आज 16 दिसम्बर को विजय दिवस देश भर में मनाया जाता है. इसको मनाये जाने का कारण 1971 में हुए युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर जीत है. पाकिस्तान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध के अंत के बाद 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था. इस युद्ध में पाकिस्तान की पराजय के बाद पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र हो गया था. यही स्वतंत्र भाग आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. इस युद्ध में लगभग चार हजार भारतीय सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई थी और दस हजार के आसपास सैनिक घायल हुए थे.
16 दिसंबर 2025
20 मई 2025
सकारात्मक माहौल में नकारात्मक राजनीति
किसी भी देश के
राजनैतिक विकास के लिए उसके सत्ता पक्ष और विपक्ष का समन्वित स्वरूप महत्त्वपूर्ण
होता है. यह तब और भी विशेष हो जाती है जबकि देश में कोई संकट की स्थिति हो.
आवश्यक नहीं कि संकट सीमा-पार से ही उत्पन्न हो, देश की आंतरिक स्थिति, प्राकृतिक स्थिति के कारण भी संकट
का सामना करना पड़ता है. ऐसी किसी भी स्थिति में, आपातकाल में
यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष में समन्वय रहता है, उनमें
सामंजस्य की भावना हो तो समाधान सहजता से हो जाता है. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में
चारों तरफ शांतिपूर्ण माहौल के बाद भी अशांति लगती है. प्रशासनिक सजगता के बाद भी
अराजक तत्त्वों की हलचल दिखती है.
विगत दिनों देश का
सामना एक असामान्य घटना से हुआ. घटना की प्रतिक्रिया में सरकार ने भी कदम उठाया.
आतंकी घटना और उसके बाद ऑपरेशन सिन्दूर की समयावधि में ऐसा लगा जैसे सत्ता पक्ष और
विपक्ष में तालमेल बना है. एकाधिक बयानबाजियों को छोड़ दें तो प्रमुख विपक्षी दल
कांग्रेस की तरफ से भी आतंकियों के विरुद्ध कार्यवाही की खुली छूट, सरकार को पूर्ण समर्थन जैसे
सहयोगात्मक बयानों का आना हुआ. ऑपरेशन सिन्दूर सफलतापूर्वक अपनी पूर्णता को
प्राप्त होता उसके पहले ही युद्ध-विराम को अपनाना पड़ा. यह निर्णय देशवासियों को
किसी भी कीमत पर पसंद नहीं आया. पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने की
कार्यवाही का नागरिकों ने जितने खुले दिल से समर्थन किया,
युद्द-विराम पर उतने खुले रूप में सरकार का विरोध किया.
यहीं देश के
सत्ता-पक्ष और विपक्ष का चेहरा देखने का अवसर भी मिला. केन्द्र सरकार को किन
कारणों, किन कूटनीतिक
स्थितियों के चलते युद्ध-विराम पर सहमत होना पड़ा, ये अलग
विषय है किन्तु इसके बाद भी सरकार के अडिग नजरिये में, कठोर
निर्णयों में कोई परिवर्तन नहीं आया. प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा
पाकिस्तान सहित सकल विश्व को स्पष्ट रूप से सन्देश दिया गया कि पाकिस्तान की
परमाणु ब्लैकमेलिंग को सहन नहीं किया जायेगा. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी कठोर
लहजे में कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर तो ट्रेलर था, पिक्चर अभी
बाकी है. वैचारिक रूप से अपनी मनोवैज्ञानिक बढ़त के साथ सत्ता पक्ष कूटनीतिक, रणनीतिक रूप से तत्पर था किन्तु विपक्ष अपने पुराने रंग-ढंग में आने लगा.
पहलगाम आतंकी हमले
के पहले भी कई बार देश ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के दंश को सहा है. हर बार
देशवासियों की माँग होती कि पाकिस्तान पर हमला कर वहाँ के आतंकी ठिकाने ध्वस्त कर दिए
जायें. पाकिस्तान के साथ कई बार युद्ध होने, संघर्ष की स्थिति होने पर देश में उपद्रव होने की आशंका रहती.
आतंकी स्लीपर सेल द्वारा गृह-युद्ध जैसे हालात पैदा किए जाने का भय रहता. ऑपरेशन
सिन्दूर के बाद सरकार ने पूरी सजगता दिखाई. युद्ध-विराम पर सहमति के बाद भी
कार्यवाही को विराम नहीं दिया. उसके द्वारा कूटनीति को धार देते हुए न केवल देश में
बल्कि बाहर भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया. वैश्विक
स्तर पर पाकिस्तान के नापाक इरादे बताने के लिए, ऑपरेशन
सिन्दूर की आवश्यकता के बारे में तथा आतंकवाद के विरुद्ध भारत के ठोस और कठोर
नजरिये के बारे में सरकार द्वारा अभूतपूर्व कूटनीति तैयार की गई. केन्द्र सरकार ने
आक्रामक कूटनीतिक पहल करते हुए सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल बनाये जो आगामी कुछ
सप्ताहों में अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र, यूरोप,
अमेरिका और पूर्वी एशिया जैसे महत्वपूर्ण
क्षेत्रों का भ्रमण करेंगे. इसका उद्देश्य सहयोगी देशों के साथ सामंजस्य स्थापित करना, पाकिस्तान की आतंकवाद में भूमिका को
वैश्विक मंच पर उजागर करना है.
एक तरफ सर्वदलीय
प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की जानकारी देने वैश्विक यात्रा की
तैयारी में है, तब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा विदेशमंत्री एस. जयशंकर पर
ऑपरेशन सिन्दूर की जानकारी पाकिस्तान को पहले से देने का आरोप तथा वायुसेना के
नष्ट हुए विमानों की संख्या माँगना समझ से परे है. राहुल गांधी के इस बयान को
पाकिस्तान में भारत विरोधी वातावरण बनाने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा है.
यदि राहुल गांधी का केन्द्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति नजरिये का,
बयानों का इतिहास देखें तो यह पहली घटना नहीं है जबकि उनके नकारात्मक विचार
सार्वजनिक हुए हैं. उनके द्वारा ऐसा किया जाना आम बात है,
बिना यह विचारे कि देश-हित में इन बयानों का क्या प्रभाव पड़ेगा. देखा जाये तो राहुल
गांधी का यह बयान देश-विरोधी ताकतों के लिए उत्प्रेरक का कार्य करेगा. संवेदनशील
समय में ऐसा बयान देने का कारण तो वही बता सकेंगे किन्तु निश्चित ही ऐसे बयान देश
की छवि को नुकसान पहुँचाते हैं. प्रतिनिधिमंडल के लिए कांग्रेस प्रस्तावित चार नामों
से इतर शशि थरूर का नाम केन्द्र सरकार द्वारा न केवल प्रतिनिधिमंडल में शामिल करना
बल्कि एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व देना कांग्रेस को कतई पसंद नहीं आया. ऑपरेशन
सिन्दूर पर केन्द्र सरकार की प्रशंसा करने के लिए कांग्रेस उनसे नाराज चल रही है. ऐसा
समझा जा रहा है कि राहुल गांधी का हालिया आरोप इसी की परिणति है.
कुछ भी हो मगर ऐसे
समय में जबकि पूरा देश आतंकियों के सफाए के लिए एकजुट है; केन्द्र सरकार द्वारा न
केवल आंतरिक रूप से बल्कि सीमा पार भी राजनैतिक-कूटनीतिक रूप से सशक्त और
सकारात्मक कदम उठा रखे हैं; पड़ोस की भू-राजनीतिक स्थितियों में उथल-पुथल होने के
बाद भी देश में स्थिरता वाले माहौल में ऐसे बयान नकारात्मकता पैदा करते हैं. वैश्विक
रूप से अपनी सैन्य शक्ति की सशक्तता, निर्णयों की गम्भीरता, कूटनीति की सक्षमता की विकास-यात्रा में यही
नकारात्मकता अवरोधक का कार्य करती है. निश्चित रूप से ऐसे बयान न तो परिपक्वता की
पहचान कराते हैं और न ही गम्भीरता की.
