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09 जून 2026

पत्रों की अनमोल धरोहर

कुछ चीजें अचानक ही सामने आती हैं और तब उनकी ऐतिहासिकता का, उनके अनमोल होने का भान होता है.



चित्र में प्रदर्शित डाक लिफाफा हरेक के लिए महत्त्व का नहीं है. घर के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में वर्षों से बंद सामान को खोला-टटोला गया कि यदि किसी काम का समझ आएगा तो रखा जायेगा
, अन्यथा कबाड़ी के हवाले किया जायेगा. इसी क्रम में हमारे बाबा जी से सम्बंधित बहुत सारे पत्र मिले; परिजनों के पत्र, उनके मित्रों के पत्र. इसी में एक पत्र यह भी मिला. 1934 में लिखे इस पत्र के समय बाबा जी कक्षा दस में थे. उरई में राजकीय पुस्तकालय के बगल में जो पुरानी इमारत है, उस समय वहीं  राजकीय विद्यालय चला करता था. कालांतर में यही राजकीय संस्था जीआईसी के पुराने भवन में संचालित होने लगी थी. यहाँ हमारे परिवार की तीन पीढ़ियों को पढ़ने का अवसर मिला, बाबा जी, उसके बाद हमारे चाचा जी और मामा जी, तथा उसके बाद हम और हमसे छोटा भाई.


इस पत्र को बाबा जी के किसी मित्र ने कोंच से भेजा था और इस लिफाफे में जो पत्र है, उसमें उन्होंने अपनी मानसिक व्यथा का वर्णन एक कहानी के रूप में किया है. बाबा जी को उसे भेजने के पीछे उनके मित्र का उद्देश्य उनकी व्यथा को पढ़ना-समझना और उस कहानी को संशोधित करना था. पठन-पाठन-लेखन की आनुवंशिक परम्परा बाबा जी से शुरू होकर पिताजी से चलती हुई हमारे बाद की पीढ़ी अर्थात् हमारी बेटियों तक पहुँच गई है.



23 जून 2024

प्राचार्य समस्या के सम्बन्ध में पत्र

दिनांक 06.05.2024 के इस पत्र को मिलने के बाद कुछ कार्यवाहक ऐसे नाचने में मगन हैं जैसे उनके नाम वसीयत कर दी गई हो. उनसे ज्यादा उनके लगुआ-भगुआ ठुमके मार रहे हैं. 


पत्र को पढ़ें, कम से कम जो हिस्से रंगीन किये गए हैं, उनको विशेष रूप से पढ़ें.


==>> आवश्यक/अनिवार्य............. इसका अर्थ क्या निकाला जाये?

==>> प्राचार्यों की नियुक्ति के बारे में दो बार साफ़-साफ़ लिखा गया है. स्पष्ट है कि कार्यवाहक/अस्थायी टाइप के प्राचार्य उचकने का प्रयास न करें.

==>> पाँच घंटे की बैठकी तो लगभग सभी लोग कर रहे हैं. हाँ, कार्यवाहक प्राचार्य की ही गैंग के कुछ लोग ऐसा नहीं कर रहे थे. (कहो तो नाम लिख दें?)

==>> बाकी परीक्षा समय में बायोमैट्रिक सम्बन्धी या पाँच घंटे सम्बन्धी कोई नियम इस पत्र में नहीं है. इसलिए परीक्षा समय में अनावश्यक बकबकाने की कोशिश न की जाये.

==>> और अंत में, यह पत्र किसी तरह का आदेश नहीं बल्कि प्राचार्य परिषद् के अध्यक्ष/महामंत्री के लिए एक तरह से सूचनार्थ लिखा गया है. इसके साथ-साथ क्षेत्रीय अधिकारियों को यह पत्र बायोमैट्रिक उपस्थिति और छात्र-निधि सम्बन्धी निर्गत शासनादेशों का अनुपालन करवाए जाने के सम्बन्ध में लिखा गया है.

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उक्त के सम्बन्ध में कार्यवाहक प्राचार्य खुद को खुदा न समझें और कमजोर दिल के प्राध्यापक घबरा कर कार्डियोलोजी में भर्ती होने न चले जाएँ. 




31 जुलाई 2023

खो गई पत्रों की आत्मीय सुगंध

तकनीक के आने से बहुत सारी सुविधाओं की प्राप्ति हुई तो उसने अनेक तरह के एहसासों  से वंचित भी किया है। बहुत सारे एहसासों  के गायब होने के बीच सर्वाधिक कमी महसूस होती है पत्र मिलने की, पत्र लिखने की। ‘हम सब यहाँ कुशल से हैं और आशा करते हैं कि  आप सभी लोग भी कुशल से होंगे। आगे समाचार ये है कि....’ जैसी आत्मीयता भरी पंक्ति से आज की मोबाइल पीढ़ी परिचित ही नहीं होगी। यादों का पिटारा खोलकर बैठे तो लगा कि  अत्यंत तीव्रगति से संदेशों को इधर से उधर भेज देने वाली तकनीक मे हमने संदेशों को भले प्राप्त कर लिया हो मगर उसके भीतर छिपे एहसासों को खो दिया है। उस दौर मे जबकि एक-दूसरे के कुशलक्षेम का माध्यम पत्र हुआ करता था, तब पत्र बाँटने वाला डाकिया भी किसी रिश्ते की डोर से बँधा  होता था। उसके आने मात्र की आहट मन को, दिल को उमंगित कर जाती थी। किसका पत्र होगा, क्या समाचार आया होगा इन सबके बीच सबसे पहले पत्र पढ़ने की होड़ लगा करती थी। किसी आत्मीय का, स्वजन का, मित्र का विशेष पत्र होने पर उसे घंटों के हिसाब से कई-कई दिनों तक पढ़ा जाता था। बहुतेरे पत्र तो किसी अनमोल खजाने की तरह से हमेशा के लिए सुरक्षित रख लिए जाते थे।




तकनीक के आने ने संदेशों का, समाचारों का संप्रेषण अत्यधिक तीव्र कर दिया है। इधर एक तरफ से एक क्लिक किया गया दूसरी तरफ तत्काल उस संदेश की प्राप्ति हो जाती है। इस तीव्रगति से भागती संदेशों की दुनिया मे संदेश तो तत्काल प्राप्त हो गए मगर उनसे जुड़ना नहीं हो पा रहा है। मोबाइल, कम्प्यूटर के मैसेज, ई-मेल के इलेक्ट्रॉनिक रूप से उत्पन्न मशीनी शब्दों मे वो आत्मीयता नहीं दिखाई देती है जो हस्तलिपि वाले पत्रों मे हुआ करती है। बैठकर इत्मीनान से पत्र पढ़ने के बजाय अब चलते-फिरते, गाड़ी चलाते, सफर करते संदेशों पर निगाह डाल ली जाती है। कभी-कभी सुरक्षित या सँजोकर रखने वाले संदेश भी क्लियर ऑल के चक्कर मे सदैव को गायब हो जाते हैं।


देखा जाए तो पत्र लेखन का एक इतिहास है जो हजारों वर्षों से हम सबके बीच उपस्थित है। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन मिस्र में मृतकों को पत्र लिखना आम बात है। पत्र लेखन का कोई व्यवस्थित इतिहास तो नहीं मिलता है मगर ऐसा माना जाता है कि अब तक लिखा गया पहला पत्र लगभग 500 ईसा पूर्व फारस की रानी एटोसा द्वारा भेजा गया था। ट्रिनिटी कॉलेज डबलिन के इतिहास और मानविकी प्रोफेसर ब्रिड मैकग्राथ द्वारा इसे अब तक के सबसे महत्वपूर्ण पत्र के रूप में उद्धृत किया गया है। मैकग्राथ के अनुसार रानी ने पत्रों को लंबी दूरी के संचार का सामान्य और प्रभावी रूप दिया। समय के साथ इसने लेखन सामग्री के निर्माण के लिए संपूर्ण उद्योगों का निर्माण किया और अंततः डाक सेवा का आधार बनाया जो आज भी फल-फूल रही है।


असल मे पत्र लेखन के माध्यम से महज संदेशों का संप्रेषण ही नहीं होता है बल्कि विचारभिव्यक्ति को भी एक मंच मिलता है। पत्र लेखन के द्वारा भावों से परिचय करवाने के साथ-साथ लेखन कला से भी परिचित होने का अवसर मिला करता है। वैश्विक स्तर पर बहुत सारे नामचीन लोगों के पत्रों को आज भी आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जाता है। विश्व स्तर के दो महानुभावों के मध्य हुए पत्राचार को आज अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है, उनका प्रकाशन होता है, उनके विचारों को उल्लेखित भी किया जाता है। यह सब महज संयोग नहीं है। पत्रों द्वारा एक पीढ़ी के विचारों का हस्तांतरण दूसरी पीढ़ी को होता है। उस दौर की पीढ़ी के विचार, उनकी मानसिकता, जीवन-शैली, उस समय की दशा-दिशा आदि का बोध भी पत्रों के माध्यम से जानना-समझना संभव होता है।


