शरारत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शरारत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

28 अक्टूबर 2025

खुराफाती पलों का बिंदास साथी

अपने पढ़ने के शौक के कारण ऐसा बहुत ही कम होता है कि कोई पुस्तक मँगवाई जाए और बिना पढ़े अलमारी में सज जाए. इसी तरह ऐसा तो बहुत कम ही पुस्तकों के साथ होता है कि आने के बाद कुछ ही घंटों में उसे चट कर दिया जाये. आज ही अपने कर्मकांडी मित्र अनुराग की पुस्तक हाथ लगी. ये बात कहने में कोई गुरेज नहीं कि आज किसी भी व्यस्तता में होते उसे छोड़कर पहला काम अनुराग के उपन्यास को पढ़ना रहता. हुआ भी कुछ ऐसा ही. कॉलेज से लौटते ही कोरियर वाले ने पुस्तक थमाई उसके बाद उसी को पढ़ने का काम शुरू हुआ.

उपन्यास की समीक्षा इस पोस्ट के बाद, अभी कुछ बातें अनुराग और अपने बारे में. 1990 में स्नातक की पढ़ाई के लिए जब ग्वालियर के साइंस कॉलेज में एडमिशन लिया तो हॉस्टल में सबसे पहली मुलाकात अनुराग से ही हुई. उस पहली मुलाकात में बहुत ही संक्षित सी बातचीत हुई मगर उसके बाद डिफ़ॉल्ट सेटिंग में इंस्टाल खुराफातों ने आजतक हमें और अनुराग को लगातार साथ बनाये रखा.

हॉस्टल की एक फोटो, 1991 

हॉस्टल के बहुत से मित्र आज भी साथ हैं, बहुत से सीनियर बड़े भाई की तरह अपना आशीष बनाये हुए हैं, बहुत से जूनियर छोटे भाई की तरह जीवन से जुड़े हुए हैं. सभी भाई किसी न किसी विशेषता के कारण सबसे अलग थे, आज भी अपनी उसी विशेषता के कारण अलग हैं. अनुराग पहले दिन से ही एकदम बिंदास, जिंदादिल, बेख़ौफ़ व्यक्तित्व से भरा हुआ लगा और ऐसा आजतक है. संभवतः इसी डिफ़ॉल्ट सेटिंग के कारण स्थलीय दूरी होने के बाद भी हम दोनों अलग-अलग नहीं हो सके.

हॉस्टल मीट, 2017

बिंदास, मौजियल स्वभाव के अनुराग के साथ मिलकर कितनी-कितनी खुराफातें रची गईं कहना मुश्किल है. उसकी एक बिंदास फोटो आज भी हमारे कलेक्शन को महकाती-चहकाती है. इसे आशीर्वाद ही कहा जायेगा कि 2017 में हॉस्टल मीट के दौरान मंच से हम लोगों के वार्डन रहे चंदेल सर ने अनुराग और हमारा ही नाम लेकर हमारी शरारतों का जिक्र किया. होली के ठीक पहले अनुराग के साथ मिलकर हाथ ठेला पर बिठाकर अपने एक सीनियर को रेलवे स्टेशन छोड़ने की घटना का जिक्र हम आज तक अपने दोस्तों के बीच किया करते हैं. अनुराग को पत्र मित्र कॉलम में कुमारी अनु के नाम से मिलने वाले हजारों-हजार पत्र आज भी हॉस्टल के साथियों के बीच मौज-मस्ती का बिन्दु बनते हैं.

आज अनुराग के उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते तीस साल से अधिक पुराना हॉस्टल का समय बार-बार उभर आता, उस समय की शैतानियाँ सामने आ खड़ी होतीं. कई-कई बार होंठों पर मुस्कान उभर आती, ख़ुशी में आँखें नम हो जातीं.  

मौज-मस्ती, 2021

अनुराग के ऑफिस में, 2021



26 जून 2021

बचपना अपने जीवन में उतार कर तो देखिये

देखा जाये तो हर एक मौसम का अपना मजा है. जिसको मौसम का मजा लेने की आदत है वो किसी न किसी बहाने उस मौसम का अपनी तरह से उसका आनंद लिया करता है. किसी को गर्मी पसंद है क्योंकि इस मौसम में वह देश-विदेश के बर्फीले स्थानों के घूमने का मौका निकाल लेते हैं. कुछ लोगों के लिए सर्दी पसंद का कारण है क्योंकि उस मौसम का गुलाबीपन मनभावन होता है. कुछ लोगों को बरसात का मौसम उसकी रिमझिम के कारण, भीगते हुए मस्ती करने के कारण पसंद आता है. हर मौसम का अपना आनंद है, हर मौसम का अपना महत्त्व है. हमें भी सभी मौसम अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण पसंद हैं मगर बरसात का आना सबसे सुखद लगता है. इसका कारण खुद को बचपन में लौटा ले जाने जैसा अनुभव कराना है. बरसात का आना हमारे लिए आज भी भीगने का सन्देश लाने जैसा होता है. बचपन में तो भीगना, कागज की नाव बनाकर तैराना, एक साथ कई नावों को धागे से बाँधकर तेरा देना, भरे पानी में कूद कर खुद को भिगाते हुए बगल वाले को भिगो देना, मेंढकों की टर्र-टर्र को पकड़ना, बारिश बंद हो जाने के बाद भीगे पौधों को हिलाकर उनकी पत्तियों पर बैठी बूंदों के नीचे आकर भीगना आदि सहज भाव से होता रहता था. यह सहजता हम आज भी बनाये हुए हैं.




