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01 जनवरी 2026

मोबाइल से इतर भी है ज़िन्दगी

नववर्ष 2026 का आगमन हो गया है. हम सभी ने उसके स्वागत में अपनी पर्याप्त ऊर्जा और शक्ति को लगा दिया. इस आते वर्ष के साथ क्या हमने अपने उन वायदों की तरफ ध्यान दिया जिनको वर्ष 2025 के शुरू में खुद से किया था? शायद नववर्ष के स्वागत के उत्साह में ऐसा करने की याद नहीं रही. चलिए कोई बात नहीं, जब जागो तभी सबेरा वाली बात के द्वारा नए वर्ष 2026 के साथ अभी-अभी गए वर्ष 2025 के एक घटनाक्रम को याद कर लेते हैं. मैनेजमेंट गुरु के रूप में प्रसिद्ध एन. रघुराजन ने कहा कि 2025 एक स्लोगन के साथ विदा हो रहा है- मोबाइल फोन के परे भी ज़िन्दगी है. उन्होंने अपने कॉलम में एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए लिखा कि प्रवेश द्वार पर एक बड़े बोर्ड पर लिखा था कि अपना मोबाइल फोन निकालें और मेरी तस्वीर लें. जैसे ही आप प्रवेश द्वार पर अभिवादन कर रहे महिला या पुरुष की तस्वीर लेते हैं तो वे बेहद शालीनता से आपके फोन के कैमरा लेंस पर एक छोटा सा आयताकार स्टिकर चिपका देते हैं. किसी मेहमान ने इसका विरोध नहीं किया. वहीं दूसरे बोर्ड पर लिखा था कि हर बीस मेहमानों पर एक फोटोग्राफर है, उनसे जितनी चाहें तस्वीरें खिंचवाइए.

 

यह आईडिया कोई नया-नवेला नहीं है. इसे बर्लिन, लंदन और न्यूयॉर्क के मशहूर क्लबों से लिया गया है. यहाँ पर लम्बे समय से जोर दिया जाता रहा है कि वहाँ आने वाले मेहमान फोन से तस्वीरें लेना छोड़ संगीत की धुनों पर नाचें. पहले इन क्लबों में फोन प्रतिबंधित थे लेकिन अब उन पर स्टिकर लगाया जाता है. एक पल को अपने मोबाइल को जेब में डालकर सोचिए इन दोनों निवेदनों के बारे में. सोचा आपने? आप किसी कार्यक्रम का हिस्सा हैं, उसमें सहभागिता कर रहे हैं और आपका बहुत सारा समय कार्यक्रम का आनंद उठाने के बजाय फोटोग्राफी में खर्च होता है. ये समय कभी सेल्फी के नाम पर, कभी कार्यक्रम के फोटो-वीडियो बनाने के नाम पर, कभी मित्रों-परिचितों-परिजनों के साथ फोटोसेशन करवाने के नाम पर खर्च होता है. क्या कभी आपने-हमने एक पल को रुककर ये सोचा है कि उस कार्यक्रम में हमारी उपस्थिति किसलिए हुई है? हम वहाँ कार्यक्रम का आनंद उठाने के लिए उपस्थित हुए हैं अथवा फोटोग्राफी करने के लिए?

 



वर्तमान दौर में यह बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है कि हम सभी सामने उपस्थित पलों का आनंद उठाने के बजाय इधर-उधर के कार्यों में अपना समय बर्बाद कर देते हैं. इस समय बर्बादी में मोबाइल को सबसे आगे रखा जा सकता है. सिर्फ फोटोग्राफी की ही बात न करें, सिर्फ किसी कार्यक्रम की बात न करें तो भी यदि गौर करें तो लगभग प्रत्येक नागरिक का एक दिन का बहुतायत समय मोबाइल पर व्यतीत हो रहा है. हम सभी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हों अथवा किसी पारिवारिक कार्यक्रम में, कहीं नितांत फुर्सत के पलों में हों या फिर व्यस्तता भरे किसी दौर में मोबाइल से खुद को दूर नहीं कर पाते हैं. भीड़ के बीच में भी हम सब मोबाइल के कारण अकेले होते हैं.

 

मैनेजमेंट गुरु द्वारा बताया गया तरीका चूँकि अब निजी और हाई-प्रोफाइल पार्टियों में अपनाया जा रहा है और इसका मुख्य उद्देश्य यही है कि उन पार्टियों में, कार्यक्रमों में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति वहाँ के पलों का आनंद ले सके. ऐसा बहुतायत में देखने में आता है और लेखक का अपना नितांत व्यक्तिगत अनुभव है कि कार्यक्रमों के दौरान फोटो-वीडियो निकालने वाले बहुतायत लोग शायद ही दोबारा उनको देखते हों. उनमें से बहुसंख्यक लोग ऐसे होते हैं जो कार्यक्रम के बाद ही फोटो और वीडियो डिलीट करते देखे गए. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके मोबाइल में स्टोरेज की समस्या उत्पन्न होने लगती है. कोरोनाकाल के दौरान लॉकडाउन में मोबाइल का उपयोग बढ़ने से भले ही कुछ लोगों की दिनचर्या में इसका उपयोग शामिल हो गया हो किन्तु समय के साथ लोग महसूस करने लगे कि पूरी तरह स्क्रीन पर टिकी ज़िन्दगी ही असल में जीवन नहीं है. एक शोध के आँकड़े बताते हैं कि सोशल मीडिया पर बिताया जाने वाला समय वर्ष 2022 में चरम पर था और वर्ष 2024 में इसमें दस प्रतिशत की गिरावट दिखाई दी.

 

मोबाइल उपयोग के प्रति जिस तरह की ललक लोगों में देखी गई थी, उसी तरह की वितृष्णा भी अनेक लोगों में देखने को मिल रही है. यहाँ अनेकानेक अनुभवों को सामने रखने का मंतव्य कदापि यह नहीं कि मोबाइल को पूरी तरह से नकार दिया जाये. यहाँ उद्देश्य मात्र इतना ही है कि मोबाइल के उपयोग के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाये कि परिवार की अहमियत हमारे लिए क्या है? बच्चों का मैदान पर जाकर खेलना-कूदना कितना महत्त्वपूर्ण है? सामाजिकता के निर्वहन के लिए आज सहभागिता आवश्यक है अथवा मोबाइल का उपयोग? परिवार के साथ समय का बिताना किसी स्वप्न की तरह से हो गया है. मित्रों के साथ शाम की महफ़िलें किसी गुजरे दौर की बातें हो गईं हैं. बच्चों की हँसी, खिलखिलाहट से गुलजार रहने वाले पार्क अब बुजुर्गों के अकेलेपन के साक्षी बन रहे हैं. यह अपने आपमें कितना विद्रूपता भरा होगा कि आने वाली पीढ़ी के लिए हम इस तरह के अकेलेपन के, सुनसान के, तन्हाई के अनुभव इकट्ठे करने में लगे हैं.

 

नववर्ष की आज की इस पहली सर्द सुबह में चाय की चुस्की लेते हुए अपने मोबाइल को देखिएगा कि आपने ऐसे कितने फोटो-वीडियो हैं जो अब तक अनदेखे और बेमतलब ही मोबाइल में जगह घेरे हैं. निश्चित ही इनकी बहुत बड़ी संख्या होगी. यदि आप हमारी बात से सहमत हैं तो चाय की चुस्की के साथ नववर्ष में वादा करिए मोबाइल के बजाय अपने लोगों के साथ अधिक से अधिक समय बिताने का. आभासी अनुभवों को एकत्र करने के स्थान पर वास्तविक अनुभवों को संजोने का. याद रखिये केवल एक ही बात कि मोबाइल फोन से परे अनुभवों से भरी एक शानदार ज़िन्दगी है.

 


01 जनवरी 2025

संकल्प लें परिवार बचाने का

पूरे हर्ष-उल्लास के साथ जिस वर्ष का स्वागत किया गया था, वो वर्ष हम सबसे विदा ले चुका है. अनेक खट्टी-मीठी घटनाओं, हँसाती-रुलाती यादों के साथ वह वर्ष भी इतिहास बन गया है. नया वर्ष अनेकानेक संभावनाएँ, आशाएँ, योजनाएँ आदि लेकर पूरे हर्षोल्लास से हम सबके जीवन में प्रवेश कर चुका है. पुराने को अलविदा और नए के स्वागत के बीच की बारीक रेखा पर बहुतायत लोगों द्वारा गए वर्ष में अपने उपलब्धियों, नाकामियों का स्मरण किया जायेगा, उनका आलोचनात्मक मूल्यांकन किया जायेगा. इसी तरह से नव वर्ष के लिए बहुत सारे संकल्प, नवीन कार्य मन-मष्तिष्क में बन-बिगड़ रहे होंगे.

