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25 जुलाई 2026

बात को समझो

आरक्षण विरोधी नेताओ, तुमको एक रास्ता दिखा दिया गया है इस उत्पाती आन्दोलन के द्वारा निकले इस्तीफे से. सरकार ने एक इशारा कर दिया है कि उत्पात के द्वारा भी समाधान हो सकता है. यदि एक इस्तीफ़ा हो सकता है तो आरक्षण भी हट सकता है. यदि नीट पेपर लीक के कारण जान गँवाने वाले बच्चों को इस्तीफ़े का आधार बनाया जा सकता है तो बहुत से प्रतिभाशाली बच्चों ने आरक्षण के कारण जान गँवाई है, इसे भी आरक्षण समाप्ति का आधार बनाया जा सकता है.

 

जंतर-मंतर के हंगामे से, इस इस्तीफे से न तो पेपर लीक की घटनाएँ रुकनी हैं, न शिक्षा व्यवस्था में कोई बहुत बड़ा सुधार होने वाला है. हाँ आरक्षण को लेकर एक और आन्दोलन शुरू करने का अवसर मिल गया.

विचार करो अब पूरे घटनाक्रम पर, पिछले कुछ बयानों पर तब दिखाई पड़ेगा कि जहाँ तुम लोगों का सोचना बंद होता है, उससे कहीं आगे जाकर अगले का सोचना शुरू होता है.

 

समझे…???

 


03 मई 2025

जातिगत जनगणना का राजनैतिक खेल

केन्द्र सरकार ने जातिगत जनगणना की स्वीकृति देकर समूचे देश में राजनैतिक हलचल पैदा कर दी है. जातिगत जनगणना की स्वीकृति मिलते ही विपक्षी दलों ने इसे अपनी जीत घोषित कर दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि विपक्षी दल लम्बे समय से इसकी माँग करते रहे हैं. ऐसे समय में जबकि सभी राजनैतिक दलों के साथ-साथ समूचे देश का ध्यान पहलगाम आतंकी हमले की तरफ था, केन्द्र सरकार का जातिगत जनगणना करवाने का निर्णय न केवल चौंकाने वाला है बल्कि अप्रत्याशित भी है. राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि केन्द्र सरकार के इस निर्णय के पीछे बिहार का आगामी विधानसभा चुनाव है. यह एक तरह से सही भी हो सकता है क्योंकि बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव द्वारा जातिगत जनगणना को आधार बनाकर भाजपा के विरुद्ध, नीतीश कुमार के विरुद्ध माहौल बनाया जाना निश्चित था.

 

जातिगत जनगणना देश के लिए अथवा देश के इतिहास की अनोखी घटना नहीं है. अंग्रेजी शासन में 1881 से लेकर 1931 तक जातिगत जनगणना होती रही थी. यदि जातिगत जनगणना की समयावधि को देखें तो लगभग सौ वर्षों के बाद यह पुनः होने जा रही है. यद्यपि स्वतंत्रता के पूर्व 1941 में भी जातिगत जनगणना करवाई गई थी तथापि उसके आँकड़ों को प्रकाशित नहीं करवाया गया था. देश की आज़ादी के बाद भी एक तरह से जातिगत जनगणना होती आई है किन्तु उसे सम्पूर्ण न कहकर आंशिक कहा जा सकता है क्योंकि उसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों की ही गणना होती रही है. यह गणना 1951 से लेकर 2011 तक होती रही है. 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण करवाकर जातिगत आँकड़ों की पहचान करने का प्रयास किया गया था किन्तु इस सर्वेक्षण के जातिगत आँकड़े प्रकाशित नहीं हो सके थे. विपक्षी दलों द्वारा केन्द्र सरकार पर जातिगत जनगणना करवाए जाने का दबाव लगातार बनाया जाता रहता था किन्तु कांग्रेस द्वारा हमेशा इसका विरोध किया गया. ऐसे में राहुल गांधी का जातिगत गणना के लिए सर्वाधिक सक्रिय रहना, इस माँग के मामले में अन्य विपक्षी दलों को पीछे छोड़ देना हैरान करने वाला है.

 



इस तरह की स्थितियाँ देखने के बाद ऐसा समझ आ रहा है कि विपक्षी दल हों या फिर केन्द्र सरकार, सभी के लिए जातिगत जनगणना एक राजनैतिक खेल है. इसके द्वारा समाज के या कहें मतदाताओं के बहुत बड़े वर्ग को साधने का प्रयास किया जा रहा है. पिछले कुछ सालों में भाजपा द्वारा जिस तरह से ओबीसी में अपना जनाधार मजबूत किया है, वह उन तमाम दलों के लिए परेशानी और चिंता का कारण बना हुआ है जिनके लिए ओबीसी वोट-बैंक रहा है. इसी तरह कांग्रेस, जिसने ओबीसी आरक्षण का हमेशा ही विरोध किया है, के द्वारा ओबीसी को जातिगत जनगणना के, आरक्षण के लाभ समझाना राजनैतिक खेल ही है. यह सही है कि सामाजिक कल्याण के लिए समाज की मुख्यधारा में सभी जातियों, उपजातियों का शामिल होना आवश्यक है. यह भी सही है कि एकमात्र आरक्षण के रास्ते से चलकर समाज का अथवा सभी जातियों-उपजातियों का भला नहीं हो सकता. समाजोत्थान के लिए आवश्यक है कि आरक्षण की नीतियों के साथ-साथ समाज कल्याण की अन्य योजनाओं को भी सबके बीच पहुँचाया जाये.