सामान्य पाठ्यक्रम के रूप मे पत्रों को औपचारिक और अनौपचारिक श्रेणी मे बाँटकर भले ही आज विद्यार्थियों के बीच रखा जा रहा हो मगर उनको पत्र-लेखन से परिचित नहीं करवाया जा रहा है, न ही उसका व्यावहारिक ज्ञान दिया जा रहा है। तकनीक ने पत्रों की औपचारिक श्रेणी को तो लगभग समाप्त ही कर दिया है। अनौपचारिक पत्रों की श्रेणी आज भी सरकारी, गैर-सरकारी कार्यों के कारण जीवित है। आज की पीढ़ी बहुत हद तक उसी से परिचित है। विभागीय पत्र, नियुक्ति संबंधी पत्र, शिकायती पत्रों आदि से आए दिन उसका सामना होता रहता है मगर उनके द्वारा भावनाओं की, एहसासों की सुगंध का अनुभव उसे नहीं हो पाता है। इस सुगंध से उसका परिचय होना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण उसमें छिपी आत्मीयता है। व्यक्ति के जीवन मे अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं जबकि वह अपनी बात को खुलकर सामने नहीं रख पाता है। बहुत बार देखने मे आता है कि  अनेक अवसरों पर अत्यंत निकट व्यक्ति के सामने, अत्यंत आत्मीय के सामने भी शब्दों का प्रस्फुटन नहीं हो पाता है। पत्र-लेखन इसी बंधन से मुक्त करता है। अपनी बात को बेझिझक, खुलकर अपनी ही भावनाओं मे व्यक्त करने का अवसर देता है।


संभव है कि आज की तीव्रतम गति से भागती दुनिया को, तत्काल ही फल प्राप्त कर लेने वाली मानसिकता को ये सारी बातें दकियानूसी, अनुपयोगी प्रतीत हो रही हों। सच भी है, क्योंकि अब वो धैर्य दिखाई नहीं देता जो किसी एक पत्र के लिए कई-कई दिन तक डाकिया की राह देखा करता था। बावजूद इसके कि समय के साथ बहुत सी चीजें पीछे छूट गईं हैं, अनुपयोगी हो गईं हैं, आम चलन में नहीं हैं मगर उनको किसी न किसी रूप में हमारा समाज जीवित रखे हुए है। झोपड़ी, लालटेन, मिट्टी का चूल्हा आदि आज रेस्टोरेंट, होटलों मे आधुनिक रूप मे सुसज्जित होकर हम सबको आकर्षित करते हैं। ग्रामीण जीवन से बाहर निकल कर शहरी जीवन में प्रवेश करने के बाद भी हम किसी न किसी बहाने ग्रामीण अञ्चल के जीवन का अनुभव करने का प्रयास करते हैं, ठीक इसी प्रकार से आज की तकनीकी दुनिया मे अनौपचारिक पत्र अनुपयोगी से, महत्तवहीन से भले लगने लगे हों मगर अपने बच्चों को ‘हम सब यहाँ कुशलता से रहकर तुम सबकी कुशलता की कामना करते हैं..’ पंक्ति की सुगंध से, एहसास से परिचित करवाने का प्रयास करना चाहिए।  

  

(विश्व पत्र दिवस के अवसर पर)



 

01 अक्टूबर 2022

पोस्टकार्ड का जन्मदिन

संभवतः वर्तमान पीढ़ी संचार के एक माध्यम पोस्टकार्ड के बारे में जो भी जानकारी रखती होगी, वो उसे इंटरनेट से मिली होगी. इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण ऐसे संचार माध्यमों का लगभग बंद हो जाना है. अब मोबाइल और ई-मेल के ज़माने के बहुत कम लोग ऐसे हैं जो पोस्टकार्ड का उपयोग करते होंगे. अभी कुछ साल पहले तक इसका उपयोग परीक्षा फॉर्म प्राप्ति के लिए अवश्य उपयोग करते देखा गया है मगर इसका उपयोग समाचार भेजने या फिर कोई जानकारी भेजने के रूप में देखना नहीं हुआ है. 


आज एक अक्टूबर को पोस्टकार्ड का जन्मदिन मनाया जाता है. ये और बात है कि इस जन्मदिन के बारे में न तो मीडिया में बहुत चर्चा होती है और न ही सोशल मीडिया इस बारे में बहुत बखान करता है. इसके पीछे भी एक कारण बाजार है. आज बाजार की निगाह में पोस्टकार्ड का कोई महत्त्व नहीं, ऐसे में उसके जन्मदिन की चर्चा करना किसी के लिए उपयोगी सिद्ध नहीं. खैर, यदि पोस्टकार्ड की बात की जाये तो सबसे पहले पोस्टकार्ड का अविष्कार ऑस्ट्रिया में सन १८६९ को आज ही के दिन हुआ था. इस हिसाब से आज पोस्टकार्ड १५३ वर्ष का हो गया है. यहाँ के डॉक्टर इमानुएल हरमान ने पत्राचार के लिए एक सस्ते माध्यम की कल्पना करके पोस्टकार्ड का आविष्कार किया. पोस्टकार्ड ने अपने जन्म के साथ ही इतनी अधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर ली कि एक महीने में ही पंद्रह लाख पोस्टकार्ड की बिक्री हो गई. उसकी लोकप्रियता देखकर बाकी देशों ने भी इसे अपनाने में देरी नहीं की. ब्रिटेन ने सन १८७२ में पोस्टकार्ड जारी कर दिया. इसके सात वर्षों बाद ही सन १८७९ में भारत ने भी पोस्टकार्ड को जारी कर दिया. 


भारत में पहले पोस्टकार्ड की कीमत तीन पैसे थी. यहाँ भी इसकी लोकप्रियता में किसी तरह की कमी नहीं आई. पहले नौ महीने में ही भारत में ७.५ लाख रुपए के पोस्टकार्ड बिक गए.  भारत में पोस्टकार्ड की डिज़ाइन और छपाई का कार्य मेसर्स थॉमस डी०ला०रयू० एण्ड कंपनी लंदन के द्वारा किया था. उस समय पोस्टकार्ड को दो मूल्यवर्गों में बाँटा गया था. इसमें एक पोस्टकार्ड वे थे जिनका मूल्य एक पैसा था. यह कार्ड अन्तरदेशीय प्रयोग के लिए उपयोग में लाया जाता था. दूसरी तरह के कार्ड में डे‌ढ़ आना मूल्य वाला कार्ड था. इसका उपयोग उन देशों के लिए था जो अंतरराष्ट्रीय डाक संघ से संबद्ध थे.


पोस्टकार्ड भले ही किसी तरह के संदेश भेजने का सबसे सस्ता माध्यम हो किन्तु भारत सरकार के लिए यह एक महंगा सौदा है. प्रत्येक पोस्टकार्ड के लिए सरकार को उसके प्रिंट मूल्य से कहीं अधिक मूल्य चुकता करना पड़ता है. इस तरह से सरकार को पोस्टकार्ड छापने में घाटा उठाना पड़ता है. इस घाटे की पूर्ति के लिए सरकार ने पोस्टकार्ड में एक तरह का विज्ञापन देना शुरू किया. २१ जुलाई १९७५ में जारी किए गए पोस्टकार्ड में सरकार ने एक तरफ अपनी ओर से संदेश छापना शुरू किया. बाद में इस तरह के पोस्टकार्ड की बिक्री मेघदूत के नाम से की गई. आज भी सामान्य पोस्टकार्ड की कीमत ५० पैसे और मेघदूत पोस्टकार्ड की कीमत २५ पैसे बनी हुई है.


आप सबके आश्चर्य की बात ये है कि हम आज भी पोस्टकार्ड का उपयोग करते हैं. हमें भले ही कोई जवाब दे या न दे मगर हम आज भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के लेखकों को, सोशल मीडिया के मित्रों को अपने अन्य परिचितों को मेघदूत पोस्टकार्ड भेजा करते हैं.   

 










 

30 जुलाई 2022

पत्र लिखने का एहसास आज भी जिंदा है

किसी समय जुलाई महीना आने की ख़ुशी होती थी. बाद में ये ख़ुशी बढ़ गई. ख़ुशी इसलिए बढ़ गई क्योंकि जिस छोटे भाई का जन्मदिन इसी माह पड़ता है, उसकी जीवन संगिनी का जन्मदिन भी इसी माह पड़ता है. इस ख़ुशी में बढ़ोत्तरी उस समय हुई जबकि हमारे छोटे भाई समाज शरद ने पत्र लेखन को लेकर एक अभियान छेड़ दिया. शरद वर्तमान में पत्रकारिता से जुड़े हैं और जाना-पहचाना नाम हैं, उनके बारे में फिर कभी.


हो सकता है कि बहुत से लोगों को जानकारी न हो कि 31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस मनाया जाता है. इस दिन को मनाये जाने के पीछे कारण यही है कि लोग एक-दूसरे को पत्र लिखें. यदि हम इससे इतर व्यक्तिगत अपने स्तर पर बताएँ तो 31 जुलाई हमारे लिए ख़ुशी का एक और कारण लेकर आई है. इस दिन हमारी बेटी का जन्म हुआ था. जहाँ एक तरफ लोग इस दिन को प्रेमचंद जयंती के रूप में मनाते हैं, वहीं हम इसे अपनी बेटी के जन्मदिन के रूप में और पत्र दिवस के रूप में मनाते हैं.




पत्र दिवस मनाये जाने का कोई ख़ास कारण नहीं मगर इतना ख़ास है कि हम आज के ई-मेल, सोशल मीडिया सन्देश के ज़माने में लोगों को पत्र लिखते हैं. इस आश्चर्य के ऊपर एक आश्चर्य ये कि पत्र हम अपनी हस्तलिपि में लिखते हैं, वो भी फाउंटेन पेन से. पत्र लिखने के संस्कार बचपन से ही हमारे अन्दर आ गए थे. वैसे देखा जाये तो किसी भी बच्चे में किसी भी चीज के संस्कार उसके परिवार से आते हैं, उसके आसपास के माहौल से आते हैं. आज तो मोबाइल का जमाना है, इंटरनेट का युग है, ऐसे में कौन पत्र लिखने की तरफ ध्यान देता है.