16 मई 2025
अनावश्यक तुलनात्मक विवेचन
ऐसा माना जा सकता है कि सभी को ये बात मालूम होगी कि तुलनात्मक अध्ययन उन्हीं
दो वस्तुओं, व्यक्तियों,
स्थितियों के मध्य किया जा सकता है,
जहाँ उनके चर एकसमान सम्भावना रखते
हों.
सीजफायर के बाद कांग्रेसी आईटी सेल से एकदम इंदिरा गांधी बाहर निकल आईं और अनचाहे ही समाज में एक तुलनात्मक विवेचन किया जाने लगा. तुलना होनी भी चाहिए, आलोचना होनी भी चाहिए मगर पूर्वाग्रह से रहित. इंदिरा गांधी के सन्दर्भ में तत्कालीन स्थितियों को ध्यान रखने के साथ-साथ वर्तमान स्थितियों को भी ध्यान रखना आवश्यक है. प्रत्येक कालखंड के, समय के अपने-अपने सत्य होते हैं जिसे उसी समय के अनुरूप समझा जा सकता है.
फिलहाल देश का एक जवान पाकिस्तानी कैद से रिहा होकर वापस आ चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा विगत वर्षों में, आयरन सत्ता में, मौनी-रिमोट सरकार में ऐसा क्यों नहीं हो सका? आयरन की मात्रा और वजन बताने वाले भी इस पर विचार करेंगे तो और ज्यादा सटीक निष्कर्ष मिल सकते हैं.
10 मई 2025
क्रोध-रोष, जोश-प्रतिशोध
पहलगाम में
आतंकियों की अप्रत्याशित रूप से धार्मिक पहचान कर हिन्दुओं की हत्याएँ करने के बाद
समूचे देश ने केन्द्र सरकार से कठोर कार्यवाही की अपेक्षा की थी. निर्दोषों को मौत
की नींद सुलाने के साथ-साथ ‘मोदी को बता देना’ जैसी चुनौती के बीच जनसामान्य को दृढ़ विश्वास था कि केन्द्र
सरकार की तरफ से जबरदस्त जवाबी कदम उठाया जायेगा. दिन बीतते जा रहे थे, सरकार की चुप्पी बयानों के सन्दर्भ में ही टूट रही थी, मीडिया की तरफ से लगातार कुछ न कुछ बड़ा होने जैसा संकेत दिया जाता मगर
प्रत्येक दिन जितनी आशा के साथ आता, उतनी निराशा के साथ चला
जाता. उरी और पुलवामा के आतंकी हमलों के बाद सरकार की तरफ से की जा चुकी सैन्य
स्ट्राइक के बाद भी इस बार की चुप्पी जनसामान्य के भीतर एक तरह के रोष को जन्म दे
रही थी. पहलगाम हत्याकांड के बाद आतंकवादियों, पाकिस्तान के
विरुद्ध उपजा क्रोध अब सरकार की ख़ामोशी, कदमों को देखते हुए
रोष में बदलने लगा था. जनसामान्य की एकराय सिर्फ और सिर्फ युद्ध जैसा कठोर कदम उठाने
की थी. बहुसंख्यक भारतीय नागरिक भी पाकिस्तान को, पाकिस्तान
समर्थित आतंकवादियों को सिर्फ सबक सिखाने की मंशा नहीं बल्कि उनका सम्पूर्ण
विध्वंस करने की चाह रख रहे थे.
केन्द्र सरकार ने पहलगाम
घटना के बाद से ही अपनी सक्रियता शुरू कर दी थी. गृह मंत्रालय के आदेश पर एनआईए ने हमले की जाँच आरम्भ
की. सिन्धु जल समझौता अनिश्चितकाल के लिए निलम्बित कर दिया गया. पाकिस्तान से
युद्ध होने, तनाव की स्थितियों के बाद भी इस समझौते को कभी निलम्बित नहीं किया गया
था. यह पहली बार है जबकि भारत ने इसको निलम्बित किया. पाकिस्तान ने भारत के इस कदम को ‘युद्ध की कार्यवाई’ बताया. पाकिस्तानी नागरिकों के सभी
प्रकार के वीजा रद्द करते हुए उन्हें तत्काल वापसी के आदेश दिए गए. इसी के साथ इस्लामाबाद
में भारतीय मिशन और नई दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग के कर्मचारियों की संख्या को
कम कर दिया गया. पाकिस्तानी उच्चायोग के रक्षा, नौसेना और वायुसेना सलाहकारों को एक सप्ताह में भारत छोड़ने
का आदेश भी दिया गया. सेना के सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिए गए. केन्द्र सरकार के ऐसे
क़दमों, निर्णयों से
स्पष्ट संकेत मिला कि इस बार वह शांत बैठने के मूड में नहीं है.
केन्द्र सरकार
स्वयं तो कूटनीतिक,
राजनैतिक निर्णय लेते हुए काम कर रही थी साथ ही सैन्य गतिविधियों को भी सक्रियता
प्रदान कर रही थी. सरकार की तरफ से लगातार बैठकों के द्वारा सेना को उनकी सैन्य
गतिविधियों के लिए खुली छूट देने जैसा आक्रामक एवं विश्वासपरक कदम उठाकर दर्शाया
गया कि सरकार सुस्त अथवा खामोश नहीं है. भारतीय वायुसेना द्वारा सेंट्रल सेक्टर में
एक बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू किया गया, जिसमें पहाड़ी और जमीनी लक्ष्यों पर हवाई हमलों
का अभ्यास किया गया. इसे 'आक्रमण'
नाम दिया गया जिससे इसका उद्देश्य स्पष्ट
हो जाता है. वायु सेना के अलावा नौसेना ने अरब सागर में अपनी गतिविधियों को बढ़ा
दिया था. युद्धपोतों को हाई अलर्ट पर रख कर कई एंटी-शिप और एंटी-एयरक्राफ्ट
मिसाइलों का सफलतापूर्वक परीक्षण भी किया गया.
इसके बाद भी
जनाक्रोश कम नहीं हो रहा था. जनमानस पाकिस्तान के विरुद्ध खुले रूप में सैन्य
गतिविधि को देखना चाहता था. दरअसल जनता का मनोविज्ञान तत्काल कार्यवाही करने का, तुरंत बदला लेने का होता है. उसके
लिए रणनीति, कूटनीति, राजनीति आदि का
कोई सन्दर्भ नहीं होता है. इसके उलट किसी भी सरकार के लिए युद्ध तात्कालिक
प्रतिक्रिया के रूप में नहीं स्वीकारा जाता है. युद्ध का तात्पर्य किसी दूसरे देश
पर केवल हमला करना भर नहीं होता है बल्कि अपने देश, सेना, नागरिकों की अत्यल्प क्षति के साथ युद्ध को अपने पक्ष वाली स्थिति में ले
जाना होता है. हम सभी वर्तमान में वैश्विक स्तर पर कई युद्ध देख रहे हैं, जो लम्बे समय के बाद भी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं. भारत सरकार
की मंशा भी कुछ इसी तरह की रही होगी कि बिना युद्ध जैसे ट्रैप में फँसे पाकिस्तान
को सबक सिखाया जाये. देखा जाये तो दक्षिण एशिया की वर्तमान भू-राजनैतिक स्थितियाँ
भारत के पक्ष में नहीं हैं. सभी पड़ोसी देशों में राजनैतिक हलचल मची हुई है. ऐसे
में अनिश्चितकालीन अथवा दीर्घकालिक युद्ध वाला माहौल न केवल देश को क्षति पहुँचा
सकता है बल्कि चीन को हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान कर सकता है. सम्भव है कि ऐसा
कुछ विचार करके केन्द्र सरकार किसी सटीक कदम को उठाने की तैयारियों में सक्रिय हो.
