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25 जुलाई 2026

बात को समझो

आरक्षण विरोधी नेताओ, तुमको एक रास्ता दिखा दिया गया है इस उत्पाती आन्दोलन के द्वारा निकले इस्तीफे से. सरकार ने एक इशारा कर दिया है कि उत्पात के द्वारा भी समाधान हो सकता है. यदि एक इस्तीफ़ा हो सकता है तो आरक्षण भी हट सकता है. यदि नीट पेपर लीक के कारण जान गँवाने वाले बच्चों को इस्तीफ़े का आधार बनाया जा सकता है तो बहुत से प्रतिभाशाली बच्चों ने आरक्षण के कारण जान गँवाई है, इसे भी आरक्षण समाप्ति का आधार बनाया जा सकता है.

 

जंतर-मंतर के हंगामे से, इस इस्तीफे से न तो पेपर लीक की घटनाएँ रुकनी हैं, न शिक्षा व्यवस्था में कोई बहुत बड़ा सुधार होने वाला है. हाँ आरक्षण को लेकर एक और आन्दोलन शुरू करने का अवसर मिल गया.

विचार करो अब पूरे घटनाक्रम पर, पिछले कुछ बयानों पर तब दिखाई पड़ेगा कि जहाँ तुम लोगों का सोचना बंद होता है, उससे कहीं आगे जाकर अगले का सोचना शुरू होता है.

 

समझे…???

 


23 जुलाई 2026

मिली भगत की आशंका

जंतर मंतर पर सीजेपी का धरना-अनशन कार्यक्रम शुरू होने के तीन-चार दिन बाद से ही हम ये विचार कर रहे थे कि यहाँ सबकुछ हो रहा है पर इनका हुल्लड़ नहीं हो रहा है. हमें इसलिए ऐसा लग रहा था क्योंकि हमारा व्यक्तिगत विचार ये है कि यह सब कुछ तमाम राजनैतिक दलों और सरकारी तंत्र की मर्जी से ही हुआ है.

 

ग़ौर करिए, अनशन करते वांगचुक को हॉस्पिटल भेजना रहा हो, संसद तक मार्च करना रहा हो आदि संसद के मानसून सत्र के ठीक पहले हुआ. मिलीभगत से चलने वाले आन्दोलन से राजनैतिक शून्यता की तरफ़ जाते नेताओं को संजीवनी मिली, एथेनॉल, मंदिर चढ़ावा चोरी से लोगों का ध्यान भटका, नेता जी और चढ़ावा चोरी अभियुक्त के बीच 900 से अधिक कॉल का मामला छिप गया, दल-बदल को लेकर किसी तरह का कोई मसला न रहा, हंगामे के बीच पेपर लीक और इस्तीफ़ा भी बौना नजर आने लगा.

 

हमारे व्यक्तिगत विचार में बहुत सी बातें हैं जिन पर यहाँ की बजाय अपने ब्लॉग पर लिखेंगे. अब ये मंच जोकरों का, बददिमाग़ों का, संकुचितों का अड्डा बनता जा रहा है, जहाँ सबके सब अपनी ही व्यक्तिगत कुंठित सोच के सहारे प्रत्येक परिदृश्य को देखने लगे हैं. यदि आप लोगों ने ग़ौर किया हो तो हंगामा करने वाले नेतागीरी करते हुए पुलिस बल पर हावी हुए और पिट गए वे मासूम बच्चे जो शिक्षा व्यवस्था को सुधारे जाने का ख्वाब लेकर आए थे. आंदोलनकारियों का एक मुखिया सेहत के नाम पर हॉस्पिटल में, एक बर्गर खाने के आरोप में बाहर, एक मंत्री से मिलने की बेताबी में अलग.

 

बात इतनी भी नहीं, यदि विपक्षी दल वाक़ई में कोई बदलाव चाहते तो एकजुट रहते मगर नहीं. सभी इस आन्दोलन का लाभ लेने की मंशा में एकदूसरे पर ही आरोप लगाने लगे. दो दलों ने तो इसे भाजपा-कांग्रेस की मिलीभगत बता दिया क्योंकि युवराज ने आकर सबको पीछे कर दिया. सोचिए आप लोग ख़ुद के व्यवहार पर. हम-आप इन राजनैतिक दलों की कठपुतली मात्र हैं. हमारी-आपकी सोच से कहीं आगे जाकर ये सोचते-काम करते हैं. ये सब एक हैं और यदि आपस में कोई दुश्मन है तो हम और आप ही.

 

विचार करियेगा.


20 जुलाई 2026

हाथ अगरबत्ती, पैर मोमबत्ती...

कॉलेज टाइम में सींकिया टाइप लौंडों को रंगबाजी दिखाते समय काव्य-पंक्तियाँ स्वतः ही उभरती थीं....

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

......"

आज ये पंक्तियाँ फिर अनायास ही उभर आईं, जब कोकरोचों के विरोध प्रदर्शन में देखने-सुनने को मिला कि संसद को उखाड़ देंगे, देश को नेपाल बना देंगे, प्रधानमंत्री को संसद में घुस कर मारेंगे, रंडुओं को देश कैसे दे दिया आदि-आदि. ऐसे विचार रखने वाले कथित प्रेशर ग्रुप के सामने शिक्षा मंत्री का ही क्या, किसी छात्र-संघ के पदाधिकारी का भी इस्तीफ़ा नहीं होना चाहिए. विपक्षी दलों की चाल एक बार फिर सरकारी दृढ़ता के सामने विफल हुई, ये अच्छी बात है. कम से कम पढ़े-लिखे लोगों को इस बात को समझना चाहिए.

 

एक तरफ इसरो जैसी सरकारी, स्थायी नौकरी को छोड़कर 35-36 वर्ष के दो युवकों ने अन्तरिक्ष में अपनी उड़ान को सिद्ध किया, दूसरी तरफ ऐसे युवा हैं जिनको कोकरोच बने रहने में गर्व हो रहा है; संसद उखाड़ने के मंसूबे हैं; देश को नेपाल बनाने की मानसिकता है. ऐसे युवाओं में पुलिस की लाठी के साथ-साथ जनमानस के जूते भी पड़ने चाहिए थे.

 

इन्हीं के लिए फिर कहेंगे...

"हाथ अगरबत्ती,

पैर मोमबत्ती,

सीना संदूक,

गाँ@@ बन्दूक,

......

26 फ़रवरी 2026

अनावश्यक ज्ञान बाँटते अज्ञानी-जन

 ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिनसे अपना घर न सँभलता है; घर की किसी योजना में उनकी कोई राय नहीं ली जाती है; जिनका काम न केवल घर में बल्कि आस-पड़ोस में भी सिर्फ बकैती करना हो, वे लोग भी विदेश-नीति पर, वैश्विक सम्बन्धों पर, दक्षिण-एशिया के विविध बिन्दुओं पर अपनी राय दे रहे हैं. कई लोग विदेश नीति को असफल बताने में लगे हैं. हास्यास्पद ये भी है कि जो व्यक्ति विगत दो दशक से अधिक समय से संवैधानिक पद पर है, उसके निर्णयों पर, उसके कार्यों पर वे लोग सलाह दे रहे हैं, जिनके हिस्से में किसी तरह का सम्मान आज तक नहीं आया है.

 



यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि जिस UGC का विनियम 2026 का सहारा लेकर अपने लोग ही अब पीठ में छुरा भोंकने की स्थिति में आ गए हैं, आस्तीन का साँप बने बैठे हैं, वे सहज भाव में UGC के विनियम 2012 को पढ़ लें. ध्यान देने की आवश्यकता है कि अमित शाह के द्वारा अर्बन नक्सलवाद का सफाया करने वाले कदम उठाये जाने के बाद से ही क्यों इस तरह के मुद्दे उभर कर सामने आने लगे? इसका एक सीधा सा उत्तर है कि नक्सलवाद से, वामपंथ से जुड़े लोगों को भली-भांति मालूम है कि मोदी की टीम में ऐसे बकबकी करने वालों की संख्या ज्यादा ही है. वे एक बार में ही बहकने वाली मुद्रा में आ जाते हैं, उनको बहकाया जाना आसान है.

 

बहरहाल, बहेलिया (वामपंथ, अर्बन नक्सलवाद) ने जाल बिछाया और बकवास करने वाले कबूतर उसमें फँस गए. अब उन फँसे कबूतरों को सरकार के, मोदी के और तो और और योगी के भी हर कदम, हर निर्णय गलत लग रहे हैं. अब क्या ही कहा जाये, जो इन लोगों के बापों के समय में नहीं हुआ, वो सब हो गया, इनको देखने को मिल गया तो बकबकी निकल रही जुबान से, नहीं तो छिलवा दिए गए थे किसी समय में.


14 सितंबर 2024

प्राध्यापकों का अनूठा विरोध प्रदर्शन

सत्ताएँ, कुर्सियाँ, प्राधिकारी जब अपने-अपने दायित्वों से च्युत होने लगते हैं, हो जाते हैं तो उनको अपनी आवाज़ सुनाने के लिए प्रताड़ित पक्ष को कुछ न कुछ कदम उठाने ही पड़ते हैं. अक्सर प्रताड़ित पक्ष अपनी अवहेलना के कारण, अपने कार्य में प्रगति होता न देख क्षुब्ध होकर क्रोधवश ऐसे कदम उठा लेता है जिसे सहज रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है. ये जानते हुए भी कि विरोधात्मक कदम उठाने वाला पक्ष अपनी ओर से कतई गलत नहीं है मगर समाज आदर्शात्मक रूप में ऐसे किसी भी कदम का समर्थन नहीं करता है जो कि किसी भी तरह के आदर्श का ध्वंस करते हों, किसी भी तरह से सामाजिक व्यवस्था में अवरोध पैदा करते हों. यह बिन्दु उस समय और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है जबकि विरोध का मुद्दा शिक्षित वर्ग से जुड़ा हो, शिक्षकों से सम्बंधित हो. इस को ध्यान में रखते हुए गांधी महाविद्यालय, उरई के प्राध्यापकों ने व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ भी उठाई और विरोध करने का, अपनी नाराजगी को प्रदर्शित करने का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया.