इसी युग के सापेक्ष हम जब अपने उस पत्र लेखन वाले युग को याद करते हैं तो वही ज्यादा सुखद लगता है. उस दौर में भावनाओं को सुरक्षित रख पाना संभव था. आज सारे एहसास, सारी भावनाएँ एक क्लिक पर निर्भर हैं. उस दौर में दिन भर डाकिये का इंतजार रहता था, आज बार-बार घंटी बजाने वाले नोटिफिकेशन सर दर्द समझ आने लगते हैं.


बहरहाल, यदि पत्रों पर लिखने बैठे तो पोस्ट लम्बी हो जाएगी. इधर इंटरनेट ने वर्तमान पीढ़ी को कुछ इस तरह का बना दिया है कि वह लम्बी पोस्ट पढ़ना ही नहीं चाहती. और वैसे भी उसने पत्रों की दुनिया को देखा नहीं है, उसका एहसास नहीं किया है तो उसके लिए यह पोस्ट किसी काम की नहीं. यह पोस्ट तो हम जैसे उन लोगों के लिए है जिन्होंने पत्र के एहसास को देखा है, जिया है.


31 जुलाई, विश्व पत्र दिवस की सभी को शुभकामनायें.


17 सितंबर 2021

इतिहास से छेड़छाड़ के सम्बन्ध में इरफान हबीब, रोमिला थापर के नाम पत्र

आजकल मूर्धन्य इतिहासकार श्री इरफ़ान हबीब और सुश्री रोमिला थापर जी के नाम मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त श्री विजय मनोहर तिवारी का खुला पत्र सोशल मीडिया पर वायरल है। इसमें मध्यकाल के मुस्लिम इतिहास को लेकर की गई मिलावट और मनमानी पर कई सवाल खड़े किए गए हैं। इस लंबी चिट्‌ठी में उन्होंने लिखा है कि आज इतिहास को लेकर भारतीयों में पहले से ज़्यादा जागरूकता पैदा हुई है। इंटरनेट ने तथ्यों को उजागर करने में बहुत मदद की है। आप भी पढ़ें और बताएं कि जो बात उन्होंने कहीं हैं या तथ्य उन्होंने रखें हैं आप उनसे कितना सहमत हैं।


पूरी चिट्‌ठी इस प्रकार है-


आदरणीय इरफान हबीब साहब/ रोमिला थापर मैम,

सादर प्रणाम।


मैं साइंस का विद्यार्थी रहा हूँ। मगर बहुत बचपन से ही मेरी दिलचस्पी इतिहास में थी। लेकिन सबसे पास के कॉलेज में इतिहास में एमए की व्यवस्था ही नहीं थी और मैं पढ़ाई के लिए बाहर जा नहीं सकता था, इसलिए गणित में एमएससी करके एक साल काॅलेज में पढ़ाया। फिर लिखने के शौक की वजह से मीडिया में आ गया।


करीब पच्चीस बरस प्रिंट और टीवी में काम किया। इस दरम्यान पाँच साल तक लगातार आठ दफा भारत भर के कोने-कोने में घूमनेे का भी मौका मिला। इन पच्चीस-तीस सालों में इतिहास ने मेरा पीछा कभी नहीं छोड़ा। स्कूल से कॉलेज तक की अपनी पूरी पढ़ाई में जितनी किताबें नहीं पढ़ी होंगी, उतनी अकेले इतिहास की किताबें पढ़ी होंगी। खासतौर से भारत का मध्यकालीन इतिहास। भारत के ‘मध्यकाल’ से आप जैसे विद्वानों का आशय जो भी हो, मेरी मुराद लाहौर-दिल्ली पर तुर्कों के कब्ज़े के बाद से शुरू हुए भयावह दौर की है।


मुझे अच्छी तरह याद है कि तीस साल पहले गणित की डिग्री लेते हुए जब इतिहास की किताबों में ताकाझाँकी शुरू की थी, तब इरफान हबीब और रोमिला थापर के नाम बहुत इज़्ज़त से ही सुने और माने थे। हमने आपको इतिहास लेखन में बहुत ऊँचे दर्जे पर देखा था।


हम नहीं जानते थे कि इतिहास जैसे सच्चे और महसूस किए जाने वाले विषय में भी कोई मिलावट की गुंजाइश हो सकती है। हम सोच भी नहीं सकते थे कि इतिहास में कोई अपनी मनमर्ज़ी कैसे डाल सकता है।


मैं बरसों तक वही पढ़ता रहा, जो आज़ादी के बाद आप जैसे मनीषियों ने स्थापित किया। सल्तनत काल और फिर मुगल काल के शानदार और बहुत विस्तार से दर्ज एक के बाद एक अध्याय। सल्तनत काल के सुल्तानों की बाज़ार नीतियाँ, विदेश नीतियाँ और फिर भारत के निर्माण में मुग़ल काल के बादशाहों के महान योगदान और सब तरह की कलाओं में उनकी दिलचस्पियाँ वगैरह। वह कथानक बहुत ही रूमानी था।


वह इन सात सौ सालों के इतिहास की एक शानदार पैकेजिंग करता था। उसी पैकेजिंग से हिंदी सिनेमा के कल्पनाशील महापुरुषों ने बड़े परदे पर ‘मुगले-आजम’ और ‘जोधा-अकबर’ के कारनामे रचे।


चूँकि मुझे इतिहास में एमए की डिग्री नहीं लेनी थी और न ही पीएचडी करके किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी की नौकरी की तमन्ना या जरूरत थी इसलिए मैं एक आज़ाद ख़्याल मुसाफिर की तरह इतिहास में सदियों तक भटका और कई ऐसे लोगों से अलग-अलग सदियों जाकर मिला, जो अपने समय का सच खुद लिख रहे थे।


इस भटकन में एक सिरे को पकड़कर दूसरे सिरे तक गया। एक के बाद दूसरे कोने तक गया। एक सूत्र से दूसरे सूत्र तक गया। मीडिया में बीते ढाई दशक के दौरान कोई साल ऐसा नहीं बीता होगा जब मैं किसी न किसी ब्यौरे को पढ़ते हुए ऐसे ही एक से दूसरे सूत्रों तक नहीं पहुँचा होऊँ। उस खोजी तरीके ने मेरे दिमाग की खिड़कियाँ खोलीं। रोशनदान फड़फड़ाए। दरवाज़े हिल गए। एक अलग ही तरह का मध्यकाल मेरे सामने अपनी सारी सच्चाई के साथ उजागर हुआ।


ऐसा होना तब शुरू हुआ जब मैंने समकालीन इतिहास के मूल स्त्रोतों तक अपनी सीधी पहुँच बनाई। यह काम उसी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जरिए हुआ, जहाँ आप इतिहास के एक प्रतिष्ठित आचार्य रहे हैं। मैंने आज़ादी के बाद की लिखी गई इतिहास की किताबों को अपनी लाइब्रेरी की एक अल्मारी में रखा और सीधे मुखातिब हुआ मध्यकाल के मूल लेखकों से।


कुछ के नाम इस प्रकार हैं, गलत हों तो दुरुस्त कीजिएगा, कम हों तो जोड़िएगा-फखरे मुदब्बिर, मिनहाजुद्दीन सिराजुद्दीन जूजजानी, जियाउद्दीन बरनी, सद्रे निजामी, अमीर खुसरो, एसामी, इब्नबतूता, निजामुद्दीन अहमद, फिरिश्ता, मुहम्मद बिहामत खानी, शेख रिजकुल्लाह मुश्ताकी, अल हाजुद्दबीर, सिकंदर बिन मंझू, मीर मुहम्मद मासूम, गुलाम हुसैन सलीम, अहमद यादगार, मुहम्मद कबीर, याहया, ख्वंद मीर, मिर्जा हैदर, मीर अलाउद्दौला, गुलबदन बेगम, जौहर आफताबची, बायजीद ब्यात, शेख अबुल फजल, बाबर और जहाँगीर वगैरह। ज़ाहिर है इनके अलावा और भी कई हैं, जिन्होंने बहादुर शाह ज़फर तक की आँखों देखी लिखी।


इतिहास हमारे यहाँ एक उबाऊ विषय माना जाता रहा है। आम लोगों की कोई रुचि नहीं रही यह पढ़ने में कि बाबर का बेटा हुमायूँ, हुमायूँ का बेटा अकबर, उसका बेटा सलीम, उसका बेटा खुर्रम और उसका बेटा औरंगज़ेब। इसे पढ़ने से मिलना क्या है? गाँव-गाँव में बिखरी और बर्बाद हो रही ऐतिहासिक विरासत के प्रति आम लोगों का नज़रिया बहुत ही बेफिक्री का रहा है। उन्हें कोई परवाह ही नहीं कि ये सब कब और किसने बनाए और कब? और किसने बर्बाद किए, क्यों बर्बाद किए?


गाँव-गाँव में बर्बादी की निशानियाँ टूटे-फूटे बुतखानों और बर्बाद बुतों की शक्ल में मौजूद हैं। मैं जिस शहर के कॉलेज में पढ़ता था, वहाँ नौ सौ साल पहले परमार राजाओं ने एक शानदार मंदिर बनाया था, जिसे बाद के दौर में बहुत बुरी तरह तोड़कर बरबाद किया गया और एक मस्जिदनुमा ढाँचा उस पर खड़ा किया। डेढ़ लाख आबादी के उस शहर में ज़्यादातर बाशिंदे नहीं जानते कि वह सबसे पहले किसने तोड़ा था, कौन लूटकर ले गया था, किसने उसके मलबे से इबादतगाह बनाई?


