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27 दिसंबर 2012

एकाकार होने का सत्य और स्त्री-पुरुष अंतर्विरोध



          दिल्ली बस केस के बाद बलात्कार से सम्बन्धित कानून, महिलाओं की रक्षा करने सम्बन्धी कानूनों को और कड़ा करने पर व्यापक जनान्दोलन सा स्वरूप दिखाई दिया। इसी के पार्श्व में महिलाओं-पुरुषों के आपसी सम्बन्धों पर भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष बहस भी छिड़ती दिखी।  बलात्कार से सम्बन्धित कानून कितनी कड़ी सजा का प्रावधान करता है; महिलाओं की सुरक्षा हेतु और क्या-क्या साधन-संसाधन प्रयोग में लाये जाते हैं, यह अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन अब समाज में स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों पर सार्थक और सकारात्मक बहस की, निदानात्मक बहस की आवश्यकता है, नितान्त आवश्यकता है। 

          यह एक सामाजिक सत्य है कि स्त्री और पुरुष के आपसी सामन्जस्य से ही सामाजिक अवधारणा का सूत्रपात हुआ। समय, काल, परिस्थितियों के द्वारा पूर्व में क्या-क्या और क्यों होता रहा, इस पर बहस करने से बेहतर है कि वर्तमान को सामने रखकर आपसी सम्बन्धों पर दोनों पक्षों द्वारा विचार किया जाये। इस बात से शायद ही कोई इंकार करेगा कि वर्तमान समय में महिलायें स्वयं को घनघोर रूप से असुरक्षित महसूस कर रही हैं। देखा जाये तो वे असुरक्षित महसूस ही नहीं कर रही हैं वरन् असुरक्षित हैं ही, ऐसे में इस बात पर विचार बहुत ही आवश्यक है कि आखिर 21वीं सदी में पहुँचने के बाद भी, समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति को दर्ज करवाने के बाद भी महिलाओं को समाज में असुरक्षा का भाव किस कारण से जागता है? समाज में किसी भी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन करने वाली महिला चन्द पुरुषों के बीच स्वयं को असुरक्षित महसूस क्यों करने लगती है? समाज के बीचोंबीच किसी महिला की उपस्थिति पुरुषों द्वारा उसके वस्त्रों से गुजार कर उसकी देह पर आकर क्यों टिका दी जाती है? और भी तमाम सारे बिन्दु हैं जिन पर सार्थक और सकारात्मक चर्चा होने के स्थान पर, आपसी सहमति बनने के स्थान पर दोनों एक दूसरे पर दोषारोपण करने लगते हैं।

         
यहाँ पूर्वाग्रह से ग्रसित बिना हुए इस बात को स्त्री-पुरुष दोनों को इस बात का स्वीकार करना होगा कि समाज में सभी पुरुष महिलाओं के विरोधी अथवा उन पर अत्याचार करने वाले नहीं हैं, इसी तरह समाज की सभी महिलायें शोषित नहीं हैं। अनेक उदाहरण ऐसे हैं जिनमें महिलायें ही महिलाओं का शोषण कर रही हैं और पुरुष भी अनेक रूप से शोषितों के रूप में दिखाई देता है। मारपीट की घटना,  शारीरिक अत्याचार, दरिन्दगी आदि का शिकार पुरुष भी होते हैं और महिलाओं के विरुद्ध इस तरह के अत्याचार करने वालों में महिलायें भी शामिल होती हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर इस समस्या का निदान कौन और कैसे निकालेगा? ऐसे में भले ही प्रयास व्यक्तिगत हों अथवा सामूहिक, प्रयास इस तरह के हों जिनसे एक दिशा मिलती दिखाई दे। इससे इतर वर्तमान में हो यह रहा है कि स्त्री पक्ष के लोग समाज की समूची स्त्रियों को अबला, निरीह, मासूम, शोषित के रूप में ही प्रस्तुत करके पूरे प्रकरण के लिए सिर्फ और सिर्फ पुरुष को दोषी ठहराते दिखते हैं। सदियों-सदियों पुरानी उस मनुवादी व्यवस्था को वर्तमान में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसकी एक पंक्ति का आज अनुसरण भी नहीं किया जाता है। आपसी विवाद, वैमनष्यता को सुलझाने के स्थान पर पुरुष को अपराधी, शोषक, अत्याचारी, अहंकारी रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

