फाउंटेन पैन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फाउंटेन पैन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

07 नवंबर 2025

आज है फ़ाउण्टेन पेन दिवस

आज है फ़ाउण्टेन पेन दिवस.

प्रतिवर्ष नवम्बर के पहले शुक्रवार को यह दिवस मनाया जाता है. यह दिन समर्पित है उनको जिनको फ़ाउण्टेन पेन संग्रह का शौक है, इससे लिखने का जुनून है, इससे मुहब्बत है.




30 मार्च 2025

राष्ट्रीय पेन्सिल दिवस

इसे संयोग ही कहा जाएगा. आज रविवार अवकाश के चलते बहुत दिनों से इधर-उधर बिखरे पड़े पेन-पेन्सिल को इकठ्ठा, साफ़-सफाई के कार्यक्रम में लगे थे. सोच भी रहे थे कि आज एक पोस्ट लगाईं जाये फाउंटेन पेन पर.

 

अभी देखा तो जानकारी हुई कि आज, 30 मार्च को राष्ट्रीय पेन्सिल दिवस है. बस, इस अवसर पर अपनी ही कुछ पेंसिलों के साथ....

 

(पेन की तरह पेंसिलों के शौक ने बहुत सारी पेन्सिल भी इकठ्ठा करवा रखी हैं. जो खजाने में बंद हैं, उन पेंसिलों से परिचय फिर किसी दिन...)




14 मई 2024

अटकी हुई कृपा दूर कर दी

एक सप्ताह से अधिक हो गया था क्रेडिट कार्ड बनकर आए हुए. तबसे कल रात तक छह अलग-अलग जगहों पर उसी क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने की प्रक्रिया अपनाई. हर बार भुगतान प्रक्रिया पूर्ण न हो सकी. किसी न किसी कारण से भुगतान न हो पाता.

कई बार लगा कि पहली बार उपयोग कर रहे हैं सम्भव है कि ग़लत तरीक़े से कर रहे हों. कभी लगा कि नया कार्ड है हो सकता है बैंक से कुछ अलग एक्टिवेट करवाना पड़ता हो. अनुभवी लोगों से जानकारी की तो पता चला कि हम भुगतान की सही प्रक्रिया अपना रहे हैं, कोई गलती नहीं कर रहे हैं.

इसके बाद कल रात दिमाग़ घुमाया तो समझ आ गया कि कृपा कहाँ एक जगह अटकी हुई है, तभी भुगतान सफल न हो रहा. बस, आज सुबह ख़रीददारी मुहूर्त में दो फ़ाउण्टेन पेनऔर दो पुस्तकोंके ऑर्डर दिए, तत्काल भुगतान हो गया.

कल समझ आ गया था कि क्रेडिट कार्ड का पहला भुगतना अत्यंत मनपसंद सामग्री पेन या पुस्तक पर होना है. सो पेन और पुस्तक दोनों को वरीयता देते हुए अटकी कृपाको दूर किया.

 





 

26 जनवरी 2024

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व : हमारा प्यारा तिरंगा


तिरंगा हम सबकी शान है. उन्मुक्त गगन में लहराते तिरंगे को नमन करने के साथ ही याद आया अपना लेखकीय तिरंगा. ये वो तिरंगा है जो हमें ताकत देता है, सच कहने की, असत्य के खिलाफ लिखने की, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की. 

इस तिरंगे को भी नमन. 

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व
हमारा प्यारा तिरंगा.... 
❤ ❤ ❤
26 जनवरी 2024


08 जनवरी 2023

पेन की दीवानगी और बचपन के मँहगे पेन

फेसबुक पर अतिसक्रियता दिखाने वाले राम द्विवेदी, जो अक्सर हलकी-फुलकी पोस्ट के बीच गंभीर पोस्ट लगाकर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करते रहते हैं. आज भी उनके द्वारा कुछ ऐसा ही किया गया. Luxor Pilot पेन से सम्बंधित एक पोस्ट लगाई और उसमें हमें भी टैग कर दिया. चूँकि पेन का जबरदस्त शौक हमें हैं, ये बात न केवल राम जानते हैं बल्कि हमारे सभी परिचित भी जानते हैं, इसी कारण से उस पोस्ट में हमें टैग किया गया था. पोस्ट देखी तो वो Luxor Pilot Pen से सम्बंधित थी. आज की पोस्ट के द्वारा बीते दिनों की सैर करवाई जा रही थी. जिस पेन की फोटो राम ने लगाईं थी, अस्सी-नब्बे के दौर में किसी भी साधारण विद्यार्थी के लिए उसे खरीदना संभव नहीं था. उसी साधारण विद्यार्थी वाली स्थिति में हम भी थे. 




पेन का शौक आज से नहीं बल्कि बचपन से रहा है. अपनी कक्षा के कुछ धनवीर मित्रों के हाथों में इस तरह के पेन देखकर मन ललचाता तो था किन्तु परिवार में जिस तरह का माहौल था, उसके द्वारा संतोषम परम सुखम वाली भावना सर्वोपरि थी. जब खुद कमाना, तब शौक करना वाली घुट्टी तो बचपन से ही पिलाई जाने लगी थी. खुद कमाओगे तब पैसे का मोल समझ में आएगा की धमकी भी समय-समय पर मिलती रहती थी. बहुत अच्छे से याद है कि कक्षा छह में आने के बाद ही अकेले में बाजार घूमने का अवसर मिला था. इसी कक्षा में आने के बाद ही अपने घर से लगभग डेढ़-दो किमी दूर स्थित राजकीय इंटर कॉलेज में जाने का मौका मिला. जैसा कि आज का दौर है बच्चों को रेशम में लपेट कर पालने की, वैसा माहौल उस समय हमें नहीं मिला. ऐसा नहीं था कि हम बच्चों की देख-रेख नहीं होती थी किन्तु उस समय बहुत छोटे-छोटे कदमों के द्वारा हमें आत्मनिर्भर होने के, परिस्थितियों से खुद लड़ने के अवसर भी परिवार की तरफ से दिए जा रहे थे.


बाजार से गुजरते समय कुछ दुकानें मिलती थीं स्टेशनरी की, उनमें लटके पेन देखकर मन ललचाता मगर एक दिन के जेबखर्च के रूप में मिलती चवन्नी उस लालच की तरफ उतावला न होने देती. हो सकता है कि आज के बच्चे चवन्नी का अर्थ भी न समझें. इसे हमारे पाठक समझायेंगे. उसी दौरान राम द्विवेदी द्वारा दर्शाए गए इस पेन के साथ-साथ इसी कंपनी का एक और पेन नजर के सामने से गुजरा. इन दोनों पेन में इनकी टिप का अंतर था. जो पेन राम ने दिखाया उसकी टिप स्टील की हुआ करती थी और दूसरे पेन की टिप फाइबर की. बहुत हिम्मत करके एक दिन पिताजी के सामने फाइबर टिप वाला पेन लेने की फरमाइश रख दी. स्केच की जगह पर उसके इस्तेमाल का कारण बताते ही पेन के लिए पैसे तो न मिले बल्कि जबरदस्त डांट मिली. कुछ दिनों के लिए किसी भी तरह के नए पेन की तरफ से ध्यान ही हट गया.




एक बात यहाँ बताएँ कि उस समय हमें फाउंटेन पेन से लिखने के लिए प्रेरित भी किया जाता था और धमकाया भी जाता था. बस इसी कारण से बॉल पेन के रूप में यदि कोई पेन कभी-कभार हाथ में आया तो शार्प का पारदर्शी नीला पेन और कभी-कभी चवन्नी वाली रिफिल वाला कोई सस्ता सा बॉल पेन. ऐसे में किसी दूसरे पेन की बात सोचना भी बड़ी हिम्मत का काम हुआ करता था. यद्यपि उसी समय में एक-दो रुपये तक के कुछ पेन कई-कई दिन की दस-पाँच पैसे की बचत करके भी लिए गए. शायद आप लोगों को याद हो एक स्टील का पेन आया करता था बिना कैप का.