अलबत्ता प्राचीन बुतखानों की बरबादी को एकमुश्त सबसे बदनाम मुगल औरंगज़ेब के खाते में एकमुश्त डाला जाता रहा है। वहाँ भी पुरातत्व वालों के एक साइन बोर्ड पर आलमगीरी मस्जिद ही लिखा है, जो एक पुराने मंदिर को तोड़कर बनाई गई। वह बरबाद स्मारक उस शहर के एक ज़ख्म की तरह आज भी खड़ा है, जहाँ बहुत कम लोग ही आते हैं। किसी को कोई मतलब नहीं है।


जब मैं समकालीन लेखकों के दस्तावेजी ब्यौरों में गया तो पता चला कि मिनहाजुद्दीन सिराज ने उस मंदिर की ऊँचाई 105 गज ऊँची बताई है, जिसे शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने 1235 के भीषण हमले में तोड़कर बरबाद किया। लेकिन मुझे यह जानकर हैरत हुई कि इतिहास विभाग में नौकरी करने वाले कई प्रोफेसरों को भी इसके बारे में कुछ खास इल्म था नहीं।


जब किसी विषय के प्रति किसी भी देश के अवाम में ऐसी उदासीनता और बेफिक्री होती है तो मिलावट और मनमर्ज़ी उन लोगों के लिए बहुत आसान हो जाती है, जो एक खास नजरिए से अतीत की सच्चाइयों को पेश करना चाहते हैं। उस पर अगर सरकारें भी ऐसा ही चाहने लगें तो यकीनन यह अल्लाह की ही मर्ज़ी मानिए।


मैं अपने मूल विषय पर आता हूँ। बरसों तक इतिहास को एक खास पैटर्न पर पढ़ते हुए हमने अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नीतियों को इस अंदाज़ में पढ़ा जैसे कि दिल्ली के किले में बैठकर हुए फैसलों से भारत का शेयर मार्केट आसमान छूने लगा था और विदेशी निवेश में अचानक उछाल आ गया था, जिसने भारत के विकास के सदियों से बंद दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिए थे।


जावेद अख़्तर जैसे फिल्मकार भी ऐसे ही इतिहास के हवाले से खिलजी की बाजार नीतियों के जबर्दस्त मुरीद देखे गए हैं। इतिहास की उन किताबों को पढ़कर कोई भी सुल्तानों और बादशाहों का दीवाना हो जाएगा। जबकि खिलजी के समय अपनी आँखों से सब कुछ देखने वाले लेखकों ने जो बताया है, वह असल इतिहास पूरी तरह गायब है और आपसे बेहतर कौन जानता है कि वह कितना भयावह है।


मसलन बाज़ार नीतियों के कसीदों में दिल्ली में सजे गुलामों के बाजार का कोई ज़िक्र तक नहीं है, जहाँ दस-बीस तनके में वे लड़कियाँ ग़ुलाम बनाकर बेची गईं, जो खिलजी की लुटेरी फौजें लूट के माल में हर तरफ से ढो-ढोकर लाई जा रही थीं। जियाउद्दीन बरनी ने गुलामों की मंडी के ब्यौरे दिए हैं और ऐसा हो नहीं सकता कि आपकी आँखों के सामने से वह मंजर गुजरा न हो। इसी तरह मोहम्मद बिन तुगलक की नीतियों पर ऐसे चर्चा की गई, जैसे बाकायदा कोई नीति निर्माण जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ आज की तरह संवैधानिक तौर पर काम कर रही थीं। जबकि उस दौर में अपने आसपास तमाम तरह के मसखरों और लुटेरों से घिरे तथाकथित सुलतानों की सनक ही इंसाफ थी।


तुगलक की महान नीतियों के कसीदों में ईद के वे रौनकदार जलसे गायब कर दिए गए, जिनमें इब्नबतूता ने बड़े विस्तार से उन जलसों में नाचने के लिए पेश की गई लड़कियों से मिलवाया है। वे लड़कियाँ और कोई नहीं, हारे हुए हिंदू राज्यों के राजाओं की बेटियाँ थीं, जिन्हें ईद के जलसे में ही तुगलक अपने अमीरों और रिश्तेदारों में बाँट देता था। लुटेरों की उन महफिलों में तमाम आलिम और सूफी भी सरेआम नज़र आते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि ये गिरोह आपकी निगाहों में आने से रह गए?


मैं अक्सर सोचता हूँ कि सदियों तक सजे रहे उन गुलामों के बाज़ार में बिकी हजारों-लाखों बेबस बच्चियाँ और औरतें कहाँ गई होंगी? वे जिन्हें भी बेची गई होंगी, उनकी भी औलादें हुई होंगी? आज उनकी औलादें और उनकी भी औलादों की औलादें सदियों बाद कहाँ और किस शक्ल में पहचानी जाएँ?


जब मैं यह सोचता हूँ तो आज के आजम-आजमी, जिलानी-गिलानी, इमरान-कामरान, राहत-फरहत, सलीम-जावेद, आमिर-साहिर, माहरुख-शाहरुख, औवेसी-बुखारी, जुल्फिकार-इफ्तखार, तसलीमा-तहमीना, शेरवानी-किरमानी जैसे अनगिनत चेहरे आँखों के सामने घूमने लगते हैं।


बांग्लादेश के इस छोर से लेकर अफगानिस्तान के उस छोर तक इस हरी-भरी आबादी के बेतहाशा फैलाव में नजर आने वाला हरेक चेहरा और तब मुझे लगता है कि मातृपक्ष (Mother’s side) से धर्मांतरण का व्याकरण कितना जटिल और अपमानजनक है, जो हमारी अपनी याददाश्तों से गुमशुदा किए बैठे हैं और यह सब नजरअंदाज़ कर हम मुगलों को राष्ट्र निर्माता बताकर प्रसन्न हैं। यह कैसी कयामत है कि कोई खुद को गाली देकर खुश होता रहे!


ऐसे दो-चार नहीं सैकड़ों रुला देने वाले विवरण हैं, जो इतिहास पर लिखी हुई किताबों में पूरी तरह गायब हैं। इन पर लंबी बहस हो सकती है। कई किताबें लिखी जा सकती हैं। खुद ये असल और एकदम ताजे ब्यौरे मोटी-मोटी कई किताबों में रियल टाइम दर्ज हैं। इनमें कोई मिलावट नहीं है। कोई मनमर्जी नहीं है। जो देखा जा रहा था, जो घट रहा था, बिल्कुल वही जस का तस कागजों पर उतार दिया गया है। लेकिन आजादी के बाद के इतिहास लेखन में भारत के मध्यकाल के इतिहास का यह भोगा हुआ सच पूरी तरह गायब है।


इसके उलट हमने ऐसी नकली और मनगढ़ंत अच्छाइयों का महिमामंडन किया, जो दरअसल कहीं थी ही नहीं। भारत के मध्यकाल के इतिहास की किताबें कूड़े में से बिजली बनाने के विलक्षण प्रयासों जैसी हैं और इन प्रयासों का नतीजा यह है कि सत्तर साल बाद कूड़ा अपनी पूरी सड़ांध के साथ सामने है। बिजली की रोशनी आपके ख्यालों और ख्वाबों में ही रोशन है! और मध्यकाल के पहले जिसे एक बिखरा हुआ भारत माना गया, जो एक राजनीतिक इकाई के रूप में कभी था ही नहीं, उसमें एक सबसे कमाल की बात को आप साहेबान में किसी ने गौर करने लायक ही नहीं समझा। गुजरात में साेमनाथ से लेकर हिमालय में केदारनाथ तक शिव के ज्योतिर्लिंगों की स्थापना और पूजा परंपरा हजारों साल पुरानी है।


किसी मुल्क के इतने बड़े भौगोलिक विस्तार में देवी-देवता और उनकी मूर्तियाँ एक ही तरह से बनाईं और पूजी जा रही थीं। आंध्र प्रदेश में विशाखापत्तनम के पहाड़ी स्तूपों से लेकर अफगानिस्तान के बामियान तक गौतम बुद्ध एक ही रूप में पूजे जा रहे थे, जिनके महान स्मारक इस छोर से उस छोर तक बन रहे थे। यह तो दो हजार साल पीछे की बातें हैं।


मतलब, राजनीतिक रूप से भले ही इतने बड़े भारत में हजार राजघराने राज कर रहे होंगे, मगर उनकी सांस्कृतिक पहचान एक ही थी। वह ‘कल्चरल कवर’ पूरे विस्तार में भारत का एक शानदार आवरण था, जिसके रहते आपसी राजनीतिक संघर्ष में भी भारत की संस्कृति चारों तरफ एक जैसी ही फलती-फूलती रही थी। यह महत्वपूर्ण बात थी, जिसे आजाद भारत के इतिहास लेखकों ने बिल्कुल ही नजरअंदाज किया। क्या यह अनेदखी अनायास है या एक शरारत जो जानबूझकर की गई?


