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16 जुलाई 2025

जहाँ हो वहाँ खुश रहो, सुखी रहो

आज की तारीख वैसे तो खुश होने की है मगर चाह कर भी खुश नहीं हो पाते हैं. ऐसा नहीं कि खुश रहना नहीं आता या फिर ख़ुशी ने अपना रास्ता बदल लिया है. इस तारीख को अब चाह कर भी खुश न रह पाने का कारण इसी तारीख वाले छोटे भाई से सम्बंधित है. आज छोटे भाई मिंटू का जन्मदिन है. जब उसका जन्म हुआ तब हमारी उम्र ने पूरी तरह से छह वर्ष की संख्या को छुआ नहीं था, इसके बाद भी उसके जन्म के समय की बहुत सारी घटनाएँ आज भी दिल-दिमाग में जीवित हैं.

 



जुलाई का महीना था और उस समय लोग आज की तरह कमरे में बंद रहकर, कूलर-एसी को अपनी आदत बनाकर नहीं सोते थे. सही कह रहे हैं, आखिर वो समय 1979 का था. उस समय सीलिंग फैन ही जबरदस्त हवा दिया करता था. रात में अनिवार्य रूप से छत पर सोने का उपक्रम हुआ करता था. उस रात भी हम लोग छत पर हँसते-गुनगुनाते सोने की तैयारी में लगे थे जबकि मिंटू के आने की खुशखबरी घर में आई.

 

बहरहाल, आज मिंटू के जन्मदिन को ख़ुशी से मना भी नहीं पा रहे हैं. जैसे ही खुश होने के विचार सामने आता है, जन्मदिन मनाने का भाव जगता है वैसे ही आँखों से आँसुओं की धार स्वतः चलने लगती है. आज से चार वर्ष पहले मिंटू की शारीरिक उपस्थिति हम लोगों के बीच शून्य में विलीन हो गई. उस दिन से उसका जन्मदिन मनाया जाता है मगर आँखों आँखों में, आँसुओं में, अकेले में.

31 जुलाई 2024

प्रेमचन्द से इतर भी है साहित्य

विषयों और विमर्शों का ताना-बाना बुनते हुए समाज निरंतर आगे ही बढ़ता रहता है. साहित्य अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किसी भी बहस, विमर्श पर अपनी नजर बनाये रखता है, इसीलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है. समय के साथ हुए अनेक परिवर्तनों को समाज ने स्वीकारा है किन्तु साहित्यिक जगत ने ऐसा करने में बहुत हद तक कंजूसी की है, आज भी करता है. इक्कीसवीं सदी आने के साथ ही वैश्विक रूप से बहुत कुछ बदला है. जीवन-शैली, मूल्यों, विचारों, परिवार, संस्कृति, रिश्तों आदि में न केवल परिवर्तन हुए हैं वरन पुरातन ढाँचों का विखंडन, विध्वंस भी हुआ है. ये और बात है कि प्रत्येक परिवर्तन, विखंडन, विध्वंस के साथ विरोधात्मक स्वरों का उठना होता रहा किन्तु परिवर्तनों को आवश्यकतानुरूप स्वीकारा भी जाता रहा. परिवर्तनों के इन्हीं विध्वंस और नव-निर्माण के क्रम से सामाजिक ताने-बाने का विस्तार होता रहा.

 

साहित्य में परिवर्तनों को स्वीकारने में खुलापन न मिलने को यदि आज की तारीख के सन्दर्भ में देखा जाये तो और भी स्पष्ट होता है. प्रतिवर्ष 31 जुलाई को साहित्य जगत में प्रेमचन्द जयंती का आयोजन देश भर में होता है. इन आयोजनों, कार्यक्रमों में प्रेमचन्द की परम्परा का जिक्र होता है, उनके साहित्य पर चर्चा होती है, उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला जाता है. इन सबके बीच कई सवाल भी खड़े होते हैं किन्तु उन पर विमर्श की दृष्टि से विचार करने की बजाय एकांगी रूप में विवाद किया जाता है. सवाल यह नहीं कि जिस कालखण्ड में प्रेमचन्द लेखन कर रहे थे, क्या उसी समय में उनके साथ कोई दूसरा लेखक साहित्य सृजन नहीं कर रहा था? सवाल यह भी नहीं कि जिस समय, परिस्थिति को देखते हुए प्रेमचन्द ने कहानियों, उपन्यासों का लेखन किया वे स्थितियाँ आज हैं अथवा नहीं? सवाल यह भी नहीं कि प्रेमचन्द की साहित्यिक परम्परा दक्षिणपंथी हैं, वामपंथी हैं या फिर कलावादी? सवाल यह भी नहीं कि प्रतिवर्ष जिस गम्भीरता से प्रेमचन्द के विचारों को प्रासंगिक मानते हुए मात्र मंचीय परम्पराओं में प्रसारित किया जाता है उनको उतनी ही गम्भीरता से आत्मसात क्यों नहीं किया जाता? सवाल यह भी नहीं कि आज की कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली पीढ़ी को प्रेमचन्द के उस साहित्य द्वारा क्या सन्देश दिया जा रहा है जो आज से लगभग एक सदी पूर्व लिखा गया था?

 



ऐसे सवाल इसीलिए खड़े होते हैं क्योंकि हिन्दी साहित्य ने विस्तीर्ण रूप से सोचने में, नवोन्मेषी साहित्यकारों को आत्मसात करने में दरियादिली नहीं दिखाई है. ऐसा लगभग प्रत्येक कालखंड में हुआ है जबकि नए रचनाकार को, किसी भी नई रचना को आलोचना के केन्द्र में रखते हुए उस पर स्वीकारात्मक दृष्टि नहीं डाली गई वरन अस्वीकरण भाव रखा गया. यदि प्रेमचन्द के समकालीन लेखकों पर ही समीक्षात्मक रूप से विचार किया जाये तो जयशंकर प्रसाद, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, शिवपूजन सहाय, राहुल सांकृत्यायन, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ आदि ऐसे साहित्यकार रहे हैं जिनकी गद्य रचनाओं का समग्र रूप में मूल्यांकन नहीं किया गया है. 1936 में प्रेमचन्द के निधन से पूर्व ही जैनेन्द्र, भगवती चरण वर्मा जैसे साहित्यकार अपने उपन्यासों के द्वारा साहित्यिक जगत में चमकने लगे थे. तत्कालीन साहित्यिक परिदृश्य में प्रेमचन्द के समकालीन साहित्यकारों पर विहंगम दृष्टि क्यों नहीं आरोपित की गई, इसके कारण भी तत्कालीन स्थितियों से निर्मित हुए होंगे लेकिन वर्तमान स्थितियों में हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रमों से समकालीन साहित्यकारों का, नवोन्मेषी साहित्यकारों का, रचनाओं का गायब रहना निश्चित ही अचंभित करने वाला तो है ही, शोध का विषय भी है.