 




विरोध का, नाराजगी का मामला चूँकि महाविद्यालय के प्राध्यापकों से जुड़ा हुआ था, ऐसे में उनके द्वारा ऐसे किसी भी कदम को गलत ठहराया जा सकता था, जिससे किसी व्यवस्था में अव्यवस्था उत्पन्न होने लगे. गुरुतर दायित्व-बोध का भान होने के कारण प्राध्यापकों द्वारा किये गए विरोध प्रदर्शन से महाविद्यालय के किसी भी कार्य में किसी भी तरह की रुकावट नहीं आई. महाविद्यालय में जिन कक्षाओं में अध्यापन कार्य चल रहा था, उन कक्षाओं का सञ्चालन भी सुचारू रूप से होता रहा. स्नातक और परास्नातक कक्षाओं में नवीन सत्र हेतु प्रवेश प्रक्रिया भी संचालित है, प्राध्यापकों ने इसका भी ध्यान रखा और उनके विरोधात्मक कदम के बाद भी विद्यार्थियों के प्रवेश सम्बंधित कक्षाओं में होते रहे. कार्यालयीन कार्य भी यथोचित रूप से संपन्न होते रहे.

 

आपको बताते चलें कि महाविद्यालयों में कैरियर एडवांसमेंट स्कीम के अन्तर्गत प्राध्यापकों की प्रोन्नति प्रक्रिया को अपनाया जाता है. इस प्रक्रिया के अंतर्गत प्रोन्नति के नियमों और सेवा-शर्तों को पूरा करने वाले प्राध्यापकों को निश्चित प्रारूप में अपना आवेदन समस्त अभिलेखों के साथ प्राचार्य कार्यालय में जमा करना पड़ता है. गांधी महाविद्यालय, उरई के दस प्राध्यापकों द्वारा यथोचित सेवा-शर्तों को पूरा करने के बाद अपनी प्रोन्नति सम्बन्धी आवेदन की फाइल को समस्त दस्तावेजों के साथ गत वर्ष, 2023 में 15 सितम्बर को प्राचार्य कार्यालय में जमा किया गया था. उसके बाद से अद्यतन सम्बंधित प्राधिकारी द्वारा, प्राचार्य द्वारा कोई आधिकारिक जानकारी किसी भी प्राध्यापक को नहीं दी गई और न ही इस सम्बन्ध में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा गठित साक्षात्कार पैनल को आधिकारीक ढंग से सूचित किया गया. सम्बंधित उच्चाधिकारी, प्राधिकारी की इस तरह की कार्य-संस्कृति के चलते पूरा एक वर्ष हो जाने के बाद भी वे दस प्राध्यापक अपनी प्रोन्नति की राह ताकने में लगे हैं.

 


इस तरह की कार्य-संस्कृति, कार्य-प्रणाली से क्षुब्ध होकर उन दस प्राध्यापकों के साथ-साथ अन्य जागरूक प्राध्यापकों ने विरोध का, अपनी नाराजगी प्रदर्शित करने का एक नया तरीका अपनाया. इस विरोध प्रदर्शन में सम्बंधित प्राध्यापकों ने एक वर्ष से फाइलों की स्थिति में प्रगति ने देखते हुए प्राचार्य कार्यालय में फाइल जमा करने की पहली वर्षगाँठ मनाई. अवसर भले ही विरोध करने का रहा, भले ही नाराजगी दिखाने का था, प्राचार्य की उदासीन कार्य-प्रणाली के विरुद्ध था मगर किसी भी तरह का तो शोर-शराबा किया गया, न किसी तरह की नारेबाजी की गई, न किसी तरह से कक्षाओं में अध्यापन कार्य को बाधित किया गया. नारेबाजी, शोरगुल, हंगामा आदि से उलट इस अवसर पर प्राध्यापकों द्वारा केक काट कर अपना विरोध जताया गया. केक के साथ-साथ महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापकों, कर्मचारियों को जलपान भी करवाया गया. इसमें भी प्राध्यापकों ने गंभीरतापूर्वक व्यवहार अपनाते हुए इस बात का ध्यान रखा कि महाविद्यालय का अध्यापन अथवा कार्यालयीन कार्य बाधित न हो, इसलिए सभी विभागों में जलपान पहुँचाये जाने की व्यवस्था की गई.

 





महाविद्यालय के प्राध्यापकों ने इस अवसर पर कहा कि वे लोग शिक्षित वर्ग से आते हैं, शिक्षा देने का कार्य करते हैं. और तो और शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है, ऐसे में उनके द्वारा विरोध के तरीके से एक तरह का सन्देश भी देना उनका उद्देश्य था, साथ ही विद्यार्थियों में भी चेतनात्मक विकास करवाना था. आज विरोध, अनशन के नाम पर देश की, समाज की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है, समाज में अराजकता फैलाई जाती है, यह सब नकारात्मक प्रवृत्ति का परिचायक है. उन्होंने अपने इस तरह के शालीन, सभ्य, शांत विरोधात्मक कदम के द्वारा प्रयास किया है कि अपने दायित्वों, कार्यों के प्रति उदासीन प्राचार्य, प्राधिकारी संभवतः जाग सकें. प्राध्यापकों ने कहा कि प्रोन्नति के इस मुद्दे के साथ-साथ एनपीएस का मुद्दा भी उनके महाविद्यालय में उलझा हुआ है. इसके लिए भी प्राध्यापकों और कर्मियों द्वारा इसी तरह से शालीन, सभ्य विरोध प्रदर्शन करके उदाहरण निर्मित किया जायेगा.

 




विरोध प्रदर्शन के इस अवसर पर शिक्षक संघ अध्यक्ष रोहित कुमार पाठक, महामंत्री डॉ. धर्मेन्द्र कुमार, पूर्व नैक प्रभारी डॉ. ऋचा सिंह राठौर, पूर्व आईक्यूएसी संयोजक डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर, डॉ. सुनीता गुप्ता, डॉ. ऋचा पटैरिया, प्रीति परमार, डॉ. मोनू मिश्रा, डॉ. के.के. गुप्ता, डॉ. के.के. त्रिपाठी, डॉ. मसऊद अंसारी, डॉ. कंचन दीक्षित, डॉ. इन्द्रमणि दूबे, डॉ. संदीप श्रीवास्तव, डॉ. शिवसंपत्त द्विवेदी, डॉ. वंदना सिंह, डॉ. विश्वप्रभा त्रिपाठी, कश्यप पालीवाल, महेन्द्र सिंह आदि उपस्थित रहे.         




30 मई 2024

ईवीएम पर निराधार आरोप

लोकसभा चुनाव अपने अंतिम चरण में है, आखिरी चरण का मतदान अभी शेष है. अंतिम चरण के मतदान वाले दिन से ही चुनाव परिणामों पर बहस शुरू हो जाएगी. तमाम सारे दावे, चुनावी विश्लेषण, राजनैतिक दलों के गणित अपने-अपने दल के प्रति भविष्यवाणी सी करते नजर आयेंगे. अंतिम परिणाम तो चार जून सामने आएगा. यह तो सभी जान-समझ रहे हैं कि चार जून के परिणाम के आते ही ईवीएम पर संकट आने वाला है, उसकी अस्मिता को कलंकित किया जाने लगेगा. यह कोई पहला चुनाव नहीं है जिसमें कि इस तरह से कोई बात उठेगी, लगभग सभी चुनावों में और विशेष रूप से उन चुनावों में जिसमें भाजपा विरोधी दलों को हार का सामना करना पड़ा, उसमें ईवीएम को सिर्फ और सिर्फ हैक करके ही चुनाव परिणाम बनाये जाने का आरोप लगाया जाता रहा है.




इस चुनाव में अंतिम चरण के आने के पहले ही संभवतः विपक्ष को अपने परिणाम के बारे में भनक लगने लगी है. इसी कारण अंतिम परिणाम आने के पहले ही ईवीएम के प्रति संदेह व्यक्त करना शुरू कर दिया गया है. यह कितने आश्चर्य की बात है कि सभी राजनैतिक दल और उनके नेतागण ईवीएम की वास्तविकता को भली-भांति जानते-समझते हैं, इसके बाद भी अनर्गल बातें जनता के बीच प्रसारित की जाती हैं. राजनैतिक व्यक्तित्वों को समझना चाहिए कि उनके द्वारा जनता को भ्रमित किया जाना लोकतंत्र के लिए सही नहीं है. यदि उनको लगता है कि वाकई ईवीएम को हैक किया जा सकता है तो उन सभी जगहों से अपनी सरकारों को वापस ले लेना चाहिए जहाँ वे इसी ईवीएम के द्वारा जीत कर सत्ता में हैं. इसके अलावा जब तक निर्वाचन आयोग द्वारा उनके संशय को दूर नहीं किया जाता है तब तक वे सभी नेता ईवीएम के माध्यम से होने वाले चुनावों में भाग नहीं लें.


असल में विगत कुछ वर्षों से मोदी जी के आभामंडल के कारण भाजपा विरोधियों को जीत बड़ी मुश्किल से नसीब हो रही है. अनेकानेक हथकंडे अपनाये जाने के बाद भी वे लोग भाजपा को, मोदी को पराजित नहीं कर पा रहे हैं. इसी के चलते उन सभी में खीझ पैदा हो चुकी है. इसको वे ईवीएम पर निकाल कर अपने आपको संतुष्टि दे रहे हैं, साथ ही जनता को, मतदाताओं को भ्रमित करने में लगे हैं. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में इस तरह का भ्रम, झूठ फैलाया जाना उचित नहीं.


