बयान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बयान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

10 मार्च 2026

अमेरिका का बड़बोलापन

पिछले दिनों अमेरिका की वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के एक बयान के बाद भारतीय समाज में हलचल सी मच गई. इसमें न केवल राजनीति बल्कि बौद्धिक वर्ग, मीडिया, सोशल मीडिया, आमजनमानस चर्चा में शामिल हुआ. इस चर्चा में केन्द्र सरकार को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जाने लगा. ईरान के साथ चल रहे अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच अमेरिकी वित्त मंत्री ने बयान जारी करते हुए कहा कि उन्होंने भारत को तीस दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की अनुमति दी है. इस बयान के आते ही देश में केन्द्र सरकार को कमजोर बताया जाने लगा. विपक्षी दलों द्वारा पहले से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सरेंडर नरेंदर का नारा उछाला जा रहा था, इस बयान से इस नारे को और हवा मिली.

 

यहाँ एक बात समझने वाली है कि राजनीतिज्ञों का कार्य हमेशा से किसी भी तरह के बयानों को, कार्यों को, आँकड़ों को, जानकारियों को अपने मनमुताबिक तोड़-मरोड़ करके उसे जनता के बीच अपने लाभ के सन्दर्भ में उछालना रहा है. इस स्थिति से परिचित होने के बाद भी बौद्धिक वर्ग से जुड़े हुए लोगों द्वारा, मीडिया से जुड़े संस्थानों, व्यक्तियों ने, सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने बिना जाने-समझे, बिना जाँचे-परखे अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान पर सरकार को दोषी ठहराना शुरू कर दिया. अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान को परमसत्य मानने से पहले उसके मूल में छिपे सन्दर्भ को भी समझ लिया होता तो शायद सच्चाई समझ आती. उनके इस बयान के पीछे कुछ समय पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर टैरिफ का लगाया जाना मुख्य बिन्दु रहा. दरअसल ट्रम्प ने भारत पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था, जो समूचे देशों पर लगाये गए टैरिफ से कहीं ज्यादा था. इसके लगाये जाने की जो वजह अमेरिका द्वारा बताई गई थी, उसने अमेरिकी वित्त मंत्री के हालिया बयान को मजबूती प्रदान की. गत वर्ष अगस्त माह में अमेरिका द्वारा भारत पर ज्यादा टैरिफ लगाए जाने का कारण रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से तेल लेना बताया गया. अमेरिका का मानना है कि ऐसा करके भारत रूस की आर्थिक मदद कर रहा है.

 

ऐसे में एकबारगी अमेरिका के बयानों पर ध्यान देने के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में उनके द्वारा दिए जा रहे बयानों, उनके कार्यों का आकलन ही कर लिया जाता तो भी भारत को रूस से तेल लेने के लिए तीस दिनों की अनुमति दिए जाने के सन्दर्भ में स्थिति स्पष्ट हो जाती. ऑपरेशन सिन्दूर के समय में भी ट्रम्प के बयानों में बार-बार जोर दिया जाता रहा कि उनकी कोशिशों से ही युद्ध रुका. इस तरह की बयानबाजी के बाद देश की केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया. किसी आधिकारिक साईट पर जाकर सच देखने का प्रयास नहीं किया गया. ट्रम्प के ऐसे बयानों के बाद भी हमारे देश के अनेक सैन्य अधिकारियों, विशेषज्ञों के लगातार बयान आते रहे कि परमाणु हथियारों से सम्बंधित सुरक्षा को देखते हुए भारत द्वारा युद्ध-विराम जैसा कदम उठाया गया, न कि अमेरिका के दबाव में.

 

इन बयानों की सत्यता उस समय और पुख्ता होती है जबकि स्टेट ऑफ द यूनियन के सम्बोधन में ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को रोककर तीन करोड़ से अधिक लोगों की जान बचाई थी. उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा था कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 3.5 करोड़ लोग मारे जाते. ट्रम्प ने अकेले ऑपरेशन सिन्दूर को रुकवाने की बात नहीं की बल्कि उनके द्वारा आठ युद्ध रुकवाने का भी दावा किया गया. देश के तमाम बयानवीर अभी ट्रम्प द्वारा तेल लेने की अनुमति सम्बन्धी कथित बयान पर अटके हुए हैं, उधर ट्रम्प ने अपने बड़बोलेपन में एक और विवादित बयान मीडिया के सामने सरका दिया. उन्होंने कहा कि उनके सैन्य अधिकारियों को ईरान के जहाजों को डुबोने में मजा आ रहा है. सोचा जा सकता है कि ट्रम्प किस हद तक अमानवीय होकर अपने बयानों को, अपने क़दमों को उठा रहे हैं.