 

आज जैसे ही पाठ्यक्रम परिवर्तन की चर्चा होती है, साहित्यकारों के नामों में बदलाव की बात होती है तो भूचाल सा आ जाता है, ऐसा एकाधिक बार हो चुका है. सोचने वाली बात है कि इक्कीसवीं सदी में जबकि सोचने, समझने, काम करने, रहन-सहन आदि का तरीका बदल चुका है; परिस्थितियों में परिवर्तन आ चुका है; तकनीकी में परिवर्तन आ चुका है; सामाजिक ढाँचे में बदलाव देखने को मिल रहे हैं; जीवन-मूल्यों में बदलाव आया है तब भी साहित्य के नाम पर लगभग विलुप्त हो चुकी स्थितियों को थोपने जैसा कार्य किया जा रहा है. हिन्दी साहित्य पाठ्यक्रमों में प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा स्तर तक या कहें कि शोध के स्तर तक प्रेमचन्द उपस्थित हैं. साहित्य महज पठन-पाठन का नहीं बल्कि खुद को समाज के सापेक्ष समझने-समझाने वाला माध्यम है. एक पल को विचार कीजिये कि वैश्विक मानकों से सम्बन्ध रखने वाली पीढ़ी किस तरह अतीत के उन मानकों के साथ समन्वय बनाएगी जो अब अस्तित्व में ही नहीं हैं? आज के वैश्वीकरण दौर में आज़ादी के पहले की मूल्य व्यवस्था से किस तरह तारतम्य जोड़ सकेगी? सुपरसोनिक गति का अनुभव करने वाली पीढ़ी बैलगाड़ी की गति को कैसे समझेगी?

 

विद्यार्थी वर्ग में साहित्यिक उदासीनता का एक कारण यह भी है. पाठ्यक्रमों में आज भी वह साहित्य आरोपित है जिसकी काल-सापेक्षता से वर्तमान पीढ़ी स्वयं को जोड़ नहीं पा रही है. ऐसा नहीं है कि प्रेमचन्द को वर्तमान परिदृश्य में खारिज कर दिया जाये. इसे भी पारिवारिक संरचना के रूप में समझने की आवश्यकता है. समय के साथ परिवार में प्राचीन मूल्यों का सम्मान करते हुए नवीन अवधाराणाओं को स्वीकार लिया जाता है; बुजुर्गों के अनुभवों से लाभान्वित होते हुए नव-विचारों को उन्मुक्त आकाश उपलब्ध कराया जाता है उसी प्रकार प्रेमचन्द की साहित्यिक छाँव में नवोन्मेषी साहित्य को, साहित्यकारों को भी पुष्पित-पल्लवित होने का अवसर मिलना चाहिए.

 


16 जुलाई 2024

जहाँ रहो खुश रहो, सुखी रहो

आज की तारीख वैसे तो खुश होने की है मगर चाह कर भी खुश नहीं हो पाते हैं. ऐसा नहीं कि खुश रहना नहीं आता या फिर ख़ुशी ने अपना रास्ता बदल लिया है. इस तारीख को अब चाह कर भी खुश न रह पाने का कारण इसी तारीख वाले छोटे भाई से सम्बंधित है. आज छोटे भाई मिंटू का जन्मदिन है. जब उसका जन्म हुआ तब हमारी उम्र ने पूरी तरह से छह वर्ष की संख्या को छुआ नहीं था, इसके बाद भी उसके जन्म के समय की बहुत सारी घटनाएँ आज भी दिल-दिमाग में जीवित हैं.

 



जुलाई का महीना था और उस समय लोग आज की तरह कमरे में बंद रहकर, कूलर-एसी को अपनी आदत बनाकर नहीं सोते थे. सही कह रहे हैं, आखिर वो समय 1979 का था. उस समय सीलिंग फैन ही जबरदस्त हवा दिया करता था. रात में अनिवार्य रूप से छत पर सोने का उपक्रम हुआ करता था. उस रात भी हम लोग छत पर हँसते-गुनगुनाते सोने की तैयारी में लगे थे जबकि मिंटू के आने की खुशखबरी घर में आई.

 

बहरहाल, आज मिंटू के जन्मदिन को ख़ुशी से मना भी नहीं पा रहे हैं. जैसे ही खुश होने के विचार सामने आता है, जन्मदिन मनाने का भाव जगता है वैसे ही आँखों से आँसुओं की धार स्वतः चलने लगती है. आखिर आज मिंटू होते तो 45 का आँकड़ा छू लिया होता. आज से तीन वर्ष पहले मिंटू की शारीरिक उपस्थिति हम लोगों के बीच शून्य में विलीन हो गई. उस दिन से उसका जन्मदिन मनाया जाता है मगर आँखों आँखों में, आँसुओं में, अकेले में.

19 नवंबर 2022

अल्पायु में बनी क्रांति मशाल

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी, ये कविता आज भी रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानी सुनाती है। वास्तव में अंग्रेजों के सामने घुटने न टेक, मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी का घोष कर रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए। वाराणासी में जन्मी मणिकर्णिका के रानी लक्ष्मीबाई बनने की गाथा भी उनके कार्यों की तरह अविस्मरणीय है। रानी लक्ष्मीबाई कही जाने वाली मनु का जन्म 19 नवम्बर 1835 को काशी में एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मोरोपन्त ताम्बे और माता का नाम भागीरथी बाई था। मोरोपन्त मराठा बाजीराव की सेवा करते थे। उनके पारिवारिक संरक्षण में ही मनु ने बचपन में ही शस्त्र और शास्त्र, दोनों की ही शिक्षा ली। इस दौरान लोग उन्हें प्यार से ‘छबीली’ के नाम से भी पुकारने लगे। 

 

पन्द्रह वर्ष की आयु में, सन 1850 में मणिकर्णिका का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ हुआ। यहीं आने के बाद वे मनु या मणिकर्णिका से झाँसी की रानी बन गयी। विवाह पश्चात उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। ये शायद दैवीय विधान कहा जाये या कि नियति का खेल कि विवाह के एक वर्ष पश्चात लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसकी चार माह पश्चात ही मृत्यु हो गयी। इस दुख के सदमे के कारण राजा अस्वस्थ रहने लगे। इसी के चलते बाद में 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव का निधन हो गया। एक तरफ झाँसी शोक में डूबी थी और दूसरी तरफ अंग्रेज उसे हड़पने का मन बनाये थे। इसीलिए अंग्रेजों द्वारा चाल चलते हुए रानी लक्ष्मीबाई द्वारा 20 नवम्बर 1853 को गोद लिए बालक दामोदर राव को रानी लक्ष्मीबाई का वारिस मानने से इंकार कर दिया।

 