ये और बात है कि बचपन से युवावस्था की तरफ बढ़ते रहने के साथ कार्यशैली बदलती रही. कार्य बदलते रहे. जीवनशैली बदलती रही. जिम्मेवारियाँ बढ़ती रहीं. इन सबके बदलते रहने के बीच बरसात हर साल अपनी रंगत में आती रही. ये और बात है कि पर्यावरणीय समस्याओं के चलते अब बरसात अपने उस रूप में नहीं आती जैसी कि हमारे बचपने में आती थी. क्या कुछ न बदला. समय बदला, बरसात की रंगत बदली, बारिश की समयसीमा भी बदली मगर यदि न बदला तो बरसात में मौज-मस्ती करने का हमारा अंदाज. उम्र अपनी जगह, जिम्मेवारी अपनी जगह, प्रस्थिति अपनी जगह, कार्य अपनी जगह और बरसात की मस्ती अपनी जगह. कई बार तेज बारिश में सड़क पर खुद को भिगाते घूमते समय लोगों को दुकानों में, किसी आड़ में, कहीं किसी स्थान पर दुबके खड़े लोगों को देखकर विचार आता है कि क्या इनके अन्दर बारिश में भीगने की इच्छा नहीं होती? बारिश में भीगने के डर से दुबके खड़े लोगों में युवाओं को देखकर तो उनके ऊपर तरस आता है. यदि वे इस अवस्था में खुलकर जीने का आनंद नहीं उठा पा रहे हैं तो उस समय क्या उठाएंगे जबकि उनके ऊपर परिवार की, अपने कार्य की, पद की जिम्मेवारी होगी.


कई बार लगता है हमने कि लोग अनावश्यक रूप से गंभीर बनने की कोशिश में जीवन जीना भूल चुके हैं. बढ़ती उम्र के लोग ये सोचकर बारिश में नहीं भीगते कि लोग क्या कहेंगे. वे बच्चों के साथ कागज की नाव इसलिए तैराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि लोग उन्हें पागल न समझ लें. युवाओं में भी भीगने को लेकर, पानी में कूदने, नाव तैराने को लेकर संकोच का भाव है. आजकल के बच्चे, युवा अचानक ही अपनी उम्र से कई गुना अधिक बड़े-बुजुर्ग बन चुके हैं. जिम्मेवारियों से पहले ही उनके कंधों पर अनावश्यक जिम्मेवारियाँ डाल दी गई हैं. ऐसा नहीं हैं कि हमारे कंधों पर जिम्मेवारी नहीं, ऐसा भी नहीं है कि हमारे आसपास के वातावरण में, समाज में हमारी प्रस्थिति-स्थिति दोयम दर्जे की है मगर अपनी जिंदगी को अपने ढंग से जीने के लिए किसी की क्या परवाह करना. हाँ, हमारी उन्मुक्तता से, हमारी स्वच्छंदता से, हमारी मौज-मस्ती से किसी अन्य के जीवन पर, उसकी जीवनशैली पर, उसके आनंद पर, उसके रहन-सहन पर किसी तरह का नकारात्मक असर न पड़े, इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए. हम तो आज भी बारिश का इंतजार उसी बेसब्री से करते हैं जैसे कि बचपन में किया करते थे. आज भी बारिश होते ही शहर की सड़कों पर विचरना शुरू हो जाता है. भरे पानी में, बहते पानी में नाव का तैराना शुरू हो जाता है. 


अभी कुछ दिन पहले दो-तीन दिन कभी-कभी बहुत तेज बारिश हुई. इसे शायद संयोग ही कहेंगे कि उस समय हम घर से बाहर ही थे. तेज बारिश के उस मौके पर हमने बजाय दुबक के बैठने के बारिश में घूमने का मौका निकाला. न केवल हम बारिश में भीगने निकले बल्कि बारिश के तेज समझ आते ही हम घर आये और उस समय घर में उपस्थित अपनी दोनों बेटियों को स्कूटर में बैठाया और निकल पड़े तेज बारिश का आनंद लेने. बहुत से परिचित लोगों के लिए यह हँसी-मजाक का विषय बन जाता है मगर एक बार बच्चा बनकर देखिये, एक बार अपनी बढ़ती उम्र में बचपन को जीकर देखिये, आपको भी हमारी तरह मजा आएगा, सुकून मिलेगा.




.

20 जून 2021

बचपन की वो चटर-पटर अभी भी ज़ारी है



इस चित्र को देखकर आपको अपना बचपन याद आया होगा. याद आया या नहीं? यदि याद नहीं आया तो इसका मतलब ये ही कहा जायेगा कि आपने अपने बचपन को मस्ती से नहीं बिताया है. और जिस-जिस को ये याद आ गया है तो फिर कहने ही क्या. ऐसे लोगों की उँगलियों में हरकत होने लगी होगी इसके साथ खेलने की. ये एक तरह की पैकिंग शीट है जिसमें हवा भरे कोष्ठ बने होते हैं. ये शीट या कहें कि हवा भरे कोष्ठ किसी भी सामान को धक्के से, टूट-फूट से बचाने का काम करते हैं.


ये तो हुआ इसका असल मगर संक्षिप्त परिचय. वैसे भी किसी बड़े और गम्भीर परिचय की अभी आवश्यकता है नहीं इसके लिए. बस आप सभी से ये परिचित है, आप सभी इससे परिचित हैं, यही काफी है. परिचय की बहुत ज्यादा आवश्यकता इसलिए भी नहीं है क्योंकि इसके साथ बहुत से लोग अपना बचपन बिता चुके हैं और अभी भी जबकि बहुत से लोग युवा, अधेड़, वृद्ध हो गए होंगे, इससे खेलना नहीं छोड़ पा रहे होंगे.


हम ही नहीं हमारी बेटियाँ आज भी इस ताक में रहती हैं कि कौन सबसे पहले इस शीट को अपने कब्जे में करे. वर्तमान दौर में बहुत सारा सामान ऑनलाइन प्रकट करवाया जाता है. इस ऑनलाइन मार्केटिंग के कारण लगभग सभी तरह के सामानों में यह शीट लिपटी आती है. सामान निकालने के बाद सबसे पहला काम इस शीट के साथ खेलना होता है.


अब जिन्होंने इसके साथ नहीं खेला है वे आश्चर्य अवश्य कर रहे होंगे कि इससे कैसे खेला जाता होगा? अरे जी, इसके साथ खेलने का अपना ही मजा है. इस शीट में बने हवा के कोष्ठ, जिनके एक तरह के छोटे गुब्बारे समझा का सकता है, को उँगलियों के दवाब से फोड़ा जाये तो पट्ट-पट्ट की आवाज़ करते हुए फूट जाते हैं. इस आवाज़ में इतनी मधुरता होती है कि एक कोष्ठ फोड़ने के बाद रुका नहीं जाता है. एक, दिर एक, फिर एक और.... धीरे-धीरे सारी शीट के गुब्बारे फूट जाते हैं.


