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20 सितंबर 2025

सेमीकंडक्टर : भारतीय अर्थव्यवस्था का डिजिटल हीरा

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में सेमीकंडक्टर चिप के बारे में चर्चा करते हुए कहा था कि वर्ष 2025 के अंत तक भारत की पहली स्वदेशी सेमीकंडक्टर चिप बाजार में होगी. इसके कुछ दिन बाद ही सेमीकॉन इंडिया 2025 आयोजन में देश की पूरी तरह से स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर चिप को पेश किया गया. विक्रम नामक चिप को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की सेमीकंडक्टर लैबोरेट्री (SCL) ने बनाया है. यह 32-बिट माइक्रोप्रोसेसर है, जिसे पूरी तरह से देश में डिजाइन किया और बनाया गया है. देश की पहली एवं पूर्णतः स्वदेशी चिप को विशेष रूप से अंतरिक्ष मिशनों के लिए तैयार किया गया है. अंतरिक्ष में रॉकेट प्रक्षेपण की कठिन परिस्थितियों को सहने में सक्षम यह चिप -55 डिग्री सेल्सियस से लेकर +125 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकती है. सेमीकॉन इंडिया 2025 इवेंट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चिप्स को डिजिटल डायमंड के रूप में परिभाषित किया. सेमीकंडक्टर चिप जिसे माइक्रोचिप या इंटीग्रेटेड सर्किट भी कहते हैं. यह एक छोटा सा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है, जो सिलिकॉन का बना होता है. यह अपने छोटे से आकार में लाखों-करोड़ों ट्रांजिस्टर समेटे इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को नियंत्रित करता है. स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, टेलीविजन, कार, मेडिकल उपकरण, सैटेलाइट, मिसाइल आदि के लिए ये चिप दिमाग की तरह काम करती है.

 



वर्तमान डिजिटल युग में तमाम सारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, जो आज हमारे जीवन का प्रमुख हिस्सा हैं, इन्हीं सेमीकंडक्टर चिप के सहारे काम करते हैं. जीवन शैली को सहज और सरल बनाने में उपयोगी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयोग होने वाली चिप का उत्पादन गिने-चुने देशों में ही होता है. ताइवान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका इसके उत्पादन के केन्द्र-बिन्दु हैं. भारत को भी इन्हीं देशों पर निर्भर रहते हुए चिप सम्बन्धी माँग को पूरा करने के लिए इनसे आयात करना पड़ता है. आज भले ही गिने-चुने देशों के पास चिप उत्पादन की क्षमता हो मगर सेमीकंडक्टर चिप के आविष्कार, निर्माण की यात्रा वैश्विक स्तरीय रही है. देखा जाये तो सेमीकंडक्टर चिप का इतिहास 1947 में ट्रांजिस्टर के आविष्कार से शुरू हुआ. जब अमेरिका के बेल लैब्स के विलियम शॉकली, वाल्टर ब्रेटेन और जॉन बार्डीन ने जर्मेनियम पर आधारित पहला ट्रांजिस्टर बनाया. इसके बाद 1958 में टेक्सास के जैक किल्बी ने जर्मेनियम का उपयोग करते हुए विश्व के पहले इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) का निर्माण किया. इसके कुछ महीनों पश्चात् 1959 में फेयरचाइल्ड सेमीकंडक्टर के रॉबर्ट नॉयस ने सिलिकॉन का उपयोग करते हुए इंटीग्रेटेड सर्किट बनाया. इस आविष्कार ने कालांतर में आधुनिक सेमीकंडक्टर चिप निर्माण की राह निर्मित की. जिस आधुनिक चिप का स्वरूप आज हमारे सामने है उसका आधार 1959 में मेटल ऑक्साइड सेमीकंडक्टर फील्ड इफेक्ट ट्रांजिस्टर (MOSFET) के रूप में बना.  

 

भारतीय सन्दर्भ में यदि सेमीकंडक्टर के इतिहास पर नजर डालें तो अस्सी के दशक के आरम्भ में सेमीकंडक्टर चिप निर्माण हेतु चंडीगढ़ में सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स लिमिटेड (SCL) की स्थापना की गई थी. तकनीकी एवं आर्थिक कारणों से सेमीकंडक्टर चिप निर्माण में अवरोध उत्पन्न होने के कारण लम्बे समय तक देश को इसके लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ा. दूसरे देशों पर निर्भरता की एक लम्बी यात्रा पूरी करने के बाद अपनी पहली पूर्ण स्वदेशी सेमीकंडक्टर चिप विक्रम के निर्माण पश्चात् भारत ने अब अगली जनरेशन की सेमीकंडक्टर तकनीक में कदम रख दिया है. केन्द्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 16 सितम्बर को बेंगलुरु में एआरएम (ARM) के नए कार्यालय का उद्घाटन किया. यहाँ पर विश्व की सबसे उन्नत किस्म की चिप्स तकनीक पर काम शुरू किया जायेगा. जिनमें एआई सर्वर, ड्रोन और मोबाइल उपकरणों के लिए 2 नैनोमीटर प्रोसेसर शामिल हैं. एआरएम  के नए डिजाइन ऑफिस में 2 नैनोमीटर चिप तकनीक पर काम शुरू होना भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल करता है जो हाईटेक चिप बना सकते हैं. यह तकनीक निश्चित रूप से देश को वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर हब बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम समझी जा सकती है. इससे पहले मई 2025 में नोएडा और बेंगलुरु में 3 नैनोमीटर चिप डिजाइन सेंटर खोले जा चुके हैं.

 

सरकार की पहल पर भारत में सेमीकंडक्टर इंडिया कार्यक्रम का आरम्भ 2021 में हुआ. इसके अंतर्गत 2023 में पहले प्लांट को मंजूरी मिलने के बाद कई अन्य परियोजनाओं को भी मंजूरी मिली. इससे अब तक छह राज्यों में दस परियोजनाएँ प्रगति पथ पर हैं, जिसमें लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया है. इस मिशन के अंतर्गत 76000 करोड़ रुपये का सरकारी बजट भी निर्धारित कर दिया गया है. देश में ही सेमीकंडक्टर का उत्पादन आरम्भ होने के बाद से भारत में जहाँ बड़े निवेश आकर्षित हुए हैं वहीं स्वदेशी चिप डिज़ाइन कम्पनियों ने भी अपनी रुचि दिखाई है. ये कम्पनियाँ और बहुतेरे स्टार्टअप रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक वाहनों, अन्तरिक्ष क्षेत्र के लिए विशेष रूप से चिप्स का उत्पादन कर रही हैं. अर्थव्यवस्था की दृष्टि से भी सेमीकंडक्टर चिप निर्माण में वैश्विक संभावनाएँ हैं. इस समय वैश्विक बाजार लगभग 600 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है. ऐसे में भारत के लिए व्यापक अवसर यहाँ उपलब्ध हैं. ऐसी सम्भावना जताई जा रही है कि 2026 तक भारत में इस क्षेत्र में लगभग दस लाख नए रोजगार सृजित किये जाने की उम्मीद है.