बहरहाल, Luxor के ये दोनों पेन भी लिए गए मगर बहुत दिनों की बचत के बाद. धारे-धीरे कक्षा आगे बढती गई, घर से सख्ती भी कुछ कम होती रही. कभी ड्राइंग के लिए, कभी चार्ट के लिए, कभी परीक्षाओं के लिए पेन की जरूरत पड़ती रही तो ये पेन भी हमारी जेब की शोभा बनते रहे. उन्हीं दिनों इसी कंपनी के एक और बड़े हाई-फाई टाइप पेन से मुलाकात हुई. Pilot V5 के नाम से बाजार में आये इस पेन ने एक बार में ही अपनी तरफ ध्यान खींचा, ऐसा लगा जैसे पहली नजर का प्यार उसी से हो गया हो. उसके बाद जैसे ही दुकान पर जाकर उसका मूल्य पता किया, सारा प्यार हवा में उड़ गया. उस पेन की कीमत के आसपास का पैसा तो महीने भर में हमारे हाथ नहीं आया करता था. पेन से अपने प्यार को खाली हाथ कुछ धन्नासेठों के बच्चों के हाथ में सजा देखते रहे.




शायद आज के बच्चों को आश्चर्य हो कि उस पेन (Pilot V5) को हमने अपनी स्नातक की पढ़ाई के दौरान पैसे जोड़कर ही खरीदा. स्नातक की पढ़ाई के लिए ग्वालियर जाना हूं वहाँ हॉस्टल में रहने का कारण महीने का जेबखर्च चार सौ रुपये मिला करता था. इसी में खाना, दूध और बाकी सामान लिए जाते थे. ऐसे में कुछ महीनों की बचत के बाद V5 पेन ले लिए गया. समय के साथ बहुत कुछ बदला. बाजार ने पेन पर पेन उतार दिए, सस्ते से सस्ता पेन और मंहगे से मंहगा पेन. अब पेन की इतनी वैरायटी मौजूद है कि लेने वाला ही पागल हो जाये कि किसे ले और किसे छोड़े.


दूसरों के पागलपन की क्या बात करें, हम खुद ही पागल रहते हैं बाजार में इतने अधिक पेन देखकर. ये एक आश्चर्य हो सकता है कि पिछले लगभग पच्चीस-तीस साल से हमने किसी पेन के लिए रिफिल नहीं खरीदी है. इससे बड़ा आश्चर्य तो ये होगा कि इतने सालों में किसी पेन की रिफिल ही ख़त्म नहीं हुई है. हर महीने दो-चार नए पेन खरीद लिए जाते हैं, इस कारण रिफिल सुरक्षित बनी रहती है. हाँ, Pilot का V5 पेन जरूर नियमित रूप से पिछले बीच-पच्चीस साल से हमारे लेखन का, हमारी आर्ट का, स्केचिंग का, कैलीग्राफी का हिस्सा बना हुआ है. 






 

04 नवंबर 2022

फाउंटेन पेन आज भी है लेखकों की पसंद

फाउंटेन पेन एक ऐसा उपकरण होता है, जिसके माध्यम से लेखन कार्य किया जाता है. एक निब की सहायता से इसका उपयोग स्याही को कागज़ पर उतार कर लिखा जाता है. आज बहुतायत में लोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग लिखने के लिए करने लगे हैं फिर भी बहुत सारे लोग लिखने के लिए पेन का उपयोग करते हैं. मूल रूप से दो तरह के पेन उपयोग में लाए जा रहे हैं. इनमें एक बॉलपेन और दूसरा फाउंटेन पेन है. फाउंटेन पेन का उपयोग अब कम ही दिखता है. इसके अलावा वर्तमान में बच्चों द्वारा लिखने के लिए पेन्सिल का उपयोग किया जाता है. फाउंटेन पेन में उस पेन में बनी टंकी के अंदर भरी स्याही को निब की सहायता से कागज़ पर चलाया जाता है. निब और जीबी की सहायता से कागज पर उतरी स्याही कागज पर चिपक जाती है. इसी तरह से अक्षरों का लिखना होता रहता है.  


पूर्व में जबकि पेन का अविष्कार न हुआ था तब पक्षियों के पंखों से, हड्डियों से बने पेन की सहायता से, पत्थर को नुकीला बनाकर लेखन कार्य हुआ करता था. कालांतर में इसका विकास हुआ, जिसके चलते पेंसिल और फाउंटेन पेन का आविष्कार हुआ. फाउंटेन पेन का अविष्कार होने का लाभ ये हुआ कि अब पेन को बार-बार स्याही में डुबोने की आवश्कता नहीं होती थी. इससे पहले जिस तरह के उपकरण लेखन हेतु उपयोग में लाये जा रहे थे, वे चाहे हड्डियों से बने हों, पक्षियों के पंखों के बने रहे हों या फिर पत्थर से निर्मित हों सभी को बार-बार स्याही में डुबोना पड़ता था.




आज हम लोग जिस तरह के फाउंटेन पेन को देख रहे हैं, उसका स्वरूप बाँस के माध्यम से बनाया गया था. पहले पेन बनाने के लिए इसका उपयोग किया गया था. बाँस को काटकर एक शार्प निब वाला पेन तैयार किया गया, जिसे इंक बुश के नाम से जाना जाता था. यह पेन अन्य पेन के मुकाबले में बहुत बड़ा होता था. इंक बुश पेन आगे से पतला और पीछे से मोटा होता था. इसका पीछे वाला हिस्सा खोखला होता था, जिसमें स्याही भरी जाती थी. इसी के बाद ही फाउंटेन पेन अस्तित्व में आये. ऐसा माना जाता है कि पेन का सर्वप्रथम आविष्कार इराक में हुआ था. यह एक नुकीली धातु के द्वारा बनाया गया था. यदि पहले रीड पेन की बात की जाये तो उसका आविष्कार मिस्त्र में हुआ था. ऐसा कहा जाता है कि फाउंटेन पेन का आविष्कार भी मिस्त्र में हुआ था.


फाउंटेन पेन का अविष्कार फ्रेंच के वैज्ञानिक पेट्राचे पोएनरु और रॉबर्ट विलियम थॉमसन ने किया. उन्होंने 25 मई 1857 को इसका आविष्कार किया था. यदि ऐतिहासिक रूप में देखा जाये तो भारत में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के लोगों को सबसे पहले पेन के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है. मोहनजोदड़ो शहर से कई ऐसे लेखयुक्त मोहरें प्राप्त हुईं हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में पेन का आविष्कार मोहनजोदड़ो काल में हुआ था. फाउंटेन पेन के आविष्कार से ही बॉलपेन के आविष्कार का रास्ता खुला. बॉलपेन का आविष्कार इस क्षेत्र में क्रांति माना जाता है. बॉलपेन का आविष्कार जॉन जैकब लाउड और लासलो बीरो ने किया.


जब फाउंटेन पेन बना था तो इसकी खूब बिक्री हुई. कालांतर में जब साठ के दशक में बॉलपेन की तकनीक आयी तो लोगों द्वारा इसे हाथों-हाथ लिया गया. फाउंटेन पेन का उपयोग आज भले कम हो रहा हो किन्तु वह पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है. आज भी ज्यादातर लेखक फाउंटेन पेन का उपयोग करते हैं. सुलेखन के लिए लोग आज भी फाउंटेन पेन को ही महत्त्व देते हैं.


(फाउंटेन पेन दिवस, 04 नवम्बर पर विशेष)





 

11 अप्रैल 2022

मुठी भर कलम तबा की स्याही, ताको विद्या कभऊँ न आई

पिछले दो-तीन दिनों से अपने संग्रह के तमाम पेन की देखभाल का काम चल रहा है. उनकी धुलाई-पुछाई हो रही है, कुछ नए पेनों को काम पर लगाया जा रहा है, कुछ पुराने पेनों को आराम दिया जा रहा है. जो गिफ्ट किये गए पेन हैं, उनको सुरक्षित रखने का काम चल रहा है. इसी में एक पेन आँखों के सामने से गुजरा तो उससे जुड़ी एक घटना भी न चाहते हुए याद आ गई. घटना के बरबस याद आ जाने के पीछे छोटा भाई मिंटू है, जो अब बस यादों में है.


वो फाउंटेन पेन अपने आकार में बहुत छोटा है. उरई के परिचित दुकान वाले हमारे पेन के, विशेष रूप से फाउंटेन पेन के शौक को जानते हैं, ऐसे में यदि कोई विशेष पेन या नया पेन हुआ करता है उनके पास तो वे हमें सूचित कर देते हैं. बहुत साल पहले किसी सामान लेने के लिए दुकान पर पहुँचे तो पता चला कि एक बहुत छोटा पेन आया है, वो भी फाउंटेन. हमने दिखाने को कहा और पेन भी ऐसा था कि पहली नजर का प्यार हो गया उससे. बस बिना किसी संकोच के साथ उसके साथ सम्बन्ध जोड़ते हुए उसे घर ले आये.




