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28 जुलाई 2023

पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने की कहानी

आये दिन दशरथ मांझी की पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने की कहानी सामने आती है। काम तारीफ करने लायक हो सकता है पर कुछ प्रश्न उठते हैं इसके पीछे से मन में और हर बार अनुत्तरित से रह जाते हैं। आप लोग भी विचार करिए, मन कर जाए तो उत्तर खोजने में मदद करिए।

==> पहाड़ किसी की व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं होता। क्या इस तरह किसी भी पहाड़ को खोद कर रास्ता बना देना कानूनी है?

==> आज पहाड़ को तोड़कर रास्ता बना, कल को पार्क, मैदान बनाने लग जाएँ लोग तो क्या वह कानूनन सही होगा?

==> दशरथ मांझी ने पहाड़ तोड़ा तो उसकी टूटन, पत्थर भी निकला होगा, वो कहाँ गया? किसने उसका उपयोग किया?

==> यदि बिना लागत के उस पत्धर को उपयोग में लिया गया तो यह राजस्व की हानि नहीं? क्या एक तरह से प्राकृतिक सम्पदा की चोरी नहीं?

==> पहाड़ तोड़कर बनाई सड़क को प्रशासन ने या किसी अन्य सरकारी अथॉरिटी ने पक्का भी किया होगा, डामरीकरण किया होगा। उसका खर्चा किस विभाग ने उठाया होगा?

==> क्या बिना नक्शे के बनी सड़क को प्रशासनिक स्तर पर बनवाया जा सकता है?


सोचिएगा। हो सकता हम गलत हों, जानकारी अधूरी हो तो आप सहायता करिएगा।

 

 

02 अक्टूबर 2020

एक सवाल खुद से भी करो

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

एक बहुत छोटी पोस्ट मगर सदैव झकझोरने वाली... 

मोहनदास करमचंद गांधी को गोली किसने मारी ये सबको पता है क्योंकि बताया गया मगर लाल बहादुर शास्त्री जी को जहर किसने दिया वो किसी को पता नहीं. क्यों? कभी जानने का प्रयास किया? नहीं न, बस मनाते रहे गांधी जयंती. मनाते रहो, आज भी, आने वाले कल में भी.

 

27 जून 2020

कोरोना संक्रमण से सम्बंधित कुछ प्रश्नों के उत्तरों की अपेक्षा

कोरोना संक्रमण को लेकर बहुत सी बातें लगातार सामने आ रही हैं. सामाजिक, शारीरिक दूरी बनाये जाने की बातें की जा रही हैं. हाथ धोने के तरीके बताये जा रहे हैं. इन सबके बीच कुछ शंकाएँ हैं, मन में. शंकाएँ इसलिए क्योंकि जो प्रश्न मन में उठते हैं उनके बारे में समाधान खुद से ही खोज लेते हैं मगर उनके बारे में स्पष्ट उत्तर मिलते नहीं.



सवाल ये हैं कि कोरोना संक्रमण फैलने का मूल कारण क्या है?
+
यदि दो व्यक्ति एकसाथ सटे हुए बैठे/खड़े हैं. उनमें एक व्यक्ति पॉजिटिव है और दूसरा स्वस्थ. वे आपस में किसी तरह की बातें न करें (ड्रॉपलेट सम्बन्धी कोई कारण न हो) तो भी क्या दूसरा व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
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किसी स्वस्थ व्यक्ति ने किसी संक्रमित व्यक्ति से हाथ मिला लिया या फिर किसी संक्रमित वस्तु को छू लिया तो क्या वो पॉजिटिव हो जायेगा?
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यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी संक्रमित व्यक्ति/वस्तु को छूने के बाद अपने हाथ को आँख, नाक, मुँह में नहीं लगाता तो भी क्या वह संक्रमित हो जायेगा?
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ऐसी स्थिति में कितने देर रहने के बाद उसकी हथेली संक्रमण मुक्त हो जाएगी, यदि उसे साबुन न मिले, सेनेटाइजर न मिले? या वह संक्रमित ही बनी रहेगी?
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यदि स्वस्थ व्यक्ति किसी ऐसी जगह बैठ जाए जिसे किसी संक्रमित व्यक्ति ने छू लिया हो या वहाँ कोई संक्रमित व्यक्ति बैठा रहा हो तो क्या वो स्वस्थ व्यक्ति संक्रमित हो जायेगा?
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कोरोना संक्रमित व्यक्ति के शरीर के किस हिस्से से छूने से संक्रमण फैलेगा? क्या पॉजिटिव व्यक्ति का पूरा शरीर संक्रमित हो जाता है?
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कहा जा रहा है कि संक्रमण मुँह, आँख, नाक के सहारे फेफड़ों तक ही हो रहा है, ऐसे में किसी संक्रमित व्यक्ति का पूरा शरीर किस तरह/किस कारण संक्रमित हो जाता है?
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संक्रमित व्यक्ति जो कपड़े पहने होता है क्या उसका ऊपरी हिस्सा भी संक्रमित रहता है, जिसे उसने अपनी हथेलियों से न छुआ हो?

सवाल तो बहुत सारे हैं मगर सब इन्हीं के आसपास घूमते-टहलते हैं. इनका जवाब इसलिए भी आवश्यक है, ये जरूरी नहीं कि हमें मिलें बल्कि सबको पता होने चाहिए क्योंकि कोरोना के नाम से जिस भय का व्यापार अब हो रहा है वह खतरनाक है. आज ज्यादातर डॉक्टर्स किसी मरीज को देखने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं. वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे बीमार व्यक्ति अपनी आँखों से कोरोना फेंक रहा है.

इन सवालों के जवाब इसलिए भी मालूम होने चाहिए क्योंकि जिस तरह से लोगों का बाहर निकलना हो रहा है, जिस तरह से सभी कार्यालय, संस्थान अपनी सामान्य स्थिति में आ रहे हैं उससे कोरोना संक्रमण बढ़ने की ज्यादा सम्भावना है. मास्क को लेकर, हाथ धोने को लेकर, ड्रॉपलेट को लेकर, मौसम को लेकर, वायरस के जीवित रहने को लेकर जिस तरह से अलग-अलग बातें निकल कर सामने आ रही हैं, वे चिंताजनक हैं. ऐसे में इस तरह के और दूसरे सवालों को उठाया जाना चाहिए, उनका समाधान खोजना चाहिए. सुरक्षा तो अपनी जगह है, संभव है कि ऐसे सवालों से प्राप्त जानकारी से भी सावधानी बढ़ाई जा सके.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

