का पंजा तुम्हारे साथ है. वैसे हमने कभी तुमको नमस्कार सचिन भी नहीं कहा इसलिए ये कहने का अधिकार नहीं बनता है, फिर भी...जी ललचाये....बिना कहे रहा न जाए...इसलिए कहे देते हैं..... अलविदा सचिन.

24 सितंबर 2013

हिंगलिश से क्षतिग्रस्त होती हिन्दी भाषा




संप्रेषणीयता की सहजता के लिए भाषा का विकास किया गया और फिर नए-नए शब्दों की, उनके अर्थों की लगातार खोज की जाने लगी. इन्सान विचार-सम्प्रेषण के लिए जैसे-जैसे भाषा पर, शब्द पर अधिक से अधिक निर्भर होता रहा वैसे-वैसे वो शब्द-भंडार को भी समृद्ध करता रहा. शब्दों को गढ़ने के साथ-साथ वह अन्य भाषाओं के शब्दों को भी आत्मसात करता रहा. गौरवशाली संस्कृत से उत्पन्न शब्दों के कारण हिन्दी शब्द-भण्डार दूसरी भाषाओं के शब्द-भण्डार से कहीं अधिक समृद्ध रहा है. आम बातचीत पर यदि ध्यान दिया जाये तो उसमें हिन्दी के साथ अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी आदि शब्दों का मिश्रण दिखता है जो वार्तालाप को प्रवाहमान बनाता है. इन भाषाओं के साथ-साथ दूसरी भाषाओं के शब्द भी हिन्दी के साथ इतनी आसानी से घुले-मिले हैं कि उनमें विभेद कर पाना आसान नहीं होता है. अंग्रेजी का भी कुछ ऐसा ही हाल है, उदाहरण के रूप में प्लेट, बोतल, ट्रेन, प्लेटफ़ॉर्म आदि को लिया जा सकता है. हिन्दी शब्दों की अनुपलब्धता के कारण इन शब्दों का प्रयोग हुआ होगा किन्तु अंग्रेजी ने कहीं अधिक आगे आकर हिन्दी पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया.
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शब्दों का सम्मिलन सुखद होता है क्योंकि इससे सम्बंधित भाषा का शब्द-भंडार विस्तृत-व्यापक होता है. अंग्रेजी-शब्दों कोई संकट हिन्दी को से तब तक नहीं लगा जब तक कि उसने शब्द-भंडार बढ़ाने का कार्य किया. समस्या उस समय उत्पन्न हुई जब अंग्रेजी-शब्दों ने लोगों की बातचीत के साथ-साथ लोगों के दिमाग पर अधिकार करना शुरू किया. रोजमर्रा की बातचीत में लोगों ने हिन्दी-शब्दों को किनारे कर अंग्रेजी-शब्दों को स्वीकार करना शुरू किया. अंग्रेजी अतिक्रमण का आलम ये हुआ कि अब घर में चाचा-चाची की जगह पर अंकल-आंटी खड़े दिखते हैं; मम्मी-पापा ने अम्मा-पिताजी को परिवार से बाहर कर दिया है; बच्चों को चावल, रोटी, दूध, पानी की नहीं बल्कि राईस, ब्रेड, मिल्क, वाटर की चाह होती है; वे सेब, आम नहीं बल्कि एप्पल और मैंगो खाते हैं; गाय, बकरी से वे परिचित नहीं होते बल्कि काऊ, गोट ही उन्हें समझ आती है. ऐसे अंग्रेजी शब्दों का जबरन घालमेल हिन्दी शब्द-भंडार को नष्ट ही कर रहा है.
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अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी शब्दों के साथ होता ये जबरिया अतिक्रमण बातचीत में भी साफ़ तौर से दिखाई पड़ता है. यहाँ हमें याद रखना होगा कि किसी शब्द विशेष के न होने की स्थिति में उसका स्थानापन्न दूसरी भाषा से लिया जा सकता है किन्तु जब उचित शब्द उपस्थित हो तो अंग्रेजी का जबरन प्रयोग हिंग्लिश बना उसको विद्रूपता तक ले जाता है. दरअसल हम हिन्दीभाषी अपने आपको बुद्धिजीवी दर्शाने के लिए जबरन अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं. हिन्दी के इक्का-दुक्का शब्दों की अनुपलब्धता होने पर उनके स्थान पर अंग्रेजी प्रयोग को स्वीकार किया जा सकता है किन्तु उसकी हर एक दो शब्दों के बीच उपस्थिति भाषा को विकृत करती है. यदि इसे नियंत्रित न किया गया तो निश्चित ही ये अवस्था किसी दिन हिन्दी शब्द-भण्डार को संकटग्रस्त स्थिति में पहुँचा देगी.