29 July 2015

कलाम साहब, जवाब देने तो तुम्हें आना ही होगा


क्यों लग रहा है कि कुछ रीतापन सा है आसपास, क्यों ऐसा महसूस हो रहा है जैसे कुछ खाली-खाली सा हो गया है आसपास? तुमसे तो कोई रिश्ता भी नहीं था हमारा, तुमसे कोई नाता भी नहीं था हमारा, तुम कहीं दूर के रिश्तेदार, सम्बन्धी भी नहीं लगते थे हमारे फिर क्यों तुम्हारे जाने की खबर ने आँखें नम कर दी हमारी? जबसे तुम्हारे दूर जाने की खबर सुनी तबसे क्यों ऐसा लग रहा है कि शरीर का कोई भाग कट सा गया है जबकि तुमसे कोई अंतरंगता भी नहीं थी हमारी, कोई नियमित मुलाकात भी नहीं थी हमारी? क्यों तुम्हारा जाना व्यथित सा कर रहा है? बस तुमको कभी-कभार टीवी पर देख लेते थे, कभी-कभार तुम्हारे बारे में कोई खबर पढ़ लेते थे फिर ऐसा कौन सा रिश्ता बन गया था कि इस दुखद खबर में पूरे देश के साथ-साथ हम भी दुखी हैं? इंसान के रूप में कभी ऐसा अवसर नहीं मिला कि हमने कभी तुम्हारे पद का, तुम्हारे नाम का सहारा लेकर कोई लाभ लिया हो फिर क्यों ऐसा लग रहा है कि कोई ऐसा चला गया है जो हमारा भला कर सकता था? कभी हमारे बीच आपस में कोई बातचीत नहीं हुई, कभी कोई आत्मीय सम्बन्ध बनाये जाने की कोई कोशिश भी नहीं हुई फिर ऐसा क्यों महसूस हो रहा है कि कोई अपना आत्मीय बिछड़ गया है? महज एक मुलाकात ही तो थी, बहुत छोटी सी, चंद सेकेण्ड की, बिना बातचीत के, सामान्य से औपचारिक अभिवादन से भरी हुई इसके बाद भी क्यों लग रहा है कि अब मिलने-जुलने का क्रम किसके साथ स्थापित किया जाये?
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हम दोनों के बीच कुछ न होते हुए भी बहुत कुछ था. कुछ बातचीत न होते हुए भी बहुत कुछ कहते-सुनते थे हम दोनों. कभी भी न मिलने के बाद भी नियमित रूप से मिलते रहते थे हम दोनों. प्रत्यक्ष शिक्षक-शिक्षार्थी का सम्बन्ध न होने के बाद भी बहुत कुछ सीखने-सिखाने वाला सम्बन्ध था हम दोनों के मध्य. इसी अनाम सम्बन्ध के कारण तुम्हारा जाना दुःख उत्पन्न कर रहा है. इसी अनाम रिश्ते को दृढ़ता देने का काम करते हुए अनेक बच्चों ने तुमको चाचा कहना शुरू किया तो अब लगा कि वाकई ऐसा कोई चला गया जिसने वास्तविक रूप में चाचा सम्बोधन को सार्थकता प्रदान की. व्यक्ति-व्यक्ति न मिलने के बाद भी तुमने देश के एक-एक व्यक्ति के साथ सम्बन्ध स्थापित किया. एक-एक व्यक्ति के साथ अपना रिश्ता कायम रखा. शिक्षा, ज्ञान की उच्चता को स्थापित करने के बाद भी तुमने निरक्षरों से संवाद स्थापित किया. तकनीक की कठिनता को सरल, सहज स्वरूप में देशवासियों के सामने रखकर देश को तकनीकी दुरुहता जीतने की ओर अग्रसर किया. स्वप्न देखने और स्वप्न पूरा करने के मध्य की बारीक रेखा को स्पष्ट करते हुए एक दृष्टिकोण विकसित किया. पद, सत्ता की सर्वोच्चता प्राप्त करने के बाद भी जीवनशैली की, कार्यशैली की सहजता को आत्मसात करने की प्रेरणा दी. ये सब कुछ ऐसा था जिसने तुमको महानायक तो बनाया ही किन्तु जन-जन से दूर नहीं होने दिया.
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जीवन भर अनेकानेक सन्देश, जीवन-दर्शन, कार्य-तकनीक आदि को समाज के बीच स्थापित करते रहे. सक्रियता के वाहक बनकर तुमने अंतिम-अंतिम साँस तक सभी को सक्रिय रहने का सार्थक सन्देश दिया. इसके साथ-साथ एक अद्भुत तरह का मानवतावादी सन्देश भी लोगों के बीच स्वतः-स्फूर्त ढंग से प्रसारित हुआ. अब देखना समझना ये है कि कितने मानवतावादी इसे समझकर आत्मसात करते हैं और कितने महज ढोंग करते हुए इसे विस्मृत कर देते हैं. धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता जैसे अनावश्यक माहौल के बीच लोगों ने तुमको भी इस तरह के खांचों में बाँधना चाहा था किन्तु तुम्हारी मानवतावादी सोच ने, इंसानियत भरे दृष्टिकोण ने सबको हाशिये पर लगा दिया. अब जबकि तुम हमारे बीच नहीं हो तब देश का हर एक वो व्यक्ति जो मानवता को जानता-समझता है, इंसानियत की कद्र करता है, उसकी आँख में आँसू हैं. उसे याद भी नहीं कि तुम हिन्दू थे या मुसलमान; वो ये भी नहीं जानता कि तुम्हारे धर्म में पैर छुए जाते हैं या नहीं; वो नहीं जानना चाह रहा कि तुम किस राजनैतिक दल से थे; वो नहीं जानना चाहता कि तुम्हारी जाति क्या थी; उसे नहीं पता कि तुमको श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए कौन सी आराधना करनी है, कौन सी इबादत करनी है; अपने आपको कट्टर कहलाने वाले भी अपनी कट्टरता को त्याग तुम्हारे सामने नतमस्तक हैं. आखिर ये सब क्या है? आखिर तुम कौन थे? आखिर तुम्हारा हमसे रिश्ता क्या था? इन रोते देशवासियों से तुम्हारा क्या सम्बन्ध था? आखिर तुम किस धर्म, किस जाति के थे? क्या तुम जैसे लोगों को ही इन्सान कहते हैं? क्या तुम जैसे लोगों की सोच को ही इंसानियत कहते हैं? क्या तुम जैसे लोगों के विचारों को आधुनिकता कहते हैं? बहुत सारे सवाल हैं, कलाम साहब.... अब कब आओगे जवाब देने? तुम चाहे जितनी दूर चले जाओ, पर तुमको इन सारे सवालों के जवाब देने तो आना ही पड़ेगा. जाते-जाते जो सन्देश दिया है उसका पालन करवाने भी तुम्हीं को आना होगा. यदि ऐसा न हुआ तो इंसानियत यूँ ही धर्म-मजहब के बीच मरती रहेगी. मानवता धर्मनिरपेक्षता-साम्प्रदायिकता के बीच पिसती रहेगी. आधुनिकता सरेराह नग्नावस्था में विचरण करती रहेगी. तकनीक किसी अलमारी की शोभा बनी प्रयोगशाला में भटकती रहेगी. जीवनशैली किसी अमीर की, सताधारी की, बाहुबली की रखैल बनी सिसकती रहेगी.

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