नए-नए पेन का उपयोग करने का अपना ही मजा है, बस उसी मजे को लेते हुए घर आते ही उसमें स्याही भरी गई और लिखना शुरू. ऐसे ही एक दिन अपने कमरे में बैठे कुछ लिखा पढ़ी हो रही थी. उसी समय सबसे छोटे वाले भाई का आना हुआ. उसने पेन देखा और आश्चर्य से उसे अपने हाथ में लेकर बोला, ये तो बहुत अच्छा लग रहा, बहुत छोटा भी है. उसकी आँखों की चमक बता रही थी कि अगले को वो पेन चाहिए है. यहाँ एक पल रुक कर आप सबको बता दें कि पेन, घड़ी के शौक भी उसे हमारी तरह रहे हैं. हमने कहा कि वो पेन रख दो, तुम्हारे लिए अलग रखा है एक पेन.


उसे जब ये भरोसा हो गया कि उसके लिए भी छोटा सा पेन रखा है तो उसी ख़ुशी के साथ अचानक से उसका स्वर कुछ गम्भीर हुआ और हमसे बोला कि भाई जी, ऐसे छोटे पेन से न लिखा कीजिये. हमने उसकी तरफ सवालिया निगाह से देखा तो उसने पेन अपनी मुट्ठी में बंद करते हुए कहा कि आपने सुना तो होगा इसे....


मुठी भर कलम, तबा की स्याही,

ताको विद्या कभऊँ न आई.


उसके बहुत ही गंभीरता से इतना कहते ही हमने बहुत जोर का ठहाका लगाया. दो-तीन मिनट की हमारी अनियंत्रित हँसी को रोकने के बाद हमने उससे कहा कि दो पी-एच.डी. कर ली और कितनी विद्या चाहिए, जो मुठी भर कलम इस्तेमाल करने से न आएगी. हमारे इतना कहते ही उसकी भी हमारे अंदाज वाली हँसी गूँज उठी.


आज उस पेन को देखकर भरी आँखें लिए बस मुस्कुरा कर ही रह गए क्योंकि हमारी हँसी में अपनी हँसी मिलाने वाला वो भाई हमारे साथ न था.   


05 नवंबर 2021

फाउंटेन पेन के प्रति प्रेम आज भी है : फाउंटेन पेन दिवस विशेष

मानवीय सभ्यता के विकास में बहुत सारे उपकरणों का आविष्कार हुआ. इन उपकरणों ने मानव जीवन को बहुत प्रभावित किया है. ऐसे ही अनेक उपकरणों में एक उपकरण पेन है. किसी समय में इशारों के द्वारा आपसी वार्तालाप किया जाता था. कालांतर में जब इशारों के द्वारा, कतिपय रेखाचित्रों के द्वारा, निशानों के द्वारा, चिन्हों के द्वारा वार्तालाप में अवरोध सा उत्पन्न होने लगा या कहें कि बहुत सी बातों को सामने वालों तक पहुँचाना संभव नहीं हो सका तो फिर भाषा का विकास हुआ. इस भाषा के साथ-साथ लिपि की आवश्यकता भी हुई. भाषा, लिपि के विकास के साथ-साथ उसको आम जनमानस तक लिखित रूप में पहुँचाने के लिए उपकरण की आवश्यकता महसूस हुई. इसी आवश्यकता ने कलम का आविष्कार किया.


लेखन के लिए उपयोग किए जाने वाले इस उपकरण ने अपने पूरे इतिहास में बहुत सारे बदलावों को देखा है. किसी समय में पत्थरों, पेड़ों की लकड़ियों, पक्षियों के पंखों आदि के द्वारा कलम को बनाकर लेखन कार्य किया गया. स्याही के लिए विभिन्न प्रकार के पौधों के पदार्थ, जानवरों आदि के अर्क का उपयोग किया गया. स्याही बन जाने के बाद को कलम के रूप में मिला उपकरण एक तरह का डिप पेन था अर्थात इसको स्याही में डुबो-डुबो कर लिखा जाता था. यह स्थिति लम्बे समय तक बनी रही. आविष्कारों के प्रति सजग मानव ने अंततः लेखन के लिए एक नया उपकरण खोज लिया, जिसे बार-बार स्याही में डुबोने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी. इसी को वह पेन या कहें कि फाउंटेन पेन कह सकते हैं, जिसका परिष्कृत रूप आज हम सबको देखने को मिल रहा है.




ऐसा ऐतिहासिक स्वरूप से देखने को मिलता है कि सन 1636 में फाउंटेन पेन अस्तित्व में आया. फाउंटेन पेन को रोमानिया के पेट्राचे पोएनारू द्वारा डिजाइन किया गया था. जिसमें धातु की निब के साथ स्याही भरने के लिए एक टंकी लगी हुई थी. इसके आविष्कार से कई सुविधाएँ प्राप्त हुईं. न तो बार-बार कलम छीलने की आवश्यकता हुई और न बार-बार निब को स्याही में डुबोने की समस्या का सामना करना पड़ा. इस तरह के आविष्कार के आने से लेखन की दुनिया हमेशा के लिए बदल गई. ऐसा माना जाता है कि फाउंटेन पेन का सबसे पहला रूप प्राचीन मिस्रवासियों द्वारा 3,000 ईसा पूर्व में इस्तेमाल किया गया था. इन्हें स्टाइलस कहा जाता था. स्याही में डुबोए जाने के कारण इन्हें डिप पेन कहा गया.कालांतर में 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान धातु वाले निब वाले लेखन कलमों के उपयोग का उल्लेख मिलता है.

 

फाउंटेन पेन के लगातार उपयोग में बने रहने के कारण सन 2012 से फाउंटेन पेन डे को मनाना शुरू किया. नवम्बर माह के पहले शुक्रवार को इसके लिए निर्धारित किया गया है. इस दिन को मनाने का उद्देश्य दिन-प्रतिदिन के जीवन में फाउंटेन पेन के उपयोग को बढ़ावा देना, उसके उपयोग के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करना, लिखावट को सुन्दर बनाना रहा है. आज जबकि आधुनिक समय में लेखन के लिए वरीयता में, प्राथमिकता में फाउंटेन पेन नहीं है फिर भी बहुतायत में फाउंटेन पेन का उपयोग महत्वपूर्ण आधिकारिक कार्यों के लिए किया जाता है. इसके साथ-साथ बहुत से पेन संग्रह प्रेमी आज भी बाज़ार में, दुकानों में फाउंटेन पेन को तलाशते घूमते-भटकते देखे जाते हैं.


.

31 मई 2021

फाउंटेन पेन और बेटियों का लेखन

कहते हैं कि हरेक चित्र के पीछे कोई न कोई कहानी छिपी रहती है. ऐसा सच भी लगता है क्योंकि फोटो खींचते समय कोई न कोई विचार, कोई न कोई विषय, कोई न कोई मामला उस चित्र के साथ जुड़ा हुआ होता है. अक्सर लोग चित्र खींचने के बाद उससे जुड़ी हुई कहानी को विस्मृत कर देते हैं. ऐसा बहुत बार हमारे साथ भी होता है. यह कोई अनोखी अथवा अचंभित करने वाली प्रक्रिया नहीं है. इसके पीछे ऐसा होने के कारण फोटो का बहुत ज्यादा खींचा जाना है.


आज हर हाथ में स्मार्ट फोन होने के कारण और उनमें एक से एक बढ़कर, बहुत ज्यादा मेगापिक्सल वाले कैमरा होने के कारण भी फोटो का खींचा जाना आम बात हो गई है. ऐसे में बहुत बार सबको फोटो खींचते देखकर भी फोटो खींचने का मन होने लगता है. ऐसी स्थिति में ध्यान ही नहीं रहता है कि सम्बंधित फोटो के साथ कौन सी विशेष बात अथवा घटना जुड़ी हुई थी.


