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24 जून 2020

फिल्म फेस्टिवल में कुछ अपनी बातें

जनपद जालौन की तहसील कोंच के उत्साही युवा पारसमणि द्वारा कोंच फिल्म फेस्टिवल का आयोजन ऑनलाइन किया जा रहा है. उस युवा की क्षमता पर हमें भरोसा है, यदि कोरोना संक्रमण से सुरक्षित रहने की, लॉकडाउन-अनलॉक जैसी व्यवस्था का पालन करने की उसकी ईमानदारी न होती तो निश्चित ही ये आयोजन वास्तविक रूप में बहुत ही भव्य होता. फ़िलहाल तो इन्हीं बाध्यताओं, नियमों का पालन करते हुए इस फेस्टिवल का आयोजन ऑनलाइन किया गया. इसमें निश्चित समय पर अनेक कलाकारों को, फिल्म से जुड़े लोगों को, व्याख्यान देने वालों को आमंत्रित किया गया. सभी ने अपनी-अपनी प्रतिभा का परिचय यहाँ दिया.



इसी में हमें भी ऑनलाइन अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया. ऑनलाइन बोलना, वो भी उस स्थिति में जबकि आपके सामने कोई सुनने वाला न दिखाई दे, बहुत ही अजब सा अनुभव देता है. इसी कारण से बहुत कम लाइव कार्यक्रमों में सहभागिता कर पाते हैं. इस कार्यक्रम में सहभागिता करना हमारा स्नेहिल बंधन था. पारस के स्नेहिल आदेश के बाद इंकार कर पाना संभव ही नहीं होता है. कतिपय कारणों से इस बार उसके कहे अनुसार वीडियो बनाकर नहीं भेज सके. फिलहाल, ऑनलाइन आकर नए फ़िल्मी कलाकारों से बात करने का अवसर मिला.

इस पोस्ट के द्वारा अपनी उसी बात को लगभग दोहराते हुए जनपद जालौन के उन सभी कलाकारों से, जो फिल्म निर्माण में लगे हैं, इतना निवेदन है कि वे विषयों का निर्धारण कुछ इस तरह से करें जो आम विषय से अलग हो. यह सत्य है कि छोटी जगहों के फिल्मकार बड़े बैनर का मुकाबला किसी भी स्थिति में नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में बजाय हतोत्साहित होने के वे ऐसे विषयों का चुनाव करें जो अपने आपमें अलग दिखाई दे. इसके साथ-साथ जनपद जालौन में साहित्यिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासत की अत्यंत समृद्ध है. इनके बारे में भी समाज को बताये जाने की आवश्यकता है. फिल्मकारों को इस तरफ भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है.

यहाँ के फिल्मकारों को चंद छोटी-छोटी बातों को ध्यान रखना होगा.

  • उनकी बनाई फ़िल्में व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकतीं. ऐसे में ऐसे विषयों पर फ़िल्में बनाई जाएँ जो लोगों का ध्यान खींचें.
  • बजाय कमाई करने के लोगों तक अपनी पैठ बनाने के लिए फिल्मों को बनाया जाना चाहिए.
  • उन विषयों पर फिल्म बनाने से बचना चाहिए जो आम हैं, सामान्य हैं. किसी विशेष विषय को ऐतिहासिक, सांस्कृतिक रूप से सम्बद्ध करते हुए दिखाया जाना चाहिए.
  • उन स्थानीय बिन्दुओं को भी परिलक्षित करना चाहिए जो आज भी ऐतिहासिक, अमूल्य होने के बाद भी जनमानस की दृष्टि से ओझल हैं.
  • अपनी-अपनी फिल्मों को इधर-उधर रिलीज के चक्कर में फँसने के सीधे इंटरनेट पर, विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर रिलीज करके बहुतायत लोगों तक अपनी पहुँच बनानी चाहिए.
  • सभी फिल्मकारों को खुद का विशेष समझने के अहंकार से मुक्त होने की आवश्यकता है. ऐसा करके वे सामान्य जन से सीधे तौर पर जुड़ सकेंगे.
  • सभी कलाकारों को यह समझना होगा कि नुक्कड़ नाटक, मंचीय नाटक, रंगमंच, फिल्म के अभिनय में बहुत अंतर है. नुक्कड़ अथवा रंगमच का तरीका लेकर फिल्म में अभिनय नहीं किया जा सकता है.
  • वरिष्ठ कलाकार साथियों को समय-समय पर कार्यशाला का आयोजन करना चाहिए ताकि नए लोग कुछ और नया सीख सकें.
  • इसके साथ-साथ जनपद के सभी साथियों को मिलकर एक मंच, एक बैनर की स्थापना करनी चाहिए. इसमें वे सब एकजुट होकर अपनी-अपनी समस्याओं का निदान कर सकते हैं.