25 मई 2020

प्रेम कहानियों पर इतना कौतूहल क्यों

लोगों की रुचि दूसरों की ज़िन्दगी में झाँकने की क्यों होती है? दूसरे की ज़िन्दगी में सुख है या दुःख इससे झाँकने वालों का कोई लेना-देना नहीं होता है, बस वे उसमें झाँकना चाहते हैं. इस ताका-झाँकी में यदि विषय प्रेम का, इश्क का हो तो फिर कहना ही क्या. इस विषय के आगे सभी विषयों को गौड़ कर दिया जाता है. किसी दूसरे के जीवन का कोई प्रेम-प्रसंग हाथ लग भर जाए फिर उसके आगे सारे प्रसंग बौने हो जाते हैं. किसी और के प्रेम-प्रसंगों के लिए, दूसरे की प्रेम-कहानियों को सुनने के लिए लोगों में बेताबी दिखाई देने लगती है. ऐसा किस मानसिकता के कारण होता है? ऐसा किस प्रवृत्ति के चलते लोग करते हैं? कई बार इस विषय पर अपने मित्रों से बातचीत करने की कोशिश की मगर कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया.


अपने जीवन की कुछ घटनाओं को कुछ सच्ची कुछ झूठी के द्वारा सबके बीच लाने का एक प्रयास विगत वर्ष किया था. उसके लेखन का जब आरम्भ किया था तब बहुत से दोस्तों, परिचितों के कई सवालों का सामना करना पड़ा था जो प्रेम-कहानियों से संदर्भित थे. इसके पहले भी बहुत बार लोगों के सवालों, निगाहों का शिकार हुए ऐसे सवालों को लेकर. कई बार हमारे कहीं आने-जाने को लेकर, किसी से दोस्ती को लेकर, किसी से बातचीत को लेकर ऐसे सवालों से सामना करना पड़ा. ऐसे प्रसंगों पर कई बार बात बदलने की कोशिश भी की मगर दूसरी तरफ से घूम-फिर कर बात को प्रेम-प्रसंगों पर लाकर टिका दिया जाता. ऐसा लगता जैसे उस समय किसी भी अन्य विषय से अधिक महत्त्वपूर्ण विषय लोगों के लिए हमारी प्रेम-कहानी को जानना रहता है. आजतक यह हमारी समझ से बाहर है कि ऐसा आखिर क्यों होता है? क्या उसके पीछे अगले के मन में, अचेतन में छिपी प्रेम करने की भावना रहती है? क्या उसके मन में उसके प्रेम की स्थिति इस बहाने संतुष्टि का एहसास करती है? क्या इसी तरह से वह अपने प्रेम सम्बन्धी समय को पुनः जीना चाहता है?


अब एकबार फिर इसी तरह के सवालों से सामना करना पड़ रहा है. अपनी कुछ सच्छी कुछ झूठी के प्रकाशन पश्चात् एक नई पुस्तक के लेखन में जुट गए थे. पुस्तक प्रेम कहानियों को लेकर है. इसमें कहानियों को शामिल किया गया है. ज्यादातर कहानियाँ हमसे जुड़ी हुई हैं और सत्य हैं. हाँ, इसमें कल्पना का कुछ तड़का लगाते हुए इनको पठनीय बनाने का प्रयास किया है. इसके साथ-साथ प्रयास किया है कि दूसरे व्यक्ति की छवि, उसकी सामाजिकता, पारिवारिकता पर किसी तरह का प्रभाव न पड़े, न सकारात्मक और न ही नकारात्मक. इनमें से कुछ कहानियों को ब्लॉग पर प्रकाशित भी किया जा रहा है. इसके साथ-साथ उनको सोशल मीडिया पर भी शेयर किया जा रहा है. ऐसा किये जाने से इन कहानियों की पहुँच अधिकाधिक लोगों तक हो रही है. इसके चलते बहुत से परिचित लोगों के सवालों की बौछार होने लगी है. अभी तो बस इतना ही कहना है कि इनको बस कहानियाँ मानकर पढ़िए और यदि लगता है कि ये सच हैं तो उनको अपने दिल में बसाये रखिये.

प्रेम ही ऐसा विषय है जो कभी पुराना नहीं होता. कभी बासी नहीं होता. कभी विध्वंसक नहीं होता. प्रेम ही ऐसा विषय है जो व्यक्ति को व्यक्ति होना सिखाता है. इन्सान को इंसानियत सिखाता है. दुनिया को एक अलग दुनिया में ले जाता है. यदि अनुभव करना हो तो पहले-दूसरे प्रेम की बंधी-बँधाई सीमारेखा से बाहर निकल कर देखो. प्रेम की तरह उन्मुक्त हो उड़ कर देखो. निश्चित ही एक नई दुनिया का, सतरंगी दुनिया का अपने आसपास एहसास करोगे.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

08 मई 2019

सवाल करती ज़िन्दगी का खुद सवाल बन जाना


छोटे में जब ये गीत सुना करते थे ‘तुझसे नाराज नहीं ज़िन्दगी, हैरान हूँ मैं, तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं’ तो समझ नहीं पाते थे कि ऐसे कौन से सवाल ज़िन्दगी पूछती है. उस समय उम्र भले कम थी मगर ये समझ आता था कि ज़िन्दगी और मौत क्या है. उम्र बढ़ती गई और इस गीत के मायने भी समझ आते गए. गीत के मायने समझ आने के साथ समझ आये ज़िन्दगी के सवाल. वे सवाल जो ज़िन्दगी लगातार पूछती रहती है. इधर उसके पूछे एक सवाल का जवाब दिया नहीं कि उसने तुरंत दूसरा सवाल सामने रख दिया. ज़िन्दगी के द्वारा सवालों की श्रंखला समाप्त होती नहीं है, बल्कि समय के साथ सवालों में क्लिष्टता आती जाती है. ज़िन्दगी के सवालों की क्लिष्टता उस समय और बढ़ जाती है जबकि सबकुछ जानते-समझते होने के बाद भी व्यक्ति कुछ न कर पाने की स्थिति में होता है. ज़िन्दगी में सबसे कठिन समय यही होता है जबकि ज़िन्दगी के दिए गए सवालों का हल व्यक्ति के पास है मगर हालात उसे अवसर प्रदान नहीं करते कि वह उन सवालों का जवाब दे सके. 


