19 नवंबर 2025
Men's Day पर महिलाओं की बधाई, शुभकामना??
12 अप्रैल 2025
तीस लाख वर्ष की मातृशक्ति 'लूसी'
इथियोपिया में 1975 में एक कंकाल मिला था. जाँच के
बाद बताया गया कि यह कंकाल लगभग तीस लाख साल पहले पृथ्वी पर रहने वाली एक औरत का है.
इसे इस दुनिया का सबसे पुराने मानव कंकाल के रूप में चिन्हित किया गया. जाँच से
जानकारी मिली कि यह कंकाल ऑस्ट्रेलोपिथेकस एफरेंसिस प्रजाति का है, जो लगभग बत्तीस
लाख वर्ष पुराना माना जा रहा है. इस कंकाल के मिलने के
बाद से ही इस पर अनेक तरह के शोध किये गए, अनेक तरह से इसकी
वास्तविकता को सामने लाने का प्रयास किया गया. कंकाल का वास्तविक स्वरूप सामने
लाने के लिए लगातार शोध भी चल रहे थे.
इसी सन्दर्भ में एक
खबर सामने आई कि वैज्ञानिकों की एक टीम ने फॉरेंसिक फेसियल रिकंस्ट्रक्शन तकनीक से
कंकाल की खोपड़ी के थ्री-डी स्कैन और चिम्पांजी के सॉफ्ट टिशू डाटा की सहायता ली.
वैज्ञानिकों की टीम ने इस तकनीकी की मदद से कंकाल की खोपड़ी का लगभग वास्तविक चेहरा
बना लेने में सफलता प्राप्त कर ली. इस चेहरे का अनुमानिक आकार पाने के बाद
वैज्ञानिकों ने इस कंकाल या कहें कि कंकाल से बने चेहरे का नाम लूसी रखा. इस कंकाल
की अनुमानित लम्बाई साढ़े तीन फीट है.
मानवीय सभ्यता के
सबसे पुराने पूर्वजों में से एक लूसी का चेहरा, भले ही यह काल्पनिक अथवा तकनीक से
उत्पन्न हुआ हो, इसे
देखना रोमांचकारी है. इस चेहरे के द्वारा अपने अतीत से जुड़ना निश्चित ही अद्भुत है, रोमांचक है. तकनीकी सहायता से कंकाल से निर्मित चेहरे लूसी को नमन, लूसी के रूप में लाखों-लाखों वर्ष पहले की मातृशक्ति को नमन.
08 मार्च 2024
आठ मार्च महिला दिवस पर विचार करिए
आज है अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस और चारों तरफ कार्यक्रमों
की औपचारिकता का निर्वहन दिखाई दे रहा है. जगह-जगह संगोष्ठियों, सभाओं, भाषणों,
रैलियों आदि की औपचारिकता निभाई जाने लगी है. सरकारी संगठनों के
साथ-साथ उन स्वयंसेवी संगठनों की मजबूरी भी है जो महिला-सशक्तीकरण के लिए कार्य कर
रहे हैं कि वे इस दिन पर कार्यक्रम करें, सिर्फ करें ही नहीं
अवश्य ही करें. यदि भाषणों, रैलियों, कार्यक्रमों
से ही विकास होना सम्भव होता तो हमारा मानना है कि सबसे अधिक विकास हम भारतवासियों
ने ही किया होता. आये दिन की भाषणबाजियों और सभाओं के बाद भी विकास वहीं का वहीं
है, नारियों की स्थिति वहीं की वहीं है, कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति वहीं की वहीं है, स्त्री-पुरुष
लिंगानुपात वहीं का वहीं है. केवल भाषणों से नारी की स्थिति को सुधारा नहीं जा
सकता है, यह चाहे पुरुषों द्वारा किया जा रहा हो या फिर खुद
महिलाओं द्वारा.
कुछ बिन्दु ऐसे है जिन पर बिना किसी पूर्वाग्रह के
विचार अवश्य होना चाहिए.