ऐसा कुछ उस समय
समझ में भी आया जबकि केन्द्र की तरफ से युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए
नागरिकों को आगाह किया गया. एक निश्चित तिथि पर देश में मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट के
द्वारा युद्ध से निपटने के लिए जन-जागरूकता को बढ़ाने वाले दिशा-निर्देश जारी किये
गए. इधर जनमानस में ब्लैक आउट को लेकर, मॉक ड्रिल को लेकर सक्रियता, सजगता देखने को मिल
रही थी उधर सरकार कुछ बड़ा करने के मूड में थी. केन्द्र सरकार द्वारा अप्रत्याशित
कदम उठाते हुए मॉक ड्रिल, ब्लैक आउट वाले दिन से पहले ही पाकिस्तान और पीओके में मिसाइल
स्ट्राइक करके पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की कमर तोड़ दी.
भारत की तीनों
सेनाओं ने अपनी संयुक्त शक्ति के साथ आधी रात के बाद ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के द्वारा
पाकिस्तान और पीओके स्थित आतंकवादी ठिकानों पर सटीक सैन्य हमले किये. ख़ुफ़िया
जानकारियों के आधार पर चिन्हित 21 आतंकी ठिकानों में से अभी 09 ठिकानों को सेना ने
अपना निशाना बनाया है. इनमें पाँच केन्द्र पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में और चार
पाकिस्तान में स्थित थे. इन हमलों में विशेष बात यह रही कि पाकिस्तान के किसी भी
सैन्य ठिकाने को और नागरिकों को निशाना नहीं बनाया गया. सेना का निशाना पूरी तरह
आतंकी केन्द्रित रहा, इसमें लश्कर-ए-तैयबा, टीआरएफ सहित कई आतंकी ठिकाने शामिल
रहे. बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद),
मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय), टेहड़ा कलां (जैश-ए-मोहम्मद), सियालकोट (हिजबुल मुजाहिदीन), बरनाला (लश्कर-ए-तैयबा), कोटली (जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल
मुजाहिदीन का प्रशिक्षण शिविर), मुजफ्फराबाद (लश्कर-ए-तैयबा
का आतंकी शिविर और जैश-ए-मोहम्मद का संचालन केन्द्र) इन हमलों में पूरी तरह ध्वस्त
कर दिए गए.
केन्द्र सरकार ने
एक सर्वदलीय बैठक में स्पष्ट रूप से कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर अभी ख़त्म नहीं हुआ है.
यह स्पष्ट सन्देश है कि आतंकी संगठनों का, उनके ठिकानों का सफाया किये बिना भारतीय सेना रुकने वाली नहीं
है. अचम्भित करने वाली भारत की सैन्य कार्रवाई में दर्जनों आतंकियों और उनके
करीबियों के मारे जाने की पुष्टि खुद पाकिस्तान ने की है. केन्द्र सरकार द्वारा उरी
हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक तथा पुलवामा अटैक के बाद की एयर स्ट्राइक के बाद
वर्तमान मिसाइल स्ट्राइक के द्वारा पाकिस्तान को स्पष्ट सन्देश दिया गया है कि
भारत अब पाकिस्तानी आतंकवाद का घिनौना खेल बर्दाश्त नहीं करने वाला. निश्चित ही
ऐसा दृढ़ विश्वास और आक्रामक रणनीति जनाक्रोश को समाप्त करेगी साथ ही आतंकियों का
भी सर्वनाश करेगी.
07 मई 2025
ऑपरेशन सिन्दूर के द्वारा पाकिस्तान को सबक सिखाने की शुरुआत
आज सुबह आँख खुली. जब मोबाइल पर आये हुए संदेशों को देखा तो सबसे पहले ये चित्र नजर आया. अभिन्न मित्र द्वारा भोर में भेजे गए इस चित्र से समझ आया कि किस तरह की सक्रियता रही होगी उच्च स्तर पर.
(पहले चित्र देखिये...)
मन प्रसन्न हो गया था ये चित्र देख कर. आखिर पहलगाम आतंकी हत्याकांड में मिली चुनौती को जवाब देने का आरम्भ हो चुका था. इस चित्र के बाद जब सोशल मीडिया पर दस्तक दी गई तो चारों तरफ यही बम-बम मची हुई थी. सभी जगह से ऑपरेशन सिन्दूर पर ही गर्व किया जा रहा था.
इसी उत्साह, उमंग, जोश ने शांत नहीं बैठने दिया. सोशल मीडिया पर कुछ सन्देश लिखित रूप में और कुछ चित्र के रूप में प्रसारित किये जाते रहे. उनकी एक झलक, आज की पोस्ट के रूप में....
Operation SINDOOR का एक अर्थ ये भी है...
ऑपरेशन SIN दूर
😊
#छीछालेदर_रस से खात्मा हो जाएगा इस SIN का.
+
अरे मोदी जी,
थोड़ा सा पानी छोड़ दीजिए. बेचारे आग बुझाने
से पहले पिछवाड़ा धो लें.
😜
ग़ज़ब #छीछालेदर_रस लपेटे दिख रहे टीवी पर
+
एक साथ दो-दो ऑपरेशन
की जबर लहर चली,
पाकिस्तान में ऑपरेशन
सिन्दूर, देश में ऑपरेशन फटी.
😜
#दुनाली कहरदार
+
भारत में सायरन बजेगा
बोल के
पाकिस्तान का बैंड
बजाया पेल के.
😜😆
#दुनाली ऑपरेशन सिन्दूर
भरी
+
चिल्ला-चिल्ला के यही
गा रहे.....
भाग डी के बोस... डी
के बोस....
#छीछालेदर_रस
😜😆😜😆
(स्याले बोन चिड़ी के)
+
अंधियारे में उजियारा
लाने वाली
सेना हिन्द की है,
दुश्मन को ठिकाने लगाने
वाली
सेना हिन्द की है,
आघात सहकर खामोश बैठना
नहीं है अपनी फितरत,
ख़ामोशी को विस्फोट
बनाने वाली
सेना हिन्द की है.
+
कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
07.05.2025
+
ये कटपीस क्या चलायेंगे
परमाणु बम,
भारतीय सेना ने सुलगा
दिया इनका बम.
😜😜
बोल बम #दुनाली भारतीय सैन्य शक्ति की
+
यार, जे तो रोमंटी भई, मॉक ड्रिल की कहके तुमने तो रगड़ दओ.
अब बिलबिलाने फिर रये
दोऊ तरफ़ के खजैले सुअर
कुछ चित्रों पर भी ध्यान दीजियेगा.
23 अप्रैल 2025
हिन्दुओं के विरुद्ध सुनियोजित साजिश
पहलगाम में
आतंकवादियों द्वारा उठाये गए नृशंस कदम को प्रथम दृष्टया भले ही आतंकी हमला कहा
जाये, भले ही इसे
पर्यटकों पर हमला कहा जाये मगर आतंकियों द्वारा जिस तरह से कलमा पढ़वा कर, खतना देख
कर, मजहबी पहचान करने के बाद हत्याएँ की हैं वो अलग कहानी कह
रहा है. हमले से स्पष्ट है कि आतंकियों का उद्देश्य पर्यटकों को मारना नहीं था, पहलगाम में दहशत फैलाना नहीं था बल्कि उनका उद्देश्य सिर्फ हिन्दुओं की
हत्या करना था. इस हमले को पुलवामा आतंकी हमले के बाद बड़ा हमला बताकर पहलगाम की
घटना के सन्दर्भों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है.
पहलगाम की इस घटना
के सन्दर्भ तलाशने के लिए कुछ वर्ष पूर्व की स्थितियों का आकलन किया जाना भी
आवश्यक है. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार के ठोस और दृढ़ निर्णयों के
बाद से भारतीय सेना ने,
यहाँ के वीर जवानों ने अपने पूरे पराक्रम, पूरे साहस के साथ
पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की, आतंकवादियों की कमर तोड़ी है, वह अपने आपमें बेमिसाल है. इसके साथ ही अगस्त 2019 में केन्द्र सरकार ने जम्मू
कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया था. इसको समाप्त करने के साथ ही राज्य को जम्मू-कश्मीर
और लद्दाख में विभाजित
करके दोनों को केन्द्रशासित राज्य घोषित कर दिया था. अनुच्छेद 370 समाप्त होने के
बाद से जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में आतंकी घटनाओं में कमी देखने को मिली. यहाँ के
सामान्य नागरिकों, विशेष
रूप से हिन्दुओं ने सहजता का अनुभव किया. विगत के कुछ वर्षों में हिन्दू जनसंख्या
द्वारा हर्षोल्लास के साथ अपने पर्व-त्योहारों का मनाया जाना आरम्भ हो गया. किसी
समय मौत की कहानी कहते, सन्नाटों में रहने वाले लाल चौक ने
भी शान से भारतीय तिरंगे को लहराते हुए देखा. यदि ऐसी अनेकानेक घटनाओं का सार
निकाला जाये, उनका आकलन करके निष्कर्ष निकाला जाये तो कहीं न
कहीं एहसास होगा कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति से जहाँ जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल
होने लगी थी, वहीं हिन्दुओं में भी सुरक्षा का भाव आने लगा
था.