 

नव-वर्ष के लिए संकल्पों का निर्धारण करना व्यक्ति के मनोभावों का एक हिस्सा रहा है. उसके द्वारा अपने व्यवहार, अपनी कार्य-क्षमता, अपनी जीवन-शैली, अपनी आदत आदि को लेकर किसी न किसी नए संकल्प का निर्माण करके उसी के सादृश्य कार्य करते रहने का वादा खुद से किया जाता है. इस बार भी बहुत सारे संकल्प किये गए होंगे, बहुत से कार्यों को संपन्न किये जाने का आश्वासन खुद से किया गया होगा. आइये, इस बार हम सभी लोग मिलकर परिवार को बचाने का, परिवार के पुनर्निर्माण का, परिवार के सशक्तिकरण का संकल्प लें. संभव है कि इस संकल्प प्रस्ताव को उतनी गंभीरता से विचारार्थ न लिया जाये, जितनी गंभीरता की आवश्यकता आज परिवार बचाने को लेकर होनी चाहिए. पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, जल-वायु आदि को बचाने की मुहिम चलाते-चलाते समाज बेटियों को बचाने की स्थिति में आ गया है. एक पल को विचार करिए कि क्या कभी सोचा गया था कि ‘बेटी बचाओ’ जैसा नारा समाज में देना पड़ेगा? इसी के साथ सोचिए कि वर्तमान स्थितियाँ ऐसी नहीं बन चुकी हैं कि कल को ‘परिवार बचाओ’ जैसी मुहिम भी चलानी पड़ेगी?

 

वर्तमान परिदृश्य में रोजमर्रा में बेटियों के यौन-शोषण की खबरें लगातार सामने आ रही हैं. अनेकानेक घटनाओं में परिवार के सदस्य ही संलिप्त पाए जा रहे हैं. बचपन एकाकी, गुमसुम होने के साथ-साथ शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा है. खेलने-कूदने की उम्र में उसका भी हताश-निराश होना दिख रहा है. नंबर-गेम के चलते उसके मन-मष्तिष्क पर एक तरह का दबाव बना ही रहता है. इसके चलते एकाधिक घटनाओं में बच्चों के द्वारा भी गलत कदम उठा लिए जाने का कृत्य सुनाई पड़ता है. चिंता ये दिखाई पड़ती है कि आज के बच्चे हिंसात्मक प्रवृत्ति के होते जा रहे हैं. खेलकूद के दौरान, स्कूल में आपसी प्रतिद्वंद्विता के समय, किसी भी बात पर एक-दूसरे से झगड़ जाना बचपन की आम प्रवृत्ति है. ऐसा न केवल दोस्तों में वरन सगे भाई-बहिनों के बीच भी देखने को मिलता है. अब स्थिति इस स्वाभाविक, बाल-सुलभ झगड़े से कहीं आगे पहुँच चुकी है. अब बालमन हत्यारी हिंसात्मक प्रवृत्ति का होता जा रहा है.

 

युवाओं का हाल भी सशक्त अथवा सहज नहीं कहा जा सकता है. जरा-जरा सी बात पर अवसाद में घिर जाना उनके लिए आम बात होती जा रही है. नशे की गिरफ्त में चले जाना, आपराधिक कृत्यों की तरफ मुड़ जाना, आत्महत्या कर लेना आदि ऐसे युवाओं का अंतिम लक्ष्य होता जा रहा है. दरअसल समाज ने आधुनिक बनने की कोशिश में पहनावा, रहन-सहन, शालीनता, संस्कृति, भाषा, रिश्तों, मर्यादा आदि तक को दरकिनार करने से परहेज नहीं किया है. आधुनिक संस्कारों में घुलमिल जाने की चकाचौंध में हमारे परिवारों की दिव्यता कहीं गायब ही हो गई है. युवाओं की जोशपूर्ण मस्ती के बीच परिवार के बुजुर्गों का व्यक्तित्व सिमटने सा लगा है. पश्चिमी सभ्यता, संस्कारों को अपनाने की कोशिशों में हमें अपने मूल को नहीं भूलना चाहिए. बुजुर्गों की अहमियत को विस्मृत नहीं करना चाहिए. हम बुजुर्गों के प्रति अनभिज्ञता जैसा भाव अपनाने लगे हैं, इससे भी पारिवारिकता पर संकट दिखाई देने लगा है.

 

ऐसी स्थितियों में परिवार के सभी सदस्यों को एकाकी परिवार के स्थान पर संयुक्त रूप में रहने पर विचार करना होगा. वर्तमान समय में जबकि आर्थिक स्थितियाँ इन्सान को बुरी तरह से अकेलेपन की तरफ धकेलने में लगी हैं तब न सही संयुक्त परिवार की तरह किन्तु हफ्ते-दस दिन में बुजुर्गों, बच्चों के साथ दोस्ताना माहौल में रहने का प्रयास किया जा सकता है. घर के छोटे-छोटे कामों में उनको शामिल किया जाना चाहिए जिससे उनके अन्दर सामूहिकता की भावना जगे, उनमे कार्य करने के प्रति रुचि बढ़े. नए वर्ष में कोई भी संकल्प लें मगर साथ में परिवार को एकजुट रखने का, परिवार को बनाये रखने का, बचाए रखने का भी संकल्प लेना होगा. इससे पहले कि हमारे परिवार के बीच में अकेलेपन का भयावह साया किसी सदस्य को अपनी गिरफ्त में ले, किसी बच्चे को अवसाद की तरफ ले जाये, किसी युवा को अपराध की तरफ धकेले, हम सबको एकजुटता की आवश्यकता है. हम सभी को सहयोग की, अपनत्व की महफ़िल सजाकर अपने लोगों को अपने लोगों के बीच उपस्थित करना होगा. एक-दूसरे से करते हैं प्यार हम, एक-दूसरे के लिए बेक़रार हम या फिर साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जायेगा... आदि गीतों की पंक्तियाँ स्मृति में बसाकर सबको एकसाथ गाना-गुनगुनाना होगा.

31 दिसंबर 2023

वर्ष का दुखद अंत... कष्टकारी आरम्भ

दिसम्बर का अंतिम दिन पूरी तरह से समाप्त भी नहीं हो पाता है कि लोगों के द्वारा नए वर्ष के शुभकामना संदेशों का आना शुरू हो जाता है. इधर जबसे सोशल मीडिया मंचों की बाढ़ आई है, उस पर लोगों का अधिकाधिक समय गुजरना शुरू हुआ है तबसे फोन के द्वारा बधाई, शुभकामना देने का चलन कम से कमतर हो गया है. फोन आने भले कम हो गए हों मगर संदेशों का सैलाब आकर मोबाइल के अन्दर तबाही सी मचा जाता है. फोन के द्वारा और मैसेज के द्वारा बधाई संदेशों के आने में बहुत बड़ा अंतर होता है. इस अंतर का समझ में आना उस समय और भी गहराई से महसूस होता है जबकि यहाँ भी औपचारिक और अनौपचारिक संबंधों जैसी स्थिति बनी हो.




हर हाथ में मोबाइल की स्थिति में और सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता की स्थिति ने सभी को एक-दूसरे से जोड़ रखा है. ये और बात है कि इस जुड़ाव को कौन कितना शिद्दत से महसूस कर रहा है.अक्सर ऐसे लोग, जिनसे कि बहुत आत्मीय सम्बन्ध भी नहीं होते हैं वे फोन के द्वारा बातचीत करके खुद को आपका सबसे ख़ास बताने को आतुर रहते हैं. इसी तरह वे लोग जिनको ये एहसास होता है कि आपके जीवन में उनका क्या महत्त्व है वे दो-चार शब्दों के साथ ही अपनी बात को समाप्त करते हुए रिश्तों की गंभीरता को बनाये रखते हैं.


इसी गंभीरता और अगम्भीरता के दर्शन कुछ वर्ष पहले हुए थे जबकि नए साल का स्वागत हम अपने परिजन को विदाई देते हुए कर रहे थे. यह अजब सी असामान्य सी स्थिति थी. एक तरफ रिश्ते की मर्यादा, गंभीरता तो दूसरी तरफ सामाजिकता का निर्वहन. अजब सी असमंजस वाली स्थिति थी. समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह से खुद में समन्वय बनाया जाये. असमय बारिश भरे मौसम में अपने आँसुओं को बारिश की बूँदों के साथ मिलाते-बहते हुए एक तरफ पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा था, दूसरी तरफ औपचारिकता में बंधे रिश्ते के कारण अगले ही पल सामाजिकता का भी निर्वहन करना पड़ रहा था. प्रयागराज की पावन धरती पर श्वसुर साहब की अंतिम यात्रा से लेकर उनके अंतिम संस्कार तक खुद को संयमित रखते हुए परिवार को दिलासा देने का काम भी हो रहा था वहीं दूसरी तरफ नए वर्ष की शुभकामनाओं, बधाइयों को भी सहेजने का काम किया जा रहा था.


समय बहुत कुछ दिखाता है, सिखाता है बशर्ते हम लोग उससे सीखना चाहें. उस वर्ष के जाते हुए दिन ने और आने वाले दिन ने एकसाथ बहुत कुछ सिखाया. 

आदरणीय श्वसुर साहब को सादर श्रद्धांजलि..




 

29 दिसंबर 2022

आपसी विश्वास नहीं तोड़ेंगे

विगत दो वर्षों की उथल-पुथल भरी जीवन-शैली के बीच भी लोगों ने अपने उत्साह को नहीं छोड़ा. जिस तरह से कोरोना ने लोगों के दिल-दिमाग में गहरे घाव छोड़े थे उसे देखकर लगता नहीं था कि लोग सहजता से बाहर निकल सकेंगे. बावजूद इसके लोगों ने अपनी जिजीविषा को नहीं छोड़ा और कोरोनाकाल के डरावने घेरे से खुद को बाहर निकाल लाये. लोगों की जिजीविषा ने जहाँ उनके अपने-अपने पर्वों-त्योहारों को मनाने का अवसर दिया वहीं दूसरों के सुख-दुःख में भी शामिल होने का मौका दिया. 


