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28 अगस्त 2025

कहीं और से नियंत्रित होता मोबाइल

एंड्रॉयड मोबाइल फ़ोन के कॉल डायलिंग सम्बन्धी कुछ बदलाव के बाद अधिकतम लोग ऐसे बिलबिला रहे जैसे कोई अचम्भा हो गया. स्मार्ट फ़ोन की नज़र में आप जैसे बिलबिलाने लोग ही बेवकूफ हैं. आज से नहीं बल्कि स्मार्ट फ़ोन, इंटरनेट के गठबंधन के समय से ही समझाया जा रहा है कि आपके हाथ में सिर्फ़ मोबाइल पकड़ना और स्क्रॉल करना है. बाक़ी सभी कंट्रोल तो उसके पास हैं जो आपको ये मुफ्त सुविधाएँ दे रहा है.


सोचिए, आप कोई एक विज्ञापन देख लें फिर वैसे ही आपकी स्क्रीन पर आने लगते हैं. आप कुछ सर्च कर लें वही आपको दिखने लगता है. कोई रील देख लें फिर उसी तरह की रील आपके सामने से गुजरने लगती हैं. अभी ये बदलाव बहुत छोटा सा बदलाव है. आपकी लोकेशन उनके पास है, आपका बैंक खाता उनके पास है, आपका एटीएम, उसका पिन उनको पता है, आपका आधार-पैन-पासवर्ड आदि सब उनके पास है. सबकुछ तो इंटरनेट से जुड़ा है और वही सबकुछ मोबाइल से लिंक करवाया जा रहा है. यही मोबाइल आपके हाथ में होने के बाद भी दूसरे के नियन्त्रण में है. 


एक जरा से बदलाव के बाद भी आप सजग न हुए, संगठित हो इस लिंक-लिंक खेल के विरोध में न उतरे, अपने तमाम खातों पर मजबूत पासवर्ड न बनाये, हैशटैग खेल और मुफ्तखोरी से बाहर न निकले तो अगला बदलाव हमारे-आपके खातों में, दस्तावेज़ों में, जानकारियों में होगा.

 

08 मई 2024

रहें सतर्क डिजिटल अरेस्ट से

तकनीकी के फैलते जाते मकड़जाल के बीच रहते हुए उससे सुरक्षित रहना आज बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है. कम्प्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट आदि ने जीवन-शैली को जितना आसान बनाया है उतना ही मुसीबत से भर दिया है. सूचना प्रौद्योगिकी के इस विकास के साथ-साथ होने वाले साइबर अपराधों में वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता है. यह आज के दौर में सभी को जानकारी है कि इंटरनेट के ज़रिए किए जाने वाले अपराधों को साइबर अपराध अथवा साइबर क्राइम कहते हैं. इस अपराध में कम्प्यूटर, इंटरनेट के माध्यम से वित्तीय धोखाधड़ीबैंक खाते से धन चुरानाहैकिंगअश्लीलता का प्रसार, वायरस का फैलावसॉफ़्टवेयर की चोरीदोषपूर्ण सॉफ़्टवेयर भेजकर कम्प्यूटर को ख़राब करना, किसी अन्य कम्प्यूटर नेटवर्क पर हमलापोर्नोग्राफी को बढ़ावा आदि शामिल रहता है. साइबर अपराध के तमाम सारे प्रकार में आजकल एक और प्रकार ने समाज के बीच फैलना शुरू कर दिया है, इसे साइबर अपराध की भाषा में डिजिटल अरेस्ट कहा जाता है.  

 

संभव है कि इस शब्दावली से आम आदमी परिचित न हो मगर इसके द्वारा जिस तरह का कृत्य किया जा रहा है उससे संभवतः प्रत्येक व्यक्ति का किसी न किसी रूप में सामना अवश्य ही हुआ होगा. न सही आप, आपके मित्र, रिश्तेदार, सहयोगी अथवा आसपास वाले किसी भी व्यक्ति के द्वारा ऐसा अवश्य ही सुनने में आया होगा कि उसको फोन के माध्यम से किसी के गिरफ्तार किये जाने की, उसके किसी पार्सल के गलत होने की, उसके बैंकिंग सम्बन्धी किसी समस्या के उत्पन्न होने की जानकारी दी गई होगी. इस तरह के अपराध में फोन के द्वारा बताया जाता है कि आपका बेटा, बेटी अथवा कोई अन्य रिश्तेदार पुलिस की, सीबीआई की अथवा नारकोटिक्स की हिरासत में है. उसके किसी अवैध गतिविधि में लिप्त पाए जाने की, ड्रग्स अथवा किसी अन्य नशे वाले पदार्थ के साथ पकडे जाने की खबर दूसरी तरफ से दी जाती है. इस तरह के फोन के अलावा अक्सर ऐसा फोन भी आता है जिसमें व्यक्ति के नाम से किसी पार्सल के आने की जानकारी देते हुए बताया जाता है कि उस पार्सल में आपत्तिजनक सामग्री आई हुई है अथवा विदेश से कोई अवैध सामान आया है. ऐसे फोन आने की स्थिति में दूसरी तरफ से बोलने वाला व्यक्ति खुद को पुलिस अथवा किसी प्रशासनिक विभाग का अधिकारी बताता है.

 

आजकल इस तरह के फोन कॉल आना साइबर अपराध में आम बात हो गई है. साइबर अपराध के क्षेत्र में सक्रिय अपराधियों ने इस नए तरीके की ठगी को, अपराध को बहुत बुरी तरह से फैलाया हुआ है. ऐसे मामलों में अपराधियों द्वारा तकनीक का सहारा लेते हुए पुलिस का, सीबीआई का अथवा किसी अन्य प्रशासनिक विभाग का फर्जी वीडियो बनाकर वीडियो कॉल के द्वारा इस तरह से प्रदर्शन किया जाता है मानो फोन सत्य है और किसी आधिकारिक व्यक्ति के द्वारा किया जा रहा है. ऐसे अपराधी सामान्यजन की मानसिकता को भली-भांति जानते-समझते हैं. कोई भी जनसामान्य ऐसे किसी फोन पर तत्काल घबरा जाता है जिसमें उसके किसी नजदीकी के गिरफ्तार होने की सूचना दी जाये. कानूनी पचड़े में पड़ने से घबराने वाला सामान्य व्यक्ति ऐसी किसी भी बात से बहुत दूर रहता है जो उसे किसी अवैध कृत्य में संलिप्त कर दे. इस कारण ऐसे फोन आते ही सामान्य व्यक्ति तत्काल खुद को इस परेशानी से मुक्त करवाने का मार्ग खोजने लगता है. यह मार्ग फोन करने वाला अपराधी ही उसे बताता भी है. ऐसे में फर्जी फोन अथवा वीडियो कॉल के द्वारा सामान्य व्यक्ति अपराधियों के चंगुल में फंसकर ठगी का शिकार हो जाता है. अपने नजदीकी को हिरासत से मुक्त करवाने के लिए अथवा अपने आपको किसी अवैध पार्सल का मालिक साबित न होने देने के लिए वह अपराधियों के बताये तरीके से उनको धनराशि उपलब्ध करवा देता है. 

 

आजकल इस तरह के बढ़ते अपराधों के बाद शासन, प्रशासन ने सक्रियता बढ़ाई और गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले इंडियन साइबर क्राइम कोआर्डिनेशन सेंटर ने धोखाधड़ी से जुडी एक हजार से ज्यादा आईडी को ब्लॉक किया है. यहाँ शासन, प्रशासन के साथ-साथ व्यक्ति को खुद को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है. ऐसे किसी भी फोन अथवा वीडियो कॉल आने पर खुद को संयमित रखते हुए सबसे पहले वह इत्मिनान करे कि क्या वाकई उसका कोई नजदीकी रिश्तेदार अथवा परिचित ऐसा कर सकता है जिससे वह हिरासत में आये? इसके साथ-साथ व्यक्ति यह भी ध्यान में रखे कि आजकल इस तरह के कृत्य साइबर अपराधियों द्वारा किये जा रहे हैं. ऐसे में वह तत्काल राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत कर दे अथवा अपने नजदीकी साइबर सेल में जाकर पुलिस को, प्रशासन को इस तरह के फोन आने की जानकारी दे. डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों की अधिकता को देखते हुए प्रशासन द्वारा 1930 पर कॉल करके भी जानकारी देने की सुविधा सामान्य नागरिकों को उपलब्ध करवाई जा रही है.

 

शासन, प्रशासन के साथ-साथ हम सबको भी सतर्क रहने की आवश्यकता है. अपनी जानकारियों को, अपने व्यक्तिगत विवरणों को इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर शेयर करने से बचना चाहिए. जहाँ तक संभव हो अपने परिवार की जानकारियाँ भी इंटरनेट पर शेयर करने से बचना चाहिए. छोटे कदम उठाकर बड़ी परेशानी से बचा जा सकता है. 






 

03 अक्टूबर 2023

साइबर अपराध की खामोश दस्तक

वर्तमान में कम्प्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से काम बहुत आसान हुआ है. सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ साइबर अपराधों में वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता है. सामान्य भाषा में इंटरनेट के ज़रिए किए जाने वाले अपराधों को साइबर अपराध अथवा साइबर क्राइम कहते हैं. कोई भी ऐसा आपराधिक, अवैध, अवांछनीय कार्य जो कम्प्यूटर, इंटरनेट अथवा संचार माध्यम से सम्बद्ध है, वह साइबर अपराध है. उदाहरणार्थ यदि कम्प्यूटर, इंटरनेट के माध्यम से वित्तीय धोखाधड़ी, बैंक खाते से धन चुराना, हैकिंग, अश्लीलता का प्रसार, वायरस का फैलाव, सॉफ़्टवेयर की चोरी, दोषपूर्ण सॉफ़्टवेयर भेजकर कम्प्यूटर को ख़राब करना, किसी अन्य कम्प्यूटर नेटवर्क पर हमला, पोर्नोग्राफी को बढ़ावा, आंतरिक सूचनाओं और बौद्धिक संपदा की चोरी आदि को साइबर अपराध कहा जाता है. 