बातें तो और भी बहुत हुईं मगर लगता नहीं कि उन पर अमल किया जायेगा. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद बहुत प्रयास किये कि यहाँ के सक्रिय कलाकार एक मंच पर आयें मगर संभव न हो सका. आज जबकि लोगों में होड़ ज्यादा है, आपसी तनाव अधिक है, ऐसे में सबका एक मंच पर आना कल्पना ही लगता है. अपनी बात कहनी थी सो कह दी, मानना या न मानना सामने वाले की मर्जी. फ़िलहाल तो बड़े अच्छे कार्यक्रम के लिए सभी आयोजकों को बधाई, शुभकामनायें.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

23 मई 2018

सम्बन्ध और सम्मान दे गया ओरछा फिल्म समारोह

वीर बाँकुरों के बुन्देलखण्ड की पावन धरा ओरछा में पाँच दिवसीय भारतीय फिल्म समारोह 2018 ने सभी को अपनी-अपनी तरह से सम्मोहित किया है. पाँच दिनों के इस सांस्कृतिक समागम में कला थी, कलाकार थे, निर्देशन था, निर्देशक थे, रंगमंच था, फीचर फ़िल्में थीं, डाक्यूमेंट्री थी, शॉर्ट फ़िल्में थीं, तकनीक थी, संस्कृति थी, प्राचीनता थी, नवीनता थी, परम्पराएँ थीं, आधुनिकता थी. कुल मिलाकर कहा जाये कि सभी के लिए कुछ न कुछ था. फिल्म समारोह में आये कलाकरों ने अपनी-अपनी क्षमताओं, प्रतिभाओं के अनुसार प्रदर्शन किया और वहाँ उपस्थित रहे सभी लोगों ने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उसका लाभ उठाया. मुंबई फिल्म जगत के नामचीन कलाकारों ने आकर बुन्देलखण्ड के कलाकारों की कला को तराशने का कार्य किया. हमारा व्यक्तिगत रूप से कभी रंगमंच से, नाटकों से, निर्देशन से सम्बन्ध रहा था मगर कतिपय कारणों से अब दर्शक की भूमिका के साथ-साथ फोटोग्राफर की और आलोचक की भूमिका का निर्वहन करते हैं. इन भूमिकाओं के बीच खुद को संबंधों के विस्तार के लिए भी सक्रिय रखते हैं. ऐसे कलात्मक आयोजनों में जहाँ एक तरफ कलाकारों से मुलाकात होती है, उनकी कला से परिचय मिलता है वहीं उन कलाकारों में छिपे इन्सान से भी परिचय हो जाता है.


भारतीय फिल्म समारोह ओरछा 2018 का आरम्भ पूर्ण सांस्कृतिकता के साथ हुआ. उसके बाद समारोह रोहिणी हट्टंगड़ी, रजत कपूर, केतन आनंद, नफ़ीसा अली, यशपाल शर्मा जैसी फ़िल्मी हस्तियों के आगमन से गुलज़ार हुआ. निर्देशक केतन आनंद जी से मुलाकात अचानक ही हुई जबकि मंचस्थ सुष्मिता मुखर्जी जी से मिलने हम और अनुज पहुँचे. उन्हीं के साथ खड़े केतन आनंद से बुन्देलखण्ड में हो रहे इस आयोजन के बारे में पूछ बैठे. उन्होंने अत्यंत सहज रूप में कई बातों का जिक्र किया. ख़ुशी जताई उन्होंने राजा बुन्देला जी के इस प्रयास पर. ये भी कहा कि यहाँ के कलाकारों में बहुत संभावनाएं हैं, ऐसे समारोह उनको तराशने, मंच देने का काम करेंगे.  