अब जबकि ये साल अपनी निपट अंतिम अवस्था में है. लोग फिर एकबार सबकुछ भूल कर नए वर्ष के स्वागत के लिए तत्पर दिखने लगे हैं तब उसी के पीछे से कोरोना वायरस की खतरनाक आहट फिर से सुनाई देने लगी है. खबरें डरावनी ही नहीं अत्यंत भयावह हैं. लोग बाहर से उत्साहित दिखाई दे रहे हैं मगर भीतर ही भीतर उनको बहुत कुछ डरा रहा है. यह डर लोगों के खुद के प्रति नहीं बल्कि अपनों के लिए है. उन नौनिहालों के लिए है जिन्होंने अभी ज़िन्दगी का बहुत सूक्ष्म पल ही देखा और उनके सामने भयानक वायरस आकर खड़ा हो गया. विगत दो सालों में जिस तरह से नौनिहालों ने, युवाओं ने इस संसार को त्यागा है, उनको कोरोना ने अपना ग्रास बनाया है वह वाकई दुखद भी है, भयावह भी है. ऐसी घटनाओं से दिल सिहर उठता है. अपने हाथों में ऐसी जिंदगियों को जाते देखना, जिनको भविष्य के लिए नए-नए सपने देखना था, अत्यंत कष्टकारी होता है.




ज़िन्दगी का यही वो क्षण होता है जबकि तकनीकी, ज्ञान, विज्ञान से संपन्न व्यक्ति के हाथ में कुछ नहीं होता है. उसके पास सिवाय हाथ मलने के, सिवाय पछताने के कुछ नहीं रह जाता है. देखा जाये तो यही स्थितियाँ व्यक्ति को सिखाती भी हैं. यही हालात व्यक्ति को लड़ने के लिए ऊर्जा भी देते हैं. जिजीविषा और विश्वास से भरे जनमानस को अपनी पिछली इन्हीं घटनाओं से सबक लेने की आवश्यकता है. एक बार पीछे पलट कर देखने की आवश्यकता है. हम सभी ने लॉकडाउन जैसी भयावहता को देखा और सहा है. क्या उस दौर में हमने भौतिकतावादी वस्तुओं का संग्रह करने का विचार किया? क्या उन दिनों में लोगों ने लक्जरी गाड़ियों, सामानों, जेवरातों को खरीदने के लिए प्रयास किये? सभी ने प्रयास किये अपने लोगों की सुरक्षा के. सभी ने कोशिश की एकसाथ रहने की. सभी के कदम बढ़ाये सामुदायिकता के लिए. सभी ने संग्रह किया जीवन देने वाली खाद्य-सामग्री का.


उन दिनों एक बहुत लम्बा समय बिना भौतिकता के बीता. उस समय को लोगों ने आपस में एक-दूसरे का साथ देकर बिता दिया. ऐसे में यह समझने वाली बात है कि ज़िन्दगी में आवश्यक क्या है, अनिवार्य क्या है. यही वो समझ है जो इंसानियत सिखाती है, इन्सान बनाती है. हमने जब भी इस सोच को, इस समझ को छोड़ा है हम सभी इन्सान से जानवर में बदल गए. इसी बदलाव ने समाज को ख़राब कर दिया. इसी परिवर्तन ने प्रकृति का विनाश करना शुरू कर दिया. इसी बदलाव ने पर्यावरण को असुरक्षित कर दिया. इसी परिवर्तन ने मानसिकता को दूषित कर दिया है. आज हम अपने चारों तरफ नजर डालें तो प्रदूषित वातावरण ज्यादा देखने को मिल रहा है. चाहे प्रकृति की बात करें, पर्यावरण की बात करें, संस्कृति की बात करें, खान-पान की बात करें, सामाजिकता की बात करें, पहनावे की बात करें, बोल-चाल की बात करें सभी में एक तरह का प्रदूषण स्पष्ट दिखाई देने लगा है.


विगत को विस्मृत करते हुए हम सभी आगत के स्वागत में लगे हैं, अच्छा है मगर हमें विगत को पूरी तरह से विस्मृत नहीं करना चाहिए. नए साल के जश्न के ठीक पहले जाने वाले साल के सबक को याद रखें. जाने वाले साल ने हमें क्या-क्या सीखने योग्य दिया उसे याद रखें. बीत चुके अन्य सालों में भी हम सबने किस तरह दुःख-दर्द सहकर भी सबके साथ को स्वीकार किया, सबके विश्वास को बनाये रखा, उसी को आने वाले साल के साथ भी बनाये रखें. आने वाला समय कितना भयावह होगा, होगा भी या नहीं इस बारे में आज से परेशान होने की नहीं बल्कि सजग रहने की आवश्यकता है. आने वाले कल की चिंता में हमें अपना आज ख़राब नहीं करना है.


जाने वाले इस साल के साथ अपने नौनिहालों को, युवाओं को सिखाना है कि कैसे अतीत से सीख लेते हुए हम आगे बढ़ें. निश्चित ही ये पीढ़ी रफ़्तार की शौक़ीन है, तकनीक की प्रेमी है. ऐसे में उसको ये समझाने की महती आवश्यकता है कि रफ़्तार और तकनीक के शौक में ज़िन्दगी को ख़त्म नहीं किया जाना चाहिए. इसी पीढ़ी को समाज, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि का पाठ सिखाना होगा. हम सभी को नए साल के स्वागत के जश्न के साथ याद रखना होगा कि आने वाले साल को हम जो भी धरोहर सौंपेंगे, वही हमको वो अपने जाते समय देकर जायेगा. तो संकल्पित हों कि एक-दूसरे का विश्वास बनते हुए, एक-दूसरे का साथ बनते हुए आने वाले संकटों का सामना करेंगे. नए साल को हम खुशियाँ, स्वास्थ्य, सुखद मनोभाव, बेहतर इन्सान, सामाजिकता आदि से सजाते हुए आगे बढ़ेंगे. 





 

01 जनवरी 2022

बीते साल का दर्द

क्या नया साल, क्या पुराना साल सब एक जैसे दिखाई देते हैं जब सुबह उठते समय या फिर रात को सोते समय। यदि बदलाव कुछ दिखाई देता है तो वो उनसे जुड़े अनुभवों का, उन सालों से जुड़ी यादों का। बहुत कुछ ऐसा गुजर जाता है कि मन करता है कि ऐसा बार-बार गुजरे और कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि मन बार-बार कामना करता है कि ऐसा जीवन मे कभी न हो। बहुत कुछ अच्छा हो जाता है तो बहुत कुछ बुरा हो जाता है। कुछ ऐसा बुरा होता है जो स्मृतियों से अलग होता ही नहीं है। उसी समय वर्षों के बदलाव का अंतर समझ में आता है।


पिछले साल का जाना हुआ मगर बहुत ही दुखद घटना के साथ। दिल-दिमाग उसी घटना के इर्द-गिर्द घूमता राहत है। ऐसी घटना जिसे आजीवन न तो भुलाया जा सकता है और न ही उसके दर्द को कम किया जा सकता है। ये कहने वाली बात होती है कि समय के साथ बहुत से घाव कम हो जाते हैं अथवा मिट जाते हैं। गुजरे हुए वर्ष ने जो घाव दिया है वह समय के साथ भरेगा तो नहीं हाँ, हरा हमेशा बना रहेगा।


क्या कहा जाए, क्या लिखा जाए क्योंकि जैसे ही लिखने की शुरुआत करो तो हाथ काँपने लगते हैं और आँखें बहने लगती हैं। अपने छोटे का जाना अंदर तक हिलाकर रख गया है। न ये गया हुआ साल भुलाया जा सकेगा और न ही इसके द्वारा दिए गए घाव को। जनवरी आ गई है और वो दिन, वो घटना पूरे उफान के साथ दिल-दिमाग पर हावी  होने लगी है।


बस, कामना यही कि ये साल और आने वाले साल किसी को भी ऐसा दुख, ऐसा कष्ट न दे।

30 दिसंबर 2021

वर्तमान को वर्तमान के साथ ही जीने का प्रयास हो

जाने वाले को कोई रोक नहीं सकता, ये सन्दर्भ सदैव से व्यक्ति के इस धरा से हमेशा के लिए चले जाने के सन्दर्भ में की जाती है. यह सच भी है क्योंकि इंसानी विकास यात्रा में उसके द्वारा तमाम तरह के नए-नए आविष्कार किये गए, नए-नए मानक स्थापित किये गए, अनेक असाध्य बीमारियों का निदान उसके द्वारा निकाला गया मगर एक मृत्यु ही ऐसी है जिस पर इंसानों की तमाम सारी कोशिशों के बाद भी विजय प्राप्त नहीं की जा सकी. जिस तरह से इंसान मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सका है, तमाम सारी कोशिशों के बाद भी, वैज्ञानिक, चिकित्सकीय उपकरणों के होने के बाद भी मृत्यु को रोका नहीं जा सका है, ठीक उसी तरह से समय को नहीं रोका जा सका है. गुजरे समय को वापस नहीं लाया जा सका है.