बहरहाल, इधर लॉकडाउन की फुर्सत के कारण दोनों बेटियों ने हमारे पेन, फाउंटेन पेन के खजाने को खूब निहारा, खंगाला. उसी में उनको फाउंटेन पेन दिखाए भी और उनके लिखने के लाभ भी बताये. फाउंटेन पेन से जुड़े अपने अनुभव भी उनको सुनाये. ऐसे में वे दोनों भी फाउंटेन पेन से लिखने का मन बना कर हैण्डराइटिंग में जुट गईं. दोनों ने फाउंटेन पेन से हिन्दी और अंग्रेजी में एक-एक पेज लिख कर दिखाया. दोनों की राइटिंग अच्छी लगी तो सोचा कि इससे जुड़ी यह बात लिखते हुए उसे आप सबके बीच भी लगा दिया जाये.


देखिये और आकलन कीजियेगा.


तीनों बेटियाँ 


छोटी बेटी का हिन्दी लेखन 

छोटी बेटी का अंग्रेजी लेखन 

बड़ी बेटी का हिन्दी लेखन 

बड़ी बेटी का अंग्रेजी लेखन 


08 जनवरी 2021

ऐतिहासिक निकली हरे रंग की स्याही

कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कोई न कोई प्रतिभा होती है, उसे कोई न कोई शौक भी होता है। ये बात और है कि बहुत से लोगों को प्रतिभा निखारने का, उसे दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता, इसी तरह बहुत से लोग किसी न किसी कारण से अपने शौक भी पूरे नहीं कर पाते। ऐसी स्थितियों के लिए आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक आदि पक्ष भी जिम्मेवार होते हैं। इसके साथ-साथ व्यक्ति किस स्थान, किस शहर, किस परिस्थिति में रह रहा है, यह भी शौक एवं प्रतिभा के संदर्भ में महती भूमिका निभाते हैं। 

बचपन से ही फाउण्टेन पेन से लिखने की आदत बनी और कालांतर में यही आदत शौक के रूप में भी विकसित हो गई। आज भी मोबाइल, कम्प्यूटर के दौर में प्रतिदिन फाउण्टेन पेन से लिखना होता है। लिखने के शौक के साथ-साथ अलग-अलग रंग की स्याही का इस्तेमाल करना भी शौक जैसा ही है। लिखने के साथ-साथ फाउण्टेन पेन का प्रयोग स्केचिंग के काम में, कैलीग्राफ़ी में भी कर लिया जाता है। ऐसे में भी अलग-अलग रंग की स्याही की आवश्यकता होती है। 

ऐसे दौर में जबकि पेन का, विशेष रूप से फाउण्टेन पेन का इस्तेमाल कम से कम किया जा रहा हो, उरई जैसी छोटी जगह पर तो यह कमी और भी महसूस की जाती है। इस कमी के बीच फाउण्टेन पेन की स्याही की माँग करना एक तरह की ज्यादती ही कही जाएगी। काली, नीली स्याही की उपलब्धता तो फिर भी हो जाती है पर लाल, हरी स्याही की माँग करना आसमान के तारे माँगने जैसा हो जाता है। इसमें भी हरे रंग की स्याही तो उरई में नामुमकिन स्थिति को प्राप्त कर जाती है। कोरोनाकाल और लाॅकडाउन जैसी परिस्थिति के पहले तो उरई से बाहर कहीं बड़े शहर जाने पर स्याही ले आया करते थे। इस बार न हमारा जाना हो सका और अन्य किसी की सुलभता, सहजता न होने के कारण भी हरे रंग की स्याही उपलब्ध न हो सकी।



इधर हरे रंग की स्याही लगभग समाप्ति पर थी। पिछले दो महीने से उरई की दुकानों के चक्कर लगाए जा रहे थे पर हरी स्याही की उपलब्धता नहीं हो पा रही थी। बिक्री न होने के कारण दुकानदारों की अपनी मजबूरी थी। काफी भागदौड़ और लगभग रोज की पूछताछ के बाद आज अंततः एक दुकान से दो शीशियाँ प्राप्त हो ही गईं। यद्यपि दोनों शीशियों से कुछ स्याही बह भी चुकी है तथापि हाल-फिलहाल लिखने का, स्केचिंग का, कैलीग्राफ़ी का काम बाधित न होगा। समाप्ति की ओर बढ़ती जा रही हरी स्याही के कारण इन कामों को हरे रंग से करना रोकना, कम करना पड़ा था। 

आज हरी स्याही का मिलना खुशी दे गया तो उनकी पैकिंग तिथि ने आश्चर्यचकित कर दिया। मई 1997 की पैक ही हुई स्याही को सही ठिकाना मिला जनवरी 2021 में। इस स्याही को धैर्य के साथ इस्तेमाल किया जाएगा और सुरक्षित रख लिया जाएगा क्योंकि एक तरह से ये ऐतिहासिक हरी स्याही हो गई। हरी स्याही मिलने के बाद भी हरी स्याही की खोज जारी रहेगी। वैसे जल्द ही कहीं न कहीं सैर को निकला जाएगा और बोरा भरकर हरी स्याही खरीद ली जाएगी। 



.
वंदेमातरम्

03 जनवरी 2021

स्याही की बूँदें और सजा

एक बच्चा फाउंटेन पेन से लिखा करता था. लिखने से ज्यादा वह अपने कपड़ों को, हाथों को रंग लेता था. कभी स्याही भरने के नाम पर, कभी पेन न चलने के नाम पर, कभी निब पर स्याही सूखने के नाम पर, कभी पेन को पकड़ने की स्टाइल के कारण उसके हाथ गंदे होते और हाथों के चलते कपड़े भी गंदे हो जाते. स्याही के निशान साफ़ करते-करते उसकी माँ भी परेशान रहती. परेशान वह इसलिए भी होती क्योंकि स्याही के वे निशान सिर्फ कपड़ों, हाथों पर ही रुक कर नहीं रहे बल्कि कभी-कभी वे घर के कपड़ों पर भी दिखाई दे जाते, कभी घर की दीवारों, सामानों पर भी दिख जाते.


एक दिन वह बच्चा घर पर बैठा अपना काम करने में लगा था. फाउंटेन पेन हमेशा की तरह उसके हाथ में था. स्याही की शीशी उसकी पहुँच में थी ही. उसकी मम्मी ने देखा तो उसे समझाया. अगले पल उसकी माँ के दिमाग में कुछ बात आई. उन्होंने उस बच्चे से कहा कि तुम हर जगह स्याही के निशान बना देते हो, हाथ गंदे कर लेते हो, कपड़े गंदे कर लेते हो. अब तुम्हारे हाथों पर लगी स्याही पर तो कुछ नहीं कहा जाएगा मगर यदि किसी कपड़े पर, सामान पर, दीवार पर स्याही के जितने निशान लगेंगे, उतने बार तुम्हारी पिटाई होगी. उतनी बार तुमको तमाचे पड़ेंगे.


अब बच्चा बड़ा सतर्क हो गया. बहुत सावधानी से काम करने लगा. काम करते-करते उसी समय उसके पेन ने चलना बंद कर दिया. कई बार की कोशिश के बाद भी निब ने स्याही से कुछ भी लिखने से मना कर दिया. बच्चे के मन में पिटाई को लेकर भी एक डर था, सो वह बहुत ही सावधानी से कोशिश कर रहा था पेन को चलाने की. कई बार के बाद भी जब उसका पेन न चला तो उसने फाउंटेन पेन को हाथ में पकड़ कर झटका दिया. अरे! यह क्या? वह जिस चादर को जमीन पर बिछा कर बैठा लिखने में लगा था उसमें एक तरफ स्याही के कई सारे धब्बे बन गए. (ऐसा आपके साथ भी तो हुआ होगा, जबकि फाउंटेन पेन चलाने के लिए आपने पेन को झटका दिया होगा और उसकी निब के रास्ते स्याही निकल कर कई-कई बूँदों में बिखर गई होगी.)


कुछ देर बाद उसी माँ आई और उसने चादर पर स्याही बिखरी देखकर उसे मात्र एक बार एक सजा दी. आपको आश्चर्य हुआ होगा कि कई-कई बूँदों के निशान हो जाने के बाद भी मात्र एक बार की सजा. अब इसे वही समझ सकेगा जिसने फाउंटेन पेन का प्रयोग किया हो.


अब बच्चे को सजा मात्र एक बार मिलने की बात का खुलासा. आखिर बच्चा भी समझदार था. उसने चादर पर कई निशान देखकर मिलने वाली सजा का अंदाजा लगा लिया था. बस, झटपट उसने दिमाग चलाते हुए स्याही की शीशी उठाकर उन सारी बूँदों के ऊपर बिखरा दी. नतीजा ये हुआ कि स्याही के कई-कई निशान बस एक निशान में बदल गए. कहिये, कैसी रही उस बच्चे की कारीगरी.