ज़िन्दगी का सवाल करते जाना किसलिए होता है, ये कभी समझ नहीं आया. उस समय भी समझ नहीं आता था जबकि ज़िन्दगी के सवाल क्लिष्ट नहीं हुआ करते थे, आज भी समझ नहीं आया जबकि ज़िन्दगी खुद एक सवाल बन गई है. हर एक पल के बाद, हर एक स्थिति के बाद, हर एक सवाल के बाद खुद से ही कई सारे सवाल उपजते हैं क्यों, कैसे, किसलिए, कब तक?  ऐसे सवालों के बीच लगता है जैसे ज़िन्दगी ने सवाल करना छोड़ दिया है वरन अब वह खुद ही सवाल बन गई है. यदि यही ज़िन्दगी है तो फिर ज़िन्दगी के सवाल क्या हैं और यदि यही सवाल हैं तो फिर ज़िन्दगी कहाँ है? क्या ज़िन्दगी का अर्थ सिर्फ और सिर्फ सवालों के जवाब खोजते रहना है? क्या ज़िन्दगी का अर्थ सिर्फ और सिर्फ हालातों को नियंत्रित करते रहना है? क्या ज़िन्दगी का अर्थ सिर्फ और सिर्फ समायोजन खोजते रहना है. लगता है कि ऐसे हालातों के साथ चलते-चलते व्यक्ति नितांत अकेला रह जाता होगा. हालातों को नियंत्रित करते-करते कई बार वह खुद ही अनियंत्रित हो जाता होगा. कई बार समायोजित होने की लालसा में उसका खुद से सामंजस्य टूट जाता होगा. यदि वाकई ऐसा होता होगा तो फिर वह ज़िन्दगी कैसे? यदि वाकई ऐसा होता होगा तो ऐसा व्यक्ति ज़िन्दगी से हैरान भी रहता होगा, परेशान भी रहता होगा.

ज़िन्दगी के सवालों की दौड़ में जवाब खोजने का काम चलता रहता है. ज़िदगी आगे बढ़ती जाती है और व्यक्ति कहीं पीछे छूट जाता है. यही पीछे छूट जाना समाज की निगाह में किसी व्यक्ति की, किसी सपने की, किसी आकांक्षा की मृत्यु होती है. व्यक्ति इसे समझे बिना बस ज़िन्दगी के सवालों को हल करने की जद्दोजहद में लगा रहता है, बिना इस बात की परवाह किये कि कहीं ज़िन्दगी उसे छोड़कर आगे तो नहीं निकली जा रही. ज़िन्दगी के सवालों को खोजने के क्रम में व्यक्ति को ज़िन्दगी के साथ तालमेल बिठाते हुए आगे बढ़ना चाहिए. कोशिश करनी चाहिए कि ज़िन्दगी उसे छोड़कर आगे न निकले. यही स्थिति ऐसी होती है जबकि व्यक्ति ज़िन्दगी के सवालों को खोज लेता है और ज़िन्दगी को सवाल बनने से भी रोक लेता है.

09 अगस्त 2016

इरोम के मौन संघर्ष की समाप्ति और सवाल

सोलह वर्ष से चला आ रहा अनशन आज समाप्त करने की घोषणा मणिपुर की आयरन लेडी इरोम चानू शर्मिला ने की. आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट (AFSPA-अफस्पा)को ख़तम करने के लिए शुरू किया गया उनका अनशन संभव है कि युवा भावुकता के साथ आरम्भ हुआ हो किन्तु उसका एकाएक समापन भावुकता के कारण नहीं हुआ है. AFSPA-अफस्पा वह विशेष कानून है जो पूर्वोत्तर राज्यों के विभिन्न हिस्सों में लागू है. इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को किसी को भी देखते ही गोली मारने या बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार है. शर्मिला इसके खिलाफ इम्फाल के जस्ट पीस फाउंडेशन नामक गैर सरकारी संगठन से जुड़कर भूख हड़ताल कर रही हैं. मणिपुर के ईटानगर के एक कस्बे में नवम्बर 2000 में सैनिकों की गोलीबारी में 10 नागरिक मारे गए थे. उनमें से कोई भी इरोम का दोस्त या रिश्तेदार नहीं था किन्तु इरोम इससे बहुत विचलित हुई. इस एक घटना के परिणामस्वरूप अट्ठाईस वर्षीय लड़की ने अनशन करने का मन बनाया. इरोम ने इसके लिए किसी से चर्चा नहीं की, अपने किसी दोस्त, रिश्तेदार, संगठन आदि को भी नहीं बताया. अपनी माँ के पास आकर उनका आशीर्वाद लिया और अपना अनशन शुरू कर दिया. परिवार वालों को बाद में पता चला कि इरोम ने AFSPA-अफस्पा हटाने के लिए भूख हड़ताल करने का फ़ैसला लिया है.

इरोम शर्मिला 
उस समय मालोम गाँव, जहाँ उक्त घटना घटित हुई थी, के लोग भी नहीं चाहते थे कि इरोम वहाँ भूख हड़ताल करें. उन्हें डर था कि इस कारण ग्रामवासियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं. धारे-धीरे लोग इरोम के समर्थन में जुटने लगे. शुरूआती दौर में इसे युवा जोश मानकर शासन-प्रशासन द्वारा बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया. बाद में भूख हड़ताल लंबी खिचने पर इरोम पर आत्महत्या करने का आरोप लगा कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद से उनको लगातार हिरासत में ही रखा गया. न्यायालय में उनसे अनशन समाप्त करने के बारे में पूछा जाता और उनका जवाब हर बार न में होता. सरकार ने शर्मिला को आत्महत्या के प्रयास में गिरफ्तार किया था और ऐसी गिरफ्तारी एक साल से अधिक नहीं हो सकती अतः हर साल उन्हें रिहा करते ही दोबारा गिरफ्तार कर लिया जाता था. नाक से लगी एक नली के द्वारा उनको भोजन दिया जाता. बार-बार गिरफ़्तारी और नली के सहारे भोजन देने की प्रक्रिया के चलते एक सरकारी अस्पताल के एक कमरे को अस्थायी जेल बना दिया गया था. यद्यपि इरोम को 20 अगस्त 2014 को सेशन कोर्ट के आदेश से रिहा कर दिया गया किन्तु मणिपुर की राजधानी इंफाल के लगभग बीचों-बीच बना यही अस्पताल एक दशक से भी ज़्यादा समय से इरोम शर्मिला का घर रहा है. इन सोलह वर्षों में इरोम ने एक तरह की तपस्या सी की. उन्हें हर पन्द्रह दिन पर इंफाल के जवाहर लाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज से कोर्ट ले जाया जाता रहा. उनकी गाड़ी उनके असली घर के सामने से गुज़रती. किन्तु इरोम ने अपनी माँ से लिए प्रण के चलते उनसे या अपने परिजनों से मिलने की कोशिश नहीं की. बाकी बाहरी लोगों को उनसे मिलने की अनुमति भी नहीं थी. विशेष परिस्थितियों में, विशेष अनुमति के बाद कुछ लोगों को उनसे मिलवाया गया. सोलह वर्षों से अस्पताल ही उनकी दुनिया रहा है. इन सालों में उनकी जीभ ने किसी खाद्य-पदार्थ का स्वाद नहीं चखा. इस दौरान उनका ब्रश करना रुई के सहारे रहा ताकि और बिना पानी गलती से उनके होठों को न छू जाए.


