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20 जून 2025

सवाल तो ढंग से उठाया जाये

आये दिन हिन्दुओं से सम्बंधित बाबाओं, महात्माओं, साध्वियों आदि से सम्बंधित पोस्ट सोशल मीडिया में दिखती है, वो भी उनके विरोध में. अक्सर ऐसा लगता है जैसे ये पोस्ट-धारी कहीं न कहीं हिन्दू-विरोधी स्लीपर सेल ही हैं. मौका ताकते ही सक्रिय ही जाते हैं.

 

इस समय बहुतायत पोस्ट में धीरेन्द्र शास्त्री निशाने पर हैं. उनका चश्मा, उनकी जैकेट निशाने पर है. इन दोनों वस्तुओं की कीमत को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं. उठाना भी चाहिए मगर सकारात्मक रूप में, बिना किसी पूर्वाग्रह के. आखिर इक्कीसवीं सदी में भी आप वही पाठ क्यों पढ़ना चाहते हैं....???

एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था.

किसी गाँव में एक गरीब शिक्षक रहता था.

 

अब इस गरीब वाली मानसिकता से बाहर निकलो. कभी सवाल उठाया किसी क्रिकेटर, किसी फ़िल्मी कलाकार के उपयोग में आने वाले सामानों की कीमत के बारे में? नहीं न!! वे तुमको क्या देते हैं? कोई खेलने का ढोंग करता है, कोई अभिनय का, तुम सबको क्या मिलता है..... बाबा जी का....!! अनावश्यक अपने दिमाग पर लोड लेने की आवश्यकता नहीं. समाज सुधार सबका काम निश्चित रूप से होना चाहिए मगर पूर्वाग्रह के साथ नहीं. आप सबको लगता है कि धीरेन्द्र शास्त्री अथवा अन्य कोई दूसरा बाबा, महात्मा धोखा दे रहा है तो फिर इनको बेनकाब करिए मगर फिर उन सबको भी बेनकाब करिए जो समाज को पथ-भ्रष्ट कर रहे हैं.

 

ऐसा न हो कि सनातन धर्म वालों के विरोध में तो आप लंगोट कसे हैं.... बाकियों के विरोध में आप अपनी पतलून में ही हग-मूत लेते हैं.


13 जनवरी 2024

आमंत्रण के बाद भी अनामंत्रित

भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के दो बड़े पुराने कलाकार किसी ज़माने में बहुत जबर दोस्त हुआ करते थे. उनसे जुड़ी एक घटना श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से संदर्भित समझ में आई तो यहाँ उसका उल्लेख कर रहे हैं.


उन दो कलाकारों ने एक साथ मुम्बई में आकर अपने सपनों को सच करने के लिए मेहनत करना शुरू किया. शुरूआती दौर में दोनों एकदूसरे के संघर्ष में साथ रहे, एकदूसरे की सफलता-असफलता में साथ दिया. कालांतर में दोनों कलाकार अपने-अपने स्तर पर प्रसिद्धि पाते रहे. इसी यात्रा में उन दो कलाकारों के बीच कभी किसी कारण से झगड़ा हो गया. उनका झगड़ा सिर्फ झगड़े तक न रहा, उससे आगे बढ़ता हुआ वो उनके बीच मनमुटाव तक भी पहुँच गया. यह इतना बढ़ा कि सामान्य रूप में, सार्वजनिक रूप में उन दोनों की आपस में बातचीत भी बंद हो गई. बहरहाल, इस मनमुटाव का असली रूप तब सामने आया जबकि उन दोनों कलाकारों में से एक कलाकार की बेटी की शादी होनी थी.

 

उन दो कलाकारों में एक ने सिर्फ प्रसिद्धि ही पाई तो दूसरे को महानायक के रूप में जाना गया. अब जब महानायक की बेटी की शादी का अवसर आया तो उस महानायक कलाकार ने दूसरे पूर्व-मित्र कलाकार को भी निमंत्रण भेजा. बस यहीं आकर इस पोस्ट की असली यात्रा शुरू होती है. जिस महानायक कलाकार की बेटी का विवाह था, उस कलाकार के पिता प्रसिद्ध कवि थे. ऐसा बताया जाता है कि उन्होंने सोलह पृष्ठ का निमंत्रण पत्र बनाया. प्रत्येक पृष्ठ पर कार्यक्रम का, रीति-रिवाज का विवरण और उसी के अनुसार एक कविता. कहने का अर्थ कि सोलह पृष्ठ का निमंत्रण पत्र काव्यात्मक रूप में तैयार किया गया था. महानायक कलाकार दोस्त ने दूसरे कलाकार दोस्त को वो निमंत्रण पत्र दिया. यहाँ उस निमंत्रण पत्र में जो खास बात थी वो ये कि उस कलाकार को जिसे-जिसे बुलाना था, उसके निमंत्रण पत्र में तारीख थी, समय था, स्थान था.... मगर जिसे नहीं बुलाना था उसे बस सोलह पृष्ठ का निमंत्रण पत्र ही था. खाली निमंत्रण पत्र, काव्यात्मक शैली, सोलह पृष्ठ मगर उसमें न तारीख, न समय, न स्थान अर्थात ऐसा कोई चिन्ह नहीं जिसके सहारे कार्यक्रम स्थल तक पहुँचा जा सके. बिना समय, बिना तिथि, बिना जगह वाला ऐसा निमंत्रण एक कलाकार ने अपने दूसरे कलाकार दोस्त को दिया.

 

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के समय इस घटना का याद आना महज इस कारण हुआ कि उस महानायक कलाकार द्वारा तिथि, स्थान आदि का जिक्र न करने के पीछे की मंशा थी कि कुछ लोग न आ सकें मगर इसके उलट श्रीराम जन्मभूमि मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण तो तिथि, समय, स्थान के साथ दिया जा रहा है, इसके बाद भी कुछ लोग नहीं आ रहे हैं. ये बात समझ से परे है कि ये लोग, जो अयोध्या नहीं जा रहे हैं वे श्रीराम के विरोधी हैं या फिर भाजपा के?


10 जनवरी 2024

पत्थर होती मानवीय संवेदना

एक स्टार्ट-अप कंपनी की सीईओ ने अपने चार वर्षीय बेटे की हत्या कर दी. हत्या का कारण तलाक प्रक्रिया के दौरान अदालत द्वारा उसके पति को बेटे से मिलने की अनुमति प्रदान किया जाना था. अदालत के इस निर्णय से वह महिला चिढ़ी हुई थी. ये घटना इसी समाज की है जहाँ स्वीकारा जाता है कि पूत तो कपूत हो सकता है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती. तलाक की प्रक्रिया जिस पति से चल रही, उससे चिढ़ होना सहज है मगर उसके चलते अपने ही बेटे की हत्या कर देना संवेदनहीनता के साथ-साथ मानसिक असंतुलन का परिचायक है. मामूली सी बात पर अपने ही परिजन की हत्या जैसा जघन्य अपराध समाज के लिए नया नहीं है. 




अभी कुछ दिनों पूर्व खबर आई कि एक महिला ने अपने पति की हत्या महज इस कारण से कर दी क्योंकि उसके पति ने महिला को सोशल मीडिया पर रील बनाने से रोका था. यद्यपि किसी भी रूप में किसी इन्सान की हत्या को स्वीकार्य नहीं माना जाता है तथापि स्वरक्षा हेतु किसी अपराधी की, आतातायी की जान ले भी ली जाये तो उसे कानूनी रूप में, सामाजिक रूप में क्षम्य माना गया है. अब जिस तरह की घटनाओं के चलते हत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं उनमें तो विवाद भी इस तरह का नहीं होता है कि आवेश में, क्रोध में, बदले की भावना में किसी व्यक्ति की जान ले ली गई हो. लिव इन रिलेशन में रहने के बाद मन ऊब जाने के कारण हत्या कर देना रहा हो, प्रेम विवाह के बाद मनमुटाव होने पर सूटकेस में टुकड़े-टुकड़े में मिलना, प्रेमी के साथ मिलकर पति और बच्चों की हत्या, व्यावसायिक लाभ के लालच में पत्नी का सौदा करना, नशा न करने देने पर माता-पिता की हत्या, पिता द्वारा बेटी के साथ बलात्कार करना आदि खबरें प्रतिदिन ही हमारी नज़रों के सामने से गुजरती हैं. बड़ी संख्या में होती इन घटनाओं को किसी बाहरी तत्व द्वारा अंजाम नहीं दिया जा रहा है वरन परिवार के निकट सम्बन्धियों द्वारा ऐसा किया जा रहा है.


इस तरह की घटनाएँ स्पष्ट रूप से मानवीय संवेदनाओं के मृत होने की ओर इशारा करती हैं. तकनीकी, बौद्धिक रूप से समृद्ध होते जा रहे समाज की यह बहुत बड़ी विडम्बना बनती जा रही है कि यहाँ मानवीयता के प्रति नकारात्मकता देखने को मिल रही है. संवेदनाओं के कम होने के कारण, मानवता के प्रति लोगों की सकारात्मकता कम होने से आपसी प्रेम-स्नेह, समन्वय आदि में भी गिरावट आई है. मानवीय संवेदना के चलते ही एक मनुष्य दूसरे से संपर्क रखता है, उसके साथ रिश्तों का निर्वहन करता है. ऐसा होने के कारण ही मनुष्य अपनी व्यक्तिगत सीमा-रेखा से बाहर आकर अपने परिवार के साथ-साथ अपने आस-पड़ोस, अपने क्षेत्र, समाज आदि के प्रति चिंता का भाव रखता है. संवेदना ही मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने में सहायक होती है. संवेदनाओं का लगातार क्षरण होते जाने से मनुष्य क्रूरतम से क्रूरतम कदम उठाने से नहीं डर रहा है.


मानवीय संवेदनों के समाप्त होने के पीछे के कारण मानव ने स्वयं उत्पन्न किये हैं. तीव्रतम गति से किसी भी रूप में सफलता को प्राप्त कर लेने की तृष्णा ने जैसे सोचने-समझने की शक्ति को छीन लिया है. शिक्षित होने के बाद भी समाज से नैतिक शिक्षा का लोप हो चुका है. सोशल मीडिया की स्वतंत्रता ने रिश्तों की गरिमा को तार-तार कर दिया है. इस तरह की प्रवृत्ति ने जहाँ एक तरफ नैतिकता को,मानवीयता को समाप्त किया है वहीं दूसरी तरफ हमारे संस्कारों की, संस्कृति की पाठशाला संयुक्त परिवारों का भी क्षरण किया है. संयुक्त परिवारों के विघटन के बाद जन्मे एकाकी परिवारों ने बच्चों की सामूहिकता समाप्त कर दी है. अब उनका बचपन विशुद्ध रूप से मशीनों के साथ बीतता है. ऐसे में उसके भीतर संस्कारों का, संवेदनाओं का होना एक कल्पना ही है.