ये वर्तमान वर्ष 2021 का अत्यंत अंतिम दौर है. एक-दो दिन इसके गुजर जाने में शेष हैं, ऐसे में बहुतायत लोग इस वर्ष के जाने की और नए साल के आने की बात करते दिख रहे हैं. इस साल ने अपने पूर्ववर्ती वर्ष 2020 की तरह ही कोरोना की भयावहता को बनाये रखा. इधर ऐसा दिखाई दे रहा है, जैसे वर्ष 2020 को जल्दी से जल्दी जाने की बात लोग करते दिखाई दे रहे थे, कुछ ऐसा ही इस साल में दिखाई दे रहा है. समय के जल्द से जल्द जाने की इच्छा उसी समय की जाती है जबकि उस समय से प्रसन्नता न मिले, ख़ुशी न मिले. कुछ ऐसा ही इस जाते हुए वर्ष के साथ हुआ है. इस साल में कोरोना की दूसरी लहर ने जबरदस्त भयावहता फैलाई. यद्यपि इस लहर की समयावधि कम रही तथापि जितनी देर उसकी उपस्थिति रही लोगों को डराती ही रही, लोगों को मौत के आगोश में भेजती रही.


ये साल चला जायेगा, भले रूप में या बुरे रूप में ये और बात है. जाते हुए समय को कोई रोक नहीं पाया है, जाने वाले समय को कोई वापस भी नहीं ला सका है. ऐसे में बुरे समय के जल्दी गुजरने वाली बात हो या फिर अच्छे समय को रोके रखने की इच्छा, ये एक काल्पनिक स्थिति है. बुरे समय को न तो जल्दी भगाया जा सकता है और न ही अच्छे समय को आहूत अधिक रोका जा सकता है. समय का अपना ही एक निर्धारण है, जिसके अनुसार उसका आना और जाना लगा रहता है. यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि यदि समय अच्छे से गुजारा जाए, उसमें खुशियों को समाहित किया जाये तो वह बिना किसी कष्ट के बीत जाता है. इसके उलट कई बार समय ही कष्ट दे जाता है, समय ही दुःख दे जाता है बस उसी समय से कैसे भी निपटा नहीं जा सकता है. समय के हाथों मिलने वाले दुःख या कष्ट का कोई निदान नहीं, सिवाय इसके कि आने वाले समय की महत्ता समझी जाये और वर्तमान को वर्तमान के साथ ही जीने का प्रयास किया जाये.


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01 जनवरी 2021

कुछ सीखने-सिखाने का प्रयास नहीं होता नववर्ष के पहले दिन

नया वर्ष 2021, नये साल का पहला दिन। सभी लोग उत्साह, उमंग से भरे दिख रहे हैं। सभी के चेहरे किसी उम्मीद के साथ नये साल का स्वागत करने को तत्पर हैं। अभी-अभी गया हुआ वर्ष 2020 अप्रत्याशित सा निकला, इस कारण लोगों में अनजान भय के बीच एक सुखद संदेश की आस है। इस आस के उत्साह को देखकर लगा कि समय के साथ न केवल समय बदलता है बल्कि लोगों के विचार, मानक, कार्यशैली भी बदल जाती है। ऐसा होना स्वाभाविक है पर कुछ बातें ऐसी हैं जो समय के साथ आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित होती रहें तो बेहतर होता है।



विगत कई वर्षों से देखने में आ रहा है कि नववर्ष के पहले दिन को पार्टी, पिकनिक के रूप में लिया जाने लगा है। आधी रात से शुरू होने वाला ये सिलसिला कई-कई दिनों तक चलता रहता है। हमें आज भी बहुत अच्छे से याद है कि हमारे बचपन में पहली तारीख को स्कूल बंद नहीं होते थे। हम बच्चे नियमित दिनचर्या की तरह स्कूल जाते थे। यह सब इसलिए भी याद है क्योंकि उस दिन हमारे अध्यापक, अध्यापिका बार-बार इस बात पर बल देते कि नये साल के पहले दिन किया जाने वाला कार्य बिना किसी परेशानी के साल भर सफल रहता है। उस दिन स्कूल में हम सबको पढ़ना, लिखना तो होता ही था, भोजन अवकाश के बाद के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी अनिवार्य रूप से भाग लेना होता था। 

इसके पीछे उद्देश्य यही था कि साल भर करते रहने के लालच में हम बच्चे न केवल पढ़ने-लिखने की ओर बढ़ें बल्कि खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी हिस्सा लें, रुचि दिखाएँ। अब इधर काफी समय से ऐसा कुछ देखने को नहीं मिल रहा। अब पहली तारीख को छुट्टी होती है और पार्टी के नाम पर सैर-सपाटा। इधर न तो शैक्षणिक संस्थानों द्वारा प्रतिभा विकास पर बल दिया जा रहा है और न ही अभिभावकों द्वारा इस पर ध्यान दिया जा रहा है। आज नया साल सिर्फ मौज-मस्ती करने का माध्यम भर रह गया है, इसके आयोजन द्वारा किसी तरह की सीख देने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। 


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वंदेमातरम्

नया वर्ष मंगलमय हो - Happy New Year 2021





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वंदेमातरम्

31 दिसंबर 2020

वर्ष 2020 क्या हम लोगों को याद रहेगा?

वर्ष 2020 क्या हम लोगों को याद रहेगा? ये सवाल इसलिए क्योंकि विगत कुछ दिनों से सोशल मीडिया में, मीडिया में, आपसी बातचीत में इसी साल की चर्चा हो रही है. सभी लोग कामना कर रहे हैं कि ये बुरा साल (उनके हिसाब से) बीते और नया अच्छा साल आये. कुछ लोगों का कहना है कि यह वर्ष 2020 कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा. फिर वही सवाल क्या वाकई ऐसा हो सकेगा? ऐसा इसलिए क्योंकि अभी इसी वर्ष के माह मार्च में जनता कर्फ्यू लगने के तुरंत बाद ही लॉकडाउन लगा दिया गया था. उसके बाद मीडिया में, सोशल मीडिया में न केवल देशव्यापी बल्कि विश्वव्यापी आँकड़े दिखाए जाने लगे. हर तरफ से ऐसी खबरें सामने आने लगीं जैसे कि कोई भयावह राक्षस हर घर में घुसकर सभी को खा जाने पर आतुर है. लोगों में भय, आशंका इस कदर थी कि वे सुनसान गली में भी अपने घर के बाहर निकलने से परहेज कर रहे थे.


समय का चक्र कभी रुका नहीं रहता, सो कोरोना की भयावहता पर भी नहीं रुका. मौतों, बीमारों के आँकड़ों के बीच स्वस्थ होने की सुखद खबरें भी आती रहीं. लोगों के स्वस्थ होने का प्रतिशत लगातार बढ़ते रहने से भी लोगों में आशा का संचार होने लगा. इसी बीच वैक्सीन बनने-बनाने, उसके परीक्षण आदि की खबरों ने भी लोगों में संतोष का भाव जगाया. लॉकडाउन के दौरान जीवन को निरुद्देश्य बताते-मानते लोगों के बीच अनलॉक की प्रक्रिया आरम्भ होने से जीवन के प्रति सकारात्मकता जगी. इसी में धीरे-धीरे अनलॉक को क्रमिक रूप से लागू करते हुए बहुत सारे प्रतिबंधों को दूर कर दिया गया. बहुत सारे कामों को पहले की तरह किये जाने पर जोर दिया जाने लगा. इन सबके बीच सरकार ने सभी को सुरक्षित रहने का सन्देश देने का काम बराबर किया. लोगों को मास्क लगाने, हाथ धोते रहने, शारीरिक दूरी बनाने का सन्देश लगातार सबके बीच प्रत्येक मंच से पहुँचाते रहने का काम सरकारी, गैर-सरकारी मंचों से होता रहा. इसके बाद भी आज बहुतायत लोगों में कोरोना को लेकर, खुद को सुरक्षित रखने को लेकर लापरवाही देखने को मिल रही है.




बाजारों में भीड़, मॉल में भीड़, ऑफिस में शारीरिक दूरी का पालन यथोचित रूप में न दिखना आदि लोगों की लापरवाही को, भूलने की आदत को ही दर्शाता है. भूलने की आदत कोई इसी बीमारी के प्रति ही नहीं है बल्कि हम भारतीयों में यह आम बीमारी है. हम सभी लोग बहुत जल्दी अपने आसपास की घटनाओं को भूल जाते हैं. हमने अपने आसपास की छोटी-छोटी घटनाओं को ही नहीं भुलाया है बल्कि देशव्यापी घटित हुई बड़ी-बड़ी घटनाओं को, वीभत्स घटनाओं को, जघन्य हत्याओं को भी लगातार भुलाने का काम किया है. किसी एक घटना का जिक्र करना बाकी सभी घटनाओं के साथ अन्याय होगा, आप स्वयं अपने दिमाग पर जोर डालकर देखिये और विचार करिएगा कि आपको कौन-कौन सी घटनाएँ, कौन-कौन सा वर्ष भली-भांति याद है. अपनी भूलने की आदत के चलते जल्द ही हम सभी इस वर्ष 2020 को भी भुला देंगे. यह क्षणिक भावुकता है, क्षणिक संवेदना है अन्यथा की स्थिति में देश के बहुत से वर्ष ऐसे निकले हैं जबकि उनमें इस बीमारी से ज्यादा जघन्य घटनाएँ हुई हैं, इससे ज्यादा दिल दहलाने वाली वारदातें हुई हैं.


भूलने की यह बीमारी बहुत हद तक सही भी है. कम से कम इससे दुखों को बहुत लम्बे समय तक ढोते रहने से बचा रहा जाता है. बीते समय के दुःख को भुलाकर आने वाले समय को सुखद बनाने के लिए तत्पर रहने के स्वभाव से हम सभी जल्द ही इस वर्ष 2020 को भूलें और आने वाले अपने समय को सुखमय बनाएँ.


