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31 जनवरी 2026

शोध परियोजनाओं हेतु गैर-सरकारी संस्थाओं से वित्तीय सहायता

Research Funding Opportunities (Non-Government Agencies)

 

1. Tata Trusts

https://www.tatatrusts.org

Areas Supported: Education, Rural development, Social innovation, Public policy, Community development

Funding is provided for research projects and social impact studies.

 

2. Infosys Foundation

https://www.infosys.com/infosys-foundation

Areas Supported: Education, Indian culture and literatur, Social development, Community projects

Research projects related to education and society may receive support.

 

3. Azim Premji Foundation/Azim Premji University

https://azimpremjiuniversity.edu.in

Areas Supported: Education policy, School education, Social development, Rural studies, Governance

 

4. Ford Foundation

https://www.fordfoundation.org

Areas Supported: Social justice, Gender equality, Human Rights,  Public policy, Cultural studies

International collaborations are also possible.

 

5. British Council Research Grants

https://www.britishcouncil.org

Areas Supported: Higher education research, Cultural relation, English language education, International academic collaboration

This is especially useful for English and Humanities faculty.

 

6. India Foundation for the Arts (IFA)

https://indiaifa.org

Areas Supported: Literature, Cultural studies, Arts and humanities, Documentation and archives

 

7. Wellcome Trust (UK)

https://wellcome.org

Areas Supported: Humanities, Health and society, Medical humanities, Social sciences related to health

27 जनवरी 2026

शोध परियोजनाओं हेतु केन्द्रीय सरकारी एजेंसियों द्वारा वित्तीय सहायता

विभिन्न केंद्रीय सरकारी एजेंसियां अलग-अलग विषयों में वित्तीय सहायता (फंडिंग) के लिए शोध प्रस्ताव (Research Proposals) आमंत्रित कर रही हैं. शोध प्रस्ताव नैक (NAAC) के अनुसंधान और नवाचार मापदंडों के लिए भी महत्वपूर्ण है.

 

The following major funding agencies and portals may be explored:

 

1. ICSSR (Indian Council of Social Science Research)

https://icssr.org

Relevant Areas: Social Sciences, Literature, Education, Gender Studies, Governance, Culture, Public Policy, Society.

Major Research Project

Minor Research Project

Collaborative Research Projects

 

2. ANRF (Anusandhan National Research Foundation) – EarlierSERB

https://www.anrfonline.in

Relevant Areas: Science, Technology, Interdisciplinary Research, and Innovation.

Core Research Grant (CRG)

Advanced Research Grant

Early Career Research Grants

 

3. ICPR (Indian Council of Philosophical Research)

https://icpr.in

Relevant Areas: Philosophy, Ethics, Indian Knowledge Systems, Religious and Cultural Studies.

 

4. ICHR (Indian Council of Historical Research)

https://ichr.ac.in

Relevant Areas: Indian history, culture, civilization, archives, historical studies.

 

5. Ministry of Culture Research Grants

https://indiaculture.gov.in

Relevant Areas: Indian heritage, literature, culture, traditions, art and cultural studies.

21 जनवरी 2026

विरोधियों के हाथों में उस्तरा तो न थमा दिया?

यूजीसी के उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनिमय 2026 को कई-कई बार पढ़ने के बाद ऐसा महसूस हुआ कि इसके विरोध में जो स्वर उठे हैं, वे इसके विरोध से ज्यादा मोदी-विरोध के हैं. ऐसा लगता है इसका विरोध करने वालों में से बहुतायत लोगों ने इसे पढ़ा नहीं है. यदि पढ़ा होता तो बिन्दुवार विरोध दर्ज करवाया गया होता किन्तु ऐसा नहीं हो रहा है. लगभग सभी जगह से एक ही बात निकल कर सामने आ रही है कि सवर्णों के बच्चे कॉलेज से सीधे जेल जाएँगे; सवर्णों की बेटियाँ बिस्तरों पर लाई जाएँगी आदि-आदि.