 

ट्रम्प के ऐसे बयान उनको शांति का नोबेल पुरस्कार न मिल पाने की हताशा है. युद्ध उनके द्वारा महज अपनी हताशा को छिपाने और खुद को सर्वशक्तिशाली दिखाने के लिए किये जा रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन का भले ही साथ देना रहा हो मगर कूटनीतिज्ञ रूप से जेलेंस्की के साथ अमेरिका में किया गया बर्ताव उनकी अगम्भीरता को दर्शाता है. अब जबकि रूस से तेल लेने को अमेरिका द्वारा कथित अनुमति की चर्चा चरम पर है, उसी समय अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट बयान देते हैं कि पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव को देखते हुए वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने हेतु अमेरिका ने भारत से रूस से तेल खरीदने का आग्रह किया था. सीएनएन को दिए गए साक्षात्कार में ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ मिलकर भारतीय अधिकारियों से बातचीत कर समुद्र में पहले से उपस्थित रूसी कार्गो को भारतीय रिफाइनरियों में उतार लेने का आग्रह किया.

 

सोचने वाली बात है कि जो अमेरिका दो-चार दिन पहले भारत को अनुमति देने जैसी शब्दावली का प्रयोग कर रहा था, वही अब आग्रह जैसी भाषा बोल रहा है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने दूसरे कार्यकाल में बड़बोलेपन का ही उदाहरण पेश किया है, वो चाहे वैश्विक युद्ध रुकवाने की बात हो, नोबेल शांति पुरस्कार हो, टैरिफ हो या कि अब तेल खरीदने वाली बात हो. ऐसा लगता है कि ट्रम्प भली-भांति समझ चुके हैं कि भारत का विपक्ष इस स्थिति में है कि वह किसी भी छोटी से छोटी बात, झूठी बात के लिए केन्द्र सरकार का विरोध व्यापक स्तर पर करना शुरू कर देता है. इस मानसिकता को समझते हुए भारत को तेल खरीदे जाने की अनुमति देने जैसा बयान दिया. ये और बात है कि मुँह की खाने के बाद अमेरिका को अपने बयान से उलटना पड़ा. काश! ये बात भारतीय विपक्षी दल समझ पाता. 


05 अगस्त 2025

फटकार के बाद भी नहीं रुकेंगे विवादित बोल

सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को उनकी टिप्पणी के लिए फटकार लगाई है. राहुल गांधी द्वारा भारत-चीन सेनाओं के बीच हुई झड़प को लेकर टिप्पणी की गई थी कि चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों को पीट रहे हैं. इस बयान पर बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक उदय शंकर श्रीवास्तव ने राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस दर्ज करवाया था. इस मामले में हो रही सुनवाई पर न्यायालय ने कहा कि एक भारतीय विश्व में सबसे वीर भारतीय सेना के विषय में ऐसा कैसे कह सकता है कि वो चीन से पिट रही है. राहुल गांधी के साथ इस तरह की घटना तीसरी बार हुई है जबकि उनको न्यायालय से फटकार मिली है. चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों को पीट रहे हैं के बयान के साथ-साथ उनको इस बात के लिए भी फटकारा गया है कि चीन ने भारत की दो हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर रखा है. इस बयान पर अदालत ने उनसे सवाल किया कि आखिर उन्हें यह कैसे पता चला कि चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है?

 

राहुल गांधी के द्वारा इस तरह का विवादित बयान पहली बार नहीं दिया गया है. पिछली लम्बी समयावधि में उनके द्वारा दिए गए अनेकानेक बयानों को देखकर लगता है कि इस तरह की बयानबाज़ी करना जैसे उनकी आदत बन चुका है. स्मरण रहे कि इससे पहले एक मामले में उनको सजा भी सुनाई गई थी जिसके चलते राहुल गांधी को लोकसभा की सदस्यता भी गँवानी पड़ी थी. राहुल गांधी ने अप्रैल 2019 कर्नाटक में एक चुनावी रैली में कहा था कि ललित मोदी, नीरव मोदी, नरेन्द्र मोदी का सरनेम कॉमन क्यों है? सारे चोरों का सरनेम मोदी क्यों होता है? इस बयान पर समूचे मोदी समुदाय को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ भाजपा नेता पूर्णेश मोदी ने आपराधिक मानहानि का केस दर्ज कराया था. इसी मामले में राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई गई थी, जिसके चलते उनको लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी थी. इसी तरह नवम्बर 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान इस बयान पर कि सावरकर ने अंग्रेजों को माफीनामा लिखकर महात्‍मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को धोखा दिया था, राहुल गांधी को वीर सावरकर के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजी करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की फटकार सुननी पड़ी थी.

