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25 मई 2025

सरकार की प्रतिबद्धता से मिटेगा नक्सलवाद

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्टको अभी तक देश में चलाये गए नक्सल विरोधी अभियानों में सबसे बड़ा और सफल अभियान माना जा रहा है. 21 दिनों तक चले सबसे बड़े नक्सल विरोधी अभियान में सुरक्षा बलों ने छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर नक्सलवाद के विरुद्ध बड़ी सफलता प्राप्त की. 21 अप्रैल से 11 मई 2025 तक संचालित ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट को नक्सली समूहों के गढ़ तथा रणनीतिक रूप से संवेदनशील माने जाने वाले कर्रेगुट्टालु पहाड़ी क्षेत्र में चलाया गया. इस अभियान में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), विशेष कार्य बल (एसटीएफ), जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) और राज्य पुलिस बलों का संयुक्त प्रयास सुखद परिणाम तक पहुँचा. इनके सकारात्मक-समन्वित सहयोग के परिणामस्वरूप 31 माओवादियों को मार गिराया. अभियान सञ्चालन के दौरान मिली कामयाबियों के साथ-साथ अभियान पूरा होने के बाद भी नक्सलवाद के मिटने के संकेत मिलते रहे. ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट के पूरा होने के बाद छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में 54 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 84 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया.

 



इसी तरह छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों ने बीजापुर-नारायणपुर सीमा पर एक मुठभेड़ में 27 खूँखार माओवादियों को मार गिराया. मारे जाने वालों में सीपीआई-माओवादी का महासचिव, शीर्ष नेता और नक्सल आंदोलन की रीढ़ नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू भी शामिल है. बसवराजू के मारे जाने को सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है क्योंकि विगत कई दशकों में यह पहला अवसर है जबकि नक्सलियों का महासचिव स्तर का कोई नेता मारा गया. बसवराजू देश में प्रमुख माओवादी हमलों का मास्टरमाइंड रहा. 2003 के अलीपीरी बम हमले में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. आतंकी हमलों का सबसे घातक हमला इसी के निर्देशन में हुआ था जबकि 2010 में दंतेवाड़ा में किये गए हमले में 76 सीआरपीएफ कर्मी मारे गए. इसके अलावा आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की हत्या का प्रयास भी इसके द्वारा किया गया था. बसवराजू की मौत सीपीआई (माओवादी) के लिए बहुत बड़ी क्षति है साथ ही नक्सली आन्दोलन के लिए सामरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत बड़ा झटका है.

 

दरअसल नक्सलवाद को एक तरह के वामपंथी उग्रवाद के रूप में भी देखा जाता है. यह हमारे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी और गम्भीर चुनौतियों में से एक है. पश्चिम बंगाल में 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से उत्पन्न यह आंदोलन हिंसात्मक रूप लेकर सामानांतर शासन-सत्ता के रूप में फ़ैल गया. इसने केरल, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को अपनी हिंसात्मक गिरफ्त में ले लिया. नक्सलियों ने इन राज्यों के सुदूरवर्ती, अविकसित और जनजातीय-बहुल क्षेत्रों को अपने कब्जे में लेकर अपनी गतिविधियों को संचालित करने का काम किया. ये लोग भले ही हाशिए के लोगों, जनजातीय समुदायों के हितार्थ लड़ने का दावा करते हों किन्तु उनके द्वारा सशस्त्र हिंसा, जबरन वसूली, बुनियादी ढाँचे को नष्ट करना किया जाने लगा. इस तरह की गतिविधियों का उद्देश्य सशस्त्र विद्रोह करते हुए लोकतांत्रिक संस्थानों को निशाना बनाना तथा अपनी शासन-सत्ता को स्थापित करते हुए भारतीय राज्य व्यवस्था को कमजोर करना है.

 

विगत कुछ समय से केन्द्र सरकार की सुरक्षा, अखंडता, समावेशी विकास, सहभागिता, सामुदायिकता आदि की नीति के चलते अनेकानेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. इसी क्रम में केन्द्र सरकार द्वारा नक्सलवाद समाप्ति के लिए सतत प्रयास किये जा रहे हैं. सरकार ने स्पष्ट रूप से देखा और समझा कि नक्सलवाद के कारण सुदूरवर्ती और जनजातीय क्षेत्रों में विकास अवरोधित है. इसके चलते ये क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बैंकिंग, मूलभूत ढाँचा आदि से अछूते हैं. ऐसे में केन्द्र सरकार ने प्रतिबद्ध होकर 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह से समाप्त करने की रणनीति बनायी है. इसके लिए गृह मंत्रालय की समग्र रूपरेखा ‘समाधान – SAMADHAN’ को निम्न घटकों के अन्तर्गत क्रियान्वित किया जाना है.