संवेदनाओं की लगातार होती कमी के साथ मानव में सहनशक्ति की भी कमी होती जा रही है. इधर देखने में आ रहा है कि विगत कुछ समय से इस तरह की जघन्य वारदातों, अपराधों के पीछे बहुत छोटी सी बात, मामूली सी घटना ही कारण हुआ करती है. पारिवारिक सदस्यों को किसी काम को करने से रोकना, उनको अनुशासन में रहना सिखाना, अनुपयोगी कार्यों को न करने की सलाह देना आदि ऐसे कारण बनते हैं. देखा जाये तो एक व्यक्ति के जीवन में बचपन से लेकर अंतिम अवस्था तक कदम-कदम पर घर-परिवार में, विद्यालय में, कार्यक्षेत्र में, समाज में एक तरह का प्रतिस्पर्द्धा का माहौल बना रहता है. उसे न केवल समाज में, अपने कार्यक्षेत्र में बल्कि परिवार तक में आपसी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ता है. ऐसा करने के लिए उसे प्रेरित भी किया जाता है, कभी-कभी उसे हतोत्साहित करके भी आपसी प्रतिस्पर्द्धा में शामिल कर दिया जाता है. प्रतिस्पर्द्धा के इस तरह के बनावटी माहौल में ऐसा इन्सान अपने-पराये का, अच्छे-बुरे का, संयम-आवेश का अंतर भुला बैठता है, सहनशीलता को विस्मृत कर देता है. उसके लिए किसी भी रूप में सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत विजय ही मायने रखती है.


सहानुभूति, संवेदना, दुःख, मानवीयता आदि रहित इन्सान जब समाज में अपना अस्तित्व बनाता जा रहा है तो आये दिन इस प्रकार की शर्मसार करने वाली घटनाएँ घटित होना स्वाभाविक है. आज नैतिक मूल्यों का ह्रास और आडम्बर के द्वारा खुद को उच्च स्तर पर दिखाना जीवन बन गया है. पति-पत्नी का साथ-साथ रहना मुश्किल हो गया है, माता-पिता और संतानों में कटुतापूर्ण रिश्ते बने हुए हैं, रक्त-सम्बन्धी ही एक-दूसरे के खून के प्यासे हों तो उस वातावरण में मानवीय मूल्यों का जीवंत बने रहना दुष्कर ही है. 





 

15 जून 2023

समान नागरिक संहिता का अतार्किक विरोध

समान नागरिक संहिता का मसला उस समय चर्चा में आया जबकि इसी 14 जून को 22वें विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों के विचार माँगे हैं. एक सामान्य नागरिक भी इस पर अपने विचार विधि आयोग को तीस दिन के भीतर भेज सकता है. आयोग ने यह भी कहा है कि यदि आवश्यकता महसूस हुई तो वह चर्चा के लिए व्यक्ति अथवा संगठन को बुला भी सकता है. जैसे ही समान नागरिक संहिता की चर्चा शुरू हुई वैसे ही इसका विरोध भी शुरू कर दिया गया. समान नागरिक संहिता का मुद्दा कोई राजनैतिक नहीं वरन संविधान में ही इसके तत्त्व समाहित हैं. संविधान की प्रस्तावना और नीति निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सरकार सभी के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करे. 


आज़ादी के बाद नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने पर लम्बी बहस चली. बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड एच लारी, बिहार के मुस्लिम सदस्य हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने भीमराव अम्बेडकर का विरोध किया था. तब डॉ० अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, संपत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. जबरदस्त विरोध के बीच हुए मतदान में डॉ० अम्बेडकर का प्रस्ताव विजयी हुआ. मुस्लिम सदस्य बुरी तरह पराजित हुए और संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत की राय से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इसके बाद भी बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र दर्शाते हुए समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए टाल दिया गया. समय गुजरने के साथ-साथ मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते सन 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताती-मानती है.




इसके विरोध में खड़े लोगों का यह तर्क तो अत्यंत हास्यास्पद है कि समान नागरिक संहिता की बात हिन्दुओं द्वारा महज इस कारण की जाती है क्योंकि वे मुसलमानों की चार शादी और तलाक देने की सुविधा को आबादी बढ़ाने वाला मानते हैं. यहाँ सवाल उठता है कि क्या ये प्रासंगिक है कि एक महिला को मात्र तीन बार तलाक बोलकर हमेशा के लिए बेघर कर दिया जाये, जैसा कि शाहबानो प्रकरण में हुआ? 1985 में शाहबानो की उम्र 62 वर्ष थी और उसके पति ने तीन बार तलाक कहकर उससे सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था. पाँच बच्चों की माँ शाहबानो को तब सिर्फ मैहर की रकम वापस की गई थी. इसी वर्ष उच्चतम न्यायालय ने कहा भी था कि संसद को समान नागरिक संहिता पर आगे बढ़ना चाहिए. वर्ष 2015 में भी पुनः उच्चतम न्यायालय ने इसकी आवश्यकता पर बल दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पूर्व वर्ष 2003 में भी भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 की धारा 118 को असंवैधानिक करार देते हुए संसद को समान नागरिक संहिता के निर्माण के सम्बन्ध में अपनी टिप्पणी प्रेषित की थी.


गैर-भाजपा राजनैतिक दलों का आरोप है कि भाजपा ध्रुवीकरण के लिए इस विषय को उठाती रहती है. सत्तारूढ़ केंद्र सरकार द्वारा राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के वायदे को पूरा करने के बाद ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वह हिंदुत्व, हिन्दू वोट के लिए समान नागरिक संहिता को देश में लागू करना चाहती है. ये समझने का विषय है कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थी, तब हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई स्थिति भी नहीं थी तब उस समय क्यों इसका विरोध किया गया? सभी नागरिकों के एक अधिकार हो जाने का विरोध क्यों? शरीयत की बात करने वाला कट्टरपंथी मुसलमान क्या सभी कार्य शरीयत के अनुसार ही करता है? किसी मुसलमान द्वारा अपराध किये जाने पर शरीयत के अनुसार उसको कोड़े मारना, हाथ काटना, पत्थर मारना, फांसी पर लटकाना आदि जैसी सजाएँ दी जाती हैं? कुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है. उसके अनुसार विवाह केवल बालिग स्त्री-पुरुष के बीच हो सकता है. जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ख्याल-उल-बलूग अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के संभव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. कुरान विधवा विवाह और पुनर्विवाह को मान्य करती है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऐसा प्रतिबंधित करता है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में ये लोग किस शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध करने में लगे हैं? क्यों इस विषय पर मुस्लिमों के एकमत होने का इंतजार किया जाता है? क्यों उनको अंतरात्मा की आवाज़ सुनने के लिए कहा जाता है? सवाल उठता है कि क्या सन 1955-56 में हिन्दू कोड बिल लागू करते समय हिन्दुओं की भावनाओं का ख्याल रखा गया था? क्या उत्तराधिकार, बाल विवाह आदि पर नियम बनाते समय हिन्दुओं की अंतरात्मा की आवाज़ को सुनने का प्रयास किया गया था?


आखिर चन्द गैरजिम्मेवार लोगों के विरोध के चलते कब तक अपरिहार्य विधान को लागू होने से रोका जाता रहेगा? समान नागरिक संहिता किसी एक समुदाय विशेष के विवाह अथवा तलाक की बात नहीं करती वरन एक महिला को भी नागरिक के रूप में अधिकार प्रदान किये जाने की बात करती है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आवश्यकता इसकी है कि सभी लोग हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि धार्मिक मानसिकता से ऊपर उठकर विशुद्ध भारतीय नागरिक की मानसिकता से विचार करें. देश में एक ऐसी संहिता का निर्माण करने में योगदान दें जो सभी समुदायों पर समान रूप से लागू हो, सभी को भारतीयता की पहचान कराती हो.






 

11 जनवरी 2021

शास्त्री के साथ क्या हुआ था?

जब साल 1966 के अप्रैल में ताशकंद में आए एक विनाशकारी भूकंप में सैकड़ों जानें चली गयी, तब सलामत बचे लोगों में कुछ को ऐसा लगा कि जैसे ईश्वर भारतीय प्रधानमंत्री की उनके यहाँ उसी साल हुई मौत से नाराज थे. कुछ महीनों बाद आँखों में आँसू लिए ललिता शास्त्री उस विला को देखने को पहुँचीं, जहाँ उनके पति को ठहराया गया था. एक महिला कर्मचारी उन्हें उस बेडरूम तक ले गई, जहाँ शास्त्री ने अपनी आखिरी साँस ली थी. शास्त्री का कमरा दिखाते वक्त वो उज्बेकी महिला अपनी भवों में सिलवटें डालकर गंभीरता से फुसफुसाई... “कोई टेलीफोन नहीं”- यानी अपने आखिरी वक्त में भारतीय प्रधानमंत्री एक तरह से बाकी दुनिया से कटे हुए थे.


लोगों को संदेह था कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बारे में आधिकारिक तौर पर जो जानकारी दी गई थी, उसमें कुछ न कुछ जरूर छिपाया गया था. शास्त्री की मौत से जुड़ी शंकाओं के बारे में जहाँ ताशकंद में दबी जुबान में बातें होती थीं, तो वहीं उन दिनों भारत में यही चर्चा सबसे बड़ा विषय था. आज भी ताशकंद में शास्त्री जी की मृत्यु और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का रहस्यमई हालत में लापता होना देश के सबसे विवादित सियासी मसले हैं.


शास्त्री की मौत हमारे दिलो-दिमाग में आज भी कुछ ऐसे बसी है कि जब भी उनका जिक्र होता है, चर्चा खुद-ब-खुद जनवरी 1966 के उस घटनाक्रम तक पहुँच जाती है. आखिर उस दिन ताशकंद में क्या हुआ था? शास्त्री जी जैसे महान व्यक्तित्व को किसी किस्म के प्रचार की जरूरत नहीं है. उनकी सादगी और ईमानदारी हमारे जेहन में हमेशा के लिए दर्ज है. लेकिन ये सवाल आज भी चुभता है कि आखिर हमारे प्रधानमंत्री की किसी विदेशी जमीन में संदिग्ध मौत पर कभी कोई जाँच क्यों नहीं की गई? जबकि यह हमारे अब तक के इतिहास का इकलौता ऐसा मामला है.


ऐसा भी नहीं है कि ये मामला कभी देश के सामने नहीं लाया गया हो. संसद में शास्त्री के लिए शोक सन्देश पढ़े जाने के फ़ौरन बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने पूछा था: “ताशकंद में क्या हुआ? क्या उनकी मृत्यु को टाला नहीं जा सकता था? क्या यह संभव नहीं था कि बिस्तर से बिना उठे ही वह अपने डॉक्टर को और नौकर को बुला सकते? क्या यह संभव नहीं था कि वहाँ ऑक्सीजन की व्यवस्था होती? जो पाँच या सात मिनट मिले थे, उसमें अगर उचित प्रबंध होता, तो शायद हम उन्हें बचा पाते?”