 

वर्तमान में ताइवान, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, चीन, मलेशिया देश चिप निर्माण करते हैं. अब जबकि भारत ने इस क्षमता को विकसित कर लिया है तो निकट भविष्य में भारतीय इलेक्ट्रोनिक्स उद्योग को आत्मनिर्भर बनने, वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा करने से कोई नहीं रोक सकता है. देश का स्वदेशी सेमीकंडक्टर सिस्टम भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स, अन्तरिक्ष, स्वास्थ्य, ऊर्जा, रक्षा आदि क्षेत्रों में भारत को विश्व में अग्रिम पंक्ति में खड़ा करेगा.

 


23 अगस्त 2023

चंद्रयान 3 की सफलता का समाजशास्त्रीय विश्लेषण

करोड़ों-करोड़ों देशवासियों ने साँसों को थामकर, अपनी धड़कनों की तीव्रगति को महसूस करते हुए खुद को गौरवशाली पल का साक्षी बनाया. अपने निर्धारित समय चंद्रयान 3 ने जैसे ही चंद्रमा की सतह का स्पर्श किया वैसे ही हम वैश्विक स्तर पर चौथे देश हो गए जिन्होंने अपने यान को चंद्रमा पर उतारा है. इस उपलब्धि में भले ही हम चौथे स्थान पर रहे हों मगर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर किसी भी उतारने वाले हम पहले देश बने. आज से चार वर्ष पूर्व सन 2019 में भी हमारे वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 को दक्षिणी ध्रुव पर उतारने का प्रयास किया था मगर चंद्रमा की सतह से कुछ पहले ही विक्रम का संपर्क नियंत्रण कक्ष से टूट गया था. यद्यपि प्रथम दृष्टया चंद्रयान 2 असफल समझ आ रहा हो तथापि उसके ऑर्बिटर के आज भी कार्य करने के कारण उसको आंशिक रूप से सफल कह सकते हैं. चंद्रयान 2 अभियान से जुड़े लैंडर विक्रम की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग न हो पाने और फिर ऑर्बिटर से उसका संपर्क टूट जाने बाद इसरो प्रमुख के. सिवन भाव विह्वल हो गए थे. उनका अपने आँसू न रोक पाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनको गले लगाकर उनका हौसला बढ़ाना आज भी भारतवासी भूले नहीं हैं. उन आँसुओं के पीछे छिपी भावनात्मकता को आज की सफलता के बाद उमड़े आँसुओं से समझा जा सकता है, आज की स्वर्णिम गौरवमयी गाथा को समझा जा सकता है. 




चंद्रयान 3 अब किस तरह से चंद्रमा के, अंतरिक्ष के रहस्यों को उजागर करेगा; कैसे उसके द्वारा नवीनतम खोजों को आधार मिलेगा; कैसे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में चंद्रयान 3 भारत का नाम रोशन करेगा; कैसे हमारा देश अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की राह पर लगातार उन्नति के पथ पर बढ़ सकेगा; कैसे अंतरिक्ष यात्रा के लिए अन्य देशों को अपने यान प्रक्षेपित करने के लिए विश्वसनीय मंच उपलब्ध हो सकेगा आदि पर लगातार मंथन होता रहेगा, विमर्श होता रहेगा. इन सबके सापेक्ष चंद्रयान 3 की सफलता का समाजशास्त्रीय आकलन भी अत्यावश्यक है. इस अभियान की सफलता ने सबसे प्रमुखता से सिखाया है कि किसी एक-दो असफलताओं से खुद को निराश नहीं किया जाना चाहिए. मात्र चार साल की अल्पावधि में जिस तरह से इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग की निराशा से बाहर निकल कर सफलता का झंडा चंद्रमा पर लहराया है, वह अनुकरणीय है. देश के भीतर और बाहर इस तरह की मानसिकता को बहुंख्यक लोगों में गहरे से बैठा दी गई है कि देश में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में कोई मानक स्थापित नहीं किया जा सकता है. विगत की अनेकानेक अव्यवस्थाओं, असफलताओं को उदाहरण बनाकर इस तरह से प्रचार किया जाता है कि देश में सिर्फ और सिर्फ अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है. इस अभियान ने सम्पूर्ण विश्व को स्पष्ट सन्देश दिया है कि हम वे भारतवासी हैं जो अपनी असफलता से भी सीख लेते हुए पुनः पूरी ताकत के साथ सफलता के लिए खड़े होते हैं.


चंद्रयान 2 की असफल लैंडिंग के बाद से लेकर चंद्रयान 3 की सफल लैंडिंग के बीच वैज्ञानिकों के धैर्य, उनकी मेहनत, आत्मविश्वास की कहानी उन बच्चों को अवश्य ही सुनाई जानी चाहिए जो किसी एक प्रतियोगी परीक्षा की असफलता के बाद हताशा, निराशा, अवसाद के अंधकार में जाकर अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं. देश का एक शहर कोटा लम्बे समय से जहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए प्रसिद्द रहा है वहीं अब वह बच्चों के द्वारा लगातार की जा रही आत्महत्याओं के लिए कलंकित हो रहा है. अभिभावकों को कोटा अथवा अन्य स्थानों पर कठिन परिश्रम कर रहे बच्चों के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह हौसला, हिम्मत बननी चाहिए. अभिभावकों को समझाना और समझना चाहिए कि दो-चार प्रतियोगी परीक्षाओं की असफलता ही ज़िन्दगी का अभीष्ट नहीं है. ज़िन्दगी इसके भी बहुत आगे तक है. सफलताओं के लिए और भी रास्ते हैं, और भी मंच हैं.




इस अभियान की सफलता उनके लिए भी उदाहरण बन सकती है जो बात-बात पर संसाधनों की कमी का, तनाव का, दबाव का रोना रोते हैं. यहाँ समझना चाहिए कि अंतरिक्ष अभियान में केवल वैज्ञानिक मेधा ही खर्च नहीं होती है वरन उनका समय, श्रम, देश का धन और अनेक संसाधनों का भी उपयोग होता है. चंद्रयान 2 और चंद्रयान 3 के वित्तीय बजट से इसे सहजता से समझा जा सकता है. चंद्रयान-2 मिशन पर 978 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. इसमें से 603 करोड़ रुपये ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर, नेविगेशन और ग्राउंड सपोर्ट नेटवर्क पर तथा 375 करोड़ रुपये सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल पर खर्च किए गए थे. चंद्रयान 3 में इस बजट में अभूतपूर्व कमी आई. इसके लिए लगभग 615 करोड़ रुपये का बजट तैयार किया गया. इसके लैंडर, रोवर और प्रोपल्शन मॉड्यूल में लगभग 250 करोड़ रुपये व्यय होने का तथा लॉन्च सर्विस पर अतिरिक्त 365 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया. एक ऐसे देश के लिए जहाँ पर जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है; गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या भी अधिक है; जनहितकारी योजनाओं में धन की कमी नहीं रहने दी जाती है; प्राकृतिक आपदाओं में सरकारी खजाने से बिना किसी भेदभाव के सहायता उपलब्ध करवाई जाती है वहाँ स्पष्ट है कि न केवल आर्थिक संसाधनों पर बल्कि प्राकृतिक संसाधनों पर, मानवजन्य संसाधनों पर भी एक तरह का दबाव बन जाता है. संभव है कि अनेकानेक भावी योजनाओं को भविष्य के लिए सुरक्षित रख लिया गया होगा. संभव है कि अनेक संचालित योजनाओं के बजट को रोककर इस महत्त्वाकांक्षी अभियान को सफलता की राह ले जाया गया होगा.