04 मई 2024

गैर-भाजपाई दलों का प्रयास

जैसे-जैसे चुनाव के चरण बढ़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे चुनावी रंग-ढंग भी कुछ अलग तरह के नजर आ रहे हैं. गैर-भाजपाई दल लगातार स्वयं को इस तरह से प्रोजेक्ट करने में लगे हैं मानो समूचे चुनावी क्षेत्र में एकमात्र वही बचे हुए हैं. भाजपा के नाम पर इस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा है जैसे कि इस बार उसे नाममात्र की सीटें मिलने वाली हैं.

 

ऐसी स्थिति में देखकर कई बार भाजपा-विरोधियों पर, उनकी सोच पर जबरदस्त हंसी आती है. यदि चुनावी समर को ही देखें तो ये कोई पहला चुनाव नहीं है जहाँ कि भाजपा को अथवा नरेन्द्र मोदी को खुद को साबित करना हो. इससे पहले लोकसभा के दो चुनावों-2014 और 2019 में लोगों ने भाजपा को और नरेन्द्र मोदी को परख लिया है. इसी तरह से उत्तर प्रदेश विधानसभा के दो चुनावों-2017 और 2022 में भी जनता ने भाजपा को निराश नहीं किया है. इन चार चुनावों में भाजपा और मोदी की छवि स्पष्ट रूप से निखर कर सामने आई है. इसके साथ-साथ प्रदेश विधानसभा के दो चुनावों में इन छवियों में  योगी जी की छवि ने अपना सकारात्मक सहयोग भी प्रदान किया है. ऐसे में अब विरोधियों द्वारा किया जाने वाला फोटोशॉप प्रचार महज खानापूरी नजर आ रही है.

24 अक्टूबर 2023

सनातन संस्कृति के विरुद्ध तथ्यहीन, असत्य बातों का प्रचार

विजयादशमी का पावन पर्व उसी तरह से गुजर गया जैसे कि प्रतिवर्ष गुजरता है. एक दिन पहले से शुभकामनाओं का आदान-प्रदान चलना शुरू हुआ. सोशल मीडिया के तमाम मंचों के द्वारा नीलकंठ के दर्शन करवा दिए गए, पान खिलवा दिए गए. इधर कई वर्षों से ऐसा होने लगा है कि अब किसी भी पर्व-त्यौहार पर मिलने-जुलने का काम मोबाइल के द्वारा होने लगा है. चित्रों के, शब्दों के माध्यम से शुभकामनाओं का आना-जाना हो जाता है, उसी को मिलना-जुलना, लोगों का आना-जाना मान लिया जाता है. जितना उत्साह मोबाइल पर, सोशल मीडिया के मंचों पर दिखाई देता है, उससे अधिक उदासीनता एक-दूसरे से प्रत्यक्ष मिलने में दिखती है. 




इस उदासीन सी स्थिति के साथ-साथ विगत कुछ वर्षों से एक चलन और देखने को मिलने लगा है कि दशहरा आते ही रावण को महान बताये जाने के प्रयास होने लगते हैं. उसे एक भावुक इंसान, अत्यंत विद्वान, सजग भाई, जिम्मेवार पति, मानवीय दृष्टिकोण रखने वाला बताया जाने लगता है. राम के सापेक्ष उसके व्यक्तित्व को इस तरह से खड़ा किया जाने लगता है कि राम को मानने वाले खुद में शर्म महसूस करने लगें. रावण को इतना महान बताया जाने लगता है कि समाज के बहुत से लोग उसी की तरह के भाई, पति, इंसान मिलने की कल्पना करने लगते हैं. दरअसल ये जहाँ एक तरफ सनातन संस्कृति को धूमिल करने का, उसे बदनाम करने का षड्यंत्र है वहीं दूसरी तरफ सनातन संस्कृति वालों के द्वारा अपनी ही संस्कृति से विमुख होने का दुष्परिणाम है.


इक्कीसवीं सदी में आने के बाद से लोगों में आधुनिक होने का ऐसा नशा चढ़ा है कि अपनी ही संस्कृति को नकारना उनके लिए गर्व की बात होने लगी है. जिस तरह से किसी अत्याधुनिक अथवा आधुनिक माने लाने वाले परिवार के लिए यह बड़े गर्व की बात होने लगी है कि उसकी बेटी रसोई का काम नहीं जानती, ठीक इसी तरह से यह भी गौरवान्वित करने वाली बात होने लगी है कि किसी व्यक्ति को हिन्दू धर्म के बारे में जानकारी नहीं, सनातन संस्कृति की समझ नहीं, अपने ही धर्म ग्रंथों, धार्मिक व्यक्तित्वों के बारे में कोई जानकारी नहीं. ऐसे में केवल उन लोगों को ही दोष नहीं दिया जा सकता जो सनातन संस्कृति के खिलाफ काम कर रहे हैं. वे तो अपने काम को पूर्ण मनोयोग से करने में लगे हैं. उनको इस काम के लिए उचित मानदेय, पारिश्रमिक भी मिल रहा है. समय-समय पर ऐसे लोग सम्मानित भी किये जाते हैं. इसके उलट सनातन संस्कृति के लोग क्या कर रहे हैं? हिन्दू धर्म के रक्षक होने का दावा करने वाले क्या कर रहे हैं?


ये लोग भी ऐसी बातों का विरोध इसलिए भी नहीं कर पाते क्योंकि अपने ही धर्म के बारे में इनको ज्ञान नहीं. रावण के बारे में बताई जा रही अनर्गल बातों की काट के सम्बन्ध में असली ज्ञान इनको है ही नहीं. रावण ने सीता जी का स्पर्श क्यों नहीं किया; रावण और उसकी बहिन के आपसी सम्बन्ध क्या थे; रावण के पतिरूप, पितारूप, भाईरूप की असलियत क्या थी आदि बातों को तब समझा जाता जबकि अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन किया होता. इंटरनेट पर बिखरी बड़ी काल्पनिक, असत्य, तथ्यहीन बातों को पढ़कर हिन्दू धर्म को, सनातन संस्कृति को समझने का दंभ भरने वालों ने ही ऐसी बातों को बढ़ा-चढ़ा कर समाज में फैला रखा है. वर्तमान दौर में सनातन संस्कृति के विरुद्ध काम करने वालों को सबक सिखाने से कहीं ज्यादा आवश्यक है कि सनातन संस्कृति, हिन्दू धर्म, इनके व्यक्तित्वों, धार्मिक ग्रंथों के बारे में प्रचारित तथ्यहीन, असत्य बातों को फैलने से रोका जाये. 





 

22 मई 2023

फिल्मों का विरोध या राजनीति

भारतीय समाज में फिल्मों का अपना ही महत्त्व है. किसी समय जबकि आज की तरह न रंगीन फ़िल्में हुआ करती थीं और न ही बोलने वाली फ़िल्में तब भी भारतीय दर्शकों ने फिल्मों का भरपूर आनंद उठाया था. समय के साथ-साथ तकनीकी बदलाव हुए और न केवल बोलने वाली फ़िल्में बननी शुरू हुईं बल्कि रंगीन फिल्मों ने भी दर्शकों के बीच आना शुरू किया. फिल्मों में जहाँ तकनीकी रूप से परिवर्तन हुए वहीं उनके विषयों में भी जबरदस्त तरीके से बदलाव देखने को मिले. किसी समय धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, देशभक्ति आदि विषयों की फिल्मों के निर्माण पर ज्यादा जोर दिया जाता था. कालांतर में इनमें वास्तविकता का पुट दिया गया, प्रेम कहानियों का आना हुआ और उसी के पीछे-पीछे आपराधिक पृष्ठभूमि वाली फिल्मों ने जोर पकड़ना शुरू किया. सीधे-साधे, मासूम से नायक की छवि एंग्री यंग मैन में बदल गई. 


समय के साथ फिल्मों के विषय में बदलाव को दर्शकों की रुचि बताया जाता रहा. हिंसा, अपराध, माफिया, अंडरवर्ल्ड आदि को फिल्मों में प्रमुखता से दिखाया जाने लगा. आपराधिक पृष्ठभूमि के चरित्रों को नायक की तरह से प्रस्तुत किया जाने लगा. कहते हैं कि फिल्में समाज का आईना होती हैं. इस आईने ने न केवल सच दिखाना शुरू किया बल्कि अशालीन रूप में दिखाना शुरू कर दिया. नग्नता, गालियाँ, अश्लीलता अपने चरम पर प्रदर्शित की जाने लगी. फिल्मकारों द्वारा कहा गया कि इस तरह के फिल्मांकन द्वारा समाज का वास्तविक सच दिखाया जा रहा है. फिल्मकार अपनी ऐसी फिल्मों के द्वारा जनता को सोशल मैसेज देने का दावा करने लगे. इसी सामाजिक सन्देश देने के पीछे समाज की, राजनीति की असलियत दिखाने के लिए राजनीतिक फिल्मों का निर्माण भी किया जाने लगा. ऐसा नहीं है कि ऐसी फिल्मों का निर्माण इक्कीसवीं सदी की घटना है. आँधी फिल्म और उसके साथ घटित राजनीति किसी भी फिल्म-प्रेमी से छिपी नहीं है. ऐसी कोई एक-दो फ़िल्में नहीं बल्कि अच्छी-खासी सूची है.  




