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19 नवंबर 2025

Men's Day पर महिलाओं की बधाई, शुभकामना??



Women's Day पर कूद-कूद कर बधाई शुभकामना देने वाले पुरुषो, सोशल मीडिया को रंग देने वाले पुरुषो, महिलाओं की प्रोफाइल में घुस-घुस कर बधाई देने वाले पुरुषो.....

आज Men's Day पर कितनी महिलाओं ने तुमको बधाई, शुभकामना दी हैं?

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ध्यान रखो... तुम कुछ भी करो, कुछ भी करते फिरो मगर बहुतायत महिलाओं की निगाह में तुम आज भी लम्पट, कामुक, शोषक, बलात्कारी, निर्लज्ज, हिंसक, अराजक आदि-आदि ही हो.....


12 अप्रैल 2025

तीस लाख वर्ष की मातृशक्ति 'लूसी'

इथियोपिया में 1975 में एक कंकाल मिला था. जाँच के बाद बताया गया कि यह कंकाल लगभग तीस लाख साल पहले पृथ्वी पर रहने वाली एक औरत का है. इसे इस दुनिया का सबसे पुराने मानव कंकाल के रूप में चिन्हित किया गया. जाँच से जानकारी मिली कि यह कंकाल ऑस्ट्रेलोपिथेकस एफरेंसिस प्रजाति का है, जो लगभग बत्तीस लाख वर्ष पुराना माना जा रहा है. इस कंकाल के मिलने के बाद से ही इस पर अनेक तरह के शोध किये गए, अनेक तरह से इसकी वास्तविकता को सामने लाने का प्रयास किया गया. कंकाल का वास्तविक स्वरूप सामने लाने के लिए लगातार शोध भी चल रहे थे.

 



इसी सन्दर्भ में एक खबर सामने आई कि वैज्ञानिकों की एक टीम ने फॉरेंसिक फेसियल रिकंस्ट्रक्शन तकनीक से कंकाल की खोपड़ी के थ्री-डी स्कैन और चिम्पांजी के सॉफ्ट टिशू डाटा की सहायता ली. वैज्ञानिकों की टीम ने इस तकनीकी की मदद से कंकाल की खोपड़ी का लगभग वास्तविक चेहरा बना लेने में सफलता प्राप्त कर ली. इस चेहरे का अनुमानिक आकार पाने के बाद वैज्ञानिकों ने इस कंकाल या कहें कि कंकाल से बने चेहरे का नाम लूसी रखा. इस कंकाल की अनुमानित लम्बाई साढ़े तीन फीट है.

 

मानवीय सभ्यता के सबसे पुराने पूर्वजों में से एक लूसी का चेहरा, भले ही यह काल्पनिक अथवा तकनीक से उत्पन्न हुआ हो, इसे देखना रोमांचकारी है. इस चेहरे के द्वारा अपने अतीत से जुड़ना निश्चित ही अद्भुत है, रोमांचक है. तकनीकी सहायता से कंकाल से निर्मित चेहरे लूसी को नमन, लूसी के रूप में लाखों-लाखों वर्ष पहले की मातृशक्ति को नमन.

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इंटरनेट, सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार 

08 मार्च 2024

आठ मार्च महिला दिवस पर विचार करिए

आज है अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस और चारों तरफ कार्यक्रमों की औपचारिकता का निर्वहन दिखाई दे रहा है. जगह-जगह संगोष्ठियों, सभाओं, भाषणों, रैलियों आदि की औपचारिकता निभाई जाने लगी है. सरकारी संगठनों के साथ-साथ उन स्वयंसेवी संगठनों की मजबूरी भी है जो महिला-सशक्तीकरण के लिए कार्य कर रहे हैं कि वे इस दिन पर कार्यक्रम करें, सिर्फ करें ही नहीं अवश्य ही करें. यदि भाषणों, रैलियों, कार्यक्रमों से ही विकास होना सम्भव होता तो हमारा मानना है कि सबसे अधिक विकास हम भारतवासियों ने ही किया होता. आये दिन की भाषणबाजियों और सभाओं के बाद भी विकास वहीं का वहीं है, नारियों की स्थिति वहीं की वहीं है, कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति वहीं की वहीं है, स्त्री-पुरुष लिंगानुपात वहीं का वहीं है. केवल भाषणों से नारी की स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता है, यह चाहे पुरुषों द्वारा किया जा रहा हो या फिर खुद महिलाओं द्वारा.




कुछ बिन्दु ऐसे है जिन पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार अवश्य होना चाहिए.


वंश-वृद्धि की लालसा में पुत्र प्राप्ति की चाह रखने वाले बतायें कि क्या जवाहरलाल नेहरू का वंश किसी लड़के के कारण चल रहा है?

स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगत सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, चन्द्रशेखर आजाद आदि अनेक महापुरुषों का नाम किस लड़के के कारण चल रहा है?

बेटे की चाह में लड़की को मारने वाले अपने लड़के के विवाह के लिए लड़का कहाँ से लायेंगे?

इसी प्रकार से स्त्री-पुरुष लिंगानुपात कम होता रहा तो आने वाले समय में होने वाली स्त्री हिंसा की भयावहता को कौन रोकेगा?

बराबर का दर्जा सिद्ध करती स्त्री आने वाले समय में कम संख्या के कारण अपनी खरीद-बिक्री को कैसे रोक सकेगी? (आज भी कई घटनायें इस तरह की प्रकाश में आईं हैं जहाँ कि परिवारों में पुरुष स्त्रियों को खरीद कर ला रहे है)

लड़कियों की लगातार गिरती संख्या से क्या समाज में अनाचार की और विकट स्थिति पैदा होने वाली नहीं है?


सवाल बहुत हैं पर जवाब.......???


जवाब हमें ही देना होगा, मात्र किसी दिवस की औपचारिकता को पूरा करने के लिए ही आवाज उठाना और फिर शान्त हो जाना नैतिक नहीं है. समाज के सभी वर्गों को प्रयास करने होंगे, एकसाथ करने होंगे. पुरुष-स्त्री को आपसी विभेद को दूर करना होगा. क्या आधुनिकता का, ज्ञान का, अहम का रंग अपने ऊपर चढ़ा चुके स्त्री और पुरुष (दोनों को विचारना होगा) इस बात को समझेंगे?





 

06 मार्च 2023

कट्टरवाद से लड़ती ईरान की बेटियाँ

सम्पूर्ण विश्व में एक तरफ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन होने जा रहा है, दूसरी तरफ ईरान में महिलाओं के साथ दरिंदगी दिखाई जा रही है. महिलाओं द्वारा हिजाब के खिलाफ चल रहे आंदोलन के बीच सैकड़ों लड़कियों को स्कूल जाने से रोकने की कोशिश की जा रही है. इनको जहर देकर मारने का हथकंडा अपनाया जा रहा है.

 

ईरान में हिजाब का विरोध उस समय शुरू हुआ जबकि सितम्बर 2022 में एक लड़की महसा अमीनी की मौत पुलिस हिरासत में हो गई. उसे ठीक तरह से हिजाब नहीं पहनने के कारण गिरफ्तार किया गया था. पुलिस हिरासत में उसकी रहस्यमय तरीके से मौत के बाद पूरे ईरान में महिलाओं का गुस्सा फूट पड़ा. सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हुए और देखते ही देखते ही यह बड़े आंदोलन में बदल गया. इस आन्दोलन में महिलाओं की व्यापक भागीदारी हुई. सभी उम्र और पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाएँ न्याय, सुधार और अपने अधिकारों की माँग के लिए सड़कों पर उतरीं. ईरानी महिलाओं पर शासन के सख़्त नियंत्रण की खुली अवहेलना के रूप में कई महिलाओं ने अपने स्कार्फ जला दिए, अनेक ने अपने बाल काट लिए. प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार घातक बल का उपयोग करने से हिचक नहीं रही है. ईरान की मानवाधिकार संस्थाओं के अनुसार इस आंदोलन में अब तक मरने वालों की संख्या लगभग 200 तक पहुँच चुकी है.

 



महिलाओं के सन्दर्भ में ईरान की स्थिति सुखद नहीं कही जा सकती है. यहाँ के एक कानून के अनुसार ईरान में कानून है कि एक पिता अपनी ही गोद ली हुई बेटी से निकाह कर सकता है. महिलाओं को देश से बाहर जाने के लिए अपने पति से अनुमति लेनी पड़ती है. महिलाओं को ढीले-ढाले कपड़े पहनने को कहा जाता है. अगर कोई महिला इसका उल्लंघन करती है तो ईरान पुलिस को उस महिला को पीटने और उसे छह महीने तक जेल में रखने का अधिकार है. महिलाओं पर नजर रखने के लिए सन 2005 में गश्त-ए-इरशाद का गठन किया गया. यह एक तरह की पुलिस टुकड़ी है जो शहरों में महिलाओं पर नजर रखती है कि वे कानून के अनुसार कपड़े पहन रही हैं या नहीं. वे लगाये गए प्रतिबंधों का पालन कर रही हैं या नहीं. अगर कोई इनका पालन नहीं करता तो यह पुलिस उन्हें सजा देती है.

 

ईरानी महिलाओं ऐसी स्थिति सदैव से नहीं रही है. सन 1979 से पहले ईरान में मोहम्मद रेजा पहलवी का शासन था जो एक पढ़े-लिखे, धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक विचारों वाले व्यक्ति थे. उनकी आधुनिक नीतियों ने महिलाओं को स्वतंत्रता दे रखी थी. उनके पास हिजाब पहनने का विकल्प था. सन 1963 में वोट देने का अधिकार प्राप्त हुआ. परिवार संरक्षण अधिनियम ने महिलाओं के लिए विवाह की आयु बढ़ा दी, बहुविवाह को कम कर दिया, अस्थायी विवाहों पर प्रतिबंध लगा दिया और इसमें धर्मगुरुओं की भूमिका को कम कर दिया. तब यहाँ का समाज बहुत खुले विचारों वाला था. लोग धार्मिक पाबंदियों से दूर थे. वहाँ की महिलाएँ पुरुषों की तरह ही स्वतंत्र थीं. वे अपनी मर्जी से हर तरह के कपड़े पहन सकती थीं.  