इनके अलावा कुछ साइबर अपराध ऐसे हैं जिनका प्रभाव सरकारों पर, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पड़ता है. इनमें साइबर जासूसी, साइबर युद्ध, साइबर आतंकवाद आदि आते हैं. साइबर युद्ध अथवा साइबर वारफेयर अन्य देशों के खिलाफ युद्ध के कार्यों को संचालित करने के लिए साइबरस्पेस का उपयोग है. भूमि, महासागर, वायु और अंतरिक्ष के बाद साइबरस्पेस को युद्ध का पाँचवाँ आयाम माना जाता है. आजकल साइबर आतंकवाद को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाया जाता है. इसके द्वारा आतंकवादी कंप्यूटर नेटवर्क पर हमला कर जनता के बीच बड़े पैमाने पर विनाश या भय को पैदा करके सरकार को निशाना बनाते हैं. इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा पर आक्रमण करना और रणनीतिक महत्व की जानकारी को नष्ट करना है. यह किसी भी देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है. 




राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2021 में भारत में साइबर अपराध के 52,974 मामले दर्ज किये गए जो वर्ष 2020 (50,035 मामले) की तुलना में 5 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्शाते हैं. सीईआरटीइन (इंडियन कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम) के आँकड़ों के अनुसार 2022 में भारत में सबसे अधिक साइबर क्राइम के मामले दर्ज किए गए हैं. सीईआरटी साइबर सुरक्षा हमलों से निपटने के लिए केन्द्र सरकार की एक नोडल एजेंसी है जो सूचना प्रौद्यौगिकी मंत्रालय के तहत काम करती है. आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी के 4047 मामले, ओटीपी जालसाजी के 1093 केस, डेबिट क्रेडिट कार्ड से ठगी की 1194 घटनाएँ और एटीएम से सम्बन्धित 2160 मामले दर्ज किए गए. रिपोर्ट में बताया गया कि सोशल मीड़िया पर फर्जी सूचना के 578 केस, ऑनलाइन परेशान करने या महिलाओं और बच्चों को साइबर धमकी से जुड़े 972 मामले, फर्जी प्रोफाइल के 149 और आँकड़ों की चोरी के 98 मामले जारी किए गए हैं.


भारत सरकार ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए सूचना प्रौद्यौगिकी अधिनियम 2000 पारित किया था, साथ ही आईपीसी की धाराओं में भी कुछ प्रावधान किए गए हैं. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की कुछ धाराओं में संशोधन भी किया गया है ताकि अपराधियों के विरुद्ध और सहजतापूर्वक कार्यवाही की जा सके. धारा 69ए के तहत पुलिस को अधिकार है कि किसी भी वेबसाइट को ब्लॉक कर सकती है. वर्तमान दौर में प्रत्येक हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट है और उसका उपयोग भी बहुत तेजी से हो रहा है, ऐसे में आम जनसामान्य को बहुत अधिक सतर्क, समझदार होने की आवश्यकता है. सामान्य व्यक्ति की एक लापरवाही, एक गलती से साइबर अपराधी को अवसर मिल जाता है और वह किसी भी स्तर का संकट पैदा कर देता है, किसी भी तरह का नुकसान कर देता है. 


व्यक्तियों को अपने सिस्टम को लगातार अपडेट करते रहने की आवश्यकता है. इसके लिए अपने सॉफ्टवेयर और ऑपरेटिंग सिस्टम को नवीनतम स्थिति में बनाये रखा जाना चाहिए. इसके साथ-साथ कंप्यूटर अथवा मोबाइल में एंटी-वायरस का भी उपयोग करना चाहिए. इसके द्वारा अवांछित रूप से वायरस के हमले को रोका जा सकता है. व्यक्ति की जिम्मेवारी बनती है कि वह अपने खातों, सेवाओं से सम्बंधित पासवर्ड मजबूत बनायें. इसके अलावा अपने पासवर्ड को समय-समय पर बदलते भी रहना चाहिए. किसी अनजान ई-मेल को, स्पैम ई-मेल को खोलने से बचना चाहिए. 


नागरिकों के साथ-साथ प्रशासन को भी आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिए, जिससे कि नागरिकों के हितों की सुरक्षा हो सके और साइबर अपराधियों के हौसले पस्त हों. इसके लिए ई-वाणिज्य और ई-प्रशासन को बढ़ाने देने के लिए पुलिस एवं उपकरणों को प्रशिक्षित करके इस योग्य बनाया जाये कि वे साइबर अपराध की जाँच कर सकें. पुलिस में कम्प्यूटर के क्षेत्र अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रशिक्षित करके इस अपराध से निपटने के योग्य बनाना चाहिए. उनको शोषित व्यक्ति के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए दोस्ताना एवं मधुर वार्तालाप बनाये जाने को भी प्रेरित किया जाना चाहिए.


इंटरनेट हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है. यह भी एक तरह का समाज बन गया है जहाँ प्रत्येक मानसिकता के लोग रह रहे हैं. यहाँ भले लोग भी हैं तो आपराधिक प्रवृत्ति के लोग भी हैं. ऐसे में साइबर अपराधियों से बचने के हम सबको ही सतर्क रहने की आवश्यकता है. लापरवाही से बचने की जरूरत है. कुछ सुरक्षात्मक उपायों को अपनाये जाने की आवश्यकता है. यदि प्रशासन एवं आम जनता इस सन्दर्भ में दिए जाते सुझावों पर अमल करती है तो निश्चित ही इन अपराधों और समस्याओं से बचा जा सकेगा.


28 अगस्त 2023

सोशल मीडिया की भेड़चाल से बचने की आवश्यकता

वर्ष 2021 का समय था जबकि खबर आई थी कि दुनियाभर में सबसे ज्यादा प्रसिद्द सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक को Meta (मेटा) के नाम से जाना जाएगा. इस नाम परिवर्तन पर कम्पनी के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने बताया कि हम इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक ही सीमित नहीं रखना चाहते हैं. अब जो हम करने जा रहे हैं, उसके लिए नए नाम के साथ आगे जाने की आवश्यकता है. मेटा का अर्थ ग्रीक भाषा में होता है हद से पार, कम्पनी के द्वारा नाम बदलने को लेकर एक कारण यह भी रहा कि वे इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से कहीं आगे एक वर्चुअल दुनिया में ले जाना चाहते हैं. इसमें कम्पनी एक ऐसी वर्चुअल दुनिया बना रही है जहाँ लोग अपने कमरे में बैठकर एक समय में कई जगहों पर वर्चुअली रूप से अलग-अलग काम कर सकते हैं. इंटरनेट की इस नई दुनिया को मेटावर्स का नाम दिया गया है.

 



कम्पनी के सीईओ ने खुद इसका नाम बदलकर इसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से कहीं और आगे ले जाने का सपना देखा जबकि इसी प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लोग भेड़चाल में फँसे हुए हैं. सोशल मीडिया पर आये दिन एक तरह की भेड़चाल शुरू होती है, जहाँ पर बिना सोचे-समझे इसके उपयोगकर्ता उसके अंधानुकरण में लग जाते हैं. आप सभी ने गौर किया होगा कि आये दिन सोशल मीडिया पर कुछ इस तरह की पोस्ट तेजी से वायरल होती हैं जिसमें किसी विशेष तारीख को रात के कॉस्मिक किरणों के पृथ्वी के करीब से गुजरने से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नुकसान होने, पृथ्वी को खतरा होने की बात कही जाती है. किसी पोस्ट में किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित बच्चे के इलाज के लिए धन का एकत्रण लाइक, शेयर आदि के द्वारा किया जाता है. कभी किसी लापता बच्चे को खोजने का निवेदन होता है, कभी किसी के गुम हुए कागजात के बारे में पोस्ट वायरल होती है. सोशल मीडिया पर एकदम से फ्री बैठा उपयोगकर्ता बिना कुछ आगा-पीछा सोचे ऐसी पोस्ट को शेयर करने में लग जाता है. आजकल इसी तरह की भेड़चाल सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही है जहाँ पर मुफ्त में इस्तेमाल किये जा रहे प्लेटफ़ॉर्म को ही नोटिस देने वाली पोस्ट बुरी तरह से छाई हुई हैं.  

 

तेजी से और बुरी तरह से वायरल होती इस पोस्ट में फेसबुक को अपनी निजता का उल्लंघन न करने, अपनी फोटो, वीडियो आदि के सार्वजनिक न किये जाने के सम्बन्ध में चेतावनी, नोटिस दिए जा रहे हैं. आईपीसी की विशेष धारा का उल्लेख करते हुए फेसबुक पर कार्यवाही करने की बात इस पोस्ट में है. निजता के उल्लंघन न करने की, फोटो, वीडियो आदि को सार्वजनिक न करने की बात को लिखने वालों ने कभी विचार किया है कि इंटरनेट पर किसी भी प्लेटफ़ॉर्म का जब भी उपयोग किया जाता है तो उसकी बहुत सारी शर्तों, नियमों पर अपनी अनुमति दी जाती हैं. क्या कभी इन नियमों या शर्तों को पढ़ने की फुर्सत निकाली गई? क्या किसी भी प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करने के पूर्व उसकी चरणबद्ध प्रक्रिया को पूरा करने की जल्दबाजी में हम सबने अपनी सहमति देने के पहले उनको पढ़ने की, समझने की कोशिश की?

 

आखिर हम सभी मुफ्त के ऐसे तमाम सारे एप्लीकेशन का उपयोग करने, उस प्लेटफ़ॉर्म पर अपने आपको सर्वाधिक सक्रिय दिखाने की अतिशय जल्दबाजी में भुला बैठते हैं कि अपने उपकरण में, चाहे वह कम्प्यूटर हो या फिर मोबाइल, हम ही उस सॉफ्टवेयर को भीतर तक झाँकने की अनुमति देते हैं. उसको अपने कॉन्टेक्ट्स, अपनी गैलरी, अपनी लोकेशन, अपना कैमरा, अपना माइक आदि का उपयोग करने की अनुमति देते हैं. ऐसा करने के बाद ही सम्बंधित एप्लीकेशन हमारे उपकरण में इंस्टॉल होती है और उसके बाद ही हम उसका उपयोग कर पाते हैं. ऐसा करने के बाद हमारे हाथ में निजता जैसी, गोपनीय जैसी कोई बात रह नहीं जाती है. सोशल मीडिया के मुफ्त में मिलते प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करने की चाहत में हम स्वयं ही अपनी गोपनीयता, अपनी निजता किसी दूसरे सॉफ्टवेयर के हाथों में थमा देते हैं. अब पूर्व में दी गई हमारी अनुमति के आधार पर वह हमारे उपकरण में सेंधमारी करता रहता है; हमारी सक्रियता पर निगाह रखता है; हमारे क्रियाकलापों को देखता रखता है. क्या आपने कभी इस पर गौर नहीं किया कि सोशल मीडिया के किसी मंच पर आपकी उपस्थिति का स्वागत उन्हीं वस्तुओं, सेवाओं, उत्पादों के विज्ञापन से होती है जिनको आपने सर्च इंजन में खोजा होता है? क्या आपने कभी विचार किया है कि आपके विभिन्न एप्लीकेशन, विभिन्न वेबसाइट, विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म के पासवर्ड भूल जाने की स्थिति में यही इंटरनेट आपको दूसरा पासवर्ड उपलब्ध करवा देता है?