किसी समय इक्का-दुक्का फिल्मों को लेकर राजनीति होती थी, इधर देखने में आ रहा है कि लम्बे समय से लगातार कई फ़िल्में राजनीति का शिकार हुई हैं. इन फिल्मों को लेकर जमकर राजनीति की जा रही है. कभी कश्मीर फाइल्स, कभी द केरला स्टोरी, कभी प्रधानमंत्री पर बनी बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री. इनके अलावा देखा जाये तो पद्मावत, बाजीराव मस्तानी, पीके, गैंग्स ऑफ़ बासेपुर, पठान आदि ऐसी फ़िल्में रहीं हैं जिनको लेकर खूब राजनीति हुई, खूब विरोध हुआ. इधर लम्बे समय से ऐसा लग रहा है जैसे फिल्मों का रिलीज होना सिर्फ बायकॉट के लिए ही होता है. इसके पीछे सोशल मीडिया को जिम्मेवार माना जाता है मगर यही अंतिम और पूरा सच नहीं है. सोशल मीडिया के आने के बरसों पहले से भी बॉलीवुड फ़िल्में बायकॉट का शिकार हो चुकी हैं. नील आकाशेर नीचे देश की पहली ऐसी फिल्म थी जिस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रतिबन्ध लगाया था. तीन महीने तक विवाद के बाद यह फिल्म 1958 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म में राजनीति का उपयोग गलत तरीके से होते दिखाया गया था. देखा जाये तो बॉलीवुड में ऐसे मुद्दों पर अनेक फिल्में बनी हैं जिनमें न केवल राजनीति को गलत ढंग से दर्शाया गया है बल्कि प्रशासनिक मशीनरी को भी जबरदस्त तरीके से भ्रष्ट दिखाया गया है.बहुत सी फ़िल्में ऐसी भी बनी हैं जिनमें राजनीतिक उलटफेर को दिखाया गया है. ऐसी फिल्मों का भी विरोध हुआ है मगर इधर फिल्मों के विरोध के पीछे धर्म, संस्कृति, समाज आदि प्रमुखता से है. इसके साथ-साथ समाज की सच्चाई को दिखाने वाली फिल्में भी राजनीति का, विरोध का शिकार हुई हैं.


ऐसी फ़िल्में जो समाज की वास्तविकता को लेकर बनती हैं, उनके विषयों में राजनीति तलाशने के पीछे राजनैतिक मकसद तो दिखाई देते ही हैं, जनभावनाओं का समाहित होना भी होता है. राजनीति ही एक ऐसा विषय है जो साक्षर से लेकर निरक्षर तक पूर्ण बहस के, विमर्श के साथ उपस्थित होता है. यही कारण है कि राजनीति से जुड़े विषयों पर जब भी फिल्में बनी हैं तो तो दर्शकों ने उनके साथ खुद को सहजता से जोड़ने का प्रयास किया है. इसी कारण से बहुत बार ऐसा होता है कि जनभावनाएँ सकारात्मक रूप से जुड़ने के साथ-साथ नकारात्मक रूप से भी जुड़ती हैं. इस नकारात्मकता में वर्तमान दौर में कुछ ज्यादा ही वृद्धि हुई है. देखा जाये तो इसके पीछे किसी न किसी रूप में राजनैतिक हस्तक्षेप भी रहा है.  


राजनैतिक हस्तक्षेप की सम्भावना होने के बाद भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि फिल्मों के बायकॉट करने के पीछे सिर्फ राजनीति ही काम करती हो. अनेक बार समाज के वास्तविक विषयों को लेकर बनी फिल्मों के प्रस्तुतीकरण को लेकर भी विवाद होता है. कई बार फिल्मों के माध्यम से कड़वी सच्चाई भी सामने आती है, ऐसी स्थिति के कारण भी विवाद का जन्म होता है. ऐसे में फिल्मकारों के लिए यह बहुत ही जिम्मेवारी भरा काम होता है कि वे ऐसे विषयों पर, जिनमें कि समाज की वास्तविकता को दिखाया जा रहा हो, किसी चरित्र को उभरा जा रहा हो, समाज के किसी सच को दिखाया जा रहा हो, संवेदनशील होने की आवश्यकता है. हाल के दिनों में आई दो फिल्मों- कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी को इस रूप में सहजता से देखा जा सकता है. दोनों फिल्मों के द्वारा समाज ने देश के उस सच को देखा जिसे उसने अभी तक सिर्फ सुन रखा था. ऐसे में जनभावनाओं में परिवर्तन आना स्वाभाविक सी बात है.


यहाँ फिल्मकारों को ये समझने की आवश्यकता है कि ऐसी फ़िल्में जिनमें समाज का सच, उसकी वास्तविकता दिखाई जा रही हो, वे महज मनोरंजन के लिए नहीं हैं. उनका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा धन कमाने का नहीं होना चाहिए. उनको भी जानकारी होती है कि जनभावनाओं का विरोध कई बार फिल्मों को हिट करवाता है, ऐसे में अक्सर उनके द्वारा जानबूझकर इस तरह का फिल्मांकन, गीत का प्रस्तुतीकरण किया जाता है कि फिल्म के द्वारा विवाद उत्पन्न हो. ऐसी स्थिति में उनका प्रयास हो कि जनभावनाएँ नकारात्मक रूप में न उभरने पायें. ऐसे लोग, जिन्होंने उस कड़वे सच को भोगा होता है, उनके लिए उसे देख पाना, सहन कर पाना संभव नहीं होता है और वे लोग जो उस सच को फिल्मांकन के द्वारा देख रहे होते हैं, वे भी संवेदित होकर विरोध की स्थिति में आ जाते हैं. ऐसे में जहाँ एक तरफ फिल्मकारों को संयम बरतने की आवश्यकता है वहीं दूसरी तरफ दर्शकों को, राजनैतिक पृष्ठभूमि से जुड़े लोगों को भी संवेदित होने की आवश्यकता है कि वे आक्रोश में, विरोध में ऐसा कदम न उठायें जो जनमानस को नुकसान पहुँचाये.  






 

18 जून 2022

अग्निपथ योजना का अनावश्यक विरोध

भारतीय सेना में अग्निपथ योजना की घोषणा होते ही उसका विरोध देश में अनेक स्थानों पर दिखाई दिया. सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया साथ ही निजी संपत्ति को भी क्षति पहुँचाई गई. अग्निपथ योजना में भर्ती किये जाने वाले अग्निवीर युवाओं के सन्दर्भ में अनेक तरह की चर्चाएँ देखने को मिल रही हैं. ऐसा लगता है जैसे किसी अन्य शक्ति के हाथों से सारा उपद्रव संचालित हो रहा हो. जिस तरह से बयानबाजी होने लगी, जिस तरह से लोगों ने इस योजना को लेकर पूर्वाग्रह व्यक्त किये उसे देखकर तो यही लगता है कि विरोध करने वाले किसी व्यक्ति ने इस योजना के बारे में पढ़ नहीं रखा है. केंद्र सरकार द्वारा जैसे ही इस योजना की घोषणा की गई वैसे ही विरोधियों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया.


कुछ बिंदु ऐसे हैं जिन पर विचार किया जाता तो शायद बहुत बातें स्पष्ट हो जाती. यहाँ जिस तरह से विरोध शुरू किया गया उसके अनुसार ऐसा प्रतीत हुआ मानो सरकार युवाओं को जबरदस्ती उठा ले जा रही है. सत्रह वर्ष से बाईस वर्ष तक के युवाओं के लिए जैसे यह अनिवार्य योजना है, जिसमें उनको अपने ये चार साल सेना के लिए देना ही देना है. सरकार के ऐसे कदम के बाद उनका भविष्य चौपट हो जायेगा. चार साल के बाद वे किस नौकरी की तैयारी करेंगे. यहाँ समझना चाहिए था कि यहाँ किसी तरह की अनिवार्यता अथवा जबरदस्ती नहीं है. जिस युवा का मन हो सेना में सेवा करने का वह चार साल के लिए इसमें जा सकता है.


जिस तरह से कहा जा रहा कि सिविल सेवा में जाने के लिए, इंजीनियर, डॉक्टर आदि बनने के लिए यही उम्र महत्त्वूर्ण होती हा और यदि यही चार साल सेना में निकल गए तो फिर वे युवा क्या करेंगे. यहाँ सोचना होगा कि जिस युवा को सिविल सेवा, डॉक्टर, इंजीनियर क्षेत्र में जाना होगा वो उसी के लिए अपनी पढ़ाई कर रहा होगा. वो अनावश्यक रूप से अपना ध्यान क्यों भटकाएगा? इस योजना के द्वारा कम से कम वे युवा जो शारीरिक रूप से सक्षम हैं मगर किसी अन्य कारण से सिविल अथवा अन्य क्षेत्र में नहीं जा सकते. सेना में अग्निवीर के रूप में अपनी सेवा दे सकते हैं.




इस बात का भी विरोध किया जा रहा है कि इस तरह की भर्तियों से सेना का मूल ढाँचा प्रभावित होगा. यहाँ भी इस बात पर विचार नहीं किया गया कि इस अग्निपथ योजना के आने के कारण किसी दूसरी भर्ती योजना को बंद नहीं किया गया है. नियमित रूप से जो भर्तियाँ सेना में होती थीं, वे चलती रहेंगी. इस योजना का लाभ जो व्यक्तिगत रूप से हमें समझ आ रहा है वो ये होगा कि सेना के वे कुशल, नियमित जवान जो लम्बे परिश्रम, अनुशासित जीवन और अभ्यास के बाद प्रशिक्षित होते हैं और उनको अपना बहुत सा समय मंत्रों ट्रेन की सुरक्षा में, वीआईपी की सुरक्षा में, आपदा के समय राहत कार्यों में, किसी दुर्घटना के समय सहायता करने में निकालना पड़ता है, उन सैनिकों को इससे मुक्त रखा जा सकता है. यहाँ पर यही अग्निवीर तैनात किये जा सकते हैं. इससे देश के कुशल और प्रशिक्षित सैनिकों को अपना बेहतर सेना के लिए, देश की सुरक्षा के लिए देने को मिलेगा.


