महाराष्ट्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महाराष्ट्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

28 नवंबर 2019

महाराष्ट्र की तिकड़ी सरकार : किसका लाभ, किसकी हानि


महाराष्ट्र में राजनीति के ऊँट ने कई बार इधर-उधर करवटें बदलते हुए अंततः उस तरह करवट ले ली, जिस तरफ किसी ने सोचा न था. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही एक ऐसा अध्याय जुड़ गया जो राजनीति की कल्पना में ही संभव कहा जायेगा. जैसा कि कहा जाता है कि राजनीति में न कोई स्थायी शत्रु है और न ही कोई स्थायी मित्र है, इसका वास्तविक उदाहरण महाराष्ट्र में हाल ही में देखने को भी मिला. पहले भाजपा द्वारा एनसीपी के अजित पवार के साथ मिलकर दो-चार दिनों की सरकार बनाई गई और फिर अचानक आये बदलाव में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी की तिकड़ी ने सरकार बना डाली. राजनीति में कब किसके साथ किसका गठबंधन हो जाये कहा नहीं जा सकता और इसके बारे में आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए क्योंकि अब राजनीति सामाजिक विकास का नहीं वरन स्व-विकास का रास्ता बन गया है. 


समझने वाली बात है बाला साहब बाल ठाकरे के समय में महाराष्ट्र की जो राजनीति मातोश्री से संचालित होती थी, वह अब वहाँ से बाहर निकल सड़कों पर तैरती दिख रही है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बाला साहब ने कभी भी अपने लिए किसी पद की चाह नहीं की बल्कि वे लगातार सत्ता का रिमोट अपने हाथ में लिए रहे. अब जबकि शिवसेना की कमान उद्धव ठाकरे के हाथ में है तब उनके द्वारा हिंदुत्व या फिर अन्य मुद्दों की राजनीति के बजाय स्वार्थ-पूर्ति की राजनीति की जाने लगी. ऐसा विगत कई वर्षों में लगातार देखने को मिला जबकि केंद्र सरकार में भाजपा की सहयोगी होने के बाद भी शिवसेना द्वारा प्रेशर ग्रुप की तरह से काम किया गया. वर्तमान राजनीति में किसी तरह के सिद्धांत, आदर्श देखने को नहीं मिल रहे हैं मगर अब देखना यह है कि महाराष्ट्र में इस तरह के बने नए तरह से गठबंधन से किसे-किसे क्या लाभ होने वाले हैं और कौन-कौन कितने घाटे में रहेगा. ऐसा विशेष रूप से भाजपा और शिवसेना के सम्बन्ध में कहा जा सकता है. देखना होगा कि क्या शिवसेना बिना भाजपा के अपने चिर प्रतिद्वद्वियों के साथ समन्वय बना पायेगी? इसके साथ ही यह देखना भी महत्त्वपूर्ण होगा कि क्या भाजपा अब बिना शिवसेना के दवाब के अपने आपमें एक बड़ा स्थान महाराष्ट्र में बना सकेगी? किसके हिस्से लाभ आया, किसके हिस्से हानि यह आने वाले कुछ दिनों में अपने आप सामने आ जायेगा.

06 अक्टूबर 2009

कंक्रीट के जंगल में कुछ सुखद क्षण

पिछले कई दिन व्यस्तता भरे निकले। पहले हमारे मित्र डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव द्वारा आयोजित किये गये राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में व्यस्त रहे उसके बाद अपने पारिवारिक कार्यक्रम में। परिवार में कोई विशेष समारोह आदि नहीं था बस हमारी छोटी बहिन और बहनोई मुम्बई में रह रहे हैं। विगत तीन वर्षों से उनका हमको मुम्बई बुलाने का काम होता रहा और हम यहाँ अपने आप में ‘बिजी विदाउट वर्क’ के फंदे में फंसे रहे।


(मेरीन ड्राइव की सैर, पत्नी और बिटिया के संग)