S Smart leadership (कुशल नेतृत्व)

A Aggressive strategy (आक्रामक रणनीति)

M Motivation & Training (अभिप्रेरणा एवं प्रशिक्षण)

A Actionable Intelligence (अभियोज्य गुप्तचर व्यवस्था)

D Dashboard based Key performance indicators and key result area (कार्ययोजना आधारित प्रदर्शन सूचकांक एवं परिणामोन्मुखी क्षेत्र)

H Harnessing Technology (कारगर प्रौद्योगिकी)  

A - Action Plan for each threat (प्रत्येक रणनीति की कार्ययोजना)

N No access to financing (नक्सलियों के वित्त-पोषण को विफल करने की रणनीति)

 



सरकार की ठोस एवं स्पष्ट नीतियों के कारण नक्सलवाद को पर्याप्त क्षति पहुँची है. इससे नक्सल प्रभावित अनेक जिले राष्ट्र की मुख्यधारा में फिर शामिल हो सके हैं. नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या अप्रैल 2024 में 38 रह गई. ऐसे जिले जो पूर्णतः नक्सलवाद की चपेट में थे, उनकी संख्या 12 से घटकर 6 रह गई. इनमें छत्तीसगढ़ के चार जिले-बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और सुकमा; झारखंड का एक-पश्चिमी सिंहभूमि और महाराष्ट्र का एक जिला-गढ़चिरौली शामिल है. वर्ष 2016 में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए आरम्भ की गई ‘सड़क आवश्यकता योजना’ अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल रही है. 2024 तक नक्सल प्रभावित इलाकों में लगभग बारह हजार किमी हाईवे का निर्माण और बीस हजार किमी के आसपास ग्रामीण सड़कें बनाई गईं. सड़क व्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ सरकार द्वारा पुलिस को मजबूत करने की दृष्टि से ‘विशेष अवसंरचना योजना’ द्वारा नक्सल प्रभावित राज्य के संवेदनशील जिलों में किलेबंद पुलिस स्टेशनों का निर्माण किया गया. इससे नक्सलवाद से जुड़ी हिंसा की घटनाओं में बीते वर्षों की तुलना में लगभग 80 प्रतिशत तक की कमी आई है. 2024 में इस तरह की कुल घटनाओं की संख्या 374 रह गई. इसी एक वर्ष में 290 नक्सलियों को निष्प्रभावित किया गया; 1090 गिरफ्तार किये गए और 881 ने आत्मसमर्पण किया. सुरक्षा बलों की सक्रियता के कारण नक्सली या तो मारे जा रहे हैं अथवा वे आत्मसमर्पण कर रहे हैं. इसका परिणाम यह हुआ है कि नक्सलवाद अब धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है.

 

इसमें कोई दोराय नहीं कि नक्सलवाद देश के लिए एक गम्भीर समस्या बनी हुई है. इस आन्दोलन के आरम्भ होने से लेकर आज तक नक्सलवाद आन्दोलनकारियों का प्रयोजन पूरा नहीं हुआ है. किसी समय भूमिहीन किसानों के द्वारा सामंती व्यवस्था के विरोध में शुरू हुआ आन्दोलन आज सरकार के, सुरक्षा बलों के विरुद्ध संचालित किया जाने लगा है. अपने आन्दोलन के मूल उद्देश्य से भटककर नक्सली नेताओं द्वारा सरकारी व्यवस्था के समानांतर अपनी शासन-सत्ता स्थापित की जाने लगी. वर्तमान केन्द्र सरकार देश की सुरक्षा, अखंडता के लिए खतरा बनती किसी भी स्थिति का सफाया करने के लिए दत्तचित्त होकर पूरी गम्भीरता से कार्य कर रही है. सरकार के समन्वित सैन्य और विकासात्मक दृष्टिकोण ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई को निर्णायक रूप से बदल दिया है. नक्सलवाद जैसी कई दशकों पुरानी अत्यंत गम्भीर समस्या को एक निश्चित समयावधि में पूर्णतः समाप्त करना भले असम्भव प्रतीत हो रहा हो किन्तु जिस तरह निरन्तर सतर्कता, सामुदायिक सहभागिता और राजनीतिक संकल्प के साथ ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट को अंजाम तक पहुँचाया गया उससे नक्सलवाद-मुक्त भारत का लक्ष्य सम्भव भी लगता है, पहुँच के भीतर भी लगता है.

 


30 अप्रैल 2023

नक्सली हिंसा रोकने को बने कारगर रणनीति

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने विस्फोटक के द्वारा हमला करके ग्यारह जवानों मौत की नींद सुला दिया. डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड के जवान एक ऑपरेशन को अंजाम देकर वापस लौट रहे थे, उसी समय उन पर आईईडी की सहायता से हमला किया गया. बस्तर में नक्सलियों ने इस समय टैक्टिकल काउंटर अफेंसिव कैंपेन (टीसीओसी) चला रखा है. इसके अंतर्गत नक्सली अक्सर बड़े हमले करते हैं. इस कैंपेन के चलते सेना पहले से ही वहाँ अलर्ट मोड पर है, इसके बावजूद भी नक्सली अपना हमला करने में कामयाब रहे. देश में आतंकवादक्षेत्रवादवर्ग-संघर्ष के साथ-साथ नक्सलवाद भी शासन-प्रशासन के लिए नासूर बन गया है. यह भी एक तरह का आतंकवाद बना हुआ है. समय के साथ बढ़ते शक्ति प्रदर्शन ने नक्सलवाद को हिंसात्मक बना दिया है. प्रसिद्ध नेता माओत्से तुंग की आदर्श खूनी क्रांति की उक्ति पावर कम्स आउट ऑफ़ द बैरल ऑफ़ ए गन (सत्ता बंदूक की नली से निकलती है) के पार्श्व में नक्सलवाद के बीज आरोपित होते दिखते हैं. वामपंथी विचारधारा से लैस माओत्से सदा ही आदर्श खूनी क्रांति के समर्थक रहे और यही कारण है कि किसी न किसी रूप में उनकी विचारधारा कोउनको आदर्श मानने वालों ने भी किसी न किसी तरह से खूनी क्रांति के रास्ते को अपनाना उचित समझा. 


पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी गाँव में सन् 1967 में भूमिहीनों, किसानों द्वारा एक तरह का वर्ग-संघर्ष भू-स्वामियों के विरुद्ध आरम्भ हुआ था. इस संघर्ष को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन जिला स्तरीय नेता चारू मजूमदारकानू सन्याल तथा जंगल सन्थाल ने नेतृत्व प्रदान किया. सन् 1967 में किसानोंमजदूरों और जमींदारों के बीच का वर्ग-संघर्ष एक आन्दोलन के रूप में तीव्रता पकड़ने लगा. कभी पश्चिम बंगाल के चार जिलों में फैला यह आन्दोलन लगातार अपने कार्य-प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करता रहा. आँकड़ों के अनुसार नक्सलवाद देश के बीस राज्यों के दो सौ से अधिक जिलों को अपने प्रभाव में ले चुका है. पश्चिम बंगाल से शुरू इस खूनी आन्दोलन ने छत्तीसगढ़झारखण्डआंध्रप्रदेशउड़ीसाबिहारकर्नाटकउत्तर प्रदेश आदि राज्यों में अपना प्रभाव कहीं कमकहीं ज्यादा दिखाया है. इस कारण से अनेक नक्सली संगठनों ने अलग-अलग राज्यों में न केवल अपना अस्तित्व बनाया है बल्कि वहाँ हिंसात्मक कार्यवाहियाँ अंजाम दी हैं. इन संगठनों ने शक्ति प्रदर्शन के लिए अकारण हत्याओं के साथ-साथ धन उगाहीअपहरणलूटमार जैसी घटनाओं में अपनी संलिप्तता बनाई. नक्सलवाद अब एक आन्दोलन के स्थान पर आतंकवाद अथवा सशस्त्र खूनी हिंसा के समकक्ष खड़ा हो गया है.




देखने-सुनने में यह समस्या जितनी भयावह दिखती है वास्तविकता में उससे कहीं अधिक भयावह है. आये दिन पुलिस थानों पर हमलेरेलवे स्टेशनों को जलाया जानास्कूलोंअस्पतालों को बन्द करवा देनाबारूदी सुरंग बिछानाचुनावों में हिंसा करनाबसों-ट्रेनों में बम धमाकेसरकारी अधिकारियों को मारनाविकास कार्यों में बाधा खड़ी करनाअपहरणहत्या आदि दर्शाते हैं कि नक्सली आन्दोलन अब आतंकवाद बन गया है. सामान्यतः लोगों ने नक्सली आन्दोलन को आदिवासियों द्वारा अपने हित और हक के लिए चलाया जाने वाला आन्दोलन मान रखा थायहाँ तक कि आज भी बहुत से लोग इसको हिंसात्मक आन्दोलन अथवा आतंकी घटना मानने को तैयार नहीं हैं. इसके परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए कि कैसे नक्सली बन्दूक उठाये सिर्फ और सिर्फ अपनी शक्ति दिखाने के लिए हमले कर रहे हैं. हाल के वर्षों में सैन्य बलों के साथ-साथ क्षेत्र के भोले-भाले नागरिकों की, हिंसक कार्यवाहियों में मासूम बच्चों, वृद्धों की हत्या करनाआदिवासियोंजंगलवासियों पर जबरन नक्सली आन्दोलन से जुड़ने का दवाब बनाना दर्शाता है कि जंगलवासियों की समस्या का समाधानआदिवासियों के हकों की प्राप्तिसामाजिक समरसता की चाह उनके लिए अब गौण हो चले हैं.


ऐसे में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि क्या नक्सली समस्या से निपटने का कोई उपाय नहीं हैक्या देश के एक जिले से फैलता हुआ लगभग चालीस प्रतिशत भू-भाग पर फैल चुका नक्सलवाद समूचे देश को अपनी गिरफ्त में ले लेगाजंगलवासियोंआदिवासियों के नाम पर चलाया गया आन्दोलनजमींदारों के शोषण से मुक्ति पाने के लिए चलाया गया आन्दोलनशोषितों को समाज में समानता दिलवाने के लिए प्रारम्भ हुआ आन्दोलन क्या महज स्वार्थपूर्ति में लगा रहेगासमानतासामाजिक समरसताभेदभावन्याय जैसी विशिष्ट अवधारणा को लेकर चला संघर्ष क्या हिंसाअपहरणहत्या जैसी आतंकी घटनाओं में परिवर्तित हो जायेगाइन सवालों के आलोक में सरकारी प्रयासों की तरफ भी ध्यान देना होगा. ऐसा नहीं है कि सरकार सिर्फ दमनात्मक रूप से ही नक्सली हिंसा को दबाना चाहती है. उसके द्वारा वर्ष 2013 में आजीविका योजना के तहत रोशनी नामक विशेष पहल की शुरूआत की गई थी, ताकि सर्वाधिक नक्सल प्रभावित ज़िलों में युवाओं को रोज़गार के लिये प्रशिक्षित किया जा सके. हालिया नक्सली हमले में शहीद हुए रिजर्व गार्ड के रूप में उन्हीं युवाओं को भर्ती किया जाता है जो नक्सली हिंसा छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ते हैं. इसके अलावा सरकार द्वारा सर्वाधिक नक्सल प्रभावित तीस ज़िलों में जवाहर नवोदय विद्यालय और केंद्रीय विद्यालय संचालित किये जा रहे हैं. हिंसा का रास्ता छोड़कर समर्पण करने वाले नक्सलियों के लिये सरकार पुनर्वास की भी व्यवस्था कर रही है.


