अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

21 मई 2025

चाय की एक प्याली से बने रिश्ते की मिठास

1990 की बात है जबकि स्नातक की पढ़ाई हेतु ग्वालियर के साइंस कॉलेज में एडमिशन लिया और रहने के लिए आशियाना बनाया इसी कॉलेज के हॉस्टल को. प्रवेश की सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद अगस्त महीने में स्वतंत्रता दिवस के एक-दो दिन पहले हॉस्टल में अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर आ गए. पहली मंजिल पर मिला कमरा नंबर 11. पिताजी के अभिन्न परिचित सदस्य के बेटे राजीव त्रिपाठी हमारे रूम-मेट थे. राजीव का उरई से ही होने के कारण किसी अनजाने मित्र के साथ कमरे में रहने का डर-भय समाप्त हो चुका था.

 

यहाँ तक एक परिचय हॉस्टल के आरम्भिक दिनों से. पोस्ट का असल विषय तो ये है कि हॉस्टल के दिनों में चाय के कारण एक ऐसा रिश्ता बन गया जो कभी सोचा नहीं था. आज इस पोस्ट को लिखने का कारण भी यही है कि आज 21 मई को अन्तर्राष्ट्रीय चाय दिवस है और ऐसे में मन में आया कि चाय की और कोई महत्ता हो या न हो मगर हमारे लिए एक महत्ता ये है कि एक रिश्ता चाय के कारण बना जो आज भी पूरी गरिमा और स्नेह के साथ चल रहा है.

 

हॉस्टल में रहते हुए करीब दो महीने हो गए थे. रैगिंग जैसी किसी डरावनी चीज से हॉस्टल का नाता नहीं था बल्कि हम सभी छात्रों में आपस में बड़े-छोटे का नाता था. यहाँ सर या किसी और औपचारिक सम्बोधन के स्थान पर अपने से बड़ों को भाईसाहब कहने का चलन था. हॉस्टल का माहौल भी पूरी तरह से पारिवारिक था. न तो किसी कमरे में कोई ताला लगाता था और न ही किसी सामान में ताला लगा मिलता था. ऐसा लगता था जैसे सभी सामान एक-दूसरे का है. सभी के बीच आपस में कोई औपचारिकता नहीं. मैस में खाना खाते समय एक-दूसरे के सामान का उपयोग करना हो अथवा अन्य किसी वस्तु का उपयोग, कहीं कोई संकोच नहीं हुआ करता था.

 

बाँए से - अक्षय भाईसाहब, हम, राकेश भाईसाहब (हॉस्टल के दिन-बलवंत भैया पहाड़ी पर-1991)

हॉस्टल के उन दिनों में कैसे अचानक से चाय पीने की आदत लग गई, पता नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि जितना याद आ रहा है, चाय पीने की आदत जैसी इंटरमीडिएट तक नहीं पड़ी थी उस समय तक सामान्य ढंग से जितनी चाय एक दिन में पीने को मिलती थी, उतनी ही पी जाती थी. इधर हॉस्टल में रहने के कारण चाय पीने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं रहा सो खूब चाय पी जाने लगी. उस समय हॉस्टल में कई लोग थे जो चाय पीते थे मगर एक-दो लोग ही थे जो हॉस्टल में चाय बनाने की व्यवस्था किये थे. ऐसे एक-दो लोगों में एक हम थे, जिनके पास चाय से सम्बंधित समस्त सामग्री चौबीस घंटे उपलब्ध रहती थी. हमारे कमरे की कभी-कभी की बैठकी में कुछ मित्र, कुछ भाईसाहब के चाय का शौक पूरा हो जाया करता था.