 

यदि देखा जाये तो ये अधिनियम पूर्व से चले आ रहे 2012 के अधिनियम का संशोधित रूप है. ये विनियम 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप है. यूजीसी द्वारा यह अद्यतन रूप भी अचानक से लागू नहीं कर दिया गया. इसका प्रारूप फरवरी 2025 में जारी हुआ था. लगभग 11 महीने की प्रक्रिया, जिसमें नागरिकों की सहमति, असहमति संसदीय समिति के विचार आदि के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया. इस संशोधन में अब अन्य पिछड़ा वर्ग को भी शामिल कर लिया गया है. एक जाति-आधारित भेदभाव वाला बिन्दु ऐसा है जिसे विवादास्पद माना जा सकता है, इसके अतिरिक्त कहीं से भी जाति के आधार पर भेदभाव वाला स्वरूप नहीं दिखाई देता है.

 

इस अधिनियम के अनुसार प्रत्येक संस्थान में बनाये जाने वाले समान अवसर केन्द्र के अन्तर्गत समता समिति का गठन किया जाना है. इसके सदस्यों के बारे में अधिनियम लिखता है कि 'समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.'. यदि इसे भी समग्रता में देखा जाये तो यह बिन्दु भी इनके होने की अनिवार्यता की बात नहीं करता बल्कि इनके प्रतिनिधित्व की बात करता है. समिति के गठन के प्रकार में भी जातिगत आधार को वरीयता नहीं दी गई है.


चूँकि वर्तमान अधिनियम 2026 पूर्व से विनियमित अधिनियम 2012 का संशोधित रूप है और यदि विगत बारह-तेरह वर्षों में सामान्य वर्ग के साथ सब कुछ सामान्य रूप से गुजरता रहा है तो अपेक्षा की जानी चाहिए कि आगे भी सामान्य ही गुजरेगा. हाँ, ये न हो कि लगातार उठते विरोधी स्वर सामान्य वर्ग के विरोधियों के हाथों में उस्तरा थमा दें.

 

18 जनवरी 2026

भेदभाव उन्मूलन में दूसरे संग भेदभाव न हो

उच्च शिक्षा के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय की भावना के प्रति सकारात्मकता पैदा करने का कार्य करने के साथ-साथ इंसानों में संवेदनशीलता, मानवीयता गुणों का विकास किया जाता है. इसी उद्देश्य को लेकर ही देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की स्थापना की गई थी. अपनी स्थापना से लेकर अद्यतन यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों लोकतांत्रिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक आधारशिला निर्मित करने का प्रयास किया जाता रहा है. आयोग द्वारा इसी 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए समता के संवर्द्धन हेतु विनिमय 2026 को अधिसूचित कर दिया गया. ये विनियम 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप है. यूजीसी द्वारा यह अद्यतन रूप भी अचानक से लागू नहीं कर दिया गया. इसका प्रारूप फरवरी 2025 में जारी हुआ था. लगभग 11 महीने की प्रक्रिया, जिसमें नागरिकों की सहमति, असहमति संसदीय समिति के विचार आदि के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया.

 



इस अधिनियम के लक्ष्य में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन देना. यदि इस उद्देश्य पर विचार किया जाये तो यह किसी एक वर्ग के प्रति भेदभाव जैसी स्थिति नहीं दिखाता है. इसके बाद भी इसे सामान्य वर्ग के विरुद्ध बताया जा रहा है, जिसके चलते देशभर में यह बिल चर्चा के केन्द्र में है. चर्चा के दौरान जो बात उभर कर सामने आई है वो दर्शाती है कि अधिनियम में जिस तरह के प्रावधान किये गए हैं उसके अनुसार इस विचार को मजबूती मिलती है कि सामान्य वर्ग के लोग भेदभाव के शिकार नहीं हो सकते बल्कि वे सिर्फ भेदभाव ही कर सकते हैं. इस सोच के पीछे वे तमाम अधिनियम हैं जिनका दुरूपयोग करके सामान्य वर्ग को परेशान किया जाता रहा है.