 



अपनी बयानबाज़ी के कारण, विवादित बोलों के कारण राहुल गांधी को लगातार न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, सर्वोच्च न्यायालय से डाँट भी खानी पड़ रही है, इसके बाद भी उनके विवादित बयान देने सम्बन्धी आदत में किसी तरह की कमी नहीं आई है. राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में कथित दलाली को लेकर की गई गलतबयानी के कारण उनको सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर माफी माँगनी पड़ी थी. राहुल गांधी को समझना चाहिए कि वे वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और ऐसे में उनका दायित्व बनता है कि वे जनहित मामलों पर, सरकार की गलत नीतियों पर अपनी बात को संसद में खुलकर रखें. बजाय ऐसा करने के उनके द्वारा कभी संसद के भीतर, कभी संसद के बाहर तो कभी सोशल मीडिया पर अनावश्यक टिप्पणी की जाती है. उनके ऐसा करने में वे दलगत विचारधारा का विरोध करते-करते देश का विरोध करने लगते हैं. अपनी इस बयानबाज़ी में वे सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ खुलकर बोलने की बजाय प्रधानमंत्री के लिए भद्दी, अपमानजनक भाषा-शैली का प्रयोग करने लगते हैं.

 

भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस और उसके वरिष्ठ नेताओं द्वारा राहुल गांधी को एक परिपक्व नेता के रूप में, जिम्मेदार पदाधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित किया जाने लगा था. इसके पीछे की रणनीति उनको प्रधानमंत्री पद के लिए स्वीकार्य बनाना, नरेन्द्र मोदी के सापेक्ष स्थापित करना रहा है. उनके विवादित बयानों के बाद दर्ज मामलों, न्यायालयों के रुख, सर्वोच्च न्यायालय की फटकारों के शुरूआती मामलों के बाद ऐसा समझा गया था कि राहुल गांधी अब सँभलकर बयानबाज़ी करेंगे मगर उनके विवादित बोलों को देखकर लगता है कि उन पर अदालतों के बर्ताव का कोई असर नहीं हुआ है. ऐसी स्थिति में अब यह सम्भावना कम ही है कि सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान फटकार के बाद राहुल गांधी भविष्य में राष्ट्रीय हितों पर बात करना पसंद करेंगे, विवादित बोलों से बचने की कोशिश करेंगे. ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि विगत कई वर्षों के उनके व्यवहार, बर्ताव, भाषा-शैली को देखकर लगता है कि वे अभी भी राजशाही मानसिकता से ग्रसित हैं. उनके द्वारा भले ही अपने भाषण में कहा गया हो कि वे राजा नहीं बनना चाहते, इस तरह की शब्दावली को पसंद नहीं करते मगर उनकी भाषा-शैली, हाव-भाव, बयानबाज़ी किसी भी रूप में राजशाही अंदाज से कम नहीं.

 

पाकिस्तान और चीन को पसंद आने वाले बयान देना, ऑपरेशन सिन्दूर पर सवाल उठाना, डोकलाम विवाद के समय चीनी राजदूत से मिलना, ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीय लोकतंत्र का अनादर करना, लोकसभा में चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए उसे धमकी देना, अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों का समर्थन करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बताना आदि ऐसे मामले हैं जो राहुल गांधी के बयानों की दशा-दिशा निर्धारित करते हैं. अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद प्रियंका गांधी सहित उनके अनेक समर्थकों द्वारा न्यायालय की टिप्पणी को निशाना बनाया जा रहा है तब लगता नहीं कि राहुल गांधी के बर्ताव, विशेष रूप से उनकी भाषा-शैली में किसी तरह का बदलाव होगा. संभवतः उन्होंने अपना मन बना रखा है कि वे राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध, प्रधानमंत्री के विरुद्ध विवादित बयानबाज़ी करते ही रहेंगे, इसके लिए भले ही उन पर कानूनी कार्यवाही होती रहे, भले ही न्यायालय से फटकार लगती रहे.

 


24 सितंबर 2017

निम्नतर मानसिकता का विरोध

एक पत्रकार की हत्या होती है और देश भर में एकदम से आक्रोश दिखाई देने लगता है. लोग सड़कों पर उतर आते हैं. चौराहों पर मोमबत्तियाँ जलाई जाने लगती हैं. बड़े-बड़े चैनल, नामधारी पत्रकार संगठित होने लगते हैं, प्रमुख राजनैतिक व्यक्तित्व अपना निर्णय सा सुनाने लगते हैं. बहुतेरे लोग इस हत्या को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताते हैं. कुछ लोगों के लिए यह लोकतंत्र की हत्या कही जाने लगती है. यह सब देख सुनकर लगने लगता है कि क्या देश में वाकई लोकतान्त्रिक व्यवस्था शेष रही भी है या नहीं? इन सबका विलाप सुनकर मन द्रवित हो उठता है और एहसास होने लगता है कि वाकई देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी है ही नहीं. यहाँ बोली का जवाब गोली से दिया जाने लगा है. अभी इस तरह के अनजाने डर से खुद को बाहर निकाल भी न पाए थे कि एक और पत्रकार की हत्या हो जाती है. अबकी मारे जाने वाला पत्रकार अपने पीछे किसी तरह का हंगामा नहीं खड़ा कर पाता है. कोई बड़ा राजनैतिक व्यक्ति उसके समर्थन में आकर बयान नहीं देता है. किसी मीडिया संस्थान की तरफ से कोई प्रदर्शन नहीं किया जाता है. चौराहों पर इकट्ठा होकर नारेबाजी करने, मोमबत्तियाँ जलाने वाले कहीं गायब नजर आते हैं. देश से और न ही विदेश से कोई आवाज़ उठती है कि अब भी देश में बोली का जवाब गोली से दिया जा रहा है. दिमाग भन्ना जाता है कि आखिर हम सब किस युग में जी रहे हैं? क्या हम सबकी इंसानियत महज राजनैतिक विचारधाराओं में ही सिमट कर रह गई है?