लेकिन भला कौन था-जो शास्त्री जी को मृत देखना चाहता था? उनके बचपन के दोस्त टीएन सिंह के मुताबिक वो ‘अजातशत्रु’ (जिसका कोई शत्रु न हो) थे. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए भी मानती थी कि 40 साल के सियासी सफ़र में शास्त्री के न के बराबर ही दुश्मन थे. ऐसे में कौन था जिसको शास्त्री की मौत से फायदा होता? आखिर भारत के खिलाफ ऐसे खतरनाक अपराध की सोच के पीछे भी भला क्या मकसद हो सकता था?




उनकी मौत पर कभी कोई जाँच नहीं हुई, क्योंकि सरकार हमेशा यही कहती रही कि शास्त्री की मृत्यु हार्ट अटैक से ही हुई है. उनके अनुसार शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. कुछ लोगों ने ‘दाल में कुछ काला’ होने के आरोप भी लगाये, लेकिन सरकार ने इस मामले में अपने आधिकारिक स्टैंड को बदलना दूर उस पर दोबारा गौर करना भी मुनासिब नहीं समझा. जाँच को लेकर उठी आवाजें धीरे-धीरे खामोश हो गईं. बीच-बीच में सुभाष चन्द्र बोस के लापता होने के विवाद के साथ ये मामला भी उठाया जाता रहा. कुछ वक्त बाद दोनों ही मसले एक ही चश्मे से देखे जाने लगे. 1970 में जब समर्थकों के दवाब में सरकार बोस के मामले की न्यायिक जाँच कराने को तैयार हो गई, तब शास्त्री के समर्थकों ने भी (इनमें से ज्यादातर लोगों ने बोस के मामले में भी आवाज़ उठाई थी) उनके केस की जाँच के लिए भरसक कोशिशें की, लेकिन सरकार पर उसका कोई असर नहीं हुआ. उसी साल से यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया.


तो फिर हम आज साल 2019 में इस मामले को लेकर इतना गंभीर क्यों हैं? शास्त्री के निधन के 54 सालों बाद उस घटना को कुरेदने से भला क्या हासिल होगा? दरअसल मेरा मकसद है कि इस मुद्दे पर पूर्णतः विराम लगना चाहिए, जो कि आज तक नहीं हो पाया है. ऐसा तभी संभव होगा जब इस घटना की तह तक पहुँचने की कोशिश की जाये, ताकि उस रात की एक मुकम्मल तस्वीर सामने आ सके. आज भी कई लोग हैं जो उस घटना की पूरी सच्चाई जानना चाहते हैं. खासकर शास्त्री जी के परिजन, जो आज भी उस हादसे से उबर नहीं सके हैं. उस भयावह रात के बारे में सोचकर अभी भी उनके दोनों बेटों की आँखें डबडबा आती हैं. उस रात फोन पर शास्त्री जी की हालत नाजुक होने का संदेशा मिलने के बाद उनके परिवार के लोग अगले आधे घंटे तक भगवान के आगे प्रार्थना करते रहे, लेकिन...


सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से जुड़े विवाद पर एक मशहूर किताब लिखने के बाद मुझे ‘शास्त्री’ की संदिग्ध मौत पर लिखने के लिए भी कई सुझाव दिए गए. मैं उन सुझावों को टालता रहा. दरअसल मेरे पास ऐसा न करने की दो वजहें थीं. एक तो यह कि ‘बोस’ के मामले के उलट शास्त्री की मौत के केस में आधिकारिक तौर पर कुछ जानकारियाँ नहीं थीं. इसको लेकर दाखिल की गई मेरी आरटीआई (शास्त्री की मौत से जुड़े मामले में दाखिल की गई ये पहली RTI थी) से भी बस कुछ खबरों और लेखों के लायक जानकरी ही हासिल हो सकी थी. भले ही दोनों मामलों में चर्चा एक साथ की जाती हो लेकिन नेता जी और शास्त्री जी के मृत्यु के मामले एक लिहाज में बिलकुल अलग हैं – एक तबके का मानना रहा है कि नेताजी अपनी मृत्यु की अधिकारिक तारीख के बहुत बाद भी जिन्दा थे, जबकि शास्त्री जी की मृत्यु यकीनन ताशकंद में ही हो गई थी. लिहाजा नेताजी के मामले में खोजबीन के लिए भी काफी कुछ था. जबकि शास्त्री के केस में सिर्फ यही तय करना था, कि क्या उनकी मौत प्राकृतिक थी या नहीं? बिना पर्याप्त जानकारी और तथ्यों के इस घटना को लेकर एक ठोस, सटीक और संवेदनशील कहानी बुनना किसी पहाड़ पर चढ़ने से कम मुश्किल नहीं था.


इस किताब को न लिखने के पीछे मेरा दूसरा तर्क था कि कहीं मेरी पहचान राष्ट्रीय नेताओं की मौत पर लिखते रहने वाले लेखक के तौर पर न बन जाए! हालाँकि मेरा मकसद ऐसी गुत्थियों को सुलझाने का है. इसलिए शास्त्री केस पर कई बेहद चर्चित और सराहे गए लेखों को लिखने के बाद भी मैं इस मुद्दे पर किताब लिखने को लेकर इच्छुक नहीं था.


लेकिन कुछ महीनों पहले मैं दिल्ली में फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री के साथ खाने की मेज पर बैठा था. इसी दौरान पहली बार मेरे दिमाग में इस किताब को लिखने का ख्याल आया. अग्निहोत्री इसी मामले को लेकर ‘द ताशकंद फाइल्स’ के नाम से एक फिल्म ला रहे हैं. उनकी इस फिल्म के लिए जरूरी तथ्य जुटाने के बाद कुछ सार्थक और बेहतर करने की चाह में मैंने अपनी हिचकिचाहट को दरकिनार कर इस किताब पर काम शुरू किया, ताकि फिल्म के साथ बने माहौल के बीच राष्ट्रीय महत्त्व के मसले को एक अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचाया जा सके.



(अनुज धर जी की प्रसिद्द पुस्तक शास्त्री के साथ क्या हुआ था? का प्राक्थन, साभार, लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर)
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वंदेमातरम्

15 अक्टूबर 2020

गंगा-जमुनी संस्कृति का संकुचित ताला खोलो अब

इधर तनिष्क का एक विज्ञापन देखने को मिला और उसका विरोध भी साथ-साथ दिखाई देता रहा. विज्ञापन की अच्छाई-बुराई को एक किनारे लगा दिया जाये तो एक बात आज तक समझ नहीं आई कि समाज में कुछ लोगों को ये कीड़ा कहाँ से काट लेता है कि वे गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों की वकालत शुरू कर देते हैं? क्या हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द्र के लिए आवश्यक है कि दोनों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता रखा जाये? यदि ऐसा करना आवश्यक है तो फिर रोटी-बेटी का रिश्ता बनाने में बेटी सदैव हिन्दू की ही क्यों नजर आती है? ये तनिष्क का विज्ञापन हो या फिर होली का कोई विज्ञापन, सभी जगह हिन्दू बेटी ही निशाने पर रखी जाती है. आखिर तनिष्क का ये विज्ञापन मुस्लिम को लेकर बनाया-दिखाया जाना अनिवार्य था तो उन्हीं के रीति-रिवाजों, चाल-चलन के साथ भी तो बनाया जा सकता था. उनकी मजहबी मान्यताएँ भी विज्ञापन में दिखाकर सोने का, ज्वेलरी का प्रचार किया जा सकता था, मगर ऐसा नहीं किया गया.



ये आज से नहीं, अचानक से नहीं बल्कि बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत होता आ रहा है. इसे भी विवाद का विषय बना दिया जाता है मगर आये दिन अब घटनाएँ सबूत के साथ सामने आ रही हैं जहाँ कि हिन्दू बेटी पहले किसी मुस्लिम लड़के के प्यार में पागल हो जाती है फिर वो धर्म परिवर्तन करके निकाह करती है. कालांतर में उसके शोषण के वीडियो सोशल मीडिया में दिखाई देने लगते हैं. किसी-किसी खबर में, घटना में बेटी की लाश भी मिलती है. आखिर ये क्या है, क्यों है? यह बात किसी समय में आतंकियों के सन्दर्भ में कही जाती थी कि मुसमलानों को आतंकी के रूप में ही क्यों देखा जाता है? इसके जवाब के रूप में यह आम धारणा बनी हुई थी कि भले ही हर मुसलमान आतंकी नहीं मगर पकड़े जाने वाला हर आतंकी मुस्लमान ही निकलता है. इधर आतंक का ये नया चेहरा लव जिहाद के रूप में सामने आया है.


समझ नहीं आता कि शासन-प्रशासन कहाँ तक, किस बात की निगरानी करे, किस-किसके पीछे पहरेदारों की तरह भागती रहे. ऐसी किसी भी मानसिकता के लिए, किसी भी घटना के लिए परिवार वाले, समाज के लोग भी जिम्मेवार हैं. आखिर क्यों एक परिवार अपने बच्चों के चाल-चलन, उनकी मानसिकता पर नजर नहीं रख पा रहा है? आखिर क्यों किसी हिन्दू परिवार में उनके बच्चों में उनके धर्म, संस्कृति, सभ्यता के प्रति सकारात्मक वातावरण देखने को नहीं मिल रहा है? क्यों हिन्दू परिवारों के बच्चे लगातार अपनी धार्मिक मान्यताओं से विमुख होते जा रहे हैं? इन सवालों को समाज में, अपने परिवार में परखने की आवश्यकता है. ये विज्ञापन हो अथवा फ़िल्में, कोई कहानी हो या फिर किसी भी तरह का सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण सभी के पीछे कोई कुत्सित मानसिकता काम कर रही है. इस मानसिकता का एकमात्र उद्देश्य हिन्दू धर्म का मखौल बनाना, उसकी जड़ों को खोखला करना ही है.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

07 जनवरी 2020

विद्यार्थियों का नहीं राजनैतिक है जेएनयू विवाद


चुनाव की तिथियाँ घोषित होने के आसार पहले से ही थे और उसी के हेरफेर में आखिरकार उत्पाती गैंग, लोटा गैंग ने अपना कारनामा दिखा दिया. जेएनयू में पंजीकरण के नाम पर उत्पात किया गया उसके बाद उन्हीं उत्पातियों को अपनी तरह से दूसरे गैंग ने सबक भी सिखाया. पंजीकरण रोकने को मचा उत्पात किसी भी तरह से सुर्ख़ियों में नहीं आ सका मगर उसकी प्रतिक्रिया में जब हंगामा मचा तो सबकी निगाहों में आ गया. खून-खराबा हुआ, लड़कियों से, शिक्षकों से भी हाथापाई हुई. दोनों पक्ष अपनी-अपनी तरह से अपने-अपने तर्क रख रहे हैं. बहरहाल, ये हंगामा अब विश्वविद्यालय से संदर्भित कम केन्द्र सरकार से संदर्भित अधिक हो गया है. विश्वविद्यालय के विद्यार्थी गुटों की आपसी तनातनी से अधिक ये केन्द्र सरकार के निर्णयों के विरोध का हो गया है. यदि ऐसा न होता तो फिर उत्पात के बाद बामपंथियों द्वारा फ्री कश्मीर, हिन्दू राष्ट्र विरोधी, ब्राह्मण विरोधी, हिंदुत्व विरोधी नारे क्यों लगाये गए? स्पष्ट सी बात है कि इस उत्पात के बहाने बामपंथियों ने या कहें कि भाजपा-विरोधियों ने चुनावी रंगत को जमाना शुरू कर दिया है.