इस बार मौका लगाया और परिवार सहित अपने मित्र सुभाष के साथ मुम्बई यात्रा पर निकल पड़े। यात्रा बड़े ही आराम से हुई। छुट्टियाँ कम होने के कारण मुम्बई का दो-तीन दिनों का कार्यक्रम था। यह भी विचार करना था कि मोहित (हमारे बहनोई) को भी अपने काम से ज्यादा छुट्टियाँ न लेनी पड़ें।

(मित्र सुभाष, सफ़ेद शर्ट में; बहनोई मोहित, बहिन पूजा, पत्नी बच्ची को लिए गेट वे ऑफ़ इंडिया पर)


दो-चार जगह घूमे फिरे, मंदिर भी गये, समुद्र भी देखा। गेटवे आफ इंडिया को खड़ा पाया तो ताज होटल के घाव भी देखे। इसके अलावा माल संस्कृति का भी नजारा लिया। देश का सबसे बड़ा माल कहलाने वाले आरबिट में भी घूमा फिरी की। मुम्बई में भ्रमण के समय इमारतों का जंगल देखने को मिला। पुरानी भव्य इमारतें तो नई अत्याधुनिक तकनीक को दर्शातीं इमारतें। पत्थरों का कलात्मक प्रदर्शन तो काँच की सुंदर जगमगाहट।

(प्रसिद्द मॉल ऑर्बिट इसे देश का सबसे बड़ा मॉल कहते हैं)

समुद्र को बाँधते पुल, सड़कों का बोझ ढोते ओवर ब्रिज, घरों की नई परिभाषा रचतीं मल्टी स्टोरी बिल्डिंग्स, औद्योगीकरण, वैश्वीकरण का प्रदर्शन करते जगमगाते माल, दुकानें, भीड़ को अपने में समातीं लोकल ट्रेन और बसें, दौड़ते-भागते लोग, मशीनी जीवन आदि-आदि सभी कुछ यहाँ देखने को मिला। इस चकाचैंध के बीच असल जिंदगी भी दिखाई दी। झुग्गी-झोपड़ी में जीवन तलाशते लोग। भेलपूरी, पावभाजी, बड़ापाव आदि बेच कर अपना गुजारा करते लोग। लगा कि मुम्बई कंक्रीट का एक भव्य जंगल है जहाँ हर कोई अपने जीवन को गुजर-बसर के लिए ही जिये जा रहा है।

हाँ, ऐसे लोग भी हैं जो जीवन को जिन्दगी की तरह से जीते दिखे। अभावों से दूर, धन की, शानो-शौकत की जिन्दगी जीते लोग।

मुम्बई घूमना कम और अपने परिवार के एक अंग से मिलना ज्यादा था। नवी मुम्बई में बने उस निवास से भी प्रकृति का नजारा मन को बराबर लुभाता रहा। हरे-भरे पहाड़, छोटे-छोटे झरने, आसपास तैरते काले-काले बादलों ने एक पल को तो यह भी भुला दिया कि ये मुम्बई है।

(नवी मुंबई में घर के पास का प्राकृतिक दृश्य)

इसी तरह मुम्बई-पुणे एक्सप्रेस वे ने भी प्रकृति को बहुत ही पास से देखने का मौका दिया। खंडाला, लोनावला के आसपास स्थित हरे-भरे पहाड़, हाथ की पहुँच में तैरते बादल इस बात का आभास ही नहीं होने दे रहे थे कि हम मुम्बई में हैं।

(मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे पर प्रकृति का विहंगम दृश्य, बहिन, पत्नी और बिटिया के साथ)
बहरहाल कंक्रीट के जंगल में इस तरह की हरियाली ने मन को सुकून भी पहुँचाया।