अभी कहीं भी खुलकर ये बात नहीं कही गई है कि अग्निवीरों को देश की सीमा पर तैनात किया जायेगा. किसी ने भी ये नहीं कहा है कि उनको हथियारों से समृद्ध करके संवेदित जगहों पर तैनात किया जायेगा. जिस तरह की चर्चाएँ निकल कर सामने आ रही हैं उनमें एक बात ध्यान देने योग्य है कि ये एक तरह का सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम है. जिसके चार साल तक नियमित प्रतिमाह वेतन तो मिलेगा ही, चार साल की अवधि पूरी होने के बाद एक बड़ी धनराशि भी प्रदान की जाएगी. दुर्घटना में अथवा इन्हीं चार साल की अवधि में किसी तरह से अग्निवीर की मृत्यु हो जाती है तो उसके लिए भी सरकार की तरह से धनराशि की व्यवस्था की गई है.


देखा जाये तो वर्तमान में जिस तरह का परिदृश्य राजनैतिक हलकों में बना हुआ है, उसे देखते हुए एक बात विरोधी भली-भांति समझ चुके हैं कि उनके द्वारा किसी भी रूप में केंद्र सरकार को हिलाया नहीं जा सकता है. इसलिए विरोधियों के द्वारा समय-समय पर उपद्रव रूप में विरोध किया जाने लगा है. उनका मकसद है कि समाज में लोगों में केंद्र सरकार के विरुद्ध एक मानसिकता का निर्माण हो, सरकार के खिलाफ माहौल बने जिससे आगामी चुनावों में शायद किसी हद तक सरकार को कमजोर कर सत्ता से दूर किया जा सके. अग्निवीर का विरोध इसी विपक्षी मानसिकता का परिणाम है.

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02 दिसंबर 2020

कुतर्क भरे समाज की भटकती दिशा

समझ नहीं आता है कि जैसे-जैसे हम लोग साक्षर होते जा रहे हैं, पढ़ते-लिखते जा रहे हैं वैसे-वैसे ही क्यों दिमागी रूप से कुंद होते जा रहे हैं? इधर बहुत सोच-विचार कर इस बारे में लिखने का मन बनाया. कुछ दिनों से देश की राजधानी पर किसान आन्दोलन का संकट दिख रहा है. इस आन्दोलन के बहाने से जिस तरह से खालिस्तान समर्थन के, पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लग रहे थे, वे ज्यादा चिंताजनक लगे. कृषि से सम्बंधित कानूनों पर किसानों की आपत्ति है या नहीं इसे बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है मगर बहुत से राजनैतिक दलों में आपत्ति देखने को मिली. केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से आये दिन देश के किसी न किसी हिस्से से राजनैतिक दलों के विरोधी स्वर सुनाई देने लगते हैं. ऐसा उस समय और भी तेजी से होता है जबकि कहीं से चुनावी आहट सुनने को मिलती है. बहरहाल, अभी दिल्ली में जमे किसानों और उससे जुड़े कुछ बिन्दुओं पर.


कृषि से सम्बंधित कानूनों के विरोध में दिल्ली में मुख्य रूप से पंजाब का किसान एकत्रित हुआ है. इधर आन्दोलन शुरू होने के समय बहुत से लोगों ने जैसी कि आशंका व्यक्त की थी, कुछ वैसा देखने को भी मिला. आन्दोलन में किसानों की शक्ल में कुछ खालिस्तान समर्थक और कुछ पाकिस्तान समर्थक भी दिखाई देने लगे. इस बारे में सोशल मीडिया पर कई वीडियो भी दिखाई दिए. इनके साथ-साथ किसान रूप में जमा आन्दोलनकारियों द्वारा सड़क से गुजरने वाले कुछ लोगों से अभद्रता करते भी दिखाया गया है. जब इस बारे में सोशल मीडिया में अपने विचार व्यक्त किये तो बहुत से लोगों ने किसानी से, खेती से जुड़ा न होना बताते हुए इस मुद्दे से हमें जैसे बाहर ही कर दिया. इधर बहुत से ऐसे लोग अपनी राय देते दिख रहे हैं जिनका न इन कानूनों से मतलब है और न ही उनको इसका भान है कि कानूनों में परिवर्तन के बाद और पहले की स्थिति में मूल अंतर क्या आया है? इधर कुछ समय से एक लीक सी बन गई है कि जैसे ही सामने वाला आपके तर्कों से हारने लगता है, उसके पास आपके सवालों का जवाब नहीं रहता है तो सीधे-सीधे आपको सम्बंधित क्षेत्र से जुड़ा हुआ न बताकर आपको ख़ारिज करने का काम करने लगता है.


इधर इस किसान आन्दोलन पर टिप्पणी करने पर कुछ ऐसा ही हमारे साथ हुआ. जो लोग अनर्गल तरीके से लिखने में लगे थे, उनसे इन कानूनों के लाभ-हानि पूछ लिए, उनके द्वारा इन संसोधनों का पढ़ा हुआ होना पूछ लिया, बस बात यहीं बिगड़ गई. हमें किसानी, किसान, खेती आदि के बारे में बताया जाने लगा. इन सब क्षेत्रों में हमारा अनुभव जाना जाने लगा. ये सत्य है कि जमीनी रूप से हम कृषि कार्यों से बहुत दूर हैं. हमने कभी खेतों में काम नहीं किया, कभी हल नहीं चलाया, कभी पानी नहीं लगाया, कभी रात में खेतों की रखवाली नहीं की. ये सब न करने का ये मतलब नहीं कि हमें किसानों के दर्द का भान नहीं. इसका ये अर्थ नहीं कि हमें जानकारी नहीं कि खेती कैसे होती है.


ऐसे लोगों की जानकारी के लिए इतना ही काफी है कि जमींदार परिवार से होने के बाद भी आज भी हमारे भाई खेती-किसानी का काम स्वयं करते हैं. खेतों में उनके द्वारा किसी सामान्य किसान की तरह पसीना बहाया जाता है. यह काम अकेले हमारे पैतृक गाँव में ही नहीं होता बल्कि हमारे ननिहाल में भी होता है. इसके साथ-साथ हमारे कई अभिन्न मित्र खेती के कार्य में संलग्न हैं. इन सबके द्वारा हमें खेती के, किसानों के अनुभवों से सहजता से परिचय मिल जाता है. और जहाँ तक बात कानूनों को, स्थितियों को, परिस्थितियों को, नियमों को समझने की है तो हमने स्वयं कृषि से सम्बंधित शोध-कार्य के पश्चात् पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की है. इस उपाधि को प्राप्त करने में हमने सिर्फ टेबल वर्क ही नहीं किया है बल्कि किसानों से मिलकर, खेती की, कृषि की स्थिति को देखकर अपना कार्य पूरा किया है.


इधर ऐसा लग रहा है जैसे कि अब मुद्दा विषय का, विषय से सम्बंधित अध्ययन का रह ही नहीं गया है. अब बात विचारधाराओं की होने लगती है. जो जिसके पक्ष का है, उसी के पक्ष की बात को सुनना, कहना पसंद करता है, शेष लोग उसके लिए बेकार हो जाते हैं. पता नहीं ऐसी एकतरफा स्थिति समाज को किस दिशा में ले जा रही है, किस अंत पर ले जाकर खड़ा कर देगी?


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वंदेमातरम्

28 अक्टूबर 2020

आवाज़ उठाओ कायदे से तो सुनी जाती है

आज, 28 अक्टूबर को फेसबुक पर एक पोस्ट दिखी, पोस्ट कुछ ऐसी थी कि उस पर रुककर उसे देखा. वह एक वेंक्वेट हॉल के सन्दर्भ में थी, जो हमारे परिचित लोगों द्वारा संचालित है. उरई जैसी छोटी जगह में परिचय बहुत सहजता से बन जाता है ऐसे में वह व्यक्ति जो इस वेंक्वेट हॉल को चला रहा है वह अधिकतर लोगों से परिचित होगा. बहरहाल, जो पोस्ट देखी थी वो किसी परिचय के लिए नहीं थी वरन वह एक बैनर से संदर्भित थी. उस हॉल के नाम के साथ एक बैनर दिखाया गया था, जिसमें सबसे नीचे एक सफ़ेद पट्टी में बहुत से देवी-देवताओं के चित्र बने हुए थे. चित्र बने होना भी उस पोस्ट का मूल बिंदु नहीं था बल्कि उन देवी-देवताओं से सुशोभित उस बैनर के लगाये जाने की जगह का असल मसला था. वह बैनर एक सड़क के किनारे बनी दीवार पर लगाया गया था और इतने नीचे लगा था जहाँ न केवल खड़े होकर बल्कि बैठकर भी धार मारी जा सकती थी.


धार मारने से आप अब समझ गए होंगे. असल में जिस दीवार पर बैनर लगा हुआ था वहाँ पर आने जाने वाले लोग (इसमें स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हैं) लघुशंका से निवृत्त हो लिया करते हैं. संभव है कि किसी अतिशय बुद्धिजीवी ने उस हॉल को चलाने वालों को सलाह दे दी हो कि कोई बैनर भगवानों के चित्र सहित लगा दो तो वहाँ धार बहनी बंद हो जाएगी. ऐसा ही कुछ उस व्यक्ति ने बताया हो हमारे परिचित में है. उस पोस्ट को देखते ही हमने उसे फोन किया. उसने यही बात बताई तो हमने कहा कि अपने कर्मचारी बैठाओ जो वहाँ पेशाब करने वाले व्यक्तियों की ठुकाई करें मगर यह तरीका गलत है. यह इसलिए भी गलत है क्योंकि रात के अँधेरे में दारू पीकर मूतने वालों को न दीवार समझ आती है, न बैनर और न ही भगवान. ऐसे में भगवानों का निरादर होना ही होना है. परिचित व्यक्ति ने बात समझी और मानी भी फिर एक मित्र की सहायता से उस विवादित पट्टी को बैनर से हटवा दिया गया.