इन स्थितियों का दबाव न केवल सरकार पर वरन वैज्ञानिकों पर भी रहता होगा. एक अभियान की असफल लैंडिंग का तनाव लेकर, देश की अनेकानेक परेशानियों, समस्याओं को जानते-समझते हुए, वैश्विक जगत में खुद को स्थापित करने के दबाव को लेकर भी हमारे वैज्ञानिकों ने महान उपलब्धि हासिल की है. उन्होंने दिखाया है कि हम भारतीय महज कीर्तिमान रचने के लिए नहीं वरन दुर्गम्य को सहज बनाने, अलभ्य को सुलभ बनाने के लिए पूर्ण मनोयोग, आत्मविश्वास से कार्य करते हैं. हमारे वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि एक असफलता जीवन मे संभावनाओं का अंत नहीं करती है, बस हमें ही अपनी हिम्मत बनाये रखनी चाहिए. मिशन चंद्रयान के बाद गगनयान और सूर्य मिशन के बारे में वही विचार कर सकता है जो हौसला बनाये रखेगा. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की ये पंक्तियाँ ‘क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं’ निश्चित ही कर्मशील लोगों की कहानी कहती हैं.    





 

06 अगस्त 2023

अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता के लिए उड़ान

14 जुलाई 2023 को दोपहर बाद प्रक्षेपित किया गया चंद्रयान-3 चंद्रमा की कक्षा में पहुँच चुका है. सब कुछ सही रहा तो चंद्रमा की सतह पर 23 अगस्त को इसकी सॉफ्ट लैंडिंग कराई जाएगी. इसके लिए इसकी गति को लगातार कम किया जायेगा. चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण चंद्रयान की वर्तमान गति, जो लगभग चालीस हजार किमी प्रति घंटा है, को कम करते हुए 3600 किमी प्रति घंटे पर लाया जाएगा. इसके लिए इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा चंद्रयान की गति की विपरीत दिशा में थ्रस्ट फायर किये जायेंगे. चंद्रयान-3 को चंद्रमा पर जिस स्थान पर लैंड कराये जाने की योजना है वह स्थान लगभग उसी तरह का है जैसा कि चंद्रयान-2 की लैंडिंग का था. यदि चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह पर उतरने में कामयाब रहा यह मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला मिशन बन जाएगा. 




इस मिशन की विशेष बात यह है कि चंद्रयान-3 चंद्रमा की दक्षिणी सतह पर उतरेगा. चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र वहाँ का दुर्गम क्षेत्र है, जहाँ के अनेक भागों में सूरज की रोशनी बिल्कुल नहीं पहुँचती है. पूरी तरह से अँधेरे में रहने के कारण यहाँ का तापमान दो सौ डिग्री सेल्सियस भी से नीचे चला जाता है. रोशनी का न होना और अत्यंत निम्न तापमान के कारण इस क्षेत्र में उपकरणों के संचालन में कठिनाई होती है. इसके अलावा यह क्षेत्र बड़े-बड़े गड्ढों वाला है, इस कारण भी यहाँ सॉफ्ट लैंडिंग एक चुनौती होती है. अभी तक चंद्रमा पर उतरने वाले पिछले सभी अंतरिक्ष यान भूमध्यरेखीय क्षेत्र में उतरे हैं. भूमध्य रेखा से कोई भी अंतरिक्ष यान सबसे दूर गया यान चीन का चांग-ई-4 था जो 45 डिग्री अक्षांश के पास उतरा था. चंद्रमा के भूमध्यरेखा क्षेत्र के पास किसी भी यान का उतरना आसान और सुरक्षित है. यहाँ की सतह चिकनी है, ढलान न के बराबर हैं और यहाँ पर पहाड़ियाँ, गड्ढे भी नहीं हैं. इसके साथ-साथ सूर्य की रौशनी भी पर्याप्त मात्रा में इस क्षेत्र में उपलब्ध रहती है.  


भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा चंद्रयान-3 के पहले भी दो मिशन के द्वारा चंद्रमा के रहस्यों को खोजने का प्रयास किया गया है. चंद्रयान कार्यक्रम की घोषणा वर्ष 2003 में 15 अगस्त को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी. यह भारत का पहला चंद्रमा मिशन बना. चंद्रयान-1 ने सॉफ्ट लैंडिंग न होने के बाद भी 14 नवंबर 2008 को सफलतापूर्वक चंद्रमा की सतह का स्पर्श किया. इसका उद्देश्य चंद्रमा की सतह की खनिज संरचना, ध्रुवीय क्षेत्र में बर्फ के पानी की उपलब्धता और चंद्रमा की सतह पर हीलियम 3 और विकिरण प्रभावों का पता लगाना था. इसके बाद 22 जुलाई 2019 को चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान को स्वदेशी जीएसएलवी रॉकेट द्वारा सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया था. जीएसएलवी की यह पहली परिचालन उड़ान थी. यह इसरो का पहला मिशन था जिसमें लैंडर भी गया था. विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला था कि 7 सितंबर को चंद्रमा की सतह से उतरने के पूर्व लगभग दो किमी की दूरी पर लैंडर विक्रम से संपर्क टूट गया. इसका आर्बिटर अभी भी चंद्रमा की कक्षा में मौजूद है, इसलिए एक दृष्टि से चंद्रयान-2 को सफल भी कहा जा सकता है.