अगर भारत के इतिहास को एक किक्रेट मैच के नज़रिए से देखा जाए तो पचास ओवर के टेस्ट मैच में सल्तनत और मुगल काल आखिरी ओवर की गेंदों से ज़्यादा हैसियत नहीं रखते। लेकिन इतिहास की कोर्स की किताबों में इन खिलाड़ियों को पूरे ‘मैच का मैन ऑफ द मैच’ बना दिया गया है। अगर मैच जिताने लायक ऐसा कुछ बेहतरीन होता भी ताे कोई समस्या या आपत्ति नहीं थी।


जिन लेखकों के नाम मैंने ऊपर लिखे हैं, उनके लिखे विवरणों से साफ जाहिर है कि सल्तनत और मुगल काल के सुल्तानों और बादशाहों के कारनामे अपने समय के इस्लामी आतंक और अपराधों से भरी बिल्कुल वही दुनिया थी, जो हमने सीरिया और काबुल में इस्लामिक स्टेट और अफगानिस्तान में तालिबानों के रूप में अभी-अभी देखी। इस्लाम के नाम पर भारत भर में वे बिल्कुल वही कर रहे थे, जो वे आज कर रहे हैं। सदियों तक माथा फोड़ने के बावजूद वे भारत का संपूर्ण इस्लामीकरण नहीं कर पाए और एक दिन खुद खत्म हो गए।


तीस साल बाद आज भी मैं इतिहास के विवरणों में जाता रहता हूँ। भारत की यात्राओं में मैं नालंदा और विक्रमशिला के विश्वविद्यालयों के खंडहरों में भी घूमा हूँ और दूर दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य के बर्बाद स्मारकों में भी गया हूँ। इनकी असलियत आपसे बेहतर कौन जानता है कि ये उस दौर में इस्लामी आतंक के शिकार हुए हैं। ऐसे हजारों और हैं।


बामियान के डेढ़ सौ मीटर ऊँचे बुद्ध तभी बने होंगे जब आज का पूरा अफगानिस्तान बौद्ध और हिंदू ही रहा होगा। वे सब हमेशा-हमेशा के लिए बरबाद कर दिए गए। लेकिन आजाद भारत की इतिहास की किताबों में सल्तनत और मुगलकाल के उन कारनामों पर पूरी तरह चादर डालकर लोभान जला दिए गए। माशाअल्लाह, इतिहास पर पड़ी इन चादरों के आसपास आप भी किसी सूफी से कम नहीं लगते।


अगर हिंदी सिनेमा की एक मशहूर फिल्म ‘शोले’ की नजर से भारत के इतिहास को देखा जाए तो मध्यकाल का इतिहास एक नई तरह की शोले ही है। आप जैसे महान विचारकों की इस रचना में गब्बर सिंह, सांभा और कालिया रामगढ़ के चौतरफा विकास की नीतियाँ बना रहे हैं। रामगढ़ पहली बार उनकी बदौलत ही चमक रहा है। रामगढ़ में विदेशी निवेश बढ़ रहा है और हर युवा के हाथ में काम है। बाजार नीतियाँ गज़ब ढा रही हैं। शेयर मार्केट आसमान छू रहा है। कारोबारी भी खुश हैं और किसान भी। मगर वीरू रामगढ़ की किसी गुमनाम गली में बसंती की घोड़ी धन्नो को घास खिला रहा है।


रामगढ़ में पसरे सन्नाटे के बीच जय मौलाना साहब का हाथ थामकर मस्जिद की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं, क्योंकि अज़ान हो रही है। जय ने अपना माऊथ ऑर्गन जेब में खोंसा हुआ है क्योंकि नमाज़ का वक्त है और म्यूजिक हराम है, जिससे मौलाना साहब की इबादत में खलल हाे सकता है। ठाकुर के जुल्मो- सितम से निपटने के लिए जननायक गब्बर सिंह ने सूरमा भोपाली की अध्यक्षता में एक जाँच कमेटी बना दी है। बसंती ने गब्बर को राखी भेजी है और गब्बर ने खुश होकर रामगढ़ की आटा चक्की उसके नाम कर दी है। जेलर के गुणों से प्रसन्न मौसी बसंती और जेलर की जन्म कुंडली मिलवा रही हैं। गब्बर ने शिवजी के मंदिर में भंडारा कराया है और जन्मजात बदमाश गाँव के ठाकुर ने दंगे की नीयत से मस्जिद के पास की जमीन पर नाजायज कब्जे करा दिए हैं। आपसे ही पूछता हूँ कि मध्यकाल का इतिहास बिल्कुल ऐसा ही रचा गया एक फरेब नहीं है?


इतिहास की बात है, बहुत दूर तक न जाए, इसलिए इस खत को यहीं समेटता हूँ। मैं याद करता हूँ, तीस साल पहले जब एनसीईआरटी की किताबों में इतिहास को पढ़ना शुरू किया और कॉलेज में चलने वाली कोर्स की किताबों के जरिए भारत के मध्यकाल को पढ़ा तो उस दौर में अखबार में छपने वाले इतिहास संबंधी लेखों में इरफान हबीब और रोमिला थापर को अपने समय के महान प्रज्ञा पुरुषों के रूप में ही पाया।


अब तीस साल बाद मैं एक ऐसे समय में हूँ जब टेक्नालॉजी ने कमाल ही कर दिया है। इंटरनेट की फोर-जी जनरेशन अपने आईफोन पर आज सब कुछ देख सकती है और पढ़ सकती है। दुनिया की किसी भी लाइब्रेरी की किसी भी भाषा और उसके अपने अनुकूल अनुवाद में हर दस्तावेज हाथों पर मौजूद है।


भारत का अतीत आज हर युवा को आकर्षित कर रहा है। वह भले ही किसी भी विषय में पढ़ा हो लेकिन इतिहास में पहले से बहुत ज्यादा दिलचस्पी ले रहा है। वह सच को जानने में उत्सुक है। बिना लागलपेट वाला सच। बिना मिलावट वाला इतिहास का सच, जिसमें न किसी सरकार की मनमर्जी हो और न किसी पंथ की बदनीयत!


इतिहास जानने के लिए उसे एमए की डिग्री और मिलावटी किताबें कतई जरूरी नहीं हैं। भारत के विश्वविद्यालयों के इतिहास विभाग दरअसल इतिहास के ऐसे उजाड़ कब्रिस्तान हैं, जहाँ डिग्री धारी मुर्दा इतिहास के नाम पर फातिहा पढ़ने जाते रहे हैं। उनकी आँखें मध्यकाल के इतिहास में की गई आपराधिक मिलावट को देख ही नहीं पातीं। लेकिन इंटरनेट ने सारी दीवारें गिरा दी हैं। सारे हिजाब हटा दिए हैं। सारी चादरें उड़ा दी हैं और मध्यकाल अपनी तमाम बजबजाती बदसूरती के साथ सबके सामने उघड़कर आ गया है।


जिस इस्लाम के नाम पर दिल्ली पर कब्ज़े के बाद सात सौ सालों तक और सिंध को शामिल करें तो पूरे हज़ार साल तक भारत में जो कुछ घटा है, वह सब दस्तावेजों में ही है। आज के नौजवान को यह सुविधा इन हजार सालों में पहली ही बार मिली है कि वह उसी इस्लाम की मूल अवधारणाओं को सीधा देख ले। कुरान अपने अनुवाद के साथ सबको मुहैया है और हदीसों के सारे संस्करण भी। भारत के लोग जड़ों में झाँक रहे हैं जनाब।


कभी बहुत इज़्ज़त से याद किए जाने वाले इरफान हबीब और रोमिला थापर आज इतिहास लेखन का ज़िक्र आते ही एक गाली की तरह क्यों हो गए हैं, जिन्होंने उल्टी व्याख्याएँ करके इतिहास को दूषित करने की कोशिश की। वक्त मिले तो कभी विचार कीजिए।


क्यों लोग इतनी लानतें भेज रहे हैं। वामपंथ को अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की यह दिव्य दृष्टि कहाँ से प्राप्त होती है? मेरे लिए यह भीतर तक दुखी करने वाला विषय इसलिए है क्योंकि मैंने जिस दौर में इतिहास पढ़ना शुरू किया, आप महानुभावों को सबसे योग्य इतिहासकारों के रूप में ही जाना और माना था। ऊँचे कद और लंबे तजुर्बे के ऐसे लोग जिन्होंने भारत के इतिहास पर किताबें लिखीं। यह कितना बड़ा काम था।


आजादी और मजहब की बुनियाद पर मुल्क के बँटवारे के साथ एक नया सफर शुरू कर रहे हजारों साल पुराने मुल्क में इससे बड़ा अहम काम और कोई नहीं था। जो इतिहास लिखा जाने वाला था, आजाद भारत की आने वाली पीढ़ियाँ उसी के जरिए अपने मुल्क के अतीत से रूबरू होने वाली थीं। लेकिन हुआ क्या? आज आप स्वयं को कहाँ पाते हैं?


जनाब, मैं चाहता हूँ कि आप चुप्पी तोड़ें। गिरेबाँ में झाँकें, उठ रहे हर सवाल का जवाब दें। सामने आएँ और मेहरबानी करके हाथापाई न करें। अपने समूह के अन्य इतिहास लेखकों को भी साथ लाएँ। वैसे भी आपको अब पाने के लिए रह ही क्या गया है। पद, प्रतिष्ठा और पुरस्कार से परे हैं आप। न अब और कुछ हासिल होने वाला है और न ही यह कोई छीनकर ले जाएगा!


इतिहास से अगर कोई छेड़छाड़ या मिलावट नहीं हुई है तो आपको खुलकर कहना चाहिए। क्या आपको यह नहीं लगता कि आजादी के बाद अपनाई गई इतिहास लेखन की प्रक्रिया दूषित और दोषपूर्ण थी? क्या आज भी आपको लगता है कि सल्तनत और मुगल काल जैसे कोई कालखंड वास्तविक रूप में वजूद में रहे हैं या दिल्ली पर कब्जे की छीना-झपटी में हुई हिंदुस्तान की बेरहम पिसाई का वह एक कलंकित कालखंड है?


आखिर उस सच्चाई पर चादर डाले रखने की ऐसी भी क्या मजबूरी थी? हमारी ऐसी क्या मजबूरी थी कि हम उन लुटेरे, हमलावरों और हत्यारों को सुल्तान और बादशाह मानकर ऐसे चले कि हमने उन्हें देवताओं के बराबर रख दिया और देवताओं को हाशिए पर भी जगह नहीं मिली?