23 अक्टूबर 2008

हल्ला बोल, हल्ला बोल

बहुत वर्ष पहले यहाँ उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के ऊपर "हल्ला बोल" के नाम से हमला किया गया था. एक राजनीतिक पार्टी सपा के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा "हल्ला बोल" का कार्यक्रम कई दिन तक चलाया गया था. उस समय एक कविता उन हालातों पर लिखी थी, कविता में हास्य-व्यंग्य का पुट था। आज जब राज ठाकरे ने एक तरह का हल्ला बोल दिया है तो लगा कि वह कविता आज भी प्रासंगिक है.
बहुत थोड़े, लगभग नहीं के बराबर संशोधन के बाद आपके लिए प्रस्तुत है...........
------------------------
हे मराठो हमें बचाओ,
कोई मन्त्र तो हमें बताओ।
रही हमारी नैया डोल,
कुछ तो बोल, कुछ तो बोल।
--------------------------
मेरा कैसा नेता तू,
नाक कटाए मेरी तू।
सुन मेरे मंत्रों के बोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
-------------------------
वाह गुरु क्या बात बताई,
नैया मेरी पार लगाई।
कितने सच्चे मन्त्र के बोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
-------------------------
राज ने अपना मन्त्र चलाया,
बेचारों को बहुत छकाया।
हुई स्थिति सारी डांवाडोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
-------------------------
उत्तरियों से अपना बैर,
अब आयेगी उनकी खैर।
दो खोपडी उनकी खोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
-------------------------
एक-दो दिन की बात नहीं,
सुनना किसी की बात नहीं।
हरदम गूंजेगे ये बोल,
हल्ला बोल, हल्ला बोल।
-------------------------

21 अक्टूबर 2008

जाना हो विदेश तो राज की मदद करो

खेल चालू है, एक मदारी शेष या तो उसके जमूरे हैं या फ़िर दर्शक. मदारी अपना मजमा हर दो-चार दिन पर लगाता है और उसके जमूरे उसकी हाँ में हाँ मिलाते दीखते हैं. जमूरे मजा आयेगा, हाँ आयेगा. जमूरे, हाँ उस्ताद, हंगामा मचायेगा............मचाऊंगा. जमूरे, खेल दिखायेगा......हाँ दिखायेगा........इस तरह की आपसी जुगलबंदी होती है और फ़िर शुरू हो जाता है मदारी का डमरू पीटना. डमरू की दम-दम-दम पर जमूरा अपनी हरकतों को दिखाता है......लोगों को हंसाता है, करतब दिखाता है और अपने पेट की आग बुझाने का जुगाड़ करता है. जमूरे के करतब, मदारी का कमाल, उसके खेल मिल कर पूरे माहौल को इस कदर संवेदनशील बना देते हैं कि सभी को उनकी भूख में अपनी भूख दिखाती है और हो जाती है पैसे-रुपये की बरसात.

मदारी-जमूरे के इस खेल पर तो हम-आप-सब ताली बजाते हैं, मजा लेते हैं और चल देते हैं अपनी-अपनी राह पर लेकिन इस खेल पर कोई ताली नहीं बजा रहा है, कोई मजा नहीं ले रहा है, कोई पैसों-रुपयों की बरसात नहीं कर रहा है...............बस खेल खेलने वाले खेल रहे हैं.................परेशान होने वाले परेशान हो रहे हैं. महाराष्ट्र में हो रहे इस हंगामे को और क्या नाम दिया जा सकता है? बेक़सूर परीक्षार्थियों की पिटाई सिर्फ़ इस बात पर कि कोई दूसरे प्रान्त का आदमी उनके हक़ को मार रहा है. उत्तर भारतीय मराठा मानुष के हकों को मार रहे हैं. अभी तक तो लड़ाई इस बात की थी कि यहाँ से गए उत्तर भारतीय मराठी भाषा नहीं बोलते पर अब लड़ाई इस बात की शुरू हो गई है कि उत्तर भारतीय उनकी जगहों पर नौकरी भी करने लगे हैं.