मन-मष्तिष्क में उठते अनेक तरह के सवालों के बीच जब दोनों घटनाओं का और अतीत में घटित कई-कई घटनाओं का आकलन करते हैं तो पता चलता है कि विरोध की राजनीति ने, भाजपा-विरोध की राजनीति ने सभी तरह की मानवता का ह्रास कर दिया है. इस विरोध की राजनीति में किसी समय देश की राजनीति का मुख्य केंद्रबिन्दु रहा राजनैतिक दल और उसके तमाम पदाधिकारी हैं. उनका संगठित स्वरूप सिर्फ और सिर्फ भाजपा को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना है, उनका विरोध करना है. उनके साथ इस खेल में वे वामपंथी ताकतें भी शामिल हैं जो विगत कई दशकों के बाद भी जनमानस के बीच अपनी स्वीकार्यता नहीं बना सकी हैं. इन विरोधी शक्तियों को और ताकतवर बनाने का काम कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियों द्वारा भी किया जा रहा है. इन सबका आंतरिक उद्देश्य किसी न किसी तरह केंद्र सरकार को, भाजपा को, नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना है, उनका विरोध करना है. यदि ऐसा न होता तो गौरी लंकेश हत्या के मामले में चंद मिनट बाद ही आरोप न लगाया जाता कि इस हत्या में हिन्दुवादी ताकतों का, संघ का हाथ है. बिना आगापीछा सोचे तमाम बड़े मीडिया संस्थानों द्वारा, मीडिया के बड़े नामों द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाने लगा. देश को अलोकतांत्रिक बताया जाने लगा. यदि इन लोगों को वाकई देश की चिंता होती, यदि इन लोगों को वाकई देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की चिंता होती, यदि इन लोगों को वाकई अभिव्यक्ति की आज़ादी की चिंता होती तो इनके वही विरोधी मुखर स्वर शांतनु चौधरी की हत्या के बाद भी उभरने चाहिए थे. चिंता की बात तो ये रही कि इस युवा पत्रकार की हत्या पर ऐसा कुछ न हुआ. किसी भी गैर भाजपाई राजनैतिक दल की तरफ से, किसी भी मीडिया संस्थान की तरफ से इस युवा पत्रकार की हत्या पर दो शब्द भी नहीं कहे जा सके.

असल में आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस हो या फिर अस्तित्व की खोज में लगी अनेक कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियां हों, सबका एकमात्र उद्देश बजाय अपने को स्थापित करने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करना है. इसी के चलते उनके द्वारा अकसर भाषाई संयम खो दिया जाता है. इस भाषाई संयम खोने का उदाहरण कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और कभी मंत्री रहे मनीष तिवारी के रूप में देखा जा सकता है. देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का चौथा स्तम्भ मानने वाले पत्रकार भी इस भाषाई संयम को खोने में पीछे नहीं दिखे. ये सारे लोग किसी भी रूप में इस बात को आज भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि भाजपा केंद्र में सत्तासीन होने के साथ-साथ अनेक राज्यों में अपनी सत्ता जमा चुकी है. वे सब ये भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि जिस नरेन्द्र मोदी के पीछे सभी साजिशन विगत एक-डेढ़ दशक से पड़े हुए थे, उस व्यक्ति को किसी भी मामले में दोषी सिद्ध न कर सके. उनको ये स्वीकार नहीं हो पा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने न केवल निर्विवाद रूप से सत्ता प्राप्त की वरन लगातार अपनी छवि को भी परिष्कृत किया है. जिस तरह की वोट-बैंक की राजनीति विगत कई दशकों से देश की धुरी बनी हुई थी, मोदी ने उसे दरकिनार करते हुए विकासपरक राजनीति को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया. गैर-भाजपाई मानसिकता वाले दलों, व्यक्तियों, मीडिया संस्थाओं के लिए ये स्वीकार कर पाना अत्यंत दुष्कर होता जा रहा है कि देश के आम जनमानस ने प्रधानमंत्री की अनेक योजनाओं में न केवल उनका समर्थन किया वरन एकाधिक बार उन कठिन परिस्थितियों में भी उनका समर्थन किया जबकि लगने लगा था कि जनमानस विरोध करेगा.


