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13 अक्टूबर 2021

विषयों के बदलते रास्ते

जिस तेज़ी से समाज में परिवर्तन दिखाई दे रहा है, उसी तेज़ी से यहाँ की चर्चाओं में भी परिवर्तन हो रहा है. सामान्य रूप से ऐसा लगता है जैसे समाज और यहाँ के चंद जागरूक नागरिक सामाजिक बदलाव लाने को सचेत हैं. वे इसी सचेतन दशा में इन चर्चाओं को आगे लाते रहते हैं. वैसे समाज में कहीं भी किसी बदलाव के लिए चर्चाओं का होना ज़रूरी है. समाज में ही क्या कहीं भी किसी तरह के परिवर्तन के लिए चर्चा होती ही है. घर में कोई काम होना है तो चर्चा तय है. किसी की पढ़ाई का मामला हो, किसी की शादी का मामला हो, किसी की ख़रीददारी होनी हो, किसी के रोज़गार का विषय हो सभी में चर्चा का होना मुख्य है. होना भी चाहिए क्योंकि चर्चा करने से सम्बंधित विषय पर उपयुक्त राय मिल जाती है या फिर सही राह दिख जाती है. वैसे भी समवेत चर्चा से निकले निर्णयों के आधार पर ठोस परिणाम मिलने की अपेक्षा रहती है. इस अपेक्षा पर वे चर्चाएँ ही खरी उतरती हैं जिनमें कुछ सार्थकता होती है. इधर कुछ समय से बदलाव के दौर से गुज़रता समाज अतिशय चर्चाबाज़ हो गया है. चंद सार्थक चर्चाओं के चारों तरफ़ निरर्थक चर्चाओं की भीड़ लगी हुई है. सबकी अपनी चर्चाएँ हैं, सबके अपने मंतव्य हैं. 

 

चर्चाओं के चलते दौर लगातार परिवर्तित होकर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ जाते हैं. वैसे इधर चर्चाओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अधिकता देखने को मिल रही है. चर्चा ही क्या दैनिक क्रियाकलाप भी इसी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं. स्त्री ने ये किया, उस महिला ने वो पहना, फ़लाँ लड़की का फ़लाँ लड़के के साथ चक्कर है, वो आदमी उस महिला को घूर रहा है, फ़लाँ लड़का रोज़ नई लड़की को घुमा रहा है, उस व्यक्ति ने उस महिला को छुआ, वो उसे देख मुस्कुराई, उसने उसे अजीब नज़रों से देखा आदि-आदि विषय तो रोज़ चर्चा में रहते ही हैं. इनके अलावा भी कुछ क्रांतिकारी विषय चर्चा में आने लगे हैं. इनके मूल में समाजिक बदलाव की बात कही जाती है, किसी गोपन विषय पर अगोपन होने की मंशा व्यक्त की जाती है, व्यक्तिगत विषयों पर खुली बहस करवाने की बात की जाती है. सोशल मीडिया पर एक हैशटैग आंदोलन शुरू होता है और फिर सब खुलकर चर्चाओं में शामिल होने लगते हैं. फिर चर्चा काम प्रदर्शन शुरू होने लगता है. कौन कितनी अश्लीलता से खुलकर सामने आ सकता है, इसकी होड़ लग जाती है. कौन कितना अशालीन लिख सकता है, इस पर ज़ोर दिया जाने लगता है. किसके विषयों में, भावाभिव्यक्ति में कामुकता अधिक समाहित हो सकती है, इसको प्रमुखता दी जाने लगती है. महिला-पुरुष सम्बन्धों के सार्थक, सकारात्मक विस्तार के लिए शुरू होने वाली चर्चाएँ देह-विमर्श के रूप में बदलने लगती हैं. किसके दाग़ अच्छे हैं, किसकी दैहिक संतुष्टि अधिक है, कौन कितने मिनट टिक सकता है आदि चर्चा के विषय बनने लगते हैं. 

 

स्त्री हो या पुरुष, उसके सम्बन्धों को जब तक देह की तराज़ू पर तौला जाता रहेगा तब तक खुला विमर्श कामुकता, अश्लीलता की कहानी ही लिखता रहेगा. जिस तरह स्त्री देह की समस्या को लेकर खुली चर्चा की वकालत की जा रही है, उससे क्या लगता है कि सारी समस्या सुलझ जाएगी? क्या लगता है कि आज के तकनीकी, इंटरनेट युग में लोगों को माहवरी, उसकी समस्या, स्त्री की परेशानी के बारे में जानकारी न होगी? क्या लगता है कि ऐसे लोग पैड के बारे में न जानते होंगे? क्या लगता है कि खुली चर्चा से सभी एक-दूसरे की मदद करने लगेंगे उन पाँच दिनों में? क्या खुली चर्चा की सार्थकता तब होगी जब पारिवारिक मर्यादा को भूल लोग आपस में उन दिनों की चर्चा करने लगेंगे? आधुनिकता के कथित आवरण को ओढ़कर हम सोचने लगे हैं कि खुले दिमाग़ और विचार के हो गए हैं. जहाँ आज भी परीक्षा ड्यूटी के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा लड़की के हाथों  नक़ल  पर्ची छीनना छेड़खानी माना जाता हो, बाज़ार में किसी सहायता के लिए महिला  पुकारना या उसकी तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाना फ़्लर्ट करना समझा जाता है, ज़हम महिला को देखना भी अपराध की श्रेणी में आता हो वहाँ ख़ुद महिलाओं से उनके पीरियड्स पर, पैड पर, उसके दाग़ पर खुली चर्चा की अपेक्षा करना समझा जा सकता है. ऐसे लोगों से, जो इस तरह के विषयों पर खुली चर्चा का दम भरते हैं, एक सवाल कि किसी ऐसी युवती जो अपने काम करने में सक्षम नहीं है, किसी परिस्थिति में उसके पिता, भाई द्वारा इसके पैड को बदलना-पहनाना सम्भव है