 

सन 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति ने राजशाही का अंत कर दिया गया. देश में अयातुल्ला खुमैनी ने सर्वोच्च नेता के रूप में एक इस्लामिक शासन स्थापित किया. महिलाओं की चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार द्वारा तत्काल कोई कदम नहीं उठाया गया. इसके उलट उनकी आज़ादी पर नियंत्रण करने के लिए सख़्त कानून बना दिए गए. इससे महिलाएँ सार्वजनिक जीवन से बाहर हो गईं. सन 1979 तक महिला अधिकारों को लेकर जो प्रगति हुई थी वो एक झटके में रुक गयी. परिवार संरक्षण कानून को निरस्त कर हिजाब पहनने को अनिवार्य कर दिया गया. महिलाओं की आज़ादी पर भले ही व्यवस्थित तरीक़े से कुठाराघात किया गया था लेकिन उन्होंने इन प्रतिबंधों को चुपचाप स्वीकार नहीं किया. उन्हें हिंसा के द्वारा इन कानूनों को मानने पर बाध्य किया गया. हिंसात्मक दौर के बीच भी नब्बे के दशक में महिला कार्यकर्ताओं ने पारिवारिक कानूनों के द्वारा अपने कुछ खोए हुए अधिकारों को प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया. इससे उन्हें तलाक शुरू करने और बच्चों की संरक्षा सम्बन्धी अधिकारों को पुनः प्राप्त करने में सफलता मिली.

 

एक तरफ शासन द्वारा महिलाओं का हिंसात्मक दमन होता रहा दूसरी तरफ अपने अधिकारों, स्वतंत्रता के लिए महिलाओं का विरोध चलता रहा. हिजाब के विरोध में भी महिलाएँ सालों से प्रदर्शन करती आ रही थीं. उनके 'नो टू हिजाब', 'माई स्टेल्थी फ्रीडम', ‘माई कैमरा इज़ माई वेपन’ और 'व्हाइट वेडनेस्डे' जैसे अभियान लगातार चलते रहे. महसा अमीनी की मौत ने इन अभियानों के लिए उत्प्रेरक का काम किया. जिसके चलते आज हिजाब और उस पर नज़र रखने वाली पुलिस के विरोध में महिलाएँ आन्दोलनरत हैं. अब वे सडकों पर 'डेथ टू द डिक्टेटर' और 'वूमेन लाइफ फ्रीडम' के नारे लगाकर अपनी आज़ादी की माँग कर रही हैं. देखा जाये तो ईरान में हिजाब विवाद से उत्पन्न स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है बल्कि यह वहाँ के लोगों के गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति है. वर्तमान तकनीकी दौर ने महिलाओं को जुड़ने और संगठित होने का अवसर प्रदान किया. आज ईरान में महिलाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन व्यापक नजर आ रहा है. ईरान को महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग से निष्कासित कर दिया गया है.

 

ईरान के अन्दर महिलाओं द्वारा जबरदस्त हिजाब विरोधी आन्दोलन, सोशल मीडिया पर मिलते व्यापक समर्थन, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को नियंत्रित करने सम्बन्धी कानूनों पर ईरान का विरोध होने के बाद ईरान सरकार ने भले ही हिजाब सम्बन्धी कानून की समीक्षा करने को तैयार हो गई हो किन्तु इसके बाद भी महिलाओं के विरुद्ध दमनकारी नीति में कोई कमी नहीं दिखाई पड़ी है. इसी क्रम में अब लड़कियों को ज़हर देकर मारने, स्कूल, कॉलेजों पर सुनियोजित हमलों की खबरें सामने आ रही हैं. इसके पीछे उद्देश्य यही है कि लड़कियाँ शिक्षा से वंचित होकर घरों में कैद हो जाएँ.  

 

ईरान खाड़ी का सबसे ताकतवर मुस्लिम देश है जो शीघ्र ही परमाणु शक्ति संपन्न भी हो जाएगा. महिलाओं के लिए जिस तरह संकुचित सोच का वाहक बना है वह उसे तालिबानी आतंकियों की श्रेणी में लाकर खड़ा करता है. महिलाओं के अधिकारों के समर्थन में पिछले कुछ समय में बड़े आंदोलन देखने को मिले, जिसमें हिजाब को इस्लामी कट्टरवादी सोच का प्रतीक मानकर विरोध शुरू हुआ. सरकार और महिलाओं के वर्तमान संघर्ष के चलते महिलाओं को नियंत्रित करने वाले क़ानूनों को और सख़्त बना दिया जाएगा या फिर ईरान सुधार के नए युग में प्रवेश करेगा. अब देखना यह है कि महिलाओं के क्रांतिकारी आन्दोलन में क्या ईरान के सत्तासीन किसी बदलाव के लिए तैयार हैं? क्या यह आन्दोलन ईरान की तालिबानी सोच वाले शासन को उखाड़ सकेगा?





 

16 दिसंबर 2020

सहायता करने की सच्ची मानसिकता का प्रेरणादायी उदाहरण

सुबह लगभग दस बजे का समय है. बाजार में हलचल अभी शुरू होती जा रही है. दुकानें भी आराम-आराम से खुलती दिख रही हैं. ऐसी ही सामान्य सी सुस्त सुबह में सड़क के किनारे एक महिला बेहोशी की हालत में सड़क किनारे गिरी हुई है. वह अकेली नहीं है बल्कि उसके आसपास कई लोगों की भीड़ भी है. भीड़ भले ही ऐसी न हो जिसे बहुत बड़ी भीड़ कहा जाये मगर इतनी अवश्य है जो सड़क किनारे अचेतावस्था में गिरे किसी भी व्यक्ति की मदद कर सकती है. उस सुबह की भीड़ भी इतनी थी जो उस महिला की सहायता कर सकती थी. इसके बाद भी भीड़ बस तमाशा बने उस महिला को देखे जा रही थी. रुकने वाले रुक जाते थे और रुक कर एक नजारा देख चलने वाले फिर अपने रास्ते चल देते थे. उस रुकी भीड़ में कुछ युवा भी थे, कुछ पुरुष भी, कुछ लड़के भी मगर जिस तरह से स्त्री, पुरुष विभेद विगत कुछ वर्षों में समाज में बना दिया गया है, उससे शायद उनकी भी हिम्मत न पड़ रही थी उस महिला की सहायता करने की. इसके अलावा पुलिस, कानून के तमाम चकल्लस देखते हुए भी बहुत से लोग उस सड़क किनारे बेहोश पड़ी महिला से दूरी बनाये रखे होंगे.


उसी समय एक महिला का सड़क के दूसरी तरफ से निकलना हुआ. दूसरी तरफ से इसलिए क्योंकि उस सड़क पर आवागमन के लिए बने डिवाईडर न केवल सड़क को अलग-अलग भागों में बाँट रहे थे बल्कि सड़क पर चलने वालों को भी दो हिस्सों में अलग-अलग किये हुए थे. समाज में सभी एक प्रवृत्ति के नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे कि हमारे शरीर से जुड़ी सभी उँगलियाँ एक जैसी नहीं होतीं. इस एक जैसी प्रवृत्ति न होने के कारण अपनी स्कूटी से सड़क के दूसरी तरफ से चली जाने वाली उस महिला ने सड़क के दूसरी तरफ, डिवाइडर के उस पार कुछ असामान्य सा देखा-समझा. उस महिला ने स्कूटी को वापस सड़क किनारे गिरी अचेत महिला के पास लाकर रोका और फिर जैसा कि किसी भी जागरूक, संवेदित व्यक्ति को करना था, उसने अपना काम शुरू किया.


स्कूटी से उतर कर उस महिला ने अपने बैग से पानी की बोतल निकाल कर अचेत महिला को होश में लाने का उपक्रम शुरू किया. सजग महिला की हिम्मत, उसकी सक्रियता देख आसपास खड़े कुछ युवकों ने भी अपना सहयोग देना शुरू किया. इतनी देर के बाद जब भीड़ का हिस्सा न बन, एक सक्रिय महिला ने अपनी सजगता दिखाई तो उस अचेत महिला की बंद हथेलियों में से एक में कोई फोटो सी दिखाई दी और दूसरी में एक मोबाइल नंबर लिखा नजर आया. या भी सबकुछ भीड़ को नहीं बल्कि उस स्कूटी वाली महिला को नजर आया. उन्होंने अपने मोबाइल से तत्काल उस नंबर पर बात की. वो नंबर उस अचेत महिला के किसी रिश्तेदार का नहीं था. अब भी स्थिति ज्यों की त्यों थी कि वो महिला कौन है? वह सड़क पर अचेत क्यों पड़ी हुई है? उसके हाथ में लिखा नंबर किसका है? उसकी दूसरी हथेली में दबी फोटो किसकी है? वह यहाँ अचेतावस्था में कैसे पहुँची?


इस बीच उस जागरूक महिला के कहने पर किसी व्यक्ति ने एम्बुलेंस को फोन करके बुलाया. तब तक महिला भी कुछ होश में आती नजर आई. एम्बुलेंस आकर उस महिला को जिला चिकित्सालय ले गई. सक्रिय, जागरूक महिला अपने कार्यक्षेत्र को चल दी, भीड़ अपने-अपने विचार-तर्क गढ़ते हुए अपने-अपने रास्ते चल दी. बात यही समाप्त नहीं हुई, जो सजग रहता है, वह सदैव सजग रहता है. अचेत महिला की सहायता को रुकी उस महिला ने लगातार अपने फोन से चिकित्सालय प्रशसान से, पुलिस प्रशासन से संपर्क बनाये रखा. अंततः जब सुखद खबर ये मिली कि वह अचेत महिला, जो किसी संदेहास्पद वस्तु के खा लेने से अचेत हो गई थी, अब स्वस्थ है, खतरे से बाहर है.


यह पूरी घटना जनपद जालौन के उरई शहर की है. इस घटना को यहाँ सामने लाने का उद्देश्य महज इतना है कि उरई जैसे छोटे से शहर में भी जहाँ कि परिचय का दायरा आसानी से बड़ा किया जा सकता है, वहाँ भी सड़क किनारे अचेत पड़ी एक महिला सहायता को तरसती है. उसके चारों तरफ जमा भीड़ सिर्फ तमाशबीन बनी रहती है. इसके पीछे भले ही कानूनी लफड़े की बात हो या स्त्री, पुरुष विभेद की बात मगर स्थिति सुखद नहीं कही जाएगी.


अब आपको मिलवा दें उस महिला से जो अचानक से उस रास्ते से गुजरीं और बिना किसी लफड़े, समस्या की परवाह करते हुए उस अचेत महिला की सहायता में जुट गईं. वे डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी हैं जो वर्तमान में गांधी महाविद्यालय, उरई में मनोविज्ञान विभाग में कार्यरत हैं साथ ही संगीत, समाजसेवा के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं. वे जनपद के ही नहीं बल्कि प्रदेश के अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार से सम्बद्ध हैं. सामाजिक सक्रियता बनाये रखना, लोगों की मदद करना उनके खून में है, उनके स्वभाव में है. इसी के चलते उन्होंने बिना किसी तरह की देरी किये, बिना अच्छा-बुरा सोचे उस अचेत महिला की सहायता की.




इस घटना को सामने लाने का उद्देश्य यही है कि हममें से बहुत से लोग कानूनी दांव-पेंच, पुलिस प्रशासन के रवैये से डर कर, घबरा कर बहुत बार सहायता देने से बचते हैं. ऐसा होना नहीं चाहिए. यदि हम अपने आपमें सशक्त हैं, ईमानदार हैं और निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता कर रहे हैं तो किसी तरह की समस्या नहीं आती है. हम सभी को डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी जी के इस कदम से सीखने की आवश्यकता है, प्रेरणा लेने की आवश्यकता है. इसी तरह से एक-एक करके समाज की नींव बनती है, समाज की आधारशिला मजबूत होती है, समाज की इमारत भव्य बनती है.