 

उन्हीं दिनों हॉस्टल में कुछ नए साथियों का आना हुआ. शायद इसे ही संयोग कहा जायेगा या फिर पूर्व-निर्धारित लिखित विधि का विधान कि कई-कई नए सदस्यों के आने के बीच में दो लोगों से अनायास ही आकर्षण वाला परिचय हुआ, जैसे स्वतः ही. एक अक्षय कटोच भाईसाहब से और दूसरा नवीन शर्मा से. अक्षय भाईसाहब हमसे एक क्लास आगे थे और नवीन हमारे ही साथ. दो-चार दिनों की सामान्य मुलाकातों के बाद एक दिन मैस से रात का खाना खाकर निकलने पर अक्षय भाईसाहब ने रोका और बोले क्यों चिंटू, सुना है तुम अपने कमरे पर चाय बनाते हो? एकबारगी लगा कि कहीं ये कोई अपराध तो नहीं जो हमारे सीनियर द्वारा ऐसा सवाल किया गया मगर अगले ही पल खुद को संयमित करते हुए संक्षिप्त सा जवाब दिया, जी. ठीक है, जब रात में बनाओ तो एक कप हमें भी पिला दिया करना, अक्षय भाईसाहब का स्नेहिल आदेश हम तक आया और अक्षय भाईसाहब ग्राउंड फ्लोर के अपने कमरा नंबर 29 की तरफ चल दिए.

 

उसी रात को चाय बनाकर एक गिलास में चाय 11 नंबर कमरे से 29 नंबर कमरे तक जाती. ये क्रम लगभग हफ्ते-दस दिन चला कि एक दिन अक्षय भाईसाहब ने कहा कि क्यों अपने कमरे में अकेले चाय के लिए परेशान होते हो. यहीं आ जाया करो, सब लोग इकट्ठे चाय पिया करेंगे. उनका इकट्ठे चाय पीने के बारे में उनका खुद के साथ-साथ नवीन और राकेश शर्मा भाईसाहब की तरफ इशारा करना था. उसी रात जब चाय के लिए अक्षय भाईसाहब के कमरे में जाना हुआ तो चाय के सारे सामान के साथ उनका रूम भी सुसज्जित हमारा इंतजार कर रहा था. समय के साथ चाय, खाना-पीना, पढ़ाई, कॉलेज, बाजार आदि जाना एकसाथ होने लगा.

 



अक्षय भाईसाहब द्वारा उन्हीं दिनों कुछ बातें बहुत ही स्पष्ट रूप से समझाई गईं, जैसे कोई बड़ा समझाता है उसका सुखद परिणाम ये है कि आज हॉस्टल छोड़े हुए अक्षय भाईसाहब को 33 वर्ष और हमें 32 वर्ष हो गए हैं मगर हमारे और उनके बीच एक चाय के साथ बना बड़े-छोटे भाई का रिश्ता आज तक पूरी ईमानदारी, पावनता के साथ चल रहा है. भाभी का स्नेह भी हमे उसी तरह से मिलता है जैसे किसी देवर को मिलता होगा. अक्षय भाईसाहब को लेकर हमारे और भाभी के बीच में खूब मजाक होता है. अक्सर सामने होने पर भाईसाहब बस ख़ामोशी से हँसते हुए इधर-उधर हो लेते हैं.

 

वाकई सोच में, मानसिकता में, व्यवहार में, बर्ताव में यदि ईमानदारी है, निष्ठा हो, स्नेह हो, आदर हो तो एक प्याली चाय के साथ बने संबंधों में, रिश्तों में मिठास सालों-साल बनी रहती है.


21 मई 2022

चाय की चुस्कियों वाली महफ़िलें

सुबह की गरमागरम चाय पी लेने के बाद जब मोबाइल खोला तो मालूम चला कि आज अन्तर्राष्ट्रीय चाय दिवस है. चाय के बहुत बड़े चिलमची होने के बाद भी अक्सर इस दिन को भूल जाते हैं. ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि अब चाय हमारी जीवन-शैली में ऐसे शामिल हो गई है, जैसे साँस लेना. न हम साँस लेना याद रखते हैं, न भूलते हैं. कुछ ऐसा ही चाय को लेकर है. हँसी-मजाक के दौर में हम अक्सर सबसे यही कहते हैं कि यदि किसी को अपनी कोई समस्या सुलझानी हो, कोई रुका काम करवाना हो तो हमारा नाम लेकर, दो कप चाय चढ़ा दिया करे, जब हम मिलें तो हमें पिला दिया करे. ऐसा करने से सारे बिगड़े काम बन जाते हैं. 