यदि इस हंगामे को, मारपीट को महज विद्यार्थी गुटों की लड़ाई माना जाये तो वे सारे लोग जो किसी न किसी रूप से हॉस्टल से अथवा विश्वविद्यालय की राजनीति के संपर्क में रहे हैं सहजता से बता सकते हैं कि ये हंगामा विद्यार्थियों के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए करवाया गया है. यदि ये हंगामा विद्यार्थियों के आपसी तनाव का, विभेद का मसला है तो इसमें वे राजनीतिज्ञ शामिल क्यों हुए जो अब किसी भी रूप में विश्वविद्यालय का हिस्सा नहीं हैं? इस संघर्ष में क्यों वे लोग शामिल होते चले जा रहे हैं जिनका न तो शिक्षा से कोई लेना-देना है और न ही शैक्षिक संस्थान से? स्पष्ट है कि ये दो विद्यार्थी गुटों का नहीं वरन राजनीति का उत्पात है. जो लोग भी हॉस्टल की जीवन-शैली से परिचित रहे होंगे, कॉलेज की गुटबंदी को जिसने पास से देखा होगा उसके लिए समझना आसान है कि ऐसे संघर्ष, ऐसी मारपीट आये दिन गुटों में होती रहती है. किसी दिन कोई एक गुट हावी रहता है, किसी दिन दूसरा गुट हावी हो जाता है. इस संघर्ष में, इस तनाव में किसी तरह का ऐसा मुद्दा मुख्य नहीं होता है जैसा कि इस उत्पात के बाद जेएनयू में दिख रहा है. 

इस तरह के तनाव, उत्पात जहाँ राजनीति के चलते बढ़ते जा रहे हैं वहीं इनके पीछे मीडिया का भी हाथ है. इसमें सोशल मीडिया को कतई दोषमुक्त नहीं कहा जा सकता है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया से ज्यादा दोषी तो वर्तमान में सोशल मीडिया ही है, ऐसे तनाव, संघर्ष के लिए. हर हाथ मोबाइल से लैस है. ऐसे में एक व्यक्ति उत्पात को अंजाम दे रहा होता है, दूसरा व्यक्ति उसको सोशल मीडिया पर पोस्ट करने में लगा होता है, तीसरा व्यक्ति उसे शेयर करके उसका फैलाव करता है तो चौथा व्यक्ति उस पर आपत्तिजनक टिप्पणी करके उत्पात को भड़काने का काम करता है. ऐसे न जाने कितने-कितने ग्रुप छोटे-बड़े रूप में बड़े योजनाबद्ध तरीके से कुत्सित मंसूबों को सफल बनाने के प्रयास करते रहते हैं. समाज में लोगों के बीच आग लगाने का काम करते हैं. वर्तमान में जेएनयू विवाद के पीछे विशुद्ध रूप से दिल्ली विधानसभा का होने वाला चुनाव है. इस चुनाव के चलते विद्यार्थियों की आड़ में केन्द्र सरकार के निर्णयों का विरोध करने और मतदाताओं के बीच नकारात्मक सन्देश प्रसारित करने की स्पष्ट मंशा दिख रही है.

12 अप्रैल 2019

ग़लतफ़हमी और अविश्वास में दरकते सम्बन्ध


कतिपय सार्वभौमिक सत्यों की तरह यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि ग़लतफ़हमी के चलते संबंधों के बिगड़ने में देर नहीं लगती है. इसके लिए किसी परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि यह अनादिकाल से सत्य होता चला आ रहा है. दो लोगों के आपसी संबंधों में बिखराव का एक कारण उनके बीच होने वाली ग़लतफ़हमी होती है. यह ग़लतफ़हमी कई तरह से संबंधों के बीच पनपने लगती है. आज के आपाधापी के दौर में, भागमभाग की स्थिति में सभी के पास सीमित समय रह गया है या कहें कि व्यक्तियों ने खुद को खुद में ही सीमित कर लिया है, इस कारण भी समय सीमित रह गया है. ऐसी स्थिति में लोगों के बीच आपसी वार्तालाप के अवसर बहुत कम आने लगे हैं. लोग जानबूझ कर भी आपस में मिलने से बचने लगे हैं. एक-एक व्यक्ति के भीतर अनेक-अनेक समाज पनप चुके हैं, वह उनको सँभालते-सँभालते ही अपने आपमें इतना परेशान हो जाता है कि किसी और जगह समय देने की स्थिति में नहीं रहता है.


ग़लतफ़हमी के साथ-साथ विश्वास-अविश्वास की स्थिति भी आपसी मनमुटाव का कारण बनता है. दो लोगों के मध्य अविश्वास का जन्म भी इसी ग़लतफ़हमी के कारण होता है. देखा जाये तो ग़लतफ़हमी और अविश्वास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इन दोनों का सह-सम्बन्ध भी है. एक के होने से दूसरे का उत्पन्न होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में चाहे पहले अविश्वास जन्म ले तो वहाँ ग़लतफ़हमी भी जन्म लेती है और यदि पहले ग़लतफ़हमी हो जाये तो वहाँ अविश्वास का जन्म हो जाता है. इधर देखने में आ रहा है कि वर्षों पुराने सम्बन्ध भी अचानक से जरा-जरा सी बात पर ग़लतफ़हमी का शिकार हो रहे हैं. अचानक से वर्षों पुराने संबंधों में अविश्वास पैदा हो जा रहा है. ये समझने का विषय है कि आखिर वर्षों पुराने संबंधों में एकदम से अविश्वास कहाँ, क्यों और कैसे उत्पन्न हुआ? यहाँ यह भी समझने वाली बात है कि यदि किसी स्थिति के चलते अविश्वास जैसी स्थिति आई भी, ग़लतफ़हमी का शिकार हुआ भी गया तो क्या आपसी सूझ-बूझ से, आपसी तालमेल से, आपसी बातचीत से उसे सुलझाने की कोशिश न की गई? ग़लतफ़हमी को दूर करने की कोशिश नहीं की गई?

इस तरह की स्थितियों से हमें स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर अनेक बार दो-चार होना पड़ता है जबकि अपने करीबी मित्रों, सहयोगियों, रिश्तेदारों के बीच उत्पन्न अविश्वास, ग़लतफ़हमी को दूर करने के प्रयास करने पड़ते हैं. ऐसा देखने में आया है कि बहुत बार अकारण जन्मे अविश्वास, ग़लतफ़हमी के पीछे कभी उनका अहं, कभी उनके बीच अबोल की स्थिति, कभी किसी पुरानी घटना को लेकर बना तनाव मुख्य कारण होता है. ऐसा ही कुछ हाल के दिनों में भी हुआ जबकि हमारे दो मित्रों के बीच उत्पन्न तनाव की स्थिति को, अविश्वास की स्थिति को दूर करने का प्रयास किया गया. यहाँ हवन करते हाथ जलने वाली बात हमारे साथ सत्य बैठ गई. दोनों मित्रों की चुप्पी के बीच हँसी-हँसी के वातावरण में हमने सुलझाव लाने की कोशिश की, इसी कोशिश में पता नहीं कहाँ से अविश्वास का, किसी पुरानी बात का, तनाव का, ग़लतफ़हमी का साया आ टपका. बस, एक झटके में बात बनने के बजाय बिगड़ने की दिशा में चली गई. दोनों तरफ से बात अपने-अपने स्तर पर सही समझ आ रही थी, मगर ऐसा सिर्फ भावनात्मक तौर पर ही सत्य समझ आ रहा था. भावनात्मक आधार पर निर्मित इमारत का व्यावहारिक स्वरूप निर्मित होता दिख नहीं रहा था. ऐसी स्थिति में पता नहीं उन दोनों के बीच बात सुलझी या और उलझ गई मगर हमारा प्रयास निरर्थक ही निकला. 

इस प्रयास में एक बात और स्पष्ट हुई कि शायद अभी भी हमें अपना विश्वास जमाने की आवश्यकता है क्योंकि बिना विश्वास के ऐसे मामले हल नहीं किये जा सकते हैं. दिल से, दिमाग से यही चाहा था कि दोनों दोस्तों के बीच का मसला सुलझ जाए, दोनों के बीच की तनाव की, अबोल की स्थिति समाप्त हो जाए और उन दोनों सहित हम भी सुखद स्थिति का अनुभव कर सकें. आखिर एक जिम्मेवारी सी समझ आ रही थी, उन दोनों मित्रों के बीच कॉमन मित्र बने होने के नाते. मित्रता का एक आधार जहाँ का तहाँ है, एक आधार शायद खिसक चुका है. बस उस आधार को बचाने के पहले अभी हमें खुद का ही विश्वास बचाना है. अपने विश्वास को पहले से भी अधिक ऊँचाई पर ले जाने का, पहले से अधिक मजबूत कर लेने का विश्वास तो हमें है बस कामना उन दोनों मित्रों के लिए है. जय हो....

12 मार्च 2019

होली के दाग, रमजान का चुनाव और मुसलमानों की चुप्पी


इधर दो-तीन घटनाएँ क्रमबद्ध रूप से एक के बाद एक करके सामने आती रहीं और विवाद का विषय बनती रहीं. ये सभी घटनाएँ मुस्लिम समुदाय से जुड़ी होने के कारण भी एकदम से वायरल हो गईं. इन घटनाओं में सर्फ़ एक्सेल का विज्ञापन, निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित चुनावी तारीखों का रमजान माह में पड़ना. उड़ती-उड़ती नज़रों से देखा जाये तो संभव है बहुत से लोगों को इसमें कोई विवाद दिखाई भी न दे. विज्ञापन वाले वीडियो में ऐसे लोगों को संभव है कि एक तरह का सौहार्द्र दिखाई दे. एक तरह का शांति-अमन का सन्देश दिया जाना दिखाई दे. शांति का सन्देश दिखना भी चाहिए मगर उसके लिए पूर्वाग्रह-रहित दृष्टिकोण चाहिए होगा. जिस तरह से होली के रंगों के बीच मजहबी रंग घोलने की कोशिश की गई उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे नमाज को जाते बच्चे पर रंग डाल दिया जाना किसी तरह की साम्प्रदायिकता हो जाती. क्या वाकई ऐसा है? क्या इस देश में मुसलमान होली नहीं खेलते हैं? क्या यदि नमाज पढ़ने को जाते किसी मुसलमान पर रंग लग जाए तो इसमें भी हिंसा होने जैसी स्थिति बन जाएगी? ऐसे बहुत से सवाल उमड़ने-घुमड़ने के बाद बचपन में ले जाते हैं, जहाँ याद है कि हमारे मोहल्ले में तमाम हिन्दू परिवारों के बीच एक मुसलमान परिवार भी रहता था. उस परिवार के सदस्यों को किसी भी होली में बचते नहीं देखा. स्त्री हों या पुरुष, वृद्ध हों या बच्चे सभी मिलजुल कर होली खेलते दिखते थे. बाद में युवावस्था में परिचितों संग, मित्रों संग होली पर नगर भ्रमण जैसी स्थिति बनती, होली के हुरियारों की टोली गली-गली घूमती तो भी किसी मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति को रंगों से परहेज करते नहीं देखा. हाँ, ये बात अवश्य थी कि जिसने इच्छा ज़ाहिर नहीं की, उसे रंग नहीं लगाया जाता था. ये एक तरह का अपनापन था, सौहार्द्र था जो कम से कम उस विज्ञापन वीडियो में नहीं दिखाई दिया.