मन की मस्ती पूरी होते-होते हाथ में बस एक प्लास्टिक शीट रह जाती है. जिन लोगों ने इसका मजा लिया है, वे अवश्य ही खोजने में लग गए होंगे इसे. और हाँ, जिन-जिन लोगों ने इसके साथ अभी तक खेलने का मजा नहीं लिया है वे कहीं से इस शीट को प्रकट करें और गुब्बारे फोड़ने का मजा लूट लें.


.

24 मई 2021

यार की यारी और रात की आवारगी

उस शाम अचानक से एक मित्रवर प्रकट हुए घर पर. लगभग सोलह-सत्रह साल बाद राहुल को अपने सामने देखकर आश्चर्य ही हुआ. बरसों-बरस की बातें शुरू हुईं तो फिर उस रात उसे उरई में रह रहे उसके रिश्तेदार के घर वापस न जाने दिया. अगली सुबह किसी जरूरी काम को निपटाने के बाद शाम को आने का कहकर महाशय चले गए.


उस शाम अगले का आना न हुआ. चूँकि जब महाशय उरई में पढ़ते थे तो उरई में जितनी जनसंख्या थीउससे कहीं ज्यादा उनकी रिश्तेदारियाँ थीं. यही सोचकर कि पता नहीं किसके साथ अड्डेबाजी कर रहे होंगे, उसे फोन न किया. अगला दिन भी खाली निकल गया तो रात को लगभग दस बजे उसे फोन किया.


जैसा कि एक ही लँगोटी बाँधने वाले दोस्तों के साथ बातचीत होती है, वैसे ही अत्यंत शालीन (इतने शालीन कि उन शब्दों को यहाँ लिख नहीं सकते) शब्दों में उसके न आने का कारण पूछा तो अगले ने कहा कि बस दस मिनट में बताते हैं.


पाँच मिनट बाद ही राहुल का फोन आया कि हम घर आ रहे हैं मगर घर में न बैठेंगे. उरई घूमेंगे. हमने हामी भर दी और लगभग पंद्रह मिनट बाद अपनी चिर-परिचित मुस्कान, हड़बड़ी के साथ महाशय घर के दरवाजे पर थे. एक मिनट को भी न बैठने की जिद के साथ बस उरई घूमने की रट लगी हुई थी.




बिना एक पल की देरी किये हम दोनों स्कूटर पर सवार हो निकल लिए रात लगभग साढ़े दस बजे उरई की सड़कों पर. अभी अपनी गली से निकल कर सड़क पर आये ही थे कि महाशय ने अगली रट लगाईं हमारा स्कूटर चलाने की. अगल-बगल पहिये लगे होने के कारण स्कूटर एक तरफ को भागता है. हर एक के लिए चलाना सहज नहीं होता है. कुछ ऐसा ही राहुल के साथ हो रहा था मगर प्रत्येक काम को कुशलता से कर लेने के हुनर के चलते वह धीमी गति से स्कूटर को एक तरह से सड़क पर इधर-उधर लहराते हुए लुड़का सा रहा था. देर रात सुनसान सड़क पर ऐसे लहराते हुए स्कूटर चलाते देख कुछ दूर तक पुलिस की एक जीप हम लोगों के पीछे लग गई. किसी तरह की आपत्तिजनक स्थिति न देखकर जीप कुछ देर बाद आगे निकल गई.


इसके बाद स्कूटर की ड्राइविंग सीट पर बैठे हम और स्कूटर ने उरई की सड़कों को नापना शुरू किया. इधर-उधर की जगहों को घुमाने के बाद रेलवे स्टेशन की सैर करने पहुँच गए. वहाँ की चाय, रसगुल्ले के साथ हंगामा चलता रहा. ट्रेन के साथ फोटो, वीडियो बनाये गए तो प्लेटफ़ॉर्म पर मस्ती की जाती रही. लगभग चार बजे के आसपास राहुल ने उस ट्रेन की आने की स्थिति मालूम की, जिससे उसे जाना था. जानकारी मिली कि ट्रेन एक घंटे लेट है. उसके बाद वापस घर लौटना हुआ. घर की एक कप गरमागरम चाय को डकार कर राहुल अपने रिश्तेदार के घर को निकल पड़ा. हमने कहा कि रुको छोड़ आते हैं तो वो बोला, न रहने दो. अभी दौड़ते हुए जाकर बापू को उठाएँगे और कहेंगे कि देखो हम मॉर्निंग वाक करके भी लौट आये, आप अभी तक सो रहे हैं.


हँसी का ठहाका लगाते हुए महाशय भोर के धुंधलके में गुम हो गए. बाद में अगले का फोन आया जबकि ट्रेन ने उसको अपने अन्दर बिठा कर दौड़ना शुरू कर दिया था.


.

15 दिसंबर 2020

मासूम बचपन सी फाउंटेन पेन की शैतानियाँ

नए-पुराने फाउंटेन पेन की अपनी छोटी सी बगिया में आज सैर करने निकले तो बहुत सी यादें ताजा हो गईं. जी हाँ, हमारे लिए वह बगिया ही है और उस बगिया में ढेर सारे अलग-अलग तरह के फाउंटेन पेन खुशनुमा चेहरों के साथ उपलब्ध हैं. पेन के इस खुशनुमा चेहरों के एहसास को वह बहुत सहजता से महसूस कर सकता है जो फाउंटेन पेन का प्रेमी होगा. नई पीढ़ी के लिए भले ही यह आश्चर्य हो मगर उन सभी लोगों के लिए, जो फाउंटेन पेन-प्रेमी हैं, उनको यह पहले प्यार जैसा एहसास जगाये रहता है. इसे हम अपने और अपने तमाम उन मित्रों के अनुभव के आधार पर कह सकते हैं, जो फाउंटेन पेन के शौक़ीन हैं. आज भले ही बहुतायत में लोगों द्वारा फाउंटेन पेन का उपयोग नहीं किया जाता हो मगर बाजार में अनेक रंग-रूप के, एक से एक सुन्दर डिजायन के, अत्याधुनिक तकनीक के साथ मनमोहक फाउंटेन पेन की भरमार है. इसके सापेक्ष हम जब अपने बचपन के दिनों में अपने पेन के बीच जाते हैं तो उसी बचपन जैसा मासूम सा, भोला-भाला पेन नजर आता है.


