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17 सितंबर 2025

हमारा लेखन और बाबा जी की सीख

 कुछ सीखें, बातें ज़िन्दगी भर काम आती हैं. ऐसा कुछ है हमारे साथ बाबा जी की बातों को लेकर. उनका अपने साथ सुबह की सैर पर हम तीनों भाइयों को ले जाना और पूरे रास्ते किसी न किसी कहानी, किसी न किसी दृष्टान्त के माध्यम से जीवन की सच्चाई को समझाना, जीवन में आने वाली समस्याओं से निपटने की सलाह देना. 


अपने बाबा जी के साथ अक्सर अपने लेखन सम्बन्धी चर्चा कर लिया करते थे. बचपने का अपरिपक्व लेखन बाबा जी की अनुभवी आँखों के सामने से गुजरता रहता, इसी कारण वे लेखन की गम्भीरता को देख भी रहे थे. सुबह की अपनी यात्रा के दौरान एक दिन बाबा जी ने हमारे लिखे किसी लेख की चर्चा करते हुए उस लेख के एकदम विपरीत बिन्दुओं पर विमर्श शुरू किया. बाबा जी के कुछ प्रश्नों का उत्तर तो हम दे सके, कुछ में अटक गए. ऐसे में बाबा जी ने हमारे लेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम लिखने लगे हो, ऐसे में किसी भी मुद्दे को, विषय को दोनों पक्षों की तरफ से देखो. जरूरी नहीं कि दोनों पक्षों को शामिल करते हुए लिखा जाये मगर दिमाग में दोनों पक्ष रहने चाहिए. 


इसके अलावा और भी बहुत सी बातें बाबा जी द्वारा लेखन के सम्बन्ध में बताई गईं, जो आज भी हमारे लिए मार्गदर्शन का काम करती हैं. बचपने से पड़ी लेखन की आदत आज भी बनी हुई है, बाबा जी द्वारा दोनों पक्षों को विचार करने की बात आज भी कंठस्थ है और इसी का परिणाम है कि किसी भी मुद्दे पर, किसी भी विषय पर बाल की खाल निकालने की हद तक चले जाते हैं. 


आज हमारे बाबा जी की पुण्यतिथि है. उनको सादर चरण स्पर्श... सादर श्रद्धांजलि. 




16 जुलाई 2024

जहाँ रहो खुश रहो, सुखी रहो

आज की तारीख वैसे तो खुश होने की है मगर चाह कर भी खुश नहीं हो पाते हैं. ऐसा नहीं कि खुश रहना नहीं आता या फिर ख़ुशी ने अपना रास्ता बदल लिया है. इस तारीख को अब चाह कर भी खुश न रह पाने का कारण इसी तारीख वाले छोटे भाई से सम्बंधित है. आज छोटे भाई मिंटू का जन्मदिन है. जब उसका जन्म हुआ तब हमारी उम्र ने पूरी तरह से छह वर्ष की संख्या को छुआ नहीं था, इसके बाद भी उसके जन्म के समय की बहुत सारी घटनाएँ आज भी दिल-दिमाग में जीवित हैं.

 



जुलाई का महीना था और उस समय लोग आज की तरह कमरे में बंद रहकर, कूलर-एसी को अपनी आदत बनाकर नहीं सोते थे. सही कह रहे हैं, आखिर वो समय 1979 का था. उस समय सीलिंग फैन ही जबरदस्त हवा दिया करता था. रात में अनिवार्य रूप से छत पर सोने का उपक्रम हुआ करता था. उस रात भी हम लोग छत पर हँसते-गुनगुनाते सोने की तैयारी में लगे थे जबकि मिंटू के आने की खुशखबरी घर में आई.

 

बहरहाल, आज मिंटू के जन्मदिन को ख़ुशी से मना भी नहीं पा रहे हैं. जैसे ही खुश होने के विचार सामने आता है, जन्मदिन मनाने का भाव जगता है वैसे ही आँखों से आँसुओं की धार स्वतः चलने लगती है. आखिर आज मिंटू होते तो 45 का आँकड़ा छू लिया होता. आज से तीन वर्ष पहले मिंटू की शारीरिक उपस्थिति हम लोगों के बीच शून्य में विलीन हो गई. उस दिन से उसका जन्मदिन मनाया जाता है मगर आँखों आँखों में, आँसुओं में, अकेले में.