दूसरा विवाद सामने आया रमजान माह में मतदान तिथियों के पड़ने का. निहायत बेवकूफी भरा विचार सामने आया कि रमजान माह होने के कारण निर्वाचन आयोग को मतदान की तिथियाँ नहीं रखनी चाहिए थी. क्या वाकई रमजान माह में अपने अल्लाह की इबादत के अलावा और कोई काम नहीं किया जाता क्या मुसलमानों द्वारा? क्या मतदान कार्य किसी तरह का अवैध कृत्य है, हिंसात्मक गतिविधि है या फिर गैर-इस्लामिक है जो रमजान माह में किया जाना पाप का भागी बनाएगा? ये महज एक चुनावी फितूर है जिसे राजनैतिक दलों द्वारा चुनावों के समय मुस्लिम समुदाय के वोटों का तुष्टिकरण करने के लिए छोड़ा जाता है. ये अवश्य माना जा सकता है कि मुसलमानों के लिए रमजान माह का विशेष महत्त्व है मगर ऐसा भी नहीं कि कुछ देर के मतदान का समय निकाल लेने पर उनकी किसी भी तरह की मजहबी गतिविधि पर अंकुश लग गया हो या फिर निर्वाचन आयोग द्वारा ही कोई अंकुश लगाया गया हो. जिस किसी ने भी इस तरह की राय व्यक्त की है वह मुस्लिम समुदाय का हितैषी नहीं वरन उसे वोट-बैंक समझने वाला व्यक्ति है. 


इन दोनों घटनाओं के सन्दर्भ में प्रतिक्रियाएं भी समाज में देखने को मिलीं. इनके बीच सबसे आश्चर्यजनक यह रहा कि खुद मुस्लिम समुदाय की तरफ से इन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. न तो किसी ने विज्ञापन वाले वीडियो का विरोध इस रूप में किया कि मुस्लिम भी होली खेलते हैं और न ही निर्वाचन आयोग के समर्थन में कोई मुसलमान दिखाई दिया. इससे क्या माना जाये कि देश का मुसलमान खुद को इस देश की स्थिति से, परम्पराओं से, संस्कृति से, त्योहारों से, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से कहीं अलग रखने की कोशिश करता है? उसका होली खेलना, दीपावली पर पटाखे चलाना, मतदान करना आदि किसी मजबूरीवश किया जाता है? यही वे स्थितियाँ होती हैं जबकि किसी भी धर्म, मजहब के कट्टर लोग इनका लाभ अपने लिए उठाने की कोशिश करते हैं. उनका सन्दर्भ किसी भी व्यक्ति या वर्ग से नहीं होता है बल्कि वे ऐसे किसी भी कदम में अपना लाभ देखते-उठाते हैं. ये सामान्य सी बात है कि ऐसी किसी भी विवाद की स्थिति में, जो मुसलमानों से जुड़ा होता है, मुस्लिम समुदाय इसके विरोध में एकजुट होकर खड़ा नहीं होता है. उसकी तरफ से ऐसे विवादों पर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं की जाती है. इससे भी सामान्य सा माहौल तनावग्रस्त बनते देर नहीं लगती है. देश के, समाज के हालात सामान्य रहें, हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच माहौल सौहार्द्र का बना रहे इसके लिए आवश्यक है कि मुसलमान भी एक कदम आगे बढ़ाएं.

10 जनवरी 2019

अदालती पचड़े में फँसा श्रीराम मंदिर मामला


श्रीराम जन्मभूमि मालिकाना हक़ से सम्बंधित मामला विगत कई वर्षों से भारतीय अदालती प्रक्रिया के चक्कर में फँसा हुआ है. किसी भारतीय फिल्म के एक संवाद, तारीख पे तारीख की भेंट चढ़ता हुआ उच्च न्यायालय पर एक निर्णय पर पहुँचा था लेकिन वहाँ भी गंगा-जमुनी तहजीब की कहानी कहने वालों को वह निर्णय हजम नहीं हुआ. उसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय में आ गया. यहाँ भी अदालती संस्कार ज्यों के त्यों देखने को मिले. अभी तक की कार्यवाही में महज इतना तय हो सका था कि उस मामले की सुनवाई कबसे करनी है. सोचने वाली बात है कि अभी यही तय हो पाया है कि सुनवाई की तारीख क्या होगी.


बहरहाल, तारीख पे तारीख गुजरते-गुजरते 10 जनवरी 2019 सर्वोच्च न्यायालय में श्रीराम जन्मभूमि अधिकार का मामला उस जगह आ गया जहाँ सुनवाई होनी थी. यहाँ आने के पहले विगत दिवस के चंद सेकेण्ड बहुत प्रभावी रहे जिनकी कार्यवाही के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय पीठ का गठन किया गया. इस संवैधानिक पीठ का बनाया जाना अदालती गंभीरता का सूचक जान पड़ा था. लग रहा था कि अब सुनवाई टाली न जाएगी वरन किसी दिशा की तरफ जाएगी. अबकी चर्चा के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि बेंच में शामिल जस्टिस यू०यू० ललित 1994 में कल्याण सिंह की ओर से अदालत में पेश हुए थे. इस तरह का मामला उठाने के बाद जस्टिस यू०यू० ललित ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया है. राजीव धवन द्वारा इसके साथ-साथ पीठ के तीन सदस्यीय से पाँच सदस्यीय किये जाने पर भी सवाल उठाया.

आज जिस तरह का प्रकरण उठाकर मामले को फिर लटकाया गया है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि न्यायालय इस मामले को सुलझाने के मूड में दिख नहीं रहा है. हालाँकि ऐसे संकेत पहले भी दिए जा चुके थे जबकि न्याय के मंदिर में कहा जा चुका था कि श्रीराम मंदिर निर्माण का प्रकरण उनकी प्राथमिकता में नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि मुस्लिम पक्ष के वकील द्वारा उठाया गया मुद्दा ऐसा नहीं था जिसके लिए सुनवाई की तारीख आगे सरकाई जाती. इस बिंदु पर आकर न केवल तारीख टाली गई है वरन अब संवैधानिक पीठ का पुनर्गठन किया जायेगा. न्यायमूर्ति ललित ने स्वयं को इस पीठ से अलग कर लिया है. ऐसे में आवश्यक नहीं कि अगली तारीख पर सुनवाई हो ही जाये क्योंकि मुस्लिम पक्षकार मामले को लटकाने में जितना महत्त्व दे रहे हैं, उतना ही कांग्रेस की तरफ से भी इसे हवा दी जा रही है. देखा जाये तो जनवरी 2019 तक इस मामले को सरकाने की कांग्रेस से सम्बंधित एक वकील साहब की मंशा तो पूरी हो ही गई है.

यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो श्रीराम का सवाल महज हिन्दुओं की आस्था का सवाल नहीं वरन इस देश की संस्कृति, परम्परा का भी सवाल है. देखा जाये तो वे भारतीयता के प्रतीक हैं, भारतीय संस्कृति के मर्यादा शिखर-पुरुष हैं. विगत काफी समय से न केवल हिन्दू पक्षकारों की तरफ से वरन मुस्लिम समुदाय की तरफ से तथा बुद्धिजीवियों, राजनेताओं, कलाकारों सहित अन्य क्षेत्रों के व्यक्तित्वों की तरफ से भी बात उठाई जा रही है कि इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा न बनाया जाये. बहुत से नामचीन लोगों द्वारा अपील की जा रही है कि मुस्लिम इसे देश की सांस्कृतिक एकता के लिए श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हों. इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष से कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है. विद्रूपता इस बात की है कि आये दिन कोई न कोई इस मामले में अनर्गल बयान देकर मुद्दे को विवादित बनाने की चेष्टा करने लगता है. समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि यह हिन्दुओं की सहनशीलता का परिचायक है कि वे ख़ामोशी से अदालत के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं. इसके बाद भी हिन्दुओं को ही सांप्रदायिक बताया जाने लगता है.

अब अगली तारीख 29 जनवरी निर्धारित की गई है. ऐसे में विचारणीय यह है कि जिस तरह से मुस्लिम पक्षकार वकील की तरफ से न्यायमूर्ति पर महज इसलिए सवाल उठाया गया कि वे किसी समय भाजपा के कल्याण सिंह की तरफ से अदालत में आये थे, क्या न्यायमूर्ति रंजन गोगोई पर उनके पिता का कांग्रेसी मुख्यमंत्री होने के कारण सवाल नहीं उठाया जा सकता? फ़िलहाल अब मामला 29 जनवरी तक सरका दिया गया है, उस दिन का इंतजार है.

03 जनवरी 2019

आज़ादी की चाह और बेड़ियाँ पहनने की आतुरता


महिला सशक्तिकरण के दौर में जहाँ कि सभी क्षेत्रों में अपनी हनकदार उपस्थिति का गर्व महिलाओं में दिखाई दे रहा है वहाँ एक मंदिर में किसी भी तरह से प्रवेश को लेकर जद्दोजहद मची हुई है. अदालती आदेश के बाद भी मंदिर प्रबंधकों तथा स्थानीय भक्तों द्वारा महिलाओं के प्रवेश को लेकर बनी स्थिति ज्यों की त्यों रही. कुछ अतिशय क्रांतिकारी महिलाओं द्वारा लगातार संघर्ष बनाये रखा गया कि कैसे भी मंदिर में प्रवेश करने को मिल जाए. अंततः खबर आई कि अँधेरे में दो महिलाओं ने मंदिर में घुसपैठ करके महिला सशक्तिकरण का इतिहास रच दिया. आये दिन धर्म को इसी बात के लिए कोसा जाता है कि इसने महिलाओं की स्वतंत्रता में अवरोध पैदा किया है. महिला सशक्तिकरण के नाम पर न जाने कितनी धार्मिक, पौराणिक कथाओं, पुस्तकों, ग्रंथों को गरियाया जाता है. इसके बाद भी ऐसी क्रांतिकारी महिलाओं द्वारा मंदिर में प्रवेश की आतुरता देखने को मिल रही थी. 