कहिए, आपको भी याद आया? आज आप भले ही कम्प्यूटर, मोबाइल का बहुतायत उपयोग करने लगे हों मगर हो सकता है कि आपने अपने बचपन में अपनी उँगलियों के बीच, अपनी नन्हीं सी हथेलियों में फाउंटेन पेन को थामा होगा. याद करिए आज के रंग-बिरंगे, नक्काशीदार मनमोहक पेन के बीच अपने बचपन के उस पेन को. उसमें भी आपके बचपन जैसी मासूमियत आपको अब नजर आ रही होगी. जैसे सारे बच्चे अपने भोलेपन स्वभाव में एक जैसे होते हैं ठीक वैसे ही हमारे बचपन का वो फाउंटेन पेन हुआ करता था. एक पारदर्शी टंकी, उसके ऊपर एक रंग के ढक्कन जो लाल, नीले, काले आदि किसी रंग के होते थे और एकजैसे ही निब, कोई सफ़ेद तो कोई पीले. बचपन की मासूमियत की तरह वे फाउंटेन पेन हम बच्चों के साथ खूब ठिठोली सी करते थे.


सोचिये, सोचिये... कोई ठिठोली याद आई आप लोगों को? हमें तो खूब याद है और आज भी जब हम अपने फाउंटेन पेन की बगिया में उनके बीच बैठते हैं तो वे सब भी अपनी उन शैतानियों को खूब याद करवाते हैं. हम बच्चों की शैतानियों की तरह उस समय के फाउंटेन पेन की शैतानियाँ भी हुआ करती थीं. उनका उद्देश्य कभी भी हम बच्चों को परेशान करना नहीं होता था बल्कि वे अपने स्वभाव के चलते शैतानी कर जाया करते थे. पारदर्शी टंकी को कभी ड्रॉपर के सहारे, कभी सीधे स्याही की बोतल के सहारे भरने की कोशिश होती. शैतान फाउंटेन पेन की टंकी जानबूझ कर हिल जाया करती और स्याही टंकी के बजाय हमारे ही ऊपर. अब इसे पेन की ही शैतानी कहेंगे, अपने नन्हे हाथों की कमजोर, काँपती पकड़ थोड़े कहेंगे.


इसी तरह अक्सर पता चलता कि सुबह तो उस पेन ने हँसते-हँसते हमारे साथ लिखने का काम किया और जब दोपहर में उसके साथ फिर खेलना चाहा तो महाशय चलने से मना कर देते थे. अब ये उनकी शैतानी ही हुआ करती थी. अब कोशिश होती थी कि पारदर्शी टंकी से कुछ बूँदें निब तक आ जाएँ तो शायद पेन हमारे साथ लिखने का खेल खेलने लगे. इस चक्कर में निब के ऊपर ऊँगली फिरा-फिरा कर स्याही को टंकी से घसीटने का काम किया जाता. कई बार इसमें सफलता न मिलने पर पेन को झटका दिया जाता. अब जैसे ही दो-चार बार पेन को झटका दिया वैसे ही उसकी शैतानी कपड़ों पर बूँदों के रूप में छप जाती थी. कभी खुद की नेकर, शर्ट पर चित्रकारी होती, कभी आसपास बैठे साथियों पर, भाई-बहिनों पर तो कभी घर के कपड़ों पर. फाउंटेन पेन की इस शैतानी पर अक्सर डांट भी पड़ जाती थी.


कपड़ों के अलावा पेन के स्नेह के निशान रोज ही उँगलियों पर, होंठों पर नजर आते रहते. चलते-चलते पेन का रुकना हुआ नहीं कि झट से निब-फीड (जिव्ही) को होंठों की कोमलता के सहारे दाँतों की कठोरता से दबाया. अब हाथों, उँगलियों, हथेलियों में इस करामात के निशान बनकर कारीगरी की चुगली किया करते. पानी, कपड़ों के सहारे धो-पोंछ कर वापस सबको यथास्थान लगाते. कभी तो मेहनत सफल हो जाती और कभी-कभी अपनी इस कलाकारी में तोड़-फोड़ भी हो जाया करती. कहिये फाउंटेन पेन हाथों से फिसलकर जमीन की शरण में चला गया तो निब की शक्ल बदल गई. दाँतों, होंठों के सहारे खींचने की जबरिया कोशिश में कई बार दोनों का टूटना हो जाया करता.




आज वे पुराने मासूम से पेन भी हमारी बगिया की शोभा बने हुए हैं तो आज के छैल-छबीले, डिजायनर पेन भी उसी बगिया में उनके साथी बने हुए हैं. अब टंकी को पारदर्शी से दूर करते हुए रंगीनियत मिल गई है तो तकनीक ने उसमें स्याही भरे जाने की मुश्किल को भी सरल कर दिया है. अब स्याही टंकी के सहारे से कपड़ों पर अपने रंग नहीं छोड़ती है. लिखने के दौरान भी उँगलियों से स्याही दूर-दूर ही रहती है. अब स्याही भरने की झंझट को भी स्याही की रेडीमेड बैरल ने समाप्त कर दिया है. इतना सबकुछ होने के बाद भी हम फाउंटेन पेन धोने के बहाने, खाली बैरल में स्याही भरने के बहाने, पेन की निब तक स्याही को घसीट कर लाने के लिए उस पर ऊँगली फेरने के बहाने अपने हाथों में बचपन की वही रंगीन कलाकारी कर लेते हैं. फाउंटेन पेन के साथ इस कलाकारी के बहाने हम वापस अपने बचपन में पहुँच जाते हैं.