बहरहाल, चाय दिवस के बारे में जैसे ही जानकारी हुई तो बहुत सी बातें याद आने लगीं. चाय से जुड़ी बहुत सी कहानियाँ हमारे साथ जुड़ी हुई हैं. इसके पीछे का कारण यह है कि हमारे सभी परिचितों को हमारा चाय शौक बहुत अच्छे से पता है. हमारा एक दोस्त तो आज भी कहता है कि कभी यदि गलती से ज्यादा चाय बन जाये तो परेशान न हो, बस कुमारेन्द्र को बुला लो. ये चाय का बल्क कंज्यूमर है. ऐसा सच भी है. कॉलेज टाइम में अक्सर चाय को लेकर शर्त जैसी अघोषित स्थिति बनी रहती थी. एक-एक बैठकी में दस-बीस गिलास चाय ऐसे गटक ली जाती थी जैसे हवा गटक रहे हों. गरम चाय पीने की आदत शुरू से ही थी मगर इस आदत में वृद्धि हॉस्टल में रहने के दौरान हो गई. उन दिनों बहुत सीमित जेबखर्च मिला करता था. चाय की तलब घनघोर रहती थी. उस पर विपदा ये कि कभी अकेले चाय पीना होता नहीं था. दो-चार यार-दोस्त संग रहते ही थे. तब आर्थिक समस्या से निपटने के दौर में एक रास्ता खोजने की कोशिश की जाती कि जो सबसे अंत में चाय पिएगा, वही भुगतान करेगा. ऐसे में जल्दी-जल्दी चाय पीने की आदत भी बन गई. हालाँकि इस नियम का कोई गज़ट पास तो हुआ नहीं था कि ऐसा होना ही होना है, बस तफरी के लिए, हाहा-हीही के लिए यह भी मौज होती रहती थी.




चाय का ही कमाल कहा जायेगा कि उसने हॉस्टल में हमें बड़े भाई जैसे रिश्ते से भी परिचित करवाया. पहली साल थी हॉस्टल में. अभी कुछ महीने ही हुए थे हमको. चूँकि चाय के जबरदस्त शौक़ीन होने के कारण हम हॉस्टल में अपने कमरे में चाय का पूरा इंतजाम किये रहते थे. उन्हीं दिनों हमसे एक साल आगे अक्षय भाईसाहब का हॉस्टल में आना हुआ. वे भी खूब चाय पिया करते थे. चाय की महक उड़ती हुई ऊपर की विंग से नीचे की विंग तक पहुँची. अपने साथ-साथ हम भाईसाहब के लिए भी चाय बनाने लगे. उस चाय से बना बड़े-छोटे भाई का रिश्ता आज भी उसी जिन्दादिली से चल रहा है. भाईसाहब के साथ-साथ फिर तो चाय की चुस्कियों में और भी लोग शामिल होते चले गए.


समय के साथ यार-दोस्त अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त होते चले गए, हम भी अपनी दुनिया में खोते चले गए. इसी सब में चाय तो पी जाती रही मगर चाय की महफ़िलें ख़त्म हो गईं. हॉस्टल टाइम में कभी लल्ला, जगदीश के यहाँ की चाय की घंटों के हिसाब से लगती महफ़िलें, कभी देर रात सखा-विलास के ढाबों पर चाय की चुस्की बीच कहानियों का जन्म, कभी रेलवे स्टेशन की चाय के साथ बनते-बिगड़ते सपने आदि-आदि पीछे छूट गए. चाय का स्वाद तभी है जब यारों की महफ़िल हो, ठहाके हों, गप्पबाजी हो. चाय स्वाद भी तभी देती है जबकि हाथ में चाय का प्याला हो, गिलास हो और उसकी चुस्की के साथ कोई न कोई कहानी हो. चाय की वही पुरानी महफ़िल फिर गुलज़ार करने की कोशिश है.