पृथ्वी से निर्मित होने और इसके सबसे निकट होने के कारण चंद्रमा के रहस्यों को समझने से पृथ्वी और ब्रह्मांड की बेहतर समझ विकसित हो सकेगी. चंद्रयान-3 की सफलता से भारत को दुनिया के सामने अपनी क्षमता दिखाने का मंच मिल जाएगा. रॉकेट लॉन्च, अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी, स्किल्ड मैनपावर की दिशा में बेहतरीन काम किए जा सकेंगे. ऐसा माना जाता है कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था (स्‍पेस इकॉनमी) सन 2020 तक 9.6 अरब डॉलर की थी, इसके सन 2025 तक बढ़कर 13 अरब डॉलर हो जाने के संकेत हैं. आज भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए भी खुला है. देश में डेढ़ सौ से अधिक स्‍पेस-टेक स्‍टार्टअप हैं, इनमें गूगल, स्‍कायरूट, सैटश्‍योर, ध्रुव स्‍पेस और बेलाट्रिक्‍स जैसी कंपनियाँ शामिल हैं. ये कंपनियाँ दैनिक जीवन में काम आने वाली तकनीक के लिए सैटेलाइट आधारित फोन सिग्‍नल, ब्रॉडबैंड, ओटीटी से लेकर 5जी और सौर ऊर्जा क्षेत्र में अंतरिक्ष तकनीक के उपयोग के अवसर खोज रही हैं. निजी निवेशकों की बढ़ती लालसा देखकर भारत सरकार भी अंतरिक्ष उद्योग में निजी सहभागिता को अधिक से अधिक प्रोत्साहित कर रही है. इसी उद्देश्य से भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 को मंजूरी दी है जो निजी क्षेत्र के लिए भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश की संभावनाओं को बढ़ाएगी. चंद्रयान-3 की सफलता से अंतरिक्ष क्षेत्र में तो भारत की धाक बढ़ेगी ही साथ ही धरती पर जियो-पॉलिटिक्‍स के रूप में भी प्रभाव बढ़ेगा.


यद्यपि चंद्रयान-1 ऑर्बिटर का मून इम्पैक्ट प्रोब 14 नवंबर 2008 को जब चंद्रमा की सतह पर उतरा था तो भारत चंद्रमा पर अपना झंडा लगाने वाला चौथा देश बन गया था तथापि चंद्रयान-2 लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग हो जाने पर भारत ऐसा करने वाला चौथा देश होता. 2019 के सितंबर महीने में चंद्रयान-2 के वैज्ञानिकों की आँखें आँसुओं से भर गई थीं जबकि ग्यारह वर्ष की मेहनत और लम्बा रास्ता तय करने के बाद चंद्रमा की सतह के नजदीक ही लैंडर विक्रम क्रैश हो गया था. अब चार साल बाद उसी पल की प्रतीक्षा है, जब वैगानिकों की आँखें ख़ुशी के आँसुओं से भरी होंगी. यह सफलता भारत को अमेरिका, रूस और चीन के साथ दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में खड़ा कर देगी. 






 

28 फ़रवरी 2023

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस - National Science Day

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (नेशनल साइंस डे) प्रतिवर्ष 28 फरवरी को भारत में मनाया जाता है. यह दिन प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी चंद्रशेखर वेंकट रमन को समर्पित है. वर्ष 2023 पर विज्ञान दिवस की थीम है, सतत भविष्य के लिए साइंस और टेक्नोलॉजी में एकीकृत दृष्टिकोण. 28 फरवरी को विज्ञान दिवस मनाये जाने का विशेष कारण है. इसी दिन सन 1928 में सीवी रमन ने रमन प्रभाव की खोज की थी. इस महत्वपूर्ण खोज के लिए उनको वर्ष 1930 में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.


राष्ट्रीय विज्ञान और तकनीकी संचार परिषद ने सन 1986 में भारत सरकार से 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाये जाने का आग्रह किया था. तत्कालीन केन्द्र सरकार से स्वीकृति के बाद सन 1987 में पहली बार राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया गया.








 

14 मार्च 2020

अहंकारी इंसानी दिमाग एक वायरस के सामने चूर

चंद्रमा, मंगल तक अपनी वैज्ञानिक क्षमता की हनक दिखाने वाले इन्सान की हनक को एक झटके में एक वायरस ने समाप्त करके रख दिया. विश्व समुदाय के सामने सिर उठाकर अकड़ दिखाने वाला अहंकारी इन्सान एक बीमारी के सामने घुटने टेक चुका है. अभी तक के तमाम चिकित्सकीय आविष्कारों में से कोई भी ऐसा समझ नहीं आया जो फौरी तौर पर कोरोना वायरस से बचाव जैसी स्थिति ही पैदा कर सके. 
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

28 मार्च 2019

अन्तरिक्ष तक सर्जिकल स्ट्राइक संभव


कल, 27 मार्च को जब डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम आईलैंड लॉन्च कॉम्पलेक्स से रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (DRDO) की एक मिसाइल ने बतौर परीक्षण एक सैटेलाइट को मार गिराया तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जो अंतरिक्ष में सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता रखते हैं. भारत से पहले अभी तक यह क्षमता रूस, अमेरिका और चीन के पास थी. यह एक एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण था, जिसे मिशन शक्ति नाम दिया गया. इसके लिए DRDO के बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया गया. यह मौजूदा बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का हिस्सा है. इस मिशन में जिस सैटेलाइट को निशाना बनाया गया, वह निचली कक्षा में घूम रहा था. यह परीक्षण इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने इसके जरिये यह साबित किया है कि वह अपनी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से बाहरी अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को निशाना बना सकता है. चूँकि हमारा पड़ोसी देश चीन बहुत पहले यह क्षमता विकसित कर चुका है ऐसे में भारत पर काफी दबाव था. यह सत्य किसी से छिपा नहीं है कि आज की दुनिया में पारंपरिक हथियारों से शत्रु का मुकाबला नहीं किया जा सकता है और वह भी तब जबकि पड़ोसी देशों से आपके संबंध अच्छे नहीं हों. ऐसे में देश की तरफ से किया गया यह परीक्षण भारतीय रक्षा शक्ति को कई गुना मजबूत करता है. 


यह सफलता केवल उल्लेखनीय नहीं वरन गौरवपूर्ण है. इस सफल परीक्षण के द्वारा भारत जमीन, हवा, पानी के साथ-साथ अन्तरिक्ष में भी अपने दुश्मनों से निपटने में सक्षम हो गया है. ऐसी आशंका लम्बे अरसे से जताई जाती रही है कि आगामी युद्ध, यदि कभी हुआ तो, वह धरती, हवा या जल में लड़ने के बजाय बहुत हद तक संभावित है कि अन्तरिक्ष में हो. ऐसा नहीं कि युद्ध करने वाले देशों के द्वारा अन्तरिक्ष में सेना भेजकर वहाँ युद्ध किया जायेगा वरन जिस तरह से सम्पूर्ण विश्व आज तकनीक के हाथों से संचालित होने लगा है, आम आदमी से लेकर सरकारों तक के कार्यों में अन्तरिक्ष में तैर रहे सेटेलाईट मददगार बन रहे हैं उस स्थिति में किसी भी देश को सैकड़ों वर्ष पीछे भेजने के लिए उसके उपग्रह को नष्ट कर देना ही बहुत है. इस तरह की सम्भावना कपोल-कल्पना नहीं और न ही टीवी पर दिखाए जाने वाले स्टार वार्स जैसे कार्यक्रम हैं बल्कि वास्तविकता है. इस वास्तविकता को समझने की आवश्यकता है, जिसे भारत ने समय रहते समझने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि उस पर अमल भी किया.