अंग्रेजों ने झाँसी पर चढ़ाई कर दी। रानी ने भी ईंट का जवाब पत्थर से देते हुए अंग्रेजों को सा़फ कह दिया ‘मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी’। उधर 1857 के विद्रोहियों ने सदर बा़जार स्थित किले पर कब़्जा कर लिया। अपनी मौत से भागते हुए झाँसी में मौजूद सभी अंग्रे़जों ने झाँसी के मुख्य किले में शरण ली। इस संघर्ष में 61 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा गया। 6 जून से 8 जून 1857 तक चले इस संघर्ष में कैप्टन डनलप, लेफ्टिनेण्ट टेलर और कैप्टन गॉर्डन मारे गये। कैप्टन स्कीन ने बचे हुए अंग्रे़ज सैनिकों सहित विद्रोहियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इस घटना के बाद 12 जून 1857 को रानी लक्ष्मीबाई ने एक बार फिर झाँसी राज्य का प्रशासन संभाला। 

 

अंग्रेज अपनी हार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। उनका जनरल ह्यूरो़ज आखिरकार बदला लेने की नीयत से 21 मार्च 1858 को झाँसी आ पहुँचा। यहाँ 21 मार्च से 3 अप्रैल उसका  रानी के साथ घनघोर युद्ध हुआ। युद्ध जब चरम पर पहुँच गया था किन्तु रानी को जीत सुनिश्चित नहीं दिख रही थी। उनके कुछ अपने लोगों ने विश्वासघात करके अंग्रेजों को अवसर दे दिया। अपने सलाहकारों की सलाह से रानी लक्ष्मीबाई 03 अप्रैल 1858 को आधी रात के बाद अपने अतिनिकट और विश्वस्त सैनिकों के साथ कालपी की ओर रवाना हुई। अंग्रेज सैनिकों ने उनका पीछा किया, पर वे हाथ नहीं आयीं। 

 

कालपी से युद्ध की स्थिति में ही रानी ग्वालियर पहुंची। यहाँ के किले पर कब्जा करने के बाद उनका युद्ध अंग्रेजों से फिर शुरू हुआ। यहाँ भी रानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रे़जी सेना को पीछे हटना पड़ा। युद्ध के विषम क्षणों में रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र को अपनी पीठ पर बाँध कर किले से कूद पड़ी। उनको पकड़ने की नीयत से जनरल ह्यूरो़ज स्वयं युद्धभूमि में डटा हुआ था। अंग्रेजों को लगातार परास्त करती रानी ने जब सोनरेखा नाले को पार करना चाहा तो दुर्भाग्यवश उनका घोड़ा इस नाले को पार नहीं कर सका। वह वहीं अड़ा रहा। उसी समय पीछे से एक अंग्रे़ज सैनिक ने रानी पर तलवार से हमला कर दिया। इस हमले में उनको गम्भीर चोट आई। इस कारण मात्र 23 वर्ष की आयु में 18 जून 1858 को वे वीरगति को प्राप्त हुई। कहते हैं उनके सैनिक साथी उनको घायलावस्था में बाबा गंगादास की कुटिया में ले गये। यहीं रानी लक्ष्मीबाई का प्राणान्त हुआ था। इसी स्थान पर उनका अन्तिम संस्कार किया गया। 

 

अल्पायु में वे संघर्ष की चेतना ना केवल बुन्देलखण्ड में जगा गईं बल्कि महिलाओं को भी जगा गईं। रानी का बलिदान अमर है और बरसों तक सभी को आलोकित करता रहेगा।





 

01 अक्टूबर 2022

पोस्टकार्ड का जन्मदिन

संभवतः वर्तमान पीढ़ी संचार के एक माध्यम पोस्टकार्ड के बारे में जो भी जानकारी रखती होगी, वो उसे इंटरनेट से मिली होगी. इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण ऐसे संचार माध्यमों का लगभग बंद हो जाना है. अब मोबाइल और ई-मेल के ज़माने के बहुत कम लोग ऐसे हैं जो पोस्टकार्ड का उपयोग करते होंगे. अभी कुछ साल पहले तक इसका उपयोग परीक्षा फॉर्म प्राप्ति के लिए अवश्य उपयोग करते देखा गया है मगर इसका उपयोग समाचार भेजने या फिर कोई जानकारी भेजने के रूप में देखना नहीं हुआ है. 


आज एक अक्टूबर को पोस्टकार्ड का जन्मदिन मनाया जाता है. ये और बात है कि इस जन्मदिन के बारे में न तो मीडिया में बहुत चर्चा होती है और न ही सोशल मीडिया इस बारे में बहुत बखान करता है. इसके पीछे भी एक कारण बाजार है. आज बाजार की निगाह में पोस्टकार्ड का कोई महत्त्व नहीं, ऐसे में उसके जन्मदिन की चर्चा करना किसी के लिए उपयोगी सिद्ध नहीं. खैर, यदि पोस्टकार्ड की बात की जाये तो सबसे पहले पोस्टकार्ड का अविष्कार ऑस्ट्रिया में सन १८६९ को आज ही के दिन हुआ था. इस हिसाब से आज पोस्टकार्ड १५३ वर्ष का हो गया है. यहाँ के डॉक्टर इमानुएल हरमान ने पत्राचार के लिए एक सस्ते माध्यम की कल्पना करके पोस्टकार्ड का आविष्कार किया. पोस्टकार्ड ने अपने जन्म के साथ ही इतनी अधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर ली कि एक महीने में ही पंद्रह लाख पोस्टकार्ड की बिक्री हो गई. उसकी लोकप्रियता देखकर बाकी देशों ने भी इसे अपनाने में देरी नहीं की. ब्रिटेन ने सन १८७२ में पोस्टकार्ड जारी कर दिया. इसके सात वर्षों बाद ही सन १८७९ में भारत ने भी पोस्टकार्ड को जारी कर दिया. 


भारत में पहले पोस्टकार्ड की कीमत तीन पैसे थी. यहाँ भी इसकी लोकप्रियता में किसी तरह की कमी नहीं आई. पहले नौ महीने में ही भारत में ७.५ लाख रुपए के पोस्टकार्ड बिक गए.  भारत में पोस्टकार्ड की डिज़ाइन और छपाई का कार्य मेसर्स थॉमस डी०ला०रयू० एण्ड कंपनी लंदन के द्वारा किया था. उस समय पोस्टकार्ड को दो मूल्यवर्गों में बाँटा गया था. इसमें एक पोस्टकार्ड वे थे जिनका मूल्य एक पैसा था. यह कार्ड अन्तरदेशीय प्रयोग के लिए उपयोग में लाया जाता था. दूसरी तरह के कार्ड में डे‌ढ़ आना मूल्य वाला कार्ड था. इसका उपयोग उन देशों के लिए था जो अंतरराष्ट्रीय डाक संघ से संबद्ध थे.


पोस्टकार्ड भले ही किसी तरह के संदेश भेजने का सबसे सस्ता माध्यम हो किन्तु भारत सरकार के लिए यह एक महंगा सौदा है. प्रत्येक पोस्टकार्ड के लिए सरकार को उसके प्रिंट मूल्य से कहीं अधिक मूल्य चुकता करना पड़ता है. इस तरह से सरकार को पोस्टकार्ड छापने में घाटा उठाना पड़ता है. इस घाटे की पूर्ति के लिए सरकार ने पोस्टकार्ड में एक तरह का विज्ञापन देना शुरू किया. २१ जुलाई १९७५ में जारी किए गए पोस्टकार्ड में सरकार ने एक तरफ अपनी ओर से संदेश छापना शुरू किया. बाद में इस तरह के पोस्टकार्ड की बिक्री मेघदूत के नाम से की गई. आज भी सामान्य पोस्टकार्ड की कीमत ५० पैसे और मेघदूत पोस्टकार्ड की कीमत २५ पैसे बनी हुई है.