 

चर्चाएँ हों, खुलकर हों, इन्हीं विषयों पर हों पर उनके उद्देश्य को भटकाया न जाए, भटकने न दिया जाए. और ऐसा हाल-फ़िलहाल सम्भव नहीं दिखता है. 


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29 सितंबर 2018

ये दिल का मामला है जी!


विश्व हृदय दिवस प्रति वर्ष 29 सितम्बर को मनाया जाता है. अव्यवस्थित जीवन शैली और असंतुलित खानपान के कारण हृदय रोग पीड़ितों की संख्या तेजी से बढ़ी है. व्यस्त जिंदगी में लोग अपने स्वास्थ्य की तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिसके चलते उन्हें खामियाजा उठाना पड़ रहा है. हृदय रोग विशेषज्ञों के अनुसार दिल की बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है. ऐसा माना जाता है कि महिलाओं में हृदय रोग की संभावनाएं ज्यादा होती हैं. इसके बाद भी वे इसके जोखिमों को नजरअंदाज कर देती हैं. वर्तमान जीवन-शैली तनाव, थकान, प्रदूषण आदि अनेक कारणों से रक्त का आदान-प्रदान करने वाले इस अति महत्वपूर्ण अंग को अपना काम करने में मुश्किल होती है जिसके चलते हृदय रोग की सम्भावना बढ़ जाती है.


एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में प्रतिवर्ष होने वाली मौतों का एक मुख्य कारण हृदय की बीमारियां और हृदयाघात है. इसी कारण जनसामान्य को दिल के प्रति विशेष रूप से जागरूक करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन 2000 से विश्व हृदय दिवस मनाने की शुरुआत की गई. सन 2013 तक इसे सितम्बर के अंतिम रविवार को मनाया जाता था किन्तु सन 2014 से इसे 29 सितम्बर को मनाया जाना आरम्भ किया गया. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की भागीदारी से स्वयंसेवी संगठन वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन प्रतिवर्ष विश्व हृदय दिवस मनाता है. अपने देश में तो अब कम उम्र के लोग भी इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं. आज की भागदौड़ वाली जीवन शैली में लोगों में तनाव कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है. इसलिए इस बीमारी से पूरी तरह बचना तो मुश्किल है, लेकिन जहां तक संभव हो, इससे दूरी बनाए रखनी चाहिए.तनाव के समय आवश्यकता होती है कि हम अपने हृदय की आवाज सुनें, हृदय को दुरुस्त रखने के लिए तनाव दूर भगाएं.

दिल स्वस्थ है तो इन्सान खुद ही स्वस्थ रहेगा. दिल के स्वास्थ्य के लिए निम्न बातों को अपनाना चाहिए. 

प्रत्येक व्यक्ति को व्यायाम करना चाहिए.
प्रतिदिन कम से कम आधे घंटे तक व्यायाम करना चाहिए.
तेज़ क़दमों से टहलना चाहिए.
सेहत के अनुरूप ही खान-पान तथा आहार लेना चाहिए.
नमक की कम मात्रा का सेवन करें.
भोजन में कम वसा वाले आहार ग्रहण करना चाहिए.
ताजी सब्जियां और फल अधिक मात्रा में लेना चाहिए.
तम्बाकू जैसे पदार्थों से हमेशा दूरी बनाएँ रखें.
योग और ध्यान करने की प्रक्रिया को अपनाना चाहिए.
नींद दिल को स्वस्थ रखने के लिए ज़रूरी है.