.
वंदेमातरम्

26 नवंबर 2020

यादें न जाने कहाँ से कहाँ ले जाती हैं

अपने इस ब्लॉग पर जब लिखना शुरू किया था तो समझ ही नहीं आता था कि इस पर सभी विषयों में लिखना है या फिर किसी विषय विशेष पर ही यहाँ लिखें? समय के साथ ब्लॉग लेखन होता रहा, यहाँ कई-कई विषयों पर लिखना होता रहा. ऐसे विषयों में सामाजिक और राजनैतिक विषय ज्यादा रहे. राजनीति एक ऐसा विषय है जिस पर देश का प्रत्येक व्यक्ति बोलने की दम रखता है. घर के कमरे से लेकर सड़क पर पान की दुकान तक लोग प्रधानमंत्री को, मुख्यमंत्री को सलाह देते दिख जायेंगे. ऐसे-ऐसे लोग राजनीति के हथकंडों से विदेशी मामलों को सुलझाते मिल जायेंगे, जिनसे अपने घर के मसले नहीं सुलझते. बहरहाल, कई-कई बार ऐसे विषयों पर लिखने से समस्या हुई, लोगों से बहस भी हुई तो लगा कि अपने इस ब्लॉग को विवादों से दूर रखना है. इसी में विचार किया कि विषयवार अलग-अलग ब्लॉग बना लिए जायेंगे और अपने इस ब्लॉग पर सिर्फ अपने बारे में ही लिखा जायेगा.


इसी सोच के साथ बहुत समय से यहाँ विवादित विषयों पर किसी तरह की कलम नहीं चलाई है. कोशिश रहती है कि अपने बारे में, अपने बचपन के बारे में, अपने रिश्तों के बारे में, अपने संबंधों के बारे में, अपने दोस्तों के बारे में, अपने अनुभवों के बारे में यहाँ लिखा जाये. ऐसा किया भी जा रहा है मगर एक बहुत बड़ी समस्या सामने आ जाती है. जब भी यहाँ लिखने की शुरुआत की जाती है तो टाइप करना भूल जाते हैं और बस अपने अतीत में विचरण करने लग जाते हैं. किसी एक घटना को लेकर लिखना शुरू करते हैं और फिर उसके साथ सूत्र से सूत्र जुड़ते चले जाते हैं. एक घटना से दूसरी घटना, एक बात से दूसरी बात निकलते-निकलते मूल बात से, असल घटना से बहुत दूर ले जाती है. खट्टी-मीठी यादों में घूमते-टहलते जब वापस वर्तमान में आते हैं तो यही भूल जाते हैं कि लिखने क्या बैठे थे.


आज भी कुछ ऐसा हुआ. बचपन की किसी घटना पर लिखना चाहते थे, शुरू भी किया मगर फिर वही कहानी. कुछ फोटो, कुछ यादों के सहारे न जाने कहाँ तक चले गए. वापस आना हुआ तो उन्हीं यादों की इतनी खुमारी थी कि सबकुछ भुला बैठे. अब फिर याद करेंगे, सोचेंगे कि क्या लिखने बैठे थे. याद आ गया तो आप सबको भी अपने साथ यात्रा करवाएँगे.


अपनी बिटिया की तरह हम भी करते थे बचपन में ऐसी शरारतें 


.

22 अक्टूबर 2020

समोसे के स्वाद के लिए होती शैतानियाँ

शैतानियाँ, शरारतें कहीं से भी सीखनी नहीं पड़ती हैं. कोई सिखाता भी नहीं है. यह तो बालपन की स्वाभाविक प्रकृति होती है जो किसी भी बच्चे की नैसर्गिक सक्रियता के बीच उभरती रहती है. स्कूल में हम कुछ मित्रों की बड़ी पक्की, जिसे दांतकाटी रोटी कह सकते हैं, दोस्ती थी. कक्षा में एकसाथ बैठना. भोजनावकाश के समय एकसाथ बैठकर भोजन करना. आपस में मिल-बाँटकर भोजन करना. इस मंडली में एक मित्र मनोज के पिताजी घरेलू सामानों की एक दुकान थी. लगभग रोज शाम को मनोज का दुकान पर जाना होता था. जैसा कि बालसुलभ स्थितियों में होता है, उसके पिता लाड़-प्यार में यह कहते हुए कि शाम को दुकान के मालिक तुम हो, कुछ पैसे उसे दे दिया करते थे. हम मित्र भी दस-पाँच पैसे लेकर आया करते थे. आज की पीढ़ी को ये आश्चर्य लगेगा जिसको हजारों रुपये में जेबखर्च मिलता हो कि उस समय हम लोगों को पांच-दस पैसे कभी-कभी मिलते थे. ये आज आश्चर्य भले हो मगर उस समय किसी अमीर से कम स्थिति नहीं होती थी हम दोस्तों की. ऐसा रोज तो नहीं होता था पर जिस दिन ऐसा संयोग बनता था कि ठीक-ठाक मुद्रा जेब में आ गई तो सुबह की प्रार्थना के समय ही योजना बनाकर कक्षा में सबसे पीछे बैठा जाता था.

 

कक्षा में पीछे बैठने के अपने ही विशेष कारण हुआ करते थे. असल में स्कूल परिसर में या उसके आसपास किसी बाहरी व्यक्ति को किसी तरह का खाने-पीने का सामान बेचे जाने की अनुमति नहीं थी. स्कूल समय में किसी बच्चे को बाहर जाने की अनुमति नहीं थी ताकि स्कूल का कोई विद्यार्थी बाहर का कोई सामान न खा लें. इसको सख्ती से पालन करवाने के लिए भोजनावकाश के समय किसी न किसी शिक्षक की मुस्तैदी स्कूल के मुख्य गेट पर दिखाई देने लगती थी. ऐसे में हम दोस्त अपने खुरापाती दिमाग की मदद से कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग भागने के लिए किया करते थे. यह खुराफात भी स्कूल चलने के समय हुआ करती थी. उस समय कक्षाएँ चलने के कारण मुख्य गेट पर शिक्षकों की चौकस निगाहों में कुछ न कुछ ढील सी बनी रहती थी. इसके पीछे उनकी सोच ये हुआ करती थी कि बच्चे कक्षाएँ चलने के दौरान बाहर नहीं निकलेंगे और हम लोग किसी दिन इसी ढील का लाभ उठा लिया करते थे.