स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगत सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, चन्द्रशेखर आजाद आदि अनेक महापुरुषों का नाम किस लड़के के कारण चल रहा है?
सवाल बहुत हैं पर जवाब.......???
जवाब हमें ही देना होगा, मात्र किसी दिवस की औपचारिकता को
पूरा करने के लिए ही आवाज उठाना और फिर शान्त हो जाना नैतिक नहीं है. समाज के सभी
वर्गों को प्रयास करने होंगे, एकसाथ करने होंगे.
पुरुष-स्त्री को आपसी विभेद को दूर करना होगा. क्या
आधुनिकता का, ज्ञान का, अहम का रंग
अपने ऊपर चढ़ा चुके स्त्री और पुरुष (दोनों को विचारना होगा) इस बात को समझेंगे?
06 मार्च 2023
कट्टरवाद से लड़ती ईरान की बेटियाँ
सम्पूर्ण विश्व में
एक तरफ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन होने जा रहा है, दूसरी तरफ ईरान में महिलाओं
के साथ दरिंदगी दिखाई जा रही है. महिलाओं द्वारा हिजाब के खिलाफ चल रहे आंदोलन के
बीच सैकड़ों लड़कियों को स्कूल जाने से रोकने की कोशिश की जा रही है. इनको जहर
देकर मारने का हथकंडा अपनाया जा रहा है.
ईरान में हिजाब का
विरोध उस समय शुरू हुआ जबकि सितम्बर 2022 में एक लड़की महसा अमीनी की मौत पुलिस
हिरासत में हो गई. उसे ठीक तरह से हिजाब नहीं पहनने के कारण गिरफ्तार किया गया था.
पुलिस हिरासत में उसकी रहस्यमय तरीके से मौत के बाद पूरे ईरान में महिलाओं का
गुस्सा फूट पड़ा. सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हुए और देखते ही देखते ही यह बड़े
आंदोलन में बदल गया. इस
आन्दोलन में महिलाओं की व्यापक भागीदारी हुई. सभी उम्र और पृष्ठभूमि से आने वाली
महिलाएँ न्याय, सुधार और अपने अधिकारों की माँग के लिए
सड़कों पर उतरीं. ईरानी महिलाओं पर शासन के सख़्त नियंत्रण की खुली अवहेलना के रूप
में कई महिलाओं ने अपने स्कार्फ जला दिए, अनेक ने अपने बाल काट लिए. प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए
सरकार घातक बल का उपयोग करने से हिचक नहीं रही है. ईरान की मानवाधिकार संस्थाओं के
अनुसार इस आंदोलन में अब तक मरने वालों की संख्या लगभग 200 तक पहुँच चुकी है.
महिलाओं के
सन्दर्भ में ईरान की स्थिति सुखद नहीं कही जा सकती है. यहाँ के एक कानून के अनुसार
ईरान में कानून है कि एक पिता अपनी ही गोद ली हुई बेटी से निकाह कर सकता है. महिलाओं
को देश से बाहर जाने के लिए अपने पति से अनुमति लेनी पड़ती है. महिलाओं को ढीले-ढाले
कपड़े पहनने को कहा जाता है. अगर कोई महिला इसका उल्लंघन करती है तो ईरान पुलिस को
उस महिला को पीटने और उसे छह महीने तक जेल में रखने का अधिकार है. महिलाओं पर नजर
रखने के लिए सन 2005 में
गश्त-ए-इरशाद का गठन किया गया. यह एक तरह की पुलिस टुकड़ी है जो शहरों में महिलाओं
पर नजर रखती है कि वे कानून के अनुसार कपड़े पहन रही हैं या नहीं. वे लगाये गए
प्रतिबंधों का पालन कर रही हैं या नहीं. अगर कोई इनका पालन नहीं करता तो यह पुलिस
उन्हें सजा देती है.