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वंदेमातरम्

25 अक्टूबर 2020

रावण को आदर्श मानने वालों/वालियों के लिए

इधर देखने में आ रहा है कि विजयादशमी आते-आते बहुत से लोगों (विशेष रूप से महिलाओं) को रावण बहुत पसंद आने लगता है. बहुतेरी तो रावण जैसा भाई पाने की कामना जैसी बातें भी सार्वजनिक रूप से करने लगती हैं. इसी से सम्बंधित पोस्ट सोशल मीडिया पर लगाई, जिस पर बहुत सारी टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं. दो टिप्पणी खुद में विशेष समझ आईं, वही आज की पोस्ट के रूप में.

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रावण को पति के रुप मे पाने की चाह रखने वाली फेमिनिस्ट सुंदरी से मेरे चंद सवाल......

हमारे पुराणों के अनूसार....

रावण की तीन पत्नियां थी

पहली का नाम मंदोदरी

दुसरी का नाम दम्यमालिनी

तीसरी का नाम अज्ञात है पर इसके रावण से तीन पुत्र थे

देवांतक , नरांतक और प्रहष्था जिसका रामानंद सागर जी

के बनाई रामायण धारावाहिक में भी उल्लेख है

और रावण ने अपनी तीसरी पत्नि की हत्या कर दी थी....

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और भी रावण के कहानियां हैं....

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एक रावण ने मंदोदरी की बड़ी बहन से बलात्कार करने की

कोशिश की थी जिसमे वो असफल रहा था...

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एक रावण ने अपने सौतेले छोटे भाई कुबेर की पत्नी रंभा से

बलात्कार किया था जिसके फलस्वरूप उसे कुबेर ने श्राप

दिया था कि वो किसी भी महिला के मर्जी के विरूद्ध अगर

उससे संसर्ग करने की कोशिश करेगा तो उसके मस्तक के

सैकड़ो टुकड़े हो जायेंगे , तभी वो सीता मैया से जबरदस्ती

विवाह नही कर पाया...

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एक रावण ने वेदवती नामक महिला से उस समय बलात्कार

करने की कोशिश की जब वो श्री हरी विष्णु को पति के रुप

में पाने के लिए तपस्या कर रही थी उसके उस कुकृत्य की

वजह से वेदवती ने तपस्या में ही प्राण त्याग दिये ....

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एक रावण वो था जिसकी तीन पत्नियों के अलावा हजारों

दासियां थी जिस से वो समय समय पर संसर्ग करता रहता

था....

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तो है रावण को पति रूप में पाने की चाह रखने वाली लंकनी

रुपी मंदोदरी....

तुम इन में से किस बलात्कारी रावण रूप से विवाह करना चाहोगी ???




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रावण को भाई के रूप में वही पसन्द कर सकती है जिसका चरित्र सूर्पनखा जैसा हो। जो वन-वन घूम कर दूसरी स्त्रियों का पति चुराती हो। या जो किसी सुन्दर स्त्री को देखे तो अपने भाई को उसका हरण करने के लिए प्रेरित करे। ऐसी स्त्रियाँ कभी आदर्श नहीं हो सकतीं।


रावण को भाई के रूप में वही पुरुष पसन्द करता है जिसका चरित्र कुंभकर्ण जैसा हो। जो सज्जन होने के बावजूद भाई के कुकर्मों के समय आंख बंद कर ले। ऐसे लोग कभी अनुकरणीय नहीं हो सकते।


रावण को पति के रूप में वही स्त्री पसन्द कर सकती है, जो अपने पति को हजार टुकड़ों में बंटते देख सकती हो। जो देख सकती हो कि उसका पति यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर, राक्षस, यवन सभी जाति की स्त्रियों का हरण करे और बलपूर्वक अपनी पत्नी बना कर रखे। जो सहन कर सकती हो कि उसका पति उसकी किसी भी बात को न माने... वह गिड़गिड़ाती रहे, पर उसका पति उसकी बात अनसुनी कर के पाप करता रहे।


रावण को मित्र के रूप में वही पसन्द कर सकते हैं जिनका चरित्र बाली के जैसा हो। जो अपने छोटे भाई की स्त्री को बलपूर्वक छीनने में लज्जा का अनुभव नहीं करता हो। जो तारा जैसी विदुषी पत्नी की भी कोई बात नहीं मानता हो। ऐसे लोग भी सम्मान के योग्य नहीं होते।


रावण को अपना नायक वही मान सकते हैं जिन्हें न धर्म का ज्ञान है, न वेद का। रावण उन राक्षसों का नायक था जो ऋषियों के हवन कुंड में हड्डियां डालते थे, जो ऋषियों को मार कर खा जाते थे, जो मनुष्यों को जीने नहीं देते थे। रावण ऐसे ही अमानुषों का नायक हो सकता है।


रावण को एक आदर्श पुत्र मानने वाले मूर्ख ही हैं, क्योंकि रावण के कुकर्मों के कारण स्वयं उसके पिता ने उसका त्याग कर दिया था। जिस व्यक्ति के कारण उसका लज्जित पिता नगर छोड़ दे, वह और कुछ भी हो आदर्श पुत्र नहीं हो सकता।


रावण ब्राह्मणों का नायक न था, न है, न होगा... ब्राह्मणों के आदर्श हैं वे गुरु वशिष्ठ जिन्होंने राजकुमार राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाया। ब्राह्मणों के नायक हैं वे दधीचि, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपनी हड्डियां दान कर दी। आधुनिक काल मे भी ब्राह्मणों के नायक चाणक्य, वर्षकार, पतंजलि, शंकराचार्य, या करपात्री जी महाराज हैं, कोई रावण नहीं है। रावण उन ब्राह्मण वंशियो को ही प्रिय हो सकता है जिन्होंने धर्म का त्याग कर वामपंथ स्वीकार किया हो, वे इतने महत्वपूर्ण नहीं कि वे ब्राह्मणों को दिशा दें। मैं तो उन्हें ब्राह्मण ही नहीं मानता।


भारतीय लोक रावण को हर विजया के दिन बुराई के प्रतीक के रूप में जलाता रहा है, और जलाता रहेगा। आज भी, और हजार वर्ष बाद भी... लोक किताबी विचारकों की बात नहीं सुनता, उसकी गोद में रोज हजारों चार्वाक, मार्क्स, कन्फ्यूशियस जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। लोक अपने ही गति से मुस्कुराता हुआ चलता रहता है। यही भारत है...

 



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17 अक्टूबर 2019

करवाचौथ व्रत नितांत व्यक्तिगत मामला है


समाज आधुनिकता की बात करने में लगा है, उसके द्वारा स्त्री-पुरुष समानता की बात की जा रही है, चंद्रमा पर आदमी के उतरने की आहटें सुनाई दे रही हों तब चंद्रमा के द्वारा किसी इन्सान की लम्बी उम्र की कामना किया जाना एक प्रक्रिया को हास्यास्पद बनाता ही है. सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दिया जाये कि इस आलेख का उद्देश्य किसी भी रूप में किसी की भावनाओं से, किसी की परंपरा से, किसी की श्रद्धा से खिलवाड़ करना नहीं है. इसके द्वारा स्वयं अपने आपके तमाम सवालों के जवाब प्राप्ति का रास्ता तलाशना है. प्राचीन सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तियों के पास खुद को प्रफुल्ल्ति रखने के, लोगों से मेल-मिलाप बढ़ाने के तरीकों में पर्व-त्यौहार आदि ही हुआ करते थे. इनके माध्यम से वह मेले, प्रदर्शनी आदि का आयोजन भी कर लिया करता था. जैसा कि कतिपय कारणोंवश समाज में पर्दा प्रथा का आरम्भ हुआ, महिलाओं का घर के अन्दर रहना जैसे अनिवार्य हो गया वैसे में उनके लिए ख़ुशी पाने का रास्ता त्योहारों, पर्वों, मेलों आदि से ही गुजरता था.

ऐसे में उनके द्वारा ही एक त्यौहार करवाचौथ के रूप में भी सामने आया होगा. इसे भी पति की लम्बी उम्र से जोड़ने के भी अपने सामाजिक कारण रहे होंगे. यह हम सभी को भली-भांति ज्ञात है कि समाज में आज भी विधवाओं के प्रति सोच में सकारात्मकता उस स्तर तक नहीं आ सकी जिस स्तर तक समाज विकास कर चुका है. ऐसे में सोचा जा सकता है कि दसियों साल पहले विधवाओं के प्रति किस तरह की मानसिकता समाज में व्याप्त रही होगी. उस समय जबकि विज्ञान ने आम जनमानस के बीच अपनी पैठ नहीं बनाई होगी, तकनीक ने अपनी स्थिति स्पष्ट न की होगी तब समाज में भगवान ही सबका पालनहार, तारणहार हुआ करता था. ऐसे में किसी भी महिला के लिए अपनी स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक था कि उसके पति की आयु लम्बी रहे. ऐसे में उसके सामने भगवान् ही एकमात्र सहारा रहा होगा. उसके द्वारा इसी कारण सामाजिक मान्यताओं के अधीन बने करवाचौथ को सहज स्वीकार कर लिया होगा.


आज जबकि चंद्रमा के बारे में स्थिति सबके सामने है, किसी भी ग्रह, उपग्रह के द्वारा किसी भी व्यक्ति की उम्र बढ़ने की असलियत के बारे में भी सबको जानकारी है तब करवाचौथ मनाये जाने की स्थितियां पहले से कहीं अधिक भिन्न हैं. आज आधुनिकता के दौर में न केवल त्यौहार-पर्व आधुनिक हुए हैं वरन परम्पराओं-संस्कृतियों ने भी आधुनिकता का चोला ओढ़ लिया है. आज करवाचौथ का सामान्य सा सन्दर्भ पति की लम्बी उम्र से बहुत कम लोग ही लगाया करते होंगे. आज करवाचौथ का सन्दर्भ एक त्यौहार के आयोजन सा है. इस आयोजन में आधुनिक पति भी उसी तरह से अपनी पत्नी का सहयोग करते हैं, जैसी कि स्त्री-पुरुष समानता के विचार में अपेक्षा की जाती है. आज के दौर में इस पर्व का सन्दर्भ सजने-संवरने से, खरीददारी करने से, दाम्पत्य संबंधों की मधुरता से संदर्भित करके देखा जाने लगा है. सभी को ज्ञात है कि उम्र बढ़ने के लिए संयमित जीवन-शैली, नियंत्रित खानपान, उचित देखभाल की आवश्यकता है न कि किसी व्रत की.