इस परीक्षण के बाद जैसी कि अपेक्षा थी, विपक्ष ने सरकार पर धावा सा बोल दिया. ऐसा दावा किया जाने लगा कि इस तरह का परीक्षण पिछली सरकार में किया जा चुका है, अब मोदी ऐसा बस चुनावों में लाभ लेने के लिए खोखला सन्देश दे रहे हैं. यहाँ समझने की आवश्यकता है कि पिछली सरकार में ऐसे किसी परीक्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया था. इसे खुद रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन के आला अधिकारियों द्वारा भी सामने लाया गया. बहरहाल, वर्तमान समय राजनीति के जाल में देश की इस उपलब्धि को फँसाना नहीं है वरन सभी वैज्ञानिकों को बधाई देने का है. वैश्विक स्तर पर आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए सभी देश किसी न किसी तरह के कदमों को उठाते रहते हैं, ऐसे में भारत द्वारा महाशक्ति बनने की राह में उठाया गया यह कदम निश्चित ही भारतीय सामरिक शक्ति को विश्वसनीय पहचान देगा.

11 मई 2017

बुद्ध को एक बार फिर मुस्कुराना होगा

इस बार बुद्ध पूर्णिमा, 10 मई के अगले दिन ही वो गौरवशाली दिन, 11 मई आया जब देश में बुद्ध मुस्कुराये थे. जी हाँ, 11 मई 1998 जब देश में दोबारा बुद्ध मुस्कुराये थे. इससे पहले वे सन 1974 में मुस्कुराये थे. देश के परमाणु इतिहास में दो बार भूमिगत परीक्षण किये गए और दोनों ही बार शांति-अहिंसा के परिचायक महात्मा बुद्ध का नाम इसके गुप्त सन्देश के रूप में उपयोग किया गया. यह सम्पूर्ण विश्व को यह सन्देश देने के लिए पर्याप्त और स्पष्ट है कि देश के परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ शांति-अहिंसा के लिए है, शांतिपूर्ण कार्यो के लिये है और यह परीक्षण भारत को उर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिये है. पोखरण में 11 और 13 मई 1998 को पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण करने के साथ ही भारत ने स्वयं को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया. 


राजस्थान के पोखरण में पाँच परमाणु विस्फोट होने से समूचे विश्व में तहलका मच गया था. इसका कारण किसी को भी इस कार्यक्रम की भनक न लग पाना रही. परीक्षण के इन धमाकों से सारा संसार चकित रह गया. ऑपरेशन शक्ति के रूप में शुरू हुए इस अभियान की भनक विकसित देशों के उपग्रहों को भी न लगने के पीछे कलाम साहब की बहुत बड़ी भूमिका रही. चूँकि 1995 में ऐसे कार्यक्रम को अमेरिकी उपग्रह द्वारा पकड़ लिया गया था, जिसके बाद अन्तर्राष्ट्रीय दवाब के आगे देश ने अपने उस कार्यक्रम को टाल दिया था. इस बार कलाम साहब अपनी टीम के साथ किसी भी तरह की हीलाहवाली के मूड में नहीं थे. उन्होंने गुप्त कोड के ज़रिये अपनी बातचीत को बनाये रखा. पोखरण में काम उसी समय किया गया जबकि उपग्रहों की नजर में वो जगह नहीं होती थी. परमाणु परीक्षण से सम्बंधित समस्त उपकरणों को सेब की पेटियों में लाया गया, जिससे किसी को शक न हो. परीक्षण पूर्व की पूरी तैयारी में कलाम साहब सहित समस्त वैज्ञानिक सेना की वर्दी में तथा सैन्य अधिकारियों के रूप में ही रहे जिससे यही लगे कि भारतीय सेना का कोई कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है. परीक्षण क्षेत्र के आसपास के ग्रामवासियों को भी परीक्षण के दिन तक किसी तरह का आभास नहीं होने दिया गया था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 20 मई को परीक्षण स्थल पहुंचे. उन्होंने देश को एक नया नारा जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान दिया. सभी देशवासी प्रधानमंत्री के साथ-साथ गर्व से भर उठे. अमरीका, रूस, फ्रांस, जापान और चीन आदि देशों ने भारत को आर्थिक सहायता न देने की धमकी देते हुए प्रतिबन्ध भी लगा दिए किन्तु देश इन धमकियों के सामने नहीं झुका. देश ने इन्हीं प्रतिबंधों के बीच 13 मई 1998 को पोखरण में फिर से परमाणु परीक्षण करके सम्पूर्ण विश्व को स्पष्ट जवाब दे दिया था कि वो किसी भी ताकत के आगे झुकने वाला नहीं है. इन परीक्षणों को करने का मुख्य उद्देश्य विश्व को यह बताना था कि देश किसी भी सामरिक क्षमता का मुँहतोड जवाब देने में समर्थ है. अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर है.


आज से लगभग दो दशक पहले देश ने सम्पूर्ण विश्व को दरकिनार करते हुए, बहुत सारे विकसित देशों के प्रतिबंधों को नकारते हुए अपनी जीवटता का परिचय दिया था. आज जबकि देश तत्कालीन स्थितियों से कई गुना अधिक सक्षम है, कई गुना तकनीकी रूप से विकसित है, कई गुना अधिक वैश्विक समर्थन उसके साथ है उसके बावजूद चंद आतंकी ताकतों के सामने देश की शीर्ष सत्ता कमजोर नजर आ रही है. पड़ोसी देशों के समर्थन से संचालित आतंकवाद के सामने कमजोर पड़ती दिख रही है. पड़ोसी सेना के कायराना हरकतों के आगे चुप्पी साधे बैठी है. माना कि इन सबके लिए परमाणु हथियारों का उपयोग नहीं किया जा सकता है, किसी अन्य स्थिति में किया भी नहीं जाना चाहिए मगर देश के विरुद्ध षडयन्त्र कर रहे लोगों को, देश में हिंसा फैलाते आतंकियों को, देश की सेना के लिए मुश्किल बनती पड़ोसी सेना-आतंकियों को सबक सिखाने के लिए उसी परमाणु परीक्षण जैसा हौसला, जीवटता चाहिए जो पहले दिखा था. एक बार फिर से बुद्ध को मुस्कुराना होगा और इस बार भी उनके मुस्कुराने का उद्देश्य शांति स्थापित करना होगा, सेना का स्वाभिमान बरक़रार रखना होगा, देश की अखंडता को बनाये रखना होगा. 