केतन आनंद 

इसके अलावा रमीज पठान जी से मिलना ख़ुशी का अवसर लेकर आया. कार्यक्रम की व्यस्तताओं के चलते समारोह स्थल पर उनसे मिलना ना हो सका था. कार्यक्रम के चौथे दिन की समाप्ति से कुछ पहले हमारा और अनुज (सपरिवार) का वहां से निकलना हुआ. रमीज जी हमारे साथ-साथ वहाँ से निकले निकले. इससे पहले श्रेया (अनुज की बेटी) द्वारा उनसे मुलाकात करके उनका ऑटोग्राफ लेने के साथ-साथ उनके साथ फोटो खिंचवाना भी हो चुका था. इस प्रक्रिया में कैमरे के कारण एक क्षणिक चेहरे वाली मुलाकात उनसे हो ही चुकी थी. रुद्राणी कलाग्राम से निकलने के बाद इत्तिफ़ाक़ रहा कि उनके होटल के ठीक पहले जहाँ हम लोग भोजन के लिए रुके वहां वे भी अपने साथियों सहित मिल गए. देखते ही अभिवादन हुआ और उन्होंने आगे बढ़कर अपने गले लगा लिया. लगभग एक घंटे तक उनके साथ अनौपचारिक बातचीत होती रही. अपनी लाइफ़ के बहुत से अनुभव शेयर किए. कुछ विशुद्ध गोपनीय बातें भी शेयर की. जिस गर्मजोशी और ज़िंदादिली से वे मिले उससे लगा नहीं कि वे सत्तर से अधिक बसंत देख चुके हैं. अनुज के गीत सुनने का उन्होंने वादा किया और सम्पर्क-सूत्र के आदान-प्रदान सहित मुंबई आने का न्यौता भी.

रमीज पठान 

रमीज़ जी से संभवतः इस कारण भी दिल के तार मिले होंगे क्योंकि उनकी तरह इधर भी लेखन का शौक पर्याप्त है. उनके अलावा बाकी कलाकारों से मिलना ही हुआ. एक बात विशेष है स्वभाव में कि कभी भी इक्का-दुक्का कलाकारों को छोड़कर कभी भी फ़िल्मी कलाकारों के प्रति पागलपन जैसा आकर्षण नहीं हुआ. न इस उम्र में न ही कॉलेज वाली अवस्था में. इस कारण भी उनके ऑटोग्राफ लेने, उनके साथ फोटो खिंचवाने की इच्छा भी वहां नहीं हुई. हाँ, एक नफीसा अली जी से मिलने की इच्छा थी, वो वहाँ पूरी हुई. उनसे मिलने का मन भी उनके अदाकारा होने के कारण नहीं वरन उनके सामाजिक कार्यों से जुड़े रहने के कारण हुआ था. इस मिलने-मिलाने के क्रम में भविष्य के कलाकारों से भी मिलना हुआ. कई परिचित लोगों से, कई मित्रों से मिलना हुआ. मिलने-जुलने के क्रम में सर्वाधिक ख़ुशी मिली कुछ उत्साही, युवा कलाकार साथियों से मिलकर.

मधुर 

मधुर, जो बाँसुरी बजाने में जितने योग्य हैं, उतने ही पेंटिंग बनाने में. ओरछा में मिलने से पहले उनसे कोई परिचय नहीं था, कभी मुलाकात भी नहीं थी. यहीं उनसे पहली बार मिलना हुआ. रुद्राणी कलाग्राम में टहलते हुए वो सामने से आता दिखा. मिलते ही उसने नमस्कार किया और पैर छू लिए. ऐसी स्थिति से हम अकबका से जाते हैं. लगता है कि सामने वाला हमें पहचान रहा है मगर हम ही पहचान नहीं पा रहे. यह स्थिति शर्म पैदा करती है. बिना शब्दों के सिर्फ आँखों के सहारे उसके हालचाल जानने चाहे तो उसने बताया कि नाटक 'तीसरा कम्बल' में वह बाँसुरी बजाने के साथ-साथ संगीत संयोजन कर रहा है. कुछ देर बाद टहलते हुए ही उससे फिर मुलाकात हुई तो वह बहुत ही भावुक था. अपनी कई पेंटिंग दिखाई मोबाइल पर और फिर हमारे साथ फोटो खिंचवाने के निवेदन के साथ बोला सर, हमारे सिर पर आप हाथ रख दीजिये. आपका आशीर्वाद मुझे बहुत सफलता देगा. कुछ ऐसी ही स्थिति बनी नाटक देखते समय. हमारे एक छात्र अनूप सेंगर ने जालौन के युवा कलाकारों से परिचय करवाया. उनकी फिल्म वहाँ दिखाई गई थी. मिलने के क्रम में उन युवा साथियों ने भी वही शब्द बोले- सर, आप हमारे सर पर हाथ रखकर मार्गदर्शन कीजिये हम लोगों का. जालौन टीम के दो सदस्य हमारे साथ उरई तक आये, बस उनके साथ फोटो नहीं हो सकी. पर अपने आपमें ऐसा महसूस हुआ जैसे हम भी कोई बहुत बड़े कलाकार हैं.