पिछले दो सालों में यह तीसरा ऐसा अवसर है जिसमें देवी-देवताओं से सम्बंधित विवादित सामग्री को हटवाया है. ये तो वे मामले हैं जो आँखों के सामने आ गए अन्यथा की स्थिति में हिन्दुओं को घंटा बनाकर रख दिया गया है, आओ और बजाकर चले जाओ. इससे पहले अप्रैल 2018 में शराब-बियर की दो दुकानों के नामों में बदलाव करवाया था. उसमें इतनी सहजता नहीं हुई थी, जितनी कि आज इस मामले में हुई थी. इसके पीछे एक तो उन दोनों का अपरिचित होना रहा था साथ ही शराब जैसे धंधे से जुड़ा होना भी मुख्य कारण रहा था. दो-चार बार के प्रयासों के बाद वे नाम भी हट गए थे.


इस पोस्ट का उद्देश्य अपने इन कामों को दिखाना नहीं बल्कि उन हिन्दुओं के मन में ये विश्वास जगाना है कि यदि वे अपने धर्म, अपने आराध्यों के अपमान में हो रही किसी भी बात का, घटना का विरोध करते हैं, पुरजोर तरीके से करते हैं तो आवाज़ को सुनने वाले लोग हैं. हिन्दू धर्म के विरुद्ध हो रही तमाम बातों में से कुछ बातों को सुना जाता है, विसंगतियों को दूर किया जाता है, बस आवाज़ उठानी पड़ती है. सो, बिना डरे, बिना संकोच करे आवाज़ उठाइये. गलत देखिए तो खामोश न रहिए. आज आप एक आवाज़ बनेंगे, कल को आपके साथ बहुत सी आवाजें जुड़ जायेंगीं.


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20 जून 2020

सोशल मीडिया को आवश्यकता है सम्पादकीय व्यवस्था की

कई बार लगता है कि सोशल मीडिया की ऐसी स्वतंत्रता अब बंद की जानी चाहिए. एडिट फ्री व्यवस्था ने जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है वहीं विचारों की गंदगी भी फैला रखी है. किसी समय अपने आलेख, साहित्यिक रचनाओं के सम्पादक के धन्यवाद पत्र के साथ वापस आने पर बुरी तरह गुस्सा आता था. कई बार मन में आता था कि किसी न किसी जुगाड़ के बिना पत्र-पत्रिकाओं में छपना संभव नहीं. इसी में कई बार अपने बीच के कई साथियों को प्रकाशित होना देखते, बहुत सी ऐसी प्रकाशित रचनाओं को देखते और अपनी रचनाओं की उनसे तुलना करते तो विश्वास होता कि जुगाड़ से ज्यादा रचना काम करती है. बाद में बिना किसी जुगाड़ के अपनी रचना प्रकाशित करने पर इस धारणा का भी खंडन हुआ. 


उस दौर के बाद जब ब्लॉग लेखन का, सोशल मीडिया का दौर देखा तो लगा कि अब कम से कम सम्पादकों का अनावश्यक हस्तक्षेप समाप्त होगा. उनका एक तरह का एकाधिकार समाप्त होगा. आरंभिक दौर में ऐसा देख कर अच्छा भी लगा. सोशल मीडिया पर, ब्लॉग पर बहुत ही सारगर्भित सामग्री पढ़ने को मिलती. वैचारिक भिन्नता के बीच वैचारिक मतभेद देखने को मिलता मगर सामग्री के सन्दर्भ में गिरावट देखने को नहीं मिलती. ब्लॉग को इस सन्दर्भ में बहुत ही समृद्ध कहा जा सकता था. कालांतर में जैसे-जैसे सोशल मीडिया का विकास होता रहा, हर एक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलती रही सामग्री की गंभीरता का लोप होता रहा. आज स्थिति ये है कि सिवाय आपसी कटुता के बहुत कुछ देखने को नहीं मिल रहा है.


सोशल मीडिया के दौर ने, माइक्रो ब्लॉगिंग के रूप ने ब्लॉग संसार को भी दिग्भ्रमित किया है. अब यहाँ भी चोर दिखाई देने लगे हैं. यहाँ भी विरोध के नाम पर मानसिकता हावी है. यहाँ भी अधजल गगरी छलकत जाए वाली बात सिद्ध हो रही है. सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों की स्वतंत्रता ने लोगों को पढ़ने से दूर कर दिया है. अब उनका एकमात्र काम बस लिखना, अपनी विचारधारा से इतर व्यक्तियों को अपमानित करना, अपनी ही प्रशंसा की फोटो-सामग्री को पोस्ट करना रह गया है. यहाँ अब बड़े-छोटे का लिहाज समाप्त हो गया है. यहाँ अब रिश्तों की, अनुभव की, उम्र की मर्यादा का लोप हो चुका है. यहाँ बाप-दादा की उम्र का हो वो भी फ्रेंड है, बेटे-बेटी की उम्र का हो वो भी फ्रेंड है. इसमें भी किसी तरह का सम्पादकीय प्रतिबन्ध नहीं है, किसी भी तरह के एडिटोरियल बोर्ड से गुजरना नहीं है सो चाहे जो मन आये लिख दिया जाता है, चाहे जो मन में आता है छाप लिया जाता है.

इसी का दुष्परिणाम है कि अब गंभीर सामग्री का विलोपन हो चुका है, उसकी जगह पर गालियाँ देखने को मिलती हैं. वैचारिक रूप से कुंद व्यक्ति एक-दूसरे को ही गाली नहीं दे रहे हैं बल्कि देश के प्रधानमंत्री को, मुख्यमंत्रियों को भी गाली देने में लगे हैं. किसी व्यक्ति की पोस्ट के खिलाफ आप कुछ बोलते हैं तो आपके ऊपर व्यक्तिगत, पारिवारिक आक्षेप लगाये जाते हैं. यदि सच्चे सबूत नहीं मिलते हैं तो फोटोशॉप का सहारा लिया जाता है. कुल मिलाकर सोशल मीडिया की स्वतंत्रता दूसरों को अपमानित करने के लिए रह गई है. किसी समय एडिटोरियल बोर्ड जैसी व्यवस्था को, सम्पादकीय जैसी व्यवस्था को कोसने की गलती हमने भी की थी मगर अब लगता है कि ये अत्यंत अनिवार्य व्यवस्था है. इस व्यवस्था के कारण अश्लीलता रुकी हुई थी, भ्रामक सामग्री रुकी हुई थी, आपसी कटुता रुकी हुई थी. अब लगता है कि सोशल मीडिया पर, ब्लॉगिंग पर भी सम्पादकीय व्यवस्था लागू की जानी चाहिए.

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26 मार्च 2020

विरोधी मानसिकता

सीएए को लेकर देश भर में तमाम राजनैतिक दलों के साथ-साथ मुस्लिम भी विरोध में हैं. देश भर में इसे लेकर हिंसा, उपद्रव होते रहे हैं. कोरोना वायरस की महामारी के चलते दिल्ली में सड़क जाम किये बैठे शाहीन बाग़ के विरोधियों को भी वहाँ से हटा दिया गया है. अब खुले रूप में कहीं भी इसका विरोध नहीं दिखाई दे रहा है. वर्तमान में ये विरोध ऊपरी तौर पर भले ही देश में न दिखाई दे रहा हो मगर मुस्लिम समुदाय के लोगों के दिमाग से विरोधी मानसिकता अभी भी गई नहीं है. अभी हाल में ऐसी घटनाएँ सामने आईं हैं जिनमें ऐसा देखने को मिला है. घटनाएँ भी सामान्य नहीं कही जा सकती हैं. 

हाल-फिलहाल हमारी अपनी निगाह से दो घटनाएँ ऐसी सामने आई हैं जिनमें सीएए का विरोध मुसलमानों में दिखाई दे रहा है, जबकि समय और स्थिति के अनुसार ऐसा किया जाना शर्मनाक कहा जाना चाहिए. ऐसी ही एक घटना में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर अबरार अहमद ने अपने गैर-मुस्लिम विद्यार्थियों को फ़ेल कर दिया था. इसका कारण उन विद्यार्थियों का सीएए का समर्थन करना रहा है. इसे उन्होंने स्वयं अपने एक ट्वीट के द्वारा व्यक्त किया.

अपने ट्वीट में उन्होंने कहा “15 गैर मुस्लिमों को छोड़कर मेरे सभी छात्र पास हो गए हैं. अगर आप सीएए के खिलाफ आंदोलन करते हैं तो मेरे पास सीएए के पक्ष में  55 छात्र हैं. अगर आंदोलन खत्म नहीं हुआ तो बहुमत आपको सबक सिखाएगा. कोरोना के चलते आपके आंदोलन के चिह्न मिट गए हैं. मैं हैरान हूं कि आपको मुझसे नफरत क्यों है?


मामला तूल पकड़ने के बाद यूनिवर्सिटी ने उनको सस्पेंड कर दिया और जांच शुरू हो गई है. समझने वाली बात है कि यदि शिक्षक ही इसी तरह की विभेदपूर्ण मानसिकता रखेंगे तो विद्यार्थियों के साथ न्याय कैसे हो सकेगा? प्रशासन और जनता को खासतौर पर अभिभावकों को अपने आस-पास ऐसी बातों का संज्ञान लेना चाहिए.