 

स्कूल के एकदम पास में एक छोटा सा होटल हुआ करता था, जिसे सभी अन्नू का होटल के नाम से जानते थे. उसके समोसे बहुत ही स्वादिष्ट होते थे. चूँकि भोजनावकाश में अध्यापकों की मुस्तैदी के कारण उन समोसों का स्वाद लिया जा संभव नहीं हो सकता था. ऐसे में कक्षा में सबसे पीछे बैठना समोसों तक पहुँच बनाने में सहायक हो जाता था. हम दोस्त आपस में पैसे इकट्ठे करके एक दोस्त को जिम्मेवारी देते समोसे लाने की. ज्यादातर इसके लिए रॉबिन्स को ही चुना जाता. वह कभी पानी पीने की, कभी बाथरूम जाने की अनुमति लेकर अन्नू के होटल तक अपनी पहुँच बनाता. और कभी-कभी बिना अनुमति के कक्षा के पीछे वाले दरवाजे का उपयोग किया जाता था. स्कूल का मुख्य द्वार लोहे की अनेक रॉड से मिलकर बना हुआ था, जिसमें से थोड़े से प्रयास के बाद हम बच्चे लोग आसानी से निकल जाया करते थे.

 

अन्नू के होटल तक झटपट जाने और फटाफट वापस आने की कला में माहिर रॉबिन्स अपनी नेकर की दोनों जेबों में कुछ समोसे भर कर कक्षा में दिखाई देने लगता. कक्षा में सबसे पीछे बैठी पूरी मित्र-मंडली अगले ही पल स्वादिष्ट समोसों का स्वाद ले रही होती थी. कक्षा में सबसे पीछे बैठने का मूल कारण स्कूल के मुख्य द्वार पर नजर रखना और फिर अपनी रणनीति में कामयाब होने के तत्काल बाद कक्षा में ही समोसे का स्वाद लेना रहता था. आज जब कभी रॉबिन्स के मिलने पर स्कूल की घटनाएँ, स्कूल के दोस्तों की चर्चा होती है तो वह बिना कहे नहीं चूकता है कि तुम लोगों ने हमें खूब दौड़ाया, हमारी जेबों में खूब तेल लगवाया. रॉबिन्स को इस कारण भी ये घटना और भी अच्छे से याद है क्योंकि आये दिन घर में उसकी इसी बात पर कुटाई हो जाया करती थी कि नेकर की जेबें तेल से गन्दी कैसे हो जाती हैं.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

01 अगस्त 2020

शरारत भरी हेराफेरी के साथ पत्र लेखन का शौक

31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस मनाये जाने पर हमने विचार किया था कि उस दिन अपने मित्रों को पत्र लिखेंगे. इसी सम्बन्ध में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लगाकर उन मित्रों के पते चाहे जो हमारा पत्र पाना चाहते हों. लगभग आधा सैकड़ा मित्रों ने अपने पते हमें भेज कर पत्र भेजने की इच्छा व्यक्त की. इतने सारे मित्रों की सकारात्मक प्रतिक्रिया देखकर उत्साह बढ़ गया. कल और आज तमाम कामों के बीच से समय निकाल कर बहुत से मित्रों को पत्र लिख भी डाले. पत्र लिखने में बड़ा ही मजा आ रहा था. यद्यपि पत्रों के आने-जाने के लगभग न के बराबर माहौल में भी हम नियमित रूप से पत्र लिखते रहते हैं तथापि इतनी बड़ी संख्या में पत्र बहुत दिन बाद लिखना हो रहा है.


इनको लिखने के दौरान वे दिन भी सामने आकर खड़े हो जा रहे हैं जबकि पत्रों के द्वारा मित्रों, परिचितों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान होता था. पढ़ने के उन दिनों में पत्र लिखने का चाव बहुत बुरी तरह से हम मित्रों के बीच बना हुआ था. हम दोस्तों की बातें किसी और को पता न चलें इसके लिए लिफाफे का इस्तेमाल किया जाता था. मंहगा होने के बाद भी इसका इस्तेमाल करना मजबूरी थी. एक तरफ अपनी बातों को सबसे छिपाना होता था दूसरे बातें इतनी अधिक होती थीं कि उनका अंतर्देशीय पत्र में सिमट पाना संभव ही नहीं होता था. ऐसे में न तो अंतर्देशीय पत्र काम करता था और पोस्टकार्ड की तरफ तो देखा भी न जाता था. कई-कई पन्नों में हम दोस्तों की अपनी गाथा सिमटी होती थी. अलग-अलग शहरों में पढ़ रहे हम मित्र अपने कॉलेज की, दोस्तों की, पढ़ाई की चर्चा करते रहते.



जेबखर्च की सीमित स्थिति के चलते डाक टिकटों के साथ कुछ शरारत कर ली जाया करती थी. साधारण डाक लिफाफा एक रुपये का हुआ करता था. किसी कागज़ का लिफाफा बनाकर उस पर दस-दस पैसे के दस टिकट अलग-अलग जगहों पर लगाये जाते थे. ऐसा करने से कई बार कुछ डाक टिकट मुहर लग जाने से बच जाया करते थे. उनका दोबारा उपयोग कर लिया जाता था. एक-दो बार प्रयोग किये गए लिफाफों को भी चला दिया गया. प्राप्ति वाले पते को काट कर लिख दिया कि ये व्यक्ति यहाँ नहीं रहता है और वापसी वाला पता डाल दिया जाता था. हालाँकि ऐसा एक-दो बार ही किया गया मगर काम बन गया था.