         
यह तो तय है कि समूचे समाज से स्त्री-पुरुष के भेदभाव को अब मिटाया जाना नामुमकिन सा दिखता है। ऐसे में हमें अपने परिवार के बीच से ही इस सुधार का काम करना होगा। हमें अपने परिवार के पुरुषों के मध्य स्त्री की वास्तविक छवि को रखना होगा, स्त्रियों को भी पुरुषों की सहज छवि से परिचित करवाना होगा। यदि पारिवारिक स्तर पर स्त्री-पुरुष में आपसी साम्य बनता है तो उसके परिणाम सुखद देखने को मिलेंगे। भले ही स्त्री द्वारा पुरुष को कितना भी अत्याचारी, दम्भी, अपराधी, क्रूर, निर्दयी रूप में प्रस्तुत किया जाये; पुरुषों द्वारा भले ही स्त्रियों को किसी भी रूप में परिभाषित किया जाये किन्तु इस बात से किसी को भी इंकार नहीं होगा कि दोनों को एक दूसरे को अंगीकार करना ही पड़ रहा है, भविष्य में भी करना पड़ेगा। तमाम सारे अन्तर्विरोधों के बाद, तमाम सारी विषमताओं के बाद जब स्त्री-पुरुष दोनों को एकाकार होना ही है तो आपसी मनमुटाव के द्वारा क्यों? सामाजिक विरोधों के द्वारा क्यों? निर्मूल आशंकाओं के बीच क्यों?
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25 नवंबर 2009

पुरुष-विमर्श : विमर्शों की श्रृंखला में एक नया विमर्श


आज शाम के समय अपने मित्रों के साथ बैठे हुए ब्लाग से सम्बन्धित चर्चा चल निकली। चिन्तन और चिन्ता जैसे विषय पर बात होते-होते विमर्श पर आ गई। हमारे एक मित्र डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव, जो दलित-विमर्श के क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम बन गये हैं, ने स्त्री-विमर्श को लकर कुछ सवालों को उठाया। (इस समय वे स्त्री-विमर्श से सम्बन्धित पुस्तक का सम्पादन कार्य कर रहे हैं।)

हमारा काम स्त्री-विमर्श पर चल रहा है, इस कारण अपने मित्रों और दूसरे सहयोगियों, शुभचिन्तकों से इस बारे में राय ले लेते हैं। इसी क्रम में कई बार ऐसे मौके आये जब लगा कि स्त्री-विमर्श के साथ-साथ पुरुष-विमर्श की भी आवश्यकता है।

हमारे एक अन्य सहयोगी डा0 राकेशनारायण द्विवेदी ने कहा कि आप इसे पुरुष-विमर्श का नाम न दें, अन्यथा यह लगेगा कि आप स्त्री-विमर्श की प्रतिक्रिया स्वरूप इस विमर्श की चर्चा कर रहे हैं।

हो सकता है कि बहुत से स्त्री-विमर्श के पक्षधर लोगों को इस बात का समर्थन प्राप्त हो जाये पर किसी बिन्दु पर आकर विचार किया जाये तो समाज में पुरुष-विमर्श की भी चर्चा होनी चाहिए।

इससे पूर्व भी कई बार हमने यह प्रयास किये कि इस विषय पर चर्चा हो, आपस में बहस हो किन्तु इस विषय को मजाक में लेकर समाप्त कर दिया गया। आज अपनी मित्र-चर्चा के बाद जब हम उठे तो यह सोचकर ही उठे कि आज से इस विमर्श की शुरुआत की ही जायेगी। हालांकि करीब पाँच साल पहले हमारा इसी विषय पर एक आलेख प्रकाशित भी हुआ था और उसकी प्रतिक्रिया भी सार्थक रूप में सामने आई थी।