देश के सामने कांग्रेस अथवा अन्य दूसरे दल अपनी मानसिकता के चलते, हिन्दू-विरोधी रवैये के कारण विश्वास जगा नहीं सके. इसी के साथ-साथ समय-समय पर उनके द्वारा उठाये गए पूर्वाग्रही कदमों ने भी जनमानस के मन-मष्तिष्क से इन दलों के प्रति, व्यक्तियों के प्रति विरोधी वातावरण तैयार किया. इस वातावरण को और पुख्ता करने का काम इन्हीं दलों, व्यक्तियों ने समय-समय पर किया. अशालीन, अशिष्ट बयानबाज़ी के चलते भी ये लोग अनजाने ही नरेन्द्र मोदी के पक्ष में, भाजपा के पक्ष में माहौल बनाते नजर आये. कुछ ऐसा ही अब रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में दिख रहा है. समझने वाली बात है कि आखिर किसी देश से उनको क्यों भगाया जा रहा है? उनके उस सम्बंधित देश से भागने या भगाए जाने का कारण क्या है? उनको देश में शरण देने के क्या औचित्य हैं? बिना सोचे-समझे सिर्फ मुसलमान होने के नाते रोहिंग्या लोग देश में शरणार्थी नहीं बनाये जाने चाहिए. एक सवाल उनका समर्थन करने वालों से कि आखिर यदि उनके प्रति मानवाधिकार का मुद्दा नजर आ रहा है, संवेदना दिखाई दे रही है तो ऐसा कुछ कश्मीरी हिन्दुओं के पलायन करते समय क्यों नहीं दिखा? तब न सही तो अब क्यों नहीं दिख रहा है? आखिर वे तो किसी दूसरे देश के नहीं, इसी देश के नागरिक हैं, जिस देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को सही करने का स्वयंभू ठेका ये राजनेता, मीडिया संस्थान लेते नजर आते हैं. 

++
उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, 23 सितम्बर 2017 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

28 मार्च 2017

सोच यही है कि तुम अक्षम हो

गत वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा मन की बात में विकलांगजनों के लिए दिव्यांगजन शब्द प्रयोग में लाने की बात कही गई थी. इसके समर्थन में बहुतायत लोग आये थे साथ ही साथ इसके विरोध में भी कई जगह से आवाजें उठी थी. हमने भी व्यक्तिगत रूप से पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री जी से निवेदन किया था कि अच्छी सोच और सार्थक मानसिकता के परिणामस्वरूप वे ऐसा विचार लाये किन्तु यदि दिव्यांग शब्द बदलने के साथ-साथ वे मानसिकता बदलाव का भी आहवान कर दें तो शायद कुछ और भला हो जाये. बहरहाल वे लगातार अपने कार्यों से नए-नए बदलावों का संकेत दे रहे हैं किन्तु उनके कार्यों से लोगों की मानसिकता में बदलाव आता दिख नहीं रहा है. उनके स्वच्छता अभियान को पूर्वाग्रह से देखते हुए विरोध भी किया गया. इसको स्वीकारते हुए कि सफाई सभी के लिए अत्यावश्यक है, अनिवार्य है लोगों का गंदगी करना लगातार जारी है. बदलाव की बयार तभी अपना असर दिखाती है जबकि उसके साथ मानसिकता में परिवर्तन आये. कुछ ऐसा ही दिव्यांग शब्द को लेकर सामने आया. प्रधानमंत्री जी के आहवान पर मीडिया ने, विभागों ने, सरकारों ने, प्रशासन ने विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. मंत्रालयों में भी दिव्यांगजन का इस्तेमाल किया जाने लगा किन्तु मानसिकता में परिवर्तन तनिक भी न दिखाई दिया.


वैसे समाज में आये दिन शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को अलग-अलग तरह से अलग-अलग अनुभवों से गुजरना पड़ता है. कहीं उनके साथ दयाभाव जैसा बोध कराया जाता है तो कहीं उन पर एहसान किये जाने जैसी मानसिकता दिखाई देती है. इसके साथ-साथ कहीं-कहीं वे दुर्व्यवहार का शिकार भी बनते हैं. शाब्दिक रूप से हिंसा का शिकार होने के साथ-साथ वे शारीरिक हिंसा, मानसिक हिंसा का शिकार भी बनते दिख जाते हैं. इसमें कहीं से वे लोग भी पीछे नहीं हैं जो शिक्षित हैं, रोजगार में हैं, व्यवसाय में हैं. ऐसे लोग भी अपनी शारीरिक अक्षमता के चलते आये दिन भेदभाव का, नकारात्मकता का शिकार बनते हैं. समाज के रोज के ऐसे कई-कई उदाहरणों से इतर अभी हाल में ही केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान का बयान न केवल निंदनीय है बल्कि शर्मनाक भी है. उनका ये कहना कि सौ लंगड़े मिलकर भी एक पहलवान नहीं बन सकते, को वे भले ही कहावत का नाम देकर विकलांगजनों (प्रधानमंत्री के शब्दों में दिव्यांगजनों) के अपमान को कम नहीं करता है. संभव है कि ऐसे बयान के पीछे उनकी मानसिकता दिव्यांगजनों का अपमान करना अथवा तिरस्कार करने की न रही हो किन्तु ये तो स्पष्ट है कि उनकी मानसिकता में दिव्यांगजन नकारात्मक भाव लिए हुए हैं. यदि ऐसा न होता तो क्या वे ऐसा बयान देते?