हो सकता है बहुत से लोग, तमाम नारीवादी इसकी वकालत करें कि आखिर मंदिर में प्रतिबन्ध जैसा भेदभाव क्यों? आखिर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से वंचित क्यों किया जा रहा है? एक हिसाब से ऐसे सवालों का उभरना सही भी है. आखिर जब समानता, स्वतंत्रता, अधिकारों की बात की जाती है तो फिर भेदभाव क्यों? क्यों किसी भी स्थान पर सिर्फ पुरुष का प्रवेश हो? क्यों महिलाओं को उनकी अपनी प्राकृतिक अवस्था के कारण मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित किया जाये? इसी बिंदु पर आकर सोचने की आवश्यकता है कि आखिर प्रतिबन्ध तोड़ने की प्रतिबद्धता या फिर जिद सिर्फ मंदिर के सन्दर्भ में ही क्यों? ऐसा किसी मस्जिद के लिए क्यों नहीं दिखाई देता? क्या वहाँ ऐसा करना समानता की बात करना न होगा? असल में ऐसे मामलों में बहुत गहराई से विचार किये जाने की आवश्यकता है. सिर्फ एक मंदिर प्रकरण से नहीं वरन तमाम सारे और प्रकरणों को भी इसी सन्दर्भ में देखा जाना आवश्यक है जबकि ऐसे कदमों के द्वारा प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से हिंदुत्व पर, हिन्दू धर्म पर, उसके रीति-रिवाजों पर चोट करने का प्रयास किया गया है. ऐसा ही कुछ मंदिर मुद्दे पर हुआ है.

अब जबकि दो महिलाओं ने मंदिर में अपने चरण घुसा ही दिए हैं, तब यह देखना है कि वे कहाँ-कहाँ तक अपने पैर घुसा पाने में सफल होती हैं. सिर्फ एक मंदिर ही नहीं अनेकानेक ऐसी जगहें हैं जहाँ आज भी महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित है. महिला सशक्तिकरण के दौर में एक और सशक्त कदम का इंतजार रहेगा.

14 दिसंबर 2018

राफेल नौटंकी पर अदालत का पर्दा

लम्बे समय से भारतीय राजनीति में चर्चित रहा राफेल विमान सौदा मामला आख़िरकार सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा एक तरफ से समाप्त कर दिया गया. तीन न्यायाधीशों की बेंच द्वारा 14 नवम्बर को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था. इसे आज, 14 दिसम्बर को सुनाया गया. न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया कि राफेल विमान सौदे में किसी तरह की कमी नहीं है. इस मामले में केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है. न्यायालय द्वारा यह भी कहा गया कि वर्तमान में वायु सेना को इन विमानों की आवश्यकता भी है. ज्ञात हो कि देश ने लगभग 58,000 करोड़ रूपए की कीमत पर 36 राफेल विमान खरीदने के लिये फ्रांस के साथ समझौता किया है ताकि भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता में सुधार किया जा सके. इस सौदे को लेकर विपक्षी दलों में विशेष रूप से कांग्रेस द्वारा लगातार विरोध प्रदर्शन किये जाते रहे. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा अनेकानेक बार सार्वजनिक रूप से और सदन में भी इस मामले को उठाया जाता रहा है. उनके द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर घोटाला किये जाने का आरोप लगाया गया. 


असल में भारतीय वायुसेना की क्षमता लगातार कम होती जा रही थी. इसलिए वायुसेना द्वारा मांग किये जाने पर अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने 126 लड़ाकू विमान खरीदने का प्रस्ताव रखा. कालांतर में उनके इस प्रस्ताव को उनके बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार ने आगे बढ़ाया. तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटोनी की अगुआई में रक्षा खरीद परिषद ने 126 एयरक्राफ्ट खरीदने की मंजूरी अगस्तर 2007 में दी. इसके बाद बोली लगने की प्रक्रिया शुरू हुई. यूपीए सरकार में इस सौदे पर आपसी सहमति न बन पाने के कारण समझौता न हो सका. इसके पीछे मूल कारण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के मामले में दोनों पक्षों में गतिरोध का पैदा हो जाना रहा था. इस मामले में दोबारा सक्रियता उस समय शुरू हुई जबकि सन 2014 में केंद्र में मोदी सरकार का गठन हुआ. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान वर्ष 2015 में भारत और फ्रांस के बीच राफेल विमान की खरीद को लेकर समझौता किया गया. इस मामले में विवाद इसी के बाद शुरू हुआ. वर्तमान केंद्र सरकार का कहना है कि उसने इस समझौते के बाद विमान खरीद में लगभग 12,600 करोड़ रुपये बचाए हैं. इस बीच मीडिया में आई खबरों के द्वारा यह तथ्य सामने आता रहा कि यह पूरा सौदा 7.8 अरब रुपये यानी 58,000 करोड़ रुपये का हुआ है और इसकी 15 फीसदी लागत एडवांस में दी जा रही है. इसे लेकर कांग्रेस सहित अन्य विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर हो गया. उनका कहना है कि पूर्व की यूपीए सरकार 126 विमानों के लिए 54,000 करोड़ रुपये दे रही थी जबकि वर्तमान मोदी सरकार सिर्फ 36 विमानों के लिए 58,000 करोड़ दे रही है. कीमत के इस विवाद के अलावा विपक्षियों का एक आरोप यह भी है कि वर्तमान केंद्र सरकार ने इस खरीद में देश की प्रमुख कंपनी एचएएल को किनारे लगाकर एक निजी कंपनी को वरीयता दी. इससे न केवल निजी कंपनी को लाभ पहुँचाया गया वरन एचएएल को भी करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है.

लगातार बढ़ते विवाद के बीच सर्वोच्च न्यायालय को बीच में लाया गया. अब जबकि न्यायालय द्वारा निर्णय वर्तमान केंद्र सरकार के पक्ष में आया है तब देश के सामने लगातार तथ्यात्मक झूठ बोलने के कारण विपक्षी दल और नेता क्या कदम उठाएंगे. ये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि देश की सुरक्षा के लिए, वायुसेना की ताकत बढ़ाने की दृष्टि से खरीदे जाने वाले विमानों पर भी राजनीति की जाने लगी. एक पल को ये स्वीकार भी कर लिया जाये कि वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा कीमतों को लेकर किसी तरह से घोटाला किया गया और बारबार विपक्षी दलों के कहने के बाद भी समझौते से सम्बंधित दस्तावेज, कीमतों से सम्बंधित तथ्य सार्वजनिक नहीं किये तो खुद विपक्षियों को तत्कालीन कीमतों और अन्य दस्तावेजों को सार्वजनिक करते हुए वर्तमान केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल उठाये जाने चाहिए थे. यह तो पूरे देश ने देखा था जबकि सदन में कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा फ़्रांस के राष्ट्राध्यक्ष की कथित मुलाकात, बातचीत का हवाला दिया गया था. उसके तुरंत बाद इस मामले के तूल पकड़ने पर दोनों देशों की तरफ से सम्बंधित बिंदु पर सफाई सार्वजनिक रूप से प्रकट की गई थी. ऐसे में स्पष्ट है कि केंद्र सरकार विरोधियों के पास, मोदी विरोधियों के पास राफेल विमान सौदे को लेकर किसी तरह के तथ्य अथवा प्रामाणिक जानकारी नहीं थी. वे महज राजनीति के लिए इस मुद्दे को हवा देकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि को धूमिल करना चाह रहे थे. इस पूरे प्रकरण का लाभ उनके द्वारा हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों में भी उठाये जाने की मंशा रही होगी. बहरहाल, अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले में अपना निर्णय सुना दिया गया है तब समूचे देश के सामने लगातार झूठ बोलने के लिए राहुल गाँधी को और अन्य नेताओं को माफ़ी माँगनी चाहिए.

01 नवंबर 2018

देश के गौरव की प्रतिमा पर भी विवाद


कल रात सपने में कथित और व्यथित गांधी with नेहरू आए. उन्होंने एक नया ख़ुलासा किया, मूर्ति स्थापना को लेकर. तब स्थिति स्पष्ट हुई कि उनकी मूर्तियाँ स्थापित नहीं की गईं बल्कि प्रकट हुईं हैं.

कुछ आसमानी किताब की तरह से.
कुछ इनकी पसीने की बूँद से.
कुछ उस पेय पदार्थ से भी, जिसे पीने के लिए लोग लाइन लगाए खड़े रहते थे. इसलिए इन पर धन ख़र्च हुआ ही नहीं. धन इस प्रतिमा पर पहली बार ख़र्च हुआ है.

पूरा देश भौचक्का है... खास तौर से कांग्रेसी और बसपाई...
इसलिए क्योंकि देश की पहली मूर्ति आज लोकार्पित की गई. ये दोनों चापलूस समझ ही नहीं पाए कि ये है क्या? कांग्रेसियों ने कभी अपने अम्मा-बाप के चित्र न लगाये. बसपाइयों ने कभी बहिन जी के न लगाये और मोदी को देखो मूर्ति बनवा दी. सब आश्चर्य में कि ये क्या बनवा दिया विशालकाय. एक गलत परम्परा का सूत्रपात करवा दिया. अब हर गली-चराहे-पार्क में नेहरु-गाँधी की मूर्ति लगेगी. पार्क के नाम पर हाथी लगेंगे. जिंदा रहते खुद की मूर्ति लगेगी.

मोदी तुम बहुत बुरे हो. अच्छा-खासा देश उन्नति कर रहा था. मूर्तियों की राजनीति से बाहर था. अभी तक ऐसे धन का उपयोग चिकित्सालय बनवाने में, शिक्षण संस्था बनवाने में, गरीबों की मदद करने में किया जाता रहा है, सो इसी कारण से कोई बीमार नहीं था. सभी पैदा होते ही इंजीनियर-डॉक्टर-वैज्ञानिक आदि बन जाते थे. अब आज के बाद से विशुद्ध गरीब पैदा होंगे. नंगे-भुखमरी के शिकार पैदा होंगे. अशिक्षित पैदा होंगे. तुमने देश को सदियों पीछे धकेल दिया एक मूर्ति लगा कर. सरदार पटेल के समर्थक भले तुम्हें माफ़ कर दें मगर देश में मूर्ति स्थापना की नवीन परम्परा डालने के कारण कांग्रेसी तुमको माफ़ न करेंगे.

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विश्व के सात अजूबों में एक ताजमहल शामिल है (जो एक कब्र के रूप में प्रचारित है... भले ही उसमें शंकर जी का मंदिर माना जाता हो, तेजोमहालय माना जाता हो) उस ताजमहल के लिए कूद-कूद मरे जाते हो मगर जब विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति की बात आई, स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी की तो सबको पेचिश लगने लगी, वो भी बौद्धिक और खूनी. अपने-अपने दिमाग गुलामी से बाहर निकालो. पैसा तुम्हारे बाप का ही खर्च हुआ था ताजमहल में, यहाँ भी तुम्हारे बाप का, तुम्हारा खर्च हुआ है पर ये गुलामी का नहीं बल्कि गौरव का पर्याय है.