जम्मू-कश्मीर की
ऐसी स्थिति कम से कम उनके लिए असुविधाजनक तो है ही जो यहाँ पर आतंकवाद को
फलते-फूलते देखना चाहते हैं. जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं की सहजता उन कट्टर ताकतों
के लिए असहज हो गई होगी जिनके हाथ कश्मीरी हिन्दुओं के खून से रँगे हैं. यहाँ की
शांति पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों के पैरोकारों के लिए, उनके कट्टरपंथी आकाओं के लिए भी चुभने
वाली रही होगी. 2014 के बाद से जिस तरह से केन्द्र सरकार की रणनीति जम्मू-कश्मीर
क्षेत्र को लेकर स्पष्ट रही है, जिस तरह से पाकिस्तान अधिकृत
कश्मीर को लेकर, बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को लेकर भारतीय कूटनीतिज्ञ कदम सामने
आते रहते हैं, उससे भी इस क्षेत्र के और सीमा-पार के
आतंकवादियों में निश्चित रूप से बेचैनी रही होगी. ऐसी स्थितियों के बीच में जहाँ
जम्मू-कश्मीर लगातार शांति, सुरक्षा की राह पर बढ़ता दिख रहा
है वहीं पाकिस्तान की हालत लगातार अस्थिर होती जा रही है. यह किसी से भी छिपा नहीं
है कि पाकिस्तान की, वहाँ की सरकार की अस्थिरता को रोकने का एकमात्र
कदम भारत-विरोध, हिन्दू-विरोध रहा है. यह आज से नहीं बल्कि पाकिस्तान के निर्माण
से ही उनका प्रमुख हथियार बना हुआ है. इस हथियार का प्रयोग पिछले सप्ताह इस्लामाबाद
में एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने किया था.
पाकिस्तानी सेना प्रमुख द्वारा उस कार्यक्रम में बयान अनायास ही नहीं दिए गए हैं.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की उपस्थिति में पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कश्मीर
को पाकिस्तान की गर्दन की नस बताया. इसके साथ-साथ उन्होंने परम्पराओं, रीति-रिवाजों, धर्म आदि को अलग-अलग मानते हुए
हिन्दू-मुसलमानों को भी अलग बताया. सीमा-पार से आये इस तरह के अलगाववादी बयानों के
बाद धार्मिक पहचान के आधार पर किये जाने वाला हमला न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि
चिंताजनक है.
इधर जाँच में
सामने आया है कि आतंकियों ने इस हमले की पूरी रणनीति पहले से तैयार कर रखी थी.
पहलगाम पर्यटन स्थल को चुनने के पीछे उनका उद्देश्य गैर-कश्मीरियों को निशाना
बनाना था. इसमें भी उनके
निशाने पर हिन्दू नागरिक ही थे. स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में अशांति, आतंकवाद चाहने वालों का उद्देश्य यह दिखाना है कि अनुच्छेद 370 हटाये
जाने के बाद भी स्थितियाँ सुधरी नहीं हैं. यहाँ पर हिन्दू अभी भी असुरक्षित है. अब
जबकि इस जघन्य और सुनियोजित इस्लामिक आतंकी हत्याकांड के बाद सेना सर्च ऑपरेशन चला
रही है तो निश्चित रूप से इस घटना के साजिशकर्ता भी बेनकाब होंगे किन्तु केन्द्र
सरकार को और अधिक कठोरता से, दृढ़ता से सैन्य कार्यवाही के
लिए भारतीय सेना को अधिकाधिक अधिकार प्रदान करने होंगे. कठोर सैन्य कार्यवाई के
द्वारा आतंकवादियों के, कट्टरपंथियों के आकाओं को, सीमा-पार पाकिस्तानी आतंकवाद को नेस्तनाबूद करना चाहिए. जम्मू-कश्मीर से
विस्थापित हो चुके हिन्दुओं के मन में यह विश्वास जगाना होगा कि वे अब पूरी सुरक्षा, सहजता के साथ वापस लौट सकते हैं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह
सन्देश देना होगा कि जम्मू-कश्मीर यहाँ के नागरिकों के लिए,
पर्यटकों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है.
11 मार्च 2025
स्वतंत्र होने की राह पर बलूचिस्तान?
पाकिस्तान में
ट्रेन अगवा करने की खबर से बलूचिस्तान चर्चा में है. यहाँ के अलगाववादी संगठन
बलूचिस्तान लिब्रेशन आर्मी (बीएलए) के लड़ाकों ने 500 यात्रियों को क्वेटा से पेशावर ले जा रही जफर एक्सप्रेस को
अगवा कर लिया. उन्होंने ट्रेन में सवार महिलाओं, बुज़ुर्गों,
बच्चों और बलूच लोगों को सुरक्षित रिहा कर दिया किन्तु 20 सुरक्षाकर्मियों को मार दिया तथा सैकड़ों यात्रियों को बंधक बना लिया है. बीएलए
ने ट्रेन के बंधकों को छोड़ने के बदले बलूच राजनीतिक कैदियों और गायब किए गए व्यक्तियों की
बिना शर्त रिहाई की माँग की है. इस घटना के बाद भारत, पाकिस्तान सहित अन्य देशों में बलूच
लड़ाकों, बलूचिस्तान का नाम फिर चर्चा में है. भारत में इससे पहले अगस्त 2016 में
बलूचिस्तान का मुद्दा जबरदस्त तरीके से चर्चा में आया था जबकि भारतीय प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से अपने भाषण में बलूच नागरिकों पर पाकिस्तान के
अत्याचारों का जिक्र किया था. बलूच एक जातीय समूह है जो बलूचिस्तान के मूल निवासी
हैं. यह क्षेत्र पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान तक फैला हुआ
है. इनका आरोप है कि पाकिस्तान उनके प्राकृतिक संसाधनों का
दोहन कर रहा है और बदले में उनके मौलिक अधिकारों का हनन कर रहा है. इस कारण
बलूचिस्तान में लगातार विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं. ट्रेन को अगवा करने वाली घटना
को इसी सन्दर्भ में देखा जा सकता है.
पाकिस्तान के
विरोध में बलूचिस्तान के अनेक संगठन शांतिपूर्ण आंदोलन करते रहे हैं तो कई संगठनों
ने हथियारबंद आंदोलन किये हैं. ऐसे हथियारबंद संगठन आए दिन पाकिस्तान के सैन्य और
नागरिक ठिकानों पर हमला करते रहते हैं. विगत लम्बे समय से एक हथियारबंद संगठन बीएलए
सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है, जिसने पाकिस्तान को लगातार नुक़सान भी पहुँचाया है, उसे परेशान भी किया है. बीएलए को बलूचिस्तान
के मरी, बुगती, मेंगल और अन्य बलोच
कबीलों का समर्थन मिला हुआ है. इसके छह हजार से अधिक लड़ाके बलूचिस्तान और
अफगानिस्तान से लगे क्षेत्रों में सक्रिय हैं. यद्यपि पाकिस्तान ने 2006 में बीएलए पर पाबंदी लगा दी थी तथापि विगत कुछ वर्षों में बीएलए ने
बलूचिस्तान के ग्रामीण क्षेत्रों में अपना अच्छा नेटवर्क बना लिया है.