 

ध्यान रखिये, इंटरनेट के उपयोग की स्थिति में अब हमारा-आपका कुछ भी गोपनीय नहीं है, कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है. हमारी सारी की सारी जानकारी, क्रियाकलाप, घूमना-फिरना, खाना-पीना आदि किसी न किसी सर्वर के माध्यम से दूसरे हाथों में है. वायरल होती ऐसी अनावश्यक चेतावनी वाली पोस्ट से एकबारगी आप भले अपने आपको संतुष्ट कर लें मगर इंटरनेट की दुनिया में अपनी खुराफात के लिए सक्रिय तत्त्वों ने तो अपना काम कर ही लिया. देखा जाये तो अब हम सब इंटरनेट के गुलाम हैं. हमारे सभी कंप्यूटर, मोबाइल, तमाम संस्थान, अनेकानेक जानकारियाँ आदि किसी न किसी सर्वर के कब्जे में हैं. वर्तमान दौर में इंटरनेट से दूर रह पाना संभव नहीं ऐसे में यहाँ के आपराधिक तत्त्वों से बचने का उपाय सिर्फ सावधानी है, ऐसी बेवकूफी भरी पोस्ट का शेयर करना नहीं. इंटरनेट का उपयोग करके ज्ञानवान, प्रतिभावान बनिए न कि दूसरे के हाथों में खेलते हुए बेवकूफ बनिए.  

 






 

12 मार्च 2023

संस्कारहीनता की तरफ बढ़ती पीढ़ी

तकनीकी विस्तार दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर रहा है. इंटरनेट ने घर-घर पर कब्ज़ा करने के साथ-साथ लगभग प्रत्येक व्यक्ति के मन-मष्तिष्क पर कब्ज़ा कर लिया है. दैनिक जीवन के छोटे-छोटे से काम के साथ-साथ बड़े-बड़े काम भी इंटरनेट के माध्यम से निपटाए जाने लगे हैं. शिक्षा हो या फिर व्यापार, घर की खरीददारी हो या फिर कार्यालय का कोई काम सभी में अब इंटरनेट की भूमिका प्रमुख हो गई है. ऐसा लगता है जैसे बिना इंटरनेट के एक पल भी बिताना कठिन है. अब न केवल शैक्षिक, व्यापारिक, सामाजिक, राजनैतिक क्षेत्रों में इंटरनेट ने जबरदस्त हस्तक्षेप किया है बल्कि उसने मनोरंजन के नाम पर घर के भीतर तक सेंध लगा ली है. बच्चों के कार्यक्रम हों या फिर बड़ों के अपने धारावाहिक, सभी में इंटरनेट के माध्यम से दिखाए जाते कार्यक्रमों ने घर के दरवाजे से प्रवेश करते हुए लोगों के बेडरूम में, स्टडी रूम में घुसपैठ कर ली है. 


मनोरंजन के नाम पर बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने अपना अशालीन रंग दिखलाया है उसका सर्वाधिक नकारात्मक असर बच्चों पर, किशोरों पर देखने को मिल रहा है. तकनीकी भरे दौर में हर हाथ में स्मार्ट फोन और इंटरनेट के होने के कारण समूचा विश्व सबकी मुठ्ठी में समाहित है. मुठ्ठी में समाये इस विश्व में अब कुछ भी गोपन नहीं रह गया है. इसी अगोपन ने ओटीटी के बहुसंख्यक कार्यक्रमों, वेबसीरीज की अश्लीलता को भी सार्वजनिक कर दिया है. इन वेबसीरीज के पल-पल बदलते दृश्यों में, बात-बात पर गालियों भरे संवादों के आने ने बच्चों, किशोरों के दिल-दिमाग में गालियों के प्रति एक अजब सा आकर्षण पैदा कर दिया है. ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर बनने वाले कार्यक्रम हों या फिर फ़िल्में, सभी में वास्तविकता दिखाने के नाम पर गालियों को जैसे ठूँसा जाने लगा है. इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर बने अनेकानेक चैनलों पर भी सार्वजनिक रूप से गालियों का दिया जाना होता है, अश्लील भाव-भंगिमा, शब्दों के साथ प्रस्तुतियाँ दी जा रही हैं. इनके इस तरह से सार्वजनिक होते रहने का दुष्परिणाम यह निकल रहा है कि गालियों को लेकर, अश्लील बातचीत को लेकर समाज में जिस तरह की शर्म, लिहाज बना हुआ था, वह लगभग समाप्त हो गया है. कम उम्र के युवाओं में बात-बात पर गालियाँ दिया जाना आम हो गया है. बच्चों में, किशोरों में अपने हमउम्र दोस्तों के साथ बातचीत में गालियों का प्रयोग करने के पीछे मानसिकता उनके साथ वैमनष्यता करने जैसी नहीं होती है. जरा-जरा सी बात पर अशालीन शब्दों का प्रयोग करने के पीछे उनकी मंशा सामने वाले को अपमानित करने की नहीं होती है. वे ऐसा महज उस आकर्षण के वशीभूत करते हैं, जिसे उन्होंने विभिन्न कार्यक्रमों में, सोशल मीडिया के मंचों पर देखा होता है.  




समाज में एक सामान्य सी धारणा बनी हुई है कि एक बच्चा आज्ञाकारी होगा. वह बड़ों का आदर-सम्मान करने वाला होगा. युवावस्था आने तक वह अपने भीतर ऐसे गुणों को धारण कर चुका होगा जो समाज, परिवार के हित में होंगे. बहुतायत में ऐसा करने वाले बच्चे मिलते भी हैं. किशोरावस्था का दौर अत्यंत ही संवेदित और बेहद महत्वपूर्ण होता है. किसी भी बच्चे का व्यक्तित्व विकास इसी दौर में होता है. इसी कारण से इस दौर में बच्चों का गालियों की दिशा में जाना, अश्लील शब्दावली की तरफ भटकना चिंतनीय है. बहुतेरे किशोर इन्हीं सबके चलते अनैतिक संबंधों के बनाने की हद तक चले जाते हैं. ऐसे में किशोर उम्र में उनकी तरफ विशेष ध्यान देना आवश्यक है.


ऐसे में सवाल यही उठता है कि बच्चों में, किशोरों में इस तरह के अशालीन व्यवहार को करने के पीछे उत्प्रेरक बने इन कार्यक्रमों से बचने का क्या रास्ता है? यह बात वर्तमान दौर में पूरी तरह से सही है कि वैश्विक खुलेपन के दौर में अब किसी विषय को, किसी जानकारी को परदे में रख पाना संभव नहीं रह गया है. तकनीक के बहाव भरे इस दौर में इन बच्चों की ऊर्जा को, उनके आकर्षण को उचित दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए. यह विचार करना अनिवार्य होना चाहिए कि जिस तरह के कार्यक्रम इस आयुवर्ग के बच्चों को उकसा रहे हैं, उनसे बच्चों को दूर कैसे रखा जाये. इस बिन्दु पर आकर स्वयं अभिभावकों को विचार करने की आवश्यकता है कि कहीं उनके द्वारा तो इन बच्चों के लालनपालन में कोई कमी तो नहीं रह जा रही है?


वर्तमान में जिस तेजी से नगरीकरण तथा औद्योगिकरण ने हर व्यक्ति को अपने चपेट में लिया है, उसने सभी को धन कमाने की अंधी दौर में धकेल दिया है. इससे भी परिवार अपने ही बच्चों पर नियंत्रण रखने में तथा उनको संस्कारित करने में लगभग असफल हुए हैं. समयाभाव में अपने ही बच्चों को उनकी वैयक्तिक स्वंतत्रता के नाम पर बच्चों को, किशोरों को समय से पूर्व बड़ा हो जाने दिया है. इसने बच्चों में नैतिक मूल्यों का क्षरण किया है.


इस बात को परिवारों को, अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं. उनका संस्कारवान होना, शालीन होना, सभ्य होना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वे इस समाज की, इस देश की धरोहर हैं. किसी भी समाज और देश का भविष्य इन्हीं के कंधों पर अपनी विकासयात्रा को पूरा करता है. ऐसी स्थिति में न केवल सरकारों की जिम्मेवारी है बल्कि परिवार की, समाज की, अभिभावकों की भी जिम्मेवारी है कि वे बच्चों के, किशोरों के, युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिये एक स्वस्थ्य सामाजिक, सांस्कृतिक वातावरण प्रदान करें. मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से अशालीनता, अश्लीलता, गालियाँ, अनैतिक संबंधों का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से किया जा रहा है, उस पर नियंत्रण लगाया जाये.

 





 

25 फ़रवरी 2023

गालियाँ देने का फैशन

बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने अपना अशालीन रंग दिखलाया है उसका सर्वाधिक नकारात्मक असर बच्चों पर, किशोरों पर देखने को मिल रहा है. तकनीकी भरे दौर में हर हाथ में स्मार्ट फोन और इंटरनेट के होने के कारण समूचा विश्व सबकी मुठ्ठी में समाहित है. मुठ्ठी में समाये इस विश्व में अब कुछ भी गोपन नहीं रह गया है. इसी अगोपन ने ओटीटी के बहुसंख्यक कार्यक्रमों, वेबसीरीज की अश्लीलता को भी सार्वजनिक कर दिया है. इन वेबसीरीज के पल-पल बदलते दृश्यों में, बात-बात पर गालियों भरे संवादों के आने ने बच्चों, किशोरों के दिल-दिमाग में गालियों के प्रति एक अजब सा आकर्षण पैदा कर दिया है.


ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर बनने वाले कार्यक्रम हों या फिर फ़िल्में, सभी में वास्तविकता दिखाने के नाम पर गालियों को जैसे ठूँसा जाने लगा है. इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर बने अनेकानेक चैनलों पर भी सार्वजनिक रूप से गालियों का दिया जाना होता है, अश्लील भाव-भंगिमा, शब्दों के साथ प्रस्तुतियाँ दी जा रही हैं. इनके इस तरह से सार्वजनिक होते रहने का दुष्परिणाम यह निकल रहा है कि गालियों को लेकर, अश्लील बातचीत को लेकर समाज में जिस तरह की शर्म, लिहाज बना हुआ था, वह लगभग समाप्त हो गया है. कम उम्र के युवाओं में बात-बात पर गालियाँ दिया जाना आम हो गया है. बच्चों में, किशोरों में अपने हमउम्र दोस्तों के साथ बातचीत में गालियों का प्रयोग करने के पीछे मानसिकता उनके साथ वैमनष्यता करने जैसी नहीं होती है. जरा-जरा सी बात पर अशालीन शब्दों का प्रयोग करने के पीछे उनकी मंशा सामने वाले को अपमानित करने की नहीं होती है. वे ऐसा महज उस आकर्षण के वशीभूत करते हैं, जिसे उन्होंने विभिन्न कार्यक्रमों में, सोशल मीडिया के मंचों पर देखा होता है.  




समाज में एक सामान्य सी धारणा बनी हुई है कि एक बच्चा आज्ञाकारी होगा. वह बड़ों का आदर-सम्मान करने वाला होगा. युवावस्था आने तक वह अपने भीतर ऐसे गुणों को धारण कर चुका होगा जो समाज, परिवार के हित में होंगे. बहुतायत में ऐसा करने वाले बच्चे मिलते भी हैं. किशोरावस्था का दौर अत्यंत ही संवेदित और बेहद महत्वपूर्ण होता है. किसी भी बच्चे का व्यक्तित्व विकास इसी दौर में होता है. इसी कारण से इस दौर में बच्चों का गालियों की दिशा में जाना, अश्लील शब्दावली की तरफ भटकना चिंतनीय है. बहुतेरे किशोर इन्हीं सबके चलते अनैतिक संबंधों के बनाने की हद तक चले जाते हैं. ऐसे में किशोर उम्र में उनकी तरफ विशेष ध्यान देना आवश्यक है.


ऐसे में सवाल यही उठता है कि बच्चों में, किशोरों में इस तरह के अशालीन व्यवहार को करने के पीछे उत्प्रेरक बने इन कार्यक्रमों से बचने का क्या रास्ता है? यह बात वर्तमान दौर में पूरी तरह से सही है कि वैश्विक खुलेपन के दौर में अब किसी विषय को, किसी जानकारी को परदे में रख पाना संभव नहीं रह गया है. तकनीक के बहाव भरे इस दौर में इन बच्चों की ऊर्जा को, उनके आकर्षण को उचित दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए. यह विचार करना अनिवार्य होना चाहिए कि जिस तरह के कार्यक्रम इस आयुवर्ग के बच्चों को उकसा रहे हैं, उनसे बच्चों को दूर कैसे रखा जाये. इस बिन्दु पर आकर स्वयं अभिभावकों को विचार करने की आवश्यकता है कि कहीं उनके द्वारा तो इन बच्चों के लालनपालन में कोई कमी तो नहीं रह जा रही है?


वर्तमान में जिस तेजी से नगरीकरण तथा औद्योगिकरण ने हर व्यक्ति को अपने चपेट में लिया है, उसने सभी को धन कमाने की अंधी दौर में धकेल दिया है. इससे भी परिवार अपने ही बच्चों पर नियंत्रण रखने में तथा उनको संस्कारित करने में लगभग असफल हुए हैं. समयाभाव में अपने ही बच्चों को उनकी वैयक्तिक स्वंतत्रता के नाम पर बच्चों को, किशोरों को समय से पूर्व बड़ा हो जाने दिया है. इसने बच्चों में नैतिक मूल्यों का क्षरण किया है. इस बात को परिवारों को, अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं. उनका संस्कारवान होना, शालीन होना, सभ्य होना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वे इस समाज की, इस देश की धरोहर हैं. किसी भी समाज और देश का भविष्य इन्हीं के कंधों पर अपनी विकासयात्रा को पूरा करता है. ऐसी स्थिति में न केवल सरकारों की जिम्मेवारी है बल्कि परिवार की, समाज की, अभिभावकों की भी जिम्मेवारी है कि वे बच्चों के, किशोरों के, युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिये एक स्वस्थ्य सामाजिक, सांस्कृतिक वातावरण प्रदान करें. मनोरंजन के नाम पर जिस तरह से अशालीनता, अश्लीलता, गालियाँ, अनैतिक संबंधों का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से किया जा रहा है, उस पर नियंत्रण लगाया जाये.







 

09 फ़रवरी 2023

Insert Learning : पूर्णतः अनभिज्ञ विषय से परिचय

ज्ञान का, जानकारी का संसार इतना विशाल है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है. ज्ञान सागर में ऐसे-ऐसे मोती हैं, जिनको पाने के लिए उसमें गहराई तक उतरना होता है. ऐसा अनुभव हर बार किसी न किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान प्राप्त होता है, किसी न किसी वर्कशॉप के द्वारा ऐसा अनुभव मिलता है. इन दिनों अपने अध्यापन कार्य में अनिवार्य रूप से किये जाने वाले पुनश्चर्या पाठ्यक्रम (रिफ्रेशर कोर्स) में सहभागिता की जा रही है. ऑनलाइन चल रहे इस पाठ्यक्रम में अभी तक जो जानकारी दी गई उसने हमें व्यक्तिगत रूप से आश्चर्यचकित ही किया है. इंटरनेट की दुनिया में दिन-रात किसी न किसी रूप में विचरण करते रहने के बाद भी एक ऐसे विषय से परिचय हुआ, जिसके बारे में उससे पहले हमने देखा-सुना ही नहीं था.




ऐसा शायद सबके लिए संभव नहीं होता है कि वह सभी विषयों का, सभी क्षेत्रों का जानकार हो. हमारे साथ तो ऐसा बिलकुल भी नहीं है. दो-चार क्षेत्र ही ऐसे हैं, जिनके बारे में अल्प-जानकारी, अल्प-ज्ञान ही प्राप्त कर सके हैं. इंटरनेट तो वैसे भी अत्यंत वृहद् है, जहाँ जितना मिले, जितना ग्रहण किया जाये उतना ही कम है. Insert Learning एक ऐसा विषय हमारे सामने आया जिसके बारे में हमारे पास जानकारी शून्य थी. रिफ्रेशर कोर्स में जब इस बारे में बताया गया तो इसके बारे में जानकर आश्चर्य हुआ. इसके द्वारा किसी भी वेब पेज में दी गई जानकारी में अपनी जानकारी, यूट्यूब लिंक को जोड़कर विद्यार्थियों के लिए अथवा ऐसे लोगों के लिए जिनको जानकारी देनी हो, ज्ञानवर्द्धक सामग्री उसी वेब पेज पर तैयार की जा सकती है. जब सम्बंधित विशेषज्ञ द्वारा इस बारे में बताना आरम्भ किया गया तो एकबारगी लगा कि ऐसे कैसे संभव है कि किसी वेबपेज में किसी तरह से अन्य सामग्री को जोड़ा जा सके? बाद में Insert Learning टूल की सहायता से जब ऐसा खुद किया तो बड़ा अच्छा लगा. आश्चर्य भी लगा कि ऐसे विषय से हम आज तक अनजान थे.


फिलहाल, अभी तो पुनश्चर्या पाठ्यक्रम चल रहा है. निश्चित ही और भी ऐसे विषय हमारे सामने आयेंगे, जो हमारे लिए नए होंगे. निश्चित ही ऐसे अन्य विषयों से परिचय होकर बहुत कुछ नया सीखने को मिलेगा. 






 

11 जुलाई 2022

परेशानी का कारण बनता मोबाइल : 2200वीं पोस्ट

कई महीनों से हमारा अपने साथ एक तरह का द्वंद्व चल रहा है. ये द्वंद्व मोबाइल के उपयोग को लेकर मचा हुआ है. बहुत बार मोबाइल सुविधाजनक से ज्यादा असुविधाजनक महसूस होता है. दूसरी तरफ वाले को न समय की चिंता करनी है न ही स्थान की. उसे बस अपने काम से मतलब होता है. आप कितने व्यस्त हैं, कहाँ हैं, किसके साथ हैं, किस स्थिति में हैं उसे कोई मतलब नहीं. इधर मोबाइल के उपयोग को लेकर अपने आपमें उथल-पुथल कुछ ज्यादा ही मची हुई है. इसी में आज एक चित्र हाथ लग गया, जिसमें एक समाचार प्रकाशित था. उसे देखकर विचार आया कि आज की ये पोस्ट उसी पर लिखी जाये.

 

पोस्ट लिखने के बारे में बताने का एक विशेष कारण ये है कि आज की ये पोस्ट हमारे इस ब्लॉग की 2200वीं पोस्ट है. मई 2008 से शुरू ब्लॉगिंग की यात्रा धीरे-धीरे चलते हुए यहाँ तक पहुँच गई. बहरहाल, ब्लॉगिंग की यात्रा पर फिर कभी, आज ऊहापोह में डालते मोबाइल पर चर्चा कर ली जाये.

 

आज लगभग हर हाथ में मोबाइल है, न केवल मोबाइल है बल्कि स्मार्ट फोन कहे जाने वाले मोबाइल हैं. उन्हीं हाथों में इंटरनेट भी सुसज्जित है. ऐसा तो नहीं कहेंगे कि जितने हाथों में स्मार्ट फोन है, इंटरनेट है वे सभी लोग अत्यधिक व्यस्त हैं मगर बहुतायत में ऐसे लोग हैं जो चौबीस घंटे के हिसाब से अपने इसी स्मार्ट फोन में व्यस्त हैं. हर दो-चार मिनट में उनकी जेब से, बैग से मोबाइल निकलता है, चमकता है और फिर इधर-उधर कुछ उँगलियों का सहारा लेकर वापस अपनी जगह चला जाता है. कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके आसपास कितने लोग भी क्यों न हों, कितने भी ख़ास क्यों न हों, कितने आम क्यों न हों उनका मोबाइल न बंद होता है और न ही जेब-बैग के हवाले होता है. संभवतः नहाते समय ही ऐसे लोगों का मोबाइल उनके हाथ से छूटता हो.