आज तकनीकी इस कदर तेज है कि पलक झपकने के साथ लोगों तक अपनी बात पहुँच जा रही है. इसके बाद भी हम खुद महसूस करते हैं कि उन दिनों जैसी भावनाएं मशीनी पत्र में देखने को नहीं मिल रही हैं. आज के मशीनी संदेशों का संकलन आसान हो गया है मगर उनको पढ़ने में, उनको दोबारा खोलकर देखने में किसी एहसास की अनुभूति नहीं होती है. शब्दों का टाइप होना, कागज छूने का एहसास न होना, अनजाने ही उस व्यक्ति का चेहरा उन लिखे शब्दों में बनना अब महसूस ही नहीं होता. बहरहाल, ये तकनीक है जो बदल कर इस दौर में ले आई है मगर हमें हमारे मित्रों ने उन्हीं पुराने दिनों की याद ताजा करवा दी है. सभी का हृदय से आभार.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

12 मई 2020

तीन बोर्ड परीक्षाएँ पास करने के पुरोधा

लॉकडाउन के इस सीजन में शैक्षणिक संस्थानों के सामने छूटी परीक्षाओं को करवाने का संकट मुँह बाए खड़ा है. इससे बचने का तो कोई उपाय है ही नहीं. संकट ने मुँह खोला है तो कुछ न कुछ करेगा ही. कहीं-कहीं से ऐसी खबरें भी आने लगीं हैं कि जून में, कहीं जुलाई में शेष रह गयी परीक्षाओं को करवाकर बच्चों का भला किया जायेगा. एक तरफ कोरोना से बचने के लिए दूरी बनाये रखने के उपाय समझाए जा रहे हैं, दूसरी तरफ परीक्षाओं के लिए कमर कसी जा रही है.


इधर एक तरफ संस्थाएँ परीक्षा करवाए जाने के लिए चिंतित हैं दूसरी तरफ इन्हीं संस्थानों में ऑनलाइन क्लासेज को लेकर नए नाटक चल रहे हैं. इसे नाटक ही कहेंगे, क्योंकि सबको मालूम है कि बाजार बंद है, स्टेशनरी मिलनी नहीं इसके बाद भी होमवर्क को नोट बुक पर करके अपलोड करना है. यहाँ न नोट बचे और बुक बाजार में हैं ही नहीं. बहरहाल, सरकार को दिखाने के लिए, अभिभावकों से फीस वसूलने के लिए, अध्यापकों को वेतन दिए जाने के बदले काम करवा लेने के संतोष के चलते ऐसा करना आवश्यक समझ आ रहा होगा.


ये सब अभी कोरोना, लॉकडाउन के चक्कर में शुरू हो गया है मगर देखा जाये तो भारतीय समाज में पढ़ाई को लेकर कुछ ज्यादा ही नौटंकी होने लगी है. छोटे-छोटे बच्चों की पीठ पर बोझ डालकर अभी से उनको बोझ उठाने की आदत डलवा दी जा रही है. भारी-भरकम पाठ्यक्रम के द्वारा सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही सिविल सेवा में चयनित करवाने की होड़ मची रहती है. आज बच्चों को पढ़ाई के बोझ से दबे देखते हैं तो अपना दौर याद आ जाता है. आज के दौर में बच्चों को दो-दो बोर्ड परीक्षाओं से पार होना पड़ता है, जबकि हमें तीन बोर्ड परीक्षाओं को पास करना पड़ा था. सुन कर आज के बच्चों को अजूबा लग रहा होगा सुनकर.

अजूबा आज के लिए हो सकता है मगर आपमें से बहुत से लोगों ने बोर्ड परीक्षा के तीन दौर निपटाए होंगे. कक्षा पाँच की परीक्षाएँ आने वाली थीं. स्कूल की दीदियाँ हम लोगों को समझाती थीं कि खूब पढ़ा करो, बोर्ड परीक्षा होगी. तब उस मासूमियत भरी उम्र में हम लोग समझ रहे थे कि बोर्ड में लिखना होगा. होते-करते वो दिन भी आ गया जबकि हमारी बोर्ड परीक्षाओं की शुरुआत हुई. सभी बच्चे निश्चित समय पर अपने स्कूल पहुँचे. वहाँ से दो अध्यापकों के साथ हम बच्चे पास के एक दूसरे स्कूल ले जाए गए. अपने स्कूल से अलग किसी स्कूल में परीक्षा देने का अपना ही आनंद समझ आ रहा था. परीक्षा से ज्यादा ध्यान उस स्कूल में लगे पेड़-पौधों की तरफ जा रहा था.

जिस तरह से परीक्षा होनी थी, हुई. तीन-चार दिन में कक्षा पाँच की और हमारी पहली बोर्ड परीक्षा संपन्न हुई. बचपन की उस बोर्ड परीक्षा का कोई महत्त्व आने वाले दिनों के लिए नहीं था मगर जिस बोर्ड परीक्षा का महत्त्व आने वाले दिनों के लिए था, वे भी उसी मस्ती और अल्लहड़ तरीके से पूरी की गईं. परीक्षा देने के समय ही हम दोस्तों के बीच निर्धारित कर लिया जाता था कि किस मैदान में क्रिकेट खेलने पहुँचना है, किस जगह पर बैडमिंटन की चिड़िया उड़ानी है. 

मस्ती और बेफिक्री के उस दौर के वापसी की बस कल्पना ही है और आये दिन उसी कल्पना में घूम-टहल लेते हैं.

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

02 मई 2020

गुलेल के रास्ते आया आँसुओं का ज़लज़ला

काफी देर तक समझाने के बाद भी उस लड़की के आँसू नहीं थम रहे थे. वे चार-पाँच लड़कियाँ गर्ल्स कॉमन रूम के एक कोने में खड़ीं आगे की कुछ योजना बनाने में लगी हुई थीं. उनके ग्रुप की एक दूसरी तेज-तर्रार लड़की बार-बार प्राचार्य से शिकायत करने पर जोर दे रही थी. हमारे एक मित्रवर, जो उन्हीं लड़कियों के साथ पढ़ा करते थे, लगातार समझाने की कोशिश कर रहे थे मगर न तो रोने वाली लड़की के आँसू रुक रहे थे और न ही वह तेज-तर्रार सी लड़की अपने हाव-भाव को नियंत्रित कर रही थी. 

हमारे मित्र वैसे तो बातें पुटकने में बहुत माहिर रहे हैं, आज भी हैं. ये तो संभव ही नहीं था कि वे कोई मामला, खासतौर से लड़कियों से सम्बंधित, सुलझाने जाएँ और वो सुलझे नहीं. बस ऐसे किसी भी मसले में शामिल होने पर वे अपनी इमेज का बहुत ख्याल रखते थे. जब उनको लगा कि बात, हालात उनके नियंत्रण से बाहर जा रहे हैं, स्थिति तनावपूर्ण होती जा रही है तो उन्होंने एक और दाँव फेंका.