आज के दौर में जैसा कि देखने में आता है कि व्यक्ति आधुनिकता की आपाधापी से ऊब कर अब पुनः प्राचीन मान्यताओं की तरफ, प्राचीन जीवन-शैली की तरफ, उसी रहन-सहन की तरफ आकर्षित हो रहा है. कुछ इसी तरह का बदलाव अब नई पीढी में देखने को मिल रहा है. नव-युगलों को हनीमून के नाम पर भले ही अपने शहर से कोसों दूर विचरण करते देखा जाता हो मगर नव-युवतियों में मांग भरने, मंगलसूत्र पहनने, कलाई भर-भर चूड़ियाँ पहनने का चलन सामान्य रूप से देखने को मिल रहा है. कपड़ों के नाम पर भले ही उनके साथ आधुनिकता हो मगर इस तरह के श्रृंगार में अभी भी पारम्परिकता देखने को मिल रही है. इसे भी नई पीढ़ी का पारंपरिक फैशन कहा जा सकता है.

कुछ इसी तरह से ही करवाचौथ के व्रत को लिया जाना चाहिए. यह किसी भी व्यक्ति के लिए उसका नितांत व्यक्तिगत मामला है. इसे न तो जबरिया मनवाया जाना चाहिए और न ही मनाये जाने वालों की भावनाओं का मजाक बनाया जाना चाहिए. करवाचौथ का मनाया जाना अथवा न मनाया जाना किसी भी रूप में स्त्री-विमर्श से संदर्भित नहीं किया जाना चाहिए. इसे किसी भी महिला का व्यक्तिगत रुचि का मामला समझकर उसी पर छोड़ देना चाहिए. आज भी समाज में लाखों महिलाएँ ऐसी हैं जिन्होंने पूरी श्रद्धा के साथ इस व्रत को मनाया मगर आज वैधव्य को भोग रही हैं. बहुत सी महिलाएँ ऐसी होंगी जो आये दिन अपने पति के हाथों प्रताड़ना का शिकार होती होंगी मगर फिर भी उसकी लम्बी आयु के लिए इस व्रत को रखती होंगी. तमाम महिलाएँ ऐसी होंगी जो बिना ऐसे किसी व्रत के बहुत ही हंसी-ख़ुशी से अपने दाम्पत्य जीवन का सुख भोग रही हैं. ऐसे में करवाचौथ व्रत को नितांत व्यक्तिगत मसला समझकर उन्हीं पर छोड़ दिया जाना चाहिए. ये किसी भी महिला के या कहें कि दंपत्ति के प्रसन्न रहने के, ख़ुशी तलाशने के अपने रास्ते हैं, जहाँ जबरन हस्तक्षेप करने का किसी को कोई अधिकार नहीं.

05 सितंबर 2019

छोटी सी ज़िन्दगी ने बचाईं सैकड़ों ज़िंदगियाँ


नीरजा भनोत, ये नाम संभवतः अब लोगों के लिए अनजाना नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके साहसिक कार्य और बलिदान को याद रखने के लिये राम माधवानी के निर्देशन में नीरजा फ़िल्म का निर्माण किया जा चुका है. इस फ़िल्म में नीरजा का किरदार अभिनेत्री सोनम कपूर ने निभाया. इस फिल्म को 19 फ़रवरी 2016 को रिलीज किया गया था. इस फिल्म के आने के पहले कम लोग थे जो इनके बारे में जानकारी रखते थे. ऐसे लोगो संभवतः आज भी होंगे. आज जिस दिन पूरा देश शिक्षक दिवस मना रहा है उसी दिन इस साहसी महिला की पुण्यतिथि है. नीरजा ने बहुत कम उम्र में वह साहसिक कारनामा कर दिखाया था जिसके बारे में सोचा जाना भी कठिन समझ आता है. उसी कार्य के चलते भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया था. वे इस सम्मान को प्राप्त करने वाली पहली महिला हैं. इसके साथ-साथ पाकिस्तान सरकार ने भी नीरजा को तमगा-ए-इन्सानियत प्रदान किया. भारत सरकार ने सन 2004 में नीरजा के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में मशहूर है. वर्ष 2005 में अमेरिका ने उन्हें जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड दिया. उनकी स्मृति में मुम्बई के घाटकोपर इलाके में एक चौराहे का नामकरण किया गया, जिसका उद्घाटन अमिताभ बच्चन ने किया.


जो लोग उनके बारे में नहीं जानते होंगे निश्चय ही उन्हें आश्चर्य हो रहा होगा और कौतूहल भी कि आखिर ये महिला है कौन और इसने ऐसा कौन सा साहसिक कार्य किया था. नीरजा ने आज ही के दिन पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को आतंकवादियों से बचाया था. अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए नीरजा 5 सितम्बर 1986 को मात्र 23 वर्ष की उम्र में शहीद हो गईं. 5 सितम्बर को पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को लिए पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर अपने पायलट के इंतजार में खड़ा था. तभी 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले लिया. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाया कि विमान में पायलट को जल्दी भेजा जाये. पाकिस्तानी सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया. तब आतंकियों ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करने का आदेश दिया ताकि वह किसी अमरीकी नागरिक को मारने की धमकी से पाकिस्तान पर दबाव बना सकें. नीरजा ने विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी पासपोर्ट आतंकियों को सौंप दिये. फिर आतंकियों ने एक ब्रिटिश को मारने की धमकी दी किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से सूझबूझ से बात करके ब्रिटिश नागरिक को बचा लिया. धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गये. अचानक नीरजा को ध्यान आया कि विमान में ईंधन किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद अंधेरा हो जायेगा, तब यात्रियों को बचाना आसान होगा. ऐसा विचार आते ही उन्होंने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना और साथ में विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा.

नीरजा ने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ. विमान का ईंधन समाप्त होते ही चारों ओर अंधेरा छा गया. नीरजा ने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये. सभी यात्री भी आपातकालीन द्वार पहचान चुके थे. योजना के अनुसार सारे यात्री उन द्वारों से नीचे कूदने लगे. यह देख आतंकियों ने अंधेरे में ही फायरिंग शुरू कर दी. नीरजा के सावधानी भरे कदम से कोई यात्री मारा नहीं गया. हां, कुछ घायल अवश्य हो गये थे. इस बीच पाकिस्तानी सेना के कमांडो विमान में आ गए थे. उन्होंने तीन आतंकियों को मार गिराया. सबसे अंत में नीरजा निकलने को हुई तभी उन्हें बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी. वे उन बच्चों को खोज कर आपातकालीन द्वार की ओर बढीं तभी बचे हुए चौथे आतंकवादी ने गोलीबारी शुरू कर दी. नीरजा बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल कर उस आतंकी से भिड़ गईं. यद्यपि उस चौथे आतंकी को पाकिस्तानी कमांडों ने मार गिराया तथापि वे नीरजा को न बचा सके. अपने कर्तव्य निर्वहन में नीरजा शहीद हो गईं. 

इस साहसी महिला, नीरजा भनोत का जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ पंजाब में हुआ था. इनके पिता हरीश भनोत मुंबई में पत्रकारिता क्षेत्र में थे. नीरजा की प्रारंभिक शिक्षा अपने गृहनगर चंडीगढ़ में हुई, इसके बाद की शिक्षा मुम्बई में हुई. वर्ष 1985 में उनका विवाह संपन्न हुआ किन्तु रिश्ते में स्नेह-प्रेम न होने के चलते वे विवाह के दो महीने बाद ही मुंबई आ गयीं. इसके बाद उन्होंने पैन एम एयरलाइंस में नौकरी के लिये आवेदन किया और ट्रेनिंग पश्चात् एयर होस्टेज के रूप में काम करने लगीं थीं. महज 23 वर्ष की उम्र में अपनी जान की परवाह किये बिना यात्रियों की जान बचाने जैसा अदम्य साहस का कार्य करने वाली नीरजा को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.



03 जनवरी 2019

आज़ादी की चाह और बेड़ियाँ पहनने की आतुरता


महिला सशक्तिकरण के दौर में जहाँ कि सभी क्षेत्रों में अपनी हनकदार उपस्थिति का गर्व महिलाओं में दिखाई दे रहा है वहाँ एक मंदिर में किसी भी तरह से प्रवेश को लेकर जद्दोजहद मची हुई है. अदालती आदेश के बाद भी मंदिर प्रबंधकों तथा स्थानीय भक्तों द्वारा महिलाओं के प्रवेश को लेकर बनी स्थिति ज्यों की त्यों रही. कुछ अतिशय क्रांतिकारी महिलाओं द्वारा लगातार संघर्ष बनाये रखा गया कि कैसे भी मंदिर में प्रवेश करने को मिल जाए. अंततः खबर आई कि अँधेरे में दो महिलाओं ने मंदिर में घुसपैठ करके महिला सशक्तिकरण का इतिहास रच दिया. आये दिन धर्म को इसी बात के लिए कोसा जाता है कि इसने महिलाओं की स्वतंत्रता में अवरोध पैदा किया है. महिला सशक्तिकरण के नाम पर न जाने कितनी धार्मिक, पौराणिक कथाओं, पुस्तकों, ग्रंथों को गरियाया जाता है. इसके बाद भी ऐसी क्रांतिकारी महिलाओं द्वारा मंदिर में प्रवेश की आतुरता देखने को मिल रही थी. 


हो सकता है बहुत से लोग, तमाम नारीवादी इसकी वकालत करें कि आखिर मंदिर में प्रतिबन्ध जैसा भेदभाव क्यों? आखिर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से वंचित क्यों किया जा रहा है? एक हिसाब से ऐसे सवालों का उभरना सही भी है. आखिर जब समानता, स्वतंत्रता, अधिकारों की बात की जाती है तो फिर भेदभाव क्यों? क्यों किसी भी स्थान पर सिर्फ पुरुष का प्रवेश हो? क्यों महिलाओं को उनकी अपनी प्राकृतिक अवस्था के कारण मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित किया जाये? इसी बिंदु पर आकर सोचने की आवश्यकता है कि आखिर प्रतिबन्ध तोड़ने की प्रतिबद्धता या फिर जिद सिर्फ मंदिर के सन्दर्भ में ही क्यों? ऐसा किसी मस्जिद के लिए क्यों नहीं दिखाई देता? क्या वहाँ ऐसा करना समानता की बात करना न होगा? असल में ऐसे मामलों में बहुत गहराई से विचार किये जाने की आवश्यकता है. सिर्फ एक मंदिर प्रकरण से नहीं वरन तमाम सारे और प्रकरणों को भी इसी सन्दर्भ में देखा जाना आवश्यक है जबकि ऐसे कदमों के द्वारा प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से हिंदुत्व पर, हिन्दू धर्म पर, उसके रीति-रिवाजों पर चोट करने का प्रयास किया गया है. ऐसा ही कुछ मंदिर मुद्दे पर हुआ है.