देखा जाये तो रामविलास पासवान कोई साधारण अथवा सामान्यजन नहीं हैं. वे विगत कई बार के सांसद रहने के साथ-साथ विगत कई सरकारों में केन्द्रीय मंत्री के रूप में भी कार्य कर चुके हैं. विगत सरकारों की विकलांगजनों के लिए क्या भूमिका रही हो इससे अब कोई फर्क नहीं पड़ता. अब तो वे वर्तमान केंद्र सरकार में भी मंत्री हैं और सहजता से समझ रहे हैं कि विकलांगों अथवा दिव्यांगों के लिए उनकी सरकार की, उनके प्रधानमंत्री की प्राथमिकतायें क्या हैं. ऐसे में उनके द्वारा ऐसा बयान दिया जाना सिर्फ और सिर्फ उनकी मानसिकता का सूचक है. यदि दिव्यांगों के प्रति उनकी सोच सकारात्मक होती तो वे ऐसा बयान कदापि नहीं देते. उनकी सोच समकक्षों के लिए सही है, उनके प्रति सकारात्मक है तभी उन्होंने गठबंधन पर तंज कसते हुए किसी नेता का नाम नहीं लिया, किसी दल का नाम नहीं लिया. आखिर जब वे सौ लँगड़े कहकर अनजाने ही दिव्यांगजनों का मजाक बना रहे थे, तब वे उसी जगह सौ लालू, सौ राहुल, सौ अखिलेश, सौ नीतीश जैसा भी कुछ कह सकते थे. मगर ऐसा उनके द्वारा नहीं कहा गया क्योंकि उनकी सोच में वर्षों से एक ही भाव गहरे तक भरा बैठा है कि लँगड़े लोग कुछ नहीं कर सकते.


विकलांग की जगह दिव्यांग करने से बेहतर होता कि इसी मानसिकता को बदला जाता. जिसने समाज के बहुतायत वर्गों में गहराई से इस बात को बैठा दिया है कि शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता है. समाज से ऐसे उदाहरणों को सामने लाने का काम सरकार को, समाजसेवियों को, शिक्षण संस्थानों को, प्रदेश सरकारों को, जिला प्रशासन को, मीडिया को करना होगा, जिन्होंने अपनी शारीरिक कठिनाई पर विजय प्राप्त करते हुए नए-नए आयाम स्थापित किये हैं. आवश्यक नहीं कि सभी लोग मंत्री बनें, गोल्ड मैडल लायें, पर्वतों की ऊँचाई नापें. एक ऐसा व्यक्ति जो कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दूसरे आम व्यक्तियों से शारीरिक रूप से भिन्न है यदि वो अपनी इसी कठिनाई पर विजय पाते हुए, अपनी मानसिकता को सशक्त बनाकर, आत्मविश्वास को प्रबल बनाकर दो-चार कदम भी आगे बढ़ता है तो वही समाज के लिए अनुकरणीय होना चाहिए. काश! केन्द्रीय मंत्री महोदय पासवान के बयान से सबक लेते हुए समाज के समूचे अंग जागने का काम करें, जिससे आने वाले समय में दिव्यांगजनों के लिए दिमाग में बसी नकारात्मक भावना दूर हो सके. 