01 दिसंबर 2015

विज्ञान को सरल, रोचक बनाये जाने की जरूरत


व्यक्ति दिन-प्रतिदिन तरक्की करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा है. इसके पीछे उसकी जिज्ञासा, कुछ नया करने की ललक, जीवन को सहज बना देने की मानसिकता रही है. यही कारण रहा कि उसने गुफाओं, वनों के आदिमनावीय जीवन में भी अपने मष्तिष्क को सक्रिय बनाये रखा तथा अनेकानेक खोजों, आविष्कारों के द्वारा खुद को आधुनिक मानव के रूप में विकसित कर पाया. इस वायुमंडल की जो-जो वस्तुएं, जो-जो स्थितियाँ उसके लिए कभी आश्चर्य का, भय का विषय हुआ करती थीं, उन सभी को मानव ने अपने जिज्ञासु दिमाग के चलते सहज-सरल रूप में प्रस्तुत कर दिया. आदिकाल से लेकर वर्तमान तक की खोजों, आविष्कारों में विज्ञान का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, इससे किसी को इंकार नहीं होना चाहिए. विज्ञान के चरणबद्ध स्वरूप के सामने आते रहने के कारण ही इंसान ने ज्वार, भाटा, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, हवा, आग, पानी, अंतरिक्ष, चंद्रमा, तारों, पृथ्वी सहित अनेकानेक अद्भुत रहस्यों को सुलझाने में सफलता प्राप्त की. इसी विज्ञान की ताकत के सहारे इंसान ने जहाँ सागर की गहराइयों को नापने में सफलता प्राप्त की वहीं उसने सुदूर आकाश को भी अपने क़दमों तले कर लिया. विज्ञान के प्रति इंसानी रुझान का सुखद परिणाम यही रहा कि वर्तमान दौर में इंसान के लगभग प्रत्येक कार्य विज्ञान के सहारे संपन्न हो रहे हैं. प्रतिदिन आँख खुलने से लेकर सोने तक की स्थितियों में विज्ञान बराबर इंसान के साथ कदमताल करने में लगा हुआ है. विज्ञान की इस सहजता के बाद भी विज्ञान आम आदमी की समझ से बाहर दिखाई देता है. दरअसल हम सभी विज्ञान की सहायता से अपने जीवन को तो सरल, सहज बनाते चले जा रहे हैं किन्तु उसी विज्ञान को समझने की कोशिश नाममात्र के लिए भी नहीं कर रहे हैं.
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कदम-दर-कदम विज्ञान का साथ होने के बाद भी, वैज्ञानिक तकनीक के सहारे, वैज्ञानिक आविष्कारों, खोजों के परिणामस्वरूप मिलते संसाधनों के बाद भी, विज्ञान-जनित उपकरणों पर पूरी तरह निर्भर होने के बाद भी इंसान में विज्ञान के प्रति अरुचि का भाव देखा जाता है. देखा जाये तो ऐसा भाव न केवल आम नागरिक में वरन उन लोगों में भी पनप रहा है जो विज्ञान की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं अथवा विज्ञान विषय का अध्ययन करके किसी अन्य क्षेत्र में कार्यरत हैं. माध्यमिक शिक्षा से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा तक विज्ञान विषय से अध्ययन करने के बाद भी बहुतायत छात्रों में विज्ञान के प्रति अरुचि का भाव देखा जाता है. रोजमर्रा में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों में विज्ञान किस तरह से कार्य कर रहा है, किस वैज्ञानिक तकनीक के सहारे ये उपकरण हमारे जीवन को सहजता प्रदान कर रहे हैं, इसको जानने-समझने की ललक, लालसा भी विज्ञान विषय के विद्यार्थियों में नहीं दिखती है. वर्तमान में समाज में एक और प्रवृत्ति देखने को मिल रही है कि विज्ञान विषय की तरफ उन अभिभावकों की ही रुचि दिख रही है जो अपने बच्चों को इंजीनियरिंग अथवा चिकित्सकीय शिक्षा प्रदान करवाने की मंशा रखते हैं अन्यथा की स्थिति में अभिभावक अपने बच्चों को विज्ञान विषयों से इतर अन्य विषयों में शिक्षा ग्रहण करवाने पर ज्यादा जोर देने लगा है. उसके लिए कला, वाणिज्य अथवा अन्य दूसरे विषय अब प्राथमिकता में होते जा रहे हैं.
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विज्ञान पर पूर्ण निर्भरता होने के बाद भी विज्ञान के प्रति अरुचि का भाव, सामान्य विज्ञान के प्रति अरुचि का भाव पैदा होते जाना सुखद संकेत तो नहीं ही कहा जा सकता है. विज्ञान के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों को, बुद्धिजीवियों को, साहित्यकारों को इस तरफ विचार करने की आवश्यकता है. देखा जाये तो विज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत लोगों, चाहे वे शिक्षक रहे हों, चाहे वे वैज्ञानिक हों, चाहे वे वैज्ञानिक लेखक हों, सभी ने विज्ञान को अत्यंत क्लिष्टता का, सर्वोच्चता का मुलम्मा ओढ़ाकर आम नागरिकों से दूर रखने का ही प्रयास किया है. इस क्लिष्टता में विज्ञान के लिए प्रयुक्त होने वाली भाषा ने भी अपनी भूमिका निभाई है. विज्ञान की साधारण से साधारण जानकारी हो अथवा किसी विशिष्ट विषय पर प्रस्तुत सामग्री, उसे क्लिष्ट अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत करके विशिष्टजनों तक ही सीमित कर दिया जाता है. वैज्ञानिक आविष्कारों को, आम जीवन में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों की वैज्ञानिकता को, उनकी तकनीक को भी सहज, सरल रूप में समझाने का प्रयास नहीं किया गया है.
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इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि वर्तमान दौर विज्ञान का दौर है, इसके बाद भी ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि यदि विज्ञान को सामान्य विज्ञान बनाकर आम आदमी के लिए प्रस्तुत नहीं किया जायेगा तो एक इंसान दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों के गुण-दोषों से परिचित हुए बिना उनका उपभोग ही करता रहेगा. यही कारण है कि आज समूचा विश्व पर्यावरण-संरक्षण की, पृथ्वी को बचाने की, ओजोन क्षरण रोकने की, जल-संरक्षण आदि की चर्चा करने में लगा हुआ है. आवश्यक रूप से इनके लिए कदम उठाये जाने के साथ-साथ विज्ञान को सरलतम रूप में आम आदमी के बीच प्रस्तुत करने के उपाय भी किये जाने चाहिए. हिन्दी भाषा के साथ-साथ अनेकानेक क्षेत्रीय भाषाओं में भी सहज-सरल भाषा-शैली में वैज्ञानिक लेखों, सामग्री का प्रकाशन किया जाना चाहिए. शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक शिक्षा से ही विज्ञान को अत्यंत सरल, रोचक रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति भय, अरुचि का भाव पैदा न होने पाए. समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं आदि के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से, सोशल मीडिया के द्वारा भी रोजमर्रा में प्रयुक्त होने वाले वैज्ञानिक उपकरणों के बारे में जानकारी सहज, सरल, रोचक भाषा-शैली में प्रस्तुत करके आम इंसान को विज्ञान से, वैज्ञानिक उपकरणों से जोड़ने की कोशिश की जानी चाहिए. वायुमंडल, पर्यावरण, जल, पृथ्वी, आकाश आदि की सुरक्षा के लिए तत्पर वैज्ञानिकों, समाजसेवियों, सरकारों आदि को तब तक पूर्ण रूप से सफलता नहीं मिल सकती जब तक कि वे आम इंसान को जागरूक करने में असफल रहेंगे. स्पष्ट है, आम आदमी उस स्थिति में ज्यादा जागरूक हो सकेगा जबकि वो विज्ञान के महत्त्व को समझे, प्रयुक्त किये जा रहे वैज्ञानिक उपकरणों के गुण-दोषों को, हानि-लाभ को समझे. और ऐसा विज्ञान को सुलभ बनाये बिना संभव नहीं है.