अब जबकि दो महिलाओं ने मंदिर में अपने चरण घुसा ही दिए हैं, तब यह देखना है कि वे कहाँ-कहाँ तक अपने पैर घुसा पाने में सफल होती हैं. सिर्फ एक मंदिर ही नहीं अनेकानेक ऐसी जगहें हैं जहाँ आज भी महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित है. महिला सशक्तिकरण के दौर में एक और सशक्त कदम का इंतजार रहेगा.

28 अक्टूबर 2018

सेनेटरी नेपकिन पर आधुनिक महिलाओं की अमानुषिक सोच

समाज आये दिन नए-नए आन्दोलनों से रूबरू होता है. आधुनिकता के वशीभूत आगे बढ़ता या कहें कि आगे बढ़ने का नाटक करता ये समाज ऐसे-ऐसे आन्दोलनों के सहारे चलने की कोशिश करने में लगा है जो भारतीय समाज में ही नहीं वरन किसी भी समाज में स्वीकार नहीं होंगे. सबरीमाला मंदिर विवाद के बाद से इस तरह का एक आन्दोलन सामने आया, वो भी सेनेटरी नेपकिन के आन्दोलन के रूप में. ऐसी खबर सार्वजनिक रूप से आ रही है कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को लेकर आंदोलित महिलाओं में एक महिला वहाँ स्थापित भगवान की मूर्ति पर माहवारी के दिनों में प्रयुक्त सेनेटरी नेपकिन को फेंकना चाहती है. सोचने वाली बात ये है कि ये किस तरह का आन्दोलन है? किस तरह की आज़ादी है? इस खबर के सन्दर्भ में सरकार की एक महिला मंत्री के बयान पर कुछ आधुनिक महिलाएं लामबंध हो गईं. वे माहवारी के दिनों में उपयोग में लाये सेनेटरी नेपकिन को लेकर इतनी संजीदा हो गईं, मानो ऐसे नेपकिन वे अपने संग्रह में सुरक्षित रख लेती हैं. या फिर ऐसे नेपकिन खाने की मेज पर साथ लेकर बैठती हैं.

इन महिलाओं ने महिला मंत्री के उस बयान को निशाना बना रखा है जिसमें उनके द्वारा कहा गया कि क्या महिलाएं उपयोग किये गए नेपकिन अपने मित्र के घर ले जा सकती हैं? इसके अलावा इन आधुनिक महिलाओं का आन्दोलन सेनेटरी नेपकिन के पवित्र-अपवित्र को लेकर भी चालू है. ये स्वीकार है कि माहवारी किसी भी महिला की प्राकृतिक अवस्था है. ये भी स्वीकार है कि इसी अवस्था के चले इन्सान का जन्म होता है. ये भी स्वीकार है कि इस स्थिति को नकारा नहीं जा सकता है. इन सबके बाद भी इसे भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि इन स्थितियों में उपयोग में लाये जाने वाले नेपकिन उपयोगी हैं, सुरक्षित हैं, स्वास्थ्यवर्धक हैं. यदि माहवारी की अवस्था विशुद्ध पवित्र है तो क्या इस समय में उपयोग किये गए नेपकिन यही आधुनिक महिलाएं अपने ड्राइंग रूम में सजा कर रखेंगी? क्या यही महिलाएं अपने उपयोग किये गए नेपकिन को अपने साथ खाने की मेज पर लेकर भोजन करेंगी? यदि उपयोग किया गया नेपकिन पवित्र अवधारणा से लिप्त है तो क्या वे ऐसे नेपकिन अपने किसी कार्यक्रम में किसी को उपहार स्वरूप गिफ्ट करेंगी? निश्चित है ऐसा कोई भी महिला नहीं कर पाएगी. 

असल में इस तरह की नौटंकी सिर्फ सरकार विरोध के लिए की जा रही है. ऐसी महिलाओं के निशाने पर केंद्र सरकार है उसके मंत्री हैं. यदि ऐसा नहीं है तो प्रति महीने पांच दिनों के लिए इन्हीं महिलाओं को इसी पवित्र स्थिति से गुजरना पड़ेगा. इसी बार से अपने ऐसे उपयोग किये गए नेपकिन अपने पति-बेटे-बेटी के लंच बॉक्स में रखकर भेजें. ऐसे नेपकिन को अपने किसी परिचित को उपहार स्वरूप भेंट करें. ऐसे उपयोग किये गए नेपकिन को वे खाने की प्लेट में साथ रखकर भोजन का स्वाद लें. यदि वे ऐसा करने में समर्थ हैं, सक्षम हैं तो उनके आन्दोलन को समर्थन है. अन्यथा की स्थिति में अपनी बकबक को अपने घर तक सीमित रखें और अपने दिमाग में भी एक सेनेटरी नेपकिन लगाकर बैठें ताकि अनावश्यक होने वाले स्त्राव को रोका जा सके.

27 अक्टूबर 2018

करवाचौथ पर आधुनिकतावादियों का असमंजस


करवाचौथ हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. इसे मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में मनाया जाता है. हिन्दी महीनों के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सुहागिन (शादीशुदा) महिलाओं द्वारा इसे मनाया जाता है. यह व्रत सूर्योदय से पहले आरम्भ होकर रात में चंद्रमा दर्शन के साथ अपनी संपूर्णता को प्राप्त होता है. करवाचौथ व्रत ग्रामीण से लेकर आधुनिक महिलाएं बडी़ श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं. यह आवश्यक नहीं कि सभी महिलाएं ऐसा करती हों. शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस व्रत को किया जाता है. वर्तमान में करवाचौथ व्रतोत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं.


आज करवाचौथ होने के कारण बहुत सी महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु कामना के साथ इस व्रत को पूर्ण किया गया. जैसा कि विगत कुछ वर्षों से सोशल मीडिया के माध्यम से एक परम्परा का निर्वाह कतिपय आधुनिकतावादियों द्वारा किया जाने लगा है कि जैसे ही कोई हिन्दू पर्व आया नहीं कि उनकी दार्शनिकता बाहर निकली नहीं. कुछ ऐसा इधर भी हुआ, हो रहा है. महिला मोर्चा का संगठन संभाले स्त्री-पुरुष एक स्वर से करवाचौथ व्रत का, इसे सम्पूर्ण करने वाली स्त्रियों का उपहास उड़ाने में लग गए. यहाँ वे महिलाएं इनके निशाने पर रही जो विगत कई वर्षों से परम्परा के नाम पर ये व्रत करती चली आ रही हैं. इसके साथ-साथ वे महिलाएं भी निशाना बनीं जो खुद को आधुनिकतावादी बताती हैं इसके बाद भी इस व्रत को कर रही हैं. यहाँ ऐसी महिलाओं का उनको जवाब दिया जाता है कि वे किसी परम्परा का निर्वहन नहीं कर रहीं वरन खुद के सजने-सँवरने के शौक को पूरा कर रही हैं. इस व्रत के द्वारा वे आयोजन का आनंद ले रही हैं. मेंहदी, साज-श्रृंगार आदि के द्वारा अपने रूप-सौन्दर्य में निखार ला रहीं हैं. ऐसी आधुनिकतावादी महिलाएं ऐसे व्रत के रहने के बाद भी खुद को ईश्वरीय श्रद्धा से इतर बताती हैं. देखा जाये तो सच भी है, किसी भी व्यक्ति को अपने मन-मष्तिष्क के अनुसार किसी भी आयोजन को अपनी तरह से मनाये जाने की आज़ादी है. यह उसकी मनोदशा, व्यक्तित्व आदि पर निर्भर करता है कि वह किसी भी पर्व को, आयोजन को, परम्परा को किस तरह से स्वीकार करता है. 

इस स्वीकार्यता के बाद, इस आज़ादी के साथ ही ऐसी स्थिति भी आती है जबकि यही महिलाएं खुद को परम्परा में बाँधकर पुरुषों को दोषी बताने निकल पड़ती हैं. इसके लिए वे इसी करवाचौथ व्रत का सहारा लेती हैं. ऐसी महिलाओं को जब भी किसी बहाने से, किसी आयोजन के बहाने से, किसी व्रत के द्वारा पुरुषों को आरोपित करना होता है तो वे पुरुषों को दोषी बनाते हुए करवाचौथ व्रत को ही केंद्र में रखती हैं. तब इन महिलाओं द्वारा आरोप लगाया जाता है कि एक पत्नी अपने पति की दीर्घायु के लिए करवाचौथ का व्रत करती है. दिन भर बिना कुछ खाए-पिए भूखी रहती है और पति न तो उसके लिए कोई व्रत रखता है, न ही इस व्रत में सहयोगी बनता है. यहाँ आकर इन्हीं महिलाओं को समझ नहीं आता है कि सत्य क्या है, वे कहना क्या चाहती हैं, वे करना क्या चाहती हैं. एक तरफ वे इसी व्रत को महज अपने शौक, आनंद के लिए मानती हैं, अगले ही पल इसी का आधार वे पति की उम्र से जोड़ने लगती हैं. यदि इस पर्व का आयोजन उनकी निगाह में महज मौज-मस्ती, एक दिन के आनंद के लिए है तो वे इसे किसी दूसरी औरत के लिए पति की दीर्घायु से क्यों जोड़ने लगती हैं? किसी भी मौज-मस्ती के, आनंद के, शौक के दिन या रात का, पर्व का, व्रत का सम्बन्ध किसी की आयु से कैसे हो सकता है? आधुनिकता के वशीभूत अनिश्चय की स्थिति में डोलती आधुनिक महिलाओं को खुद स्पष्ट नहीं है कि सज-संवर कर इस व्रत को मनाने का समर्थन करें या फिर इसके द्वारा अपनी मौज-मस्ती का? उनको महज हिन्दू व्रत-त्योहारों का विरोध करना है, सो वे सज-संवर कर इसे पूरी तन्मयता से करने में लगी हैं. उन्हें न अपने शौक से मतलब है न दूसरी महिला के पति की दीर्घायु की कामना से.

12 अक्टूबर 2018

मीटू, मीटू रटे जमाना


पश्चिम की धरती पर उगे विमर्श, अभियान किसी न किसी तरह भारत भूमि पर भी पल्लवित-पुष्पित होने लगते हैं. पता नहीं पश्चिम की सोच में, मानसिकता में, वहां की मिट्टी में ऐसा कौन सा उपजाऊपन छिपा हुआ है कि वहाँ की चीज तो यहाँ पल्लवित होती ही है, अपने देश की चीजें, विचार आदि भी पश्चिम जाकर पल्लवित होकर वापस लौटी. योग को इसी रूप में देखा जा सकता है, जो योगा होकर लौटा और घर-घर में जाना जाने लगा. बहरहाल, पश्चिम की धरती पर उगे तमाम सारे अभियानों के बीच वर्तमान में मीटू अभियान अपना सिर उठाये फ़िल्मी-राजनीतिक गलियों से विचरण करते हुए सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है. इस अभियान का आरम्भ 2017 में हॉलीवुड के बड़े निर्माता हार्वी वाइनस्टीन पर कई महिलाओं द्वारा यौन उत्पीड़न और बलात्कार के आरोप लगाए जाने के बाद हुई थी. अमेरिका में काम करने वाली इतालवी मूल की अभिनेत्री आसिया अर्जेंटो ने उक्त निर्माता पर आरोप लगा कर इसकी शुरुआत की थी.