अब इस देश में ऎसी व्यवस्था बना दी जाए जिससे व्यक्ति पाने ही प्रांत में नौकरी कर सके, अपने ही प्रांत में व्यवसाय कर सके, यदि किसी दूसरे राज्य में जाना भी पड़े तो उसके लिए पासपोर्ट और वीसा बनवा कर जाए. वैसे ये बुरा विचार नहीं है, देखा जाए तो राज ठाकरे पूरे देश को इस तरह से बाँट देना चाहते हैं कि आदमी आसानी से अपने पासपोर्ट का प्रयोग कर सके। भाई हम जैसे तमाम होंगे जो पासपोर्ट तो बनवा लेते हैं और फ़िर पूरी जिन्दगी विदेश जाने के सपने देखते रहते हैं. कम से कम हम जैसों का तो विदेश जाने, अपने पासपोर्ट पर विदेश की मुहर लगी देखने का तो सपना पूरा होगा.

इसी के साथ-साथ आजकल भारतीय समाज में अपनी बेटियों की शादी के लिए NRI लड़कों को पहली पसंद के रूप में देखा जाता है, अपने बेटे के NRI के रूप में पहचान बनाने को देख कर गर्व होता है..........जो लोग इसके अतिरिक्त भी किसी न किसी रूप में NRI होने की चाह रखते हैं राज ठाकरे उनकी भी हसरत को पूरा कर रहे हैं।

तो फ़िर हंगामा कैसा? शोर कैसा? उपद्रव कैसा? आइये जो लोग सस्ती दरों पर विदेश की सैर करना चाहते हैं........जो लोग ज्यादा खर्च किए बिना NRI होने का मजा लेना चाहते हैं वे लोग भी इस खेल में जुट जाएँ, जुड़ जाएँ. आज नहीं तो कल ये देश कई हिस्सों में बँटा तो हो सकता है कि हमारा-आपका-हम सबका नाम होगा और विदेश का मजा अलग से मिलेगा......पासपोर्ट का भी उपयोग हो सकेगा.

तो जुड़िये इस महाभियान में (महाप्रयोग की तरह) और सफल कीजिए उत्तर भारतीयों और मराठा मानुष के बीच खोदी जा रही खाई के प्रयास को..........ये सब उस समय हो रहा है जबकि इस देश की प्रथम नागरिक (महामहिम राष्ट्रपति जी) भी एक मराठा मानुष हैं...........जय मराठा, जय उत्तर भारतीय, जय भारत (देश तो अब बाद में ही आता है)

20 अक्टूबर 2008

तमाशा घुस के देखें

अभी-अभी कुछ देर पहले ही एक पोस्ट लिख कर उठे थे और फ़िर कुछ देर को समय निकाल कर समाचार देखने बैठे। हंगामा.....हंगामा.....हंगामा................यही सब कुछ हो रहा था. राज ठाकरे का "राज" जिस तरह से टी वी पर दिखाया जा रहा था लग रहा था कि वही क़ानून है, वही प्रशासन है, वही सरकार है. ये है स्थिति क़ानून व्यवस्था की, यही स्थिति है हमारे राजनेताओं की। अपने देश में जहाँ एक स्थिति के लिए दो बातें और एक तरह के कामों के लिए दो कानून.
अब ये तो स्पष्ट सा लग रहा है कि किसी और राज्य में हो या न हो पर महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय सुरक्षित नहीं हैं. नौकरी की तलाश में गए उत्तर भारतीयों को टेस्ट देने के समय लाठी-डंडों से मार भगाने की हरकत कतई नजर अंदाज़ करने वाली नहीं है. अब कोई किस मुंह से कहेगा कि सारा जहाँ हमारा. अब तो लगता है कि इस देश में आने-जाने के लिए पासपोर्ट और वीजा कि जरूरत पड़ेगी. एकता, अखण्डता की बड़ी-बड़ी बातें करते नेता और हम सब अब चुप हैं क्योंकि किसके लिए कहें, किससे कहें?
जागो उत्तर भारतीयों, महाराष्ट्र तुम्हारा नहीं है, ये देश एकता-शक्ति को भूल चुका है, इस देश में संविधान के लिए किसी के दिल में इज्जत नहीं रह गई है..........फ़िर क्यों मार खाने जाते हो?
बार-बार पिट कर भी महाराष्ट्र जाने की हरकत पर एक ही कहावत याद आती है "सौ-सौ जूते खाएं, तमाशा घुस के देखें"