इसी तरह एक अन्य घटना में कोरोना वायरस संक्रमण से रोकने के लिए विभिन्न समुदाय, संस्था के लोग मास्क का, दवाइयों का, सेनेटाइजर आदि का वितरण कर रहे हैं. इसी में मुस्लिम समुदाय के कुछ युवकों की तस्वीर सामने आई है जिसमें कि वे कोरोना से बचाव के लिए मास्क का वितरण कर रहे हैं. विभेद इस वितरण से नहीं अपितु उस मानसिकता से है जो इसके पीछे दिख रही है. उनके द्वारा वितरित किये जाने मास्क में No CAA छपा हुआ है. सोचने वाली बात है कि आखिर महामारी के इस संकट भरे समय में भी उनकी मानसिकता सहायता करने की बनी तो भी एक विभेद के साथ.



सरकार को, प्रशासन को ऐसी घटनाओं पर निगाह डालते हुए कार्यवाही करनी चाहिए जिससे सामाजिक सद्भाव न बिगड़ने पाए. 

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01 मार्च 2020

स्थितियाँ बदली नहीं हैं एक साल बाद भी

ठीक एक वर्ष पूर्व पूरा देश अपने जांबाज़ अभिनन्दन के सकुशल स्वदेश वापसी की प्रार्थना कर रहा था. पाकिस्तान के एक विमान को मार गिराने के बाद के क्रम में अभिनन्दन पाकिस्तानी सीमा में गिर पड़े. पाकिस्तान द्वारा उनको कैद किया गया. बाद में भारत की तरफ से जबरदस्त कूटनीतिज्ञ दवाब बनाया गया. इसका सुखद परिणाम ये हुआ कि अभिनन्दन की घर वापसी एक मार्च को हो गई. 



आज, ठीक एक साल बाद पूरा देश दिल्ली में हुई हिंसा के पक्ष-विपक्ष में लगा हुआ है. नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर चलते विरोध के पीछे हिंसा की मानसिकता पनपती रही. अंततः दिल्ली हिंसा की चपेट में आ गई. लगभग तीन दर्जन लोग मारे गए. इसमें आम जनता शामिल है, साथ ही पुलिस के, आई बी के जवान भी चपेट में आये. सैनिकों पर तेजाब फेंका गया. 

फिलहाल कुछ शांति सी समझ आ रही है, वास्तविकता क्या है, ये दंगाई ही जानें. एक वर्ष पहले हम सीमा पार के दुश्मन से लड़ रहे थे. ठीक एक वर्ष के अंतराल में हम सीमा के भीतर के दुश्मनों से संघर्ष कर रहे हैं. स्थितियाँ बदली नहीं हैं, एक साल बाद भी. 

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25 फ़रवरी 2020

नमस्ते ट्रंप और दिल्ली हिंसा का सह-सम्बन्ध


जैसा कि मन में अंदेशा था और वैसा ही हुआ. अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा को लेकर मोदी विरोधियों को विचलित किये जा रही थी. मोदी विरोधियों के लिए ऐसा कोई भी काम असहनीय हो जा रहा है जो मोदी की लोकप्रियता में किसी भी तरह की वृद्धि करते हैं. अमेरिका में संपन्न हुए हाउडी मोदी की जबरदस्त लोकप्रियता के बाद भारत में अमेरिकी राष्ट्रपति के सम्मान में संपन्न होने वाले नमस्ते ट्रंप से मोदी विरोधी बौखलाए थे. वे भली-भांति जानते थे कि यह कार्यक्रम और ट्रंप की यात्रा अद्भुत रूप से सफल होगी. इस कार्यक्रम में विरोधी प्रत्यक्ष रूप से कोई व्यवधान डालने की स्थिति में ही नहीं थे, ऐसे में उनके द्वारा अप्रत्यक्ष कदम उठाने की शंका मन में थी. अमेरिकी राष्ट्रपति के आने और दिल्ली में उत्पात मचने के अपने ही सह-सम्बन्ध हैं.


दिल्ली में दो महीने से अधिक समय से चल रहे शाहीन बाद प्रदर्शन से केन्द्र सरकार पर किसी तरह का कोई असर नहीं हो रहा था. यद्यपि इस अवरोध से आम नागरिक अवश्य परेशान था तथापि उनके द्वारा भी कोई आक्रोश कहीं व्यक्त नहीं किया गया. इधर अमेरिकी राष्ट्रपति के आने का कार्यक्रम बना उधर CAA का और काल्पनिक NRC का विरोध कर रहे लोगों को जैसे मौका मिल गया. मोदी विरोधियों के लिए, CAA विरोधियों के लिए देश का कोई मतलब नहीं. वे अपने किसी भी कदम से ट्रंप तक, वैश्विक मीडिया तक सन्देश पहुँचाना चाह रहे थे कि देश में केन्द्र सरकार नाकाम है. देश की राजधानी में आग लगी हुई है. इस मकसद में वे कितने कामयाब हुए, कितने नहीं यह तो समय बताएगा किन्तु राजधानी में जबरदस्त हिंसा मचाने में वे अवश्य ही सफल रहे. 


खुलेआम हिंसा, आगजनी, उत्पात में कई लोगों की जान गई, सैकड़ों वाहनों में आग लगा दी गई, करोड़ों रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ. विरोध का विस्तार शाहीन बाग़ से बाहर और भी कई जगहों पर हुआ. सड़कों पर अवरोधक का भी विस्तार हुआ. यह किसी भी स्थिति में देश के लिए सुखद नहीं है. मोदी विरोध के नाम पर विरोध अब देश का होने लगा है. इससे भी बुरी बात यह है कि कथित मीडिया और कथित बुद्धिजीवी इसमें भी उत्पातियों का पक्ष लेते नजर आ रहे हैं. पुलिस के सामने खुलेआम रिवाल्वर के फायरिंग करने वाले को मासूम बताया जा रहा है. जगह-जगह घरों में घुसकर हिंसा फैलाने वालों को नजरंदाज किया जा रहा है. इन सब पर चर्चा करने के बजाय ट्रंप यात्रा के खर्चे को निशाना बनाया जा रहा है. समझने वाली बात यह है कि आखिर CAA पर इन विपक्षी दलों का इतना विरोध क्यों? विरोध के नाम पर खुलेआम इस्लामिक आतंकवाद को समर्थन क्यों? ये स्थितियाँ न तो वर्तमान के लिए सुखद हैं और न ही भविष्य के लिए. इस पोस्ट के लिखे जाने के समय तक उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए गए हैं. आखिर इस समय तक ट्रंप भी देश से अपनी रवानगी कर चुके हैं. अब देखना है स्थिति कैसे नियंत्रण में आती है?

23 फ़रवरी 2020

CAA विरोधी उत्पातियों पर सख्ती क्यों नहीं?


CAA पर काफी लम्बे समय से दिल्ली के शाहीन बाग पर कब्ज़ा जमाकर बैठे अनशनकारियों के साथ अदालती वार्तालाप निष्फल ही निकली. इसका कोई सुफल निकलता तो दिखा नहीं बल्कि दिल्ली में अन्यत्र जाफराबाद में भी इसी तरह सड़क जाम करके उत्पात मचाने की खबर सामने आई है. शाहीन बाग़ से पहले भी लगभग सम्पूर्ण देश में CAA के नाप पर मुसलमानों द्वारा, गैर-भाजपाइयों द्वारा उत्पात मचाया जाता रहा है. ऐसा आज भी छुटपुट रूप में यहाँ-वहाँ हो रहा है. सोचने वाली बात है कि आखिर ऐसे लोगों ने देश को क्या धर्मशाला समझ रखा है? ऐसे लोगों ने क्या देश को अपनी उत्पाती फितरत को पूरा करने का मैदान समझ लिया है? इसके साथ-साथ समझ नहीं आ रहा है कि आखिर प्रशासन क्या कर रहा है? अदालत इसके लिए कोई ठोस और सशक्त आदेश क्यों नहीं देती है? उत्पात मचाते लोगों से, एक लम्बे समय से सड़क जाम करके लाखों लोगों के लिए परेशानी पैदा करने वाले लोगों से आखिर वार्ता का औचित्य क्या है? 

इस मसले पर केन्द्र सरकार को, दिल्ली सरकार को कड़े से कड़ा कदम उठाया जाना चाहिए. यदि जल्द ही इस तरह से बनते जा रहे शाहीन बाग, जाफराबाद को हटाया नहीं गया तो ये प्रदर्शन समूचे देश में एक नजीर की तरह पेश किये जायेंगे. ये आने वाले समय के लिए, देश के लिए सुखद संकेत नहीं है.



08 जनवरी 2020

फिल्म नहीं उसके दर्द के एहसास ने लोगों को जोड़ा है


जिस जेएनयू मारपीट विवाद को सरकार, शासन, प्रशासन, मीडिया शांत नहीं कर पा रहे थे उसे एक झटके में फिल्म अभिनेत्री दीपिका ने खामोश कर दिया. जेएनयू में हुए मारपीट सम्बन्धी विवाद के बाद दीपिका कथित टुकड़े गैंग से मिलने विश्वविद्यालय पहुँच गईं. दीपिका का वहाँ पहुँचना हुआ नहीं कि एक ऐसे गुट द्वारा, जो टुकड़े गिरोह का विरोध करता रहा है, दीपिका की फिल्म छपाक का बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया. इस बहिष्कार की घोषणा सोशल मीडिया के द्वारा सबसे अधिक चर्चा में आ गई. दीपिका की तरफ से कुछ टिप्पणी आती उसके पहले ऐसे गुट के विचार सामने आने लगे जो किसी न किसी रूप में कथित गिरोह के पक्षधर बने हुए हैं. अचानक से इस गुट को समझ आने लगा कि यह फिल्म जागरूकता के लिए बनाई गई है. इसी गुट को अचानक से आभास हुआ कि इस फिल्म का मकसद एक एसिड अटैक पीड़ित के दर्द को, उसकी पीड़ा को दिखाना है.


