28 नवंबर 2019
महाराष्ट्र की तिकड़ी सरकार : किसका लाभ, किसकी हानि
06 अक्टूबर 2009
कंक्रीट के जंगल में कुछ सुखद क्षण
(मेरीन ड्राइव की सैर, पत्नी और बिटिया के संग)
इस बार मौका लगाया और परिवार सहित अपने मित्र सुभाष के साथ मुम्बई यात्रा पर निकल पड़े। यात्रा बड़े ही आराम से हुई। छुट्टियाँ कम होने के कारण मुम्बई का दो-तीन दिनों का कार्यक्रम था। यह भी विचार करना था कि मोहित (हमारे बहनोई) को भी अपने काम से ज्यादा छुट्टियाँ न लेनी पड़ें।
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(मित्र सुभाष, सफ़ेद शर्ट में; बहनोई मोहित, बहिन पूजा, पत्नी बच्ची को लिए गेट वे ऑफ़ इंडिया पर)
दो-चार जगह घूमे फिरे, मंदिर भी गये, समुद्र भी देखा। गेटवे आफ इंडिया को खड़ा पाया तो ताज होटल के घाव भी देखे। इसके अलावा माल संस्कृति का भी नजारा लिया। देश का सबसे बड़ा माल कहलाने वाले आरबिट में भी घूमा फिरी की। मुम्बई में भ्रमण के समय इमारतों का जंगल देखने को मिला। पुरानी भव्य इमारतें तो नई अत्याधुनिक तकनीक को दर्शातीं इमारतें। पत्थरों का कलात्मक प्रदर्शन तो काँच की सुंदर जगमगाहट।
(प्रसिद्द मॉल ऑर्बिट इसे देश का सबसे बड़ा मॉल कहते हैं)
समुद्र को बाँधते पुल, सड़कों का बोझ ढोते ओवर ब्रिज, घरों की नई परिभाषा रचतीं मल्टी स्टोरी बिल्डिंग्स, औद्योगीकरण, वैश्वीकरण का प्रदर्शन करते जगमगाते माल, दुकानें, भीड़ को अपने में समातीं लोकल ट्रेन और बसें, दौड़ते-भागते लोग, मशीनी जीवन आदि-आदि सभी कुछ यहाँ देखने को मिला। इस चकाचैंध के बीच असल जिंदगी भी दिखाई दी। झुग्गी-झोपड़ी में जीवन तलाशते लोग। भेलपूरी, पावभाजी, बड़ापाव आदि बेच कर अपना गुजारा करते लोग। लगा कि मुम्बई कंक्रीट का एक भव्य जंगल है जहाँ हर कोई अपने जीवन को गुजर-बसर के लिए ही जिये जा रहा है।
हाँ, ऐसे लोग भी हैं जो जीवन को जिन्दगी की तरह से जीते दिखे। अभावों से दूर, धन की, शानो-शौकत की जिन्दगी जीते लोग।
मुम्बई घूमना कम और अपने परिवार के एक अंग से मिलना ज्यादा था। नवी मुम्बई में बने उस निवास से भी प्रकृति का नजारा मन को बराबर लुभाता रहा। हरे-भरे पहाड़, छोटे-छोटे झरने, आसपास तैरते काले-काले बादलों ने एक पल को तो यह भी भुला दिया कि ये मुम्बई है।
(नवी मुंबई में घर के पास का प्राकृतिक दृश्य)
इसी तरह मुम्बई-पुणे एक्सप्रेस वे ने भी प्रकृति को बहुत ही पास से देखने का मौका दिया। खंडाला, लोनावला के आसपास स्थित हरे-भरे पहाड़, हाथ की पहुँच में तैरते बादल इस बात का आभास ही नहीं होने दे रहे थे कि हम मुम्बई में हैं।
23 अक्टूबर 2008
हल्ला बोल, हल्ला बोल
21 अक्टूबर 2008
जाना हो विदेश तो राज की मदद करो
मदारी-जमूरे के इस खेल पर तो हम-आप-सब ताली बजाते हैं, मजा लेते हैं और चल देते हैं अपनी-अपनी राह पर लेकिन इस खेल पर कोई ताली नहीं बजा रहा है, कोई मजा नहीं ले रहा है, कोई पैसों-रुपयों की बरसात नहीं कर रहा है...............बस खेल खेलने वाले खेल रहे हैं.................परेशान होने वाले परेशान हो रहे हैं. महाराष्ट्र में हो रहे इस हंगामे को और क्या नाम दिया जा सकता है? बेक़सूर परीक्षार्थियों की पिटाई सिर्फ़ इस बात पर कि कोई दूसरे प्रान्त का आदमी उनके हक़ को मार रहा है. उत्तर भारतीय मराठा मानुष के हकों को मार रहे हैं. अभी तक तो लड़ाई इस बात की थी कि यहाँ से गए उत्तर भारतीय मराठी भाषा नहीं बोलते पर अब लड़ाई इस बात की शुरू हो गई है कि उत्तर भारतीय उनकी जगहों पर नौकरी भी करने लगे हैं.
अब इस देश में ऎसी व्यवस्था बना दी जाए जिससे व्यक्ति पाने ही प्रांत में नौकरी कर सके, अपने ही प्रांत में व्यवसाय कर सके, यदि किसी दूसरे राज्य में जाना भी पड़े तो उसके लिए पासपोर्ट और वीसा बनवा कर जाए. वैसे ये बुरा विचार नहीं है, देखा जाए तो राज ठाकरे पूरे देश को इस तरह से बाँट देना चाहते हैं कि आदमी आसानी से अपने पासपोर्ट का प्रयोग कर सके। भाई हम जैसे तमाम होंगे जो पासपोर्ट तो बनवा लेते हैं और फ़िर पूरी जिन्दगी विदेश जाने के सपने देखते रहते हैं. कम से कम हम जैसों का तो विदेश जाने, अपने पासपोर्ट पर विदेश की मुहर लगी देखने का तो सपना पूरा होगा.
इसी के साथ-साथ आजकल भारतीय समाज में अपनी बेटियों की शादी के लिए NRI लड़कों को पहली पसंद के रूप में देखा जाता है, अपने बेटे के NRI के रूप में पहचान बनाने को देख कर गर्व होता है..........जो लोग इसके अतिरिक्त भी किसी न किसी रूप में NRI होने की चाह रखते हैं राज ठाकरे उनकी भी हसरत को पूरा कर रहे हैं।
तो फ़िर हंगामा कैसा? शोर कैसा? उपद्रव कैसा? आइये जो लोग सस्ती दरों पर विदेश की सैर करना चाहते हैं........जो लोग ज्यादा खर्च किए बिना NRI होने का मजा लेना चाहते हैं वे लोग भी इस खेल में जुट जाएँ, जुड़ जाएँ. आज नहीं तो कल ये देश कई हिस्सों में बँटा तो हो सकता है कि हमारा-आपका-हम सबका नाम होगा और विदेश का मजा अलग से मिलेगा......पासपोर्ट का भी उपयोग हो सकेगा.
तो जुड़िये इस महाभियान में (महाप्रयोग की तरह) और सफल कीजिए उत्तर भारतीयों और मराठा मानुष के बीच खोदी जा रही खाई के प्रयास को..........ये सब उस समय हो रहा है जबकि इस देश की प्रथम नागरिक (महामहिम राष्ट्रपति जी) भी एक मराठा मानुष हैं...........जय मराठा, जय उत्तर भारतीय, जय भारत (देश तो अब बाद में ही आता है)