आप सोचिए आजादी के बाद हमारी तीन पीढ़ियाँ यही मिलावटी झूठ पढ़ते हुए निकली हैं? इसका जरा सा भी अपराध बोध आपको हो तो आपको जवाब देना चाहिए। इस खत का जवाब मुझे नहीं, इस देश की आवाम को दें, जो इतिहास के प्रति पहले से ज्यादा जागी हुई है। सारे फरेब उसके सामने उजागर हैं।


अंत में यह और कहना चाहूँगा कि आज की नौजवान पीढ़ी मध्यकाल के इतिहास को देख और पढ़ रही है तो वह इन ब्यौरों की रोशनी में टेक्नालॉजी के ही ज़रिए आज के सीरिया, इराक, ईरान, यमन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और कुछ अफ्रीकी मुल्कों की हर दिन की हलचल को भी देख पा रही है।


तारीख के जानकार आलिमों के इजहारे-ख्यालात ठीक उसी समय सबके सामने नुमाया है, जब वे अपनी बात कह रहे हैं। अब अगले दिन के अखबार का भी इंतजार बेमानी हो गया है। कुछ भी किसी से छिपा नहीं रह गया है। आज की जनरेशन 360 डिग्री पर सब कुछ अपनी आँखों से देख रही है और अपने दिमाग से सोच और समझ रही है। किसी राय को कायम करने के लिए अब मिलावटी और बनावटी बातों की जरूरत नहीं रह गई है।


ईश्वर आपको अच्छी सेहत और लंबी उम्र दे। ताकि सत्तर साल का इतिहास के कोर्स का बिगाड़ा हुआ हाजमा आप अपनी आँखों से सुधरता हुआ भी देख सकें। हमें यह भी मान लेना चाहिए कि आखिरकार ऊपरवाला सारे हिसाब अपने बंदों के सामने ही बराबर कर देता है!


बहुत शुक्रिया।


(विजय मनोहर तिवारी)

राज्य सूचना आयुक्त, मध्यप्रदेश


(पत्र का अंतिम हिस्सा)



(पत्र को इस लिंक से लिया गया है.)

31 जुलाई 2021

जब की गई थी हमारे पत्रों की जाँच

आज, 31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस का आयोजन किया जाता है. हमारे छोटे भाई शरद इसे लेकर विगत कई वर्षों से एक अभियान छेड़े हुए हैं. चूँकि हमें पत्र लेखन का बहुत पुराना शौक है. आज भी प्रतिमाह पत्र लिखना होता है, भले ही किसी का जवाब आये या न आये.




आज इस मौके पर उन दिनों की एक घटना याद आ रही है जबकि रोज ही दसियों पत्रों का लिखा जाना होता था और दस-पंद्रह पत्र रोज ही आते थे. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि अपने जन्म से लेकर अभी तक उरई में हमारे सामने मात्र दो मकानों में रहने की, दो मोहल्लों में रहने की स्थिति आई. पहले हम पाठकपुरा में किराये से रहते थे फिर रामनगर में अपने मकान में आ गए. ये भी संयोग कहा जायेगा कि दोनों जगह डाकिया ऐसे मिले जो आत्मीयता से जुड़े रहे, पारिवारिक रूप में जुड़े रहे. इसका सुखद परिणाम ये हुआ कि कभी कोई पत्र गायब नहीं हुआ. (हाँ, कुछ महीनों के लिए एक खुरापाती डाकिया अवश्य मिला वो भी पिताजी की एक फटकार के बाद किसी और जगह के लिए निकल लिया था.)


खैर, घटना उन अत्याधिक पत्रों के आने से सम्बंधित है. एक दिन हमें पत्र मिले तो लगभग सभी पत्र खुले हुए थे कि वे अपने आप नहीं खुले बल्कि फाड़कर खोले गए थे. और खुले भी कुछ इस तरह से थे कि वे मात्र खोले नहीं गए थे बल्कि ऐसा समझ आ रहा था कि खोलकर पढ़े भी गए हैं. हमारे कुछ बोलने से पहले ही डाकिया ने कहा कि ये हमें खुले मिले हैं और पोस्टमास्टर ने दिए हैं.


हम तुरंत ही डाकघर पहुँचे और पोस्टमास्टर से मिले. उनको जब अपना नाम बताया तो वे तुरंत ही हमारे पत्रों के खोले जाने की बात बताने लगे. उनके अनुसार ऊपर के आदेश पर कोई कमिटी बनाई गई है जो लगातार आते तमाम सारे पत्रों को जांचेगी. उसी कमेटी ने हमारे पत्रों को खोलकर देखा था. पोस्टमास्टर ने बताया कि आपके रोज ही पंद्रह-बीस पत्र आते हैं, इस कारण से ऐसा किया गया.


अब इस कमेटी वाली बात में कितनी सच्चाई थी, ये तो वही जानें मगर उसके बाद से हमारे किसी पत्र को खोलकर नहीं देखा गया.


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(आपको बताते चलें कि ये बात 1995-96 की थी, तब हम सामाजिक क्षेत्र में आज की तरह सक्रिय नहीं थे. इस कारण भी शायद लगा होगा कि किसी अनाम, अपरिचित नामवाले के इतने सारे पत्र क्यों और किसलिए आते हैं?)

07 जुलाई 2021

पत्रों के साथ यादों के गोते

जुलाई माह को वे लोग बहुत अच्छी तरह से याद रखते होंगे जो लोग पत्र लेखन का शौक रखते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इसी माह के अंतिम दिन को विश्व पत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है. पत्रों का भी अपना एक मजेदार संसार होता है. इनके सहारे पुराने दिनों की सैर की जा सकती है, बहुत से उन पलों में गोते लगाये जा सकते हैं जो अब बस यादें ही हैं. पत्र का लिखना एक गज़ब का शौक है. वर्तमान पीढ़ी, जो तकनीक की रफ़्तार में, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की भीड़ में इस सुख से वंचित है, इस शौक का स्वाद लेना नहीं जानती है. इसमें किसी भी रूप में वर्तमान पीढ़ी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि उसने आँखें खोलते ही अपने आसपास इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का मेला लगा देखा है. तेज रफ़्तार ज़िन्दगी को देखा है. ई-मेल, सोशल मीडिया मंचों को देखा है. इन सबके बीच वह पत्र लेखन जैसे शौक को पैदा करेगी, संभव नहीं लगता. एक क्लिक पर संदेशों के दूर देशों तक पहुँच जाने जैसी सेवाओं के बीच कौन कई-कई दिनों तक पत्रों का इंतजार करेगा?


आज तकनीक ने भले ही संदेशों को, खबरों को, जानकारियों को एक क्लिक कर इधर से उधर पहुँचा दिया हो मगर जो मजा पत्रों के पढ़ने में आता है, जो सुख पुराने संगृहीत पत्रों को पुनः पढ़ने में मिलता है वह ई-मेल के संदेशों में नहीं है. पत्र लिखने का अपना सुख हुआ करता है तो पत्रों का पढ़ा जाना भी असीम आनंद देता है. पुराने पत्रों को पढ़ने में सुकून मिलता है. हम अपने पत्र लेखन के शौक के चलते दशकों पुराने पत्र अपने खजाने में आज भी सुरक्षित रखे हैं. दोस्तों के पत्र, रिश्तेदारों के पत्र, भाईयों-बहिनों के पत्र, शुभचिंतकों के पत्र समय-समय पर हमारे आसपास खुशबू बिखेरते रहते हैं. 




कुछ सामान्य से पत्र हैं जो किसी न किसी विशेष वजह से सुरक्षित हैं, कुछ पत्र व्यक्ति-विशेष के कारण सुरक्षित हैं तो कुछ पत्र असामान्य होने के कारण, विशेष होने के कारण भी सुरक्षित रखे हुए हैं. विगत दो-तीन दिनों से इन्हीं पत्रों के द्वारा अतीत की सैर की जा रही है. ऐसे लोगों से मिला जा रहा है जिनसे मिलना अब संभव भी नहीं. ऐसे लोगों से भी मुलाकात की जा रही है जिनसे मुलाकात शायद वाली स्थिति में है. पत्रों की इस दुनिया में कई बार सुखद स्थिति सामने आती है तो कई बार विषम स्थिति भी सामने आ जाती है. कई बार खिलखिलाने का मन करता है तो कई बार अपने आप ही आँसू बहने लगते हैं. संबंधों का, रिश्तों का निर्वहन देखने को मिलता है, अपनेपन का एहसास दिखाई देता है. किसी के साथ का झगड़ा याद आया, किसी के साथ की अनौपचारिकता सामने आई, किसी के साथ आप से तुम तक आ जाने अधिकार दिखाई दिया, किसी के साथ बड़प्पन का भाव मुस्कुराया.


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12 सितंबर 2020

साधारण डाक यदि कूड़े के ढेर में मिले तो कोई आश्चर्य नहीं

तकनीकी विकास ने पत्र-लेखन को लगभग समाप्त ही कर दिया है. इधर इसके साथ-साथ एक बात और देखने को मिली है कि साधारण डाक का वितरण भी लगभग शून्य हो गया है. इस जुलाई में पत्र लेखन दिवस पर बहुत से मित्रों को पत्र लिखे थे. इन मित्रों में स्थानीय मित्र भी शामिल थे और देश के अनेक प्रदेशों के मित्र भी शामिल रहे. बहुत से मित्रों को पत्र मिले और बहुत से मित्र अभी तक पत्र से वंचित हैं. कुछ दिन पहले एक पंजीकृत पत्र के वितरण में हो रही अनावश्यक देरी के कारण अपने एक अधिकारी मित्र को अपनी समस्या से अवगत कराया. उनकी सहायता से पत्र तो प्राप्त हुआ मगर इस कोरोना काल में डाक विभाग की समस्या से भी परिचित होने का मौका मिला. उस पत्र के विलम्ब से वितरण का कारण समझ आया.