इन प्रयासों के साथ ही सरकार को चाहिए कि आदिवासियों और जंगलवासियों में यह विश्वास पैदा करें कि जंगल की सम्पत्तिवन-सम्पदा उनकी अपनी हैउस पर उन्हीं का हक है. केन्द्र सरकार कोराज्य सरकारों को इस तरह के कार्य करने होगे जो विश्वास की परम्परा को बनाये रखते हुए नक्सली आन्दोलन से जुड़े लोगों को राष्ट्र कीविकास की मुख्य धारा में शामिल कर सकें. पुलिस सत्रांश सेना में नवयुवकों की भर्ती लगातार की जा रही है. इन संगठनों में भर्ती के इच्छुक युवकों को सामान्य सा पैकेज न देकर उनको पूर्ण कालिक रोजगार देकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने का अवसर देना चाहिए. सरकार और नक्सलियों के समर्थक इसे लेकर एकमत हैं कि सुलह का रास्ता बातचीत के बाद निकलता है. ऐसे सरकारी प्रयासों के बीच नक्सलियों को हिंसा का रास्ता छोड़कर वार्ता के लिए आगे आना चाहिए. इसके लिए नक्सलियों को अपना एक सर्वमान्य नेता स्वीकार करना होगा. उनको समझना होगा कि शांति का रास्ता एक व्यवस्थित मन्त्र और तन्त्र के द्वारा ही निकलता है. नक्सली समस्या का हल भले ही हिंसा से न होवार्ता से हो पर उसे भी पूर्ण संकल्प और दृढ़ता के साथ करना होगा. एक बात सरकार कोशासन कोप्रशासन कासशस्त्र बलों को और स्वयं नक्सलियों को भी समझनी होगी कि संकल्प का कोई भी विकल्प नहीं होता और प्रशासन से बढ़कर कोई भी तन्त्र नहीं होता है. 

 






 

27 अप्रैल 2023

नक्सली हमले में जवान शहीद

नक्सलियों ने एक बार फिर देश को जबरदस्त क्षति पहुँचाई है. अबकी उनके हमले में 11 जवान शहीद हुए हैं. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में 26 अप्रैल नक्सलियों ने डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के जवानों को ले जा रहे एक वाहन पर हमला कर दिया. आईईडी से किये गए इस हमले में 11 जवान शहीद हो गए. डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड यानि डीआरजी छत्तीसगढ़ पुलिस के वे स्पेशल जवान हैं, जिनको केवल नक्सलियों से लड़ने के लिये भर्ती किया जाता है. इसमें सरेंडर करने वाले नक्सली और वहीं के वातावरण में पले-बढ़े लोग शामिल होते हैं. नक्सलियों के खिलाफ सबसे बड़ी सफलता अब तक इन्हीं जवानों को मिली है. इनका शहीद होना बहुत बड़ी क्षति है.  


उच्चाधिकारियों द्वारा हमेशा की तरह रटा-रटाया बयान दिया गया है. नक्सलियों पर क्या कार्यवाही होगी, ये समय बताएगा. 








 

30 अगस्त 2018

नक्सलियों का फैलता खतरनाक जाल


पिछले दिनों पुलिस ने संदिग्ध शहरी नक्सलियों के ठिकानों पर देशभर में छापेमारी की और कइयों को गिरफ्तार किया. भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच के दौरान पुलिस ने एक पत्र बरामद किया जिसके द्वारा नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश का खुलासा हुआ. इसकी जांच करते हुए यह कार्यवाही की गई. इस छापेमारी में प्रमुख वरवर राव, गौतम नौलखा, अरुण परेरा, सुधा भारद्वाज निशाने पर रहे हैं. शहरी नक्सली के रूप में कुख्यात ये लोग पिछले कुछ दिनों से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर थे. गिरफ्तार शहरी नक्सलियों को 6 सितंबर को उच्चतम न्यायालय में होने वाली अगली सुनवाई तक घर में ही नजरबंद रखा जाएगा. यह फैसला तीन जजों की बेंच ने सुनाया. अपना फैसला सुनाते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि विरोध लोकतंत्र का सुरक्षित द्वार है. यदि आप सुरक्षित द्वार मुहैया नहीं करवाएंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएगा.


सच है, लोकतंत्र में विरोध होना चाहिए पर किस हद तक? विरोध हो मगर उसका स्वरूप भी तो निर्धारित हो. नक्सलवाद का चेहरा आज सिर्फ हिंसात्मक गतिविधियों के रूप में जाना जाता है. भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल द्वारा सन 1967 में सत्ता के खिलाफ़ शुरू हुआ सशस्त्र आंदोलन पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ, जिसे अब नक्सलवाद के नाम से जाना जाता है. वे दोनों नेता चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग से प्रभावित थे और मानते थे कि न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है. वर्तमान में नक्सलवाद सरकार के सामानांतर एक सत्ता स्थापित करने की मानसिकता से काम कर रहा है. अब उनक्सलियों द्वारा आदिवासियों की आड़ लेकर राजनैतिक संरक्षण प्राप्त किया जा रहा है जो कहीं न कहीं उन्हें सत्ता के करीब लाता है जो आज राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है. वर्तमान में देश के लगभग एक सैकड़ा जिलों में नक्सलवादियों का कब्ज़ा है. यह क्षेत्रफल लगभग 92 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है. यह देश के दस राज्यों - उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि तक फैला हुआ है.