बलूचिस्तान के गठन
के बाद से ही वहाँ के लोग लगातार पाकिस्तान के विरुद्ध संघर्ष करते रहे हैं. दरअसल
पाकिस्तान बनने पर उसमें कई रियासतों का विलय हुआ, कई का विलय दबाव से करवाया गया
और कुछ पर कब्जा भी किया गया. पाकिस्तान ने अपने गठन के बाद मार्च 1948 को कलात रियासत का जबरन विलय कर
लिया. इसके बाद तीन अन्य रियासतों को मिलाकर बलूचिस्तान प्रांत बना दिया. इससे नाराज होकर बलूच लोगों ने विद्रोह शुरू कर दिए, जिन्हें पाकिस्तान
अपनी सैन्य शक्ति से दबाता रहा. एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार 2011
से अब तक दस हजार से ज्यादा बलूच लापता हो चुके हैं. बलूच लोगों का
मानना है कि वो या तो पाकिस्तान की कैद में हैं या उन्हें मार दिया गया है. बलूच राष्ट्रवादियों का कहना है कि वे लोग अपनी मर्जी से पाकिस्तान में
नहीं मिले. उनका आरोप है कि पाकिस्तान ने कब्जा करने के बाद बलूचिस्तान के
प्राकृतिक संसाधनों का भारी दोहन किया है, बदले में बलूच लोगों को कुछ नहीं मिल
रहा. यहाँ क्रोमाइट, फ्लोराइट,
संगमरमर, सोना, गैस, लोहा और पेट्रोलियम
सहित प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं. इसके साथ ही 1100 किमी सीमा समुद्र से लगती है जो
समुद्री संसाधनों और व्यापार की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. बलूचिस्तान के
साथ पाकिस्तान के भेदभाव को इससे ही समझा जा सकता है कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत
होने के बाद भी बलूचिस्तान सबसे कम जनसंख्या वाले और सबसे गरीब प्रांतों में से एक
है. पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का 44 प्रतिशत हिस्सा होने
के बाद भी कुल जनसंख्या का मात्र 6 प्रतिशत ही बलूचिस्तान में है.
पाकिस्तान ने
बलूचिस्तान का गठन अवश्य किया मगर उसे सदैव हाशिये पर रखा गया. यहाँ के निवासियों
को सेना सहित राजनीति में अपेक्षित प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण असंतोष बना रहा. पाकिस्तान
सरकार द्वारा बलूचिस्तान की प्रांतीय परिषद को ज्यादातर बर्खास्त किये जाने के
कारण यहाँ स्वायत्तता, स्वतंत्रता, जातीय संघर्ष को बल मिला. इसका परिणाम यह हुआ
कि बलूचिस्तान में स्थानीय लोगों द्वारा बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए), बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ), बलूच रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए) जैसे संगठन बना लिए
गए. ये संगठन स्वयं को स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं जबकि पाकिस्तान द्वारा इनको आतंकवादी
संगठन बताया जाता है. इन स्थानीय संगठनों के अलावा अलकायदा, क्वेटा शूरा-ए-तालिबान, तहरीक तालिबान आदि
जैसे कई कट्टरपंथी संगठन भी यहाँ सक्रिय हो गए हैं. इन समूहों की गतिविधियों ने
संघर्ष की स्थिति को जटिल बना दिया है. यहाँ की अस्थिर रणनीतिक स्थिति और बिगड़ी
अर्थव्यवस्था ने इन संगठनों को मजहबी कट्टरता के साथ संगठित अपराधों की तरफ बढ़ाया
है.
पाकिस्तान द्वारा
बलूचिस्तान की लगातार अनदेखी करने के कारण बढ़ते असंतोष, संघर्ष और पाकिस्तान की वर्तमान
स्थिति देखकर लगता है कि जल्द ही बलूचिस्तान अपने स्वतंत्र होने की घोषणा कर सकता
है. इस तरह का अंदेशा फरवरी 2025 में पाकिस्तानी सांसद मौलाना फजलुर्रहमान ने
व्यक्त करते हुए कहा था कि उनका देश एक बार फिर से टूट सकता है. बलूचिस्तान प्रांत
के एक हिस्से में पाकिस्तान से लोग खुश नहीं हैं. ये अलग होने का फैसला लेकर एक
बार फिर 1971 जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जब पाकिस्तान टूट गया था और बांग्लादेश बना था. यद्यपि भारत द्वारा
पाकिस्तान अथवा किसी दूसरे देश की आंतरिक स्थिति में दखल न देने की कूटनीति अपनाई
जाती रही है तथापि वर्तमान सन्दर्भ में उसे निश्चित रूप रूप से ऐसे हालात पर सजग
रहने की आवश्यकता है.
12 मार्च 2024
अपने ही नागरिकों को नागरिकता देने वाला कानून
चार वर्ष से अधिक
की प्रतीक्षा के पश्चात् अंततः नागरिक संशोधन अधिनियम को भारत के राजपत्र में
अधिसूचित कर दिया गया. दिसम्बर 2019 में यह अधिनियम संसद के दोनों सदनों में पारित
हुआ था. अब इसे अधिसूचित किये जाने के बाद इस अधिनियम के क्रियान्वयन का मार्ग
प्रशस्त हो गया है. इस कानून के लागू हो जाने से भारत के तीन पड़ोसी
देशों-पाकिस्तान,
बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिल सकेगी.
संसद के दोनों सदनों से पारित इस अधिनियम के द्वारा अफगानिस्तान , बांग्लादेश और पाकिस्तान से प्रताड़ित धार्मिक
अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता का त्वरित मार्ग प्रदान करके के लिए नागरिकता
अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया था. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता
सम्बन्धी नियमों में परिवर्तन किये गए.
देश की स्वतंत्रता
के बाद जब 26 जनवरी 1950 को यहाँ का संविधान लागू हुआ तो भारत में जन्म लेने वाले
नागरिकों को यहाँ की नागरिकता स्वतः ही मिल गई थी. इसके पश्चात् 1955 में नागरिकता
कानून बनाकर उन सभी नागरिकों को भारत की नागरिकता प्रदान की गई जो पूर्व-रियासतों
के नागरिक रहे थे. इस कानून में समय-समय पर परिवर्तन भी किये जाते रहे. ऐसा करने
के पीछे कारण गोवा,
दमन-दीव, पुडुचेरी की भौगौलिक स्थितियों में आये परिवर्तन
रहे थे. दरअसल पाकिस्तान और बांग्लादेश से भूमि विवाद सुलझाने के कारण से इन
क्षेत्रों में रहने वाले निवासियों को भारत की नागरिकता देने के लिए ये संशोधन
किये गए थे. भूमि विवाद के साथ-साथ इन पड़ोसी देशों में धार्मिक विवाद भी लगातार
देखने को मिल रहे थे. इससे शायद ही कोई इंकार करे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में वहाँ के अल्पसंख्यक
नागरिकों-हिन्दू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी आदि को लगातार अमानवीय
व्यवहार, उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है. पाकिस्तान में
धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा, संरक्षण के लिए
नेहरू-लियाकत समझौता भी इसी कारण से धरातल पर लाया गया था. कालांतर में उसका
अनुपालन असल हो गया.