कोरोना काल के दौर में लागू किये गए लॉकडाउन और ट्रेनों की, परिवहन के अन्य साधनों की आवाजाही बंद करवाने के कारण पत्र वितरण में समस्या आनी स्वाभाविक थी. इस समस्या के चलते मन ने स्वीकार कर लिया कि शहर/जनपद से बाहर के पत्र वितरण में परिवहन के साधनों की उचित उपलब्धता के कारण देरी होना स्वाभाविक है मगर शहर के अन्दर पत्र वितरण में देरी का क्या कारण है? हमने अपने जनपद के मित्रों को तो पत्र लिखे ही साथ ही उरई शहर के अनेक मित्रों को पत्र लिखे. शहर के कुछ मित्रों को पत्र मिल भी गए मगर जनपद के अन्य स्थानों तक पत्र नहीं पहुँचे. समझ नहीं आया कि उरई शहर की डाक को उरई शहर में वितरित करने के लिए कौन सी ट्रेन की आवश्यकता है? यदि जनपद के अन्य स्थानों की बात पर भी विचार करें तो भी अब निजी वाहनों का चलना आरम्भ हो गया है. ऐसे में पत्रों का जनपद में ही, शहर में ही वितरित न हो पाना समझ से परे है.


साधारण डाक वितरण का सुस्त रहना या फिर वितरण ही न किया जाना आज की समस्या नहीं वरन उस समय की भी समस्या है जबकि समाचारों के आदान-प्रदान का माध्यम पत्र ही हुआ करते थे. बहुत अच्छी तरह से याद है कि एक बार हमारे शहर के एक डाकिये की शिकायत पर उसके खिलाफ जाँच बैठाई गई तो मालूम हुआ कि वह सारी की सारी साधारण डाक अपने घर ले जाकर चूल्हे में जला देता है. ऐसी घटनाओं के होने के बाद भी तब डाक व्यवस्था अपने सुव्यवस्थित रूप में काम किया करती थी. आज भी बहुत सी जगहों पर डाक व्यवस्था अच्छी सेवा के रूप में जानी जा रही है. इसका उदाहरण स्वयं हम हैं. कोरोना काल में जैसे ही डाक सेवाएँ सामान्य हुईं वैसे ही हमारी डाक नियमित रूप से आने लगी. सप्ताह में दो-तीन दिन डाक को आना ही होता है. इस बात को हमारे क्षेत्र में अभी तक कार्यरत रहे डाकिये भली-भांति जानते रहे हैं.

कुछ साल पहले तक हम इन डाकियों की परीक्षा भी ले लिया करते थे. खुद ही एक पोस्टकार्ड लिख कर डाल दिया करते थे. उसमें किसी तरह का कोई समाचार न लिख कर कोई नंबर, कोई पंजीकरण संख्या आदि लिख देते थे. पोस्टकार्ड देखने पर समझ आता कि कोई बहुत महत्त्वपूर्ण समाचार नहीं है, कोई अनिवार्य रूप से पहुँचाने वाला सन्देश नहीं है, इसके बाद भी हमारा पोस्टकार्ड हम तक पहुँचता. कई बार डाक की गड़बड़ी हमारे साथ भी हुई मगर उसकी शिकायत के द्वारा वह गड़बड़ी भी दूर करवा दी जाती रही.

फ़िलहाल तो अब पत्र लिखने वाले भी न के बराबर हैं, डाक से सामग्री पाने वाले भी न के बराबर हैं. ऐसे में डाकिये भी डाक की, साधारण डाक की महत्ता को जान-समझ रहे हैं. यदा-कदा आने वाली साधारण डाक यदि कूड़े के ढेर में मिले या फिर नाले में, आग के हवाले चली जाए तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

27 अगस्त 2020

पत्र के इंतजार का भी अपना मजा है

31 जुलाई को पत्र दिवस मनाया गया. इस अवसर पर हमने कई मित्रों को पत्र लिखे. सोशल मीडिया के दौर में, संचार तकनीकी विकास के दौर में बहुत से लोगों के लिए पत्र लेखन एक अजूबे से कम नहीं है. सोशल मीडिया के बहुत से मित्रों ने अपने-अपने पते भेजे, उन सभी मित्रों को तत्काल पत्र लिख दिए गए. पत्र लेखन हमारे लिए हमेशा से एक शौक की तरह रहा है. हमें कभी भी पत्र लिखने में ऊबन नहीं हुई और न ही हमने कभी कभी पत्र लिखने में संकोच किया. आज भी ये स्थिति है कि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं पर पत्र लिख कर लेखकों को बधाई, शुभकामनायें देने का काम करते ही हैं. इसके लिए उनसे परिचित होना हमारे लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है.



पत्र लेखन के लिए हमारा मानना है कि साहित्यिक विधा में पत्र लेखन एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा विचारों को ही नहीं वरन संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों आदि को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जा सकता है. आज भले ही तकनीकी के प्रसार के दौर में संदेशों का, विचारों का तत्काल एक-दूसरे तक पहुँचना आसान हो गया हो मगर पत्रों के द्वारा जिस तरह से भावनाएं, संवेदनाएं एक-दूसरे के बीच हस्तांतरित हुआ करती हैं, वो बात आज के तकनीकी सन्देश माध्यमों में नहीं है.

बहुत से मित्रों को पत्र मिले और बहुत से मित्रों को पत्र नहीं भी मिले. कोरोना काल में जहाँ बहुत सी व्यवस्थाएँ ध्वस्त सी दिख रही हैं, उसी में डाक व्यवस्था का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है. पत्रों के न के बराबर आने-जाने से भी डाक व्यवस्था इस तरफ लगभग सुस्त रहती है. ऐसे में अनेक मित्रों ने ऐसे संशय प्रकट किया है मानो हमने उनको पत्र नहीं लिखा है. हमको जिन-जिन मित्रों के पते मिले हैं, उन सभी को हमने पत्र लिख भी दिए हैं. अब वे अपने-अपने क्षेत्र के डाकिया से संपर्क साधे रहें और पत्र का इंतजार करें. वैसे पत्र लेखन की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ पत्र प्राप्ति के इंतजार का अपना ही एक अलग मजा है.

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01 अगस्त 2020

शरारत भरी हेराफेरी के साथ पत्र लेखन का शौक

31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस मनाये जाने पर हमने विचार किया था कि उस दिन अपने मित्रों को पत्र लिखेंगे. इसी सम्बन्ध में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लगाकर उन मित्रों के पते चाहे जो हमारा पत्र पाना चाहते हों. लगभग आधा सैकड़ा मित्रों ने अपने पते हमें भेज कर पत्र भेजने की इच्छा व्यक्त की. इतने सारे मित्रों की सकारात्मक प्रतिक्रिया देखकर उत्साह बढ़ गया. कल और आज तमाम कामों के बीच से समय निकाल कर बहुत से मित्रों को पत्र लिख भी डाले. पत्र लिखने में बड़ा ही मजा आ रहा था. यद्यपि पत्रों के आने-जाने के लगभग न के बराबर माहौल में भी हम नियमित रूप से पत्र लिखते रहते हैं तथापि इतनी बड़ी संख्या में पत्र बहुत दिन बाद लिखना हो रहा है.


इनको लिखने के दौरान वे दिन भी सामने आकर खड़े हो जा रहे हैं जबकि पत्रों के द्वारा मित्रों, परिचितों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान होता था. पढ़ने के उन दिनों में पत्र लिखने का चाव बहुत बुरी तरह से हम मित्रों के बीच बना हुआ था. हम दोस्तों की बातें किसी और को पता न चलें इसके लिए लिफाफे का इस्तेमाल किया जाता था. मंहगा होने के बाद भी इसका इस्तेमाल करना मजबूरी थी. एक तरफ अपनी बातों को सबसे छिपाना होता था दूसरे बातें इतनी अधिक होती थीं कि उनका अंतर्देशीय पत्र में सिमट पाना संभव ही नहीं होता था. ऐसे में न तो अंतर्देशीय पत्र काम करता था और पोस्टकार्ड की तरफ तो देखा भी न जाता था. कई-कई पन्नों में हम दोस्तों की अपनी गाथा सिमटी होती थी. अलग-अलग शहरों में पढ़ रहे हम मित्र अपने कॉलेज की, दोस्तों की, पढ़ाई की चर्चा करते रहते.



जेबखर्च की सीमित स्थिति के चलते डाक टिकटों के साथ कुछ शरारत कर ली जाया करती थी. साधारण डाक लिफाफा एक रुपये का हुआ करता था. किसी कागज़ का लिफाफा बनाकर उस पर दस-दस पैसे के दस टिकट अलग-अलग जगहों पर लगाये जाते थे. ऐसा करने से कई बार कुछ डाक टिकट मुहर लग जाने से बच जाया करते थे. उनका दोबारा उपयोग कर लिया जाता था. एक-दो बार प्रयोग किये गए लिफाफों को भी चला दिया गया. प्राप्ति वाले पते को काट कर लिख दिया कि ये व्यक्ति यहाँ नहीं रहता है और वापसी वाला पता डाल दिया जाता था. हालाँकि ऐसा एक-दो बार ही किया गया मगर काम बन गया था.

आज तकनीकी इस कदर तेज है कि पलक झपकने के साथ लोगों तक अपनी बात पहुँच जा रही है. इसके बाद भी हम खुद महसूस करते हैं कि उन दिनों जैसी भावनाएं मशीनी पत्र में देखने को नहीं मिल रही हैं. आज के मशीनी संदेशों का संकलन आसान हो गया है मगर उनको पढ़ने में, उनको दोबारा खोलकर देखने में किसी एहसास की अनुभूति नहीं होती है. शब्दों का टाइप होना, कागज छूने का एहसास न होना, अनजाने ही उस व्यक्ति का चेहरा उन लिखे शब्दों में बनना अब महसूस ही नहीं होता. बहरहाल, ये तकनीक है जो बदल कर इस दौर में ले आई है मगर हमें हमारे मित्रों ने उन्हीं पुराने दिनों की याद ताजा करवा दी है. सभी का हृदय से आभार.