25 अगस्त 2016

मीडिया का राजनैतिक रूप

राष्ट्रवाद, राष्ट्रप्रेम को लेकर वर्तमान में देश में एक अजब सा माहौल बना हुआ है. भाजपा सरकार के पक्षकार और विपक्षी दोनों तरफ से ऐसे विषयों पर अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किये जा रहे हैं. इन बयानों, तर्कों को कसौटी पर कसे बिना, उनकी सत्यता को जाँचे बिना मीडिया द्वारा आग में घी डालने का काम किया जा रहा है. राष्ट्रवाद के पक्ष में अथवा विपक्ष में किसी भी तरह का बयान आने के बाद कतिपय मीडिया मंचों द्वारा अपनी टीआरपी को ध्यान में रखा जाने लगता है. स्वार्थमयी सोच के आगे ये विचार करना बंद कर दिया जाता है कि उनके इस तरह के प्रसारण से देश को किस तरह का नुकसान होने का अंदेशा है. विगत दो वर्षों से, जबसे कि केंद्र में भाजपा सरकार का आना हुआ है, मीडिया द्वारा, गैर-भाजपाइयों द्वारा ऐसे कृत्य कुछ अधिक ही होने लगे हैं. ऐसा माहौल बनाया जाने लगा है कि जो हो रहा है वो बस अभी ही हुआ है, न इससे पहले कभी ऐसा हुआ है और न कभी इसके बाद होगा. यदि इसके बाद होने की आशंका है और ये भाजपा के कार्यकाल में हुआ तो और भी भयानक होगा, इस तरह के प्रसारण से देशहित को ही नुकसान हुआ है.

विगत की आपत्तिजनक बातों को पुनः दोहराने का कोई लाभ नहीं. इसके उलट यदि वर्तमान की कुछ घटनाओं का संज्ञान लिया जाये तो भी स्थिति वहीं की वहीं दिख रही है. एक अभिनेत्री का बयान आया कि पाकिस्तान में सबकुछ नरक नहीं है और बस बवेला शुरू. पक्ष-विपक्ष अपने-पाने हथियार लेकर मैदान में उतर आये. बिना ये जाने-सोचे समझे कि उसने वाकई क्या कहा, क्या कहना चाहा. इसी तरह संघ प्रमुख का बयान आया कि किस कानून ने हिन्दुओं को अधिक बच्चे पैदा करने से रोका है, बस हो-हल्ला आरम्भ. मीडिया ने, गैर-भाजपाई मानसिकता वालों ने इसे ऐसे प्रसारित किया कि संघ प्रमुख ने हिन्दुओं से अधिक बच्चे पैदा करने को कहा है. ये कोई एकमात्र अथवा नया उदाहरण नहीं है किसी भी बयान पर मीडिया का दोहरा रवैया अपना लेना. देखने में आ रहा है कि मीडिया परिवार इस समय मीडिया से ज्यादा राजनीति सी करने में लगे हैं. अपने आपको एक राजनैतिक दल की तरह से प्रस्तुत कर रहे हैं. केंद्र की भाजपा सरकार के सामने विपक्ष की भांति खड़े हुए हैं. खड़े भी होना चाहिए, आखिर मीडिया ने, पत्रकारिता ने स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ घोषित किया है. इसके बाद भी उसके द्वारा पूर्वाग्रह से ग्रसित पत्रकारिता देखने को मिल रही है. अभी हाल ही में भाजपा के एक नेता जी के बयान पर हो-हल्ला हुआ. एक दलित महिला के अपमान की बात उठी, उन पर आरोप तय किये गए, जेल भेजा गया, जमानत हुई और इन सबमें मीडिया ने बड़ी तन्मयतापूर्ण भूमिका का निर्वहन किया. अब जबकि मामला शांत है, उसी मीडिया ने जरा भी नहीं सोचा कि जिस बयान के द्वारा इतना हो-हल्ला मचा उसी बयान में बसपा की मुखिया पर टिकट बेचने का आरोप लगाया गया था. क्या मीडिया की जिम्मेवारी नहीं बनती थी कि वो इस आरोप के सम्बन्ध में भी तन्मयता दिखाती, तत्परता दिखाती?


देश भर में मीडिया द्वारा, गैर-भाजपाई दलों द्वारा इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है कि भाजपा के द्वारा सिर्फ और सिर्फ गलत ही किया जा रहा है. हाल ही में अभिनेत्री के बयान को तवज्जो देने वाली मीडिया, संघ प्रमुख के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाली मीडिया जेएनयू के बलात्कारी छात्र नेता वाले प्रकरण पर खामोश रही. किसी राजनैतिक दल की तरफ से कोई बयान नहीं आया. किसी मीडिया मंच ने इस पर आन्दोलन सा खड़ा नहीं किया. जबकि यही मीडिया, यही राजनैतिक दल कश्मीर के आतंकवादी के मारे जाने पर हुए उपद्रव को ऐसे तूल देने में लगे हैं जैसे देश में एकमात्र मुद्दा यही है. मीडिया को तथा राजनैतिक दलों को समझना होगा कि अनर्गल प्रसारण से वे भाजपा का नहीं देश का नुकसान कर रहे हैं. देशवासियों को खतरे में डाल रहे हैं. 