आज फाउंटेन पेन साफ़ करते समय जगह-जगह पड़े स्याही के निशान देखकर यह कहानी याद आ गई.




.
वंदेमातरम्

15 दिसंबर 2020

फाउंटेन पेन की विरासत भी, दोस्ती भी

हमारा और कलम का जैसे पिछले जन्मों का सम्बन्ध है. बचपन से अभी तक साथ बना हुआ है. फाउंटेन पेन किसी भी तरह के हों, सस्ते हों या मँहगे, प्लास्टिक के हों या धातु के, फाउंटेन पेन हों या बॉल पेन सभी हमें बहुत पसंद हैं. किसी नए शहर में जाना होता है तो वहाँ का प्रसिद्द सामान एकबारगी भले ही न खरीदा जा सके परन्तु पेन की खरीद अनिवार्य रूप से होती है. हमने खुद में महसूस किया है कि पेन को लेकर एक तरह का नशा है. इस बारे में किसी तरह की कोई शर्म-लिहाज हम नहीं रखते हैं. बहुत बार ऐसा हुआ कि उम्र, अनुभव, रिश्ते में हमसे बड़े, सम्मानित लोगों ने अपने किसी काम के लिए हमसे पेन माँगा और यदि उनके द्वारा वापस करने में जरा भी चूक होती है तो हम उसे सुधार लेते हैं. जैसा कि बहुत से लोगों द्वारा ऐसा होता है कि अपना काम निपटाया और पेन वापस न देकर वे अपनी जेब की शरण में पहुँचा देते हैं, ऐसी स्थिति सामने आने पर हम निसंकोच, बिना इसका विचार किये कि कहीं सामने वाला इसे अन्यथा न ले ले, हम अपना पेन माँग लेते हैं.


(चित्र - 1)

फाउंटेन पेन के प्रति हमें विशेष लगाव सा है. इस पर कुछ लिखने का विचार बहुत दिनों से बन रहा था. आज इसी चक्कर में अपनी इस बगिया में टहलने निकल पड़े. कुछ यादों के साथ बहुत से मित्र सामने आ गए. अभी बस एक-दो विशेष फाउंटेन पेन आपके सामने. इसमें एक पेन हमारे पास है जिसमें दोनों तरफ निब है, इसके चलते इसे दोनों तरफ से लिखा जा सकता है. इस पेन में दोनों तरफ स्याही भरने की जगह है. इस कारण दो रंग की स्याही को एक ही पेन में उपयोग में लाया जा सकता है. इस पेन को हमने आज से करीब पच्चीस वर्ष पूर्व खरीदा था. (चित्र – 1)


(चित्र - 2)

ये जो दो फाउंटेन पेन आपको दिख रहे हैं, ये हमारे पिताजी के हैं. उनको भी फाउंटेन पेन से लिखने का शौक था. पिताजी के न रहने के बाद से ये हमारे खजाने की शोभा बने हुए हैं. पिताजी की तमाम सारी यादों और चीजों की तरह हम इनको सुरक्षित रखे हुए हैं. इसमें एक पेन (ऊपर वाले) की विशेषता यह है इसमें स्याही भरने के लिए एक तरह का लीवर लगा हुआ है. चित्र में इसे आप देख भी सकते हैं. फाउंटेन पेन की निब को स्याही की शीशी में डुबो कर इसी की सहायता से इसमें स्याही भरी जाती थी. इस पेन का उपयोग करने का हमें मौका कभी नहीं मिला. इसी चित्र में नीचे वाला दूसरा पेन सामान्य पेन है. यह हमारे लिए महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि बचपन में अपनी वार्षिक परीक्षाओं के दौरान इसका उपयोग करने की अनुमति हमें पिताजी की तरफ से मिल जाया करती थी. इन दोनों फाउंटेन पेन की एक विशेषता ये भी है कि ये दोनों पेन उम्र में हमसे बड़े हैं. अब इनको उपयोग में नहीं लाया जा रहा है, बस विरासत के तौर पर, पिताजी की स्मृति में ये दोनों फाउंटेन पेन हमारे पास सुरक्षित हैं. (चित्र – 2)


.
वंदेमातरम् 

मासूम बचपन सी फाउंटेन पेन की शैतानियाँ

नए-पुराने फाउंटेन पेन की अपनी छोटी सी बगिया में आज सैर करने निकले तो बहुत सी यादें ताजा हो गईं. जी हाँ, हमारे लिए वह बगिया ही है और उस बगिया में ढेर सारे अलग-अलग तरह के फाउंटेन पेन खुशनुमा चेहरों के साथ उपलब्ध हैं. पेन के इस खुशनुमा चेहरों के एहसास को वह बहुत सहजता से महसूस कर सकता है जो फाउंटेन पेन का प्रेमी होगा. नई पीढ़ी के लिए भले ही यह आश्चर्य हो मगर उन सभी लोगों के लिए, जो फाउंटेन पेन-प्रेमी हैं, उनको यह पहले प्यार जैसा एहसास जगाये रहता है. इसे हम अपने और अपने तमाम उन मित्रों के अनुभव के आधार पर कह सकते हैं, जो फाउंटेन पेन के शौक़ीन हैं. आज भले ही बहुतायत में लोगों द्वारा फाउंटेन पेन का उपयोग नहीं किया जाता हो मगर बाजार में अनेक रंग-रूप के, एक से एक सुन्दर डिजायन के, अत्याधुनिक तकनीक के साथ मनमोहक फाउंटेन पेन की भरमार है. इसके सापेक्ष हम जब अपने बचपन के दिनों में अपने पेन के बीच जाते हैं तो उसी बचपन जैसा मासूम सा, भोला-भाला पेन नजर आता है.


कहिए, आपको भी याद आया? आज आप भले ही कम्प्यूटर, मोबाइल का बहुतायत उपयोग करने लगे हों मगर हो सकता है कि आपने अपने बचपन में अपनी उँगलियों के बीच, अपनी नन्हीं सी हथेलियों में फाउंटेन पेन को थामा होगा. याद करिए आज के रंग-बिरंगे, नक्काशीदार मनमोहक पेन के बीच अपने बचपन के उस पेन को. उसमें भी आपके बचपन जैसी मासूमियत आपको अब नजर आ रही होगी. जैसे सारे बच्चे अपने भोलेपन स्वभाव में एक जैसे होते हैं ठीक वैसे ही हमारे बचपन का वो फाउंटेन पेन हुआ करता था. एक पारदर्शी टंकी, उसके ऊपर एक रंग के ढक्कन जो लाल, नीले, काले आदि किसी रंग के होते थे और एकजैसे ही निब, कोई सफ़ेद तो कोई पीले. बचपन की मासूमियत की तरह वे फाउंटेन पेन हम बच्चों के साथ खूब ठिठोली सी करते थे.


सोचिये, सोचिये... कोई ठिठोली याद आई आप लोगों को? हमें तो खूब याद है और आज भी जब हम अपने फाउंटेन पेन की बगिया में उनके बीच बैठते हैं तो वे सब भी अपनी उन शैतानियों को खूब याद करवाते हैं. हम बच्चों की शैतानियों की तरह उस समय के फाउंटेन पेन की शैतानियाँ भी हुआ करती थीं. उनका उद्देश्य कभी भी हम बच्चों को परेशान करना नहीं होता था बल्कि वे अपने स्वभाव के चलते शैतानी कर जाया करते थे. पारदर्शी टंकी को कभी ड्रॉपर के सहारे, कभी सीधे स्याही की बोतल के सहारे भरने की कोशिश होती. शैतान फाउंटेन पेन की टंकी जानबूझ कर हिल जाया करती और स्याही टंकी के बजाय हमारे ही ऊपर. अब इसे पेन की ही शैतानी कहेंगे, अपने नन्हे हाथों की कमजोर, काँपती पकड़ थोड़े कहेंगे.