शहरी नक्सली के रूप में चिन्हित किये गए जिन लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं, उनके समर्थन में सरकार विरोधी दल तुरंत सामने आ गए. दरअसल ऐसे लोग वे चेहरे हैं जो भले ही शैक्षिक प्रोफाइल और चेहरे से सभ्य समझ आते हों मगर ये लोग आदिवासी क्षेत्रों में जाकर लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काते हैं. वहां की विकास की परियोजनाओं में बाधा उत्पन्न करते हैं. इनका यही उद्देश्य रहता है कि पिछड़े क्षेत्रों में किसी भी तरह से विकास न होने पाए. यही पढ़े-लिखे शहरी नक्सली ग्रामीणों को सरकार के विरुद्ध उकसाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. इनके भड़काऊ बयानों और कृत्यों से ही हिंसा भड़कती है और सरकार के खिलाफ आंदोलनों की राह आसान की जाती है. शहरी नक्सलियों के समर्थन में भले ही राजनैतिक दल सरकारी कार्यवाही का विरोध कर रहे हों मगर उन्हें सोचना चाहिए कि यहाँ मामला देश के प्रधानमंत्री की सुरक्षा का है. इससे पूर्व की केद्र सरकार ने भी एक समय शहरी नक्सलियों को वनों, जंगलों, गाँवों में रह रहे नक्सलियों से अधिक खतरनाक बताया था. आज वही सरकार के इस कदम का विरोध कर रही है. हर एक कदम पर राजनैतिक लाभ लेने की मानसिकता को जब तक छोड़ा नहीं जायेगा, तब तक राष्ट्रहित की बात करना बेमानी होगा. जिस तरह से देश भर में केंद्र सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है, देश में अघोषित आपातकाल लगा बताया जा रहा है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरा लगा होना बताया जा रहा हो वह राजनैतिक दृष्टि से, सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है. हालाँकि जो लोग केंद्र सरकार का, भाजपा का, नरेन्द्र मोदी का विरोध करते-करते देश का विरोध करने लगे हों वे प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश करने वालों का विरोध क्यों करेंगे? उन्हें शहरी नक्सली शब्द भी काल्पनिक अवधारणा महसूस हो रही होगी.


28 अप्रैल 2017

गेंहू के संग घुन पिसता हो तो पिसे

फिर एक नक्सली हमला हुआ. फिर हमारे कई जवान शहीद हो गये. फिर सरकार की तरफ से कड़े शब्दों में निंदा की गई. फिर कठोर कदम उठाये जाने की बात कही गई. इस ‘फिर’ में हर बार हमारे जवान ही कुर्बान हो रहे हैं और इस ‘फिर’ का कोई अंतिम समाधान नहीं निकल रहा है.

परिचयात्मक रूप में नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ. इसे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन के रूप में आरम्भ किया था. वे चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग से प्रभावित थे और मानते थे कि न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है. यह सशस्त्र संघर्ष उनकी मृत्यु के बाद अपनी असल विचारधारा से अलग हो गया. देखा जाये तो वर्तमान में नक्सलवाद सरकार के सामानांतर एक सत्ता स्थापित करने की मानसिकता से काम कर रहा है. अब इसका उद्देश्य किसी भी रूप में आदिवासियों को उनके अधिकारों को दिलवाना, अपने वन-जंगलों-संसाधनों पर अपना आधिपत्य बनाये रखना मात्र नहीं रह गया है. अब उनके द्वारा आदिवासियों की आड़ लेकर राजनैतिक संरक्षण प्राप्त किया जा रहा है जो कहीं न कहीं उन्हें सत्ता के करीब लाता है. सत्ता के करीब पहुँचने की इसी स्थिति का दुष्परिणाम ये है कि आज नक्सलवाद भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है. देश के 180 जिलों यानि कि भारतीय भूगोल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नक्सलवादियों के कब्जे में है जो लगभग 92 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है. यह देश के 10 राज्यों-उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश आदि तक फैला हुआ है. इसी इलाके को आज रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है. एक अनुमान के अनुसार लगभग 30 हजार सशस्त्र नक्सली वर्तमान में इसी विचारधारा से काम कर रहे हैं.


नक्सलवादियों द्वारा प्रतिवर्ष सैकड़ों, हजारों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है. कई बार पुलिस मुखबिरी करने के शक में वे आदिवासी भी शामिल होते हैं, जिनके अधिकारों के लिए लड़ने की बात नक्सली करते हैं. सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि एक तरफ कॉरपोरेट घरानों द्वारा आदिवासियों की सम्पदा को लूटने की बात की जाती है दूसरी तरफ पूरी चर्चा में कहीं भी आदिवासी दिखाई नहीं देते हैं. ऐसे में यदि सरकार को किसी तरह का हल निकालना है तो बातचीत के मोड़ पर नक्सलियों के साथ-साथ उन आदिवासियों को भी शामिल करना होगा, जिनके अधिकारों का हनन हो रहा है.