 

हमारा व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि मोबाइल और इंटरनेट की जुगलबंदी ने इंसान का जीना मुश्किल किया है. उसकी सामाजिकता को प्रभावित किया है. उसकी जीवनशैली को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. इस बात को हम अपने व्यक्तिगत अनुभवों से कह रहे हैं. आज देखने में आ रहा है कि मोबाइल के, इंटरनेट के, सोशल मीडिया के अतिशय उपयोग ने लोगों को घनघोर भीड़ में भी अकेले कर दिया है. किसी समय बातचीत को सहजता, सरलता, गतिशीलता देने के लिए मोबाइल को बनाया गया था. आज स्थिति ये है कि बातचीत को छोड़कर बाकी सबकुछ मोबाइल पर होता है. मोबाइल अपने आपमें आपकी व्यक्तिगत संपत्ति जैसा है. किसी समय घर में लगे बेसिक फोन को परिवार का फोन कहा जाता था. एक ही फोन पर समूचा परिवार बात करता था. मोबाइल के द्वारा व्यक्तिगत भाव पैदा कर देने से कुछ लाभ हुए हैं तो उनके सापेक्ष नुकसान बहुत ज्यादा हुए हैं. किसी समय तक मोबाइल से बातचीत हो जाया करती थी मगर सोशल मीडिया के आने के बाद तो जैसे आपस में बातचीत करना बंद सा ही हो गया है. अब सुबह-सुबह एक मैसेज छोड़कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है. अब इसकी चिंता नहीं कि जिसे हम अपना मित्र कहते हैं, जिसे अपने साथी-सहयोगी बताते नहीं थकते, उससे बातचीत करके उसके हालचाल भी नहीं लेते.

 

मोबाइल के द्वारा इस तरह का अकेलापन पैदा कर दिए जाने को लेकर हमेशा एक तरह का भय हमारे भीतर रहता है. इस भय के अलावा समय-असमय आने वाली अनावश्यक कॉल्स के कारण भी मोबाइल सिरदर्द समझ आने लगा है. कुछ इसी तरह की अन्य दूसरी समस्याओं के कारण हमने वर्ष 2011 में मोबाइल का उपयोग पूरी तरह से बंद कर दिया था. पूरे दो साल किसी भी तरह से मोबाइल का उपयोग हमने नहीं किया था. बैंकों ने जिस तरह से जबरिया अनिवार्यता सी बना दी है, मोबाइल की उसके चलते बस उतनी देर को मैसेज देखने के लिए, ओटीपी देखने के लिए मोबाइल का उपयोग किया जाता था. हमारे उस निर्णय पर लोगों को आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे लोगों को दिक्कत होगी. हमें तब भी समझ न आया था, आज भी समझ नहीं आया है कि मोबाइल हम अपनी सुविधा के लिए रखते हैं अथवा दूसरों की सुविधा के लिए? लोगों के काम, संपर्क, मेल-मिलाप उस समय भी हुआ करते थे, जबकि मोबाइल का चलन नहीं था या कि मोबाइल सबके पास नहीं हुआ करता था. अपने भीतर की उथल-पुथल से, अपने अन्दर के द्वंद्व से निपट लेने के बाद मोबाइल को बंद करना है. कतिपय तानाशात्मक सरकारी, गैर-सरकारी रवैये के चलते पूरी तरह से बंद कर पाना संभव न हुआ तो नगण्य उपयोग की सम्भावना निर्मित की जाएगी.

 

इन तमाम समस्याओं के साथ-साथ एक बहुत बड़ा संकट मोबाइल उपयोग को लेकर सबके साथ है मगर उसे लोग सामान्य ही समझ रहे हैं. आज सरकारी, गैर-सरकारी कार्यों, संस्थानों की स्थिति यह हो गई है कि आपको किसी भी तरह का काम करना है तो उसमें अनिवार्य रूप से मोबाइल की उपलब्धता माँगी जाती है. इस पर भी एक तानाशाही और हावी है कि मोबाइल फोन अब सादा न होकर स्मार्ट फोन हो, जिसमें अनेक एप डाउनलोड हो जाएँ, वेबसाइट चल जाएँ. यहाँ सोचना-समझना होगा कि जिस देश में बहुतायत जनसंख्या मूलभूत आवश्यकताओं को पाने के लिए जद्दोजहद कर रही हो वहाँ हर हाथ में स्मार्ट फोन की अनिवार्यता सी बना देना क्रूर मजाक है. शैक्षिक संस्थानों में विद्यार्थी अपने प्रवेश के लिए फॉर्म बाद में भरता है, पहले उसे मोबाइल नंबर उपलब्ध कराना होता है. बैंक में आपका खाता बाद में खुलेगा, पहले आपको स्मार्ट फोन से ओटीपी बताना पड़ता है. रेल-हवाई जहाज में आपकी यात्रा बाद में होती है पहले आपको अपने स्मार्ट फोन में एक एप डाउनलोड करके खुद को सुरक्षित बताना होता है.

 

एक तरह की यह मोबाइल अनिवार्यता तानाशाही जैसा नहीं है? क्या ये अनिवार्य रूप से लागू नहीं कर दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति मोबाइल का उपयोग करे? क्या इस बात के लिए कदम नहीं बढ़ा दिए गए हैं कि हर व्यक्ति स्मार्ट फोन ले और उसमें इंटरनेट की सुविधा हो? क्या यह एक तरह से बहुत बड़े जनमानस को पंगु बनाने जैसा नहीं है? फिलहाल तो हमारी ऐसी बातें लोगों को मजाकिया लगती हैं, ऐसा इसलिए भी क्योंकि मोबाइल के, इंटरनेट के, सोशल मीडिया के अभी लोग मजे ही ले रहे हैं. यद्यपि वे अपने कष्ट को बताते भी हैं तथापि मोबाइल के नशे के आदी हो जाने के कारण उसे छोड़ पाने में कठिनता महसूस करते हैं. जिस चित्र की बात पोस्ट के आरम्भ में ही की थी, यदि उसमें दर्शाया गया समाचार सही है तो यह समझने वाली और चिंतन करने वाली बात है कि जिस व्यक्ति ने मोबाइल फोन का अविष्कार किया वही अब सामान्य ज़िन्दगी में जीने की बात कर रहा है, मोबाइल छोड़ने की बात कर रहा है.




02 मार्च 2022

इंटरनेट कुकीज़ (Internet Cookies) : एक जानकारी

आज लगभग प्रत्येक व्यक्ति इंटरनेट का उपयोग कर रहा है. इंटरनेट का किसी भी रूप में उपयोग करने वाले व्यक्ति ने कुकीज (Cookies) के बारे में जरूर सुना होगा. अक्सर मन में सवाल उठता है कि आखिर ये कुकीज है क्या? इसका कार्य करा होता है? कहीं ये उपयोगकर्ता के लिए, कम्प्यूटर या मोबाइल के लिए हानिकारक तो नहीं है? दरअसल किसी भी उपयोगकर्ता द्वारा इंटरनेट पर जब कोई वेबसाइट को, वेबपेज को खोला जाता है तो उस कम्प्यूटर में एक छोटा टैक्स्ट दर्ज हो जाता है, जिसे कुकी कहते हैं. यह उपयोगकर्ता की जानकारी के बिना एक तरह से परदे के पीछे काम करता है. इसका उपयोग कम्प्यूटर पर व्यक्ति की प्राथमिकताओं को याद रखने और फिर से उसी वेबपेज के खुलने पर ब्राउजिंग गतिविधियों को देखने के लिए किया जाता है. कुछ वेबसाइट उपयोगकर्ता के यूजरनेम, पासवर्ड को याद रखते हैं, इससे उपयोगकर्ता को लॉग इन करने में सहजता होती है. यहाँ विशेष बात ये है कि कुकीज कोई प्रोग्राम नहीं हैं, इस कारण से इनके द्वारा कम्प्यूटर अथवा मोबाइल को कोई नुकसान नहीं होता है. 


हम सभी इंटरनेट पर किसी भी वेबसाइट को देखने के लिए, किसी भी वेबपेज पर जानकारी सर्च करने के लिए किसी न किसी ब्राउज़र का उपयोग करते हैं. कम्प्यूटर हो या फिर मोबाइल, उसमें जब भी किसी ब्राउज़र का उपयोग किया जाता है, वह चाहे गूगल क्रोम हो, फ़ायरफ़ॉक्स हो या इंटरनेट एक्सप्लोरर सहित कोई भी ब्राउज़र हो, उसका इस्तेमाल करके किसी वेबसाइट को चलाया जा रहा हो या फिर किसी जानकारी को सर्फ़ किया जा रहा हो तो उसकी जानकारी एक फाइल के रूप में कम्प्यूटर या मोबाइल में सेव हो जाती है. उदाहरण के लिए इंटरनेट उपयोग करने वाले ने कौन सा कीवर्ड इस्तेमाल किया है, कौन सी वेबसाइट खोली है, किस जानकारी को सर्च किया है आदि तो ऐसी सभी जानकारी एक टेक्स्ट फाइल के रूप में हमारे कम्प्यूटर या मोबाइल डाटा में सेव हो जाती है ताकि इसका इस्तेमाल बाद में किया जा सके. कुकीज हम सबके कम्प्यूटर या मोबाइल की हार्ड ड्राइव में इंटरनेट से स्वतः (ऑटोमैटिक) सेव हो जाती है. इसका लाभ यह होता है कि जब भी दोबारा कोई वेबसाइट खोली जाती है तो उससे सम्बंधित कोई भी पेज खोलने में ज्यादा आसानी होती है. इंटरनेट उपयोगकर्ता की पसंदीदा भाषा को याद रखने, उसके काम के विज्ञापन दिखाने और किसी वेबपेज पर आए लोगों की संख्या जानने के लिए कुकीज का इस्तेमाल किया जाता है. कुकी की सहायता से वेबसाइट उपयोगकर्ता के डेटा को सुरक्षित रखने के साथ ही उसके द्वारा चुनी हुई विज्ञापन की सेटिंग को भी याद रख पाती हैं.