वो बेर तुमको नहीं, इसे मारना था. तुमको तो ग़लती से लग गया. आँसू बहाती लड़की को समझाते हुए मित्रवर ने तेज-तर्रार लड़की की तरफ इशारा किया. उसका इतना कहना था कि उसके आँसू बहना रुक गए और दूसरी लड़की का शिकायत करने का सुझाव कहीं खो गया. अब उसने रोना शुरू कर दिया. तब तक हमारा भी वहाँ पहुँचना हो गया.

असल में जो काण्ड हुआ था, उसके बाद आती प्रलय, आँसुओं के ज़लज़ले को थामने के लिए ही अपने मित्र को भेजा गया था. उसे गए जब देर हो गई तो लगा कि मामला कहीं फँस रहा है. डर ये भी लगा कि कहीं अपनी इमेज बनाने के चक्कर में हमारे मित्र महोदय ज़लज़ले में सबकुछ न उलट-पुलट करवा दें. हमने देखा कि जो रोता हुआ चला था, वह अब शांत है और उसकी जगह कोई और आँसू बहाने में लगा है. हमने मित्र को देख इशारा किया तो उसने शांत रहने का इशारा किया.

जैसे ही उस तेज-तर्रार लड़की ने, जो अब रोने में लगी थी (रोते हुए बड़ी प्यारी लग रही थी. हम अपनी इमेज-फिमेज की चिंता नहीं करते थे, न तो ज़लज़ला आ ही जाने देते उस दिन) उसने जैसे ही हमें देखा तो बड़े गुस्से में बोली, ये सिखाते हो आप लोग अपने जूनियर को? तमीज नहीं कि किसके साथ कैसा व्यवहार करना है?

हमने उसे शांत रहने का इशारा किया मगर वो कहाँ मानने वाली. समझाते ही उसका स्वर और तेज हुआ. बोली, आज की सारी बात अपने भैया लोगों को बताएँगे. अब वे ही आकर निपटेंगे.

जैसे ही ये निपटने, निपटाने जैसे शब्द सुने तो हॉस्टल की पानी की टंकी में उबाल आ गया. समझाने-बात करने, मामला निपटाने के क्रम में मालूम चला कि उसके रिश्तेदारी में मिलाकर आठ-नौ भाई हैं. उससे हमने कहा, सुनो, भाइयों को पिटवाने का शौक हो तो बिलकुल बता देना. तुम्हारे आठ-नौ भाई हैं पर हम चालीस-पचास भाई हैं.

ये सोचकर कि बात न बिगड़े, मामला प्राचार्य तक न पहुँचे, उसे समझाया कि चुप हो जाओ. तुमको तो लगी भी नहीं. जिसे लगी है वह कुछ बोल नहीं रही. उस जूनियर को हम समझा देंगे.

इसके बाद शायद उसको समझ आया. उसने ख्यालों में अपने भाइयों की कुटाई भी देख-समझ ली होगी. आराम से आँसू पोंछ वह सबको लेकर गर्ल्स कॉमन रूम से बाहर निकल आई. हम अपने मित्र को दुखी दुखी सा देखते रहे. उसे लग रहा था कि उनके साथ पढ़ने वाली लड़कियों के सामने एक जूनियर की बदतमीजी ने उसकी इमेज को दाग लगा दिया.


++

असल में पूरा किस्सा उस दिन शुरू हुआ पानी की टंकी के पास गिरे बेरों से. उस दिन हम दोस्त पानी की टंकी के पास पड़ी खाली जगह पर बैठे हुए थे. वह जगह एक बेर के पेड़ के नीचे बनी थी. परीक्षा का समय नजदीक था. प्रैक्टिकल चल रहे थे, सो कक्षाएँ भी गिनी-चुनी लग रही थीं. कॉलेज में विद्यार्थियों का आना-जाना भी कुछ सीमित सा हो गया था. हॉस्टल वालों के पास कॉलेज जाना एक अनिवार्य कार्य हुआ करता था. ऐसा लगता था जैसे कॉलेज नहीं जाया जायेगा तो धरती पलट जाएगी, प्रलय हो जाएगी. उस दिन भी धरती को पलटने से बचाने के लिए, प्रलय को रोकने के लिए हॉस्टल की पलटन के कुछ सिपाही उसी जगह जमे हुए थे. हँसी-मजाक, शरारतों का दौर चल रहा था. बेर के पेड़ से टपकते कुछ बेरों का और कुछ गिराए गए बेरों का स्वाद लिया जा रहा था. इस हँसी-मजाक के बीच ही एकदम से हड़बड़ सी समझ आई.

जब तक समझ में बात आती, सामने लड़कियों के एक ग्रुप में से एक लड़की ने हमारी तरफ देखते हुए तीखी, तेज आवाज़ में चिल्लाते हुए कहा कि बैठे-बैठे बदतमीजी करवा रहे हो. उसका रोना साफ़ समझ आया. इससे पहले कि उनसे कुछ पूछते, वे सब वहाँ से तेजी से चल दीं. हमारे पास खड़े एक जूनियर ने बड़े ही तीरंदाजी वाले स्टाइल में हँसते हुए बताया कि उसने गुलेल से बेर मार दिया. उसके मुँह से कुछ और निकलता उसके पहले एक तेज कंटाप से उसे शांत कर दिया. बात को सँभालने के लिए अपने मित्र को भेजा क्योंकि वे लड़कियाँ उसके साथ पढ़ा करती थीं.

++


हम हॉस्टल वाले भाई खूब शैतानियाँ, शरारतें करते थे, खूब लड़ाई-दंगे जैसी स्थिति भी बनती थी मगर लड़कियों को परेशान करने, उनको छेड़ने जैसी किसी भी हरकत का समर्थन नहीं करते थे. यही कारण था कि उसी समय गलती का परिणाम एक तमाचे के रूप में उसे मिला. 

.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग