02 December 2014

नक्सलवाद : गोली का जवाब गोली

वे हमारे अपने लोग हैं..... वे भटके हुए लोग हैं..... इस तरह के बयानों से अब तौबा करनी ही होगी. जी हाँ, इस तरह के बयान समय-समय पर तमाम राजनैतिक दलों द्वारा नक्सलवादियों के लिए दिए जाते रहे हैं.नक्सलवाड़ी से आरम्भ नक्सली आन्दोलन भले ही किसी समय पावन उद्देश्य के साथ आगे बढ़ा हो किन्तु वर्तमान में इसका स्वरूप किसी भी रूप में आतंकवाद से कम नहीं है. जिस तरह से नक्सलियों ने अपना आतंक फैला रखा है, जिस तरह से आर्थिक लाभ लेने के उपक्रम पैदा कर रखे हैं, जिस तरह से मासूमों को अपना शिकार बनाया जाने लगा है, जिस तरह से आदिवासियों को अपना हथियार बनाया जा रहा है उसे देखते हुए साफ-साफ़ लगता है कि वर्तमान में नक्सली आन्दोलन समानान्तर सत्ता चलाने का माध्यम बन गया है. 
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संभव है कि सरकारी नीतियां, योजनायें आदिवासियों के, ग्रामीणों के पक्ष में न रहती हों, उनको लाभ न पहुँचाती हों किन्तु इसके लिए खूनी उपद्रव करना भी तर्कसंगत नहीं लगता है. किसी समय में ये महसूस किया जाता था कि सुरक्षा बल, राजनेता, राजनैतिक दल और अन्य सरकारी संगठन-विभाग इन आदिवासियों का, ग्रामीणों का शोषण कर रहे हैं और इसके प्रत्युत्तर में ये लोग हिंसक हो रहे हैं. ये अपनी जमीनों, वनों, घरों, अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसके लिए छिटपुट हिंसक वारदातों को स्वीकार भले ही न किया गया हो पर नजरंदाज़ अवश्य किया जा गया था. इसके बाद भी इन नक्सलियों ने अपने अधिकारों की लड़ाई को वर्चस्व की लड़ाई में परिवर्तित कर दिया, शोषण के विरुद्ध लड़ने को शोषण करने का हथियार बना दिया, सरकार से लड़ने की बजाय ग्रामीणों-मासूमों को मारना शुरू कर दिया, अपनी जमीनें-वन-जंगल छुड़ाने के स्थान पर चौथ वसूलना शुरू कर दिया. स्पष्ट होने लगा कि नक्सली आन्दोलन भटक गया था और वो भी प्रभुत्व ज़माने की मंशा से, सरकार के समानान्तर सत्ता संचालित करने का माध्यम बनने लगा था.
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अब जबकि विगत वर्ष एक राजनैतिक दल के बहुतायत राजनीतिज्ञों की हत्या करना और अब बड़ी संख्या में सुरक्षा बल के सैनिकों के मार डालना कहीं न कहीं उनकी कुत्सित योजना को ही दर्शाता है. मासूमों की हत्या करना, बेगुनाह ग्रामीणों को मौत के घाट उतार देना, जवानों को आये दिन बंधक बनाना, मार डालना, हफ्ता वसूली, हथियारों की खरीद, ध्वजारोहण न करने देना, अपने अधिकार-क्षेत्र में सरकारी योजनाओं का सञ्चालन न होने देना आदि घटनाएँ नक्सली आन्दोलन के आतंकवाद में बदलने की परिचायक हैं. अब ये कहना कि वे लोग भटके हुए हैं, वे हमारे अपने हैं, वे जंगल के वासी हैं आदि-आदि समस्या की गंभीरता को जानकर भी विस्मृत करना है. अब समय गोली का जवाब गोली से देने का है. जब दूसरा पक्ष प्यार की, शांति की भाषा नहीं समझना चाहता है तो फिर सरकारों को भी इस बात का ख्याल रखना होगा कि सुरक्षा बलों की,  ग्रामीणों की, आदिवासियों की जान इतनी सस्ती नहीं है कि महज दिखावे के लिए कुर्बान कर दी जाए. 
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