इस विषम स्थिति के बाद, सोलह वर्षों से नाक की नली से दिए जाते भोजन के सहारे जिन्दा इरोम का अनशन समाप्त करने का फैसला उतना ही चौंकाने वाला रहा जितना कि अनशन शुरू करने वाला था. अनशन समाप्त करना, अपने ब्रिटिश प्रेमी-सहयोगी से विवाह करने तथा चुनाव लड़ने की घोषणा से लगता है कि उनके अनशन का आरम्भ भले ही युवा भावुकता हो किन्तु उसका समापन भावुकता की परिणति कदापि नहीं है. मीडिया में उनके अनशन समाप्ति को, उनके द्वारा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में उतरने को क्रांतिकारी कदम बताया जा रहा है. सम्भावना जताई जा रही है कि इरोम के लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने के बाद उनके संघर्ष को धार मिलेगी. माना जा रहा है कि राजनीति में बढ़ते जा रहे अँधियारे के बीच इरोम जैसे संघर्षशील लोग रौशनी का कार्य कर सकते हैं. और भी कई-कई सम्भावनाओं पर विचार किया जा रहा है. अनेकानेक भावी क़दमों की अपेक्षा की जा रही है. जिस समय इरोम ने अनशन शुरू किया था, उस समय भी किसी ने उसका भविष्य नहीं जाना था. अब जबकि उनका अनशन समाप्त हो चुका है कोई नहीं कह सकता कि भविष्य क्या होगा. सम्भावनाओं, अपेक्षाओं के बीच जो मूल बिन्दु सामने आता है वो यह कि आखिर इतने लम्बे संघर्ष के बाद हासिल क्या हुआ? जिस AFSPA-अफस्पा के लिए उनका अनशन चल रहा था उसमें किंचित मात्र भी संशोधन नहीं किया गया. ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सोलह वर्षों के अपने संघर्ष के बाद भी किसी तरह का परिणाम न आते देख इरोम अन्दर से टूटने लगी हों? अपना अनशन उनको निरर्थक समझ आने लगा हो? समाज में रहने के बाद भी सामाजिक स्थितियों से दूर रखी गई इरोम के भीतर नैराश्य न जन्मने लगा हो? युवा आँखों के सपनों के असमय मरने का डर पैदा न हो गया हो? अनशन समाप्ति की घोषणा के साथ ही साथ विवाह करने और चुनाव लड़ने की घोषणा ऐसे सवालों को जन्म देती ही है. बहरहाल अंतिम सत्य क्या है इसे सिर्फ इरोम ही जानती है, वही बता सकती है. इरोम का अनशन समाप्त करना यदि सवालों को जन्म देता है तो इतनी लम्बी समयावधि में सरकारों की चुप्पी भी अनेक सवालों को जन्म देती है. क्या शांतिपूर्ण चलने वाले अनशन का कोई महत्त्व नहीं? क्या अकेले व्यक्ति का संघर्ष सकारात्मक परिणाम लाने के लिए सरकार को मजबूर नहीं कर सकता? AFSPA-अफस्पा समाप्त करना सरकारों को भले ही तर्कसंगत न लगता हो किन्तु सोलह वर्षों के संघर्ष को नजरअंदाज करना क्या तर्कसंगत है?
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(चित्र गूगल  छवियों से साभार लिया गया है) 

03 नवंबर 2015

करवाचौथ व्रत का आयोजन किसलिए - सोचिये, विचारिये

भक्ति, आस्था के सागर में हिलोरें लेता हुआ पति-पत्नी के आपसी विश्वास-प्रेम का पर्व करवाचौथ बीत गया. चाँद को देखकर दिनभर से निर्जला व्रत रही पत्नी ने अपना उपवास खोला और अपने पति की लम्बी उम्र की कामना की. कितना हास्यास्पद सा लगता है आज के आधुनिक समाज में जबकि उन्नत और विकसित चिकित्सकीय सुविधाएँ, सेवाएँ भी किसी की मृत्यु को नहीं रोक पा रही हैं, चन्द महिलाएँ भूखे पेट रहकर चाँद से सिफारिश कर रही हैं अपने पति की उम्र बढ़ाने की. आपको लगता है हास्यास्पद या नहीं, सच-सच कहियेगा? संभव है कि आपको कई बार ये हास्यास्पद लगता हो और कई बार आप भारतीय संस्कृति के चलते इसे भक्ति-भाव से, आपसी समन्वय से जोड़कर देखते हों और हास्यास्पद न मानते हों. कितनी बड़ी विडम्बना है कि जहाँ एक तरफ हमारा समाज पढ़-लिख कर चाँद को अपने पैरों तले रौंदने को तैयार बैठा है वहाँ आज की युवा महिला पीढ़ी ही उसी चाँद की पूजा करते हुए अपने पति की दीर्घायु की कामना कर रही है. क्या है आखिर ये सब? क्यों है आखिर ये सब? किसलिए है आखिर ये सब? क्या महज इसलिए कि समाज को दिखाने के लिए पारिवारिक संस्कारों का निर्वहन करना है? क्या महज इसलिए कि कहीं न कहीं आधुनिक शिक्षित पीढ़ी और दकियानूसी होती जा रही है और मानती है कि उसके व्रत-उपवास से जीवन-चक्र में अन्तर आता है? क्या महज इसलिए कि इस तरह के आयोजन भारतीय स्त्रियों को विभिन्न क्रियाकलापों के लिए स्वतंत्रता प्रदान करते हैं? क्या महज इसलिए कि इस तरह के व्रत-उपवासों के द्वारा ऐसी स्त्रियाँ पतियों के दीर्घायु होने की कामना की आड़ में अपने वैधव्य को बचाना चाहती हैं? अंतिम बात शायद ज्यादा कड़वी महसूस हो किन्तु किसी न किसी रूप में एक सत्य ये भी है इस व्रत का.
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करवाचौथ व्रत का आयोजन किन सन्दर्भों, परिस्थितियों में आरम्भ हुआ था, इसकी अपनी अलग कहानी है किन्तु आज जबकि स्त्री-पुरुष संबंधों को, खासतौर से पति-पत्नी के आपसी संबंधों को भी स्त्री-विमर्श के सींकचे में जकड़ लिया गया हो; महिलाओं के किसी भी काम को पुरुषों से इतर और विशिष्ट बताकर स्त्री-पुरुष संबंधों में विभेद पैदा किया जा रहा हो; पुरुष के किसी भी कदम को स्त्री-विरोधी बताकर दोनों के बीच के संबंधों में ज़हर भरा जा रहा हो; जब आस्ता-विश्वास से भरे किसी भी कदम को, आयोजन को एहसान सिद्ध करने के प्रयास किये जाते हों तो ऐसे व्रतों के आयोजन भी संदिग्ध समझ आते हैं. संभव है कि किसी समय में ऐसे व्रत-उपवास का सन्दर्भ पति-पत्नी के आपसी विश्वास-प्रेम की अभिव्यक्ति करना रहा हो, ये सवाल उठाया जा सकता है कि इस अभिव्यक्ति के लिए पुरुष को व्रत रहने का प्रावधान क्यों नहीं किया गया? बहरहाल, समाज ने आधुनिकता के चलते इक्कीसवीं सदी में प्रवेश किया और फिर पुरातनकाल से चले आ रहे आयोजनों पर अनेक विमर्शधारियों द्वारा सवाल खड़े किये जाने लगे. पारिवारिक रिश्तों पर सवाल खड़े किये गए; भाई-बहिन के रिश्तों को कलंकित किया गया; सभी रिश्तों की बुनियाद को स्वार्थ से जोड़कर, आर्थिक तत्त्व से जोड़कर, नारी-देह से जोड़कर उसको विद्रूपता के साथ परिभाषित किया गया. नारीवादियों ने स्त्री-पुरुष के किसी भी कदम को अपने-अपने तरीके से परिभाषित किया और दोनों के संबंधों को स्वार्थमय सोच में बदलने का कुत्सित प्रयास किया. इसके लिए ऐसे व्रतों, आयोजनों, पर्वों को उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है जो स्त्री-पुरुष से किसी न किसी रूप में आपस में जुड़े हुए हैं.