दरअसल जब भी पुरुष की बात की जाती है तो एक छवि ऐसी बनती है जो किसी भी दर्द से पीड़ित नहीं है, जिसके पास अमोध शक्तियाँ हैं, वो जो चाहे कर सकता है, समाज में वह सदा शोषक की स्थिति में रहता है, कोई पुरुष का शोषण नहीं कर सकता वगैरह-वगैरह किन्तु यही सर्वथा सत्य नहीं है।

जब भी पुरुष की बात होती है तो क्यों किसी विराट व्यक्तित्व का चित्र दिमाग में बनता है? अपने आसपास दृष्टि डालिए, क्या आपको कोई ऐसा पुरुष नहीं दिखता जो पीड़ित हो? क्या कोई ऐसा पुरुष नही समझ आता जिसका शोषण न हो रहा हो? क्या कोई ऐसा पुरुष आपकी निगाह में नहीं आता जो आपको पराधीन दिखाई देता हो? अवश्य ही दिखता होगा। मजदूर, घरों, कार्यालयों में काम करते नौकर, सड़क के किनारे छोटे-छोटे काम करते व्यक्ति, समाज के अन्य दूसरे छोटे-मोटे काम करते पुरुष भी तो शोषण का शिकार हैं।

आखिर क्यों इस तरह की छावि बनी है कि यदि पुरुष विमर्श की चर्चा होगी तो वह स्त्री-विमर्श के प्रत्युत्तर में ही होगी? यह क्यों सोचा जाता है कि यदि पुरुष-विमर्श की बात की जायेगी तो उसके पीछे पति-पत्नी वाला स्वरूप ही सामने आयेगा? पुरुष भी शोषित है, घर में भी है, बाहर भी है। उसके शोषण की स्थितियाँ अलग हैं। उन पर विचार करने की स्थिति भी अलग रही है।

वर्तमान में समाज के स्वरूप पर दृष्टि डालें तो भली-भांति ज्ञात होगा कि शोषक और शोषित के बीच अब लिंगभेद का जितना प्रभावी है, उसी तरह से प्रस्थिति भी प्रभावी है। आम आदमी आज हाशिए पर खड़ा दिखाई देता है। दलित वर्ग हाशिए पर ही दिखता है। मजदूर, आदिवासी, गरीब, लाचार पुरुष भी इस बात के अधिकारी हैं कि उनके साथ भी मनुष्य की तरह व्यवहार किया जाये। क्या इन लोगों के लिए पुरुष-विमर्श की आवश्यकता नहीं है?

एक बात और है कि समाज के आधुनिक संस्करण में परिवार में पति-पत्नी के मध्य भी विवाद की स्थिति रहती है। इस स्थिति के चलते परिवारों में स्त्री और पुरुष दोनों ही तनाव की स्थिति में रहते हैं। पत्नी भी प्रताड़ित है तो पति भी प्रताड़ित है। स्त्री भी परेशान है तो पुरुष भी परेशान है। समस्या दोनों ओर है। इस विमर्श को पुरुष-विमर्श के नाम से जानने में कौन सी बुराई है?

चलिए, आज से ही सही किन्तु ब्लाग पर पुरुष-विमर्श की शुरुआत की जा रही है। समाज के शोषित, दमित, प्रताड़ित पुरुषों के बारे में, उनकी प्रस्थिति के बारे में जानने-समझने का तथा उनमें चेतना का संचार करने, उनके व्यक्तित्व विकास के लिए भी प्रयास किया जायेगा (इनमें पत्नी पीड़ित पति भी शामिल हैं, परिवारीजनों से पीड़ित पुरुष भी शामिल हैं)

डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव को याद करवा रहे हैं, इस सम्बन्ध में उन्होंने लेख भेजने का वादा किया है।

ब्लाग को यहाँ से देखें। प्रतिक्रिया दें और राय भी भेजें। ऐसा नहीं है कि समाज पुरुषों का शोषण नहीं करता है, उसे आपको और हमें ही सामने लाना है। इस सम्बन्ध में मिलकर प्रयास करना है, सामाजिक चेतना का विकास करना है। आइये प्रयास करें और पुरुष-विमर्श के इस नये आन्दोलन में हमारे सहयोगी बनें।