ईरानी महिलाओं ऐसी
स्थिति सदैव से नहीं रही है. सन 1979 से पहले ईरान में मोहम्मद रेजा पहलवी का शासन था जो एक पढ़े-लिखे, धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक विचारों वाले व्यक्ति थे. उनकी आधुनिक नीतियों ने
महिलाओं को स्वतंत्रता दे रखी थी. उनके पास हिजाब पहनने का विकल्प था. सन 1963
में वोट देने का अधिकार प्राप्त हुआ. परिवार संरक्षण अधिनियम ने
महिलाओं के लिए विवाह की आयु बढ़ा दी, बहुविवाह को कम कर
दिया, अस्थायी विवाहों पर प्रतिबंध लगा दिया और इसमें
धर्मगुरुओं की भूमिका को कम कर दिया. तब यहाँ का समाज बहुत खुले विचारों वाला था.
लोग धार्मिक पाबंदियों से दूर थे. वहाँ की महिलाएँ पुरुषों की तरह ही स्वतंत्र
थीं. वे अपनी मर्जी से हर तरह के कपड़े पहन सकती थीं.
सन 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति ने
राजशाही का अंत कर दिया गया. देश में अयातुल्ला खुमैनी ने सर्वोच्च नेता के रूप
में एक इस्लामिक शासन स्थापित किया. महिलाओं की चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार
द्वारा तत्काल कोई कदम नहीं उठाया गया. इसके उलट उनकी आज़ादी पर नियंत्रण करने के लिए सख़्त कानून बना दिए गए. इससे महिलाएँ सार्वजनिक
जीवन से बाहर हो गईं. सन 1979 तक महिला अधिकारों को लेकर जो प्रगति हुई थी वो एक
झटके में रुक गयी. परिवार संरक्षण कानून को निरस्त कर
हिजाब पहनने को अनिवार्य कर दिया गया. महिलाओं की आज़ादी पर भले ही व्यवस्थित
तरीक़े से कुठाराघात किया गया था लेकिन उन्होंने इन प्रतिबंधों को चुपचाप स्वीकार
नहीं किया. उन्हें हिंसा के द्वारा इन कानूनों को मानने पर बाध्य किया गया. हिंसात्मक
दौर के बीच भी नब्बे के दशक में महिला कार्यकर्ताओं ने पारिवारिक कानूनों के द्वारा
अपने कुछ खोए हुए अधिकारों को प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया. इससे उन्हें
तलाक शुरू करने और बच्चों की संरक्षा सम्बन्धी अधिकारों को पुनः प्राप्त करने में
सफलता मिली.
एक तरफ शासन
द्वारा महिलाओं का हिंसात्मक दमन होता रहा दूसरी तरफ अपने अधिकारों, स्वतंत्रता के लिए महिलाओं का विरोध
चलता रहा. हिजाब के विरोध में भी महिलाएँ सालों से प्रदर्शन करती आ रही थीं. उनके 'नो टू हिजाब', 'माई स्टेल्थी फ्रीडम', ‘माई कैमरा इज़ माई वेपन’ और 'व्हाइट वेडनेस्डे'
जैसे अभियान लगातार चलते रहे. महसा अमीनी की मौत ने इन अभियानों के
लिए उत्प्रेरक का काम किया. जिसके चलते आज हिजाब और उस पर नज़र रखने वाली पुलिस के
विरोध में महिलाएँ आन्दोलनरत हैं. अब वे सडकों पर 'डेथ टू द
डिक्टेटर' और 'वूमेन लाइफ फ्रीडम'
के नारे लगाकर अपनी आज़ादी की माँग कर रही हैं. देखा जाये तो ईरान
में हिजाब विवाद से उत्पन्न स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है बल्कि यह वहाँ के लोगों
के गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति है. वर्तमान तकनीकी दौर ने महिलाओं को जुड़ने और
संगठित होने का अवसर प्रदान किया. आज ईरान में महिलाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय
समर्थन व्यापक नजर आ रहा है. ईरान को महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग से निष्कासित कर दिया गया है.