आप सबके आश्चर्य की बात ये है कि हम आज भी पोस्टकार्ड का उपयोग करते हैं. हमें भले ही कोई जवाब दे या न दे मगर हम आज भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के लेखकों को, सोशल मीडिया के मित्रों को अपने अन्य परिचितों को मेघदूत पोस्टकार्ड भेजा करते हैं.   

 










 

25 जुलाई 2022

खुश रहना जहाँ भी रहना

विगत कई वर्षों की भांति चिर-परिचित तरीके से श्वेता की उपस्थिति का एहसास अपने बीच किया गया. इसे याद करना नहीं कहा जायेगा क्योंकि याद हम सभी उसे करते हैं जिसे भूल जाएँ. कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कभी भी, किसी भी रूप में भुलाए नहीं जा सकते. ऐसे ही व्यक्तित्वों में श्वेता को सहज ही शामिल किया जा सकता है. जो लोग भी उससे मिले होंगे वे निश्चित ही इससे अपनी सहमति देंगे कि वो भुलाने योग्य व्यक्तित्व नहीं है.

 

दस जून ऐसी तारीख बन गई है, जिसे चाह कर भी अपनी स्मृति से मिटाया नहीं जा सकता. उस तारीख के साथ चल कर आई दुखद स्मृति को विस्मृत करने का अत्यंत नायाब तरीका श्वेता के जीवनसाथी अंकुर ने खोज निकाला. दस जून को उनके द्वारा मुस्कान हॉस्पिटल में रक्तदान शिविर का आयोजन विशुद्ध पारिवारिक रूप में किया जाने लगा है. सामाजिक रूप में अंकुर की जो छवि बनी हुई है, उसके अक्स में रूप में श्वेता की झलक उन दिनों में दिखाई पड़ जाती थी. अब जबकि श्वेता की आत्मिक उपस्थिति हम सबके बीच है, ऐसे समय में रक्तदान जैसा पावन कर्म उसकी उपस्थिति को और भी गहरे से महसूस करवाता है.

 



इस बार भी दस जून को रक्तदान शिविर का आयोजन हुआ. किसी से आग्रह नहीं, किसी से जोर-जबरदस्ती नहीं, किसी की मनुहार नहीं, किसी पर दवाब नहीं इसके बाद भी श्वेता और अंकुर के हार्दिक व्यवहार के चलते लोगों की स्नेहिल उपस्थिति पूरे समय बनी रही. इस बार विशेष बात यह रही कि मुस्कान सेंटर के बच्चों ने अत्यंत उत्साह दिखाया.

 

मुस्कान हॉस्पिटल के रक्तदान शिविर में अपनी सकारात्मक उपस्थिति के बाद लगातार लिखने का मन करता रहा परन्तु हर बार आज की तारीख भी याद आती. दोनों तारीखों को जब भी हम व्यक्तिगत रूप से अपने भावनात्मक तराजू में तौलते तो हमें आज की तारीख ज्यादा वजनदार महसूस होती. इस 25 जुलाई वाली तारीख में श्वेता की अनुपस्थिति का आभास नहीं होता. आज की तारीख में उसके जाने का नहीं बल्कि इस दुनिया में आने का एहसास दिखाई देता है. उसके खोने की पीड़ा से बहुत अधिक उसके होने की ख़ुशी समाहित दिखती है.

 

श्वेता, जन्मदिन पर तुमको आशीर्वाद, तुम जिस रूप में जहाँ हो हमेशा सुखी रहो, हँसती रहो. लोगों को उसी तरह अपना बनाती रहो जैसे हम सबके बीच रहते हुए सबको अपना बनाती रही.






25 दिसंबर 2021

ठन गई! मौत से ठन गई! सादर समर्पित


 अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता उन्हीं को सादर समर्पित.....
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ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई.

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं.

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा.

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर.

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं.

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला.

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए.

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है.

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई.

मौत से ठन गई.

कैलीग्राफी : कुमारेन्द्र सिंह सेंगर  

11 दिसंबर 2021

प्रेम सभी माँग रहे हैं, देने वाला कोई नहीं


 

प्रेम सभी मांग रहे हैं ,देने वाला कोई नहीं

प्रेम शारीरिक नहीं है, इसका नाता कहीं विश्रांति से है, पिघलने से है, पूरा मिट जाने से है।

उन पलों में यह मिट जाता है अत: निश्चित ही यह शारीरिक नहीं। तुम्हें अधिक प्रेम देना सीखना होगा। तुम्हे बस लेने का अनुभव है। तो पहला अनुभव जो उसके अचेतन तक पैठ जाता है वह प्रेम लेने का है। परंतु समस्या यह है कि हर व्यक्ति बच्चा रहा है और हर व्यक्ति के भीतर प्रेम पाने की आकांक्षा है; कोई भी किसी अलग ढंग से पैदा नहीं हुआ है। तो सभी मांग रहे हैं,”हमें प्रेम दो” लेकिन देने वाला कोई भी नहीं क्योंकि वे भी उसी तरह पैदा हुए हैं। हमें सजग व सचेत रहना चाहिए कि हम जन्म की यह अवस्था हमारे पूरे जीवन पर आच्छादित न हो जाए। प्रेम देना बहुत सुंदर अनुभव है क्योंकि देने में तुम सम्राट हो जाते हो। लेना बहुत तुच्छ अनुभव है क्योंकि तुम भिखारी हो जाते हो।


जहां तक प्रेम का प्रश्न है, भिखारी मत बनो, सम्राट रहो क्योंकि तुम्हारे भीतर यह गुणवत्ता असीम है। तुम जितना देना चाहो, दिए चले जा सकते हो। तुम यह चिंता मत करना कि यह चुक जाएगा, कि एक दिन तुम पाओगे कि “हे प्रभु, मेरे पास तो प्रेम देने के लिए बचा ही नहीं।” प्रेम मात्रा नहीं, गुणवत्ता है, ऐसी गुणवत्ता ..जो देने से बढ़ती है और पकड़े रहने से मर जाती है।


अत: इसे पूरी तरह लुटा दो। चिंता मत लो, किसे..यह कंजूस व्यक्ति सोचता है: मैं उसे प्रेम दूंगा जिसमें अमुक गुण होंगे। तुम्हें पता ही नहीं कि तुम्हारे पास कितना प्रेम है..तुम भरे हुए बादल हो। बादल यह चिंता नहीं लेता कि कहां बरसे। चट्टान हो कि उपवन या कि सागर– कोई परवाह नहीं। यह स्वयं को हल्का करना चाहता है और वह निर्भारता ही विश्रांति है।