कुकीज के अपने कुछ फायदे और कुछ नुकसान हैं. कुकीज फाइल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह किसी सर्वर की फाइल को सेव करने के लिए बहुत ही कम डाटा लेती है. इस कारण से स्थान भी कम घिरता है और डाटा भी कम खर्च होता है. यदि ब्राउज़र किसी कारण से बंद हो जाता है तो कुकीज का इस्तेमाल करके पूर्व में अपनी खोली हुई Tab को दोबारा खोला जा सकता है. इन फायदों के साथ कुकीज का एक नुकसान यह होता है कि यह उपयोगकर्ता के पासवर्ड, उसकी यूज़र आईडी को पहचानता है, सेव करता है. इस कारण से कई बार यह सुरक्षात्मक दृष्टि से खतरनाक हो सकता है. कई बार कुकीज गोपनीयता को लेकर भी संदिग्ध रहती है. इसके द्वारा यह पता लगाया जा सकता है कि कब किस वेबसाइट को देखा गया है. इसके अलावा एक नुकसान जानकारी के लीक होने अथवा बेचे जाने का भी होता है. कई बार कम्प्यूटर, मोबाइल उपयोगकर्ता इंटरनेट का उपयोग करते समय अपनी जानकारी जैसे नाम, पता या कोई अन्य जानकारी सम्बंधित वेबसाइट पर भरता हैं, तो कुछ वेबसाइट इस जानकारी को अपने पास सेव कर लेती हैं. अक्सर देखने में आता है कि बहुत सी वेबसाइट के द्वारा उपयोगकर्ता की यह जानकारी किसी विज्ञापन कंपनी को बेच दी जाती है. इससे सम्बंधित विज्ञापन कंपनी उपयोगकर्ता को विज्ञापन, संदेशों, ई-मेल आदि के द्वारा परेशान करती हैं. हालाँकि बहुत सी वेबसाइट इस तरह की गोपनीयता को अपने तक सीमित रखने के लिए नियम और शर्तों का उल्लेख करके बताती हैं कि वह वेबसाइट उपयोगकर्ता की जानकारी किसी को भी नहीं बेचेगी. उस वेबसाइट के द्वारा इसका भी उल्लेख किया जाता है कि उपयोगकर्ता द्वारा दी जा रही जानकारी सुरक्षित है.


इंटरनेट पर अनेक तरह की कुकीज काम करती हैं. सामान्य रूप में निम्न तरह की कुकीज को समझा जा सकता है.

सेशन कुकीज (Session Cookies) जब तक किसी वेबसाइट को खोले रहा जाता है, तब तक वह कुकी फाइल वहीं रहती है. जैसे ही वेबसाइट बंद करते हैं, वह अपने आप ही हट जाती है.


परसिस्टेंट कुकीज (Persistent Cookies) यह एक प्रकार से स्थायी कुकी है, जो कम्प्यूटर बंद करने के बाद भी रह सकती है. यह कुकी सामान्यतः एक वर्ष या उससे अधिक समय तक सेव रह सकती है. जब भी सम्बंधित वेबसाइट को खोला जाता है तो इसी कुकी के साथ सम्बंधित जानकारी उपयोगकर्ता को मिलने लगती है.


सिक्योर कुकीज (Secure Cookies) यह कुकी उस वेबसाइट के द्वारा सेव होती है, जो https में खुलती है. यह जानकारी गोपनीय रहती है और सुरक्षित मानी जाती है.


एचटीटीपी ओनली कुकीज (HTTP Only Cookies) यह कुकी उन वेबसाइट के माध्यम से कम्प्यूटर या मोबाइल में सेव होती है जो केवल http में ही खोली जाती हैं. यदि उसी वेबसाइट को सुरक्षित https के द्वारा खोला जाये तो http वाली कुकी जानकारी वेबसाइट को नहीं मिल पाएगी. ऐसी स्थिति में वह कुकी काम नहीं करेगी.


ऐसा नहीं है कि सभी वेबसाइट पर कुकीज स्वतः ही काम करने लगती हैं या फिर इनको बंद नहीं किया जा सकता, हटाया नहीं जा सकता. कोई भी उपयोगकर्ता वेबसाइट का उपयोग करते समय कुकीज को चालू (Enable) या बंद (Disable) कर सकता है. सामान्य रूप में बहुत सी वेबसाइट कुकीज़ को स्वीकार (Accept) करने सम्बन्धी नोटिफिकेशन भेजती हैं. बहुत सी वेबसाइट तो कुकीज अस्वीकार (Decline) करने के बाद भी काम करती रहती हैं मगर बहुत सी वेबसाइट काम करना बंद कर देती हैं या सही ढंग से काम नहीं करती हैं. चूँकि कुकीज फाइल किसी तरह की प्रोग्रामिंग फाइल नहीं होती है ऐसे में इसके स्वीकार (Accept)   करने में कोई समस्या नहीं होती. इसको स्वीकारने से उपयोगकर्ता को वेबसाइट पर अच्छा अनुभव प्राप्त होता है. उसके द्वारा किसी ब्राउज़र पर, किसी वेबसाइट के माध्यम से सम्बंधित जानकारी को आसानी से खोजा जा सकता है.


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05 नवंबर 2020

ई-कंटेंट कोई राकेट साइंस नहीं

कोरोनाकाल के कारण ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था बहुत प्रभावी समझ आ रही है. ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था के बारे में इधर नई शिक्षा नीति में भी जोर दिया गया है. इसके साथ-साथ बहुत सी जगहों पर ऑनलाइन सामग्री को अपलोड किये जाने की नीति बनने लगी है. इस तरफ राज्य सरकार ने भी कदम बढाए और महाविद्यालयीन शिक्षकों के द्वारा बनाये गए कंटेंट को अपलोड करवाए जाने की कवायद शुरू करवा दी गई. इंटरनेट, तकनीक भरे इस दौर में बहुत से लोगों के लिए ई-कंटेंट का बहुत विशिष्ट अर्थ निकाल लिया जाता है. असल में ये कोई राकेट साइंस नहीं है बल्कि हम सबके बीच उपयोग होने वाली शब्दावली ही है. बस जैसे ही किसी भी आम शब्द में, आम कार्य में तकनीक जुड़ जाए, इंटरनेट जुड़ जाए तो उसे एकदम से हौआ समझ लिया जाता है अथवा बना दिया जाता है. इसी तरह से ई-कंटेंट के साथ हुआ है. देखा जाये तो ई-कंटेंट किसी भी रूप में कोई बहुत बड़ी अथवा क्लिष्ट शब्दावली नहीं है, बस उसे समझने की आवश्यकता है.



पहले बात तो हम इसे ऐसे समझें कि हमारे आसपास जो भी सामग्री है, जिस भी तरह से हम जानकारी एकत्र कर रहे हैं वह सब कंटेंट है. इस शब्द को यदि हम हिन्दी में जानने का प्रयास करें तो सामग्री शब्द इसी को कहते हैं. अब संभव है कि आपको कंटेंट शब्द कुछ अपना सा लगा हो. सामान्य बोलचाल में कहें तो वे सभी चीजें कंटेंट हैं जिन्हें हम किसी भी तरह के माध्यम से देखते
, सुनते, पढ़ते या समझते हैं. इसी तरह के कंटेंट से हम जानकारी प्राप्त भी करते हैं और दूसरों तक जानकारी पहुँचाते भी हैं. टीवी पर कोई कार्यक्रम देखना,किसी भी सोशल मीडिया पर कोई वीडियो देखना,कुछ पढ़ना आदि सबकुछ कंटेंट के रूप में ही समाहित है. बस समझने वाली बात इतनी है कि जो जानकारी हम इंटरनेट के द्वारा प्राप्त कर रहे हैं वह कंटेंट तो है मगर इंटरनेट से जुड़ी होने के कारण उसे हम लोग ई-कंटेंट पुकारने लगते हैं. यह सामग्री लिखित, वीडियो, चित्र अथवा ऑडियो के रूप में हो सकती है. मूलरूप से कंटेंट इसी रूप में हमारे आसपास रहता है.


अब सवाल उठता है कि क्या ई-कंटेंट के लिए कुछ ख़ास प्रयास करने होते हैं? क्या ई-कंटेंट में कुछ अलग तरह की विशेषता समाहित रहती है? कुछ लोगों की जिज्ञासा रहती है कि ई-कंटेंट को कितना बड़ा अथवा छोटा होना चाहिए? ऐसा सवाल मुख्यतया लिखित कंटेंट के लिए होता है. यहाँ प्रमुख बात तो ये है कि कंटेंट अच्छा होना चाहिए. वह लोगों द्वारा पढ़ा जाये तो उसका आनंद लिया जाये, दूसरों को भी पढ़ने को प्रेरित किया जाये. कंटेंट चाहे वह टेक्स्ट के रूप में हो, वीडियो के रूप में या फिर ऑडियो के रूप में एक बात विशेष रूप से याद रखनी चाहिए कि वह बहुत लम्बा न हो या फिर बहुत छोटा न हो. पहले पहल कंटेंट के अपलोड करने के लिए ब्लॉग का प्रयोग किया जा सकता है. सीखने की प्रक्रिया से गुजरने के दौरान स्वतः समझ आने लगता है कि किस तरह के कंटेंट की माँग अधिक है. फिलहाल तो किसी भी ई-कंटेंट को लिखते समय, उसे ब्लॉग पर अपलोड करते समय याद रखना चाहिये कि ब्लॉग पर कंटेन्ट इस तरह से लिखा जाए कि लोग उसे पढ़ने को प्रेरित हों तथा अन्य लोगों को भी पढ़ने को प्रेरित करने के साथ-साथ उससे कुछ नया सीखने का प्रयास करें.