18 मार्च 2018

सोच बदलने को अशालीन होने की जरूरत नहीं


स्तनपान करवाती मॉडल की फोटो अब फिर से चर्चा में है. इस बार उसके चर्चा में आने का कारण उसके समर्थन में उतरी कुछ महिलाओं द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान करवाने और उसकी फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर डालना रहा है. इन जागरूक महिलाओं ने इस सम्बन्ध में अपने-अपने स्तर के तर्क-कुतर्क गढ़े हैं. किसी पत्रिका के कवर पर मॉडल की स्तनपान करवाती फोटो के विवाद को शांत करने का यही सर्वोत्तम तरीका समझ आया उसके समर्थन में उतरी महिलाओं को. यदि उस पत्रिका के सम्पादक का कथन ही सच मान लिया जाये कि उस चित्र का सन्दर्भ लोगों में सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान करवाती किसी भी महिला के प्रति सकारात्मक सोच बनाना था. ऐसी माँ के इस कृत्य को अश्लील न समझा-माना जाये तो उसके समर्थन में सार्वजनिक स्थानों पर स्तनपान करवाती फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करती महिलाएं क्या वाकई इसी सन्देश का प्रसार-प्रचार कर रही हैं? असलियत में गंभीरता से विचार किया जाये तो इस तरह का प्रदर्शन किसी न किसी रूप में अपनी देह के प्रदर्शन की स्वतंत्रता की वकालत करता ही दिखता है.


समाज सभी तरह के लोगों से मिलकर बना होता और उसमें अच्छे, बुरे लोगों का भी समावेश होता है. सकारात्मक तरीके से विचार करने की आवश्यकता बस इतनी है कि आज भी सड़क चलते सभी लोगों को न तो लूटा जा रहा है और न ही सड़क चलते सभी लोग लूटने में लगे हैं. स्पष्ट है कि उसी सड़क पर जहाँ लूटमार करने वाले हैं, लुटने वाले हैं वहीं बहुतायत में ऐसे लोग भी हैं जो शांतिपूर्ण ढंग से अपना काम कर रहे हैं. संभव है कि किसी सार्वजनिक स्थल पर खुलेआम किसी माँ को स्तनपान करवाते देख बहुत से व्यक्तियों की आँखों के, चेहरे के हाव-भाव बदल जाते हों मगर इसके बाद भी ऐसे व्यक्तियों (पुरुषों कह लीजिये) की भी संख्या बहुतायत में है जो ऐसी महिला के प्रति सामान्य भाव रखते होंगे. आज आवश्यकता ऐसी भावना के प्रचार-प्रसार की है. आज जरूरत इसकी नहीं कि सिर्फ भय दिखाकर ही शांति लाने का काम किया जाये. आज आवश्यकता इसकी भी है कि कैसे सुरक्षित भाव दिखाकर लोगों में और सुरक्षा की भावना का विस्तार किया जाये. हाँ, यदि इस तरह के आन्दोलनों, प्रदर्शनों से महिलाओं को अपनी देह के प्रदर्शन की स्वतंत्रता चाहिए तो फिर कोई बात ही नहीं है.

ऐसी आशंका महज इस कारण उपजती है कि समाज में बनी दशकों पुरानी अवधारणा को, सोच को बदलने के लिए आक्रामकता की बजाय, सकारात्मकता की बजाय देह-प्रदर्शन जैसी स्थिति, अशालीन स्थिति बना दी जाती है. महिलाओं की माहवारी के सम्बन्ध में सोच बदलने की जरूरत महसूस हुई तो हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन छेड़ दिया गया. विपरीतलिंगियों में प्रेम का आदान-प्रदान का समर्थन करने की बात सामने आई तो किस ऑफ़ लव का आयोजन कर लिया गया. अब स्तनपान को सार्वजनिक स्थलों पर सहजता से लेने की बात की गई तो उसके लिए स्तन-प्रदर्शन की राह चलाई जाने लगी. स्त्री हो या पुरुष इस सन्दर्भ में इतना समझना चाहिए कि यदि देह की परिभाषा को अंगों-उपांगों के आधार पर तय किया जायेगा, उसके आधार पर निर्मित किया जायेगा तो समाज में नग्नता ही देखने को मिलेगी, अश्लीलता ही देखने को मिलेगी. यदि स्त्री की देह के अंगों-उपांगों के प्रदर्शन की आज़ादी उसे प्राप्त है तो बहुत से ऐसे पुरुष हैं जो मात्र ऐसी ही किसी आज़ादी की उंगली पकड़ना चाहते हैं. अंग के बदले अंग का प्रदर्शन समाज को कहाँ ले जायेगा, पता नहीं? अंग के बदले अंग के प्रदर्शन की सोच स्त्री-पुरुष को कहाँ जाकर खड़ा करेगा, पता नहीं? और जिस तरह से प्रत्येक सकारात्मक स्थिति को महज अपने आपको स्थापित करने की भावना से विवादस्पद बनाने की भावना समाज में विकसित होती जा रही है, स्त्री-पुरुष दोनों में बलवती हो रही है उससे आशंका इसकी है कि कहीं किसी दिन दाम्पत्य जीवन के गोपन का प्रस्तुतिकरण सड़क पर न होने लगे. आखिर, सत्य को समाज को आज की भाषा में समझाए जाने की आवश्यकता जो है. गोपन को अगोपन बनाये जाने की आवश्यकता जो है.