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रक्षाबंधन पर्व को बहुतायत नारीवादियों द्वारा बहिनों का शोषण करने वाला बता कर इस पर्व के साथ-साथ भाइयोंको भी कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है. एक प्रसिद्द नारीवादी लेखिका का यहाँ तक कहना है कि एक धागे के बंधवाने पर चंद रुपये देकर भाइयों द्वारा बहिनों का मुँह सालभर के लिए बंद कर दिया जाता है ताकि वे पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा न मांगें. क्या वाकई इस व्रत का आयोजन इसीलिए किया जाता है? कुछ इसी तरह के कुतर्क करवाचौथ को लेकर दिए जाने लगे हैं. पुरुष अपनी पत्नी की दीर्घायु के लिए  व्रत क्यों नहीं रहते रहे हैं, इसके कारण खोजने पड़ेंगे किन्तु एक तरफ इन्हीं नारीवादियों की मान्यता है कि व्रत रहने से, चाँद की पूजा करने से किसी की उम्र नहीं बढ़ती तो फिर वे नारीवादी पतियों के व्रत न रहने को आरोपित क्यों करती हैं? आज के वैज्ञानिक युग में जबकि एक तरफ स्त्रियों की शिक्षा, उन्नति, आर्थिक सशक्तिकरण की चर्चा की जा रही है वहीं इस तरह के कुतर्कों के द्वारा पत्नियों के व्रत को समर्थन दिया जा रहा है. कतिपय हिन्दी फिल्मों के चलते बहुतायत में नौजवान आज अपनी पत्नी के साथ इस दिन व्रत रहने लगा है तो उसका क्या सन्दर्भ निकाला जाये कि अब पत्नियाँ भी दीर्घायु होने लगेंगी? इसके क्या सन्दर्भ निकाले जाएँ कि चाँद की पूजा करने से, व्रत रहने से किसी व्यक्ति की आयु को प्रभावित किया जा सकता है? यदि ये सत्य नहीं है तो फिर नारीवादियों द्वारा क्या सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है? पत्नी द्वारा व्रत रखकर पति के ऊपर एहसान किये जाने की बात कह कर क्या साबित करने का प्रयास किया जा रहा है? यदि ऐसे व्रत-उपवासों से पति की आयु बढ़ रही होती तो देश में वैधव्य जीवन बिता रही स्त्रियों की संख्या इस कदर न होती. ऐसे व्रतों-उपवासों को महज आपसी विश्वास, प्रेम, स्नेह का परिचायक माना जाना चाहिए और उन्हें विवादों से दूर बनाये रखने का प्रयत्न किया जाना चाहिए. विवाद के नाम पर रिश्तों के कलंकित होने के सिवाय और कुछ नहीं मिलने वाला. यदि इसी को आधार बनाया जाए तो जिस तरह से नारीवादी पुरुष की आलोचना करते हुए स्त्रियों के व्रत रहने को एहसान बताते हैं ठीक उसी तरह से कहा जा सकता है कि कहीं करवाचौथ का व्रत पत्नियाँ अपने आपको वैधव्य से बचाने के लिए तो नहीं रखती हैं? आखिर उनके पति की उनसे पहले मृत्यु उनको वैधव्यपूर्ण जीवन दिखाती है. यदि व्रत-उपवास किसी की उम्र को प्रभावित करते हैं तो सोचिये और विचार करिए कि इस व्रत की वास्तविक असलियत है क्या, पति की दीर्घायु की कामना या फिर अपने को वैधव्य से बचाने का प्रयास? 
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01 अक्टूबर 2015

पक्षपाती भावना से किया गया लाठीचार्ज


          प्रशासन का दायित्व किसी भी रूप में शांति व्यवस्था बनाये रखना होता है. इसके लिए कई बार प्रशासन की तरफ से कठोर कदम उठाये जाते हैं. इन कठोर क़दमों में अकसर प्रशासनिक स्तर पर लाठीचार्ज करना, आँसू गैस के गोले छोड़ना, पानी की बौछार करना, प्लास्टिक की गोलियां चलाया जाना आदि शामिल हो जाता है. इस तरह के कदम प्रशासन की तरफ से उस समय उठाये जाने आवश्यक प्रतीत होते हैं जबकि हालात उनके नियंत्रण से बाहर के दिखाई देते हैं. प्रशासनिक दृष्टि में महज इतना स्पष्ट होना चाहिए कि सामने खड़ी भीड़ के अनियंत्रित होने से कानून व्यवस्था को समस्या है, सम्बंधित इलाके में अराजकता फ़ैल सकती है, जान-माल को नुकसान पहुँच सकता है. ऐसे में यदि प्रशासन किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कार्य करने लगे, भीड़ का जातिगत, धार्मिक चेहरा देखकर कार्य करने लगे, किसी वर्ग विशेष को संतुष्ट करने के लिए उक्त कार्य को अंजाम देने लगे तो स्पष्ट है कि उस समय प्रशासन का उद्देश्य न तो भीड़ को नियंत्रित करना है और न ही वातावरण को सामान्य बनाना है वरन सरकार के पूर्वाग्रहों को संतुष्ट करना है. 