.

15 दिसंबर 2019

इसीलिए तुम्हें चाय पे बुलाया है


आज 15 दिसम्बर को अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस मनाया जा रहा है. इसका मुख्य लक्ष्य चाय बागान से लेकर चाय की कंपनियों तक में काम करने वाले श्रमिकों की स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करना है. वर्ष 2004 में मुंबई में व्यापार संघों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की बैठक हुई. उसमें अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस मनाने का फैसला किया गया. भारत में इसकी शुरुआत वर्ष 2005 से की गई. एक साल बाद यह श्रीलंका में मनाया गया और वहाँ से यह आयोजन विश्वभर में फैल गया. पहली बार अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस 15 दिसंबर 2005 को मनाया गया था. अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस मनाने का उद्देश्य चाय उत्पादकों और चाय मजदूरों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए कोशिश करना रहा है. चाय के द्वारा उसके उत्पादक देशों को भले ही ढेर सारा लाभ मिलता हो मगर उन देशों के चाय बागानों के मजदूरों की हालत बहुत खराब होती है. उनको न तो उचित वेतन मिलता है और न ही काम करने की स्थिति भी अच्छी होती हैं. इन्हीं सबको ध्यान में रखते हुए सबसे पहले भारत ने इस दिवस के बहाने चाय मजदूरों की समस्याओं पर चर्चा का आरम्भ किया. इसलिए अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस पर चाय मजदूरों की काम की स्थिति, मजदूरों के अधिकार, दिहाड़ी, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर चर्चा को भी प्रोत्साहित करना है. इसके अलावा इस दिन को चाय पीने के शौक़ीन एक जश्न के रूप में भी मनाते हैं.


चाय के बारे में कहा जाता है कि सबसे पहले सन 1815 में कुछ अंग्रेज यात्रियों का ध्यान असम में उगने वाली चाय की झाड़ियों पर गया. इन झाड़ियों से स्थानीय कबाइली लोग एक पेय बनाकर पीते थे. जिसका स्वाद अंग्रेजों को बेहतर समझ आया और चाय के रूप में इसकी खोज बताई गई. भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड बैंटिक ने 1834 में चाय की परंपरा भारत में शुरू करने और उसका उत्पादन की संभावना तलाशने के लिए एक समिति का गठन किया. इसके बाद 1835 में असम में चाय के बाग़ लगाए गए. इसी के बाद से भारत में सन 1835 से चाय पीने की शुरुआत मानी जाती है. 

वर्ष 2019 अंतिम वर्ष है जबकि अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस का आयोजन 15 दिसम्बर को किया जा रहा है. आगे से यह दिवस अब 21 मई को मनाया जाएगा. ऐसा भारत की सिफारिश पर किया जा रहा है. दरअसल अधिकतर चाय उत्पादक देश में गुणवत्तापूर्ण चाय का उत्पादन मई से ही शुरू होता है. ऐसे में भारत की तरफ से संयुक्त राष्ट्र संघ को सुझाव दिया गया, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा स्वीकार कर लिया गया. एक रिपोर्ट के अनुसार समूचे विश्व में पानी के बाद सर्वाधिक उपयोग में आने वाला पेय पदार्थ चाय ही है. चाय के उत्पादन में लगे लोगों की समस्याओं का निराकरण हो. चाय पीने के शौकीनों को उनके मन की चाय अधिक से अधिक मिलती रहे. इसके अलावा जिनकी भी शादी का ख्याल कहीं उठा हो तो वहाँ से आवाज़ आती रहे कि इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है. तो फिर चाय पर चर्चा करिए और आगे से इस दिवस का आनंद लीजियेगा मई में.