 



यह पूर्णतः सत्य है कि किसी भी समाज में, संस्था में किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान नहीं होना चाहिए और इससे भी किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि समाज से भेदभाव कम करने के प्रयास ज्यादा से ज्यादा होने चाहिए. इस सन्दर्भ में आयोग द्वारा जारी अधिसूचना को भी समझना आवश्यक हो जाता है. अधिनियम के बिन्दु 3 के अन्तर्गत विभिन्न सन्दर्भों को परिभाषित किया गया है, जिसमें 3ख में पीड़ित का सन्दर्भ ऐसे व्यक्ति से लगाया गया है जिसके पास इन विनियमों के अंतर्गत शिकायतों से सम्बंधित या जुड़े मामलों में कोई शिकायत है. इसमें भी जातिगत उल्लेख नहीं है अर्थात पीड़ित व्यक्ति किसी भी वर्ग का हो सकता है. इसके अतिरिक्त 3थ में हितधारक का अर्थ स्पष्ट किया गया है कि इसमें छात्र, संकाय सदस्यों, कर्मचारी और प्रबंध समिति के सदस्य, जिनमें उच्च शिक्षा संस्थान का प्रमुख भी शामिल है. एक बिन्दु 3ग अवश्य ऐसा है जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव को परिभाषित करता है. इस सम्बन्ध में शिकायत मिलने पर 24 घंटे में प्राथमिक कार्रवाई करनी होगी और 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होगी. आरोपी विद्यार्थी पर संस्थागत अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में पहले उसे चेतावनी दी जाएगी, इसके पश्चात् जुर्माना भी लगाया जा सकता है. गम्भीर मामलों में विद्यार्थी को शिक्षण संस्थान से निष्कासित भी किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त सामान्य भेदभाव में नस्ल, लिंग, धर्म, दिव्यांगता, जन्म-स्थान आदि को शामिल किया गया है. सामान्य वर्ग का व्यक्ति इस आधार पर अपने साथ होने वाले भेदभाव की शिकायत कर सकता है.

 



अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने की दृष्टि से प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समान अवसर केन्द्र की स्थापना करनी होगी. इसका कार्य वंचित समूहों के लिए नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रखना; शैक्षणिक, वित्तीय, सामाजिक एवं अन्य मामलों में मार्गदर्शन एवं परामर्श प्रदान करना; तथा परिसर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित करना होगा. प्रत्येक समान अवसर केन्द्र एक समता समिति के माध्यम से कार्य करेगा. यदि इस अधिनियम में बिन्दु 3ग के अलावा बिन्दु 7 खटकता है, जो कहता है कि समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. यह बिन्दु भी इनके होने की अनिवार्यता की बात नहीं करता है. इस अधिनियम का दुर्भाग्यपूर्ण बिन्दु यह माना जाना चाहिए कि झूठी शिकायत मिलने पर सम्बंधित व्यक्ति के लिए किसी भी तरह की सजा, जुर्माना अथवा कार्यवाही का प्रावधान नहीं किया गया है. यद्यपि मसौदा नियमों में इसका प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हतोत्साहित किया जाए और इसके लिए जुर्माने का भी प्रावधान रखा गया था तथापि अंतिम अधिसूचित नियमों में यूजीसी ने इस प्रावधान को हटा दिया और अन्य पिछड़ा वर्ग को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल कर लिया. इस कारण यूजीसी का वर्तमान अधिनियम न केवल बेहद सख्त हो जाता है बल्कि अन्यायपूर्ण भी समझ आने लगता है.

 




अतः आवश्यकता इस बात की है कि इस अधिनियम पर जल्दबाजी अथवा उतावलेपन में विरोध के बजाय व्यापक विमर्श, पारदर्शिता और हितधारकों से संवाद के साथ इसका स्वरूप निर्धारित किया जाए. शिक्षा सुधार का लक्ष्य जाति-आधारित भेदभाव नहीं बल्कि स्वतंत्र, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. यूजीसी को भी जनमानस के विचारों का सम्मान करते हुए इस पर पुनर्विचार करना चाहिए. यह न केवल वर्तमान समय की माँग है बल्कि देश के शैक्षणिक भविष्य के लिए आवश्यक भी है. ध्यान रखना चाहिए कि एक वर्ग के साथ सम्भावित भेदभाव को दूर करने के प्रयास में दूसरा वर्ग भेदभाव का शिकार न हो जाये.

 


01 नवंबर 2025

MMTTP के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान

MMTTP के द्वारा करवाये जाने कोर्स/प्रोग्राम के लिए ड्यूटी लीव मिलने का प्रावधान यूजीसी की तरफ़ से किया गया है.



मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम (MMTTP) का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण पद्धतियों और नेतृत्व कौशल से सशक्त बनाना है. यह कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की सिफारिशों को लागू करने पर केन्द्रित है. इस प्रशिक्षण का लक्ष्य शिक्षकों की क्षमताओं को बढ़ाना और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है. इसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह के प्रशिक्षण शामिल किये गए हैं. 


बहुत सी संस्थाओं में देखने में आ रहा है कि इस कोर्स में सहभागिता करने वाले प्राध्यापकों को उन उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्राचार्यों द्वारा अवकाश प्रदान नहीं किया जा रहा है. ऐसे में प्राध्यापकों द्वारा अध्यापन कार्य के लिए संस्था में उपस्थित रहने के दौरान ही इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करना पड़ता है. ऐसे में जहाँ अध्यापन कार्य भी प्रभावित होता है वहीं इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्देश्य में भी बाधा उत्पन्न होती है. 


इसी को देखते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता करने पर अवकाश का प्रावधान किया गया है. 


12 फ़रवरी 2025

यूजीसी केयर लिस्ट की समाप्ति

शोध पत्रिकाओं (रिसर्च जर्नल्स) की यूजीसी केयर सूची को बंद करने और सहकर्मी-समीक्षित पत्रिकाओं के लिए पैरामीटर विकसित करने के संबंध में यूजीसी की सार्वजनिक सूचना




27 अप्रैल 2024

शोध कार्य में गुणवत्ता की सम्भावना?

उच्च शिक्षा क्षेत्र में सक्रियता से अपनी भूमिका का निर्वहन करता विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) इस क्षेत्र में गुणवत्ता बनाये रखने हेतु कदम उठाता रहता है. शोध कार्य को लेकर यूजीसी द्वारा विशेष रूप से कार्य किया जा रहा है. उच्च शिक्षा से सम्बद्ध संस्थानों में अध्यापन के साथ-साथ शोध कार्य को लेकर अनेक सुधार किये गए. अनेक सुधारात्मक उपायों के बीच अभी हाल ही में यूजीसी द्वारा एक बड़ा निर्णय लेते हुए पी-एच.डी. के लिए अब राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है. अभी तक नेट परीक्षा के माध्यम से दो श्रेणियों में परीक्षार्थी उत्तीर्ण होते थे. इसके माध्यम से एक तरफ जेआरएफ के लिए विद्यार्थी चयनित किये जाते थे, दूसरी तरफ उत्तीर्ण विद्यार्थी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर पद की पात्रता प्राप्त कर लेते थे. यूजीसी के इस नए बदलाव के बाद नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों की एक तीसरी श्रेणी भी अस्तित्व में आ गई है. अब नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों को पी-एच.डी. करने की पात्रता भी प्राप्त हो सकेगी. जून 2024 की नेट परीक्षा के लिए यूजीसी द्वारा जारी अधिसूचना में इस बदलाव को शामिल किया गया है.

 

विगत कुछ वर्षों से पी-एच.डी. में नामांकन हेतु विश्वविद्यालय स्तर पर प्रवेश परीक्षा का आयोजन करवाया जा रहा है. इसमें चयनित विद्यार्थी ही पी-एच.डी. हेतु अपना नामांकन करवा पाता है. इधर देखने में आ रहा था कि बहुत से विश्वविद्यालय समय से पी-एच.डी. हेतु परीक्षा का आयोजन नहीं करवा रहे हैं. इसके अलावा यह भी देखने में आया कि पी-एच.डी. में प्रवेश को लेकर यथोचित मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है. इससे ऐसे लोगों द्वारा अनावश्यक रूप से प्रवेश लिया जा रहा है जिनका न तो शोध से कोई लेना-देना है और न ही उच्च शिक्षा से. ऐसी स्थिति के चलते यूजीसी शोध कार्य में गुणवत्ता और उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार की जिस व्यवस्था को लागू करना चाह रही है, वह भी पूरी नहीं हो पा रही है. इसे देखते हुए नेट परीक्षा के माध्यम से पी-एच.डी. करने की नई व्यवस्था लागू किये जाने के साथ ही यूजीसी ने विश्वविद्यालयों द्वारा ली जाने वाली प्रवेश परीक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है.