देश में इस अभियान का आरम्भ फ़िल्मी गलियों में तनुश्री दत्ता द्वारा नाना पाटेकर पर लगभग दस वर्ष पूर्व किसी सेट पर यौन उत्पीड़न के प्रयास किये जाने से हुआ. उसके बाद से कई महिलाओं द्वारा सोशल मीडिया पर इस अभियान के द्वारा अपने यौन उत्पीड़न की बात शेयर की गई. यह अभियान विशुद्ध रूप से सोशल मीडिया के अंतर्गत चलने वाला अभियान है जो अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त किये हुए है. इसके अलावा भारत में फ़िल्मी और राजनैतिक जगत से जुड़े लोगों के इसमें शामिल होने, अपनी बात कहने को अभी तक देखा गया है. इस अभियान के द्वारा किसी पुरुष पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने के पीछे की सत्यता-असत्यता क्या है, ये तो आरोप लगाने वाली महिला ही जाने किन्तु जैसा कि पूर्व के आन्दोलनों, विमर्शों, अभियानों में होता रहा है कि पश्चिमी धरती पर सार्थक रूप से फलते-फूलते आये अभियानों का यहाँ स्वरूप विकृत कर दिया गया, ऐसा ही कुछ इस अभियान के साथ हुआ. इससे पूर्व स्त्री-विमर्श ने अपनी राह से भटक कर इसे विशुद्ध साहित्यकारों का विषय बना दिया. स्त्री-विमर्श चर्चा में रहा किन्तु स्त्री सशक्तिकरण सही दिशा में न हुआ. इसी तरह कुछ दिन पहले हैप्पी टू ब्लीड अभियान के भौंड़ेपन ने उसके भीतर छिपे सन्देश को मटियामेट कर दिया. इसी तरह से मीटू अभियान के साथ होता दिख रहा है. ऐसा लगने लगा है कि ये आन्दोलन किसी सार्थक दिशा को प्राप्त करने के बजाय कहानियों का, चटखारा लेने वाले बिन्दुओं का, मसालेदार घटनाओं का कोलाज बनता जा रहा है.

एक मिनट को रुक कर सोचा जाये तो देश में आरोप लगाने वाली महिलाओं के सापेक्ष यह सवाल बार-बार खड़ा हो रहा है कि जब आर्थिक, सामाजिक रूप से सक्षम महिला किसी पुरुष की बदतमीजी का तत्काल जवाब नहीं दे सकी तो आम महिला की हैसियत ही क्या है कि वह खुलकर अपनी बात रखे. यदि तनुश्री दत्ता जैसी अभिनेत्री को अपनी बात कहने के लिए दस साल इस अभियान का इंतजार करना पड़े तो इन आरोपों के पार्श्व में असल कहानी पर भी लोगों की राय प्रकट होगी. फ़िल्मी जगत और राजनीति का क्षेत्र ऐसा है जहाँ कास्टिंग काउच जैसी घटनाएँ पूर्व में भी खुलकर सामने आती रही हैं. इन क्षेत्रों में महिलाओं के यौन उत्पीड़न की, यौन शोषण की खबरें भी समय-समय पर सिर उठाती रही हैं. इन खबरों के पीछे से स्वार्थपूर्ति की खबरें भी सामने आती रही हैं. खुद के स्थापित करवाने के लिए, खुद को किसी पद पर स्थापित करवाने के लिए, किसी मुख्य भूमिका के लिए, किसी टिकट के लिए आये दिन इस तरह की खबरें सामने आती रही हैं. क्या माना जाये ऐसे में, कि उस समय इन महिलाओं की चुप्पी उनके कैरियर के कारण रही? क्या माना जाये कि स्वार्थपूर्ति के लिए ये महिलाएं तब अपना यौन उत्पीड़न करवाती रहीं? आज ये महिलाएं अपनी कहानी को मीटू के रूप में सामने ला रही हैं, क्या ये अपने घरों में, कार्यालयों में काम करने वाली आम औरत की यौन शोषण की घटनाओं को, उन पुरुषों को इस अभियान के द्वारा सामने लाने का काम करेंगी? क्या ये ऐसी कमजोर महिलाओं के हितों के लिए संघर्ष करने का काम करेंगी? क्या ये महिलाएं अपने इसी अभियान के द्वारा यह बताने की हिम्मत दिखाएंगी कि इन्होंने किसी पुरुष का शोषण नहीं किया है?

यह सत्य है कि देश में महिलाएं यौन उत्पीड़न का शिकार हैं, यौन शोषित हैं पर जिन महिलाओं की घटनाएँ मीटू अभियान के साथ बाहर आ रही हैं, क्या वाकई न्याय की अपेक्षा के साथ आ रही हैं? क्या मान लिया जाये कि समाज में पुरुष यौन उत्पीड़न का शिकार नहीं है? क्या इस अभियान के साए में सामने आती कहानियाँ वाकई सच्चाई हैं? कहीं ऐसा न हो कि यह अभियान भी हैप्पी टू ब्लीड की तरह सोशल मीडिया पर कुछ फोटो, वीडियो के साथ ही एक वर्ग विशेष तक सीमित रह जाये?

15 मार्च 2018

रूढ़ियों को दरकिनार कर उड़ाया हवाई जहाज


आज, 15 मार्च को उस महिला की पुण्यतिथि है, जिसने तमाम रूढ़ियों को, अमान्य परम्पराओं को तोड़ते हुए इतिहास रचा था. ऐसा उन्होंने उस समय किया था जबकि हमारा देश आज़ाद भी नहीं हुआ था. सन 1936 में पहली बार किसी भारतीय महिला ने हवाई जहाज उड़ाया था. जी हाँ, अपने आपमें आश्चर्य का विषय इसलिए भी है क्योंकि तब आज की तरह स्त्री-विमर्श, नारी-सशक्तिकरण चारों तरफ गूँज नहीं रहा था. तब सरकारी अथवा गैर-सरकारी संस्था द्वारा बेटियों को बचाने, उनके सशक्तिकरण के कार्य भी नहीं किये जा रहे थे. गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत में ऐसा जीवट का काम करने वाली वह सम्मानीय महिला थी सरला ठकराल. पहली बार भारतीय महिला द्वारा हवाई जहाज उड़ाए जाने के साथ-साथ कुछ और आश्चर्य भी जुड़े थे, वो ये कि सरला ठकराल ने साड़ी पहन कर हवाई जहाज़ उड़ाने का गौरव हासिल किया था. उस समय वह चार साल की एक बेटी की मां भी थीं.


सरला ठकराल का जन्म सन 1914 में नई दिल्ली में हुआ था. उन्होंने 1929 में दिल्ली में फ़्लाइंग क्लब में विमान चलाने का प्रशिक्षण लेकर एक हज़ार घंटे का अनुभव भी प्राप्त किया. दिल्ली के फ़्लाइंग क्लब में ही उनकी मुलाकात पी०डी० शर्मा से हुई, जिनके साथ बाद में उनका विवाह भी हुआ. उनके पति ने ही उन्हें व्यावसायिक विमान चालक बनने को प्रोत्साहन दिया. इससे प्रोत्साहित होकर सरला जोधपुर फ्लाइंग क्लब में ट्रेनिंग लेने लगी. इसके बाद सन 1936 में वह ऐतिहासिक पल आ गया जो स्वर्णाक्षरों में आज भी अंकित है. महज 22 साल की सरला ठकराल ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, आँखों पर चश्मा चढ़ाया और जिप्सी मॉथ नामक दो सीटों वाले विमान को अकेले ही आकाश में ले उड़ीं. तत्कालीन समय में विमान उड़ाना बहुत बड़ी बात समझी जाती थी. इस तरह सरला ठकराल भारत की पहली महिला विमान चालक बनीं.

सन 1939 में ही एक विमान दुर्घटना में उनके पति का देहांत हो गया. इसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने से जोधपुर क्लब बंद हो गया. सरला ठकराल के माता-पिता ने उनका दूसरा विवाह कर दिया और वे विभाजन के बाद लाहौर से दिल्ली आ गईं. दिल्ली आकार उन्होंने पेंटिंग शुरू की, बाद में वे कपड़े और गहने डिज़ाइन करने लगीं. इस क्षेत्र में भी वे खासी सफल रहीं. अपने जीवन में सफलताओं के कई आयाम छूने वाली सरला ठकराल का 15 मार्च 2008 को निधन हो गया. उनका जीवन प्रेरणा, साहस और आत्मविश्वास की एक अनूठी कहानी है. उनकी ज़िन्दगी का संघर्ष और उसके बाद मिली सफलता महिलाओं के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बनी रहेगी.


ऐसी साहसी और आत्मविश्वास की धनी महिला को श्रद्धासुमन अर्पित हैं.

09 मार्च 2018

दिव्या का सम्मान वास्तविक कार्य का सम्मान है

जीतने की कोई उम्र नहीं होती, सम्मान पाने की कोई उम्र नहीं होती. हाँ यदि इसके लिए कुछ होता है तो वो है काम करने का जज्बा. सम्मान, पुरस्कार, इज्जत, नाम आदि पाने के लिए काम पहली शर्त है और इस शर्त में भी कई तरह की अन्य शर्तें भी लागू होती हैं. उनमें आत्मानुशासन, आत्मबल, स्वाभिमान, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा आदि भी आवश्यक है. कुछ इसी के सहारे चरित्र का ही नहीं वरन व्यक्तित्व का भी निर्माण होता है. चरित्र-निर्माण का कार्य अथवा व्यक्तित्व-निर्माण का कार्य कोई एक दिन का नहीं, एक पल का नहीं, एक कार्य का नहीं, एक व्यक्ति का नहीं वरन कई-कई पलों की, कई-कई कामों की, कई-कई निगाहों की परीक्षण प्रक्रिया से गुजरने के बाद सामने आने वाली स्थिति है. इस प्रक्रिया से गुजरे बिना कोई भी अपने आपका विकास नहीं कर पाता है. अक्सर देखने में आता है कि सामाजिक क्षेत्र में कार्य कर रहे लोग आशानुरूप परिणाम न मिलने के कारण निराश होने लगते हैं. ऐसे लोगों में अपने कार्य के प्रति तुरंत ही परिणाम पाने की लालसा छिपी होती है. ये सही है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा कहीं न कहीं अपने नाम के प्रति गंभीरता दिखाई देती है. और ऐसा होना भी चाहिए. यदि कोई व्यक्ति अपने नाम के प्रति, अपनी इज्जत के प्रति, अपने सम्मान के प्रति सचेत नहीं है तो संभव है कि वह सामाजिक हित में काम उतनी मेहनत या ईमानदारी से न करे. यहाँ एक बात इसके ऊपर भी लागू होती है कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को अपने कार्य के प्रति ईमानदारी बरतने की आवश्यकता है. यदि वह अपने काम क प्रति, अपनी जिम्मेवारी के प्रति ईमानदार नहीं है तो संभव है कि वह अपनी जिम्मेवारी से दगाबाजी कर रहा हो. ऐसा करना कहीं न कहीं समाज के विरूद्ध कार्य करना ही कहा जायेगा. ऐसे में फिर काहे का सम्मान, काहे का नाम.