(वर्ष 2020 की अंतिम पोस्ट)


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वंदेमातरम्

सम्मान करना तो सीख लो

किसी-किसी बात को लेकर, किसी-किसी बिन्दु को लेकर लोगों में एक तरह की भेड़चाल देखने को मिलती है। इधर नया साल आने को होता है वैसे ही ये दिखाई देने लगती है। सोशल मीडिया के बहुत से मंचों पर दिन भर इसी तरह की जुगाली होने लगती है। हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान को मानने, स्वीकारने की बात करते हुए अंग्रेजी नववर्ष को न मनाने की चर्चा चल पड़ती है। अंग्रेजी नववर्ष न मनाने एक बात है पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान भी न करना एक दूसरी बात है। 

नववर्ष आयोजन का तात्पर्य पार्टी, खाने-पीने, आतिशबाजी करने, रात भर कार्यक्रम करने से है और जरूरी नहीं कि सभी को यह करना ही हो। बहुत से लोग हैं जो इस तरह के आयोजन न तो करते हैं और न ही ऐसे किसी आयोजन का हिस्सा बनते हैं, इसके बाद भी ये लोग नववर्ष की शुभकामनाएँ लेने, देने में पीछे नहीं रहते हैं। इन लोगों में ऐसे लोग भी होते हैं जो हिन्दी नववर्ष का आयोजन पूरे उत्साह और जोश में करते हैं। 



अंग्रेजी नववर्ष का मनाना या न मनाना निजी मामला है। हिन्दी नववर्ष का मनाना, न मनाना निजी मसला होने के साथ-साथ संस्कार, संस्कृति का मामला है। ये अच्छी बात है कि आधुनिकता अपनाने के बाद भी अपनी संस्कृति, संस्कार को भुलाया न जाए। इसी बिन्दु पर आकर यही बात भी प्रभावी हो जाती है कि जिस स्थिति का, जिस कैलेंडर का सभी लोग साल भर उपयोग करते हों, दिन में बीसियों बार अंग्रेजी तिथि को बोलते, लिखते, उपयोग करते हों उस नववर्ष के आने पर शुभकामनाओं के आदान-प्रदान पर नकारात्मक नौटंकी क्यों?

ऐसे लोग गौर करें कि वे अपने काम करते समय किस तिथि का, किस कैलेंडर का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं? आज ही उन्होंने कौन सी तिथि लिखी, बोली होगी, पौष कृष्ण प्रतिपदा, विक्रम संवत् २०७७ या गुरुवार 31 दिसम्बर 2020? जब हर जगह इसी अंग्रेजी कैलेंडर का इस्तेमाल किया जाता है तो इसके बदलने पर, नया अंग्रेजी साल आने पर शुभकामनाओं के आदान-प्रदान से परहेज का नाटक अच्छी मानसिकता नहीं है। आप रात भर न जागें, आधी रात से विश करने न जुटें, रात भर पार्टी न करें, रात भर दारू-मुर्गा न करें पर जिससे दिन भर, साल भर काम चलाते हैं उस अंग्रेजी कैलेंडर का, उस अंग्रेजी साल का सम्मान अवश्य करें। 


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वंदेमातरम्

30 दिसंबर 2020

जाते की विदाई आते का स्वागत, बाकी तो समय के हाथ है

इस वर्ष, 2020 का आज अंतिम दूसरा दिन, सेकेण्ड लास्ट डे है. पिछले कई दिनों से बहुत से मित्रों, परिचितों के सन्देश मिल रहे हैं जिसमें इस साल के बारे में उनके विचार पढ़ने को मिल रहे हैं. ये इंसानी फितरत होती है कि इन्सान अपने मनोभावों को तत्कालीन सन्दर्भों से जोड़कर व्यक्त करता है. कुछ ऐसा ही लगभग सभी के विचारों में देखने को मिला. वर्तमान में कोरोना-कोरोना ही सबके दिल-दिमाग में छाया हुआ है. कहीं की भी बात की जाये वो लौट-फिर कर कोरोना पर आकर टिक जाती है. किसी से मुलाकात हो या फिर फोन से बातचीत हो सबकी बातों का केंद्र सिर्फ कोरोना ही रहता है. ऐसा ही संदेशों में आते विचारों में देखने को मिला.


ये सच है कि वर्ष 2020 को कोरना ने पूरी तरह से अपनी जकड़न में ले रखा है. इसके उलट यदि एक बार समूचे वर्ष को देखें तो ऐसी जकड़ उन दिनों में ज्यादा देखने को मिली जबकि लॉकडाउन लगा हुआ था. अनलॉक की प्रक्रिया शुरू होने के बाद जैसे-जैसे आज़ादी मिलती रही, काम करने की अनुमति मिलती रही, बहुत सी छूटें मिलती रहीं उनके बाद जिस तरह से लोगों की भीड़ सड़क पर देखने को मिल रही है, जिस तरह से लोग बिना किसी भय के अपने-अपने काम पर लगे हुए हैं उसे देखकर लगता नहीं कि अब कोरोना का वह डर लोगों में है. यह भी मानसिकता का खेल है. पिछले दिनों अपने एक परिचित के सामान्य बीमार होने पर उनसे बात करने पर पता चला कि वे कमजोरी महसूस कर रहे हैं. उनको शंका थी कि भले ही उनकी कोरोना टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई है मगर उनको कोरोना ही है. इसी कारण वे कमजोरी महसूस कर रहे हैं. उनकी सोच से उलट उनकी मेडिकल रिपोर्ट में उनको टायफाइड बताया गया था. क्या कहेंगे आप, क्या इस कोरोना काल के पहले टायफायड होने की दशा में कमजोरी नहीं होती थी? क्या किसी बीमारी में कमजोरी आना इसी साल से हुआ है?




कुछ इसी तरह की मानसिकता ने सबके भीतर एक अज्ञात भय पैदा कर रखा है. किसी भी तरह की शारीरिक समस्या आने पर, कोई भी बीमारी आने पर वे उसे कोरोना से जोड़ दे रहे हैं. इस तरह की सोच, ऐसा मानसिकता अब अपने आपमें एक बीमारी है. अकारण किसी बात के लिए परेशान रहना, सबको परेशान करना कहीं से भी उचित नहीं. हाँ, किसी भी हमले के लिए, किसी भी रोग से बचने के लिए सतर्क रहना, सुरक्षित रहना एक आवश्यक कदम है मगर सिर्फ और सिर्फ किसी एक बीमारी से डर कर किसी भी कदम को उसी से जोड़ देना बुद्धिमानी नहीं.


यह साल सबके लिए अपने-अपने हिसाब से अच्छा गुजरा. किसी के लिए बुरा, किसी के लिए अच्छा. क्या आपने इससे पहले इतना लम्बा समय अपने परिजनों के साथ बिताया था? क्या इससे पहले आपको अपने शौक, जो कहीं दबे हुए थे, पूरे करने का अवसर कभी मिला है? नुकसान बहुत से लोगों को हुआ है, बहुत से लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा, बहुत से लोगों के परिजन सदा-सदा को उनसे दूर हो गए, बहुत से लोगों ने कोरोना बीमारी का हमला झेला है मगर इसके साथ-साथ बहुत से लोगों ने अपने दूर हो चुके परिजनों को भी पाया है, बहुत से लोगों को इसी काल में नौकरी भी मिली है, बहुत से लोगों को इसी कालखंड में अपना नया रोजगार ज़माने का अवसर मिला है. इसी एक साल का नहीं, बीते प्रत्येक साल का हिसाब-किताब करिए और उसमें अच्छे-बुरे का, लाभ-हानि का, सुख-दुःख का आकलन करिए. इसके बाद तय करिए कि क्या ये साल सिर्फ और सिर्फ बुरा ही गुजरा? उसके बाद ही विचार करिए कि इस जाते साल ने सिर्फ और सिर्फ कष्ट ही दिए हैं?


जाने वाले को विदा करिए और आने वाले का स्वागत करिए. बाकी सब तो समय के हाथ में है, भविष्य के गर्भ में है.


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वंदेमातरम्

26 दिसंबर 2020

समय का स्वागत कर उसे सुखद बनाने का प्रयास हो

बाजार में रोज की तरह सैर-सपाटा करने के दौरान आज एक परिचित से मुलाकात हुई. इधर-उधर की बातों, हालचाल के बाद उनके सामने एक सवाल उछाल दिया. वैसे जो सवाल हमने उनकी तरफ उछाला वो सवाल वैसे प्रतिवर्ष उनकी तरफ से उछाला जाता था. जी हाँ, यह सच है. चूँकि बाजार में उनसे लगभग रोज ही मुलाकात हो जाया करती है. इसी में दिसम्बर माह के अंतिम दिनों में उनकी तरफ से एक सवाल हर बार सामने आता है कि नए साल के लिए क्या संकल्प लिया है? नए वर्ष में क्या नया करने का विचार है? आज बहुत देर तक बातचीत करने के बाद भी उनकी तरफ से ऐसा कोई सवाल नहीं आया तो जरा आश्चर्य हुआ. आश्चर्य इस कारण हुआ कि दिसम्बर समाप्ति में अब चार-पाँच दिन शेष रह गए हैं फिर भी उनकी तरफ से शून्यता क्यों?