इसी तरह अक्सर पता चलता कि सुबह तो उस पेन ने हँसते-हँसते हमारे साथ लिखने का काम किया और जब दोपहर में उसके साथ फिर खेलना चाहा तो महाशय चलने से मना कर देते थे. अब ये उनकी शैतानी ही हुआ करती थी. अब कोशिश होती थी कि पारदर्शी टंकी से कुछ बूँदें निब तक आ जाएँ तो शायद पेन हमारे साथ लिखने का खेल खेलने लगे. इस चक्कर में निब के ऊपर ऊँगली फिरा-फिरा कर स्याही को टंकी से घसीटने का काम किया जाता. कई बार इसमें सफलता न मिलने पर पेन को झटका दिया जाता. अब जैसे ही दो-चार बार पेन को झटका दिया वैसे ही उसकी शैतानी कपड़ों पर बूँदों के रूप में छप जाती थी. कभी खुद की नेकर, शर्ट पर चित्रकारी होती, कभी आसपास बैठे साथियों पर, भाई-बहिनों पर तो कभी घर के कपड़ों पर. फाउंटेन पेन की इस शैतानी पर अक्सर डांट भी पड़ जाती थी.


कपड़ों के अलावा पेन के स्नेह के निशान रोज ही उँगलियों पर, होंठों पर नजर आते रहते. चलते-चलते पेन का रुकना हुआ नहीं कि झट से निब-फीड (जिव्ही) को होंठों की कोमलता के सहारे दाँतों की कठोरता से दबाया. अब हाथों, उँगलियों, हथेलियों में इस करामात के निशान बनकर कारीगरी की चुगली किया करते. पानी, कपड़ों के सहारे धो-पोंछ कर वापस सबको यथास्थान लगाते. कभी तो मेहनत सफल हो जाती और कभी-कभी अपनी इस कलाकारी में तोड़-फोड़ भी हो जाया करती. कहिये फाउंटेन पेन हाथों से फिसलकर जमीन की शरण में चला गया तो निब की शक्ल बदल गई. दाँतों, होंठों के सहारे खींचने की जबरिया कोशिश में कई बार दोनों का टूटना हो जाया करता.




आज वे पुराने मासूम से पेन भी हमारी बगिया की शोभा बने हुए हैं तो आज के छैल-छबीले, डिजायनर पेन भी उसी बगिया में उनके साथी बने हुए हैं. अब टंकी को पारदर्शी से दूर करते हुए रंगीनियत मिल गई है तो तकनीक ने उसमें स्याही भरे जाने की मुश्किल को भी सरल कर दिया है. अब स्याही टंकी के सहारे से कपड़ों पर अपने रंग नहीं छोड़ती है. लिखने के दौरान भी उँगलियों से स्याही दूर-दूर ही रहती है. अब स्याही भरने की झंझट को भी स्याही की रेडीमेड बैरल ने समाप्त कर दिया है. इतना सबकुछ होने के बाद भी हम फाउंटेन पेन धोने के बहाने, खाली बैरल में स्याही भरने के बहाने, पेन की निब तक स्याही को घसीट कर लाने के लिए उस पर ऊँगली फेरने के बहाने अपने हाथों में बचपन की वही रंगीन कलाकारी कर लेते हैं. फाउंटेन पेन के साथ इस कलाकारी के बहाने हम वापस अपने बचपन में पहुँच जाते हैं.



.
वंदेमातरम्

14 दिसंबर 2020

स्याही की नमी में शब्द नहीं जीवन उभरता है, स्मृतियाँ बिखरती हैं

एक दौर था जबकि सुलेख पर बहुत ध्यान दिया जाता था. अब एक दौर ऐसा आया है जबकि लिखने पर ही बहुत ध्यान नहीं दिया जाता है. जो पीढ़ी अपने अनुभवों को लेकर आई है वह भी कंप्यूटर की चपेट में आ चुकी है, नई पीढ़ी तो कम्प्यूटर पर ही पैदा हुई है. ऐसे में लिखने-लिखाने, लेखन आदि की बात उसके लिए एकदम से बेवकूफी वाली बातें हैं. इस बेवकूफी भरी बातों के बीच यदि खुद को गंवार साबित करना है तो किसी भी स्टेशनरी की दुकान पर जाकर फाउंटेन पेन माँग लीजिये. दुकान वाला ऐसे देखता है जैसे मंगल पर भेजे गए अंतरिक्ष यान पर बैठ कर कोई प्राणी धरती पर आ गया है. इसमें भी और अजूबा बनने वाली स्थिति वह होती है जबकि आप उस दुकान वाले से फाउंटेन पेन में भरने के लिए स्याही माँगिए. मंगल ग्रह से आने के बजाय वह आपको न जाने कौन से अजीब से ग्रह से आया हुआ घोषित कर दे. आज के समय में बहुतेरे लोगों के लिए, खासतौर से वे लोग जिनके लिए लिखना बहुत बड़ी मशक्कत की विषय-वस्तु है उनके लिए फाउंटेन पेन, स्याही आदि चीजें अजूबा ही हैं.


इस अजूबी दुनिया में अभी भी बहुत से प्राणी ऐसे हैं जो खुद को इस पुरातन समाज से जोड़े रखने में खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं. ऐसे लोगों के लिए लिखना आज भी एक धर्म है, एक पावन कृत्य है, उनकी पूजा है. उनके लिए कम्प्यूटर का इस्तेमाल आधुनिक जीवन-शैली के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना है मगर लिखना उनके लिए जीवन है. इस जीवन को एक-एक साँस उनके शब्दों से मिलती है. इस जीवन की धड़कन आज भी की-बोर्ड से नहीं बल्कि फाउंटेन पेन से चलती है. ऐसे लोगों के लेखन शौक की देह में रक्त का प्रवाह उसी स्याही का होता है जो कागज़ पर शब्द बनकर उतरती है. आज की उस पीढ़ी के लिए जो की-बोर्ड की दुनिया में, मोबाइल की टच स्क्रीन के संसार में खो चुकी है, ऐसे लोग भले ही अजूब हों मगर ऐसे लोगों ने ही अपनी ज़िन्दगी को असलियत में जिया है, आज भी उसी का सुख उठा रहे हैं.




पठन-पाठन करने वालों के लिए, लिखने के शौक़ीन लोगों के लिए कागज, पेन, स्याही जैसा सुख कहीं और नहीं है. उनके सामने, उनकी मेज पर भले ही उत्तम दर्जे के कम्प्यूटर, मोबाइल क्यों न मौजूद हों मगर उनके लेखन का चरम तभी पूर्ण होता है जबकि हाथ में कलम हो और हथेलियों के नीचे कागज़. स्याही की नमी में उभरते शब्दों में कोई रचना नहीं बल्कि ऐसे लोगों का जीवन उभरता है, उनके अनुभव उभरते हैं, उनकी स्मृतियाँ बिखरती हैं. इस सुख का अनुभव आज की पीढ़ी शायद ही कभी कर सके.


एक निवेदन पेन, कागज, स्याही के शौकीनों से कि वे अपने इस शौक को, अपनी इस जीवन-शैली को अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करने का प्रयास करें. इस सुख को उनकी धड़कनों में, उनकी साँसों में, उनके रक्त-प्रवाह में समाहित करने की चेष्टा करें. 


.
वंदेमातरम्

28 सितंबर 2020

नया फाउंटेन पेन मिलने की ख़ुशी बदली सजा में

हस्तलिपि की चर्चा छिड़ी तो बचपन की एक घटना याद आ गई. उस समय हम कक्षा पाँच में पढ़ते थे. एक शाम पिताजी बाजार से वापस आने के बाद अपना लिखा-पढ़ी का कोई काम कर रहे थे. हमने देखा कि पिताजी अपने जिस फाउंटेन पेन से लिखते थे, उससे न लिख कर एक नए पेन से लिख रहे हैं. मैरून रंग का वह पेन बहुत अच्छा लग रहा था. यद्यपि रंगीन पेन हमारे लिए नया नहीं था क्योंकि पिताजी जिन फाउंटेन पेन का प्रयोग करते थे, वे रंगीन बॉडी के ही थे. उन पेन को छूने की हिम्मत भी नहीं होती थी.


उस शाम पता नहीं हमें क्या हुआ, शायद मैरून रंग का ज्यादा आकर्षण रहा कि जैसे ही पिताजी ने अपना काम बंद करके पेन रखा, हमने पिताजी से पूछा कि ये पेन हम ले लें? पिताजी की अनुमति मिलते ही ख़ुशी का ठिकाना न रहा. झटपट पेन उठाया, अपनी कॉपी निकाली. कॉपी के एक पेज पर बड़ी ही फुर्ती में अपना पूरा नाम (जैसा चित्र में लाल रंग में लिखा है) लिख कर पिताजी को दिखाने पहुँच गए.