तो पहला रहस्य है: इसे मांगें मत, प्रतीक्षा मत करें कि कोई आएगा तो हम देंगे। बस दे दें।


अपना प्रेम किसी को भी दें..किसी अजनबी को ही सही। प्रश्न यह नहीं है कि तुम कुछ बहुत कीमती दे रहे हो, कुछ भी, थोड़ी सी सहायता, और वह काफ़ी है।


चौबीस घंटों में तुम जो भी करते हो उसे प्रेम से करो और तुम्हारे दिल की पीड़ा मिट जाएगी। और क्योंकि तुम इतने प्रेमपूर्ण होओगे, लोग तुम्हें प्रेम करेंगे। यह स्वाभाविक नियम है। तुम्हें वही मिलता है जो तुम देते हो। वास्तव में तुम उससे अधिक पाते हो जो तुम देते हो। देना सीखो और तुम पाओगे कि लोग तुम्हारे प्रति कितने प्रेमपूर्ण हैं, वही लोग जिन्होंने तुम्हारे प्रति कभी ध्यान नहीं दिया। तुम्हारी समस्या यही है कि तुम्हारा दिल प्रेम से भरा है लेकिन तुम कंजूस रहे हो; वही प्रेम तुम्हारे दिल पर बोझ हो गया है। दिल को खुला रखने की बजाए तुम इसे पकड़े रहे तो कभी-कभार, किसी प्रेम की घड़ी में यह पीड़ा तिरोहित होने लगती है।


प्रेम बांटो। बस बांटो, और तुम अपने भीतर असीम शांति व मौन का अनुभव करोगे। यही तुम्हारा ध्यान बन जाएगा। ध्यान में उतरने की विभिन्न दिशाएं हैं; और शायद तुम्हारी दिशा यही है।


~ओशो~


(प्रेम पर ओशो के विचार पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जन्मदिन, ११ दिसम्बर के अवसर पर ओशो को श्रद्धा-सुमन रूप में उनके ही विचार. सबसे ऊपर ओशो के चित्र पर उनके नाम की कैलीग्राफी लेखक द्वारा की गई है.

23 जनवरी 2021

नामी का गुमनामी होना

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के निधन को एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि उनकी मृत्यु 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था और ये स्थिति आज भी बनी हुई है. नेताजी की मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेताजी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार सेंट्रल डेली न्यूज़ से पता चलता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था.


इसी तथ्य पर मिशन नेताजी से जुड़े अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि 14 अगस्त से 25 अक्तूबर 1945 के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है. (तब ताईहोकू के इस हवाई अड्डे का नाम मात्सुयामा एयरपोर्ट था और अब इसका नाम ताईपेह डोमेस्टिक एयरपोर्ट है.) नेताजी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि जिस शव का अंतिम संस्कार किया गया वो शव नेताजी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुरा का था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. इसी कारण बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेताजी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे-लपेटे ही कर दिया गया था, जिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का.




नेताजी की कार्यशैली, उनकी प्रतिभा, कार्यक्षमता को जानने के बाद उनके प्रशंसकों ने नेताजी की उपस्थिति को विभिन्न व्यक्तियों के रूप में स्वयं से स्वीकार किया है. इसका सशक्त उदाहरण गुमनामी बाबा के रूप में देखा जा सकता है. समय-समय पर गुमनामी बाबा के सामानों की जाँच के लिए भी आवाज़ उठी. अब फ़ैजाबाद के डबल लॉक में रखे गुमनामी बाबा के सामानों के खुलासे ने उम्मीद जगाई है कि शायद नेताजी का सच अब सामने आ सके. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटो, अनेक पत्र, न्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मे, मँहगे-विदेशी सिगार, नेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँ, जर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थी, ब्रिटेन का बना ग्रामोफोन, रिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईं? इन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म, एक नक्शा, प्रचुर साहित्यिक सामग्री, अमरीकी दूतावास का पत्र, नेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं.


फ़ैजाबाद के रामभवन में प्रवास के दौरान किसी के भी सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले भगवन अथवा गुमनामी बाबा के देहांत की खबर वर्ष 1985 में आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. देश का सच्चा सपूत आज़ादी के बाद भी भले ही गुमनाम बना रहा किन्तु उनकी भतीजी ललिता बोस और देशवासी रामभवन में मिले सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा को ही नेताजी स्वीकारते रहे. ये महज संयोग नहीं कि इनके लम्बे संघर्ष पश्चात् सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के 2761 सामानों की एक सूची बनाई गई जो फैजाबाद के सरकारी कोषागार में रखे हुए हैं.


रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा 13 जनवरी 2013 को याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के 24 बड़े लोहे के डिब्बों और 8 छोटे डिब्बों अर्थात कुल 32 डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को लगने लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया जाना है और ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही है किन्तु अंतिम विजय का पर्दा उठाना अभी शेष है.


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वंदेमातरम्

12 जनवरी 2021

स्वामी विवेकानन्द का सकारात्मक वेदांत दर्शन

भारत में वेदान्त की कई प्रकार की व्याख्याएँ हुई हैं और सभी को प्रगतिशील माना गया है. वेदान्त का शाब्दिक अर्थ है वेद का अंत. वेद हिन्दुओं के आदि धर्मग्रन्थ हैं. विवेकानन्द जी के विचार धर्म के विषय में उल्लेखनीय हैं. वेदान्त दर्शन के सम्बन्ध में उनका नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है. उन्होंने देश में और देश के बाहर भी वेदान्त के सम्बन्ध में अपनी वाणी का जादू चलाया. वे वेदों को दो अंशों में विभक्त करते हैं, इनमें एक है कर्मकाण्ड और दूसरा है ज्ञानकाण्ड. किसी भी हिन्दू के सन्दर्भ में सहज रूप में स्वीकारा जाता है कि वेदान्त ही उसका जीवन है, वेदान्त ही उसकी साँस है. वेदान्त की अनेक व्याख्याएँ हुई हैं. वेदान्त के सन्दर्भ में सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ उत्तरमीमांसा स्वीकार्य है. कालांतर में वेदान्त के व्याख्याकार तीन प्रसिद्ध सम्प्रदायों - द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद तथा अद्वैतवाद में बँट गये. समय के साथ इनका पुनरुद्धार शंकराचार्य, रामनुजाचार्य तथा मध्वाचार्य के द्वारा किया गया. शंकराचार्य ने अद्वैतवाद को, रामनुजाचार्य ने विशिष्टताद्वैतवाद को तथा मध्वाचार्य ने द्वैतवाद को पुनः स्थापित किया.