ये एक विचारणीय
स्थिति है कि देश के विभाजन के पूर्व इन तीनों पड़ोसी देशों के ये अल्पसंख्यक
नागरिक इसी भारत देश के नागरिक थे, यही इनकी भी मातृभूमि थी. ऐसी स्थिति जबकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के
संरक्षण के लिए किये गए समझौते का अनुपालन करना संभव नहीं हो रहा था तो भारत की
संवैधानिक जिम्मेवारी बनती थी कि वह इन प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान
करे. लगातार मिलते उत्पीड़न, शोषण के कारण इन देशों के
अल्पसंख्यक नागरिक लगातार अपनी मातृभूमि-भारत की तरफ एक आशा की दृष्टि के साथ दौड़
पड़ते हैं. पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के ऐसे
हजारों नागरिक अवैध प्रवासी के रूप में भारत में रह रहे हैं. मानवीयता के आधार पर
भले ही उनकी सहायता की जा सके मगर देश की कोई भी सरकार,
राज्यों की सरकारें चाह कर भी संवैधानिक रूप से उनकी सहायता नहीं कर पा रही थीं. ये
तीनों देश भी अपने देश में अपने अल्पसंख्यक नागरिकों की सहायता करने में असमर्थ ही
नजर आ रहे थे. ऐसे में भारत सरकार ने अपना दायित्व समझते हुए नागरिकता संशोधन
अधिनियम को दोनों सदनों में पारित करवाया और उसकी विस्तीर्ण नियमावली को अधिसूचित
कर दिया. यह अधिनियम इन तीनों देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों को देश की नागरिकता
लेने की सुविधा प्रदान करता है किन्तु वह इन्हीं तीनों पडोसी देशों के मुस्लिम
नागरिकों को भारत की नागरिकता लेने की सुविधा प्रदान नहीं करता है.
देखा जाये तो भारत
सरकार की तरफ से यह एक महत्त्वपूर्ण कदम का उठाया जाना है. इस अधिनियम से देश के
किसी भी अल्पसंख्यक और मुस्लिम की नागरिकता पर किसी तरह का संकट नहीं खड़ा होता है, जैसा कि पूर्व में अनेक विपक्षी
राजनैतिक दलों द्वारा कहा जाता रहा है. अनेक राजनैतिक दलों के साथ-साथ अनेक
मुस्लिम संगठनों ने इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात् इसका जबरदस्त विरोध किया
था. शाहीन बाग़ में एक लम्बी अवधि तक चला विरोध प्रदर्शन इसका उदाहरण है. यहाँ
स्पष्ट रूप से समझने वाली बात है कि यह अधिनियम देश के किसी भी व्यक्ति, वह चाहे किसी भी धर्म का हो, की नागरिकता को खतरे
में नहीं डालता है न ही उसका हनन करता है. यह अधिनियम उन वंचितों को, धार्मिक
अल्पसंख्यकों को कानूनी अधिकार देता है जो पाकिस्तान,
बांग्लादेश, अफगानिस्तान में प्रताड़ित होकर भारत में
शरणार्थी की स्थिति में हैं. नागरिकता अधिनियम में नागरिकता के प्रावधान के
सन्दर्भ में आवेदक को पिछले 12 महीनों के दौरान और पिछले 14 वर्षों में से आखिरी वर्ष
में 11 महीने भारत में रहना चाहिए. कानून में हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई जो तीन
देशों-अफगानिस्तान, बांग्लादेश
और पाकिस्तान से सम्बंधित हैं, उनके लिए 11 वर्ष की जगह 6 वर्ष तक का समय निर्धारित किया गया है. कानून में
यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी नियम का उल्लंघन किया जाता है तो ओवरसीज सिटीजन
ऑफ इंडिया कार्डधारकों का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है.
भारत सरकार द्वारा
कहीं न कहीं, किसी न
किसी रूप में अपने ही उन नागरिकों को संरक्षण, सुरक्षा
प्रदान किये जाने का प्रावधान किया है जो आज़ादी के समय तत्कालीन स्थितियों के चलते
अनचाहे ही किसी दूसरे देश के नागरिक बन गए थे और उन देशों में वे धार्मिक आधार पर
अल्पसंख्यक भी थे, प्रताड़ित भी थे. इस तरह के कदम के लिए
देशव्यापी समर्थन, सहयोग मिलना चाहिए था मगर कतिपय राजनैतिक स्वार्थ के चलते इस
अधिनियम का अतार्किक विरोध किया गया. अब जबकि इस अधिनियम को अधिसूचित कर दिया गया
है, राज्यों का अनापेक्षित हस्तक्षेप न रहे इसके लिए
केन्द्रीय पोर्टल की व्यवस्था की गई है, तब सभी को अपने ही
पूर्व-नागरिकों का स्वागत, सम्मान करना चाहिए जो अभी तक अपने
ही देश में शरणार्थी की तरह रहने को विवश थे.
03 फ़रवरी 2024
सैन्य हाथों में पाकिस्तानी लोकतंत्र
भारत के पड़ोसी देश
पाकिस्तान में इसी आठ फरवरी को आम चुनाव होने हैं. इमरान खान जेल में बंद
होने के कारण भले ही चुनाव मैदान से बाहर हैं मगर चुनावी लड़ाई उनके और नवाज़ शरीफ़
के बीच ही है. वैश्विक स्तर पर अनेक देशों की नजरें इस चुनाव पर लगी हैं. अमेरिका के
विदेश विभाग ने बयान जारी करते हुए कहा है कि वे पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की आजादी,
विधायी अधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिंतित
हैं. पाकिस्तानी जनता को अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल कर भविष्य के नेता को चुनने
का अधिकार होना चाहिए. यह बयान ऐसे समय में आया है जबकि पाकिस्तानी सेना पर आरोप
लगाया जा रहा है कि वह पाकिस्तानी लोकतंत्र को निरंकुश तरीके से प्रभावित कर रही
है. पाकिस्तान की एक वरिष्ठ पत्रकार मलीहा लोधी, जो राजनयिक भी रह चुकी हैं, ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि पाकिस्तान के वर्तमान
सैन्य प्रतिष्ठान का मुख्य ध्येय यह सुनिश्चित करना है कि इमरान खान प्रधानमंत्री न
बनने पाएँ. इसी तरह की बात अमेरिकी समाचार-पत्र द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट
में है. उसका कहना है कि पाकिस्तान में राजनेताओं पर हो रही कार्रवाई साफ दिखाई
दे रही है और इन्हीं वजहों से पाकिस्तान के चुनाव की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में
है. पाकिस्तानी सेना का चुनाव में दखल है और पीटीआई के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है.
किसी न किसी रूप
में सेना के नियंत्रण में चलता 2024 का चुनाव वैसा ही नजर आ रहा है जैसा कि 2018 का
आम चुनाव था, बस राजनीतिज्ञों की स्थिति बदल गई है. 2018 का चुनाव नवाज़ शरीफ़ के बगैर हुआ था और 2024 का
चुनाव इमरान खान के बिना हो रहा है. उस चुनाव में नवाज़ शरीफ़ भ्रष्टाचार के मामले में
सजा मिलने के कारण जेल में थे और चुनाव नहीं लड़ सके थे. इस बार ऐसी स्थिति में
इमरान खान हैं. उनको और उनकी पत्नी भ्रष्टाचार के एक मामले में चौदह साल की सजा मिलने
पर जेल में हैं. इसी तरह सरकारी गुप्त भेद जाहिर करने के एक अन्य मामले में इमरान खान
को पहले ही दस वर्ष की कैद सुनाई जा चुकी है. ऐसा आरोप लगातार लगता रहा है कि 2018
में नवाज़ शरीफ़ के और अब 2024 में इमरान खान के जेल जाने में पाकिस्तानी सेना का
हाथ रहा है. 1999 में नवाज़
शरीफ़ के कार्यकाल में सैन्य तख़्तापलट हुआ था. उनके तीसरे कार्यकाल, वर्ष 2013 में भी उनके और सेना के बीच मतभेद खुलकर
सामने आये थे, जिसके परिणामस्वरूप नवाज़ शरीफ़ सत्ता से बाहर हो गए थे. अभी कुछ महीने
पहले ही उनको सभी आरोपों से बरी कर दिया गया और उनके चुनाव लड़ने पर लगी आजीवन रोक
को भी असंवैधानिक बताया गया.
कुछ इसी तरह की
कहानी इमरान खान की भी है. 2018 में उनकी छवि पाकिस्तान का भविष्य बदलने वाले नेता के रूप में बन रही थी.