उन्होंने पूछा कि कुमारेन्द्र कैसे लिखा जाता है?


हमारी फुर्ती, पेन पाने की ख़ुशी को जैसे ग्रहण लग गया. तुरंत इतना समझ आ गया कि लिखने में कुछ गलती कर गए. कॉपी पर लिखे अपने नाम को फिर से देखा तो समझ आ गया कि द्र की मात्रा गलत लगा गए. गलती समझ आई तो तुरंत सही तरीके से कुमारेन्द्र लिख कर दिखा दिया (जैसा कि चित्र में पीले रंग में लिखा है). पिताजी ने सिर हिलाते हुए उस सही को स्वीकार किया और गलत लिखने की सजा भी सुना डाली.


अब जाओ, सौ बार कुमारेन्द्र लिखो.


नए फाउंटेन पेन से लिखने के चक्कर में सजा पहले तो सजा जैसी न लगी मगर बीस-तीस बार कुमारेन्द्र लिखने के बाद नया पेन आफत लगने लगा. फिलहाल सजा तो पूरी करनी ही थी, सो करी. आज भी बरसों बरस बीत जाने के बाद भी कहीं भी जब अपना नाम लिखते हैं तो तुरंत यह सजा, वह मैरून फाउंटेन पेन याद आ जाता है.


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

27 सितंबर 2020

प्रयास पिताजी की तरह की हस्तलिपि लेखन का

अपनी प्रशंसा सुनना किसे ख़राब लगता होगा? हमें भी नहीं लगता और खासतौर से उस प्रशंसा को अत्यंत सहज भाव से स्वीकार करते हैं जो हमारी हस्तलिपि (हैण्ड राइटिंग) को लेकर होती है. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी इस राइटिंग को सुधारने के पीछे हमारे मन्ना चाचा (श्री नरेन्द्र सिंह सेंगर) तथा पिताजी (श्री महेन्द्र सिंह सेंगर) का योगदान है.


मन्ना चाचा की बैंक में सेवाओं का बहुत सारा समय कालपी, कोंच, कानपुर में बीता. इस कारण उनका नियमित रूप से उरई आना होता था. वे हम लोगों को बॉल पेन से लिखते देख लेते तो बहुत गुस्सा होते थे. फाउंटेन पेन से लिखने की आदत उनके द्वारा ही डलवाई हुई है. हम लोगों के लिए वे सुन्दर से फाउंटेन पेन भी लाया करते थे. (पेन इकठ्ठा करने का हमें जो शौक लगा है वो भी उन्हीं की देन कहा जायेगा क्योंकि उनके पास भी बहुत बेहतरीन पेनों का संग्रह आज भी है. इसमें कुछ विदेशी पेन भी शामिल हैं)


इसके अलावा किसी अक्षर को कैसे लिखा जाएगा, इसका अभ्यास पिताजी का लिखा हुआ देख कर किया करते थे. वकालत पेशे से सम्बद्ध होने के कारण पिताजी को बहुत से कागजों को लिखना होता था. बहुत से लिखे हुए कागज़ उनके द्वारा फाड़कर रद्दी में फेंके जाते थे. हम उन्हीं फटे टुकड़ों को उठाकर चोरी-चोरी पिताजी के बनाये अक्षरों की घंटों नक़ल किया करते थे.


आज फेसबुक पर टहलते हुए एक चैलेंज (#handwritingchallenge) दिखाई दिया. हमारे अनेक मित्रों ने, जो हमारी हस्तलिपि से परिचित हैं, हमारे प्रति अपना स्नेह व्यक्त किया. अपनी हस्तलिपि के पहले आज अपने पिताजी की हस्तलिपि के कुछ हिस्से आपके सामने. हमारा आज भी प्रयास रहता है पिताजी की तरह अक्षर बनाने का मगर बचपन से लेकर अभी तक सफल नहीं हो सके. कुछ अक्षर तो बन जाते हैं मगर कुछ अक्षर हमें मुँह चिढ़ाते हुए आगे बढ़ जाते हैं.





.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

01 मई 2020

पेन की दीवानगी और नशे के चलते पेन काण्ड

जैसे कुछ लोगों को चाय का नशा होता है, किसी को शराब का, किसी को भाँग, गांजे, अफीम आदि का वैसा ही कुछ अपना हाल है. पेन को लेकर नशे जैसी स्थिति है अपनी भी. दुकान पर पहुँचे नहीं कि बस यही लगता है कि ये वाला पेन ले लो, वो वाला पेन ले लो. इस ये ले लो, वो ले लो के चक्कर में सैकड़ों की संख्या में पेन हमारे खजाने में जमा हो गए हैं. इस नशे जैसी स्थिति में भी फाउंटेन पेन के प्रति दीवानगी जैसा हाल है. अब तो पेन इतनी तरह के आ गए हैं कि खुद व्यक्ति चकरा जाये कि कौन सा लिया जाये, कौन सा छोड़ दिया जाये. 

एक वो दौर बहुत अच्छी तरह से याद है जबकि फाउंटेन पेन में रंगीन ढक्कन और ट्रांसपेरेंट टंकी वाले पेन आया करते थे, शायद ऊषा, हीरो कंपनी के. उस साधारण से पेन के दौर में पिताजी ने एक पेन लाकर दिया था, पूरा पेन डार्क मैरून रंग का था. उस समय हम कक्षा चार में पढ़ा करते थे. वह पेन अपने आपमें अजूबा सा लगता था. रंगीन पेन पहली बार नहीं देखा था, पहली बार हमारे पास आया था. रंगीन फाउंटेन पेन तो उस समय हमने पिताजी के पास देखा था हरे रंग का, कुछ डिजायन बना हुआ. उस पेन को देखकर हमारी लार टपकती रहती थी. वह पेन हमें मिला कक्षा छह में और उसके बाद वह हमारे पास रहा, अभी तक भी है.


पिताजी के ये दोनों पेन अब हमारे खजाने में, बिना कैप वाला पेन हमें मिला था कक्षा छह में 

हमारे पास सस्ते से सस्ता पेन भी है और अपनी सामर्थ्य भर का मंहगा पेन भी. पेन के प्रति लगाव या कहें दीवानगी इस कदर है कि यदि हमसे कोई पेन लेता है किसी काम के लिए तो हम उससे वापस माँग लेते हैं, बिना किसी शर्म के. सामान्य से सामान्य पेन भी यदि कभी गिर जाता है तो हमें कई-कई दिन बहुत बुरा सा एहसास होता रहता है. एक बार की बात आपको बताएँ, स्थानीय स्कूल में एक साल प्रशासनिक व्यवस्थाओं को देखने के लिए जाना हुआ. उसी वर्ष उसकी क्रिकेट टीम का कोच बनाकर हमें मैच जितवाने की जिम्मेवारी भी दे दी गई. एक दिन अभ्यास से सम्बंधित कुछ बिंदु लिखने के लिए जैसे ही जेब पर हाथ लगाया, धक्क से रह गया. पेन गायब. तुरंत अभ्यास रोककर सभी खिलाड़ी बच्चों से पेन खोजने को कहा. लगभग आधा घंटे की मेहनत के बाद हमारी वानर सेना ने पेन खोज निकाला.


कॉलेज टाइम में हमारा रहना हॉस्टल में हुआ. शरारतें, मस्ती अपने चरम पर रहती थी. कॉलेज में हमारे एक सीनियर भाईसाहब के साथ हमेशा शर्त लगी रहती थी पेन गायब करने की. किसी के जेब से गायब करना हो, किसी के कमरे से गायब करना हो यही होड़ रहती थी कि कौन पहले उस पेन को अपने जेब की शोभा बनाता है. इसी चक्कर में एक बार एक विभागाध्यक्ष तक को अपने पेन से हाथ धोना पड़ गया. वह पेन भी आज तक हमारे पास है.