 

ऐसे में जबकि जातिगत जनगणना की स्वीकृति मिल चुकी है तब सवाल उठता है कि आरक्षण की सीमा लगातार बढ़ती रही है किन्तु इसका लाभ सभी को प्राप्त नहीं हो सका है तो क्या जातिगत जनगणना का लाभ वास्तविक रूप में मिल सकेगा? विभिन्न सरकारों द्वारा नियमित रूप से ऐसे प्रयास किये जाते रहे हैं कि आरक्षण का लाभ यथोचित वर्ग तक, उपयुक्त व्यक्तियों तक पहुँचे. बावजूद इसके अभी भी पिछड़ों-वंचितों-शोषितों की संख्या पर्याप्त रूप में देखने को मिलती है. अभी भी बहुत बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जिनके द्वार तक आरक्षण नहीं पहुँच सका है. ऐसे में यह कहना उचित प्रतीत नहीं होता है कि बिना जातिगत जनगणना के समाज के वंचित वर्ग तक, ओबीसी तक, एससी-एसटी तक आरक्षण सहित अन्य योजनाओं का लाभ नहीं पहुँचेगा. क्या जातिगत जनगणना के बाद प्राप्त आँकड़ों के आधार पर देश के संसाधनों का बँटवारा कर देना ही सामाजिक समस्याओं का समाधान है? क्या देश में अनेकानेक नीतियाँ, परियोजनाएँ जातिगत आँकड़ों के आधार पर बनाई जाएँगी? जातिगत जनगणना की स्वीकृति मिलने के साथ ही इस पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है कि क्या ऐसी गणना सिर्फ हिन्दुओं के सन्दर्भ में ही होगी अथवा इसके दायरे में मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध आदि सहित अनेक समुदायों को भी लाया जायेगा?

 

देखा जाये तो अभी जातिगत जनगणना की स्वीकृति केन्द्र सरकार द्वारा दी गई है किन्तु इसके आँकड़े आने के बाद उसके क्रियान्वयन पर, उसके व्यावहारिक पक्ष की तरफ ध्यान दिया जाना आवश्यक होगा. इस जनगणना के लाभ-हानि के सम्बन्ध में भी उसी समय उचित रूप में ज्ञात हो सकेगा. एक ऐसे राजनैतिक वातावरण वाले देश में जहाँ सामाजिक कल्याण, सामाजिक न्याय की बात भी जातियों को केन्द्र में रखते हुए की जाती है; जहाँ एक-एक व्यक्ति खुद को जाति विशेष का प्रतिनिधि साबित करते हुए संसद तक पहुँच जाता है; जहाँ जातिगत आधार किसी भी राजनैतिक दल के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता है; जहाँ चुनावों में क्षेत्र, विकास, नीति आदि प्रमुख न होकर जाति ही सर्वोपरि हो जाती है वहाँ जातिगत जनगणना सम्बन्धी राजनीति वैमनष्यता को बढ़ावा देने वाली हो सकती है. इस तरह की राजनीति जिसमें कि देश के, समाज के विकास से अधिक महत्त्वपूर्ण जातीय विभाजन हो, राजनैतिक दलों के जनाधार को कमजोर करना हो उससे सामाजिक एकजुटता ही कमजोर होगी.


04 अगस्त 2024

बांग्लादेश की हिंसा से भारतीय नागरिकों को सतर्क रहने की आवश्यकता

एक अपील या एक निवेदन सभी से.

 

सोशल मीडिया पर आप सब जितना समय देते हैं, बिलकुल दें, उसे कम न करें मगर अब अपने आसपास भी ध्यान देने की आवश्यकता है. बांग्लादेश के घटनाक्रम के बाद और भी सजग होने की आवश्यकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि वहाँ के हालात के केन्द्र में आरक्षण या कहें कि कोटा सिस्टम है. एक ऐसा कोटा सिस्टम जो कतिपय राजनैतिक सोच के चलते, राष्ट्रवादी सोच को स्थापित करने की दृष्टि से उन परिवारों को प्रदान किया जा रहा था जो बांग्लादेश मुक्ति वाहिनीं से सम्बंधित थे.

 

वहाँ जिस कोटा सिस्टम के विरुद्ध हिंसात्मक कार्यवाही की गई, यदि एक नजरिये से देखें तो वह कोटा वहाँ की राष्ट्रवादी सोच से सम्बंधित है, उस मुक्ति वाहिनी के परिजनों के लिए है जिन्होंने बांग्लादेश निर्माण में अपना साथ दिया. स्पष्ट है कि वे लोग ही उस कोटा के खिलाफ होंगे जो बांग्लादेश राष्ट्रवाद सोच के विरुद्ध होंगे. निश्चित ही इसके पीछे पाकिस्तानी समर्थकों का बहुत बड़ा हाथ होगा क्योंकि बांग्लादेश बनने का सबसे बड़ा कष्ट तो उसी को है. इस पूरे आन्दोलन को छात्र आन्दोलन का नाम लेकर न केवल उकसाया गया बल्कि उसे आक्रामक, हिंसात्मक रूप भी प्रदान किया गया. इसके पीछे स्पष्ट रूप से वे ताकतें दिखाई दे रही हैं जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भारत-विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहती हैं.

 



आपके इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर व्यस्त बने रहने के साथ-साथ सजग, सतर्क रहने की आवश्यकता इस कारण से है क्योंकि बांग्लादेश की तरह की भूमिका अपने देश में भी बनती नजर आ रही है. राष्ट्रवादी सोच का लगातार विरोध किया जा रहा है. पाकिस्तान, फिलिस्तीन के पक्ष में खुलेआम नारेबाजी करने वाले इसी देश में हैं. पाकिस्तान समर्थक यहाँ अपना काम स्लीपर सेल के रूप में पिछले कई वर्षों से करते आ रहे हैं, ऐसी खबरें हम सभी आये दिन पढ़ते-सुनते हैं. अब बस आप सब सजग रहिये. अपने आसपास के ऐसे तत्त्वों को पहचानिए.


04 सितंबर 2018

नोटा की उतावली से पहले


केंद्र सरकार के एक विधेयक पारित करते ही सवर्णों में मानो भूचाल आ गया. बहुतायत में सवर्ण एकजुट होकर केंद्र सरकार को सबक सिखाने के लिए जुट गए. अपनी ताकत को वे किसी प्रत्याशी के पक्ष में लाकर नहीं वरन नोटा बटन दबाकर दिखाना चाह रहे हैं. वे सवर्ण प्रत्याशियों को भी हराने के पक्ष में नहीं हैं जबकि यहाँ ध्यान रखना होगा कि संसद में किसी सवर्ण ने इस एक्ट का विरोध नहीं किया था. इसके बाद भी सवर्णों की नाराजगी सिर्फ भाजपा से ही है. यही वह बिंदु है जहाँ कि भाजपा विरोधी अपनी चाल में सफल हो गए दिखते हैं.