 



यूजीसी द्वारा नेट के माध्यम से पी-एच.डी. हेतु नामांकन की व्यवस्था किये जाने से निश्चित रूप से उन विद्यार्थियों को प्रोत्साहन मिलेगा जो वास्तविकता में इसके लिए अपना नामांकन चाहते हैं. इस व्यवस्था से उन विद्यार्थियों का विभिन्न विश्वविद्यालयों की पी-एच.डी. सम्बन्धी प्रवेश परीक्षाओं हेतु भटकने से बचना होगा जो वास्तविक रूप में उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन कार्य को अपना लक्ष्य बनाये हुए हैं. नेट परीक्षा के माध्यम से जहाँ वे असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने की पात्रता प्राप्त कर लेंगे वहीं पी-एच.डी. हेतु भी अपना नामांकन करवा सकेंगे. इस व्यवस्था के लागू होने के बाद भी यह निर्विवाद रूप से नहीं कहा जा सकता है कि इसके द्वारा शोध कार्यों में गुणवत्ता का विकास होगा. यूजीसी द्वारा भले ही पी-एच.डी. को शोध कार्य हेतु एक प्रक्रिया माना जाता हो मगर समाज में आज भी इसे महज एक उपाधि मानकर औपचारिकता को पूरा किया जाता है. मौलिक शोध कार्य को वरीयता देने से अधिक महत्त्व नाम के साथ डॉक्टरेट उपाधि का लग जाना रहता है.

 

देखा जाये तो आज भी कला, साहित्य, मानविकी आदि विषयों में इस प्रकार के शोध कार्य नहीं हो रहे हैं जिनके द्वारा समाज को एक दिशा दी जा सके. समाज के मुख्य बिन्दुओं, समाज की समस्याओं, दैनिक जीवन में सहयोगी होने वाले विषयों आदि से सम्बंधित शोध कार्य हेतु प्रोत्साहन भी नहीं दिया जाता है. ऐसे में इन क्षेत्रों में शोध कार्य को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता है. पी-एच.डी. के लिए किया जाने वाला शोध कार्य महज एक पुस्तकीय संस्करण बन कर रह जाता है. यदि शोध कार्य व्यक्ति के कैरियर के लिए होगा, उसकी एपीआई बढ़ाने के लिए होगा, उसकी प्रोन्नति के लिए आवश्यक होगा तो शोध कार्य में गुणवत्ता कैसे आएगी?  बावजूद इसके, इस नई व्यवस्था से शोध कार्य में गुणवत्ता के, योग्यता के आने की सम्भावना देखनी चाहिए लेकिन उसके लिए यूजीसी को कुछ सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है.

 

भले ही नेट की परीक्षा उत्तीर्ण करना विद्यार्थियों के लिए सदैव से चुनौती रहा हो मगर इसके द्वारा गुणवत्ता को बढ़ाने वाली योग्यता का चयन ही होगा, ऐसा कहना मुश्किल है. शोध कार्य की गुणवत्ता के लिए ऐसे योग्य विद्यार्थियों का चयन किये जाने की आवश्यकता है जिनकी रुचि शोध कार्य में हो. नेट परीक्षा आरम्भ से ही असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने की पात्रता मात्र रही है, अब यह पी-एच.डी. करवाने की पात्रता भी बन गई है. इससे शोध कार्य में गुणवत्ता के आने की, उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार की सम्भावना न के बराबर ही है. यदि यूजीसी वाकई शोध कार्य में गुणवत्ता चाहती है तो उसे शोध कार्य हेतु एक अलग मार्ग निर्धारित करना होगा. जहाँ किताबी शोध कार्य के बजाय समाज के बीच जाकर शोध कार्य करवाया जाये. शोध कार्य इस तरह का हो जिससे आमजन के जीवन में सकारात्मकता आये, लोगों को एक दिशा मिले, कार्योंन्मुख जीवन-शैली का विकास हो, तब तो शोध कार्य की सार्थकता समझ आती है. यदि ऐसा करने में कोई भी शोध कार्य सफल नहीं होता है तो निस्संदेह वह कार्य महज उपाधि प्राप्ति का ही साधन मात्र बना रहेगा फिर भले ही उसे नेट परीक्षा के माध्यम से करवाया जाये या किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षा के द्वारा.