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29 जुलाई 2015

कलाम साहब, जवाब देने तो तुम्हें आना ही होगा


क्यों लग रहा है कि कुछ रीतापन सा है आसपास, क्यों ऐसा महसूस हो रहा है जैसे कुछ खाली-खाली सा हो गया है आसपास? तुमसे तो कोई रिश्ता भी नहीं था हमारा, तुमसे कोई नाता भी नहीं था हमारा, तुम कहीं दूर के रिश्तेदार, सम्बन्धी भी नहीं लगते थे हमारे फिर क्यों तुम्हारे जाने की खबर ने आँखें नम कर दी हमारी? जबसे तुम्हारे दूर जाने की खबर सुनी तबसे क्यों ऐसा लग रहा है कि शरीर का कोई भाग कट सा गया है जबकि तुमसे कोई अंतरंगता भी नहीं थी हमारी, कोई नियमित मुलाकात भी नहीं थी हमारी? क्यों तुम्हारा जाना व्यथित सा कर रहा है? बस तुमको कभी-कभार टीवी पर देख लेते थे, कभी-कभार तुम्हारे बारे में कोई खबर पढ़ लेते थे फिर ऐसा कौन सा रिश्ता बन गया था कि इस दुखद खबर में पूरे देश के साथ-साथ हम भी दुखी हैं? इंसान के रूप में कभी ऐसा अवसर नहीं मिला कि हमने कभी तुम्हारे पद का, तुम्हारे नाम का सहारा लेकर कोई लाभ लिया हो फिर क्यों ऐसा लग रहा है कि कोई ऐसा चला गया है जो हमारा भला कर सकता था? कभी हमारे बीच आपस में कोई बातचीत नहीं हुई, कभी कोई आत्मीय सम्बन्ध बनाये जाने की कोई कोशिश भी नहीं हुई फिर ऐसा क्यों महसूस हो रहा है कि कोई अपना आत्मीय बिछड़ गया है? महज एक मुलाकात ही तो थी, बहुत छोटी सी, चंद सेकेण्ड की, बिना बातचीत के, सामान्य से औपचारिक अभिवादन से भरी हुई इसके बाद भी क्यों लग रहा है कि अब मिलने-जुलने का क्रम किसके साथ स्थापित किया जाये?
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हम दोनों के बीच कुछ न होते हुए भी बहुत कुछ था. कुछ बातचीत न होते हुए भी बहुत कुछ कहते-सुनते थे हम दोनों. कभी भी न मिलने के बाद भी नियमित रूप से मिलते रहते थे हम दोनों. प्रत्यक्ष शिक्षक-शिक्षार्थी का सम्बन्ध न होने के बाद भी बहुत कुछ सीखने-सिखाने वाला सम्बन्ध था हम दोनों के मध्य. इसी अनाम सम्बन्ध के कारण तुम्हारा जाना दुःख उत्पन्न कर रहा है. इसी अनाम रिश्ते को दृढ़ता देने का काम करते हुए अनेक बच्चों ने तुमको चाचा कहना शुरू किया तो अब लगा कि वाकई ऐसा कोई चला गया जिसने वास्तविक रूप में चाचा सम्बोधन को सार्थकता प्रदान की. व्यक्ति-व्यक्ति न मिलने के बाद भी तुमने देश के एक-एक व्यक्ति के साथ सम्बन्ध स्थापित किया. एक-एक व्यक्ति के साथ अपना रिश्ता कायम रखा. शिक्षा, ज्ञान की उच्चता को स्थापित करने के बाद भी तुमने निरक्षरों से संवाद स्थापित किया. तकनीक की कठिनता को सरल, सहज स्वरूप में देशवासियों के सामने रखकर देश को तकनीकी दुरुहता जीतने की ओर अग्रसर किया. स्वप्न देखने और स्वप्न पूरा करने के मध्य की बारीक रेखा को स्पष्ट करते हुए एक दृष्टिकोण विकसित किया. पद, सत्ता की सर्वोच्चता प्राप्त करने के बाद भी जीवनशैली की, कार्यशैली की सहजता को आत्मसात करने की प्रेरणा दी. ये सब कुछ ऐसा था जिसने तुमको महानायक तो बनाया ही किन्तु जन-जन से दूर नहीं होने दिया.
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जीवन भर अनेकानेक सन्देश, जीवन-दर्शन, कार्य-तकनीक आदि को समाज के बीच स्थापित करते रहे. सक्रियता के वाहक बनकर तुमने अंतिम-अंतिम साँस तक सभी को सक्रिय रहने का सार्थक सन्देश दिया. इसके साथ-साथ एक अद्भुत तरह का मानवतावादी सन्देश भी लोगों के बीच स्वतः-स्फूर्त ढंग से प्रसारित हुआ. अब देखना समझना ये है कि कितने मानवतावादी इसे समझकर आत्मसात करते हैं और कितने महज ढोंग करते हुए इसे विस्मृत कर देते हैं. धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता जैसे अनावश्यक माहौल के बीच लोगों ने तुमको भी इस तरह के खांचों में बाँधना चाहा था किन्तु तुम्हारी मानवतावादी सोच ने, इंसानियत भरे दृष्टिकोण ने सबको हाशिये पर लगा दिया. अब जबकि तुम हमारे बीच नहीं हो तब देश का हर एक वो व्यक्ति जो मानवता को जानता-समझता है, इंसानियत की कद्र करता है, उसकी आँख में आँसू हैं. उसे याद भी नहीं कि तुम हिन्दू थे या मुसलमान; वो ये भी नहीं जानता कि तुम्हारे धर्म में पैर छुए जाते हैं या नहीं; वो नहीं जानना चाह रहा कि तुम किस राजनैतिक दल से थे; वो नहीं जानना चाहता कि तुम्हारी जाति क्या थी; उसे नहीं पता कि तुमको श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए कौन सी आराधना करनी है, कौन सी इबादत करनी है; अपने आपको कट्टर कहलाने वाले भी अपनी कट्टरता को त्याग तुम्हारे सामने नतमस्तक हैं. आखिर ये सब क्या है? आखिर तुम कौन थे? आखिर तुम्हारा हमसे रिश्ता क्या था? इन रोते देशवासियों से तुम्हारा क्या सम्बन्ध था? आखिर तुम किस धर्म, किस जाति के थे? क्या तुम जैसे लोगों को ही इन्सान कहते हैं? क्या तुम जैसे लोगों की सोच को ही इंसानियत कहते हैं? क्या तुम जैसे लोगों के विचारों को आधुनिकता कहते हैं? बहुत सारे सवाल हैं, कलाम साहब.... अब कब आओगे जवाब देने? तुम चाहे जितनी दूर चले जाओ, पर तुमको इन सारे सवालों के जवाब देने तो आना ही पड़ेगा. जाते-जाते जो सन्देश दिया है उसका पालन करवाने भी तुम्हीं को आना होगा. यदि ऐसा न हुआ तो इंसानियत यूँ ही धर्म-मजहब के बीच मरती रहेगी. मानवता धर्मनिरपेक्षता-साम्प्रदायिकता के बीच पिसती रहेगी. आधुनिकता सरेराह नग्नावस्था में विचरण करती रहेगी. तकनीक किसी अलमारी की शोभा बनी प्रयोगशाला में भटकती रहेगी. जीवनशैली किसी अमीर की, सताधारी की, बाहुबली की रखैल बनी सिसकती रहेगी.