इसी बिंदु पर आकर नोटा प्रेमियों को आज से लगभग तीन दशक पहले जाना होगा जबकि पूरे देश में आरक्षण विरोधी प्रदर्शन, आन्दोलन चल रहा था. उन्हें अपने नोटा आंदोलन को धरती पर उतारने के पहले 1990-91 में चले आरक्षण विरोधी देशव्यापी आंदोलन को शिद्दत से याद कर लेना चाहिए क्योंकि तब का युवा आज से ज़्यादा आक्रोशित था. उस समय का आन्दोलन आज के आन्दोलन से ज़्यादा ज़मीनी आंदोलन था. उस समय के देशव्यापी आन्दोलन में किसी तरह का सोशल मीडिया सहयोग नहीं हुआ करता था. इसके बाद भी आन्दोलन पूर देश में हुआ. अनेक होनहार युवाओं ने आत्मदाह किया. अनेक युवाओं ने लाठियाँ खाईं और बहुतों को जेल भी भेजा गया मगर सरकार अपने कदम को पीछे लेने को तैयार न हुई. आरक्षण सरकारी मर्जी के हिसाब से लागू हुआ. उसके बाद हुए आम चुनाव में सरकार गिर गई फिर क्या हुआ उससे? आगे किसी और सरकार पर खतरा न हो, इस डर से आगे आने वाली सरकारों ने आरक्षण हटाया? नहीं न. ऐसे में वर्तमान में नोटा समर्थकों की यह कपोल कल्पना ही है कि उनके नोटा से आगे आने वाली सरकारें सवर्णों की ताकत को महसूस करेंगी. यदि किसी तरह से नोटा समर्थकों ने वर्तमान भाजपा सरकार को गिरा दिया तो क्या जो सरकार आएगी वो एक्ट हटा देगी?

देखा जाये तो सरकारों को इस तरह के आन्दोलनों से किसी तरह का फर्क नहीं पड़ता है. ये सोचना अपने आपमें भूल ही है कि नोटा की ताकत के बाद सवर्णों की पूछ राजनैतिक हलकों में बढ़ जाएगी. उनको सोचना होगा कि कांग्रेस अपनी हरकतों से 44 सीट पर आ गई तो उनके नेताओं के कौन से काम रुक गए? उनका कौन सा नुक़सान हो गया? ऐसा ही भाजपा के साथ होगा, यदि वह हारती है. एक बात और आरक्षण विरोधी आन्दोलनकारियों का उस समय एकमात्र विरोध था तो सरकार से. यहाँ आज की स्थिति ये है कि नोटा समर्थकों को एक तरफ सरकार से लड़ना है साथ ही उनसे भी लड़ना है जिनके लिए ये एक्ट लाया गया है. क्या लगता है कि जब सवर्ण एकजुट होकर नोटा के द्वारा सरकार को हराने की, एक्ट में संशोधन की माँग बुलंद करेगी तो दलित समर्थक शांति से बैठे रहेंगे? वे जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद शांति से नहीं बैठे तो यहाँ कैसे बैठ जायेंगे. ऐसे में वर्तमान आन्दोलनकारियों को दोतरफा लड़ाई लड़नी होगी और दोनों ही जगह बेमकसद युद्ध है. उनको ध्यान रखना चाहिए कि एक अकेले सरकार से लड़कर पूरे देश में आंदोलन करके आरक्षण कम या समाप्त तो हुआ नहीं. अब तो दो या दो से अधिक लोगों से लड़ना है, ऐसे में सकारात्मक परिणाम की आशा कहाँ से मिले? यदि वाकई नोटा समर्थक केंद्र सरकार से नाराज हैं और उसे सबक सिखाना चाहते हैं तो एकजुट होकर सभी जगह अपना उम्मीदवार उतारें. उसको जिताने की कोशिश करें. न भी जिता सकें तब भी उसके वोटों को भविष्य की रूपरेखा बनाने के काम में ला सकते हैं. केंद्र सरकार के वर्तमान विधेयक को भावी राजनैतिक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए. (इस बारे में जल्द ही)

03 अगस्त 2018

सवर्ण राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं

उच्चतम न्यायालय द्वारा एससी-एसटी एक्ट के सम्बन्ध में दिए गए निर्णय के खिलाफ जाते हुए सरकार संशोधन विधेयक वर्तमान सत्र में ला रही है. इसकी तैयारी के बीच पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा दे दिया गया है. दलितों-पिछड़ों के लिए उठाये जाते इन कदमों के बीच आरक्षण सम्बन्धी तमाम सारे और भी कदम इस दौरान उठाये जाते रहे हैं. शिक्षा, नौकरी के साथ-साथ पदोन्नति में भी आरक्षण यथावत रखा गया है. केंद्र सरकार के दलितों-पिछड़ों को लेकर किये जा रहे तमाम सारे कार्यों में से शायद ही किसी का इतना विरोध हुआ जो जितना कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर हो रहा है. यह स्थिति तब है जबकि इस एक्ट में कोई आमूल-चूल परिवर्तन करने के बजाय उच्चतम न्यायालय द्वारा महज इतनी व्यवस्था की गई थी कि आरोपी सवर्ण की गिरफ़्तारी बिना जाँच के नहीं होगी. इस आदेश को मोदी सरकार की मंशा बताते हुए विपक्षियों ने उपद्रवी माहौल बना डाला. इसका नकारात्मक असर यह हुआ कि केंद्र सरकार संशोधन बिल लाने को तैयार हो गई.