विगत कुछ वर्षों की घटनाओं को देखने में साफ तौर पर समझ आ रहा है कि नक्सलियों द्वारा अपने प्रभाव को, शक्ति को, राजनैतिक संरक्षण को धन-उगाही के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है. उनके द्वारा सम्बंधित क्षेत्र में विकास-कार्यों को बाधित करना उनका मुख्य उद्देश्य बन गया है. वे किसी भी रूप में नहीं चाहते हैं कि क्षेत्र का विकास हो और आदिवासियों में राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने की मंशा जन्म ले. वे समूचे क्षेत्र और व्यक्तियों को अपनी हथियारों की सत्ता के अधीन रखना चाहते हैं. ऐसे में यदि बातचीत एक रास्ता है तो सैन्य कार्यवाही भी एक रास्ता है. सैन्य कार्यवाही के जवाब में एक तर्क हमेशा आता है कि इसमें निर्दोष नागरिक मारे जायेंगे. इसके जवाब में बस एक ही सवाल कि क्या नक्सली हमलों में अभी तक निर्दोष नहीं मारे गए? ‘गेंहू के साथ घुन भी पिसता है’ की बात को दिमाग में रखते हुए सरकार एक तरफ सैन्य कार्यवाही की छूट देनी चाहिए साथ ही स्थानीय नागरिकों के साथ तालमेल बैठाते हुए उनका समर्थन हासिल करना चाहिए क्योंकि जब तक स्थानीय नागरिकों का समर्थन नक्सलियों के साथ है (चाहे स्वेच्छा से अथवा डर से) तब तक समस्त नक्सलियों को समाप्त करना संभव नहीं. इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य संबंधों को और बेहतर बनाये जाने की आवश्यकता है. केंद्र द्वारा भेजे गए सुरक्षा बलों व स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर तालमेल बनाये जाने की जरूरत है. नक्सलियों से निपटने के लिए सरकार को अपनी रणनीति में बदलाव करने होंगे. सोचना होगा कि आखिर संसाधनों के नाम पर, विकास के नाम पर जंगलों को, वनों को, पहाड़ों को समाप्त कर देने से वहाँ से विस्थापित आदिवासी जायेंगे कहाँ? यदि उसके द्वारा आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना सुनिश्चित है तो उसके द्वारा आदिवासियों को उससे विस्थापित करने की बजाय उन्हें मालिकाना अधिकार देना होगा.

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि आदिवासी क्षेत्रों से चुने गए जनप्रतिनिधियों को इन आदिवासियों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए. सत्यता यही कि नक्सलवाद का अंतिम समाधान सिर्फ हिंसा नहीं है क्योंकि नक्सलवाद अब एक विचारधारा के रूप में काम कर रहा है. इसमें राजनैतिक लोगों का सरकार के, सेना के, सुरक्षाबलों के समर्थन में आना होगा. आदिवासियों एवं आदिवासी क्षेत्रों के चहुंमुखी विकास की बात करनी होगी. यही नक्सलवाद के निराकरण के लिए रामबाण अचूक औषधि है. 

02 दिसंबर 2014

नक्सलवाद : गोली का जवाब गोली

वे हमारे अपने लोग हैं..... वे भटके हुए लोग हैं..... इस तरह के बयानों से अब तौबा करनी ही होगी. जी हाँ, इस तरह के बयान समय-समय पर तमाम राजनैतिक दलों द्वारा नक्सलवादियों के लिए दिए जाते रहे हैं.नक्सलवाड़ी से आरम्भ नक्सली आन्दोलन भले ही किसी समय पावन उद्देश्य के साथ आगे बढ़ा हो किन्तु वर्तमान में इसका स्वरूप किसी भी रूप में आतंकवाद से कम नहीं है. जिस तरह से नक्सलियों ने अपना आतंक फैला रखा है, जिस तरह से आर्थिक लाभ लेने के उपक्रम पैदा कर रखे हैं, जिस तरह से मासूमों को अपना शिकार बनाया जाने लगा है, जिस तरह से आदिवासियों को अपना हथियार बनाया जा रहा है उसे देखते हुए साफ-साफ़ लगता है कि वर्तमान में नक्सली आन्दोलन समानान्तर सत्ता चलाने का माध्यम बन गया है. 
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संभव है कि सरकारी नीतियां, योजनायें आदिवासियों के, ग्रामीणों के पक्ष में न रहती हों, उनको लाभ न पहुँचाती हों किन्तु इसके लिए खूनी उपद्रव करना भी तर्कसंगत नहीं लगता है. किसी समय में ये महसूस किया जाता था कि सुरक्षा बल, राजनेता, राजनैतिक दल और अन्य सरकारी संगठन-विभाग इन आदिवासियों का, ग्रामीणों का शोषण कर रहे हैं और इसके प्रत्युत्तर में ये लोग हिंसक हो रहे हैं. ये अपनी जमीनों, वनों, घरों, अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसके लिए छिटपुट हिंसक वारदातों को स्वीकार भले ही न किया गया हो पर नजरंदाज़ अवश्य किया जा गया था. इसके बाद भी इन नक्सलियों ने अपने अधिकारों की लड़ाई को वर्चस्व की लड़ाई में परिवर्तित कर दिया, शोषण के विरुद्ध लड़ने को शोषण करने का हथियार बना दिया, सरकार से लड़ने की बजाय ग्रामीणों-मासूमों को मारना शुरू कर दिया, अपनी जमीनें-वन-जंगल छुड़ाने के स्थान पर चौथ वसूलना शुरू कर दिया. स्पष्ट होने लगा कि नक्सली आन्दोलन भटक गया था और वो भी प्रभुत्व ज़माने की मंशा से, सरकार के समानान्तर सत्ता संचालित करने का माध्यम बनने लगा था.
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अब जबकि विगत वर्ष एक राजनैतिक दल के बहुतायत राजनीतिज्ञों की हत्या करना और अब बड़ी संख्या में सुरक्षा बल के सैनिकों के मार डालना कहीं न कहीं उनकी कुत्सित योजना को ही दर्शाता है. मासूमों की हत्या करना, बेगुनाह ग्रामीणों को मौत के घाट उतार देना, जवानों को आये दिन बंधक बनाना, मार डालना, हफ्ता वसूली, हथियारों की खरीद, ध्वजारोहण न करने देना, अपने अधिकार-क्षेत्र में सरकारी योजनाओं का सञ्चालन न होने देना आदि घटनाएँ नक्सली आन्दोलन के आतंकवाद में बदलने की परिचायक हैं. अब ये कहना कि वे लोग भटके हुए हैं, वे हमारे अपने हैं, वे जंगल के वासी हैं आदि-आदि समस्या की गंभीरता को जानकर भी विस्मृत करना है. अब समय गोली का जवाब गोली से देने का है. जब दूसरा पक्ष प्यार की, शांति की भाषा नहीं समझना चाहता है तो फिर सरकारों को भी इस बात का ख्याल रखना होगा कि सुरक्षा बलों की,  ग्रामीणों की, आदिवासियों की जान इतनी सस्ती नहीं है कि महज दिखावे के लिए कुर्बान कर दी जाए. 
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03 जुलाई 2013