21 अप्रैल 2016

बोल न ऐसे बोल

प्रदेश के संवैधानिक पद पर बैठे माननीय कहना क्या चाहते थे? लोगों को समझाना क्या चाहते थे? अपने ही कार्यकर्ताओं को क्या सन्देश देना चाहते थे? सपा का झंडा लगाकर लडकियाँ न छेड़ें. समझ से परे है ये बयान, जो कि एक मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया. उत्तर प्रदेश वर्तमान में चुनावी वर्ष में प्रवेश कर चुका है. ऐसे में तमाम सारे राजनैतिक दलों की कोशिश जनता के साथ अधिक से अधिक संपर्क साधने की रहती है. इसमें भी सत्ता पक्ष अपने आपको जनता का सबसे बड़ा हितैषी सिद्ध करने का प्रयास करता है. ऐसा ही कुछ सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी द्वारा प्रदेश में किया जा रहा है. विगत चार वर्षों के इस सरकार के विकास कार्यों को उसी के कार्यकर्ताओं और जाति-विशेष के लोगों की गुंडागर्दी ने कहीं हाशिये पर धकेल रखा है. विकास कार्यों पर गुंडागर्दी, माफियागीरी, जातिवाद हावी रहा. इस कोढ़ में खाज का काम इस दल के इन्हीं बड़े-बड़े नेताओं द्वारा भी किया जाता रहा है. मुख्यमंत्री से पहले पार्टी के मुखिया द्वारा बलात्कार को लेकर किया गया ‘नादानी’ वाला आपत्तिजनक बयान दिया गया था. अबकी खुद मुख्यमंत्री ने ही जैसे लड़कियों के छेड़ने सम्बन्धी गाइडलाइन सी जारी कर दी.

कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक तरफ देश ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ जैसे अभियान को संचालित करने में लगा है. देश का लगभग हर राज्य बेटियों के विकास के लिए काम कर रहा है. सरकारी, गैर-सरकारी संगठन बेटियों के विकास के लिए लगातार प्रत्यनशील हैं. इन सबके बीच मुख्यमंत्री जैसे संवेदनशील पद पर, जिम्मेदाराना, संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति किस तरह गैर-जिम्मेवाराना बयान देता है. हो सकता है कि वे अपने दृष्टिकोण से इसे सही समझ रहे हों किन्तु इस बयान का सार देखा जाये तो बहुत कुछ कहता है. कहीं न कहीं एक सन्देश ये भी जाता है कि लड़कियों को छेड़ते समय छेड़ने वाले लोग सपा का झंडा न लगायें. इसका अर्थ ये भी निकाला जा सकता है कि यदि झंडा लगाकर ही छेड़ना है तो किसी और झंडे के साये में ऐसा किया जा सकता है. वर्तमान में मुख्यमंत्री जी अपने भ्रमण के द्वारा, अपने विकास कार्यों के बखान के द्वारा, राहत सामग्री के वितरण के द्वारा विगत चार वर्षों का ‘डैमेज कण्ट्रोल’ करना चाहते हैं. इस चक्कर में वे स्वयं में कुछ अटपटा बोल गए.

सपा के विगत चार वर्षों का लेखा-जोखा देखा जाये तो ये शासन उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर नहीं कहा जा सकता है. सरेआम महिलाओं के, लड़कियों के अपहरण की घटनाएँ, उनके साथ बलात्कार की वारदातें, गैंग रेप के साथ-साथ उनकी हत्या के जघन्य कांडों ने सपा सरकार को कटघरे में खड़ा किया है. इसमें भी उसके लिए मुश्किल इसकी रही कि अधिसंख्यक मामलों में सपा के कार्यकर्त्ता आरोपी की भूमिका में नजर आये. बलात्कार के मामले में स्वयं सपा मुखिया भी नादानी सम्बन्धी बयान देकर विवादों के घेरे में रहे थे. ऐसे में महिला-विरोधी छवि को दूर करने की कवायद में मुख्यमंत्री ने शहर-शहर, नगर-नगर मुख्य मार्गों पर, स्थानीय मार्गों पर महिलाओं के लिए सुलभ शौचालय बनवाये जाने का आश्वासन दिया, व्हाट्सएप्प पर छेड़खानी की खबर देने पर कार्यवाही करने का भरोसा दिखाया मगर एक जरा से बयान ने सबकुछ साफ़ कर दिया. दरअसल, वे अपने समर्पित कार्यकर्ताओं के विरोध में मुखरता से बोलने की हिम्मत इस चुनावी वर्ष में नहीं जुटा पाए. वर्तमान सरकार के लिए महिला सुरक्षा जितना बड़ा मुद्दा है, उससे कहीं बड़ा मुद्दा अपने कार्यकर्ताओं के भरोसे को बनाये रखना भी है. देखा जाये तो मुख्यमंत्री ने एक बयान के द्वारा अपने ही कार्यकर्ताओं को ताकत प्रदान की है. यही ताकत उनके लिए चुनावी समर में सीटें लाने का काम करती है. अब महिलाओं को सोचना होगा कि उनके प्रति ऐसी सोच रखने वाले किसी भी दल, किसी भी व्यक्ति के साथ उन्हें कैसा व्यवहार करना है.