उनकी तरफ से किसी तरह की पहल न होते देख हमने ही इस बार उनकी जिम्मेवारी का निर्वहन करने का मन बनाया. उनकी तरफ सवाल उछाला कि आने वाले साल के लिए क्या संकल्प कर रहे हो? जवाब में बहुत बुरा सा मुँह बनाते हुए, लगभग नजरंदाज करने जैसा अंदाज दिखाते हुए बोले कुछ नहीं. अब संकल्प-बंकल्प लेना बंद. हमारा प्रश्नवाचक स्वरूप देख कर वे आगे बोले कि इस साल भी कुछ सोचा था, कुछ संकल्प लिए थे मगर इस साल की तो पूरी तरह से रगड़ लग गई. सारे के सारे संकल्प धराशाही हो गए. इसलिए अब आगे से कोई संकल्प नहीं. समय का कोई भरोसा नहीं कि कब क्या हो जाये. हमें समझ आ गया कि कोरोना के चलते वे इस वर्ष को कोसने में लगे हैं और उसी के चलते आने वाले वर्षों के लिए किसी तरह के संकल्प की नीति पर नहीं चल रहे.


हमने हँसते हुए उनको दिलासा दिलाई कि एक साल ऐसा निकल गया, इसका ये मतलब तो नहीं है कि आने वाले सभी वर्ष ऐसे ही निकलेंगे. हो सकता है कि आने वाला साल या फिर उसके बाद के आने वाले साल बहुत बेहतरीन निकलें. संभव है कि जो-जो सोचा जाये, जो भी संकल्प लिया जाये वो सब आने वाले वर्षों में पूरे हो जाएँ. उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव न दिखने पर उनके सामने फिर सवाल उछाला कि अच्छा चलो, यह साल ख़राब निकल गया. पिछले सालों में तुमने अपने कितने संकल्प पूरे कर लिए? पिछले वर्षों में तुम्हारे सोचे हुए कितने काम पूरे हुए? वे साल तो इस साल जैसे बुरे नहीं थे. उनमें तो इस वर्ष जैसी कोई बीमारी नहीं फैली थी. उनकी तरफ से कोई जवाब न आता देख समझाया कि समय के हाथों में बहुत कुछ है जो हमारे हाथ में नहीं मगर हमारे हाथ में इसके बाद भी इतना कुछ है जो समय को बदल सकता है. संकल्प लेना न लेना तुम्हारा अपना निजी मसला हो सकता है मगर किसी एक वर्ष के बुरे निकल जाने के कारण से आने वाले समूचे समय को बुरा समझने लगना नितांत नकारात्मक सोच है. इस नकारात्मकता से बाहर निकलने की जरूरत है.


उनके चेहरे की मुस्कराहट से लगा कि बात सही जगह पहुँच सकी है. ये हम सभी को ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जो समय निकल गया जरूरी नहीं कि आने वाला समय भी वैसा ही निकले. निश्चित ही यह साल बहुत ही ख़राब रहा मगर इसके बाद भी इसमें बहुत कुछ अच्छी खबरें सुनने को मिलीं. देखा जाये तो प्रत्येक वर्ष अच्छे और बुरे का संयोग लेकर आता है. हम अपने ऊपर घटित होने वाली घटनाओं के अनुसार उस वर्ष का आकलन करने लगते हैं. वास्तविक रूप में तो हमें समय का स्वागत करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि हम सभी अपने कदमों से, अपने कार्यों से, अपने प्रयासों से उस समय को सुखद, खुशनुमा, बेहतर बना सकें.


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वंदेमातरम्

01 जनवरी 2020

नववर्ष की औपचारिकता


लोगों का उत्साह, लोगों की उमंग, लोगों की आकुलता देखकर लग रहा है जैसे उन सभी लोगों के लिए जाने वाला साल सकारात्मक रहा होगा या फिर उनके द्वारा अपने आपसे सोचे गए कार्य अधिकतम रूप में सफलता को प्राप्त किये होंगे. यदि ऐसा नहीं है तो फिर नए साल के स्वागत के लिए, उसके आने के लिए इतना उत्साह क्यों? आपस में शुभकामना संदेशों का इतना तीव्र आदान-प्रदान क्यों? ‘सबसे पहले मैं’ की तर्ज़ पर 2019 के रहते-रहते नववर्ष शुभकामना संदेशों का आदान-प्रदान क्यों? नए साल का स्वागत करना एक परम्परा सी बन गया है. यह भी आज के दौर में एक तरह की औपचारिकता बन गई है. सोशल मीडिया के इस तकनीक भरे युग में यह भी जबरदस्त औपचारिकता हो गई है. पुराने वाले साल में ही शाम से ही मोबाइल-कम्यूटर पर बैठकर दुनिया भर को शुभकामना सन्देश भेज कर अपने आपको सामाजिकता की श्रेणी में सबसे आगे लाकर साल भर के लिए किसी भी व्यावहारिकता से मुक्त कर लेते हैं.

इस तरह की औपचारिकता के बीच हम आज तक यह नहीं समझ सके हैं कि आखिर नए साल की शुभकामनाओं के आदान-प्रदान करने के पीछे का मुख्य मकसद क्या होता है? क्या वाकई हम सभी दिल से एक-दूसरे को शुभकामनायें देते हैं या फिर इसे भी महज औपचारिकता में निपटा लेते हैं? क्या वाकई हमारी शुभकामनायें या दूसरे की शुभकामनायें हमारे लिए शुभ होती हैं? बिना यह जाने कि बीता हुआ साल या फिर तमाम बीते साल किस तरह और कितने शुभ निकले, कितनी खुशियों भरे निकले हम सभी औपचारिकता में लिपट कर बस शुभकामना देने-लेने में लगे हुए हैं. क्या इस बार भी हम सभी ऐसा कर चुके हैं? क्या इस बार भी हम सभी बिना सही-गलत सोचे महज औपचारिकता में बहे जा रहे हैं?

फिलहाल, आज नए साल के आगमन पर ऐसा कुछ भी कहना-सुनना किसी को पसंद नहीं आएगा. जैसी कि औपचारिकता है, उसी का पालन आपके लिए हम भी किये जाते हैं, अपने एक शुभकामना सन्देश के साथ--

सूर्य रश्मियाँ स्वर्णिम-मधुरिम,
आनंदित कर दें घर-आँगन.
सुख, समृद्धि, वैभव, खुशियों संग,
वर्ष नया रहे मनभावन.


30 दिसंबर 2019

वर्ष 2019 में असफलताएँ ज्यादा आईं हमारे हिस्से में


दिसम्बर अपनी अंतिम अवस्था में है, ये साल भी अपनी अंतिम स्थिति में है. यही एक अवसर सभी की ज़िन्दगी में ऐसा होता है जबकि वह जाने वाले के लिए दुखी नहीं होता है बल्कि आने वाले के लिए ख़ुशी मनाता है. देश भर में सभी लोग आने वाले साल के स्वागत में जुट जाते हैं बिना इसकी परवाह किये कि जाने वाला साल पूरे साल, पूरे 365 दिन उसके साथ रहा. ऐसा क्यों? क्या जाने वाले के साथ हम सभी का क्षणिक नाता हो गया है, इसलिए? क्या जाने वाले को हम महज चंद पलों के लिए याद करना चाहते हैं, इसलिए? क्या हम यह सम्भावना तलाशने लगे हैं कि हर आने वाला हमारे जीवन में कुछ नया लेकर आएगा? जिस वर्ष को, जिस पल को हमने अभी देखा नहीं; वह हमारे लिए क्या-क्या लेकर आने वाला है; वह अपने साथ हमारे हितार्थ कौन-कौन सी सम्भावनाएं छिपाए हुए है ये हमें कुछ भी ज्ञात नहीं मगर हम सब उसके स्वागत में तत्पर हैं. क्यों?


बहरहाल, किसी भी साल के आने पर ऐसा ही होता है. कौन सा ऐसा पहली बार हो रहा है. ऐसा प्रत्येक वर्ष होता आया है, आगे भी होता रहेगा. न हमारे रोके रुकना है, न हमारे रोके रुकेगा. ऐसा अकेले अंग्रेजी नववर्ष के समय ही नहीं होता है वरन हिन्दू नववर्ष के आगमन पर भी होता है. दरअसल सामाजिक रूप से इसकी एक परिपाटी सी बना ली गई है कि आने वाले वर्ष का स्वागत करना है. अच्छा है ऐसा करना क्योंकि किसी भी नवांगतुक का स्वागत किया ही जाना चाहिए मगर इसके साथ-साथ जो आपके साथ लम्बे समय तक रहा, उसका आकलन भी आवश्यक है. आखिर जो साल इतने लम्बे समय तक साथ रहा. हर अच्छे-बुरे काम उसी के साए में किये गए तो क्या ये आवश्यक नहीं कि चंद पल रुक कर उनका आकलन कर लिया जाये? ये जान लिया जाए कि जाते हुए वर्ष के साथ हमने क्या अच्छा किया और क्या बुरा? क्या ये जानना भी आवश्यक नहीं कि जो साल अब दोबारा नहीं आने वाला वह हमारे लिए सुखद रहा या दुखद? 