इमरान खान अपने भाषणों में वंशवाद की राजनीति को ख़त्म करने, भ्रष्ट नेताओं को जेल में डालने, न्यायपालिका में बदलाव करने और युवाओं को नौकरी
देने की बात कर रहे थे. उस समय उनके विरोधियों द्वारा आरोप लगाया जा रहा था कि वे
सेना के हाथों की कठपुतली बने हुए है. ऐसा माना भी जाता है कि सेना के प्रभाव और
हस्तक्षेप के चलते इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन सके थे. कालांतर में इमरान
के कार्यकाल में पाकिस्तान में आर्थिक हालात ख़राब हुए, मँहगाई बढ़ी, दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कमी होने लगी, मीडिया पर पाबंदी लगाई गई, कई विपक्षी नेता जेल
भेजे गए. इन घटनाओं ने जहाँ इमरान खान की लोकप्रियता में कमी की वहीं सेना के साथ भी
उनके सम्बन्धों में कड़वाहट पैदा की.
नवम्बर 2022 में पूर्व सेनाध्यक्ष
जनरल बाजवा द्वारा अपने चहेते लेफ्टिनेंट जनरल असीम मुनीर को नया सेनाध्यक्ष बनवाया
गया. नए सेनाध्यक्ष का पद सँभालने के बाद जनरल मुनीर ने लगातार यही प्रयास किया कि
सबसे पहले उन व्यक्तियों पर कार्यवाही का चाबुक चलाया जाए जो किसी भी रूप में इमरान
खान का नज़दीकी रहा हो अथवा उनकी सरकार का सक्रिय मददगार रहा हो. इसके पीछे इमरान खान
और जनरल मुनीर के बीच की व्यक्तिगत दुश्मनी मानी जा रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री
रहते हुए इमरान खान ने ही अड़ंगा लगाते हुए मुनीर की नियुक्ति आईएसआई महानिदेशक के
रूप में नहीं होने दी थी. इसका बदला मुनीर ने इस रूप में लिया कि इमरान खान को हटाये
जाने के बाद वे पहले आईएसआई मुखिया बने उसके बाद सेनाध्यक्ष भी बने. व्यक्तिगत
खुन्नस के चलते ही इमरान खान अनेक मुक़दमे झेलते हुए जेल में बंद हैं.
यह पाकिस्तानी
लोकतंत्र की विडम्बना है कि वहाँ की राजनीति, सत्ता कभी भी सेना से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं
बना सकी है. इन चुनावों में वहाँ की आंतरिक समस्याओं, राजनीतिक पार्टियों के अपने विरोधाभासों
के कारण भले ही भारत विरोधी बयान सामने न आये हों; भले ही इमरान
खान ने प्रधानमंत्री के रूप में कई बार भारत के साथ बातचीत से मुद्दे सुलझाने पर जोर
दिया; भले ही नवाज़ शरीफ़ भारत के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने का वादा करते आये हैं मगर
अंतिम कदम वहाँ की सेना के मंशानुरूप ही उठाना पड़ता है. ऐसे में पाकिस्तान के इन
चुनावों में परिणाम कुछ भी रहें, सत्ता में कोई भी पार्टी
आये, प्रधानमंत्री कोई भी बने मगर भारत के साथ सम्बन्ध वही
चिर-परिचित रूप में ही रहेंगे क्योंकि जनरल मुनीर की मानसिकता भारत से इत्तेफाक
रखने वाली नहीं है.
30 जनवरी 2023
पाकिस्तान के आर्थिक संकट पर भारत को सजग रहने की आवश्यकता
भारत का पड़ोसी देश
पाकिस्तान वर्तमान में अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है. वहाँ की आर्थिक स्थिति
एकदम खस्ताहाल हो चुकी है. बढ़ते कर्ज, बढ़ती मँहगाई, घटता विदेशी मुद्रा भंडार, घटती
जीडीपी आदि के चलते पिछले एक साल में पाकिस्तान की हालत बदतर हुई है. रोजमर्रा की
वस्तुओं के दामों में जबरदस्त वृद्धि देखने को मिल रही है. लोगों के लिए आटा-दाल की
व्यवस्था करना भी दुष्कर हो रहा है. दूध, प्याज, नमक आदि जैसे जरूरी सामान भी इतने मँहगे हो गए हैं कि लोगों के लिए इनको
खरीदना कठिन हो रहा है.
पाकिस्तान के
विदेशी मुद्रा भंडार में 6.7 बिलियन
अमेरिकी डॉलर की गिरावट आई है, जो फरवरी 2014 के बाद सबसे निचले स्तर पर है. इसमें मात्र
4.3 अरब डॉलर बचे हैं जबकि वाणिज्यिक बैंकों के पास 5.8
अरब डॉलर हैं. इस प्रकार पाकिस्तान के पास कुल 10.1 अरब डॉलर ही हैं, जो आयात बिल के भुगतान हेतु पर्याप्त नहीं हैं. ऐसा
अनुमान लगाया जा रहा है कि उसके पास केवल तीन सप्ताह के भुगतान हेतु ही विदेशी
मुद्रा शेष है. इस कमी के चलते पाकिस्तान खाना पकाने के तेल जैसे जरूरी सामानों का
आयात भी नहीं कर पा रहा है. विदेशी मुद्रा की कमी के कारण भुगतान न होने से बंदरगाहों
पर बहुत सारा आवश्यक सामान अटका पड़ा है.
पाकिस्तान की
आंतरिक दशाएँ भी उसके बिगड़ते हालात के लिए उत्तरदायी हैं. वहाँ की राजनैतिक
स्थितियाँ किसी से छिपी नहीं हैं, रही सही कसर वर्ष 2022 में आई भीषण बाढ़ ने पूरी कर दी.
वर्ष 2022 में जून से अक्टूबर के बीच एक तिहाई पाकिस्तान
बाढ़ की चपेट में था. इससे करीब साढ़े तीन करोड़ लोग प्रभावित हुए थे. अभी भी 80
लाख लोग विस्थापित स्थिति में हैं, 1700 से
ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, 22 लाख
से ज्यादा घर तबाह हो गए हैं, स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गई हैं,
इसके साथ-साथ दूसरी बुनियादी सेवाएँ भी ध्वस्त हो गई हैं.
आर्थिक स्थितियों
की नकारात्मकता का असर केवल पाकिस्तान पर ही नहीं हो रहा है बल्कि प्रत्यक्ष और
अप्रत्यक्ष रूप से इसका असर भारत पर भी पड़ रहा है. आर्थिक तंगहाली का, मुद्रा अवमूल्यन का, बढ़ती मँहगाई का असर पाकिस्तान की तमाम कम्पनियों पर तो पड़ा ही है, उसके साथ-साथ वे कम्पनियाँ भी नकारात्मकता का शिकार हुई हैं जो भारत से सम्बंधित
हैं. बहुतायत कम्पनियाँ घाटे में चल रही है. जिंदल और टाटा पर भी इसका सर्वाधिक
प्रभाव देखने को मिल रहा है. पीटीआई के अनुसार जिंदल ग्रुप का पाकिस्तान में अच्छा खासा व्यापार है. यह
ग्रुप स्टील इंडस्ट्री के अलावा एनर्जी सेक्टर में भी सक्रिय है. यदि पाकिस्तान की
आर्थिक गतिविधि के कारण वहाँ के व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर संकट आता है तो इस
कंपनी पर भी वैसा ही असर पड़ेगा. इसी तरह पाकिस्तान के आर्थिक विकास में टाटा ग्रुप टेक्सटाइल मिल्स लिमिटेड का
बहुत ज्यादा योगदान है. वहाँ की नकारात्मकता का असर इस कम्पनी पर भी देखने को मिल
सकता है.
पाकिस्तान में
भारतीय कम्पनियों पर होने वाले नकारात्मक प्रभाव के अलावा वहाँ के आर्थिक संकट का
असर भारत से पाकिस्तान भेजे जाने वाले सामानों पर भी हो रहा है. ट्रेडिंग
इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट के अनुसार कर्ज में डूबे पाकिस्तान ने साल 2021 में भारत से लगभग 503 मिलियन डॉलर का आयात किया था. इस दौरान भारत से
फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स, ऑर्गेनिक
केमिकल्स, चीनी, कॉफी-चाय, एल्युमिनियम, प्लास्टिक के सामान पाकिस्तान भेजे गए. यदि इस वर्ष
के आँकड़े देखें तो पाकिस्तान में करीब 8 मिलियन डॉलर की कॉफी-चाय, लगभग 190 मिलियन डॉलर के
फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स, 141 मिलियन डॉलर के ऑर्गेनिक केमिकल्स, 119 मिलियन डॉलर की चीनी सहित अनेक दूसरे सामान भेजे गए.