28 जून 2018

मगहर की टोपी और मुस्लिमों के कबीरदास


गुजरात के टोपी विवाद के बाद उत्तर प्रदेश में भी टोपी को विवाद बनाया जा रहा है. कबीरदास की पाँच सौवीं पुण्यतिथि के अवसर पर प्रधानमंत्री के मगहर भ्रमण को लेकर होने वाली तैयारियों एवं अन्य स्थितियों का जायजा लेने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वहाँ पहुँचे. मगहर में बनी कबीरदास की मजार में पहुँचने पर योगी जी को टोपी पहनाने की कोशिश की गई. योगी जी ने टोपी पहनने से इंकार कर दिया. इसके बाद भी उस टोपी को उनको पकड़ाने का प्रयास किया जाता रहा. मीडिया को जैसे इसी मौके की तलाश थी. अब उसके लिए देश भर से, उत्तर प्रदेश से सारे मुद्दे समाप्त हो गए हैं. सभी जगह एकमात्र मुद्दा योगी जी का टोपी न पहनना बना हुआ है.

मगहर में कबीरदास प्रतिमा 

मगहर में जिन कबीरदास जी के अंतिम संस्कार को लेकर हिन्दू-मुस्लिम विवाद हुआ था और कहते हैं कि इस विवाद के बाद कबीरदास जी के पार्थिव शव के स्थान पर फूल ही मिले, जिन्हें हिन्दू-मुस्लिम ने आपस में बाँट कर अपने-अपने धार्मिक तरीके से उनका अंतिम संस्कार किया. मगहर में आज भी दोनों धर्मों के प्रतीक एक स्थल पर बने हुए हैं. 27 एकड़ में फैले इस समाधि स्थल में कबीरदास की आदमकद प्रतिमा ने बरबस ध्यान आकर्षित करती है. एक तरफ मजार कबीर साहब की इबारत लिखी इमारत थी, जो अपने आपमें स्पष्ट संकेत दे रही थी इस्लामिक मजहबी होने का. इस इमारत के भीतर दो मजारें, एक कबीरदास की तथा दूसरी उनके बेटे की बताई जाती है. इसी इमारत के दूसरी तरफ एक छोटी सी दीवार पार करने पर बनी इमारत के प्रवेशद्वार पर सदगुरु कबीर समाधि का लिखा होना और भीतर कबीर की मूर्ति का होना उसके स्वतः ही हिन्दू धर्मावलम्बियों के होने के संकेत देती है. इस विस्तृत समाधि प्रांगण के एक तरफ पुस्तकालय, दूसरी तरफ कबीर साहित्य विक्रय हेतु उपलब्ध है.

लेखक ने स्वयं मगहर में इस स्थान का भ्रमण किया है. एक प्रांगण में दो धर्मों, मजहबों की इमारतों को अलग-अलग रूपों में देखने के बाद जहाँ एक तरफ ख़ुशी का एहसास हुआ वहीं मन में एक खटका सा भी लगा कि क्या मुसलमानों ने कबीर को वर्तमान में अपने मजहब का नहीं माना है? क्या मुसलमानों में कबीर-साहित्य के प्रति अनुराग नहीं है? हिन्दू धर्म के साथ-साथ इस्लाम की आलोचना करने वाले कबीर को क्या वर्तमान मुसलमानों ने विस्मृत कर दिया है? दोनों इमारतों की स्थिति, वहाँ आने वाले लोगों की स्थिति, दोनों तरफ की व्यवस्थाओं को देखकर, दोनों इमारतों में सेवाभाव से कार्य करने वालों को देखकर लगा कि आज के समय में कबीर भी धार्मिक विभेद का शिकार हो गए हैं. वो और बात रही होगी जबकि उनके अंतिम संस्कार के लिए आपस में हिन्दू-मुस्लिम में विवाद पैदा हुआ होगा किन्तु मगहर में स्थिति कुछ और ही दिखाई पड़ी. इस्लामिक इमारत के नीचे मजार के रूप में कबीर नितांत अकेलेपन से जूझते दिखाई दिए. जहाँ बस एक इमारत, एक सेवादार, नाममात्र को रौशनी और चंद हरे-भरे पेड़-पौधे उनके आसपास हैं. किसी समय में तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों पर बेख़ौफ़ होकर बोलने वाले कबीर आज इस विभेद पर गहन ख़ामोशी ओढ़े लेटे दिखे. उस स्थल को और बेहतर बनाने, कबीरदास की स्वीकार्यता मुस्लिमों में भी बनाने, कबीरदास के साहित्य का प्रचार-प्रसार मुस्लिमों के बीच करने के बजाय वहाँ के सेवादार आने वाले को टोपी पहनाने को आतुर दिखे.

21 अप्रैल 2018

संवेदनशीलता के साथ हो कठुआ काण्ड की जाँच


अभी तक किसी भी घटना पर मीडिया ट्रायल देखते आ रहे थे, अब सोशल मीडिया भी इसी भूमिका में आ गया है. पिछले दिनों कठुआ कांड को जिस तरह से मजहबी रंग देकर उछाला गया उसे लेकर मीडिया की अपनी भूमिका रही. उसकी भूमिका से इतर सोशल मीडिया पर लोगों के अपने-अपने विचार सामने आने लगे. फोटो, वीडियो खुलकर पीड़ित बच्ची का नाम, पता बताने में लग गए. इन्हीं फोटो, वीडियो के बीच ऐसी भी पोस्ट सामने आईं जो उस कांड की सत्यता उजागर करने की ओर बढ़ती दिख रही थीं. लोगों की न्यायविद बनने, पत्रकार बनने, नेता बनने, जज बनने, जासूस बनने की भूमिकाओं के बीच हिन्दू धर्म को कटघरे में खड़ा कर दिया गया. मंदिरों को अपराध-स्थल और हिंदुत्व को बलात्कारी धर्म जैसा साबित किया जाने लगा. कार्टून बनाये जाने लगे, टी-शर्ट पहनकर विदेशों तक में ये बताया जाने लगा कि भारत में स्त्री सुरक्षित नहीं है. विदेश की बातें फिर कभी क्योंकि वहां बैठे लोग और देश में बैठे उनके एजेंट देश की छवि वैश्विक स्तर पर ख़राब करने को सदैव से आमादा रहे हैं. बहरहाल, देश में कठुआ कांड को लेकर इस तरह की मोर्चेबंदी की जाने लगी जैसे भाजपा और हिंदूवादी लोग बलात्कार करने में लगे हैं. हिन्दू धर्म पर इसी बहाने न केवल उंगली उठाई गई बल्कि पूरी तरह से बदनाम भी किया गया. बहुतेरे बुद्धिभोगी टाइप लोगों को अपने हिन्दू होने पर, अपने पुरुष होने पर शर्म आने लगी. इसके बाद भी उन्होंने न अपना हिन्दू धर्म त्यागा और न ही पुरुष से लिंग परिवर्तन किया.


आरोपों, प्रत्यारोपों के बीच बहुत से ऑडियो, बहुत से वीडियो, बहुत सी रपटों ने कठुआ कांड की असलियत को सामने लाने का काम भी किया. घटना से सम्बंधित तमाम सारी बातों के बीच मीडिया में खबर छपी कि दुष्कर्म के एक आरोपी उस दिन अपनी परीक्षा दे रहा था. इस बावत साक्ष्य भी प्रस्तुत किये गए. इसी के साथ हल ही में खबर आई कि पीड़ित बच्ची के साथ रेप नहीं हुआ था. ये भी बताया गया कि उसकी खोपड़ी भी सुरक्षित थी जबकि इससे पहले बताया जा रहा था कि बच्ची की हत्या सिर कुचल कर की गई थी. मंदिर के सम्बन्ध में भी अनेक तथ्य सामने आने से और मृतक बिटिया की स्थिति से ये समझाने की कोशिश की गई कि अपराध मंदिर में नहीं हुआ था. रेप हुआ या नहीं, घटना मंदिर में हुई या नहीं, हत्या सिर कुचल कर की गई या अन्य तरीके से इन बिन्दुओं पर चर्चा होने से बेहतर है कि अब पहली चर्चा इस बात पर हो कि एक बेटी की हत्या हुई है, एक बच्ची की मौत हुई है उसकी यदि हत्या हुई है तो आरोपी कौन है? और यदि उसकी मृत्यु किसी दुर्घटना से या फिर किसी असामान्य स्थिति में हुई है तो वह क्या है? मीडिया या सोशल मीडिया इन बिन्दुओं पर चर्चा नहीं हो रही है. अभी तक कठुआ कांड में रेप घटना के बारे में बोलने वाले पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को गलत बताने में लग गए हैं और इससे इतर लोग दूसरे तरह की बयानबाजी में लग गए हैं.


एक बच्ची की मृत्यु की जाँच के साथ-साथ एक जाँच और आवश्यक है कि किसने और क्यों इस पूरे मामले को हिन्दू-विरोधी रंग देने की कोशिश की? कैसे एक योजनाबद्ध तरीके से देश भर में उस बच्ची का नाम, फोटो सार्वजनिक किया गया? किस तरह से सामाजिक अपराधिक घटना को राजनैतिक रंग देकर किसके द्वारा अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास किया गया? ऐसा नहीं है कि देश में रेप की या फिर बच्चियों के साथ रेप की यह पहली वारदात थी. इसके पहले भी ऐसी घिनौनी हरकतें होती रही हैं किन्तु इसी बार इस मामले को मजहबी रंग देने की कोशिश की गई है, इसकी भी जाँच की जानी चाहिए कि आखिर वे कौन लोग हैं जो संवेदनशील मामले को धार्मिक रंग देने में लगे थे? शर्मनाम यह रहा कि इस पूरे मामले में सोशल मीडिया के वे लोग भी पुरजोर ढंग से सरकार के, हिंदुत्व के खिलाफ दिखे जो अपने आपको बुद्धिजीवी बताते नहीं थकते हैं. इस मामले में एक शर्मनाक पहलू और भी सोशल मीडिया में निकल कर आया कि इस मामले के सापेक्ष समूचे माहौल को पुरुष-विरोधी साबित किया जाने लगा. बहुत सी महिलाओं द्वारा अपनी प्रोफाइल काली करके महिला-विहीन समाज होने की स्थिति बनाई गई. यहाँ उनकी खुद की समझ से परे था कि कैसे एक बच्ची की हत्या और यदि रेप हुआ है तो वह समाज में महिला-पुरुष विरोधी आन्दोलन की आधारभूमि कैसे बन सकता है. (इस विषय पर बाद में)

कुल मिलाकर जिन ताकतों ने एक बच्ची की मौत को धार्मिक उन्माद में बदलने की साजिश रची थी, वे सफल नहीं हो सके. हाँ, ऐसे लोग सोशल मीडिया पर अवश्य ही माहौल ख़राब करने में सफल रहे. किसी आपराधिक घटना को संवेदना-रहित बनाकर अपने-अपने तर्क-कुतर्क करते देखे गए. रेप की आड़ में पुरुष समाज को गाली देते देखे गए. मंदिर को निशाना बनाकर हिन्दू धर्म को कलंकित करते देखे गए. फ़िलहाल, सबके अपने-अपने तर्क-कुतर्क हैं मगर सत्य यह है कि एक बच्ची की मौत हुई है, सत्य यह भी है कि कतिपय स्वार्थी ताकतों ने धार्मिक उन्माद फ़ैलाने की कोशिश की है. ऐसे में जाँच एजेंसियों की, सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि वह पूरी गंभीरता के साथ इस मामले की जाँच करे और इसके दोषी लोगों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये.