आज से नहीं बल्कि लगभग डेढ़-दो दशकों से अपने कार्य के प्रति समर्पण भाव लिए, समाजहित में खुद को चौबीस घंटे समर्पित किये, काम के प्रति एक जुनूनी हद तक जाकर वास्तविक काम करने वाले बहुत कम लोग देखने को मिलते हैं. बहुतेरे तो प्रचार की चकाचौंध में सिमट जाते हैं और अपने काम से ज्यादा अपने नाम के प्रचार में लग जाते हैं. इन सबसे बहुत अलग दिव्या ने न केवल खुद को सामाजिक कार्यों में लगा रखा है बल्कि जमीनी स्तर पर खड़ा कर रखा है. देश में तमाम तरह की प्राकृतिक आपदाओं में दिव्या उन सबके बीच खड़ी मिली, जिन्हें उसकी जरूरत थी. बाढ़ हो, भूकंप हो, आगजनी हो या फिर किसी और तरह की दुर्घटना दिव्या सब जगह बिना कुछ सोचे-बिचारे, बिना किसी आदेश की प्रतीक्षा के खड़ी मिली. न केवल वह वहां उपस्थित रही वरन खुद को काम के प्रति समर्पित करती रही. उसका काम हर बार बिना किसी अपेक्षा के आगे बढ़ता रहा. बिना किसी अपेक्षा के वह लगातार आगे चलती रही. उसके कार्य की निस्वार्थ भावना को जानने-समझने का दिन आखिर आ ही गया. उन सभी लोगों को, जो अपने काम के मूल्यांकन न होने की भावना से निराश होने लगते हैं, एक बात जान लेनी चाहिए कि ये समाज सबका मूल्यांकन करता है. आज नहीं तो कल, सभी को उसके कार्यों का प्रतिफल मिलता ही मिलता है. दिव्या को भी उसके कार्य का सुफल मिला.



गुजरात में यूनिसेफ के साथ सलाहकार के रूप में काम करने वाली दिव्या विगत कई वर्षों से जमीनी काम चुपचाप करने में लगी हुई है. विगत दो-तीन वर्षों से उसके द्वारा Volunteer Indians नाम से एक सार्थक प्रयास भी आरम्भ किया गया है. (फेसबुक पेज के लिए यहाँ क्लिक करें) कई वर्षों के समर्पित कार्य का प्रतिफल आज ये मिला कि उसे गांधीनगर (गुजरात) में UDGAM Women's Achiever's Award से सम्मानित किया गया. दिव्या को बधाई. साथ में उन सभी को भी बधाई जो बिना किसी प्रचार पाने की भावना के सत्यनिष्ठा से, पूरी ईमानदारी से अपना काम करने में लगे हैं. आज नहीं तो कल वे भी दिव्या की तरह प्रकाशित होंगे. सभी को शुभकामनायें.

19 फ़रवरी 2018

आधुनिकता में दरकते रिश्ते


सम्बन्ध क्या हैं? रिश्ते क्या हैं? रिश्तों और संबंधों में आपसी सामंजस्य, साहचर्य किस तरह का है? क्या रिश्ते और सम्बन्ध एक ही हैं? क्या रिश्ते और सम्बन्ध आपस में एकसमान भाव रखते हैं? ये ऐसे सवाल हैं जो आये दिन दिमाग में उलझन तो पैदा ही करते हैं, दिल में भी उथल-पुथल मचाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि कई बार हम संबंधों को लेकर सजग होते हैं और कई बार रिश्तों का महत्त्व नहीं समझते हैं. इसके अलावा बहुत बार ऐसा भी होता है कि किसी व्यक्ति के लिए संबंधों के साथ-साथ रिश्तों की भी महत्ता होती है. इसके साथ-साथ समाज में ऐसे लोगों से भी सामना होता है जिनका सम्बन्ध सिर्फ उन्हीं लोगों से अधिक होता है जो उनके साथ किसी न किसी तरह का रिश्तेनुमा व्यवहार रखते हैं. वर्तमान स्थितियों को देखते हुए आज बहुतेरे लोग रिश्तों के साथ संबंधों को अहमियत देते दिखाई देते हैं जबकि बहुत से लोग संबंधों को तवज्जो देते हैं.


यहाँ समझने का विषय मात्र इतना है कि किसी के लिए भी संबंधों और रिश्तों में अंतर कैसा है? इन दोनों शब्दों की परिभाषा उसके लिए किस स्तर की है? असल में आज की भौतिकतावादी दुनिया में हम संबंधों और रिश्तों की महत्ता को भूल चुके हैं. आज हम में से बहुतों के लिए रिश्तों का कोई महत्त्व नहीं. ऐसे लोग संबंधों को महत्त्व देने लगे हैं. और आश्चर्य की बात ये कि ऐसा उन लोगों के बीच भी होने लगा है जिनका रिश्ता पावनता के साथ आपस में जोड़ा गया है. माता-पिता, भाई-बहिन आदि रक्त-सम्बन्धियों के अलावा एक रिश्ता आपस में सामाजिक रूप से इस तरह निर्मित किया गया है जो पावनता में, विश्वास में किसी भी रिश्ते से पीछे नहीं बैठता है. पति-पत्नी के रूप में बनाया गया यह रिश्ता भी आज कसौटी पर खड़ा कर दिया गया है. आये दिन इस रिश्ते को भी परीक्षा देनी पड़ती है. कभी इन दोनों को आपस में और कभी इन दोनों को सामाजिक रूप में तो कभी इनको पारिवारिक रूप में. समय के साथ माता-पिता, भाई-बहिन आदि से दूरी बनती जाती है, भले ही ये दूरी दिल से न बने मगर ऐसा अपने रोजगार, कारोबार या अन्य कार्यों के चलते भौगौलिक रूप से अवश्य ही हो जाता है. इन रिश्तों से दूरी बनने के बाद भी पति-पति साथ रहते हैं. इधर देखने में आ रहा है कि पति-पत्नी आपस में अहंकारी भाव दिखाने लगे हैं.

सम्पूर्ण समाज में, खास तौर से भारतीय समाज में एकमात्र यही रिश्ता ऐसा है जो लाख लड़ाई के बाद भी रात को एकसाथ होता है. इधर जबसे समाज को आधुनिकता की, पाश्चात्य समाज की हवा लगी है तबसे इस रिश्ते में भी उसी का असर दिखने लगा है. एक तरह के झूठे अहंकार में दोनों लिप्त होकर न केवल रिश्ते की हत्या कर रहे हैं वरन संबंधों की आत्मीयता को भी समाप्त कर रहे हैं. अनजाने से, अनचाहे से अहंकार के बीच ये पावन रिश्ता लगभग पिसता जा रहा है. आधुनिकता की दौड़ में शामिल होकर पति-पत्नी के रूप में दो इन्सान न मिलकर अब स्त्री-पुरुष एक-दूसरे का सामना करते हैं. जहाँ कानून की भाषा बोली जाती है, अदालत का सहारा लिया जाता है, एक-दूसरे को सबक सिखाने की चुनौती दी जाती है. ऐसे में कई बार लगता है कि समाज में बहुत पहले से अनेकानेक रक्त-सम्बन्धियों में आपसी विवाद देखने को मिलता था. आपसी रक्त-सम्बन्धियों में आपसी तनाव देखने को मिलता था. जिसके चलते उनके किसी तरह के सम्बन्ध भविष्य में देखने को नहीं मिलते थे. अब जबकि ऐसा पति-पत्नी के बीच दिखाई देने लगा है और बहुतायत में दिख रहा है तब आशंका सामाजिक अवधारणा पर खड़ी होती है. समाज में पारिवारिकता, सामाजिकता के लिए खड़ी की गई विवाह संस्था इस तरह से एक न एक दिन अवश्य ही खंडित होकर नष्ट हो जाएगी. सामाजिकता की संस्कारवान पीढ़ी के निर्माण की संकल्पना के लिए पति-पत्नी को सामंजस्य बनाये रखने की, आपस में आत्मीयता बनाये रखने की आवश्यकता है.


11 फ़रवरी 2018

शर्म, संकोच की दीवार गिराना होगी पहले


पैड मैन जैसी फिल्मों को सामाजिक परिवर्तन का वाहक बताया जा रहा है. पता नहीं ये बॉक्स ऑफिस पर फिल्म के चलने के कारण है या फिर समाज के लोगों को इसके विषय की अहमियत समझ आ गई है? इस बारे में एक बात साफ़ है कि समाज में इसे महज फिल्म के रूप में ही देखा जा रहा है और इसको तारीफ के लायक महज इसलिए बताया जा रहा है कि इसके द्वारा एक ऐसे विषय को सामने लाया गया जो कि अभी तक शर्म का विषय माना जाता है. ऐसा न केवल पुरुष वर्ग में है वरन खुद महिलाओं में भी अपने पैड को लेकर शर्म, घृणा जैसा माहौल बना हुआ है. इधर पैड मैन के द्वारा समाज में सन्देश देने की कोशिश की जा रही है वहीं महिलाओं में इस विषय को लेकर एक अजब तरह की स्थिति देखने को मिल रही है. अभी तक जिस तरह के भारतीय समाज की, परिवारों की संकल्पना देखने को मिली है उसे देखकर सहज नहीं है किसी भी महिला के लिए ऐसे किसी भी विषय पर चर्चा करना जिसे गोपनीय माना जाता रहा है. यहाँ वे महिलाएं अपवाद हैं जो अपने उन पांच दिनों के ब्लीड को भी गर्व से सबको दिखाने को आतुर बैठी हैं.