कुछ फाउंटेन पेन 

आज जब पेन की बात करने बैठे हैं तो याद आ रहा है अपने स्कूल का वह समय जबकि हमें फाउंटेन पेन के अलावा किसी बॉल पेन से लिखते देख डांट पड़ जाया करती थी. ऐसे में बॉल पेन का उपयोग बहुत ही संभल कर, डरते हुए करते थे. किफायती कीमत में तब शार्प के बॉल पेन ही बहुतायत में मिला करते थे. नीला ढक्कन लगा ट्रांसपेरेंट बॉडी में. उसी में कम्फर्ट कंपनी के पेन आये जिन्होंने एकदम से सबको भौचक कर दिया. पेन में कहीं कोई ढक्कन नहीं, कहीं से खुलने की कोई जगह नहीं. समझ नहीं आता था कि इसमें रिफिल कहाँ से पड़ेगी. एक मित्र में वह पेन सबसे पहले दिखाया और हमारे पेन के शौक के चलते ये चैलेंज सा दिया कि इसमें रिफिल कहाँ से डलेगी, बताओ. खूब दिमाग लगाया मगर समझ नहीं आया. फिर हम दोनों क्लास में सबसे पीछे बैठे और कोई पन्द्रह बीस मिनट में उसकी पहेली सॉल्व कर दी. उस बॉल पेन में ऊपर वाले क्लिक बटन को खींच कर बाहर निकाल दिया जाता था और वहीं से रिफिल डाली जाती थी. 

आजकल कंप्यूटर, मोबाइल के दौर में लोगों का पेन से लिखना बंद है मगर हम आज भी लिखते हैं, वो भी फाउंटेन पेन से. इसी शौक के चलते, दीवानगी के चलते या कहें नशे के चलते किसी नई जगह जाने पर पेन जरूर खरीदते हैं. उरई में फाउंटेन पेन का मिलना न के बराबर होता है, इसके लिए ऑनलाइन खरीददारी ही सहारा है. किसी दिन आपकी अपने सभी पेन से मुलाकात करवाएंगे. अभी महज उन फाउंटेन पेन से, जिनसे आजकल हमारा लिखना हो रहा है. हाँ, आपको बताते चलें कि एक साथ करीब दस-बारह पेन हम स्याही से भरे रखते हैं. काली,नीली, हरी, लाल चारों तरह की स्याही से सजे-सजाये पेन हमारी मेज पर तैयार रहते हैं लिखने को. आप भी लिख कर देखिये, पेन से मजा आएगा.

आजकल ये फाउंटेन पेन हमसे प्रेम जता रहे हैं 


.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

13 मार्च 2019

फाउंटेन पैन ललचाता है आज भी


बहुत समय से व्यस्तता के चलते फाउंटेन पैन की साफ़-सफाई का काम रुका पड़ा हुआ था. जी हैं, फाउंटेन पैन की साफ़-सफाई. हमारे पास एक सैकड़ा के आसपास तो फाउंटेन पैन होंगे ही. यह एक ऐसा पैन होता है जिसकी निब (नोंक) नुकीली होती है. इसके अंदर स्याही के भरने के लिए जगह होती है. उपयोग के दौरान स्याही समाप्त हो जाने के बाद दोबारा स्याही भरकर उसे उपयोग में लाया जाता है. गुरुत्वाकर्षण बल के कारण स्याही नीचे निब की पिन में आती है और कागज़ पर अक्षर रूप में उतर कर रचनाओं को जन्म देती है. बहुत मँहगे पैन तो नहीं हैं मगर कई तरह के हैं और कुछ पैन तो बहुत पुराने हैं. हो सकता है कि पुराने पैन में कुछ पैन तो साठ के दशक के होंगे. ये वे पैन हैं जिनका उपयोग हमारे पिताजी किया करते थे.


फाउंटेन पैन से लिखने की आदत हमारे चाचा जी, श्री नरेन्द्र सिंह सेंगर द्वारा डलवाई गई है. हम लोगों को बचपन में यदि वे बॉल पॉइंट पैन से लिखते देख लेते तो बहुत नाराज होते थे. उनका कहना था कि फाउंटेन पैन से लिखने से राइटिंग अच्छी होती है. उनके द्वारा पैन से लिखने की जो आदत बचपने में पड़ी वो अभी तक बनी हुई है. पैन को लेकर स्थिति यह है कि एकदम लालच जैसी स्थिति है. आये दिन कोई न कोई पैन खरीदा ही जाता है, बस इसके लिए एक मौका चाहिए होता है, बहाने के रूप में. कभी अपने जन्मदिन पर, कभी अपने परिजनों के जन्मदिन पर, कभी किसी ख़ुशी के मौके पर, कभी किसी त्यौहार पर. इसी लालच में कई बार एक पैन दो-दो बार खरीद लिया जाता है. अपने सभी पैन की देखभाल भी हम बहुत ध्यान से करते हैं. सस्ते से सस्ता पैन भी हम कभी बर्बाद न होने देने हैं. सबका बड़ा ख्याल रखते हुए संभाल कर रखते हैं. ये लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है कि हम आज भी फाउंटेन पैन से लिखते हैं. हमारे कई मिलने वाले, कई अनजान, अपरिचित मुलाकाती करने वाले, मित्र, कॉलेज के सहयोगी, विद्यार्थी भी आश्चर्यचकित रहते हैं.  


बहरहाल, पैन साफ़-सफाई के बाद यथास्थान पहुँच गए तो सोचा कि कुछ लिखा-सुना जाये. आज के समय में जैसी कमी फाउंटेन पैन से लिखने वालों की दिख रही है वैसी ही कमी इंटरनेट पर फाउंटेन पैन से सम्बंधित जानकारी/सामग्री की दिख रही है. हिन्दी में तो कहीं जानकारी मिली ही नहीं, एक-दो जगह अंग्रेजी में अवश्य कुछ देखने को मिला है. ये भी हो सकता है कि हमारी पहुँच में जानकारी न आ रही हो, तो ऐसे में यदि आपमें से किसी के पास यदि फाउंटेन पैन से सम्बंधित जानकारी-सामग्री हो तो हमें अवश्य भेजिएगा. 

हम सभी जानते हैं कि फाउंटेन पैन का आविष्कार लेविस वाटरमैन ने 1884 में USA में किया था. उन्होंने लकड़ी को छील कर उसका निब और अंगूर के रस से स्याही बनाई. इन दोनों की सहायता से उनके द्वारा फाउंटेन पैन का जन्म हुआ. इसके बाद भी यदि देखा जाये तो समाज में मानवीय संरचना होने के काफी सालों बाद पैन जैसी चीज़ का आविष्कार भले हुआ हो मगर लेखन सम्बन्धी कार्य के लिए कोई न कोई सामग्री लगभग 24000 साल पहले ही तैयार कर ली गई थी. तत्कालीन मानव समाज द्वारा रेखाचित्र बनाने के लिए, साज-सज्जा करने के लिए पत्थर, लकड़ी आदि से इस तरह की वस्तु निर्मित कर ली गई थी. उनके द्वारा अपनी खेती, फसल, शिकार किए गए जानवरों आदि के चित्र दीवार पर बनाने के लिए पत्थर से बने औजार का प्रयोग किया गया. बाद में मिस्र के लोगों ने पेड़-पौधे का उपयोग करके कागज बनाया गया और उस पर लिखने के लिए बांस द्वारा निर्मित पैन बनाया गया. कई सालों तक इसी तरह के पैन उपयोग में लाये जाते रहे. इसके बाद अलग अलग तरीकों से पैन बनाने के लिए लिए बहुत से लोग इस काम में लग गए लेकिन हर पैन में कोई न कोई कमी बनी रही. 


M. Klein and Henry W. Wynne received U.S. Patent 68,445 in 1867 for an ink chamber and delivery system in the handle of the fountain pen

लगातार होते रहे विकासपरक आविष्कारों के बाद फाउंटेन पैन का सफल आविष्कार सामने आया. यद्यपि स्याही के देर से सूखने, हाथों के स्याही से गंदे होने, पैन की स्याही बह जाने से कपड़ों के ख़राब होने सम्बन्धी दिक्कतें लगातार बनी रहीं. इसके बाद भी फाउंटेन पैन से लेखन-कार्य अनवरत चलता रहा. इसकी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए कालांतर में बॉल पैन का आविष्कार हुआ और 1938 में बॉल पैन का पहला पैटेंट Laszlo Biro को मिला. आज अनेक तरह के रंग-बिरंगे और आकर्षक बॉल पैन बाज़ार में उपलब्ध हैं. नई पीढ़ी के लेखन का यह महत्त्वपूर्ण अस्त्र बना हुआ है, इसके बाद भी फाउंटेन पैन के शौक़ीन आज भी हैं जो अपने संग्रह में लगातार फाउंटेन पैन एकत्र करते जा रहे हैं.