बस...कुल छह ही मारे..!!

बस कुल छह.....!!! ओ नक्सलियो, ये तो कलंक है तुम पर. इतनी संख्या में तो तुम तब मारते थे जब तुमने मारना ही सीखा था. इस समय तो तुम लोग देश के अधिकांश हिस्से में अपना आतंकी साम्राज्य स्थापित करने वालों में, तिरंगे की बजाय अपना लाल झंडा फहराने वालों में, अपने कुकृत्यों पर लाल सलाम ठोकने वालों में शामिल हो फिर भी ऐसा चिरकुट सा काम, तुम लोगों को तो कोई बहुत महान काम करना था. शर्म है तुम सब पर. ये तो वही स्थिति हुई कि किसी स्नातक, परास्नातक वाले व्यक्ति से कहा जाए कि आगे का पाठ तब सिखाया जायेगा पहले ए, बी, सी, डी या गिनती लिख कर दिखाओ...डूब मरो चुल्लू भर पानी में. अरे..!! अभी कुछ दिन पहले जब एक राजनैतिक दल पर हमला किया था तो लगा था कि अब सही ताकत में आये हो.....पर ये क्या..कुल जमा छह...वो भी पुलिस वाले.
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ओ नक्सलियो..!! ये तुम लोगों की ताकत के हिसाब से शोभा नहीं देता. तुम लोग तो अब सेना के जवानों को भी मारने लगे थे, अर्धसैनिक बलों के जवानों को भी अपना शिकार बनाने लगे थे...फिर ये लुंज-पुंज से पुलिसवाले क्यों चुन लिए? कहीं तुम लोगों की ताकत घट तो नहीं रही, कहीं तुम लोगों का आतंक कम तो नहीं हो रहा? सोचो अपने संगठन के बारे में, अपनी ताकत के बारे में, अपने शिकार के बारे में. ऐसे कृत्य तुम्हें नहीं करने चाहिए, वो भी तब जबकि तुम सबको मालूम है कि सरकारों के अधिकांश नुमाइंदे तुमको अपना भटका हुआ भाई बताते हैं. अब भाई तो भाई ही है...वो चाहे साथ रहता हो या भटक गया हो...उस पर कार्यवाही तो होगी नहीं. इसके बाद भी तुम इन पुलिसवालों को मरोगे, वो भी मात्र छह तो ये तुम्हारे लिए तो कलंक है ही, तुम्हारे उन सुधरे भाइयों के लिए भी कलंक है जो संसद में, विधानसभाओं में बैठे तुम्हारा पक्ष लेते रहते हैं; तुम्हारी ताकत को बढ़ाते रहते हैं.
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अरे! मारना है तो अब सैकड़ों की संख्या में मारो. इससे तुम्हारी ताकत का अंदाज़ा आन जनता को भी लगेगा, तुम्हारे समर्थकों को भी लगेगा. इस तरह से दो-दो, चार-चार करके मारने से तुम अपना अस्तित्व ही खतरे में डाल रहे हो. तुम लोगों के पास आधुनिक हथियार हैं, राकेट लोंचर हैं, ग्रेनेड हैं, बारूदी सुरंग का सामान है..और भी बहुत कुछ है, तब भी दो-दो महीनों में ऐसी घटना, वो भी कुल छह, उस पर भी पुलिस वाले........अरे एक बार अपना पूरा दम-ख़म दिखा दो. सैकड़ों की संख्या में लोगों को उड़ा दो. जब तुमने अपनी समर्थक जनता को मरने से परहेज नहीं किया; नादान-भोले बच्चों को मारने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई; सेना के जवानों को मारने में नहीं डरे; एक राजनैतिक दल पर हमला करने में नहीं चुके; महिलाओं की गर्दन काटने में हाथ नहीं काँपे तो अब किस बात का संकोच? ये तो तुम सबको मालूम है कि केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, कोई भी तुम्हारे खिलाफ कठोर कदम नहीं उठा सकती; तुम्हारा समूल नाश करने की सोच नहीं सकती; तुम्हारे खिलाफ कोई सैन्य कार्यवाही नहीं कर सकती; फिर भी तुम इक्का-दुक्का मारने का काम कर रहे हो. उठो जवानों, उठो नक्सलियो अबकी बार दिखा दो कि तुम खेल-खेल में ही चार-छह को मारते हो. अबकी बार तुम्हारे हथियार उठें तो कम से कम सैकड़ों की संख्या में लोग मरें...इससे मतलब नहीं कि सेना के जवान मरें या पुलिस के; आम आदमी मरे या कि राजनीतिज्ञ. तुम तो मारते रहो...शायद किसी दिन तुम लोगों का नाम भी शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चला जाए. अरे..! जब लगभग दो दर्जन मारने पर फूलन देवी का नाम जा सकता है तो तुम लोगों ने तो बहुतों को मौत के घाट उतारा है, तुम्हारा नाम तो ये सफेदपोश जरूर भेजेंगे, आखिर तुम इनके भटके भाई भी तो हो. तो फिर संकोच नहीं..लगे रहो, उड़ाते रहो..मारते रहो...पर अगली बार इतनी चिरकुटई नहीं...चार-छह नहीं....!!!
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31 मई 2013