ईरान के अन्दर
महिलाओं द्वारा जबरदस्त हिजाब विरोधी आन्दोलन, सोशल मीडिया पर मिलते व्यापक समर्थन, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को
नियंत्रित करने सम्बन्धी कानूनों पर ईरान का विरोध होने के बाद ईरान सरकार ने भले
ही हिजाब सम्बन्धी कानून की समीक्षा करने को तैयार हो गई हो किन्तु इसके बाद भी महिलाओं
के विरुद्ध दमनकारी नीति में कोई कमी नहीं दिखाई पड़ी है. इसी क्रम में अब लड़कियों को
ज़हर देकर मारने, स्कूल, कॉलेजों पर सुनियोजित हमलों की खबरें सामने
आ रही हैं. इसके पीछे उद्देश्य यही है कि लड़कियाँ शिक्षा से वंचित होकर घरों में कैद
हो जाएँ.
ईरान खाड़ी का सबसे
ताकतवर मुस्लिम देश है जो शीघ्र ही परमाणु शक्ति संपन्न भी हो जाएगा. महिलाओं के लिए
जिस तरह संकुचित सोच का वाहक बना है वह उसे तालिबानी आतंकियों की श्रेणी में लाकर खड़ा
करता है. महिलाओं के अधिकारों के समर्थन में पिछले कुछ समय में बड़े आंदोलन देखने को
मिले, जिसमें हिजाब को इस्लामी कट्टरवादी सोच का प्रतीक मानकर विरोध शुरू हुआ. सरकार
और महिलाओं के वर्तमान संघर्ष के चलते महिलाओं को नियंत्रित करने वाले क़ानूनों को
और सख़्त बना दिया जाएगा या फिर ईरान सुधार के नए युग में प्रवेश करेगा. अब देखना
यह है कि महिलाओं के क्रांतिकारी आन्दोलन में क्या ईरान के सत्तासीन किसी बदलाव के
लिए तैयार हैं? क्या यह आन्दोलन ईरान की तालिबानी सोच वाले शासन को उखाड़ सकेगा?
16 दिसंबर 2020
सहायता करने की सच्ची मानसिकता का प्रेरणादायी उदाहरण
सुबह लगभग दस बजे का समय है. बाजार में हलचल अभी शुरू होती जा रही है. दुकानें भी आराम-आराम से खुलती दिख रही हैं. ऐसी ही सामान्य सी सुस्त सुबह में सड़क के किनारे एक महिला बेहोशी की हालत में सड़क किनारे गिरी हुई है. वह अकेली नहीं है बल्कि उसके आसपास कई लोगों की भीड़ भी है. भीड़ भले ही ऐसी न हो जिसे बहुत बड़ी भीड़ कहा जाये मगर इतनी अवश्य है जो सड़क किनारे अचेतावस्था में गिरे किसी भी व्यक्ति की मदद कर सकती है. उस सुबह की भीड़ भी इतनी थी जो उस महिला की सहायता कर सकती थी. इसके बाद भी भीड़ बस तमाशा बने उस महिला को देखे जा रही थी. रुकने वाले रुक जाते थे और रुक कर एक नजारा देख चलने वाले फिर अपने रास्ते चल देते थे. उस रुकी भीड़ में कुछ युवा भी थे, कुछ पुरुष भी, कुछ लड़के भी मगर जिस तरह से स्त्री, पुरुष विभेद विगत कुछ वर्षों में समाज में बना दिया गया है, उससे शायद उनकी भी हिम्मत न पड़ रही थी उस महिला की सहायता करने की. इसके अलावा पुलिस, कानून के तमाम चकल्लस देखते हुए भी बहुत से लोग उस सड़क किनारे बेहोश पड़ी महिला से दूरी बनाये रखे होंगे.
उसी समय एक महिला का सड़क के दूसरी तरफ से निकलना हुआ. दूसरी तरफ से इसलिए क्योंकि उस सड़क पर आवागमन के लिए बने डिवाईडर न केवल सड़क को अलग-अलग भागों में बाँट रहे थे बल्कि सड़क पर चलने वालों को भी दो हिस्सों में अलग-अलग किये हुए थे. समाज में सभी एक प्रवृत्ति के नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे कि हमारे शरीर से जुड़ी सभी उँगलियाँ एक जैसी नहीं होतीं. इस एक जैसी प्रवृत्ति न होने के कारण अपनी स्कूटी से सड़क के दूसरी तरफ से चली जाने वाली उस महिला ने सड़क के दूसरी तरफ, डिवाइडर के उस पार कुछ असामान्य सा देखा-समझा. उस महिला ने स्कूटी को वापस सड़क किनारे गिरी अचेत महिला के पास लाकर रोका और फिर जैसा कि किसी भी जागरूक, संवेदित व्यक्ति को करना था, उसने अपना काम शुरू किया.
स्कूटी से उतर कर उस महिला ने अपने बैग से पानी की बोतल निकाल कर अचेत महिला को होश में लाने का उपक्रम शुरू किया. सजग महिला की हिम्मत, उसकी सक्रियता देख आसपास खड़े कुछ युवकों ने भी अपना सहयोग देना शुरू किया. इतनी देर के बाद जब भीड़ का हिस्सा न बन, एक सक्रिय महिला ने अपनी सजगता दिखाई तो उस अचेत महिला की बंद हथेलियों में से एक में कोई फोटो सी दिखाई दी और दूसरी में एक मोबाइल नंबर लिखा नजर आया. या भी सबकुछ भीड़ को नहीं बल्कि उस स्कूटी वाली महिला को नजर आया. उन्होंने अपने मोबाइल से तत्काल उस नंबर पर बात की. वो नंबर उस अचेत महिला के किसी रिश्तेदार का नहीं था. अब भी स्थिति ज्यों की त्यों थी कि वो महिला कौन है? वह सड़क पर अचेत क्यों पड़ी हुई है? उसके हाथ में लिखा नंबर किसका है? उसकी दूसरी हथेली में दबी फोटो किसकी है? वह यहाँ अचेतावस्था में कैसे पहुँची?
इस बीच उस जागरूक महिला के कहने पर किसी व्यक्ति ने एम्बुलेंस को फोन करके बुलाया. तब तक महिला भी कुछ होश में आती नजर आई. एम्बुलेंस आकर उस महिला को जिला चिकित्सालय ले गई. सक्रिय, जागरूक महिला अपने कार्यक्षेत्र को चल दी, भीड़ अपने-अपने विचार-तर्क गढ़ते हुए अपने-अपने रास्ते चल दी. बात यही समाप्त नहीं हुई, जो सजग रहता है, वह सदैव सजग रहता है. अचेत महिला की सहायता को रुकी उस महिला ने लगातार अपने फोन से चिकित्सालय प्रशसान से, पुलिस प्रशासन से संपर्क बनाये रखा. अंततः जब सुखद खबर ये मिली कि वह अचेत महिला, जो किसी संदेहास्पद वस्तु के खा लेने से अचेत हो गई थी, अब स्वस्थ है, खतरे से बाहर है.
यह पूरी घटना जनपद जालौन के उरई शहर की है. इस घटना को यहाँ सामने लाने का उद्देश्य महज इतना है कि उरई जैसे छोटे से शहर में भी जहाँ कि परिचय का दायरा आसानी से बड़ा किया जा सकता है, वहाँ भी सड़क किनारे अचेत पड़ी एक महिला सहायता को तरसती है. उसके चारों तरफ जमा भीड़ सिर्फ तमाशबीन बनी रहती है. इसके पीछे भले ही कानूनी लफड़े की बात हो या स्त्री, पुरुष विभेद की बात मगर स्थिति सुखद नहीं कही जाएगी.
अब आपको मिलवा दें उस महिला से जो अचानक से उस रास्ते से गुजरीं और बिना किसी लफड़े, समस्या की परवाह करते हुए उस अचेत महिला की सहायता में जुट गईं. वे डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी हैं जो वर्तमान में गांधी महाविद्यालय, उरई में मनोविज्ञान विभाग में कार्यरत हैं साथ ही संगीत, समाजसेवा के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं. वे जनपद के ही नहीं बल्कि प्रदेश के अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार से सम्बद्ध हैं. सामाजिक सक्रियता बनाये रखना, लोगों की मदद करना उनके खून में है, उनके स्वभाव में है. इसी के चलते उन्होंने बिना किसी तरह की देरी किये, बिना अच्छा-बुरा सोचे उस अचेत महिला की सहायता की.
इस घटना को सामने लाने का उद्देश्य यही है कि हममें से बहुत से लोग कानूनी दांव-पेंच, पुलिस प्रशासन के रवैये से डर कर, घबरा कर बहुत बार सहायता देने से बचते हैं. ऐसा होना नहीं चाहिए. यदि हम अपने आपमें सशक्त हैं, ईमानदार हैं और निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता कर रहे हैं तो किसी तरह की समस्या नहीं आती है. हम सभी को डॉ० विश्वप्रभा त्रिपाठी जी के इस कदम से सीखने की आवश्यकता है, प्रेरणा लेने की आवश्यकता है. इसी तरह से एक-एक करके समाज की नींव बनती है, समाज की आधारशिला मजबूत होती है, समाज की इमारत भव्य बनती है.
25 अक्टूबर 2020
रावण को आदर्श मानने वालों/वालियों के लिए
इधर देखने में आ रहा है कि विजयादशमी आते-आते बहुत से लोगों (विशेष रूप से महिलाओं) को रावण बहुत पसंद आने लगता है. बहुतेरी तो रावण जैसा भाई पाने की कामना जैसी बातें भी सार्वजनिक रूप से करने लगती हैं. इसी से सम्बंधित पोस्ट सोशल मीडिया पर लगाई, जिस पर बहुत सारी टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं. दो टिप्पणी खुद में विशेष समझ आईं, वही आज की पोस्ट के रूप में.
+++++
रावण को पति के रुप मे पाने की चाह रखने वाली फेमिनिस्ट सुंदरी से मेरे चंद सवाल......
हमारे
पुराणों के अनूसार....
रावण
की तीन पत्नियां थी
पहली
का नाम मंदोदरी
दुसरी
का नाम दम्यमालिनी
तीसरी
का नाम अज्ञात है पर इसके रावण से तीन पुत्र थे
देवांतक
, नरांतक और प्रहष्था जिसका रामानंद सागर जी
के
बनाई रामायण धारावाहिक में भी उल्लेख है
और
रावण ने अपनी तीसरी पत्नि की हत्या कर दी थी....
.
और
भी रावण के कहानियां हैं....
.
एक
रावण ने मंदोदरी की बड़ी बहन से बलात्कार करने की
कोशिश
की थी जिसमे वो असफल रहा था...
.
एक
रावण ने अपने सौतेले छोटे भाई कुबेर की पत्नी रंभा से
बलात्कार
किया था जिसके फलस्वरूप उसे कुबेर ने श्राप
दिया
था कि वो किसी भी महिला के मर्जी के विरूद्ध अगर
उससे
संसर्ग करने की कोशिश करेगा तो उसके मस्तक के
सैकड़ो
टुकड़े हो जायेंगे , तभी वो सीता मैया से जबरदस्ती
विवाह
नही कर पाया...
.
एक
रावण ने वेदवती नामक महिला से उस समय बलात्कार
करने
की कोशिश की जब वो श्री हरी विष्णु को पति के रुप
में
पाने के लिए तपस्या कर रही थी उसके उस कुकृत्य की
वजह
से वेदवती ने तपस्या में ही प्राण त्याग दिये ....
.
एक
रावण वो था जिसकी तीन पत्नियों के अलावा हजारों
दासियां
थी जिस से वो समय समय पर संसर्ग करता रहता
था....
.
तो
है रावण को पति रूप में पाने की चाह रखने वाली लंकनी
रुपी
मंदोदरी....
तुम इन में से किस बलात्कारी रावण रूप से विवाह करना चाहोगी ???
+++++
रावण
को भाई के रूप में वही पसन्द कर सकती है जिसका चरित्र सूर्पनखा जैसा हो। जो वन-वन घूम
कर दूसरी स्त्रियों का पति चुराती हो। या जो किसी सुन्दर स्त्री को देखे तो अपने भाई
को उसका हरण करने के लिए प्रेरित करे। ऐसी स्त्रियाँ कभी आदर्श नहीं हो सकतीं।
रावण
को भाई के रूप में वही पुरुष पसन्द करता है जिसका चरित्र कुंभकर्ण जैसा हो। जो सज्जन
होने के बावजूद भाई के कुकर्मों के समय आंख बंद कर ले। ऐसे लोग कभी अनुकरणीय नहीं हो
सकते।
रावण
को पति के रूप में वही स्त्री पसन्द कर सकती है, जो अपने पति
को हजार टुकड़ों में बंटते देख सकती हो। जो देख सकती हो कि उसका पति यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर, राक्षस, यवन सभी जाति की स्त्रियों का हरण करे और बलपूर्वक
अपनी पत्नी बना कर रखे। जो सहन कर सकती हो कि उसका पति उसकी किसी भी बात को न माने...
वह गिड़गिड़ाती रहे, पर उसका पति उसकी बात अनसुनी कर के पाप करता
रहे।
रावण
को मित्र के रूप में वही पसन्द कर सकते हैं जिनका चरित्र बाली के जैसा हो। जो अपने
छोटे भाई की स्त्री को बलपूर्वक छीनने में लज्जा का अनुभव नहीं करता हो। जो तारा जैसी
विदुषी पत्नी की भी कोई बात नहीं मानता हो। ऐसे लोग भी सम्मान के योग्य नहीं होते।
रावण
को अपना नायक वही मान सकते हैं जिन्हें न धर्म का ज्ञान है, न
वेद का। रावण उन राक्षसों का नायक था जो ऋषियों के हवन कुंड में हड्डियां डालते थे,
जो ऋषियों को मार कर खा जाते थे, जो मनुष्यों को
जीने नहीं देते थे। रावण ऐसे ही अमानुषों का नायक हो सकता है।
रावण
को एक आदर्श पुत्र मानने वाले मूर्ख ही हैं, क्योंकि रावण के
कुकर्मों के कारण स्वयं उसके पिता ने उसका त्याग कर दिया था। जिस व्यक्ति के कारण उसका
लज्जित पिता नगर छोड़ दे, वह और कुछ भी हो आदर्श पुत्र नहीं हो
सकता।
रावण
ब्राह्मणों का नायक न था, न है, न होगा...
ब्राह्मणों के आदर्श हैं वे गुरु वशिष्ठ जिन्होंने राजकुमार राम को मर्यादा पुरुषोत्तम
राम बनाया। ब्राह्मणों के नायक हैं वे दधीचि, जिन्होंने धर्म
की रक्षा के लिए अपनी हड्डियां दान कर दी। आधुनिक काल मे भी ब्राह्मणों के नायक चाणक्य,
वर्षकार, पतंजलि, शंकराचार्य,
या करपात्री जी महाराज हैं, कोई रावण नहीं है।
रावण उन ब्राह्मण वंशियो को ही प्रिय हो सकता है जिन्होंने धर्म का त्याग कर वामपंथ
स्वीकार किया हो, वे इतने महत्वपूर्ण नहीं कि वे ब्राह्मणों को
दिशा दें। मैं तो उन्हें ब्राह्मण ही नहीं मानता।
भारतीय लोक रावण को हर विजया के दिन बुराई के प्रतीक के रूप में जलाता रहा है, और जलाता रहेगा। आज भी, और हजार वर्ष बाद भी... लोक किताबी विचारकों की बात नहीं सुनता, उसकी गोद में रोज हजारों चार्वाक, मार्क्स, कन्फ्यूशियस जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। लोक अपने ही गति से मुस्कुराता हुआ चलता रहता है। यही भारत है...