15 अप्रैल 2018

बढ़ती भयावहता और बढ़ती वैमनष्यता


लगता है कुछ लिखने, विचार करने, आपसी संवाद करने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है. समाज में एक तरफ जहाँ भयावहता बढ़ती दिख रही है वहीं उसके साथ-साथ वैमनष्यता भी बढ़ती दिख रही है. एक-दूसरे के साथ संवाद-हीनता की स्थिति तो बढ़ ही रही है, एक-दूसरे पर अविश्वास भी बढ़ता जा रहा है. समाज का व्यक्ति अपने-अपने वर्गों, अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार अपने-अपने तर्कों को गढ़ने में लगा है. ऐसे में किसी समस्या का समाधान खोजने के स्थान पर सामने वाले पर दोषारोपण का कार्य किया जा रहा है. समाज में घटित होने वाली हर छोटी-बड़ी घटना को धर्म, जाति से जोड़कर उसका विश्लेषण किया जाने लगा है. यह वह स्थिति है जिसने व्यक्तियों को आपस में एकजुट होने से रोक रखा है. यही कारण है कि अपराधी हर बार अपराध करने के बाद बच जाता है और फिर अगले अपराध के लिए खुद को सक्रिय करने लगता है. अपराध करने के बाद बार-बार बचते रहना ऐसे अपराधियों के हौसले बुलंद करता है. उनकी बढ़ती ताकत को देखने के बाद भी हम सब ऐसे खामोश हैं जैसे कि उनके कातिल हाथ हमारे घरों तक नहीं पहुंचेंगे. हम ये समझ कर शांत बैठे हैं कि वे हत्यारे हमारी बेटियों, बहिनों को अपना शिकार नहीं बनायेंगे. हम माने बैठे हैं कि हम एक विचारधारा विशेष से आते हैं तो हम सुरक्षित बने रहेंगे. जबकि सत्यता इससे परे है.


इधर विगत कुछ समय से देखने में आ रहा है कि देश भर में एक-एक करके मामलों को, घटनाओं को जाति, धर्म के आधार पर उठाया जाने लगा है. किसी न किसी धर्म, संप्रदाय से सम्बंधित खबरों, घटनाओं को बहुतायत में प्रचारित किया जाता है, बिना ये सोचे-समझे कि इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा. किसी भी घटना को, वारदात को, हिंसा को प्रायोजित तरीके से पेश करने की आदत सी बनती जा रही है. विद्रूपता इसकी है कि ऐसा करने वाले वे लोग हैं जिन्हें समाज का बहुत बड़ा तबका देखता-सुनता-पढ़ता है. ऐसे लोगों के लिए भी बच्चियों की हत्या में, उनके रेप में धर्म, जाति मुख्य रूप से प्रमुख होती है. उनकी रिपोर्ट का आधार भी बच्ची के साथ घटित होने वाली वारदात नहीं वरन उसका धर्म, जाति मायने रखती है. अपराधी की पहचान से ज्यादा उसका धर्म, जाति बताना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है. किसी भी वारदात, हिंसा की मूल वजह खोजने के स्थान पर उसको जबरिया सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जाने लगती है. सोचने वाली बात है कि ऐसा करने का इन लोगों का मंतव्य क्या है? आखिर ऐसा दिखा कर ये लोग समाज में किस तरह का माहौल बनाना चाहते हैं?

स्पष्ट है कि चुनावी वर्ष आरम्भ हो चुका है. ये लोग भी एक तरह के राजनैतिक कार्यकर्त्ता है जो हिंसा, अत्याचार, वैमनष्यता, कटुता आदि के प्रचार के द्वारा अपने-अपने दलों के लिए काम करते हैं. इनकी नारेबाजी भी इसी तरह की होती है. इनके बैनर, पोस्टर भी इसी तरह के होते हैं. ऐसे में नागरिकों को समझने की जरूरत है कि वे इनकी बोली जाने वाली भाषा को कैसे समझ रहे हैं.

02 अप्रैल 2018

राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के लिए विरोध


देश के बहुत सारे दलित संगठनों ने एससी/एसटी एक्ट पर उच्चतम न्यायालय के फैसले के विरोध में भारत बंद का ऐलान किया था. भारत बंद को कांग्रेस, बसपा सहित कई राजनीतिक पार्टियों का समर्थन भी मिला. इस आन्दोलन में लगे संगठनों और राजनैतिक दलों की मांग थी कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में उच्चतम न्यायालय द्वारा किये संशोधन को वापस लिया जाये और एक्ट को पहले की तरह लागू किया जाए. उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कुछ दिन पहले कहा था कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति की गिरफ़्तारी न की जाये बल्कि उसे जमानत दी जाये. आदेश में कहा गया है कि ऐसे किसी मामले में न केवल गिरफ़्तारी को रोका गया है बल्कि एफआईआर लिखने को भी प्रतिबंधित किया गया है. एफआईआर दर्ज करने के पहले डीएसपी द्वारा ऐसे मामले की जाँच की जाएगी. ऐसे मामलों में किसी अधिकारी की गिरफ़्तारी के पहले उसके उच्चाधिकारियों से अनुमति लेनी होगी और किसी सामान्य व्यक्ति के सन्दर्भ में एसएसपी से ऐसी अनुमति चाहिए होगी. इस आदेश के आने के बाद से तमाम दलित संगठनों के अलावा कई राजनैतिक दलों ने इस निर्णय को सरकारी मंशा से ओतप्रोत बताया. उनके द्वारा आरोप लगाया गया कि सरकार द्वारा संविधान से छेड़छाड़ की जा रही है और दलितों के हितों से खिलवाड़ किया जा रहा है. यहाँ समझना होगा कि आखिर उच्चतम न्यायालय का आदेश सरकार का आदेश कैसे हुआ? दूसरी बात कि न्यायालय ने इस अधिनियम को समाप्त तो किया नहीं है वरन ऐसे व्यक्तियों के हितों का संरक्षण किया है जो दुर्भावना के तहत इस अधिनियम में फँसा दिए जाते हैं.


दरअसल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 11 सितम्बर 1989 को संसद में पारित किया गया, जो जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है जो एससी/एसटी वर्ग से सम्बंधित नहीं है और इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है. इस अधिनियम में 5 अध्याय एवं 23 धाराएं हैं. यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है. इस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए लिए विशेष अदालतों की भी व्यवस्था है. उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश वर्ष 2009 को महाराष्ट्र के गवर्नमेंट फार्मेसी कॉलेज में एक दलित कर्मचारी की तरफ से फर्स्ट क्लास के दो अधिकारियों के खिलाफ कानूनी धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कराने के बाद उत्पन्न हुआ. इंस्टिट्यूट के प्रभारी डॉ० सुभाष महाजन द्वारा लिखित में कोई निर्देश नहीं देने के बाद दलित कर्मचारी ने सुभाष महाजन की शिकायत कर एफआईआर दर्ज कराई. सुभाष महाजन ने उच्च न्यायालय से अपनी एफआईआर रद्द करने की मांग की किन्तु उच्च न्यायालय ने इस माँग को ठुकरा दिया. बाद में सुभाष महाजन ने उच्चतम न्यायालय में अपील की. जहां उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को हटाने का आदेश दिया गया. इस मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि ST/SC एक्ट के तहत गिरफ्तारी न की जाए बल्कि अग्रिम जमानत की मंदूरी दी जाए.


किसी निर्णय का विरोध करना लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है. ऐसा करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है किन्तु भारत बंद के दौरान जिस तरह से हिंसात्मक तरीके अपनाये गए वह न केवल आपत्तिजनक है बल्कि निंदनीय है. इस बंद के दौरान किये गए उत्पात में न केवल सार्वजनिक, निजी संपत्ति को नुकसान हुआ वरन कई जगह से लोगों के मारे जाने की खबर भी आई है. यहाँ ऐसे संगठनों को सोचना होगा कि वे आखिर चाह क्या रहे हैं? वे खुद भी बहुत अच्छे से समझते हैं कि उनके द्वारा इस कानून का किस तरह दुरुपयोग किया जा रहा है. पूरे देश में दर्ज ऐसे मामलों में 85 प्रतिशत मामले फर्जी पाए जाते हैं. संविधान द्वारा संशोधन करके दलितों के हितों का संरक्षण करने के लिए, उनके साथ भेदभाव को समाप्त करने के लिए बनाया गया अधिनियम एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है. आये दिन दलितों द्वारा इस अधिनियम के अंतर्गत फँसा देने की धमकी दिए जाने की खबरें सामने आती रहती हैं. ऐसे में यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा कोई आदेश आया था तो उसके लिए लोकतान्त्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज करवाया जा सकता था. ऐसा न करते हुए तमाम सारे दलित संगठनों और राजनैतिक दलों ने इस निर्णय को अपनी राजनीति चमकाने का अवसर माना. उनके द्वारा न्यायालय के इस निर्णय की आड़ में मोदी का, भाजपा का विरोध किया जाना था और उसका परिणाम जान-माल के नुकसान के द्वारा सामने आया.

आज जिस तरह से सवर्णों के देवी-देवताओं के साथ अभद्रता की जा रही है, उनके धार्मिक स्थलों, मानकों के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किया जा रहा है, उनको इस अधिनियम के द्वारा जबरन फंसाया जा रहा है उससे साफ़ है कि ये दलित संगठन और इनके नेता किसी भी रूप में आपसी सद्भाव नहीं चाहते हैं. आज दलित वर्ग कानूनी प्रावधान की आड़ लेकर सवर्णों का उत्पीड़न करने का कार्य कर रहा है और इसे उनके पूर्वजों के उत्पीड़न का बदला बताया जा रहा है तो कालचक्र किसी दिन फिर घूमेगा. उत्पीड़न का बदला उत्पीड़न वाला नियम चलता रहेगा, जिसे कभी कानून मदद करेगा तो कभी जन-समुदाय. इस नियम से, इस सोच से संभवतः किसी का भला तो नहीं ही होने वाला, चाहे वाल व्यक्ति हो या संगठन.