हथियारों के विरुद्ध हथियार से मिटेगा नक्सलवाद



नक्सलवाद का असल क्रूर चेहरा अब राजनीतिज्ञों की समझ में अवश्य ही आया होगा. अभी तक जब भी नक्सलवाद का खात्मा करने की बात चाहे सदन में उठाई गई हो अथवा सदन से बाहर जनमानस द्वारा, हरेक मांग के साथ उठे अधिकतर स्वर नक्सलियों के समर्थन में ही उठे. किसी ने नक्सलियों को शोषित बताया तो किसी ने अपने बीच की अभावग्रस्त प्रजा, कोई उनको अपना भाई-बंधु बताने को आमादा दिखा तो किसी ने नक्सलवाद को अधिकारों की लड़ाई बताया. हो सकता है कि किसी समय में नक्सलवाद भूमि-वन-संपदा आदि से वंचित लोगों द्वारा अपने अधिकार की लड़ाई का प्रतीक रहा हो पर जिस तरह से विगत कुछ दशकों में नक्सलियों ने अपनी ताकत को बढ़ाकर उसका बेजा इस्तेमाल किया है उसने नक्सलवाद को आतंकवाद की श्रेणी में ही खड़ा किया है. देश के अधिसंख्यक जिलों में शस्त्र के बल पर अपनी समानान्तर सत्ता चलाना, निरपराधों को मौत की नींद बाँटना, अपने अधिकारों की प्राप्ति के नाम पर बच्चों-महिलाओं-बुजुर्गों को क्रूरता से मार देना किस अधिकार का सूचक है? 
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दरअसल अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए शुरू किये गए संघर्ष से जब नक्सलियों को सत्ता का स्वाद लगा, शस्त्रबल का एहसास हुआ, अपनी ताकत के बल पर सरकारी मशीनरी को ठप कर देने का अहंकारी भाव जागृत हुआ तब अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले नक्सली समानान्तर सत्ता के पर्याय बनकर उभरने लगे. अपनी ताकत के बल पर इन्होंने देश के भीतर एक दूसरा देश स्थापित करने का मंसूबा पालना भी शुरू कर दिया था और इसी का दुष्परिणाम ये हुआ कि देश के बहुतायत नक्सली प्रभावित इलाकों में राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा फहराया जाना स्वप्न हो गया. सोचा जा सकता है कि इस तरह की हरकतों से ये नक्सली अपने किन अधिकारों की चाहना रख रहे हैं? स्कूलों, चिकित्सालयों, अन्य दूसरे सरकारी विभागों को जबरन बंद करवाकर ये शासन-प्रशासन का विरोध नहीं कर रहे हैं बल्कि अपने लिए विकास के रास्तों को अवरुद्ध कर रहे हैं. ऐसा किसी सकारात्मक मकसद से नहीं अपितु घनघोर आतंकी मकसद से किया जा रहा है. विकास का मार्ग अवरुद्ध होने से, स्कूलों के बंद रहने से, चिकित्सालयों के न खुलने से नक्सल प्रभावित इलाकों की जनता कहीं न कहीं सिर्फ और सिर्फ इन्हीं नक्सलियों का साथ देती दिखाई देगी, या कहें कि साथ देने को मजबूर होगी.
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नक्सलियों द्वारा आये दिन जवानों को मार देना, जनता को प्रताड़ित करना, सरकारी कर्मचारियों को मौत के घाट उतारना आदि-आदि घटनाओं की कड़ी में राजनेताओं की हत्या को देखा जाना चाहिए. जहाँ तक हमारा मानना है कि जिस तरह से अमेरिका ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले के बाद ही आतंकवाद के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप को स्वीकार किया था, ठीक उसी तरह से तमाम राजनेताओं के मारे जाने के बाद ये भी नक्सलवाद को एक समस्या के रूप में लेकर संभवतः उसके खात्मे के लिए प्रयास करेंगे. इस घटना के बाद भी यदि नक्सलियों को, नक्सलवाद को पोषित करने का काम किया जाता रहा तो वो दिन दूर नहीं होगा जब सम्पूर्ण देश ही नक्सलियों के चंगुल में आ जायेगा और ये प्रत्यक्ष रूप से सत्ता का सञ्चालन करते दिखाई देंगे. 
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