17 अक्टूबर 2019
करवाचौथ व्रत नितांत व्यक्तिगत मामला है
05 सितंबर 2019
छोटी सी ज़िन्दगी ने बचाईं सैकड़ों ज़िंदगियाँ
03 जनवरी 2019
आज़ादी की चाह और बेड़ियाँ पहनने की आतुरता
28 अक्टूबर 2018
सेनेटरी नेपकिन पर आधुनिक महिलाओं की अमानुषिक सोच
27 अक्टूबर 2018
करवाचौथ पर आधुनिकतावादियों का असमंजस
12 अक्टूबर 2018
मीटू, मीटू रटे जमाना
15 मार्च 2018
रूढ़ियों को दरकिनार कर उड़ाया हवाई जहाज
09 मार्च 2018
दिव्या का सम्मान वास्तविक कार्य का सम्मान है
आज से नहीं बल्कि लगभग डेढ़-दो दशकों से अपने कार्य के प्रति समर्पण भाव लिए, समाजहित में खुद को चौबीस घंटे समर्पित किये, काम के प्रति एक जुनूनी हद तक जाकर वास्तविक काम करने वाले बहुत कम लोग देखने को मिलते हैं. बहुतेरे तो प्रचार की चकाचौंध में सिमट जाते हैं और अपने काम से ज्यादा अपने नाम के प्रचार में लग जाते हैं. इन सबसे बहुत अलग दिव्या ने न केवल खुद को सामाजिक कार्यों में लगा रखा है बल्कि जमीनी स्तर पर खड़ा कर रखा है. देश में तमाम तरह की प्राकृतिक आपदाओं में दिव्या उन सबके बीच खड़ी मिली, जिन्हें उसकी जरूरत थी. बाढ़ हो, भूकंप हो, आगजनी हो या फिर किसी और तरह की दुर्घटना दिव्या सब जगह बिना कुछ सोचे-बिचारे, बिना किसी आदेश की प्रतीक्षा के खड़ी मिली. न केवल वह वहां उपस्थित रही वरन खुद को काम के प्रति समर्पित करती रही. उसका काम हर बार बिना किसी अपेक्षा के आगे बढ़ता रहा. बिना किसी अपेक्षा के वह लगातार आगे चलती रही. उसके कार्य की निस्वार्थ भावना को जानने-समझने का दिन आखिर आ ही गया. उन सभी लोगों को, जो अपने काम के मूल्यांकन न होने की भावना से निराश होने लगते हैं, एक बात जान लेनी चाहिए कि ये समाज सबका मूल्यांकन करता है. आज नहीं तो कल, सभी को उसके कार्यों का प्रतिफल मिलता ही मिलता है. दिव्या को भी उसके कार्य का सुफल मिला.
गुजरात में यूनिसेफ के साथ सलाहकार के रूप में काम करने वाली दिव्या विगत कई वर्षों से जमीनी काम चुपचाप करने में लगी हुई है. विगत दो-तीन वर्षों से उसके द्वारा Volunteer Indians नाम से एक सार्थक प्रयास भी आरम्भ किया गया है. (फेसबुक पेज के लिए यहाँ क्लिक करें) कई वर्षों के समर्पित कार्य का प्रतिफल आज ये मिला कि उसे गांधीनगर (गुजरात) में UDGAM Women's Achiever's Award से सम्मानित किया गया. दिव्या को बधाई. साथ में उन सभी को भी बधाई जो बिना किसी प्रचार पाने की भावना के सत्यनिष्ठा से, पूरी ईमानदारी से अपना काम करने में लगे हैं. आज नहीं तो कल वे भी दिव्या की तरह प्रकाशित होंगे. सभी को शुभकामनायें.





