सम्बन्ध बनते रहे चलने-चलने तक. राजा बुन्देला, महेन्द्र भीष्म, नईम, गीतिका, संजय तिवारी, आरिफ, राघवेन्द्र चिंगारी, धर्मेन्द्र, अमजद आदि सहित कई कलाकार तो पहले से परिचित थे ही, कुछ नए सम्बन्ध भी बन गए. जालौन की टीम, वहीं के मुस्तकीम और रोहित, विवेक, रवीन्द्र, उमाशंकर, हरपाल, सरिता आदि से मुलाकात सार्थक रही. फिल्म समारोह 2018 के समापन दिवस पर इन संबंधों के साथ-साथ सम्मान भी मिला. नईम, जो हमारा छोटे भाई जैसा ही है, उसके बार-बार जोर देने के बाद भी अपनी तमाम शूट की गई क्लिप्स में से किसी की भी एडिटिंग करके समारोह में नहीं भेज सके. अंत-अंत तक हमने प्रयास किया और नईम ने बराबर जिद सी की मगर कोई फिल्म धरातल पर न उतर सकी. ओरछा के भारतीय फिल्म समारोह 2018 को हमारे लिए यादगार बनना ही था सो पुराने निर्देशन कार्यों को याद करते हुए अन्य भावी, वर्तमान कलाकारों के साथ हमारा भी सम्मान किया गया. सुखद अनुभूति के बीच प्रसिद्द अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी जी के हाथों सम्मान-पत्र प्राप्त हुआ. इसके लिए उनको और समूची आयोजक टीम का आभार.

सम्मान ग्रहण करते हुए 

भारतीय फिल्म समारोह ओरछा 2018 बुन्देलखण्ड के कलाकारों की आँखों में नए सपने भर गया है. तभी समापन समारोह अवसर पर एक नवयुवक ने राजा बुन्देला से राय प्रवीण पर फीचर फिल्म बनाये जाने का अनुरोध किया. ऐसे न जाने कितने स्वप्न यहाँ के कलाकारों, निर्देशकों, कहानीकारों, गीतकारों की आँखों में पलने लगे होंगे. सभी के सपने सच हों, ऐसी कामना ही की जा सकती है और अपेक्षा की जा सकती है कि वर्ष 2018 में ओरछा में आरम्भ यह प्रयास निरन्तर ऊँचाइयाँ पाता रहेगा, नई-नई प्रतिभाओं को तराशता रहेगा.

21 मई 2018

ओरछा बुन्देलखण्ड में भारतीय फिल्म समारोह


बुन्देलखण्ड सदैव से अनेकानेक रत्नों से सुशोभित रहा है. शौर्य, सम्मान, कला, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि में यहाँ विलक्षणता देखने को मिलती आई है. यहाँ के निवासी अपने-अपने स्तर पर बुन्देलखण्ड की संस्कृति को उत्कर्ष पर ले जाने का कार्य करते रहते हैं. इसी कड़ी में बुन्देलखण्ड निवासी फिल्म अभिनेता राजा बुन्देला द्वारा ओरछा में इस वर्ष, 2018 में भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया. पाँच दिवसीय यह आयोजन 18 मई से लेकर 22 मई तक होना है. राजा बुन्देला फिल्मों की दृष्टि से जाना-पहचाना नाम है और उनकी एक विशेषता यह भी है कि मुम्बई में रहने के बाद भी वे बराबर, नियमित रूप से बुन्देलखण्ड से सम्पर्क बनाये हुए हैं. बुन्देलखण्ड राज्य की माँग में भी उनकी आवाज़ सुनाई देती है. फ़िलहाल, उनके बारे में फिर कभी, अभी उनके इस भागीरथ प्रयास के बारे में कुछ चर्चा कर ली जाये.