संभव है कि बहुत से लोग इसे महज एक तरह का आदर्शवाद साबित करने की कोशिश करें. ये भी संभव है कि ऐसे किसी कदम को स्वानुभूति का माध्यम बताएं. कुछ भी संभव है मगर जिस तरह की एक आदत हमारे भीतर बचपन से डाली गई उसके अनुसार हम प्रतिदिन की घटनाओं का आकलन करते हैं. सोने के पहले ये विचार करते हैं कि दिन भर में हमने क्या अच्छा किया और क्या बुरा किया. कितनी बातों को लेकर हम सफल रहे और कितनी बातों को लेकर हम असफल रहे. दिन भर की घटनाओं में कितनी घटनाओं ने हमें निराश किया और कितनों ने हमें खुश किया. साल के अंतिम दिन ऐसा ही गुणा-भाग हमारे साथ चलता रहता है. एक-एक दिन का आकलन करना और पूरे साल भर का आकलन करना अपने आपमें अलग काम है. ऐसे में खुद को नियंत्रित करके अपने कार्यों के, अपने स्वभाव के बारे में कुछ भी आकलन करना, विश्लेषित करना बहुत बड़ा काम होता है. समाज को दिखाने के लिए कुछ भी कह-सुन लिया जाये मगर हम खुद की नज़रों में अपना आकलन निष्पक्ष रूप से करते हैं. यदि आज इस वर्ष के जाने के महज एक दिन पहले अपना आकलन करें तो समीक्षात्मक रूप से हम असफल ही रहे हैं. सामाजिक स्तर पर, पारिवारिक स्तर पर, दोस्ती के स्तर पर, व्यावहारिक स्तर पर. यदि कहीं सफलता मिली है तो वह भी क्षणिक खुद के खेलकूद के स्तर पर. इसके अलावा लगभग सभी स्थितियों में हमारे हाथ असफलता ही हाथ लगी है. किसी भी रूप में हम किसी भी स्तर की ख़ुशी सबके बीच इस हिसाब से नहीं बाँट सके कि कहा जा सके कि यह स्थिति हमारे लिए सुखद रही. आने वाले वर्ष में इन सभी को देखते हुए सुधारने की कोशिश करना है. वर्ष 2020 में भी सफल होंगे या असफल, ये तो समय के गर्भ में है.



06 अप्रैल 2019

मंगलमय ही नव संवत्सर 2076




आज भले ही सारे काम अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार किये जाते हों मगर इसके निर्माण के 57 वर्ष पूर्व राजा विक्रमादित्य के काल में भारतीय वैज्ञानिकों ने भारतीय कैलेंडर विकसित कर लिया था. इस भारतीय या कहें कि हिन्दू कैलेंडर का आरम्भ हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माना जाता है. इसके अलावा बारह महीनों का एक वर्ष और सात दिनों का एक सप्ताह रखने का प्रचलन भी विक्रम संवत से ही शुरू हुआ था. इस कैलेण्डर में महीने का हिसाब सूर्य और चंद्रमा की गति पर आधारित है. विक्रम कैलेंडर की इसी धारणा को बाद में यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया. इसी कैलेण्डर के आधार पर भारत के अन्य राज्यों ने भी अपने-अपने कैलेंडर का निर्माण किया. 

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होने वाले वर्ष को नव संवत्सर भी कहते हैं. संवत्सर के पाँच प्रकार- सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास हैं. विक्रम संवत में इन सभी का समावेश है. मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क आदि सौरवर्ष के माह हैं. यह वर्ष भी 365 दिनों का होता है. इसमें वर्ष का प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से माना जाता है. चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि चंद्रवर्ष के माह हैं. चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो चैत्र माह से शुरू होता है. सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है. इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है.  समय के साथ ऐसे बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं. चंद्र वर्ष में चंद्र की कलाओं में वृद्धि होती है तो यह बारह के स्थान पर तेरह माह का हो जाता है. जब चंद्रमा शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बढ़ना शुरू करता है तभी से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी गई है.
आप सभी को नव संवत्सर की शुभकामनायें.

02 जनवरी 2019

बाजार के हाथों में संवेदनाएँ


चलिए, कुछ देर बाद नए साल का नया दिन गुजरने वाला है. सभी ने खूब दम से एक-दूसरे को बधाई-शुभकामनायें दीं. ऐसा लगा जैसे इस बार सबकुछ अच्छा-अच्छा होने वाला है. एहसास सुखद प्रतीत होता है कि अब सबकुछ अच्छा, सुखद होने वाला है. इसके बाद भी जब आँख खुलती है तो समझ आता है कि ऐसा कुछ नहीं है. सब कुछ ज्यों का त्यों बना हुआ है, सबकुछ वैसा ही चल रहा है जैसा अभी तक चलता आ रहा था. इस सम्बन्ध में अपनी अइया यानि दादी की एक बात याद आती है. देश के आज़ाद होने के समय की बात बताते हुए वे अक्सर बताया करती थीं कि कुछ दिनों से घर में, पड़ोस में बराबर बातचीत होती कि देश आज़ाद होने वाला है. पंद्रह अगस्त की सुबह सभी जगह चहल-पहल मची हुई थी, गलियों में लोग उल्लासित से दिखाई दे रहे थे, एक शोर सा था कि देश आज़ाद हो गया. अइया बताती हैं कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि कुछ तो बदला नहीं फिर इस आज़ादी का क्या मतलब है. सब कुछ तो वैसा ही दिख रहा है जैसा कल रात को सोते समय दिखा था. यह सही भी है. देश आज़ाद हुआ था मगर न तो अंग्रेज एकदम से गायब हो गए थे और न ही कोई नई व्यवस्था एकदम से सामने दिखाई देने लगी थी. कुछ ऐसा ही नए साल के उल्लास में दिखाई देता है. 


न कुछ बदलता है, न बदलता दिखाई देता है सिवाय एक कैलेण्डर के, सिवाय एक तारीख के, सिवाय एक महीने. इसके बाद भी उल्लास ऐसा जैसे कोई अभूतपूर्व परिवर्तन हो गया हो. ऐसा उत्साह लोगों में जैसे कोई अनोखा बदलाव देखने को मिलने वाला हो. ऐसी उमंग लोगों में जैसे कोई अजब सा माहौल आने वाला हो. हल्ला-गुल्ला, हंगामा, बाइक रेस के बीच ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जो कल नहीं था. इसके बाद भी अनोखा नशा देखने को मिलता है. ऐसा लगता है जैसे व्यक्तिगत रूप से कोई परिवर्तन आने वाला है. देखा जाये यही बाजार की शक्ति है जो अपने हाथों में इन्सान को संभाले है. अब सबकुछ बाजार के हाथों से संचालित होता है. इसी बाजार के हाथों में अब दिन-महीने-पर्व-आयोजन हैं. इसी का उदाहरण है ये नववर्ष और आने वाले महीनों में और भी दिन इसी का उदाहरण बनेंगे. तो आइये, बिना कुछ जाने-सोचे-समझे बाजार के हाथों की कठपुतली बनकर उमंग में डूब जाएँ, उल्लास में उतरायें. ये साल भी मनाएँ, आने वाला साल भी मनाएँ.

31 दिसंबर 2018

बीते साल के अधूरे काम पूरे करने हैं


कुछ पलों के बाद वर्ष 2018 हमसे दूर चला जायेगा और नया साल 2019 हमारे सामने आ जायेगा. हम सब बीते साल को भुलाते हुए नए साल के स्वागत में जुट जायेंगे. लोगों के द्वारा आतिशबाजी, पटाखे चलाया जाना शुरू होगा. एक-दूसरे को बधाई देने-लेने का, शुभकामनायें लेने-देने का काम चलता रहेगा. इस दौरान हम लोग एक पल को भी याद नहीं करते बीते साल को. जबकि हमें याद रखना चाहिए कि हम जिस पल का स्वागत कर रहे हैं वही पल अगले ही पल पुराना होने वाला है, बीत जाने वाला है. ऐसे में जबकि एक आने वाला पल अगले ही पल पुराना होने वाला हो, बीत जाने वाला हो तब हम सभी को खुशियों के बीच बीते साल में अपने गुजारे गए पलों को नहीं भूलना चाहिए. शेष लोग क्या करते हैं, क्या नहीं इसका अंदाजा तो कतई नहीं है पर हम व्यक्तिगत रूप से नित्य ही अपने पूरे दिन का आकलन रात को सोने के ठीक पहले करते हैं. एक-एक दिन का आकलन भले ही छोटा लगे मगर इसके द्वारा अपनी गलतियों, कमियों को सीखने-सुधारने का मौका मिलता है. इसके बाद भी हमारे लिए ही हम कह सकते हैं कि कई गलतियाँ, कई कमियां अभी भी हमारे भीतर हैं, बनी हुई हैं. 


एक-एक दिन के आकलन को जोड़-जोड़ कर साल भर का आकलन बताता है कि हमारे साथ अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जो सुधारने की आवश्यकता है. अपने अन्दर की कमियों को बहुत हद तक दूर करने की कोशिश रहती है, बहुत हद तक इसमें सफल भी रहते हैं मगर फिर भी कुछ है जो अभी सुधारा नहीं जा सका है. नए बदलते कैलेण्डर के साथ बहुत से इरादे सामने होते हैं, कई सारे वादे खुद से किये जाते हैं, बहुत से संकल्प किये जाते हैं. इस जाने वाले साल में हमने अपने आपसे दो-चार वादे किये थे, दो-चार संकल्प किये थे. इनमें से पूरी तरह से सफलता तो किसी में नहीं मिली हाँ कुछ-कुछ काम अवश्य हुए हैं. ऐसे में इस नए साल में क्या संकल्प होगा, क्या वादा होगा पता नहीं. आने वाले साल में इसका भी ध्यान रखा जायेगा कि किसी की भावनाओं से खिलवाड़ न हो. जाने-अनजाने संभवतः ऐसा हो जाता है. दिल-दिमाग कभी नहीं चाहता है कि किसी का अहित किया जाये, किसी की भावना का अपमान किया जाये. इस साल अपने कुछ कार्यों से लगा कि ऐसा नहीं किया जाना था. यदि अपने आपमें अनुशासित रहते, अपने आपको संयमित रखते तो निश्चित ही बहुत कुछ नियंत्रित रखा जा सकता था. इसके बाद भी कहा जा सकता है कि किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करना उद्देश्य कतई नहीं रहता है. आने वाले कुछ दिन अपने को विश्लेषित करने का समय है. कुछ नया करने, सोचने के पहले इस जाने वाले साल में जो अधूरा रह गया है उसे पूरा करने का काम किया जायेगा. 