न्यायालय के आदेश के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार का इस तरह से संशोधन विधेयक लाने के मूल में विशुद्ध राजनीति है. यह कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं है वरन केंद्र सरकार के कदमों से बराबर सिद्ध होता रहा है कि वह किसी भी रूप में सवर्णों को मददकारी हो या न हो मगर दलितों-पिछड़ों के लिए मददगार अवश्य रहेगी. देश के सवर्णों को सरकार के इस कदम से आपत्ति या निराशा जैसा कुछ नहीं लगना चाहिए क्योंकि सिर्फ यही सरकार नहीं वरन देश की सभी सरकारों का एकमात्र उद्देश्य ऐसे कदमों से दलितों-पिछड़ों का वोट प्राप्त करना है. यदि गंभीरता से देखा जाये तो दलित-पिछड़े किसी भी राजनैतिक दल के लिए आज मुख्यधारा के लोग हैं. सवर्ण अपने आपको किसी भी रूप में मुख्यधारा में न माने, राजनीति के लिए खुद को अहम् न माने. आज न सरकारों को और न ही विपक्ष को सवर्णों की, उनके वोट की आवश्यकता है. यदि सामाजिक प्रस्थिति के रूप में इस बिंदु पर निगाह डाली जाये तो नब्बे के दशक से राजनीति की मुख्यधारा से सवर्णों का पतन किया जाना आरम्भ हो गया था. हिन्दू धर्म की छुआछूत की भावना को, विभेद की भावना को समस्त राजनैतिक दलों द्वारा बुरी तरह से अपने पक्ष में दोहन किया गया. यही कारण है कि जाति का विरोध करने वाले इन राजनैतिक दलों द्वारा जाति-विहीन समाज की बात भले ही की जाती हो मगर समाज से जाति दूर करने की बात नहीं की जाती है. इसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि राजनीति में जातिगत आधार पर न केवल राजनैतिक दलों का गठन हुआ वरन वे सत्ता में भी काबिज होने लगे.

यहाँ आकर सवर्णों को समझना होगा कि वे अब राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं हैं. अर्थशास्त्र का माँग और आपूर्ति का नियम सिर्फ अर्थशास्त्र में ही लागू नहीं होता बल्कि समाज के प्रत्येक हिस्से में लागू होता है. आज देश की राजनीति की माँग दलित हैं, पिछड़े हैं तो सत्ता पक्ष द्वारा, विपक्ष द्वारा, राजनैतिक दलों द्वारा उनकी माँग को स्वीकार किया जा रहा है. सवर्णों को यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि वे किसी भी रूप में प्रभावकारी मतदाता हैं. कायदे से देखा जाये तो सवर्ण आज भी निपट कबीलों में बंटा हुआ है. अतीत की छोटी-छोटी रियासतों की तरह वह आज भी छोटे-छोटे से वर्गों में विभक्त है. यही कारण है कि उसके पक्ष में एक आदेश के साथ किसी भी राजनैतिक दल के सवर्ण जनप्रतिनिधि भी आकर नहीं खड़े हुए. देश में वर्तमान में हो रही राजनीति की चाल को समझने की आवश्यकता है. यहाँ सभी राजनैतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य सत्ता की प्राप्ति होता है, वह कैसे हो यह उसका विचार-बिंदु होता है. उन्हें न सवर्णों के हितार्थ कोई कदम उठाना है और न ही दलितों-पिछड़ों के हितार्थ. सत्ता की खातिर उन्हें कब कौन सा कदम उठाना पड़ सकता है, ये उन्हें खुद नहीं मालूम होता है.  

02 अप्रैल 2018

राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के लिए विरोध


देश के बहुत सारे दलित संगठनों ने एससी/एसटी एक्ट पर उच्चतम न्यायालय के फैसले के विरोध में भारत बंद का ऐलान किया था. भारत बंद को कांग्रेस, बसपा सहित कई राजनीतिक पार्टियों का समर्थन भी मिला. इस आन्दोलन में लगे संगठनों और राजनैतिक दलों की मांग थी कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में उच्चतम न्यायालय द्वारा किये संशोधन को वापस लिया जाये और एक्ट को पहले की तरह लागू किया जाए. उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कुछ दिन पहले कहा था कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति की गिरफ़्तारी न की जाये बल्कि उसे जमानत दी जाये. आदेश में कहा गया है कि ऐसे किसी मामले में न केवल गिरफ़्तारी को रोका गया है बल्कि एफआईआर लिखने को भी प्रतिबंधित किया गया है. एफआईआर दर्ज करने के पहले डीएसपी द्वारा ऐसे मामले की जाँच की जाएगी. ऐसे मामलों में किसी अधिकारी की गिरफ़्तारी के पहले उसके उच्चाधिकारियों से अनुमति लेनी होगी और किसी सामान्य व्यक्ति के सन्दर्भ में एसएसपी से ऐसी अनुमति चाहिए होगी. इस आदेश के आने के बाद से तमाम दलित संगठनों के अलावा कई राजनैतिक दलों ने इस निर्णय को सरकारी मंशा से ओतप्रोत बताया. उनके द्वारा आरोप लगाया गया कि सरकार द्वारा संविधान से छेड़छाड़ की जा रही है और दलितों के हितों से खिलवाड़ किया जा रहा है. यहाँ समझना होगा कि आखिर उच्चतम न्यायालय का आदेश सरकार का आदेश कैसे हुआ? दूसरी बात कि न्यायालय ने इस अधिनियम को समाप्त तो किया नहीं है वरन ऐसे व्यक्तियों के हितों का संरक्षण किया है जो दुर्भावना के तहत इस अधिनियम में फँसा दिए जाते हैं.


दरअसल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 11 सितम्बर 1989 को संसद में पारित किया गया, जो जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है जो एससी/एसटी वर्ग से सम्बंधित नहीं है और इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है. इस अधिनियम में 5 अध्याय एवं 23 धाराएं हैं. यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है. इस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए लिए विशेष अदालतों की भी व्यवस्था है. उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश वर्ष 2009 को महाराष्ट्र के गवर्नमेंट फार्मेसी कॉलेज में एक दलित कर्मचारी की तरफ से फर्स्ट क्लास के दो अधिकारियों के खिलाफ कानूनी धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कराने के बाद उत्पन्न हुआ. इंस्टिट्यूट के प्रभारी डॉ० सुभाष महाजन द्वारा लिखित में कोई निर्देश नहीं देने के बाद दलित कर्मचारी ने सुभाष महाजन की शिकायत कर एफआईआर दर्ज कराई. सुभाष महाजन ने उच्च न्यायालय से अपनी एफआईआर रद्द करने की मांग की किन्तु उच्च न्यायालय ने इस माँग को ठुकरा दिया. बाद में सुभाष महाजन ने उच्चतम न्यायालय में अपील की. जहां उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को हटाने का आदेश दिया गया. इस मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि ST/SC एक्ट के तहत गिरफ्तारी न की जाए बल्कि अग्रिम जमानत की मंदूरी दी जाए.


किसी निर्णय का विरोध करना लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है. ऐसा करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है किन्तु भारत बंद के दौरान जिस तरह से हिंसात्मक तरीके अपनाये गए वह न केवल आपत्तिजनक है बल्कि निंदनीय है. इस बंद के दौरान किये गए उत्पात में न केवल सार्वजनिक, निजी संपत्ति को नुकसान हुआ वरन कई जगह से लोगों के मारे जाने की खबर भी आई है. यहाँ ऐसे संगठनों को सोचना होगा कि वे आखिर चाह क्या रहे हैं? वे खुद भी बहुत अच्छे से समझते हैं कि उनके द्वारा इस कानून का किस तरह दुरुपयोग किया जा रहा है. पूरे देश में दर्ज ऐसे मामलों में 85 प्रतिशत मामले फर्जी पाए जाते हैं. संविधान द्वारा संशोधन करके दलितों के हितों का संरक्षण करने के लिए, उनके साथ भेदभाव को समाप्त करने के लिए बनाया गया अधिनियम एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है. आये दिन दलितों द्वारा इस अधिनियम के अंतर्गत फँसा देने की धमकी दिए जाने की खबरें सामने आती रहती हैं. ऐसे में यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा कोई आदेश आया था तो उसके लिए लोकतान्त्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज करवाया जा सकता था. ऐसा न करते हुए तमाम सारे दलित संगठनों और राजनैतिक दलों ने इस निर्णय को अपनी राजनीति चमकाने का अवसर माना. उनके द्वारा न्यायालय के इस निर्णय की आड़ में मोदी का, भाजपा का विरोध किया जाना था और उसका परिणाम जान-माल के नुकसान के द्वारा सामने आया.

आज जिस तरह से सवर्णों के देवी-देवताओं के साथ अभद्रता की जा रही है, उनके धार्मिक स्थलों, मानकों के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किया जा रहा है, उनको इस अधिनियम के द्वारा जबरन फंसाया जा रहा है उससे साफ़ है कि ये दलित संगठन और इनके नेता किसी भी रूप में आपसी सद्भाव नहीं चाहते हैं. आज दलित वर्ग कानूनी प्रावधान की आड़ लेकर सवर्णों का उत्पीड़न करने का कार्य कर रहा है और इसे उनके पूर्वजों के उत्पीड़न का बदला बताया जा रहा है तो कालचक्र किसी दिन फिर घूमेगा. उत्पीड़न का बदला उत्पीड़न वाला नियम चलता रहेगा, जिसे कभी कानून मदद करेगा तो कभी जन-समुदाय. इस नियम से, इस सोच से संभवतः किसी का भला तो नहीं ही होने वाला, चाहे वाल व्यक्ति हो या संगठन.



25 दिसंबर 2016

जातिगत राजनीति में उलझा प्रदेश

चुनावी सुगंध का एहसास राजनैतिक दलों को कई माह पहले से होने लगता है. इसी सुगंध में उनके द्वारा लगातार ऐसे काम किये जाते हैं जो जनता के हितार्थ भी होते हैं तो दूसरी तरफ दलगत राजनीति को बढ़ावा देने वाले भी होते हैं. प्रथम दृष्टया जनहित से सम्बंधित दिखाई देने वाले इन कार्यों के पीछे मूल भावना स्व-हितकारी ही बनी होती है. इसी कारण से बहुतेरे जनहित से सम्बंधित कार्यों का निष्पादन ऐन चुनावों के आसपास ही किया जाता है. बड़े-बड़े लुभावने वादों का भी प्रस्तुतीकरण इसी समय होता है. कुछ ऐसा ही वर्तमान उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने किया है, पिछड़े वर्ग से सत्रह जातियों को अति-पिछड़े के नाम पर अनुसूचित जातियों में शामिल करके. सरकार द्वारा इस तरह से प्रदर्शित किया जा रहा है मानो उन सत्रह जातियों के अनुसूचित जाति वर्ग में समाहित किये जाने से उनकी सभी समस्याओं का अंत हो जायेगा. ऐसा लग रहा है जैसे कि वे सब अब तमाम सरकारी सुविधाओं का लाभ लेकर संपन्न हो जाएगी. इसके उलट एक सवाल खुद उन्हीं सत्रह जातियों को सरकार से करना चाहिए कि आखिर इतने वर्षों तक उन्हें पिछड़े वर्ग की सुविधाओं से वंचित क्यों रखा गया? किसने उन्हें आगे बढ़ने से रोका? किसने उनको पिछड़े वर्ग में अति-पिछड़ा बनाये रखा? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी भी सरकार के पास नहीं. 



असल में हो ये रहा है कि वर्तमान में आरक्षण को राजनैतिक हथियार के रूप में, एक रणनीति के रूप में उपयोग किया जा रहा है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. वंचित वर्ग को लाभान्वित करने के लिए की गई व्यवस्था स्वार्थ-पूर्ति का हथियार बन कर रह गई है. आरक्षण का पीढ़ी-दर-पीढ़ी लाभ उठाते आये लोग वंचित वर्गों के भीतर एक तरह के मठाधीश, कुलीन वर्ग बनकर रह गए हैं. इस नवोन्मेषी वर्ग ने आरक्षण का लाभ अपने से नीचे वर्ग तक न पहुँचने के कुप्रयास भी किये. इस सत्य को भले ही स्वीकार न किया जाए पर ये सौ फ़ीसदी सत्य है कि वर्तमान में आरक्षण कुछ विशेष जातियों, विशेष परिवारों, विशेष राजनैतिक दलों की बपौती सा बनकर रह गया है. शिक्षा, नौकरी, पदोन्नति, राजनीति आदि जिन-जिन क्षेत्रों में आरक्षण व्यवस्था लागू है वहां आसानी से देखने को मिलता है कि कैसे पीढ़ियों से आरक्षण उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रहा है. आरक्षण लाभान्वित संपन्न परिवारों को जब भी आरक्षण की परिधि से बाहर निकल जाने का खतरा दिखा तब-तब किसी न किसी राजनैतिक, प्रशासनिक जुगत से क्रीमीलेयर नामक व्यवस्था को अपने पक्ष में करवाकर आरक्षण को अपने तक ही सीमित कर लिया.


वर्तमान निर्णय का लाभ कितना मिलेगा, कितना नहीं ये तो भविष्य की बात है मगर जो बात सामने दिख रही है वो ये कि इसका सीधा सा लाभ पिछड़े वर्ग की शेष जातियों को ही मिलेगा, आरक्षण सम्बन्धी सुविधाओं के लिए. स्पष्ट है कि आरक्षण का लाभ लेने सम्बन्धी मुद्दे पर पिछड़े वर्ग के खाते से सत्रह जातियों की कमी हो गई है, जबकि आरक्षण का प्रतिशत ज्यों का त्यों बना हुआ है. इसके उलट अनुसूचित जातियों को आरक्षण का लाभ लेने के लिए अपने पूर्व-घोषित प्रतिशत में अब और भी जद्दोजहद करनी होगी. अब यदि आरक्षण समर्थक इस व्यवस्था का लाभ समस्त वंचित वर्ग तक पहुँचाना चाहते हैं वे स्वयं इस बात का विरोध करें कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आरक्षण समाप्त किया जाए. आरक्षण के सहारे शिक्षा, सुविधा, धन से संपन्न हो चुके परिवार की अगली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ न दिया जाए (जब तक कि वो वाकई वंचित की अवस्था में न हो). दरअसल आरक्षण संपन्न वर्ग द्वारा जारी अवरोध के साथ-साथ राजनैतिक दलों द्वारा उठाये जाने वाले विभेदकारी क़दमों से भी आरक्षण का लाभ समस्त वंचित वर्ग तक नहीं पहुँच सका है. इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा कि (उत्तर प्रदेश के सन्दर्भ में) अन्य पिछड़ा वर्ग में और अनुसूचित जाति वर्ग में आरक्षण का लाभ (सम्पूर्ण लाभ) किन-किन एक-दो जाति विशेष को ही उपलब्ध है. जातिगत राजनीति के सहारे आगे आने वाले और आरक्षण का समर्थन करने वाले विशेष राजनैतिक दल खुद में अपने वर्ग की अन्य दूसरी जातियों के लाभान्वित होने की दिशा में काम नहीं कर रहे हैं. इनका एकमात्र उद्देश्य आरक्षण के सहारे अपनी-अपनी जातियों के वोट-बैंक से सत्ता प्राप्त करने का रहता है. जबतक आरक्षण को उचित रूप में लागू करने की मंशा से काम नहीं किया जायेगा तब तक समाज विभेदकारी स्थिति से बाहर नहीं निकल पायेगा. आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था के गलत उपयोग से उत्पन्न होता सामाजिक विभेद, वर्ग विभेद उस विभेदकारी स्थिति से ज्यादा घातक है जिसे दूर करने के लिए आरक्षण को लागू किया गया.

13 मई 2016

जाति है कि जाती नहीं

जाति व्यवस्था को एक सिरे से समाज की घनघोर बुराई बताने वालों की कमी नहीं है. समय-समय पर इसको दूर करने के सम्बन्ध में बुद्धिजीवियों, राजनैतिक लोगों द्वारा सुझाव भी दिए जाते रहे हैं. बहुतेरे लोगों ने जाति के स्थान पर भारतीय लिखने की, किसी ने मानव लिखने की, किसी ने हिन्दुस्तानी लिखने तक की वकालत की. बहुत से संवेदनशील लोगों ने ऐसा करना शुरू भी किया. उन्होंने अपने नाम के साथ जाति के स्थान पर ऐसे ही शब्दों को लिखना शुरू किया. समाज को जाति-मुक्त बनाने का काम करना शुरू किया. समाज ने ऐसे लोगों को प्राथमिकता में नहीं लिया और न ही उनकी सोच को वरीयता दी. परिणाम ये हुआ कि ऐसे लोगों के प्रयास इन्हीं लोगों तक अथवा इनके परिवार तक ही सीमित रह गए. परिवर्तन के इस अल्प-दौर में शायद कुछ परिवर्तन होता भी किन्तु जिस तरह से राजनीति में जाति को प्रमुखता दी गई, उसने जतिमुक्त समाज की अवधारणा को पूरी तरह से समाप्त कर दिया. एकबारगी समाज का जतिमुक्त होना बहुत सुखद संकल्पना लगती है. सबका जातिविहीन होकर सम्मिलित रूप में रहना सुहाना महसूस होता है. इस सुखद संकल्पना, स्थिति में अब जातियों से ज्यादा राजनीति समस्या बनती नजर आ रही है. 

जातिगत आधार पर संचालित होती राजनीति के चलते अब नीति-नियंता भी नहीं चाहते हैं कि समाज जातिमुक्त स्वरूप में दिखे. उनके लिए समाज का जातियों में विभक्त रहना लाभकारी सौदा हो गया है. यही कारण है कि अब चुनावों के दौरान लगभग सभी दलों द्वारा जातिगत आधार को ध्यान में रखते हुए टिकट का बँटवारा किया जाता है. उनके लिए उनके कर्मठ कार्यकर्ताओं, उनके समर्पित व्यक्तियों से अधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति वो होता है जिसकी उसके क्षेत्र में निवास कर रही जातियों में बहुलता हो. राजनैतिक दलों के लिए योजनाओं का, बजट का क्रियान्वयन भी इस तरह से किया जाता है कि वे एक क्षेत्र-विशेष की जाति-विशेष के लिए लाभकारी हों. जाति को आधार बनाकर की जा रही राजनीति के चलते ही चुनावों के समय बहुसंख्यक प्रत्याशियों द्वारा अपनी जाति को प्रमुखता से दर्शाया जाता है. उसके पीछे उनका मूल उद्देश्य अपनी जाति के लोगों को आकर्षित करना होता है. ऐसी मानसिकता के बीच अनेक राजनैतिक दलों द्वारा समाज के सामान्य वर्ग अथवा सवर्ण वर्ग पर आरोप लगाया जाता है कि ये मनुवादी समाज में जातिभेद को फ़ैलाने में लगे हुए हैं. दलितों, पिछड़ों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं.

ये समझ से परे है कि उच्च सदन, निम्न सदन, प्रदेशों के सदनों में बैठे तमाम महानुभाव अपने वेतन वृद्धि के लिए किसी के मोहताज नहीं रहते. अपनी जनता की राय का अनुपालन नहीं करते. उनकी भावनाओं का ख्याल नहीं रखते हैं. वे लोग जो किसी भी तरह की नीति को बनाकर जनता पर थोपा जाना सा पसंद करते हैं, वे जातिमुक्त समाज के लिए कोई नियम-कानून पारित क्यों नहीं कर देते? समाज में सामान्य सी धारणा बनी हुई है कि शिक्षा के द्वारा जातिव्यवस्था को दूर किया जा सकता है. इसके ठीक उलट देखने में आ रहा है कि समाज जिस तेजी से शिक्षित हो रहा है, जिस तेजी से तकनीकी रूप से समृद्ध हो रहा है, उसी तेजी से जातिगत बंधनों में बँधता जा रहा है. दलित, पिछड़े वर्गों से उन्नति करके, शिक्षित होकर सामने आये लोगों में भी उसी तरह का अहंकार देखने को मिल रहा है जैसा कि सवर्णों के लिए कहा जाता है. ऐसे वर्गों के संपन्न, सक्षम लोगों में सवर्ण वर्ग के लिए उसी तरह का विद्वेष देखने को मिल रहा है  जैसा कि सवर्णों के मन में होना बताया जाता है. स्पष्ट है कि जातिगत व्यवस्था को दूर करने के लिए जातिगत विद्वेष फ़ैलाने से काम नहीं बनेगा. आरक्षण की बैशाखी के माध्यम से राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक विकास करते लोगों के मन में अपनी जातियों के विकास की भावना से अधिक भावना सवर्णों के खिलाफ माहौल बनाने की है. इसके लिए वे जातिगत विभेद को किसी भी रूप में समाप्त नहीं करना चाहते हैं. जातिगत विभेद के द्वारा राजनैतिक दल जहाँ अपनी रोटियाँ सेंकने में लगे हैं वहीं इसके द्वारा जातिगत ठेकेदार अपने-अपने उल्लू सीधे करने में लगे हुए हैं. जाति को समाज का नासूर बताने वाले ही समय-समय पर उसे कुरेदकर ज़ख्मों को हरा किये रहते हैं. आखिर जाति का जिंदा रहना उनके लिए ही लाभकारी सौदा है. 
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चित्र गूगल छवियों से साभार

16 अप्रैल 2014

किन्नरों को सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान करें पहले फिर श्रेणीकरण, आरक्षण की बात करें




किन्नरों को तीसरी श्रेणी में शामिल करने और उनको आरक्षण देने के न्यायालयीन आदेश आने से क्या होगा? क्या ऐसे लोगों को समाज की मुख्यधारा में लाने में सफलता मिलेगी? क्या ऐसे बच्चों के साथ भेदभाव  किया जायेगा? क्या कोई परिवार अपने ऐसे किसी बच्चे का त्याग नहीं करेगा? ये वे चंद सवाल हैं जो इस फैसले के बाद स्वाभाविक रूप से उपजते हैं. बहरहाल, अदालत के इस फैसले का स्वागत होना चाहिए किन्तु अब आरक्षण देने से अधिक आवश्यकता सामाजिक जागरूकता में और तेजी लाये जाने की है. प्राकृतिक रूप से स्त्री एवं पुरुष से अलग इस किन्नर समाज को तिरस्कार की नज़र से देखा जाता है. शादी-विवाहों में, बच्चों के जन्मोत्सव पर इनके बधाई गीतों में इस समाज की सहभागिता चंद पलों के लिए देखी जाती है. इधर चंद आपराधिक प्रवृति के लोगों ने किन्नर रूप धारण करके ट्रेन में, प्लेटफ़ॉर्म में, त्यौहार आदि पर जबरन चंदा वसूली जैसा काम शुरू कर दिया, इससे भी इस समाज के प्रति लोगों का नजरिया घृणित रूप में परिवर्तित हुआ है.
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२१वीं सदी में एक दशक गुजार देने के बाद भी सामाजिक मानसिक सोच में व्यापक परिवर्तन नहीं हुआ है. बेटियों को गर्भ में मारने की कुप्रवृति चल ही रही है, दहेज़ का दानव विकराल होता ही जा रहा है, महिलाओं को दोयम दर्जे का समझने की मानसिकता कम नहीं हुई है ऐसे में किन्नरों के प्रति सामाजिक सोच में एकाएक परिवर्तन आना बहुत मुश्किल है. किसी परिवार में ऐसे बच्चे के जन्मने के बाद उसका पालन-पोषण परिवार वालों ने ही किया हो, ऐसा बहुत कम देखने को मिला है. ये समझने की आवश्यकता है कि किन्नर स्वयं में बच्चे जन्मने में अक्षम हैं, ऐसे में आरक्षण जैसी व्यवस्था तब काम करेगी जबकि समाज ऐसे बच्चों को स्वीकारना शुरू करे. अपने आरंभिक जीवन-काल से ही ऐसे किसी बच्चे को तिरस्कृत करना शुरू कर दिया जाता है. ऐसे में उसकी शिक्षा, उसकी उच्च शिक्षा, उसका रहन-सहन आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनको आरक्षण से पहले सुलझाया जाना आवश्यक है.
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अदालत ने लम्बे समय से किन्नर समाज की चली आ रही एक माँग को स्वीकार करके एक पहल की है, अब इस पहल को आगे ले जाने का जिम्मा समाज का होना चाहिए. ऐसे बच्चों के साथ भेदभाव न किया जाये, सामान्य बच्चों के साथ उनकी शिक्षा के अवसर उपलब्ध करवाए जाएँ, समानता के साथ उनको शेष परिवारीजनों के साथ दूसरे कार्यों में सम्मिलित किया जाये. दरअसल समाजसुधारकों को, स्वयं किन्नर समाज को इस बात पर विचार करना होगा कि ऐसे कितने लोग हैं जो अदालत के इस फैसले के बाद किसी भी किन्नर से मित्रता करेंगे? कितने लोग ऐसे हैं जो किसी किन्नर को अपने घर में बुलाकर उसके साथ गपशप, चाय-नाश्ता, खाना-पीना करेंगे? कितने लोग ऐसे होंगे जो अपने पारिवारिक अनुष्ठानों में, शुभकार्यों में किन्नरों को मेहमान की तरह आमंत्रित करेंगे? ऐसे कितने लोग होंगे जो सड़क चलते किसी किन्नर से बात करने वालों पर टीका-टिप्पणी नहीं करते हैं? जब तक सामाजिक सोच को नहीं बदला जायेगा, किन्नरों को भी इन्सान नहीं समझा जायेगा, इनके बारे में फैली भ्रांतियों को दूर नहीं किया जायेगा तब तक ऐसे किसी भी कदम से लाभ नहीं होने वाला. और इसके लिए खुद किन्नर समाज को भी अपने चारों ओर बनाया बंदिशों का, रहस्यमयी घेरा तोड़ने की जरूरत है; महज नाच-गाकर, बधाई गाकर, चंदा वसूल कर धनार्जन करने के बजाय समाज की मुख्यधारा में आने का प्रयास उन्हें भी करना होगा.