08 अक्टूबर 2020

साइबर अपराधियों से सतर्क रहने की आवश्यकता

वर्तमान में समाज के लगभग सभी कार्य इंटरनेट के माध्यम से होने लगे हैं. सरकार हो या आम आदमी, सरकारी संगठन हों या फिर निजी संस्थान, व्यापार हो या फिर नौकरी, शिक्षा हो या समाजसेवा सभी क्षेत्र आज इंटरनेट का लाभ उठा रहे हैं. इस लाभ के साथ अनचाहे ही बहुत से नुकसान भी समाज में दिखाई देने लगे हैं. इंटरनेट जहाँ एक तरफ लोगों को लाभान्वित कर रहा है वहीं दूसरी तरफ वह नुकसान भी पहुँचा रहा है. इस तरह के तमाम सारे नुकसान को साइबर क्राइम या फिर साइबर अपराध के नाम से जाना जाता है. सामान्य रूप में इंटरनेट पर किया जाने वाला कोई भी अपराधिक कार्य साइबर अपराध के अंतर्गत आता है. इस तरह के अपराध में हैकिंग तो शामिल है ही साथ ही बैंकिंग धोखाधड़ी, किसी का डाटा, जानकारी का चुराया जाना, किसी तरह की धोखाधड़ी करके किसी दूसरे के एकाउंट, ईमेल आदि को हैक कर लेना भी साइबर अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया है.


साइबर अपराध में जिस तरह के कार्यों को मुख्य रूप से शामिल किया गया है, उनमें वित्तीय अपराध, अवैध सामग्रियों को बेचना, अश्लील सामग्री का प्रसार-प्रचार, बौद्धिक संपत्ति की चोरी, जालसाजी, आदि हैं. साइबर अपराध की श्रेणी में मुख्य रूप से हैकिंग को शामिल किया गया है. इसमें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के जानकार व्यक्ति द्वारा किसी कंप्यूटर को लक्ष्य करके उसके लिए सम्बंधित प्रोगाम का निर्माण किया जाता है. इसके बाद वे उस लक्ष्य कंप्यूटर में अपने प्रोग्राम के द्वारा एंट्री करके उस सम्बंधित कंप्यूटर से डाटा चोरी करते हैं. ऐसे हैकर्स का मुख्य लक्ष्य आर्थिक लाभ उठाना होता है. वे इसके लिए किसी अन्य व्यक्ति के कंप्यूटर में अवैध प्रवेश करके उसके कंप्यूटर से बैंक, क्रेडिट कार्ड, एटीएम आदि की सूचनाएँ हासिल कर लेते हैं. किसी व्यक्ति की आर्थिक सूचनाओं को चोरी करने के साथ-साथ ऐसे लोग बड़े-बड़े संस्थानों में भी सेंध लगाते हैं.




आर्थिक चोरी के साथ-साथ वर्तमान में इंटरनेट पर बहुत बड़ा बाजार पोर्नोग्राफी का है. बहुत सी वेबसाइट इसके लिए वयस्कों से सम्बंधित बने नियम-कानूनों का इस्तेमाल करके अपना कारोबार करती हैं मगर बहुत सी वेबसाइट ऐसी हैं जो बाल यौन सम्बन्धी सामग्री का प्रसार करती हैं. देखा जाये तो वैश्विक स्तर पर बाल यौन सामग्री का सर्वाधिक प्रसार इंटरनेट के माध्यम से हो रहा है.


इंटरनेट पर अश्लील सामग्री अत्यंत सुलभ है. आजकल हर हाथ में मोबाइल होने से औ हर हाथ में इंटरनेट होने से इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को किसी तक पहुँच बनाना कठिन काम नहीं रह गया है. बच्चे भी अब इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से दूर नहीं रह पाते हैं. यौन अपराध में लिप्त लोग इसी कारण से यौन अपराध के लिए बच्चों को लक्ष्य करते हैं. इसके लिए वे बच्चों में अश्लील सामग्री, वीडियो, फोटो आदि प्रसारित कर उन्हें बहकाते हैं. ऐसी सामग्री को देखने के बाद बहुत से बच्चे भटक जाते हैं. यही बच्चे इन यौन अपराधियों के द्वारा जबरन यौन अपराध में लिप्त कर दिए जाते हैं.  


इन दो मुख्य अपराधों के अलावा साइबर अपराधी भ्रामक ईमेल भेजने के कार्य करता है, जिससे कि यूजर से निजी सूचना लेकर उसके एकाउंट से चोरी करने का प्रयास किया जाये. ईमेल के द्वारा सम्बंधित यूजर को बताया जाता है वह किसी और वेबसाइट में जाकर अपने बैंक की, अपने आधार कार्ड की, अपने पैन कार्ड की, अपने एटीएम की, अपने अन्य किसी दस्तावेज़ की जानकारी भर कर उसे अपडेट करवा ले. ऐसा करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यूजर की समस्त जानकारियों को प्राप्त करना होता है. ऐसा करके साइबर अपराधी सम्बंधित यूजर के साथ धोखाधड़ी कर लेता है. इसके लिए साइबर अपराधी कई बार फोन कॉल करके ओटीपी अथवा अन्य गुप्त कोड को बताने की बात करता है.


अब जबकि इंटरनेट का उपयोग सर्व-सुलभ रूप से किया जाने लगा है और यह उपयोग हमारे दैनिक जीवन की दैनिक क्रियाओं की तरह हो गया है तो हम सबको इसके उपयोग में सावधानी बरतने की भी आवश्यकता है. यहाँ हमें ध्यान रखना होगा कि अपने किसी भी इंटरनेट खाते का पासवर्ड सरल नहीं बनाना चाहिए. हमें अपने खातों का पासवर्ड ऐसा बनाना चाहिए जिसे हैक करना सहज न हो. कभी भी अपने नाम, अपनी जन्मतिथि, अपने मोबाइल नंबर, अपने परिजनों के नाम आदि से सम्बंधित पासवर्ड नहीं बनाना चाहिए. ऐसे पासवर्ड को डिकोड करना आसान होता है.


इसके अलावा किसी को भी फोन पर अपने किसी भी इलेक्ट्रॉनिक कार्ड का ओटीपी, पिन आदि नहीं बताना चाहिए. कई बार साईबर अपराधी स्वयं को सम्बंधित बैंकिंग संस्थान का व्यक्ति बताकर गुप्त कोड की जानकारी कर लेता है. इसके लिए ऐसी किसी भी तरह की कॉल आने पर पुलिस को सूचना दी जानी चाहिए.


इसी तरह से अपने सोशल मीडिया खातों के लिए, अपने बैंक खातों के लिए, अपने व्यापारिक खातों के लिए डबल स्टेप सुरक्षा व्यवस्था को लागू किया जाना चाहिए. इस व्यवस्था में लॉग इन करने पर मोबाइल पर एक गुप्त कोड तत्काल प्राप्त होता है. इस तरह की टू वे वेरिफिकेशन प्रक्रिया अपनाये जाने से भी बहुत हद तक साइबर अपराध को रोका जा सकता है.


इसके अलावा सबसे ऊपर जो बात है, वो ये कि हम सभी को सजग रहने की आवश्यकता है. हम इंटरनेट पर जो भी काम कर रहे हैं, उनसे सम्बंधित सुरक्षा उपायों को, क़दमों को अपनाते हुए ही आगे बढ़ें. किसी भी तरह के इंटरनेट कार्य को करने के पहले यह सुनिश्चित कर लें कि वह सुरक्षित है और साथ ही उस इंटरनेट सम्बन्धी कार्य से हम भी तो अनजाने में कोई साइबर अपराध तो करने नहीं जा रहे. ध्यान रखें कि सावधानी ही बचाव है.


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09 सितंबर 2020

विचार थोपना प्राथमिकता में है

जैसे-जैसे हमें अपनी वैचारिकी के प्रसार-प्रचार के माध्यम मिलते जा रहे हैं, वैसे-वैसे हमारे आसपास संकुचन की स्थिति बनती जा रही है. विचारों का प्रसार करने के साथ-साथ हम सभी लोगों के मन में भावना बनी रहती है कि हमारे उन विचारों को स्वीकारने वाले अधिक से अधिक लोग हों. इसी के साथ एक दूसरी स्थिति भी बनती है जो अमूमन स्पष्ट रूप से दिखाई देने के बाद भी छिपी सी रहती है. यह स्थिति होती है कि कुछ भी हो हमारे ही विचारों को स्वीकारना है. स्वीकारने जैसी अवस्था कब थोपे जाने में बदल जाती है पता ही नहीं चलता है. विचारों के प्रस्फुटन से लेकर उसके थोपे जाने तक का जो विकास मानव जाति ने किया है वह अत्यंत विलक्षण कहा जायेगा. यह शायद ही कोई अस्वीकार करे कि इसके पीछे सोशल मीडिया का और लगभग मुफ्त जैसे इंटरनेट का हाथ है.


इंटरनेट की मुफ्त जैसी हालत और सोशल मीडिया के न के बराबर चलन वाले ज़माने में लोगों के विचारों को, उसकी बातों को ज्ञान का आधार समझा जाता था. यह स्वतः ही मान लिया जाता था कि किसी भी व्यक्ति द्वारा व्यक्त किये जा रहे विचार, लोगों के सामने आता ज्ञान उसके अनुभव का, उसकी शिक्षा का सुफल है. इसे किसी गूगल बाबा के द्वारा जन्मा नहीं समझा जाता था, किसी का कॉपी-पेस्ट किया हुआ नहीं बताया जाता था. सामाजिक स्थितियों में आते परिवर्तन के साथ शिक्षा में, वैचारिकी में भी व्यापक परिवर्तन देखने को मिले. विचारों पर किसी का आधिपत्य सा नहीं रह गया. ज्ञान, जानकारी, तकनीक आदि के प्रसार के लिए यह बहुत अच्छा संकेत था मगर इसी के पीछे-पीछे जो शंकाएँ चली आ रही थीं, वे छिपी न रहीं.


अब ज्ञान के लिए, विचारों के लिए, तकनीक के लिए किसी तरह के स्व-अनुभव की आवश्यकता नहीं. किसी तरह के स्व-अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं बस इंटरनेट की कृपा से घूम-टहल कर बस इतना देखना है कि खुद के मन की बात कहाँ लिखी हुई है. उसे कॉपी करना है और अपना बताकर दूसरों तक पहुँचाना है. यहाँ तक तो शायद ठीक भी रहता मगर हद तो तब हो गई जबकि विचारों को जबरिया मानने के लिए बाध्य किया जाने लगा. अगले ने जो लिखा है वही परम सत्य है, उसके आगे कुछ नहीं. यदि उसकी बात को काटा जा रहा है, उस पर किसी तरह की तार्किक बात की जा रही है तो विश्व युद्ध जैसी स्थिति बनी मानिए. विचारों के सन्दर्भ में उठा विमर्श कहिये आपकी निजी, व्यक्तिगत बातों तक पहुँच जाए. कहिये खुद के बारे में ऐसी-ऐसी बातें सुनाई पड़ जाएँ जो खुद को भी ज्ञात न हों. विचारों के प्रस्फुटन की तीव्रता के साथ इतनी संकुचित अवस्था शायद ही पहले कभी देखने को मिली हो.