          इस बार इस पूर्वाग्रह का शिकार बने गंगा नदी में मूर्ति विसर्जित करने निकले साधु-संत-बाबा और साथ में नन्हे-नन्हे, मासूम बटुक. देश की धार्मिक नगरी वाराणसी में रात के अंधियारे में प्रशासन द्वारा महज इस कारण से जबरदस्त लाठीचार्ज किया गया क्योंकि ये साधु-संत पावन नदी गंगा में गणेश विसर्जन करना चाहते थे. इन लोगों द्वारा मूर्ति विसर्जन की जिद सही थी या गलत, ये आकलन बाद का विषय है. प्रथम दृष्टया इसका आकलन होना चाहिए कि जिस तरह से बर्बरतापूर्ण ढंग से, गलियों में दौड़ा-दौड़ा कर पुलिसकर्मियों द्वारा इनको पीटा गया क्या वो सही था? ये सही है कि विगत कई वर्षों से लगातार सरकारी स्तर पर देश में नदियों के साफ़-सफाई हेतु ध्यान दिया जा रहा है; कल-कारखानों के गंदे पानी को, नगरों के मलमूत्र अपशिष्ट आदि को नदियों में जाने से रोकने के प्रबंध किये जा रहे हैं किन्तु जिस तरह से मूर्ति विसर्जन रोकने के नाम पर वहाँ उपस्थित लोगों को जिस तरह से पीटा गया, वो निंदनीय है. 

          स्थानीय प्रशासन को इस बात का जवाब देना होगा कि क्या उसके द्वारा गंगा नदी में गंदगी फ़ैलाने वाले सभी कारकों का निस्तारण कर दिया गया है? क्या किसी भी रूप में गंगा में आसपास स्थित कल-कारखानों, घरों, बाज़ार आदि के अपशिष्ट आदि का गिरना नहीं हो रहा है? क्या प्रशासन गंगा में किसी भी तरह से गंदगी फ़ैलाने वालों के विरुद्ध भी इसी तरह की कठोर कार्यवाही करता है? यदि प्रशासन द्वारा किसी भी रूप में सत्ताधारी राजनीति की अपनी किसी मजबूरी के चलते, सत्ताधारी राजनीति की तुष्टिकरण की नीति के चलते ऐसा कदम उठाया गया है तो ये प्रशासन की अक्षमता है. ऐसे में सरकार को समझाना चाहिए कि क्या उसके द्वारा प्रदेश में नदियों की स्वच्छता सम्बन्धी आवश्यक और अनिवार्य कदमों को पूर्ण रूप से उठाया जा चुका है? क्या गंगा नदी के सन्दर्भ में ही स्वच्छता सम्बन्धी नियमों का सख्ती से पालन किया जा रहा है? क्या जहाँ-जहाँ से गंगा नदी प्रवाहित हो रही है वहाँ-वहाँ उसके आसपास बने कल-कारखानों का गन्दा पानी, अपशिष्ट आदि को गंगा नदी में गिरने से पूरी तरह से रोका जा सका है? सम्पूर्ण प्रदेश न सही, क्या सरकार ने वाराणसी में ही गंगा नदी को उच्च स्तरीय रूप से स्थापित करने हेतु कोई ठोस कदम उठाया है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर मूर्ति विसर्जन के नाम पर एकाएक सख्ती को दिखाने के पीछे का मंतव्य आसानी से समझ में आ सकता है. उत्तर प्रदेश में वर्तमान सरकार के कार्यकाल में ये कोई पहला अवसर नहीं है जबकि हिन्दू धर्मावलम्बियों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया गया है. अनेक अवसरों पर एक वर्ग विशेष के प्रति तुष्टिकरण सम्बन्धी नीति अपनाकर प्रशासन द्वारा कठोर एवं सख्त कदम उठाये गए. स्पष्ट है कि सरकार कहीं न कहीं खुद को एक धर्म विशेष का, एक वर्ग विशेष का समर्थक दिखाना चाहती है जो उसके लिए चुनावी मौसम में वोट-बैंक के रूप में सफल सिद्ध हो.

यहाँ एक बात और कि सरकारी स्तर पर, प्रशासनिक स्तर पर नदियों में गिरती गन्दगी को रोकने के लिए भले ही बहुत सकारात्मक कार्य न किये गए हों; भले ही वर्तमान परिदृश्य में गंगा नदी में उसके आसपास स्थित कल-कारखानों, नगरीय इलाकों, बस्तियों आदि से अपशिष्ट, मलमूत्र, गंदगी, कचरा आदि लगातार गिराया जा रहा हो किन्तु इसके चलते किसी भी रूप में गंदगी फ़ैलाने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती है. सामाजिक रूप से नागरिकों को भी इसके लिए सचेत और जागरूक होने की आवश्यकता है और इसकी महती आवश्यकता उस समय प्रतीत होती है जबकि यह प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र की घटना हो. आवश्यक नहीं कि जो कार्य सदियों से होता आ रहा हो उसे काल-परिस्थिति के अनुसार बदला न जा सके. किसी समय में नदियों में जल-प्रवाह तेजी से हुआ करता था, उनके आसपास कल-कारखानों की इतनी बड़ी संख्या नहीं थी, नदियों में गिरने वाले अपशिष्ट की मात्र भी इतनी अधिक नहीं थी जैसी कि आज है. उस समय नदियों में मूर्ति-विसर्जन इस कारण भी सहजता से संपन्न हो जाता था क्योंकि मूर्तियों के रंगों में रासायनिक तत्त्वों का प्रयोग नहीं किया जाता था. अब जबकि मूर्तियों को सजाने-संवारने में अनेकानेक रासायनिक तत्त्वों का प्रयोग किया जा रहा है; मूर्तियों के साथ में उपयोग की गई सहायक सामग्री आदि को भी भरपूर मात्रा में प्रवाहित किया जा रहा है तब नागरिकों को, धर्मावलंबियों को, साधु-संतों को स्वयं गंगा नदी की स्वच्छता के प्रति, नदियों की स्वच्छता के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है.