दीपिका के इस कदम के क्या परिणाम होंगे, एक गुट द्वारा फिल्म बहिष्कार का क्या अंजाम होगा यह तो फिल्म रिलीज के बाद पता चलेगा. इसके बाद भी यदि संक्षेप में सारे घटनाक्रम का अवलोकन किया जाये तो साफ़ सी बात है कि फिल्म का निर्माण किसी भी रूप में सामाजिक जागरूकता के लिए, सामाजिक सन्देश देने के लिए, लक्ष्मी अग्रवाल की सहायता के लिए या फिर किसी अन्य एसिड अटैक पीड़ित की सहायता के लिए नहीं किया गया है. असल में छपाक लक्ष्मी अग्रवाल की कहानी है जो एसिड हमले का शिकार हुई थी. विगत कई वर्षों में उसने व्यक्तिगत रूप से अथक मेहनत की है, अपनी जिजीविषा को समाप्त न होने दिया है, अपने संघर्ष को न केवल जिंदा रखा है बल्कि उसे खुद में जिया भी है. लगभग दो वर्ष पहले एक दौर ऐसा भी आया था जबकि उसके सामने खुद के और अपने बेटी के भरण-पोषण की समस्या खड़ी हुई थी. जिस व्यक्ति के सहारे उसने अपनी ज़िन्दगी की जंग को आगे तक ले जाने का विचार बना रखा था वही उसे मझधार में छोड़कर आगे निकल गया था. यह वह दौर था जबकि लक्ष्मी अपने संघर्ष को सोशल मीडिया के द्वारा, अपने मित्रों के द्वारा लगातार चर्चा में बनाये हुए थी. स्टॉप सेल एसिड (#stopsaleacid) अभियान के सहारे उसने हजारों लोगों से खुद को जोड़ने का काम किया. हजारों लोग बिना किस फिल्म के द्वारा संवेदित हुए, खुद पर एसिड की तीव्रता का एहसास किये बिना ही अनेक लोग खुद लक्ष्मी के संपर्क में आये, उसके अभियान का हिस्सा बने. हम स्वयं भी उसके इस अभियान का हिस्सा बने. तब कहीं भी न फिल्म का विचार था और न ही किसी ऐसे माध्यम के द्वारा सामाजिक जागरूकता लाने का, सामाजिक सन्देश देने का विचार था. 

असल में फिल्मकारों ने हालिया दौर में ऐसे मुद्दों पर फिल्म बनाना शुरू कर दिया है जो किसी न किसी रूप में जनता को आंदोलित किये हों. ऐसे किसी भी मुद्दे पर जिससे जनता, समाज सीधे तौर पर जुड़ता दिखा है, फिल्मकारों ने उस विषय पर तत्काल फिल्म बनाकर पेश कर दी. छपाक भी उसी रणनीति का एक हिस्सा मात्र है. यह विचार करने वाली बात है कि जिस लक्ष्मी अग्रवाल के साथ एसिड हमले की घटना वर्ष 2005 की है उसके लिए फिल्म इंडस्ट्री आज वर्ष 2019 में जाग रही है. आखिर ऐसा क्यों? ऐसी देरी क्यों? कहीं न कहीं इसके पीछे लक्ष्मी का वह संघर्ष का उत्कर्ष है जो विगत दो सालों में हुआ है. उसकी कहानी कोई छिपी कहानी नहीं थी जो एकाएक आज सामने आई. उसका संघर्ष कोई एक दिन का संघर्ष नहीं जो अचानक सामने आ गया. असल में स्टॉप सेल एसिड अभियान के द्वारा लक्ष्मी ने देशव्यापी सन्देश देने का काम किया. इस दौरान उसके संपर्क में अनेक लोग आये. अनेक स्थानों पर, शहरों में उसके समर्थन में छोटे-बड़े आयोजन हुए. उसकी इस प्रसिद्धि को फिल्म इंडस्ट्री ने तत्काल अपने पक्ष में भुनाने का विचार करके सम्बंधित कदम उठा डाला.

अब जबकि दीपिका के कदम से जेएनयू मारपीट विवाद शांत हो गया है और फिल्म के बहिष्कार का विवाद छिड़ गया है तब यह भी जानना आवश्यक हो जाता है कि क्या महज फिल्म ही अब सामाजिक सन्देश देने का काम करेंगी? आखिर जब फिल्म न बनी थी तब कैसे हजारों लोग लक्ष्मी के दर्द का एहसास करते हुए उसके साथ जुड़ गए थे? पूरी तरह से व्यावसायिक मुद्दे को महज व्यावसायिक रूप में ही देखा जाना चाहिए. एक पक्ष है जो किसी भी रूप में समाज में अपनी फिल्म की पब्लिसिटी चाहता है. एक पक्ष है जो कथित गैंग के चलते उस फिल्म का बहिष्कार कर रहा है. एक पक्ष है जो इस बहिष्कार का विरोध करके सरकार पर निशाना साधने का काम कर रहा है. इन सारे पक्षों के बीच लक्ष्मी को अकेले नहीं छोड़ना है क्योंकि उसके संघर्ष की अपनी ही कहानी है जो किसी भी फिल्म से अपना अंजाम नहीं पा सकती.

25 जून 2018

आपातकाल : भारतीय इतिहास का काला अध्याय


25 जून, भारतीय सन्दर्भों में, भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में यह मात्र एक तारीख भर नहीं है. इस तारीख का अपना ही एक इतिहास है, जिसे आज काले अध्याय के रूप में देखा-जाना जाता है. 25 जून 1975 की रात्रि को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने आपातकाल की नींव रखी. अगले दिन सुबह-सुबह रेडियो के द्वारा देश में आपातकाल की घोषणा हो गई. सुबह छह बजे इंदिरा गाँधी ने सभी मंत्रियों को बैठक के लिए बुलाया. बैठक के तुरंत बाद ही इंदिरा गाँधी ने रेडियो पर अपने भाषण के द्वारा आपातकाल लगाये जाने की जानकारी देश को दी. उस समय फ़ख़रुद्दीन अली अहमद देश के राष्‍ट्रपति थे. कैबिनेट की बैठक में आपातकाल के प्रस्‍ताव को स्वीकृति मिल चुकी थी. उस पर अंतिम मुहर राष्‍ट्रपति को लगानी थी. इंदिरा और सिद्धार्थ शंकर ने राष्‍ट्रपति भवन पहुँच राष्‍ट्रपति को देश के हालात के बारे में अवगत कराया और आपातकाल की उपयोगिता बताई. इसके बाद राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी. यह अपने आपमें विचित्र स्थिति है कि आपातकाल की घोषणा रेडियो पर पहले कर दी गई बाद में उस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे. आपातकाल के बाद देश भर में गिरफ़्तारियों का दौर शुरू हुआ. खास बात यह रही कि महज तीन नेताओं की गिरफ़्तारी की इजाजत नहीं दी गई थी. ये तीन नेता तमिलनाडु के कामराज, बिहार के जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एसएम जोशी थे.


आपातकाल लगाये जाने के पीछे उच्च न्यायालय, इलाहाबाद का एक आदेश था. 12 जून 1975 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया. उन पर वोटरों को घूस देना, सरकारी मशनरी का गलत इस्तेमाल करने जैसे चौदह आरोप लगे थे. यह मामला राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हारने के बाद दर्ज कराया था. इस फैसले के बाद इंदिरा गाँधी ने इस्तीफा देने से इन्कार करते हुए फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी. उच्चतम न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के इस आदेश को बरकरार रखा. यह आदेश 24 जून 1975 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश कृष्ण अय्यर ने दिया. इसके बाद इंदिरा गाँधी ने आपातकाल का सहारा लेकर राजनैतिक विरोधियों को नियंत्रण में लेने का प्रयास किया. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल था. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे. नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई. इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया. प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया था. उनके बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया. जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि कहा था. 


आपातकाल लागू करने के बाद इंदिरा गाँधी के राजनैतिक विरोधी और अधिक सक्रिय हो गए. विरोध की लगातार बढ़ती तीव्रता के कारण लगभग दो साल बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी. चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ. इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं. संसद में कांग्रेस 153 पर सिमट गई और केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ. जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली. नई सरकार ने आपातकाल के दौरान लिए गए फ़ैसलों की जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया. अपने अंदरूनी मतभेदों के कारण 1979 में जनता सरकार गिर गई. उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई लेकिन यह सरकार सिर्फ़ पाँच महीने तक ही चल सकी. इस सरकार में चौधरी चरण सिंह एक दिन के लिए भी संसद न जा सके. उनके नाम कभी संसद नहीं जाने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड दर्ज हो गया.

वैसे देखा जाये तो देश में आंतरिक अशांति का खतरा होने पर, किसी बाहरी देश के आक्रमण होने पर अथवा वित्तीय संकट की स्थिति दिखाई देने पर आपातकाल लगाया जा सकता है. देश ने 1962 में चीन के साथ एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान आपातकाल का सहा था. 25 जून 1975 की मध्यरात्रि से 21 मार्च 1977 के बीच का आपातकाल विशुद्ध राजनैतिक हथकंडा था, जिसे आंतरिक अशांति के नाम पर अनुच्छेद 352 के अंतर्गत लगाया गया था.