ऐसे किसी भी विषय का स्वागत होना चाहिए जो किसी भी इन्सान की जीवन-शैली में सुधार लाते हों या ला सकते हों. कुछ इसी तरह का विषय इस फिल्म का है. आज भी बहुत सी जगहें ऐसी हैं, बहुत सी महिलाएं ऐसी हैं जो अपनी माहवारी के समय में अत्यंत कष्ट का जीवन व्यतीत करती हैं. बहुतेरी महिलाएं आर्थिक कारणों से नैपकिन से वंचित रहती हैं. ऐसी महिलाएं गंदे कपड़ों का सहारा लेकर अपने स्वास्थ्य से ही खिलवाड़ करती हैं. इसके अलावा बहुतेरी महिलाओं को अपने उन पांच दिनों के बारे में गंभीरता से जानकारी नहीं होती है. इसके चलते उन्हें सामाजिकता का, धार्मिकता का, पारिवारिकता का नाम लेकर बहुतेरे कार्यों से दूर रखा जाता है. ये स्थिति उन बच्चियों के लिए बहुत ही जटिल हो जाती है जो इसका शुरुआती परिचय प्राप्त कर रही होती हैं. आज के तकनीकी भरे समय में समय से पहले बालिग़ होती बच्चियों को माहवारी, उनके सुरक्षा उपायों के बारे में आसानी से पता रहता है मगर वे बच्चियाँ अवश्य ही असमंजस में रहती हैं जो ग्रामीण अंचलों से जुड़ी हैं. हालाँकि ऐसे विषयों के प्रति सरकारी उपक्रम और गैर-सरकारी उपक्रमों द्वारा बहुत समय से उपाय क्रियान्वित किये जा रहे हैं मगर विषय को महिलाओं से सम्बंधित होने के कारण, उनकी देह की क्रिया से सम्बंधित होने के कारण उनमें अपेक्षित सफलता नहीं मिली है. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि खुद लेखक भी कई वर्ष पूर्व इस तरह के एक कार्यक्रम में सहभागी रहा है और ग्रामीण अंचलों के विद्यालयों की बात अलग है, शहरी क्षेत्र के विद्यालयों, महाविद्यालयों में इस विषय पर जागरूकता लाने में बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा था.

आज जबकि इस विषय पर फिल्म बन चुकी है. उसकी चर्चा जोरों पर है. ऐसे में सबके लिए आवश्यक है कि इस विषय पर पूरी गंभीरता से बात हो. लेकिन क्या भारतीय परिदृश्य में ऐसा पूरी तरह से संभव है? क्या आज के परिवेश में मध्यम वर्गीय परिवारों में आसान है किसी लड़की के लिए इस विषय पर अपने पिता या भाई से चर्चा करना? समझने वाली बात ये है कि पारिवारिक अवधारणा से इतर अभी मध्यम स्तर के नगरों, शहरों, कस्बों तक में ऐसी मानसिकता विकसित नहीं हो सकी है कि सहकर्मी महिला-पुरुष इस विषय पर खुलकर बात कर सकने में सहजता महसूस करते हों. विद्यालयों, महाविद्यालयों तक में स्त्री-पुरुष सम्बन्धी विषयों पर दोनों तरफ से बातचीत में शर्म, संकोच देखने को मिलता है. जब तक स्त्री-पुरुष आपस में शर्म, संकोच त्यागकर ऐसे विषयों पर चर्चा को आम नहीं करेंगे तब तक फ़िल्में हिट होती रहेंगी, समाज में चर्चा का विषय बनती रहेंगी, लोगों की वाहवाही लेती रहेंगी मगर नतीज वहीं का वहीं रहेगा.  

16 जनवरी 2018

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक का अनावश्यक विरोध

तीन तलाक विधेयक मामला इस समय देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. एक तरफ इसे राजनैतिक कदम बताया जा रहा है वहीं दूसरी तरह इसे मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में उठाया गया सकारात्मक कदम बताया जा रहा है. सम्पूर्ण प्रकरण मार्च 2016 में उतराखंड की महिला शायरा बानो ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित करने की माँग के साथ शुरू हुआ. शायरा बानो की याचिका के बाद सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने बहुमत के निर्णय से एक साथ तीन बार तलाक देने की प्रथा को निरस्त करते हुए इसे असंवैधानिक, गैरकानूनी और शून्य करार दिया. अदालत ने कहा कि यह प्रथा कुरान के मूल सिद्धांत के खिलाफ है. प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने 365 पेज के फैसले में तीन तलाक यानि कि तलाक-ए-बिद्दत को निरस्त करते हुए इस प्रथा पर छह महीने की रोक लगाने की हिमायत के साथ-साथ सरकार से कहा कि वह इस संबंध में कानून बनाए. निर्णय में यह भी कहा गया कि यदि केन्द्र छह महीने के भीतर कानून नहीं बनाता है तो तीन तलाक पर यह अंतरिम रोक जारी रहेगी.


सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार द्वारा द मुस्लिम वीमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स इन मैरिज एक्ट नाम से विधेयक लोकसभा में पेश किया गया. लोकसभा ने इस मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2017 को मंजूरी दे दी. इसके बाद इसे कानून बनाने की दृष्टि से उच्च सदन यानि कि राज्यसभा में भेजा गया. राज्यसभा में केंद्र सरकार का बहुमत न होने के कारण सभी को इस बात का अंदेशा था कि वहां विपक्ष इस विधेयक को पारित नहीं होने देगा, और ऐसा हुआ भी. इस विधेयक को प्रस्तुत करते समय कानून मंत्री ने सदन से चार अपील की थी कि इस बिल को सियासत की सलाखों से ना देखा जाए, इस बिल को दलों की दीवारों में ना बांटा जाएइस बिल को मजहब के तारजू पर ना तोला जाए और इस बिल को वोट बैंक के खाते से ना देखा जाए. उसके बाद भी तमाम राजनैतिक दलों द्वारा भी इस विधेयक के विरोध में उठाया गया कदम समझ से परे है. विधेयक में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि अगर कोई तीन तलाक देता है तो उसको तीन साल की सजा के साथ जुर्माना होगा. इसके अनुसार पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है. इस मुद्दे पर अंतिम फैसला न्यायाधीश ही करेंगे.

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और केंद्र सरकार की तत्परता को देखते हुए जहाँ मुस्लिम महिलाओं में प्रसन्नता का माहौल बना वहीं कट्टर इस्लामिक व्यक्तियों में इसे लेकर आक्रोश देखने को मिला. केंद्र सरकार के इस फैसले का विरोध ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा किया गया है. बोर्ड का कहना है कि यह उनका मजहबी मामला है और इसमें किसी बाहरी का हस्तक्षेप मंजूर नहीं. तलाक-ए-बिद्दत को बोर्ड शरीयत का कदम स्वीकारता है और इसे कुरान की सहमति बताता है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा जिस कुरान की दुहाई दी जा रही है, जिस शरीयत की बात की जा रही है उसमें भी इस तरह के कृत्य का प्रावधान नहीं है. इस्लाम में भी तलाक को बुरा माना गया है. इसके बाद भी ऐसी व्यवस्था की गई है कि यदि पति-पत्नी में किसी भी तरह से सामंजस्य नहीं हो पा रहा है तो वे अलग होकर अपनी ज़िन्दगी को अपनी मर्ज़ी से बिताएं. इसी कारण से विश्व भर में कानूनन तलाक़ की व्यवस्था को संवैधानिक स्थिति प्राप्त है. इस्लाम में भी पैगम्बरों के दीन (धर्म) में तलाक़ की गुंजाइश बनाये रखी गई है. कुरान में कहा गया है कि अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है. (सूरेह निसा-35). कुरान में इसके बाद इद्दत की व्यवस्था है और यदि पति, पत्नी में इस दौरान सुलह हो जाती है तो तलाक का फैसला वापस लिया जा सकता है. इस सम्बन्ध में सूरेह बक्राह-229 में व्यवस्था है कि फिर अगर शौहर बीवी में इद्दत के दौरान सुलह हो जाए, तो फिर से वो दोनों बिना कुछ किए शौहर और बीवी की हैसियत से रह सकते हैं. इसके लिए उन्हें सिर्फ इतना करना होगा कि जिन गवाहों के सामने तलाक दी थी, उन्हें खबर कर दें कि हमने अपना फैसला बदल लिया है, कानून में इसे ही रुजू करना कहते हैं और यह ज़िन्दगी में दो बार किया जा सकता है, इससे ज्यादा नहीं.

मुस्लिम पर्सनल बोर्ड को शायद ये बातें दिखाई नहीं देती हैं या फिर वह किसी राजनैतिक लाभ के चलते मुस्लिम महिलाओं के हितार्थ बनने वाले इस कानून का विरोध कर रहे हैं. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि जब तीन तलाक को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जब तीन तलाक व्यवस्था को गैर-कानूनी अर्थात अपराध बताया गया है तो फिर ऐसे अपराध की सजा में क्या समस्या है. इस विधेयक के विरोधियों द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा रहा है कि आखिर तीन साल की सजा होने पर, यह मामला गैर-जमानती होने का क्या दुष्प्रभाव समाज पर पड़ेगा? दरअसल जिस तरह की मजहबी कट्टरता इस्लाम में अभी तक व्याप्त है उसके अनुसार इस्लामिक कट्टरपंथी किसी भी रूप में अपनी महिलाओं को स्वतंत्र देखना नहीं चाहते हैं.


अब जबकि केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालयय के निर्णय के बाद सक्रियता दिखा रही है तब सभी लोगों को मिलकर मुस्लिम महिलाओं के हितार्थ आगे आने की आवश्यकता है. एक बार में, एकसाथ तीन तलाक बोलकर, ई-मेल करके, लिखकर, मोबाइल से सन्देश भेजकर आदि तमाम तरह से मुस्लिम महिलाओं को बेघर कर दिया जाता रहा है. उस समय तमाम राजनैतिक दलों ने, मुस्लिम बोर्ड ने विचार नहीं किया कि उन महिलाओं का सहारा कौन बनेगा? उनके लिए गुजारा भत्ता कहाँ से आएगा? उनके बच्चों का भविष्य क्या होगा? अब जबकि ऐसा कृत्य गैर-जमानती अपराध बनने वाला है, तीन साल सजा का प्रावधान होने वाला है तब सभी को इसकी चिंता सताने लगी. देखा जाये तो यह पूरी तरह से वोट-बैंक का खेल है. भाजपा के बढ़ते जनाधार के चलते सभी तरफ से अपनी-अपनी जमीन खो चुके राजनैतिक दलों के पास और कुछ शेष नहीं है. वे अपने खोये हुए जनाधार को इस विधेयक के विरोध के बहाने वापस पाने का मंसूबा लगाये बैठे हैं. इससे पूर्व भी शाहबानो प्रकरण में राजनीति अपना खेल दिखाकर मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ काम कर चुकी है. अब इक्कीसवीं सदी में कम से कम देश में इस बदलाव के प्रति सकारात्मकता दिखाए जाने का अवसर है. केंद्र सरकार मुस्लिम महिलाओं के हितार्थ कार्य कर ही चुका है अब विपक्ष के पास अवसर है कि वह इस विधेयक के पक्ष में खड़े होकर अपनी स्थिति को कुछ हद तक सुधार ले. न सही मुस्लिम महिलाओं के हितार्थ, अपने मुस्लिम वोट-बैंक को वापस पा लेने के अपने राजनैतिक लाभ के लिए ही इस विपक्ष को विधेयक के पक्ष में खड़ा होना चाहिए.