28 जुलाई 2013

आरक्षण का दुरुपयोग समाज के लिए घातक




आरक्षण के पक्ष-विपक्ष को लेकर वर्तमान में तलवारें ही खिंची रहती हैं. आरक्षण का पक्ष लेने वाले इस व्यवस्था को वंचित तबके के लिए आवश्यक बताते हैं तो इस व्यवस्था के विरोधी लोग इसे एक बुराई के रूप में परिभाषित करने लगते हैं. आरक्षण पक्षधर लोगों का कहना है कि सरकारी नौकरियों में, पदोन्नतियों में, शिक्षा में उनके वर्ग के लोगों के साथ पक्षपात, भेदभाव किया जाता रहा है जिसको दूर करने के लिए, वंचितों को देश मी मुख्य-धारा में लाने के लिए आरक्षण आवश्यक है. जबकि इसके उलट आरक्षण विरोधी तबका इसके दुरुपयोग की बात कहकर आरक्षण को सही स्वरूप में लागू करने की वकालत करता है. दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क, अपनी-अपनी बहस है पर आज जो हालात आरक्षण को लेकर समाज में बन गए हैं, समाज में वर्ग-विभेद समाप्त होने के स्थान पर और तेजी से विकृत रूप लेकर विकसित हुआ है, उसे देखते हुए आरक्षण को लेकर उत्पन्न विभ्रम, मतभेद को दूर करने की आवश्यकता है. दरअसल आरक्षण देश के वंचित वर्ग को समान रूप से लाभ पहुँचाने की संवैधानिक व्यवस्था है और इसको लेकर किसी भी तरह के विवाद को दूर करना भी संवैधानिक संस्थाओं का कर्तव्य है.
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वर्तमान में आरक्षण को राजनैतिक हथियार के रूप में, एक रणनीति के रूप में उपयोग किया जा रहा है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. वंचित वर्ग को लाभान्वित करने के लिए की गई व्यवस्था स्वार्थ-पूर्ति का हथियार बन कर रह गई है. आरक्षण का पीढ़ी-दर-पीढ़ी लाभ उठाते आये लोग वंचित वर्गों के भीतर एक तरह के मठाधीश, कुलीन वर्ग बनकर रह गए हैं. इस नवोन्मेषी वर्ग ने आरक्षण का लाभ अपने से नीचे वर्ग तक न पहुँचने के कुप्रयास भी किये. इस सत्य को भले ही स्वीकार न किया जाए पर ये सौ फ़ीसदी सत्य है कि वर्तमान में आरक्षण कुछ विशेष जातियों, विशेष परिवारों, विशेष राजनैतिक दलों की बपौती सा बनकर रह गया है. शिक्षा, नौकरी, पदोन्नति, राजनीति आदि जिन-जिन क्षेत्रों में आरक्षण व्यवस्था लागू है वहां आसानी से देखने को मिलता है कि कैसे पीढ़ियों से आरक्षण उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रहा है. आरक्षण लाभान्वित संपन्न परिवारों को जब भी आरक्षण की परिधि से बाहर निकल जाने का खतरा दिखा तब-तब किसी न किसी राजनैतिक, प्रशासनिक जुगत से क्रीमीलेयर नामक व्यवस्था को अपने पक्ष में करवाकर आरक्षण को अपने तक ही सीमित कर लिया.
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यदि आरक्षण समर्थक इस व्यवस्था का लाभ समस्त वंचित वर्ग तक पहुँचाना चाहते हैं वे स्वयं इस बात का विरोध करें कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आरक्षण समाप्त किया जाए. आरक्षण के सहारे शिक्षा, सुविधा, धन से संपन्न हो चुके परिवार की अगली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ न दिया जाए (जब तक कि वो वाकई वंचित की अवस्था में न हो). क्रीमी लेयर में छह लाख रुपये सालाना की सीमारेखा को कम किया जाये, सोचा जा सकता है कि पचास हजार रुपये पाने वाले सुविधाएँ प्राप्त करने में वाकई असुविधा होती होगी? राजनीति में भी आरक्षण का लाभ किसी एक व्यक्ति के परिवार तक सीमित न रहे. दरअसल आरक्षण संपन्न वर्ग द्वारा जारी अवरोध के साथ-साथ राजनैतिक दलों द्वारा उठाये जाने वाले विभेदकारी क़दमों से भी आरक्षण का लाभ समस्त वंचित वर्ग तक नहीं पहुँच सका है. इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा कि (उत्तर प्रदेश के सन्दर्भ में) अन्य पिछड़ा वर्ग में और अनुसूचित जाति वर्ग में आरक्षण का लाभ (सम्पूर्ण लाभ) किन-किन एक-दो जाति विशेष को ही उपलब्ध है. जातिगत राजनीति के सहारे आगे आने वाले और आरक्षण का समर्थन करने वाले विशेष राजनैतिक दल खुद में अपने वर्ग की अन्य दूसरी जातियों के लाभान्वित होने की दिशा में काम नहीं कर रहे हैं. इनका एकमात्र उद्देश्य आरक्षण के सहारे अपनी-अपनी जातियों के वोट-बैंक से सत्ता प्राप्त करने का रहता है. जबतक आरक्षण को उचित रूप में लागू करने की मंशा से काम नहीं किया जायेगा तब तक समाज विभेदकारी स्थिति से बाहर नहीं निकल पायेगा. आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था के गलत उपयोग से उत्पन्न होता सामाजिक विभेद, वर्ग विभेद उस विभेदकारी स्थिति से ज्यादा घातक है जिसे दूर करने के लिए आरक्षण को लागू किया गया.