बहरहाल गंगा नदी की स्वच्छता को लेकर, नदियों में गिरते अपशिष्ट को रोकने के सम्बन्ध में सरकारी स्तर पर, नागरिक स्तर पर क्या और कैसे प्रयास किये जा रहे हैं ये किसी से छिपा नहीं है. इसके बाद भी सत्यता यही है कि वाराणसी में रात के अंधियारे में मूर्ति-विसर्जन कर रहे लोगों पर बर्बरतापूर्ण लाठीचार्ज किया गया. जहाँ आज भी गंगा नदी में भारी मात्रा में गिरते अपशिष्ट को रोकने में स्थानीय प्रशासन नाकाम रहा है, सरकारी स्तर पर किये जा रहे प्रयास असफल सिद्ध हो रहे हैं वहाँ एक मूर्ति-विसर्जन होने देने से कोई आफत नहीं आ रही थी. चूँकि प्रशासन सत्ताधारी राजनैतिक दल के हाथों संचालित होकर सम्पूर्ण गतिविधि को अंजाम दे रहा था और सत्ताधारी पक्ष किसी दूसरे वर्ग विशेष को आकर्षित करने की मानसिकता से संचालित था. ऐसे में ये लाठीचार्ज महज लाठीचार्ज नहीं था, ऐसे में यहाँ महज मूर्ति-विसर्जन को रोकना उद्देश्य नहीं था; यहाँ गंगा नदी की स्वच्छता मात्र का ध्यान नहीं रखा जा रहा था वरन रात के अंधियारे में किये गए लाठीचार्ज के द्वारा कई-कई निशाने साधने के प्रयास किये गए थे. सरकारी स्तर पर ऐसी सोच वाकई चिंतनीय है, निंदनीय है.

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02 अप्रैल 2015

मौत, तू कविता नहीं हो सकती


बारिश से तबाह हो चुके किसानों में बहुत से किसानों द्वारा आये दिन आत्महत्याएँ करने की, बहुत से किसानों द्वारा सदमे से मृत्यु का शिकार होने की दर्दनाक खबरें सुनने-पढ़ने-देखने को मिल रही हैं. ऐसी खबरों से मन दुखी हो जाता है और याद आता है मौत को लेकर तमाम सारे साहित्यकारों, कवियों, दार्शनिकों का शायराना अंदाज़ में बातें करना. जिनमें कोई मौत को कविता बताकर उसका गुणगान करता है, कोई मौत को महबूबा मान उसकी वफा के किस्से सुनाता है, किसी के लिए मौत खुशनुमा के सामान है, किसी के लिए मौत वो रंगीनी है जिसके लिए व्यक्ति जिन्दगी छोड़ देता है. इस बात में कोई दोराय नहीं कि मृत्यु जीवन का अकाट्य सत्य है किन्तु इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन साहित्यिक, शायराना अंदाज़ बातों से इतर मृत्यु हमेशा कष्टकारी ही रही है. ऐसे में भले ही मौत इस नश्वर जीवन का कितना भी बड़ा सत्य क्यों न हो, हमारी दृष्टि में वह कदापि सुखद, शायराना, महबूबा जैसी नहीं हो सकती है.
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यदि हम अपने आसपास देखें तो आये दिन किसी न किसी रूप में मौत के दर्शन हो ही जाते हैं. कोई अपनी पूर्ण अवस्था प्राप्त कर मौत के आगोश में जाता है तो कोई असमय ही काल का ग्रास बन जाता है. कोई सहजता से इस संसार से विदा होता है तो कई बीमारियों से लड़ते हुए अपनी अंतिम सांस लेते हैं. कभी दुर्घटना में, कभी आपदाओं में, कभी आतंकी घटनाओं में, कभी किसी अन्य कारण से अनेक लोग मौत के मुंह में जाते हैं और शायद ही किसी व्यक्ति को किसी की मृत्यु में शायराना, महबूबा जैसा कोई स्वरूप दिखलाई दिया हो? यह बात समझ से परे है कि दुर्घटना में शिकार हुये किसी बच्चे की मृत्यु शायराना कैसे हो सकती है? किसी युवा की मृत्यु को उसकी महबूबा कैसे कहा जा सकता है? किसी आतंकी हमले में मारे गये मासूमों के लिए मौत किस तरह की कविता बनकर आती होगी? कैसे हताश-निराश किसान मृत्यु को रंगीनी समझकर उसके लिए जिंदगी त्यागता होगा? उफ!!! कितना वीभत्स और दर्दनाक है इन घटनाओं में मृत्यु का शायराना स्वरूप सोच पाना. हां, जब व्यक्ति अपने समस्त दायित्वों, कर्तव्यों का पूर्णरूप से निर्वहन कर ले, अपनी आयु की पूर्णता प्राप्त कर ले और समस्त सामाजिकताओं को सम्पन्न करने के बाद इस संसार से विदा ले तो संभव है कि उसके लिए मौत महबूबा, कविता, शायराना हो सके. इसके बाद भी यह स्थिति अपने आपमें किन्तु, परन्तु के बीच भटकती दिखती है.
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आज जबकि व्यक्ति सामाजिक रूप से अपने दायित्वों, अपने कर्तव्यों को पूर्ण कर पाने में असफल सा दिख रहा है; आपाधापी और तनाव भरी जिन्दगी में असमय ही कालकलवित होते दिख रहा है; आधुनिकता के वशीभूत व्यतीत होने वाली जीवनशैली ने व्यक्तियों की आयु को लगातार कम ही किया है ऐसे में कैसे कल्पना की जाये कि किसी की मौत भी कविता होती होगी, किसी को अपनी मृत्यु महबूबा सी दिखती होगी, किसी के लिए मौत शायराना होती होगी. जिन्दगी का सत्य यही है कि मौत एक न एक दिन आनी है और यह भी सत्य है कि मौत हमेशा ही कष्ट देती है. यह कष्ट मौत पाने वाले को, उसके परिवार वालों, परिचितों को, आसपास वालों को अवश्य ही होता है. मृत्यु के इस कष्ट को दूर करने का क्षणिक प्रयास मात्र ही उसे कविता रूप में, महबूबा रूप में, शायराना रूप में समाज के सामने रखना यथोचित समझा गया हो किन्तु अन्ततः मौत मार्मिक होती है, कष्टकारी होती है, दुखद होती है; वह चाहे किसी अपने की हो अथवा किसी गैर की; किसी वृद्ध की हो, युवा की हो अथवा बचपने की; उल्लास में, सुख में, समृद्धि में डूबे परिवार के सदस्य की हो अथवा हताशा, निराशा, अवसाद में घिरे किसी परिवार के सदस्य की हो. मौत तो आखिर मौत ही होती है, जो दर्द देती है, दुःख देती है, आँसू देती है.  