स्वामी विवेकानन्द बचपन से ही बुद्धिमान थे और बचपन से दर्शन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाये हुए थे. वे किसी भी धर्म की उपेक्षा नहीं करते थे और लोगों को धर्म के मार्ग से विमुख होने से बचाने के लिए वेदान्त दर्शन के माध्यम से सही रास्ते में चलने के लिए प्रेरित करते थे. उनका कहना था कि हम लोग वेदान्त के बिना न तो साँस ले सकते हैं और न ही मृत्यु को प्राप्त कर सकते हैं. वेदान्त हमें यह बतलाता है कि समाज या कर्म के किसी क्षेत्र में शक्ति की जो विशाल राशि प्रदर्शित होती है, वह वस्तुतः भीतर से बाहर आती है, इसलिए जिसे अन्य सम्प्रदाय अंतःस्फुरण कहते हैं, उसे वेदान्त मनुष्य का बहिःस्फुरण कहने की स्वतंत्रता लेता है.


इसे स्वामी विवेकानन्द के विचारों की प्रगतिशीलता ही कही जाएगी कि इतने वर्षों बाद भी उनके मत का महत्व बना हुआ है. वेदान्त के व्यावहारिक पक्ष की आज भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी पहले पुराने समय में थी. वेदान्त दर्शन के माध्यम से स्वामी विवेकानन्द सभी सम्प्रदायों को आपस में जोड़ना चाहते थे. उन्होंने 01 फरवरी 1895 को न्यूयार्क से कुमारी मेरी हेल को लिखित एक पत्र में कहा था कि मेरे पास विश्व को देने के लिए एक संदेश है, जिसे मैं अपनी ही शैली में दूँगा. मैं अपने संदेश को न तो हिन्दू धर्म, न ईसाई धर्म, न संसार के किसी और धर्म के साँचे में ढालूँगा, बस. मैं केवल उसे अपने ही साँचे में ढालूँगा.


अपने उस संदेश के सार को उन्होंने 07 जून 1896 को सिस्टर निवेदिता लिखे पत्र में प्रस्तुत किया था. वे लिखते हैं कि मेरा आदर्श अवश्य ही थोड़े से शब्दों में कहा जा सकता है, और वह है, मनुष्य-जाति को उसके दिव्य स्वरुप का उपदेश देना तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना. इसके बाद 25 फरवरी 1900 को ऑकलैंड में दिये गये व्याख्यान में उन्होंने वेदान्त को परिभाषित करते हुए कहा था कि वेदों से आशय किन्हीं ग्रंथों का नहीं है बल्कि उनका अर्थ आध्यात्मिक नियमों के संचित कोष से है, जिनकी खोज विभिन्न व्यक्तियों ने विभिन्न कालों में की.


स्वामी विवेकानन्द ने वेदांत को सिर्फ वैचारिकता के प्रचार-प्रसार के लिए ही नहीं चुना बल्कि वे इनके द्वारा देश के नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं को आध्यात्मिकता की तरफ बढ़ने पर जोर देते हैं. वे वेदान्त के माध्यम से समझाते हैं कि हे बन्धुगण, तुम्हारी और मेरी नसों में एक ही रक्त का प्रवाह हो रहा है. तुम्हारा जीवन-मरण मेरा भी जीवन-मरण है. मैं तुमसे पूर्वोक्त कारणों से कहता हूँ कि हमको शक्ति, केवल शक्ति ही चाहिए और उपनिषद शक्ति की विशाल खान हैं. उपनिषदों में ऐसी प्रचुर शक्ति विद्यमान है कि वे समस्त संसार को तेजस्वी बना सकते हैं. उनके द्वारा समस्त संसार पुनरुज्जीवित, सशक्त और वीर्य-सम्पन्न हो सकता है. समस्त जातियों को, सकल मतों को, भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के दुर्बल, दुखी, पददलित लोगों को स्वयं अपने पैरों पर खड़े होकर मुक्त होने के लिये वे उच्च स्वर में उद्घोष कर रहे हैं. मुक्ति अथवा स्वाधीनता, दैहिक स्वाधीनता, मानसिक स्वाधीनता, आध्यात्मिक स्वाधीनता यही उपनिषदों का मूल मन्त्र है.




महज 39 वर्ष के अल्प जीवनकाल में स्वामी विवेकानन्द जो काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे. उनके दर्शन, कार्यों, व्याख्यानों को देखते हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं.


रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था कि उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असम्भव है, वे जहाँ भी गये, सर्वप्रथम ही रहे. हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था. वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी. हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा था - ‘शिव!’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो.


उनका दर्शन नितांत व्यावहारिक था. यही कारण था कि उन्होंने कहा था कि मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिये जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जायें. हिन्दू धर्म, दर्शन, आध्यात्म को मानने वाले विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे. इसी के चलते उन्होंने विद्रोही बयान कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये, भी दिया था. आज ऐसे विचार देना तो दूर, ऐसा सोच पाना खुद सरकार के लिए आसान नहीं है. देखा जाये तो यह स्वामी विवेकानन्द का अपने देश की धरोहर के लिये दम्भ या बड़बोलापन नहीं था वरन यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी.


आज उनकी जन्मजयन्ती पर सादर नमन.


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वंदेमातरम्

25 दिसंबर 2020

सादगी की प्रतिमूर्ति अटल जी

उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे. वहीं शिन्दे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटल जी का जन्म हुआ था. पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में अध्यापन कार्य तो करते ही थे इसके अतिरिक्त वे हिन्दी और ब्रज भाषा के सिद्धहस्त कवि भी थे. पुत्र में काव्य के गुण वंशानुगत परिपाटी से प्राप्त हुए. महात्मा रामचन्द्र वीर द्वारा रचित अमर कृति विजय पताका पढ़कर अटल जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी. अटल जी की बी०ए० की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज (वर्तमान में महारानी लक्ष्मीबाई कालेज) में हुई. छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने.

 

कानपुर के डी०ए०वी० कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. उसके बाद उन्होंने अपने पिताजी के साथ-साथ कानपुर में ही एल-एल०बी० की पढ़ाई भी प्रारम्भ की. पिता-पुत्र की जोड़ी के एकसाथ पढ़ाई करने, परीक्षा देने का यह अनुकरणीय उदाहरण खूब चर्चा में रहा. बाद में अपनी यह पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वे पूरी निष्ठा से संघ के कार्य में जुट गये. डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ तो पढ़ा ही साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलता पूर्वक करते रहे.

 



अटल जी भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक थे. सन् 1968 से 1973 तक वह उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे. सन् 1952 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा परन्तु सफलता नहीं मिली. बाद में सन् 1957 में बलरामपुर से जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकसभा में पहुँचे. सन् 1957 से 1977 तक जनता पार्टी की स्थापना तक वे बीस वर्ष तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे. मोरारजी देसाई की सरकार में सन् 1977 से 1979 तक विदेश मन्त्री रहे और विदेशों में भारत की छवि बनायी. सन 1980 में जनता पार्टी से असन्तुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की. 1980 में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व अटल जी को सौंपा गया. वे लोकसभा के अतिरिक्त दो बार राज्यसभा के लिये भी निर्वाचित हुए. लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने सन् 1996 में प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली. पहली बार उनकी सरकार महज 13 दिन तक रह सकी. कालांतर में तेरह महीने और फिर पूरे पाँच वर्ष के लिए दो बार वे फिर प्रधानमंत्री बने. गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने पाँच वर्ष तक सरकार चलाई. सर्वोन्मुखी विकास के लिये किये गये योगदान तथा असाधारण कार्यों के लिये 2015 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

 

आज अटल जी के जन्मदिन पर उनको सादर श्रद्धांजलि.