बहरहाल, आज का दौर तकनीक का दौर है और तकनीक में वही गुरु है जो आपको एक क्लिक पर सबकुछ उपलब्ध करवा दे. उसके बाद अपने आपको यदि गुरु साबित करना है, यदि अपने विचारों की महत्ता सबके ऊपर थोपनी है तो फिर उन विचारों को (भले ही वे चोरी के हों) दूसरों से जबरिया स्वीकार करवाना ही है. उनके विचारों को गलत साबित करना ही है. ज्ञान-विज्ञान-तकनीक के दौर में विचारों का महत्त्व संभवतः इसी कारण कम होता जा रहा है, कोई किसी की बात सुनना-स्वीकारना पसंद नहीं कर रहा है. वर्तमान परिदृश्य में जहाँ समाज बचाना, जान बचाना, भविष्य बचाना प्राथमिकता में है वहीं विचारों का बचाया जाना भी लोगों को अपनी प्राथमिकता में शामिल करना होगा.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

30 जनवरी 2020

पुरानी प्रकाशित रचनाएँ जल्द ही नए स्वरूप में


कई दिनों से अपने तमाम अधूरे कामों को पूरा करने के बारे में विचार किया जा रहा है. अनेक अधूरे कामों के बीच एक अधूरा काम पुरानी पुस्तकों का पुनः प्रकाशन करवाना भी है. असल में कुछ साल पहले दिमाग में एक खुरापात ने जन्म लिया, इसे खुरापात इसीलिए कहा जायेगा क्योंकि जिस काम का कोई ओर-छोर न हो उसे करना शुरू कर दिया जाये तो और क्या कहा जायेगा. बचपन से लेखन के शौक ने अनेकानेक रचनाओं को कागज़ पर उतार दिया था. आज भी तकनीकी के इस दौर में भले ही सोशल मीडिया का उपयोग हम भरपूर तरीके से कर रहे हैं मगर उस दौर में जबकि कम्प्यूटर, इंटरनेट हमारे लिए सिर्फ ख्वाब था, तब हम कागजों पर ही अपने विचारों की नाव तैराते रहते थे. इसी में गद्य, पद्य की अनेक रचनाओं का जन्म हुआ. कहानी, कविताएँ, ग़ज़ल, लघुकथा, नाटक, लेख, शोध-आलेख, यात्रा-वृतांत, संस्मरण आदि-आदि का लिखना लगातार और नियमित रूप से होता रहा.


कागज पर कागज अपनी-अपनी फाइल में जगह पाते जा रहे थे. कविताओं, ग़ज़लों वाली डायरियाँ लगातार बढ़ती जा रही थीं. ऐसे में दिमाग ने सनकाया कि इनको प्रकाशित करवाया जाये. ऐसे घर में सहेजे-सहेजे इनसे किसी का लाभ होने वाला नहीं है. उस विचार के आने के बाद भी कहीं यह विचार नहीं जन्मा कि इनके प्रकाशन का कोई व्यावसायिक इस्तेमाल करना है. स्वान्तः सुखाय, लेखन का शौक इतनी रचनाओं की प्रक्रिया से हमें खुद गुजार देगा ये भी कभी नहीं सोचा था. अपनी रचनाओं की इतनी बड़ी संख्या के बारे में इसलिए भी नहीं सोचा था क्योंकि पढ़ाई के दौर में एक लम्बा समय ऐसा भी आया था जबकि लिखना बिलकुल बंद कर दिया था. अब जबकि दिमाग में कीड़ा कुलबुलाया, लेखन को सबके बीच लाने की मंशा बनी तो इधर-उधर से जुटाए गए नगण्य से खजाने से कभी-कभी प्रकाशन का खेल भी खेल लिया गया. जेब इतनी भारी नहीं रहती थी कि बाहर किसी बड़े-छोटे प्रकाशक की तरफ देख भी सकते और अपने शौक को किसी के एहसान के साथ परवान चढ़ाने की मानसिकता न होने के कारण किसी से इस बारे में बहुत चर्चा भी नहीं की. 

अत्यल्प संसाधनों के द्वारा अत्यंत कम संख्या में प्रतियों का प्रकाशन स्थानीय स्तर पर उरई में ही करवाया जाता रहता. आपस के लोगों में, परिचितों में, उपहार के रूप में, कभी आदान-प्रदान के रूप में इन पुस्तकों का वितरण होता रहा. असल में पुस्तकों के लघु-आकार में होने के कारण, सामान्य सी साज-सज्जा के कारण और हमारा खुद का व्यावसायिक मानसिकता से मुक्त होने के कारण उनको बाजार की तरफ नहीं ले जा सके. बाजार ले जाने की मंशा आज भी नहीं है. तकनीकी के आज के दौर में अपनी उन्हीं सारी पुस्तकों को इंटरनेट के द्वारा आप सभी के बीच लाने का प्रयास है. उस समय भी पुस्तक प्रकाशन की मंशा अपनी रचनाओं को अपने लोगों के बीच भेजने की थी, आज भी यही मानसिकता है. इंटरनेट के कारण, सोशल मीडिया के कारण आज हमारे अपनों की संख्या में वृद्धि हुई है. ऐसे में वे सभी लोग और हमारी रचनाएँ आपस में एक-दूसरे से परिचित हो सकें, ऐसी सोच है. इसी सोच के चलते पुरानी रचनाओं को इकठ्ठा करके आप सबके बीच लाने का एक और प्रयास किया जाना है.


05 फ़रवरी 2019

इंटरनेट के नश्वर जीवन में सजग रहें


क्षणभंगुर जीवन की कलिका, काल प्रात को जाने खिली न खिली, ये पंक्ति बचपन से सुनते आ रहे हैं. इसी के साथ बताया जाता रहा कि ये जीवन नश्वर है, एक न एक दिन मिट्टी में मिल जाना है, समाप्त हो जाना है. बचपन में तो इसके अर्थ, सन्दर्भ, प्रसंग समझ-रट लिया करते थे मगर इसका यथोचित भावार्थ उम्र बढ़ने के साथ हुआ. जीवन की नश्वरता देखी भी, समझी भी, एहसास भी की. जीवों के जीवन की नश्वरता की तरह वे सभी तत्त्व नश्वर ही कहे जा सकते हैं जिनमें किसी न किसी रूप में जीवन है. यही नश्वरता कुछ समय से अन्य दूसरे तत्त्वों में भी दिखाई देने लगी है. एक क्षण को यह हास्य का विषय हो सकता है किन्तु गंभीरता से देखा जाये तो इसके प्रति सजग-सचेत रहने की आवश्यकता है. ठीक उसी तरह जैसे कि हम अपने जीवन के प्रति रहते हैं, स्वास्थ्य के प्रति रहते हैं, शरीर के प्रति रहते हैं, सुरक्षा के प्रति रहते हैं. वर्तमान जीवन में अपनी सशक्त उपस्थिति बना चुके ये तत्त्व अनादिकाल से हमारे साथ नहीं हैं वरन इसी आधुनिक समाज, आधुनिक तकनीक, संचार-क्रांति के उत्पाद हैं. इनको सोशल मीडिया के रूप में, ईमेल के रूप में, विभिन्न वेबसाइट के रूप में, इंटरनेट के बहुत से माध्यमों में बने एकाउंट के रूप में, मोबाइल के रूप में देखा-समझा जा सकता है.


हो सकता है कि आपको आश्चर्य लग रहा हो कि इनके साथ कैसी नश्वरता? इनको लेकर कैसी सजगता? आश्चर्य के बीच शायद आप सबको खबर हो गई होगी कि गूगल प्लस अप्रैल माह के पहले हफ्ते से बंद होने जा रहा है. गूगल की तरफ से जारी एक विज्ञप्ति में विस्तार से इसके बारे में बताया गया है. यदि स्मरण हो तो ऐसा ही कुछ सालों पहले ऑरकुट के साथ भी हुआ था. कुछ ईमेल सुविधा देने वाले माध्यम भी अब उतने उपयोग में नहीं हैं जितने कि किसी दौर में हुआ करते थे. बीच-बीच में व्हाट्सएप्प को लेकर भी ऐसी आशंकाएँ, खबरें सामने आती रहीं किन्तु वह अभी तक हम सबके बीच जीवित है. इन सबके अलावा ब्लॉग एग्रीगेटर भी समय-समय पर इस तकनीकी संसार से मिटते गए. बहुत से ब्लॉग , वेबसाइट भी काल-कलवित होते गए.

एक दृष्टि से देखा जाये तो हमारे अधिकार-क्षेत्र में होने के बाद भी इन सभी माध्यमों पर मालिकाना हक़ किसी और का होता है. उत्पाद के न चलने, उपभोक्ताओं के मध्य प्रसिद्द न होने की दशा में उसके बंद किये जाने का निर्णय उसी मालिक का होता है. ऐसे में सजगता इतनी बनाये रखनी है कि जो भी सामग्री आप अपने किसी भी माध्यम पर शेयर कर रहे हैं वह आपके पास किसी न किसी माध्यम में सुरक्षित रहनी चाहिए. ताकि आपातकाल की स्थिति में आप उसका उपयोग कर सकें. इसके अलावा किसी भी माध्यम पर निर्भरता इतनी नहीं होनी चाहिए कि वही आपका जीवन समझ आने लगे. ऐसा होना वर्तमान में तो स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल ही रहा होगा, उसका पूर्णतः बंद होना मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. हालाँकि इनके जीवन की साँस बंद होने के पहले, इनका जीवन समाप्त होने के पहले इनके उपभोगकर्ताओं को पर्याप्त सूचना-समय प्रदान किया जाता है फिर भी किसी भी जीव-तत्त्व के जीवन की नश्वरता की तरह इन तकनीक तत्त्वों, माध्यमों को भी नश्वर मानते हुए इनके साथ सुरक्षित समय व्यतीत करने की कोशिश की जानी चाहिए.