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23 जनवरी 2015

नेता जी की मृत्यु का राज कब तक



सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु पर आज तक संदेह बना हुआ है. इस संदेहास्पद स्थिति के साथ-साथ एक विद्रूपता ये है कि देश की आज़ादी के पूर्व से लेकर आज़ादी के बाद अद्यतन भारत सरकार द्वारा किसी भी तरह की ठोस सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई है. हालाँकि तीन-तीन जाँच आयोगों के द्वारा विभिन्न सरकारों ने औपचारिकता का ही निर्वहन किया है और वो भी कुछ जागरूक सक्रिय नागरिकों के हस्तक्षेप के बाद. इस बात को बुरी तरह से प्रसारित करने और एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को एक विमान दुर्घटना में हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था और ये स्थिति आज भी बनी हुई है.

विमान दुर्घटना और मृत्यु का सच
नेता जी की विमान दुर्घटना को लेकर, उनकी मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेता जी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बारसेंट्रल डेली न्यूज़से पता चलता है कि १८ अगस्त १९४५ के दिन ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नही हुआ था. इसी तथ्य पर हिन्दुस्तान टाइम्सके भारतीय पत्रकार (मिशन नेताजीसे जुड़े) अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि १४ अगस्त से २५ अक्तूबर १९४५ के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। (तब ताईहोकू के इस हवाई अड्डे का नाम मात्सुयामा एयरपोर्टथा और अब इसका नामताईपेह डोमेस्टिक एयरपोर्टहै।) बाद में २००५ में, ताईवान सरकार के विदेशी मामलों के मंत्री और ताईपेह के मेयर मुखर्जी आयोग के सामने भी यही बातें दुहराते हैं. नेता जी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि वो शव नेता जी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुराका था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेता जी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे-लपेटे ही कर दिया गया था, जिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का. मृत्यु प्रमाण-पत्र का दोबारा बनाया जाना भी इस संदेह को पुष्ट करता है कि नेता जी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी.

दुर्घटना के बाद नेता जी का प्रवास
ये तथ्य किसी से भी छिपा नहीं है कि नेता जी का आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना और इटली, जापान, जर्मनी से मदद लेने के पीछे एकमात्र उद्देश्य भारत देश को स्वतंत्र करवाना था. उनकी इन गतिविधियों को ब्रिटेन किसी भी रूप में पसंद नहीं कर रहा था. ऐसे में उसने नेता जी को अंतर्राष्ट्रीय अपराधी घोषित कर दिया था.  इधर अंग्रेज भले ही भारत देश को स्वतंत्र करना चाह रहे थे किन्तु वे नेता जी को राष्ट्रद्रोही घोषित करके उनके ऊपर मुकदमा चलाने को बेताब थे. इसके साथ-साथ नेता जी के सहयोगी रहे स्टालिन और जापानी सम्राट तोजो किसी भी कीमत पर नेता जी को ब्रिटेन-अमेरिका के हाथों नहीं लगने देना चाहते थे. वे इस बात को समझते थे कि मित्र राष्ट्र में शामिल हो जाने के बाद ब्रिटेन-अमेरिका उन पर नेता जी को सौंपने का अनावश्यक दवाब बनायेंगे. हो सकता है तत्कालीन स्थितियों में इस दवाब को नकार पाना इनके वश में न रहा हो. ऐसे में इन सहयोगियों ने एक योजना के तहत नेता जी को अभिलेखों में मृत दिखाकर उन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवा दी हो. इस तथ्य को इस कारण से भी बल मिलता है कि नेता जी समेट वे तीन व्यक्ति (नेताजी के सहयोगी और संरक्षक के रूप में जनरल सिदेयी, विमान चालाक मेजर ताकिजावा और सहायक विमान चालक आयोगी) ही इस दुर्घटना में मृत दर्शाए गए थे जिन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवाई जानी थी.

भारत सरकार का रवैया
भारत सरकार ने वर्ष १९६५ में गठितशाहनवाज आयोगको ताइवान जाने की अनुमति नहीं दी थी. समूची की समूची जाँच आयोग ने देश में बैठे-बैठे ही पूरी कर ली थी. और शायद इसी का सुखद पुरस्कार उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करके दिया गया.
१९७० में गठितखोसला आयोगको भी रोका गया था किन्तु कुछ सांसदों और कुछ जन-संगठनों के भारी दवाब के कारण उसे ताइवान तो जाने दिया गया मगर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से संपर्क नहीं करने दिया गया.
मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार से जिन दस्तावेजों की मांग की वे आयोग को नहीं दिए गए. अधिकारियों ने वही पुराना राग अलापा कि एविडेंस एक्ट की धारा १२३ एवं १२४ तथा संविधान की धारा ७४(२) के तहत इन फाइलों को नहीं दिखाने का प्रिविलेजउन्हें प्राप्त है.
रूस में भी जाँच आयोग को पहले तो जाने नहीं दिया गया बाद में भारत सरकार की अनुमति के अभाव में आयोग को न तो रूस में नेताजी से जुड़े दस्तावेज देखने दिए गए और न ही कलाश्निकोव तथा कुज्नेट्स जैसे महत्वपूर्ण गवाहों के बयान लेने दिए गए.
भारत सरकार ने १९४७ से लेकर अब तक ताइवान सरकार से उस दुर्घटना की जाँच कराने का अनुरोध भी नहीं किया है.

 कुछ फ़र्ज़ हमारा भी है
आज भी हमारी सरकार के ताइवान के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं कायम हो सके हैं. इसके पार्श्व में नेहरू का, सरकारों का चीन-प्रेम भी हो सकता है. नेता जी के बारे में उपजे संदेह के बादलों को पहले तो स्वयं नेहरू ने और फिर बाद में केंद्र सरकारों ने छँटने नहीं दिया. पारदर्शिता बरतने के लिए लागू जनसूचना अधिकार अधिनियम के इस दौर में भी नेता जी से मामले में किसी भी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है. नेता जी दुर्घटना का शिकार हुए या अपनों की कुटिलता का; नेता जी देश लौटे या देश की सरकार ने उनको अज्ञातवास दे दिया; वे रूस में ही रहे या फिर कहीं किसी विदेशी साजिश का शिकार हो गए….ये सब अभी भी सामने आना बाकी है. ऐसे में सत्यता कुछ भी हो पर सबसे बड़ा सत्य यही है कि देश के एक वीर सपूत को आज़ादी के बाद भी आज़ादी नसीब न हो सकी. भले ही नेता जी अपने अंतिम समय में गुमनामी बाबा बनकर रहे और स्वर्गवासी हुए फिर भी उनकी आत्मा आज भी आज़ादी के लिए भटक रही है, तड़प रही है. ये हम भारतवासियों का फ़र्ज़ बनता है कि कम से कम आज़ादी के एक सच्चे दीवाने को आज़ाद भारत में आज़ादी दिलवाने के लिए संघर्ष करेंजय हिन्द!!