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वंदेमातरम्

भारतीयता के दैदीप्यमान नक्षत्र मालवीय जी

महामना मदन मोहन मालवीय जी का जन्म प्रयाग में 25 दिसम्बर 1861 को हुआ था. आपके पिता का नाम पं० ब्रजनाथ तथा माता का नाम मूनादेवी था. मध्य भारत के मालवा प्रान्त से आने के कारण उनके पूर्वज मालवीय कहलाये. इसी को कालांतर में उनके द्वारा जातिसूचक नाम के रूप में अपना लिया गया. उनके पिता संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड विद्वान थे और वे श्रीमद्भागवत की कथा सुनाकर अपनी आजीविका अर्जित करते थे. मालवीय जी ने अपनी पढ़ाई के दौरान ही मकरंद उपनाम से कवितायें लिखनी प्रारम्भ कर दी थीं. सन 1879 में उन्होंने म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, जिसे आजकल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की. उनकी प्रतिभा देखकर हैरिसन स्कूल के प्रधानाचार्य ने उन्हें छात्रवृत्ति देकर कलकत्ता विश्वविद्यालय भेजा, जहाँ से उन्होंने 1884 ई० में बी०ए० की उपाधि प्राप्त की. इस दौरान वे अखाड़े में व्यायाम और सितार पर शास्त्रीय संगीत का अभ्यास भी करते रहे.

 



कालाकाँकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह के अनुरोध पर मालवीयजी ने उनके हिन्दी अंग्रेजी समाचार पत्र हिन्दुस्तान का 1887 में सम्पादन कार्य किया. सन 1907 ई० में साप्ताहिक अभ्युदय को निकालकर कुछ समय तक उसे भी सम्पादित किया. सन 1909 में दैनिक लीडर समाचार-पत्र निकालकर लोकमत निर्माण का महान कार्य सम्पन्न किया तथा दूसरे वर्ष मर्यादा पत्रिका भी प्रकाशित की. इसके बाद उन्होंने सन 1924 ई० में दिल्ली आकर हिन्दुस्तान टाइम्स को सुव्यवस्थित किया तथा सनातन धर्म को गति प्रदान करने हेतु लाहौर से विश्वबन्धु जैसे अग्रणी पत्र को प्रकाशित करवाया. हिन्दी के उत्थान में मालवीय जी ने ऐतिहासिक कार्य किया. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन (काशी-1910) के अध्यक्षीय अभिभाषण में हिन्दी के स्वरूप निरूपण में उन्होंने कहा कि उसे फारसी अरबी के बड़े बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूँथना भी अच्छा नहीं और भविष्यवाणी की कि एक दिन यही भाषा राष्ट्रभाषा होगी.

 

प्रयाग के भारती भवन पुस्तकालय, मैकडोनेल यूनिवर्सिटी हिन्दू छात्रालय और मिण्टो पार्क के जन्मदाता मालवीयजी को कई संस्थाओं को स्थापित और प्रोत्साहित करने का श्रेय प्राप्त हुआ. इनमें उनका अक्षय-र्कीति-स्तम्भ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय है जिसमें उनकी विशाल बुद्धि, संकल्प, देशप्रेम, क्रियाशक्ति तथा तप और त्याग साक्षात् मूर्तिमान हैं. इसके विशाल, भव्य भवनों एवं विश्वनाथ मन्दिर में भारतीय स्थापत्य कला के अलंकरण मालवीय जी के आदर्श के ही प्रतिफल हैं. अंग्रेजी शासन के दौर में देश में एक स्वदेशी विश्वविद्यालय का निर्माण मदन मोहन मालवीय की बड़ी उपलब्धि थी. मालवीय ने विश्वविद्यालय निर्माण में चंदे के लिए पेशावर से लेकर कन्याकुमारी तक की यात्रा की थी. उन्होंने 1 करोड़ 64 लाख की रकम जमा कर ली थी. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बनाने के लिए मदन मोहन मालवीय को 1360 एकड़ जमीन दान में मिली थी. इसमें 11 गांव, 70 हजार पेड़, 100 पक्के कुएं, 20 कच्चे कुएं, 40 पक्के मकान, 860 कच्चे मकान, एक मंदिर और एक धर्मशाला शामिल था. 


बताया जाता है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पहली कल्पना दरभंगा नरेश कामेश्वर सिंह ने की थी. 1896 में एनी बेसेंट ने सेंट्रल हिन्दू स्कूल खोला. बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी का सपना महामना के साथ इन दोनों लोगों का भी था. 1905 में कुंभ मेले के दौरान विश्वविद्यालय का प्रस्ताव लोगों के सामने लाया गया. उस समय निर्माण के लिए एक करोड़ रुपए जमा करने थे. 1915 में पूरा पैसा जमा कर लिया गया. पांच लाख गायत्री मंत्रों के जाप के साथ भूमि पूजन हुआ. इसके साथ ही यूनिवर्सिटी निर्माण का काम प्रारंभ हुआ. मदन मोहन मालवीय का सपना था कि बनारस की तरह शिमला में एक यूनिवर्सिटी खोली जाए. हालांकि उनका ये सपना पूरा नहीं हो सका. साल 2014 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया.  


आज उनके जन्मदिवस पर उनको सादर नमन.

 

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वंदेमातरम्

12 अक्टूबर 2020

राजमाता विजयाराजे सिंधिया की स्मृति में सिक्का जारी

आज, 12 अक्टूबर को जनसंघ की नेत्री और भाजपा की संस्थापक सदस्यों में से एक विजया राजे सिंधिया जी जन्म जयंती है. राजमाता सिंधिया के जन्म शताब्दी वर्ष के इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सौ रुपए के विशेष स्मारक सिक्के का विमोचन किया गया. ग्वालियर राजघराने से जुड़ीं राजमाता विजयाराजे सिंधिया का सम्बन्ध जनपद जालौन से यहाँ की बेटी के रूप में रहा है. यह हमारा सौभाग्य है कि वे हमारी बुआ जी के रूप में सदैव अपना आशीर्वाद हमें प्रदान करती रहीं.  

12 अक्टूबर 1919 को जन्मी विजयाराजे सिंधिया जैसे महिला नेत्री भारतीय राजनीति में कम ही देखने को मिलती हैं. वे सरलता, सहजता और संवेदनशीलता जैसे गुणों से सुसज्जित होने के साथ-साथ एक निर्णायक नेता और कुशल प्रशासक भी थीं.