पाकिस्तान की बिगडती आर्थिक दशा से इन सामानों से जुड़ी भारतीय कम्पनियों का
कारोबार भी प्रभावित होगा और इनको वित्तीय घाटा उठाना पड़ सकता है. शत्रु संपत्ति विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार
भारत में 577 ऐसी कम्पनियाँ हैं
जिनमें पाकिस्तानियों का धन लगा है. इसमें से 266 कम्पनियाँ इंडियन स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं, वहीं 318 कम्पनी सूचीबद्ध नहीं हैं. ऐसा अनुमान है कि
भारत की इन कम्पनियों में पाकिस्तानी नागरिकों के लगभग 400 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी है. इनमें बिरला, टाटा, फार्मा कंपनी सिप्ला, विप्रो, डालमिया समेत कई प्रमुख व्यापारिक प्रतिष्ठान शामिल हैं. ऐसे में अगर
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था दीवालिया होने की स्थिति में पहुँचती है तो इन कम्पनियों
पर भी उसका सीधा असर देखने को मिल सकता है.
भारत को पाकिस्तान
के आर्थिक संकट को लेकर सावधान होने की आवश्यकता है. एशियाई देशों में बांग्लादेश, श्रीलंका के बाद पाकिस्तान तीसरा
देश है जहाँ आर्थिक संकट देखने को मिल रहा है. मँहगाई का असर भारत में भी देखने को
मिल रहा है किन्तु यहाँ स्थिति नियंत्रण में है. इसके बाद भी पडोसी देश होने के
नाते, एशियाई क्षेत्र में सक्षम देश होने के नाते भारत को एक
जिम्मेवार देश के रूप में भी देखा जाता है. ऐसे में उसी तरफ से सहायता की उम्मीद भी
रहेगी. इस सहायता की उम्मीद के बीच भारत को अपनी स्थिति को मजबूत बनाये रखना होगा.
संभव है कि आर्थिक रूप से कमजोर पाकिस्तान में चीन की घुसपैठ बढ़े. नेपाल की सरकार
को प्रो-चीन माना ही जा रहा है, ऐसे में पाकिस्तान को सहायता की आड़ में भारत के
लिए चीन और नेपाल चुनौती खड़ी कर सकते हैं. पाकिस्तान को मदद के नाम पर चीन भारत के
खिलाफ रणनीति बना सकता है. अपने व्यापारिक और सामरिक लाभ के लिए वह पाकिस्तानी
क्षेत्र का उपयोग भी कर सकता है. भारत के एक और पड़ोसी देश अफगानिस्तान में इस समय
नागरिक अधिकार हनन करने वाली सरकार है. यदि पाकिस्तान को उसकी तरफ से मदद मिलती है
तो संभव है कि सीमा पार से संचालित आतंकवाद भारत के लिए मुसीबत बन जाए.
निश्चित ही
पाकिस्तान का आर्थिक संकट हाल फ़िलहाल समाप्त होता नहीं दिख रहा है. ऐसे में भारत
को उसकी दशा पर और उसके कदमों पर सजग निगाह रखने की आवश्यकता है. पाकिस्तान को मदद
के नाम पर भारत विरोधी मानसिकता वाले देशों द्वारा यदि वहाँ अपने कदम जमा लिए गए
तो निकट भविष्य में यह भारत के लिए कष्टकारी हो सकता है.
16 दिसंबर 2020
विजय दिवस की गर्वीली अनुभूति
भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों की जब भी चर्चा होती है तो प्रत्येक देशवासी के मन में यही भावना रहती है कि देश पाकिस्तान से सदैव आगे ही आगे रहे. खेल के मैदान से लेकर राजनीति के अखाड़े तक कहीं भी पाकिस्तान को आगे बढ़ते देख पाना देशवासियों के लिए संभव नहीं होता है. एकाधिक अवसरों पर देखा गया है जबकि पाकिस्तान पर विजय का उल्लास कई-कई दिनों तक बना रहा. जीत की ख़ुशी में जश्न लम्बे समय तक चलते रहे. जब खेल के मैदान की यह स्थिति होती है तो सोचा जा सकता है हमारे सैनिकों, हमारी सेना द्वारा उसको युद्ध में हराये जाने का जश्न कितना-कितना लम्बा और गौरवान्वित करने वाला रहा होगा. सन 1971 के युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर जीत का जश्न आज भी पूरा देश विजय दिवस के रूप में मनाता है. विजय दिवस प्रति वर्ष 16 दिसम्बर को मनाया जाता है. इस युद्ध का अंत पाकिस्तानी सेना के 93,000 सैनिकों के आत्मसमर्पण के द्वारा हुआ था. इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान आजाद हुआ जो आज बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. इस युद्ध में लगभग 3900 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे.
इस
युद्ध की पृष्ठभूमि वर्ष 1971 के शुरू होते ही बनने लगी थी.
पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ां ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान को सैनिक ताकत कब्जे में कर लिया. शेख़ मुजीब को गिरफ़्तार
कर लिया गया. वहाँ पर सैनिकों के अत्याचारों के चलते वहां से शरणार्थी लगातार भारत
आने लगे. ऐसा होने पर वैश्विक समुदाय की तरफ से भारत पर यह दबाव पड़ने लगा कि वह वहां
पर सेना के जरिए हस्तक्षेप करे. इस सम्बन्ध में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी
ने थलसेनाध्यक्ष जनरल मानेक शॉ से विचार-विमर्श किया. तब की प्राकृतिक स्थिति के चलते
भारतीय सेना लगातार युद्ध करने में सक्षम नहीं समझ आ रही थी. ऐसे में मानेक शॉ ने इंदिरा
गांधी से स्पष्ट कहा कि वे पूरी तैयारी के साथ ही युद्ध के मैदान में उतरना चाहते हैं.
असल में इंदिरा गाँधी उसी समय अप्रैल में ही हमला करना चाहती थीं.
दिसंबर 1971 में एक शाम पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने भारतीय वायुसीमा को पार करके पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए. इंदिरा गांधी ने मंत्रिमंडल की आपात बैठक की और भारतीय सेना हमले के लिए तैयार हो गई. युद्ध शुरू होने के बाद 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं. उसी दौरान ही भारतीय सेना के मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी.
भारतीय सेना लगातार आगे बढ़ती जा रही थी.
पाकिस्तानी जनरल जैकब की हालत बिगड़ रही थी. भारतीय सेना ने युद्ध पर पूरी तरह से अपनी
पकड़ बना ली थी. 16 दिसंबर की सुबह मानेकशॉ का संदेश जनरल जैकब
को मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुंचें. शाम के साढ़े चार बजे
जनरल अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे. पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी
बलों के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल ए०ए०के० नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट
जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. दोनों ने आत्मसमर्पण के दस्तावेज़
पर हस्ताक्षर किए. नियाज़ी ने अपनी वर्दी से अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल
अरोड़ा के हवाले कर दिया. उस समय नियाज़ी की आंखों में आंसू आ गए थे. सम्पूर्ण घटनाक्रम
वहाँ के स्थानीय नागरिकों के संज्ञान में भी था. वे लोग नियाजी की हत्या़ पर उतारू
थे. भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी को सुरक्षित रूप से बाहर निकाला. जिसके
बाद 17 दिसम्बर को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों
को युद्धबंदी बनाया गया.
जब पाकिस्तान पर विजय की खबर जनरल मानेक शॉ ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को दी तो उनकी घोषणा के बाद पूरा देश जश्न में डूब गया. इस ऐतिहासिक जीत को खुशी आज भी हर देशवासी के मन को उमंग से भर देती है.
01 मार्च 2020
स्थितियाँ बदली नहीं हैं एक साल बाद भी
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