ऐसा इसलिए क्योंकि यदि अपने स्तर पर इस साल का आकलन करें तो ऐसा कुछ भी नहीं पाया जिसे उपलब्धि कहा जा सके. ऐसा कुछ भी नहीं किया गया जिससे विश्वास में और वृद्धि की जा सके. ऐसा कुछ नहीं किया गया जिसके द्वारा अपने आपमें भी गर्व किया जा सके. बहुत कुछ मन में है, बहुत कुछ दिमाग में है उसे पूरा करने का हौसला जुटाना है. अपने प्रति बनती-बिगड़ती तमाम धारणाओं के बीच खुद को स्थापित करना है. विश्वास-अविश्वास के बीच की बारीक रेखा को मिटाते हुए विश्वास का माहौल खड़ा करना है. सफलता-असफलता के बीच भटकते हुए बस सफलता की मंजिल को प्राप्त करना है. हाँ, विगत अनेक वर्षों की तरह ही यह वर्ष भी जाते-जाते दुखी करके गया. ऐसा एक-दो सालों से नहीं हो रहा वरन पिछले न जाने कितने साल ऐसे बीते जिनमें साल जाते-जाते दुखी कर जाता है, कष्ट दे जाता है. इस बार भी हुआ मगर, ये जीवन है यहाँ इसी अनिश्चितता के बीच सबकुछ गुजारना होता है. यह साल तो गुजर जाने वाला है, आने वाला साल भी अपनी अवधि पूरी करके गुजर जायेगा. जाते साल में जो-जो उपलब्धियाँ आप सबको मिली उसके लिए शुभकामनायें. जो काम अधूरे रह गए, उनके आने वाले साल में पूरा होने की कामना.

27 दिसंबर 2015

हैप्पी न्यू इयर शो मस्ट गो ऑन


समापन के पहले ही आगमन की तैयारी देखकर हरिवंशराय बच्चन जी की पंक्ति ‘आने के साथ ही जगत में कहलाया जाने वाला’ याद आ जाती है. ये आयोजन किसी के समर्थन में नहीं होगा, ये आयोजन कोई साधारण आयोजन नहीं होगा बल्कि ये स्वागत  होगा एक और नए वर्ष का. जिन आँखों ने किसी की मौत पर आँसू बहाए होंगे उन आँखों में नए साल की रात मादकता तैर रही होगी; जो हाथ किसी की सहायता के लिए उठे थे वे लड़खड़ाते जिस्म संभालने को आतुर हो रहे होंगे; जिन होंठों से किसी शोषित को न्याय दिलाने की आवाज़ उठी थी वे लरजते होंठों से मिलन को मचल रहे होंगे.ये सोचना दुखद है कि एक झटके में दुःख, दर्द को बिसराकर अपने में सिमट जाने का हुनर हम भारतीयों में कब से, कैसे आ गया? हमारी आदर योग्य वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा की जगह एक मैं और एक तू की संकल्पना ने कैसे जन्म ले लिया? पता ही नहीं चला कि कब यहाँ मानसिक आकर्षण से इतर शारीरिक निकटता को प्रमुखता मिल गई? इन सबके बीच कई बार ये संशय भी उभरता है कि क्या हम वाकई आभासी रिश्तों, संबंधों की इमारत तैयार करने में लगे हुए हैं? क्या वाकई में हमारे लिए संवेदनाओं, शुभकामनाओं, मंगलकामनाओं आदि का कोई मोल नहीं रह गया है? औपचारिकताओं में सिमटती जा रही जिंदगी में क्या सिर्फ औपचारिकता का ही समावेश रह गया है? क्यों साल-दर-साल अनेकानेक शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करने के बाद भी हम सब सुखों, खुशियों से कोसों दूर है? ऐसे में हर बार नववर्ष का आयोजन समझ से परे रहता है. लाख समझने की कोशिश के बाद भी नाकामी ही हाथ लगती है और ऐसे आयोजनों का औचित्य समझ नहीं आता है. बहुत-बहुत कोशिशों बाद भी नया वर्ष न तो दर्द को समाप्त कर पाता है, न ही दर्द को कम कर पाता है. कभी आतंकी गतिविधियाँ, कभी महिलाओं के साथ ज्यादती, कभी बच्चियों के साथ ह्रदयविदारक घटनाएँ दिल को दहला देती हैं. इन घटनाओं के बाद ऐसे आयोजनों का शोर-हुल्लड़-उमंग-उत्साह फौरी तौर पर निपट औपचारिक दिखाई देता है. दुखों का, दर्द की एक छोटी सी लहर सुखों के, खुशियों के पहाड़ को भी नेस्तनाबूत कर देती है किन्तु?
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किन्तु क्या... किन्तु तो किन्तु है, कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा. इस किन्तु-परन्तु के बीच सत्यता को स्वीकार करते हुए इस तरह के आयोजनों की सार्थकता को सिद्ध करना होगा. हम सब यदि वाकई में नववर्ष को यादगार बनाना चाहते हैं; यदि सच में हम सब इंसानियत के लिए कुछ करना चाहते हैं तो हमें नववर्ष के आयोजन मात्र नहीं करने चाहिए. समाज को दिशा देने वाले, इंसानियत को सशक्त करने वाले, पर्यावरण को सुधारने वाले, व्यवस्था को सुदृढ़ करने वाले कार्यों को अपनाना होगा. संकल्प लेना होगा कि जिस पर्यावरण के सहारे हम जीवित हैं, उसको मिटाने का काम नहीं करेंगे. यदि हम अपने आपको सभ्य कहने का दम भरते हैं तो महिलाओं के प्रति हिंसात्मकता न दिखाते हुए इसे सत्य भी करेंगे. किंचित स्वार्थ में पड़कर बेटियों के प्रति दुर्व्यवहार नहीं करेंगे. संस्कार, संस्कृति हमारी पहचान का मूल है, इस कारण आने वाली पीढ़ी को सभ्य-संस्कारी बनाने को संकल्पित रहेंगे. परिवार जैसी महत्वपूर्ण इकाई में आ रहे विध्वंस को रोकने की कोशिश से, दाम्पत्य जीवन में आ रहे बिखराव को रोकने से, आपसी विश्वास, सहयोग की भावना पैदा करने से, रिश्तों की गरिमा को बनाये रखकर भी हम नववर्ष के आयोजन को सम्पन्न कर सकते हैं. दूसरों के लिए न सही कम से कम अपनों की खुशी के लिए चन्द सकारात्मक कदम उठाकर हम रोज नववर्ष का आनन्द उठा सकते हैं. बस इस एहसास को समझने की जरूरत है, अपनों को करीब लाने की जरूरत है, समाज के लिए जागने की जरूरत है.
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देखा जाये तो नववर्ष महज कैलेण्डर परिवर्तन का प्रतीक है, महज एक और दिन के उदय होने का सूचक है, एक और कालखंड व्यतीत हो जाने का द्योतक है. ऐसे सूचकों के लिए, संदेशों के लिए, प्रतीकों के लिए सामजिक विसगतियों को विस्मृत कर देना, मानसिक शांति को क्लेश में बदल देना, स्वार्थ में लिप्त रहकर सारी संवेदनाओं को तिरोहित कर देना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता है. ये अपने आपमें नितांत सत्य है कि मरना-जीना अत्यंत प्राकृतिक है, आना-जाना एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है और इस प्राकृतिक चक्र के लिए दुनिया का परिचालन रुकता नहीं है. ये भी सत्य है कि दिन की रौशनी से रात को गुलजार नहीं किया जा सकता और रात के अंधेरों को कालिख बनाकर दिन के उजालों में नहीं पोता जा सकता है. लोग कल भी मरते थे, लोग आज भी मर रहे हैं, लोग कल भी मरते रहेंगे. मोमबत्तियाँ जलाने वाले हर कालखंड में मिलेंगे, श्रद्धा-सुमन प्रत्येक वर्ष अर्पित किये जाते रहेंगे, श्रद्धांजलियाँ जीवन के साथ-साथ चलती रहेंगी. सीधा सा अर्थ है कि शोक के साथ हर्ष का साम्य ही ज़िन्दगी की जीवन्तता की निशानी है. तो... तो फिर... जस्ट चिल यार... कम ऑन कूल ड्यूड.... शो मस्ट गो ऑन, कल जिन हाथों में मोमबत्तियाँ-तख्तियाँ थी, आज छलकते जाम होंगे, मदमस्त-लड़खड़ाते बदन होंगे; कल जो होंठ चीख रहे थे न्याय के लिए, आज वो आपसी जुगलबंदी में मगन होंगे. कल जो-जो हो रहा था, वो कल फिर-फिर होगा... बस नए वर्ष की रात जश्न ही जश्न होगा, सब कुछ बिसराने का मौसम होगा. सब कुछ बिसराते हुए, बाँहों में बाँहें डाले, कमर में हाथ डाले थिरकते हुए जोर से ‘हैप्पी न्यू इयर’ चिल्लाएँ.

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