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06 नवंबर 2013

पहले देश सुधारो फिर अंतरिक्ष जाओ




मंगलयान पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर लिया गया. भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों में इस अभियान की सफलता मील का पत्थर साबित होगी क्योंकि अभी तक सिर्फ अमेरिका, रूस और यूरोपियन यूनियन ही मंगल अभियान में सफल रही है. भारत का पड़ोसी देश चीन, जो हर मामले में सम्पूर्व विश्व में अपनी धाक ज़माने में सफल रहा है वो भी मंगल अभियान में असफल रहा है. भारत का इस तरह से अंतरिक्ष में छलांग लगा देना देश के गौरव को बढ़ाएगा साथ ही वैश्विक रूप में उसकी साख को भी मजबूत करेगा. निश्चित रूप से देश के वैज्ञानिकों के लिए, देश में रहकर ही देश की उन्नति के लिए कार्य करती पीढ़ी के लिए भी ये क्षण गौरवान्वित करने वाला है मगर अभी इस मंगलयान की अंतिम सफलता उसके मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित होने के बाद ही निर्धारित होगी. दस महीने की लम्बी यात्रा के बाद मंगलयान २४ सितम्बर २०१४ को मंगल की कक्षा में प्रवेश करेगा. उस समय की सफलता देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की अंतिम सफलता के रूप में परिभाषित होगी.
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ये गौरव का, हर्ष का, उत्साह का विषय है किन्तु इसके साथ ही देश को यहाँ की मूलभूत आवश्यकताओं की जद्दोजहद में फंसे लोगों की मायूसी को, उनके निरुत्साह को, उनकी निराशा को, उनकी हताशा को नहीं भूलना चाहिए. आज भी देश की बहुत बड़ी जनसंख्या रोटी, कपड़ा, मकान, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्षरत है. एक तरफ हमारे वैज्ञानिक मंगल पर जीवन की खोज करने निकल चुके हैं और दूसरी तरह हम कन्या भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, महिला हिंसा के द्वारा जीवन नष्ट करने में लगे हैं. अंतरिक्ष पर पानी की तलाश की जा रही है और यहाँ हम धरती से नदी, नाहर, तालाब आदि को समाप्त करते जा रहे हैं. अरबों रुपये खर्च करके सुदूर अंतरिक्ष में रहने के ठिकाने खोजे जा रहे हैं जबकि हम एक-दो चिंगारियां सुलगाकर यहाँ बस्तियों की बस्तियां उजाड़ने का कृत्य कर रहे हैं. पृथ्वी से जानवरों को भेजकर उन पर अंतरिक्ष वातावरण का प्रभाव जानने के प्रयोग किये जा रहे हैं जबकि यहाँ धरती के इंसानों को मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित करके उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार कर रहे हैं. इस तरह का दोहरा रवैया अपनाकर हम खुद को विज्ञान युग का मानव सिद्ध कर रहे हैं; खुद को आधुनिक और वैश्विक शक्ति बनाने का काम कर रहे हैं.
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आज भी हमारे देश में लाखों लोग आँखों की रौशनी के लिए तरस रहे हैं; तमाम लोग शारीरिक विकलांगता के कारण नारकीय जीवन बिता रहे हैं; अंग प्रत्यारोपण के मामले में आपराधिक रैकेट बुरी तरह से काम कर रहा है; कैंसर, एड्स जैसी और भी बीमारियाँ स्वस्थ समाज की संकल्पना में बाधा पैदा कर रही हैं. ऐसे में अरबों-खरबों रुपये लगाकर, दस महीने की यात्रा के बाद अंतरिक्ष को नापने की, उस पर खोज करने की, जीवन ढूँढने की कवायद एक तरह का शेखचिल्लीपन ही कहा जायेगा. समय के साथ वैश्विक शक्ति स्थापित करने के लिए ये सब आवश्यक है; खुद को वैज्ञानिक शक्ति सिद्ध करने के लिए भी ये आवश्यक है; आधुनिक युग में अपनी वैश्विक साख बनाये रखने के लिए भी ये आवश्यक है किन्तु याद रखना चाहिए कि किसी भी देश की साख उसकी नीतियों, विदेश नीति, आंतरिक संसाधनों, आर्थिक सुदृढ़ता, शिक्षित नागरिकों, स्वस्थ समाज, स्वतंत्र विचारधारा आदि से भी निर्धारित होती है. अंतरिक्ष में लम्बी छलांग लगाने से उत्पन्न वैश्विक साख को आतंकवाद, नक्सलवाद, महिला-हिंसा, पड़ोसी देशों से संचालित आतंकवाद, बेरोजगारी, तुष्टिकरण आदि प्रभावित करते हैं और देश की टांग खींचकर उसे वापस धरालत पर पटक देते हैं. प्रयास ये हो कि एक तरफ अंतरिक्ष में जाने की तैयारी होती रहे दूसरी तरफ देश की धरती पर रह रहे नागरिकों को भी समृद्ध, संपन्न, स्वस्थ, शिक्षित करने के कार्यक्रम सकारात्मक रूप से चलते रहें.