रुद्राणी कलाग्राम, ओरछा का विहंगम दृश्य 


बुन्देलखण्ड की उस पावन धरा में, जहाँ श्रीराम राजा रूप में विराजमान हैं, भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन अपने आपमें सुखद एहसास जगाता है. ओरछा में राजा बुन्देला द्वारा स्थापित, संस्कारित ‘रुद्राणी कलाग्राम’ में पाँच दिवसीय फिल्म समारोह का आयोजन निश्चित ही बुन्देलखण्ड की उन प्रतिभाओं को एक मंच देगा, जो स्व-प्रोत्साहन, स्व-संसाधनों से फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं. ऐसे ही सक्रिय लोगों में शामिल झाँसी के संजय तिवारी ने बुन्देलखण्ड फिल्म एसोसिएशन के बैनर तले वर्ष 2016 में बुन्देलखण्ड फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. उस आयोजन में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में निर्मित लघु-फिल्मों को देखकर फिल्म समीक्षकों को आभास हुआ कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र में फिल्म निर्माण में अपार संभावनाएं हैं. ऐसे में राजा बुन्देला और उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी (जो फ़िल्मी दुनिया का जाना-पहचाना नाम है) का प्रयास बॉलीवुड तक बुन्देलखण्ड की फिल्म प्रतिभा की गूँज को ले जायेगा.


ओरछा में बेतवा नदी के किनारे लम्बे-चौड़े प्राकृतिक क्षेत्र में फैले रुद्राणी कलाग्राम में भारतीय फिल्म समारोह के लिए दो टपरा टॉकीज बनाई गईं हैं. टपरा टॉकीज एक तरह की अस्थायी व्यवस्था होती है जो बाहर से महज एक विशालकाय तम्बू जैसी प्रतीत होती है मगह अन्दर से पूरी तरह से किसी हॉल का एहसास कराती है. एक टपरा टॉकीज में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बनी फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है और दूसरी में हिन्दी फीचर फ़िल्में दिखाई जा रही हैं. इसके साथ-साथ सांध्यकालीन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में, हरे-भरे घने वृक्षों के आँचल में मुक्ताकाशी मंच का निर्माण किया गया है. रुद्राणी कलाग्राम में दिन का आरम्भ योग के साथ होता है और फिर अलग-अलग निर्धारित स्थानों पर, निर्धारित समय पर अलग-अलग कार्यक्रम संचालित होने लगते हैं. टपरा टॉकीज में फिल्मों का प्रदर्शन होता है. कार्यशाला स्थल पर बाहर से आये विषय-विशेषज्ञ फिल्मों से सम्बंधित तकनीकी जानकारी प्रशिक्षुओं को प्रदान करते हैं. कलाग्राम के दूसरी ओर बने स्थल पर फिल्म से सम्बंधित विषय पर आख्यान की भी व्यवस्था है. जहाँ फ़िल्मी दुनिया के रोहिणी हट्टंगड़ी, रजत कपूर, केतन आनंद, नफीसा अली जैसे नामचीन कलाकार सबसे रू-ब-रू होते हैं.

नाटक तीसरा कम्बल 

दिन भर की गतिविधियों का सञ्चालन नियंत्रित रूप में हो रहा है. सबकुछ यथावत चलता देखकर अच्छा लगा. एक अकेले व्यक्ति राजा बुन्देला के प्रयास और उनके छोटी सी टीम के समर्पण से यह समारोह सुखद अनुभूति दे रहा है. यद्यपि इस पहले प्रयास में कुछ कमियां भी देखने को मिलीं तथापि वे इस कारण नकारने योग्य हैं क्योंकि एक तो यह पहला प्रयास है, दूसरे बिना किसी तरह की आर्थिक मदद के इतना बड़ा आयोजन करवाना अपने आपमें जीवट का काम है. राजा बुन्देला और उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी इन कमियों को देख-महसूस कर रहे हैं और अगले आयोजन में इनको सुधारने की इच्छाशक्ति भी व्यक्त करते हैं. यही संकल्पशक्ति ही ऐसे समारोहों का भविष्य तय करती है. राष्ट्रीय स्तर के ओरछा में आयोजित इस पहले फिल्म समारोह में निश्चित ही कमियाँ दिखेंगी किन्तु जिस स्तर का समारोह हो रहा है, जिस तरह का उद्देश्य लेकर समारोह संचालित है, जिस तरह का मंच कलाकारों को प्रदान किया जा रहा है उससे आने वाले समय में निश्चित ही बुन्देलखण्ड को, यहाँ के कलाकारों को फिल्म क्षेत्र में उत्कृष्ट पहचान मिलेगी.