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31 जुलाई 2020

पत्रों का सुखद एहसास अब गायब हो गया

आज, 31 जुलाई को लोग कई-कई कारणों से याद रखते हैं. कोई पार्श्व गायक मुहम्मद रफ़ी के कारण याद रखता है तो कोई साहित्यकार प्रेमचंद के कारण. इनके अलावा और भी बहुत से कारण होंगे आज की तारीख को याद करने के. इन्हीं बहुत से कारणों में एक कारण याद रखने का है, इस तिथि को विश्व पत्र दिवस मनाया जाना. हो सकता है कि आपको आश्चर्य हुआ हो कि ऐसा भी कोई दिवस मनाया जाता है. जी हाँ, 31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस भी मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि आज ही की तारीख में सबसे पहला पत्र इंग्लैण्ड में लिखा गया. उसके बाद से तकनीक के विकास करने तक पत्र ही वैचारिक आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम बना हुआ था.


विश्व पत्र दिवस का मनाया जाना जितना आश्चर्य का विषय हो सकता है, उतना ही बहुत से युवा साथियों के लिए आश्चर्य का विषय पत्र का लिखा जाना भी हो सकता है. वर्तमान दौर में यदि एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की होगी जिन्होंने पत्रों का लेखन किया है, पत्रों का इंतजार किया है तो एक बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की भी होगी जिन्होंने पत्र का इस्तेमाल ही नहीं किया होगा. आज के दौर में तीव्रगति से इधर से उधर अपनी बात पहुँचाने के तमाम माध्यम विकसित हो चुके हैं मगर इसके बाद भी लगता है कि जो एहसास, जो संवेदनाएँ पत्र में छिपी होती हैं वे आज के किसी तकनीकी माध्यम में नहीं हैं.


आज भी याद आता है वो समय जबकि पत्रों का आना, उनको बार-बार पढ़ा जाना, पत्रों का सहेज कर रखा जाना अपने आपमें एक बहुत विशेष बात हुआ करती थी. हम आज भी सैकड़ों की संख्या में पत्रों को अपने पास सुरक्षित रखे हुए हैं. कई बार फुर्सत के समय में, अकेलापन महसूस होने पर इनके साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता है. परिजनों के पत्र आने पर सबसे पहले कौन पढ़ेगा को लेकर अक्सर युद्ध जैसी बन जाया करती थी. पत्र में किस-किसको नाम लेकर संबोधित किया गया है, इसको भी बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता था. किसी विशेष आयोजन पर आने वाले पत्र के समय एक लिफाफे में कई-कई छोटे-छोटे कागजों में पत्रों का आना मनोहारी मौसम जैसा लगता था. बचपन के उस दौर से बाहर आकर युवावस्था में मित्रों के पत्रों का इंतजार, पत्रों में कई बार कोड वर्ड में अपनी बात को कहने की काबिलियत भी दिखा दी जाती थी ताकि यदि धोखे से घरवालों के हाथ पत्र पड़ जाए तो उस कोड वर्ड को समझ न सकें.

ऐसे समय में याद आता है हॉस्टल टाइम में अपने एक मित्र द्वारा पत्रिका में भेजा गया सन्देश और उसके बाद उसके नाम पर रोज ही चालीस-पचास पत्र आने शुरू हो गए. यह कॉलेज के लिए और हॉस्टल के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ था कि आखिर उसके पास इतने पत्र कहाँ-कहाँ से आते हैं. यह सब करामात उसके द्वारा अनु नाम रखकर एक लड़की के रूप में पत्रिका में सन्देश छपवाने के बाद हुई थी. इसी तरह एक बार अपने शहर के मुख्य डाकघर में हमें प्रधान द्वारा बुलवाकर इसकी जानकारी ली गई थी कि हमारे पास इतने पत्र रोज कहाँ से और क्यों आते हैं. ये बात सन 1996-97 के आसपास की होगी, उस समय हमारे पास रोज ही दस-बारह पत्र आया करते थे.

आज हमारे पास पत्र आने की संख्या भले बहुत ही सीमित हो गई हो, हमारे द्वारा भी पत्र लिखने की गति भी कम हो गई हो मगर बंद नहीं हुई है. ई-मेल और सोशल मीडिया के इस दौर में लोगों ने अपनी बात इधर से उधर पहुँचाने का अलग माध्यम भले ही अपना लिया हो मगर हम आज भी बहुत से परिचितों, अपरिचितों, पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाकारों आदि को पत्र भेजते हैं. उनको पत्र लिखना हम आज भी हस्तलिपि में ही करते हैं. आप भी कोशिश करिए पुनः, अच्छा लगेगा. जो लोग पत्र लिखते रहे हैं, पत्रों का इंतजार करते रहे हैं, वे भली-भांति इसके सुखद एहसास को समझ सकते हैं. जिन लोगों ने कभी पत्र नहीं लिखा, पत्रों के इंतजार करने की अनुभूति नहीं की वे इसका आनंद उठा सकते हैं.

वर्तमान दौर में जबकि सभी लोग खुद में अकेलापन महसूस कर रहे हैं, उस समय आपके हाथ से लिखे दो शब्द आपके अपनो के लिए बहुत बड़ा सुख का माध्यम बन सकते हैं. लिख कर देखिये, हम भी लिख रहे हैं, आप भी लिखिए.

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28 अप्रैल 2020

लिखने का कीड़ा और छपास का रोग

लिखने का कीड़ा बचपन में ही काट गया था. उस समय हम लगभग दस-ग्यारह साल के रहे होंगे, उस समय पहली कविता लिखी थी. वह कविता न केवल लिखी गई बल्कि प्रकाशित भी हुई. बाद में पढ़ाई का, परीक्षाओं का सोंटा चला तो लिखने का कीड़ा कहीं दुबक गया. यह कीड़ा कभी-कभी कुलबुला जाता और इधर-उधर काट कर वापस सुसुप्तावस्था में चला जाता.


यद्यपि आज के जैसा दौर नहीं था जहाँ कि बच्चे चौबीस घंटे बस पढ़ाई और कैरियर के लिए चिंताग्रस्त दिखते हैं तथापि इतना अवश्य था कि पढ़ना है, पास होना है. क्या बनना है जैसा सवाल हर पल बदलता रहता था. नब्बे के दौर में स्नातक के अध्ययन के दौरान भी कैरियर के प्रति गंभीरता नहीं आ सकी, हाँ इतना अवश्य हुआ कि ये समझ आने लगा कि स्नातक के कुछ दिन बाद आजीविका के लिए कुछ करना अवश्य पड़ेगा. इस में ध्यान दिया, लोगों से राय ली, पूछा-ताछी की गई तो हमें अपने मनमाफिक सिविल सेवा में जाना लगा. ये जब तक दिमाग में आता उसके पहले ही लिखने वाला कीड़ा वापस बाहर आ गया. आखिर अब पढ़ाई का सोंटा घर की तरफ से पड़ना बंद हो गया था.


एक तरफ सिविल सेवा की तैयारी चल रही थी दूसरी तरफ लिखने वाला कीड़ा अपने रूप को विस्तार देने का विचार बना रहा था. लिखा तो जा रहा था पर छपना? कीड़े ने फिर काटा, अबकी छपास रोग साथ में लेकर आया. सबसे आसान लगा सम्पादक के नाम पत्र में लिखना और छप जाना. इसे चुनने के पीछे दो कारण भी रहे. एक तो समसामयिक विषयों पर त्वरित टिप्पणी दी जा सकती थी और खुद अपने आपको अपडेट रखा जा सकता था. समाचार-पत्रों में पत्र छपना शुरू हो गए. पत्रिकाओं में साहित्यिक रचनाएँ भी प्रकाशित होती रहीं.


उन्हीं दिनों अमर उजाला समाचार पत्र ने पत्र कॉलम में प्रकाशित एक विशेष पत्र को ख़ास ख़त नाम से प्रकाशित करना आरम्भ किया. हमारे पत्र लगातार प्रकाशित हो रहे थे. उन पत्रों के प्रकाशन ने खूब नाम दिया, पहचान दी. इसके बाद जब ख़ास ख़त का प्रकाशन होने लगा तो उसमें भी पत्र प्रकाशन नियमित रूप से होने लगा. लम्बे समय तक यह व्यवस्था अमर उजाला की तरफ से चलती रही और हमारा प्रकाशन उसमें चलता रहा. कालांतर में लेखन की दिशा बदली. सामायिक, साहित्यिक विषयों के साथ-साथ शोध-पत्रों के लेखन की तरफ मुड़ना हुआ. पी-एच०डी० के लिए शोध कार्य में जुटना पड़ा. धीरे-धीरे पत्र कॉलम में लिखना कम होते-होते बंद हो गया.

उन सभी प्रकाशित पत्रों को संग्रहीत करके रखा हुआ था. कालांतर में ख़ास ख़त कॉलम में प्रकाशित समस्त पत्रों को ख़ास ख़त नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित भी करवाया. इस लॉकडाउन के फुर्सत भरे समय में स्मृति वन में भटकना, टहलना लगातार हो रहा है. आज टहलते-टहलते पत्रों की उसी दुनिया में पहुँच गए, जिसने हमारी पहचान बनाई, जिसने हमें व्यापक क्षेत्र में परिचित करवाया. इसका सुखद अनुभव भी उसी दौर में हम ले चुके थे.



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