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06 मई 2020

हमारी ब्लॉगिंग तीरंदाजी के बारह वर्ष

लॉकडाउन की हड़बड़ में यही भूल गए कि अभी दो-तीन दिन पहले हमारे ब्लॉग का जन्मदिन निकल गया. वो तो आज बिटिया रानी के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर चलने वाली तैयारियों के चलते याद आ गया. हमने अपना ये ब्लॉग मई माह के आरम्भ में बनाया था किन्तु पहली पोस्ट 4 मई को लिखी थी, वर्ष 2008 में. उसी वर्ष, उसी माह 7 तारीख को हमें कन्या-रत्न प्राप्त हुआ. इसी मई में ब्लॉग और बिटिया दोनों बारह वर्ष के हो गए. तबसे से लेकर आज वर्ष 2020 तक की बारह साल की ब्लॉग-यात्रा अनेक अनुभवों से समृद्ध कर गई है. अनेक अनुभव मधुर हुए और अनेक अनुभव तो बहुत ही बुरे रहे. बुरे अनुभवों की पोटली बनाकर हमने अपने घर के पास बहते नाले में फेंक दी है. उनके द्वारा जो सीखना था, वो उसी समय सीख लिया था. अब बस अच्छा ही अच्छा अनुभव करते हैं.


इस अच्छे में एक बात हमें अपने आपमें बहुत सुकून देती है कि हमने ब्लॉगिंग का भरपूर तरीके से आनंद उठाया, आज तक उठा रहे हैं. उन दिनों जबकि हमने ब्लॉगिंग आरम्भ की तो पहले-पहल तो समझ से बाहर ही रहा कि लिखने वाली पोस्ट को लोगों तक कैसे भेजा जाये? अपना ब्लॉग सबके बीच ले जाने की तृष्णा के चलते कई-कई सामूहिक ब्लॉग से भी जुड़ना हुआ. इसमें भी कई बार खूब जूतम-पैजार हुई. ऐसी स्थिति में कई बार हमने ही ब्लॉग छोड़ दिया और कई बार हमें ही भगा दिया गया. इन सबमें भी खूब मजा आने लगा था.

इसी मजे में खुद अपना लिखा अपने अन्य परिचितों को पढ़वाने के लिए अनेक मित्रों के, परिजनों के ब्लॉग बनवाए. लोगों को खूब प्रेरित किया ब्लॉग बनाने को, लिखने को. कुछ तो गधे से घोड़े बन गए मगर कुछ गधे के गधे बने रहे. हमारे ऐसे मित्र आज भी उसी गधे की श्रेणी में पड़े हैं, हमारा ब्लॉग देख-पढ़ लेते हैं मगर खुद लिखने का कष्ट नहीं उठाते. बहरहाल, बिना किसी की सहायता के अपना ब्लॉग बना लेने के बाद, उसका सञ्चालन उचित ढंग से करने का अनुभव होने के बाद ब्लॉग बनवाने में, पोस्ट लिखवाने में खुद को तीरंदाज समझने लगे थे. सो खूब तीर मारे. आज भी मार रहे हैं. अभी इसी माह दो लोगों को ब्लॉग जगत में खींच कर लाये मगर वही ढाक के तीन पात, उन लोगों ने ब्लॉग बना लिए मगर उस पर लिखना शुरू नहीं किया. जल्द ही उनको भी इसका चस्का लगवाते हैं.


जब ब्लॉगिंग करते-करते काफी समय बीत गया, ब्लॉग एग्रीगेटर्स के चलते लोगों की पहुँच हमारे ब्लॉग तक हो गई, हमारी पहुँच दूसरों के ब्लॉग तक हो गई तो बहुत से लोगों ने ब्लॉग बनाने के लिए हमसे संपर्क किया. उसी में आज भी एक अनुभव बहुत अच्छे से याद है. एक बुजुर्ग महिला ने कई-कई दिनों तक देर रात फोन के माध्यम से ब्लॉग बनाने के बारे में, पोस्ट लिखने के बारे में जानकारी ली. हर बार वे बड़े ही स्नेह से आशीर्वाद देतीं. आज वे खूब सक्रिय हैं और कई-कई ब्लॉग के द्वारा साहित्यिक, सामाजिक लेखन में रत हैं.

इसी कई-कई ब्लॉग में याद आया, उस समय हमें ब्लॉगिंग करते कुछ महीने ही हुए होंगे. ब्लॉग बनाने, लिखने के बारे में समझ आ गया था. एक-दो सामूहिक ब्लॉग से भी जुड़ गए थे. एग्रीगेटर से भी सहारा मिल गया था. इसके बाद भी कुछ विषयों में बड़ा संशय रहता था. हमें लगता था कि विषयवार अलग-अलग ब्लॉग बनाये जाने चाहिए, जिससे लोगों को अपने मन का ही पढ़ने की सुविधा हो. हमारा मानना था कि ऐसा किये जाने से जहाँ पाठकों की संख्या बढ़ेगी और लोगों को भी अपने विषय से इतर अन्य पोस्ट देखने की जहमत नहीं उठानी पड़ेगी. इसकी चर्चा एक दिन हमने किसी पोस्ट के द्वारा करते हुए लोगों की राय माँगी. उसमें मिली कई-कई टिप्पणियों में एक टिप्पणी आजतक नहीं भूली. किसी ने कहा कि एक ब्लॉग पर ही अलग-अलग लेवल बनाकर लिखिए. अलग-अलग ब्लॉग बनायेंगे तो आप अखबार बन जायेंगे. खुद को समेटना मुश्किल हो जायेगा.

उस समय हम नए-नए ब्लॉगर बने थे सो किसी वरिष्ठ की सलाह को, राय को स्वीकारते हुए अनेक ब्लॉग बनाने का विचार त्याग दिया. इसके बाद भी हमारा मानना आज भी यही है कि यदि विषयवार अलग-अलग ब्लॉग बनाये जाएँ, उन पर सम्बंधित पोस्ट को लिखा जाये तो निश्चित ही उसका प्रसार अधिक होगा. कहते हैं न कि बारह साल बाद तो घूरे के दिन बदल जाते हैं, सो सोच रहे कि अपने विचार के दिन बदल कर देख लें. वैसे ब्लॉग पोस्ट के हिसाब से भले न अनेक ब्लॉग बनाये हों मगर अलग-अलग प्रकृति के हिसाब से अनेक ब्लॉग अवश्य बनाये.

फिलहाल तो आगे क्या करेंगे, क्या नहीं कहा नहीं जा सकता किन्तु अभी यही कह सकते हैं कि ब्लॉगिंग आज भी रोज करते हैं, आने वाले समय में भी रोज करते रहेंगे.

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आप सभी को यह बताने का लोभ संवरण नहीं हो पा रहा कि यह पोस्ट हमारे इस ब्लॉग की 1753वीं पोस्ट है. पहली ब्लॉग पोस्ट से इस ब्लॉग को बारह वर्ष 04 मई को हुए. उस दिन लिखी गई पोस्ट इस ब्लॉग की 1751वीं पोस्ट थी. (क्लिक करिए और देखिये, क्या है ब्लॉग-जन्मदिन पर)

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