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25 जुलाई 2026

बात को समझो

आरक्षण विरोधी नेताओ, तुमको एक रास्ता दिखा दिया गया है इस उत्पाती आन्दोलन के द्वारा निकले इस्तीफे से. सरकार ने एक इशारा कर दिया है कि उत्पात के द्वारा भी समाधान हो सकता है. यदि एक इस्तीफ़ा हो सकता है तो आरक्षण भी हट सकता है. यदि नीट पेपर लीक के कारण जान गँवाने वाले बच्चों को इस्तीफ़े का आधार बनाया जा सकता है तो बहुत से प्रतिभाशाली बच्चों ने आरक्षण के कारण जान गँवाई है, इसे भी आरक्षण समाप्ति का आधार बनाया जा सकता है.

 

जंतर-मंतर के हंगामे से, इस इस्तीफे से न तो पेपर लीक की घटनाएँ रुकनी हैं, न शिक्षा व्यवस्था में कोई बहुत बड़ा सुधार होने वाला है. हाँ आरक्षण को लेकर एक और आन्दोलन शुरू करने का अवसर मिल गया.

विचार करो अब पूरे घटनाक्रम पर, पिछले कुछ बयानों पर तब दिखाई पड़ेगा कि जहाँ तुम लोगों का सोचना बंद होता है, उससे कहीं आगे जाकर अगले का सोचना शुरू होता है.

 

समझे…???

 


23 जुलाई 2026

मिली भगत की आशंका

जंतर मंतर पर सीजेपी का धरना-अनशन कार्यक्रम शुरू होने के तीन-चार दिन बाद से ही हम ये विचार कर रहे थे कि यहाँ सबकुछ हो रहा है पर इनका हुल्लड़ नहीं हो रहा है. हमें इसलिए ऐसा लग रहा था क्योंकि हमारा व्यक्तिगत विचार ये है कि यह सब कुछ तमाम राजनैतिक दलों और सरकारी तंत्र की मर्जी से ही हुआ है.

 

ग़ौर करिए, अनशन करते वांगचुक को हॉस्पिटल भेजना रहा हो, संसद तक मार्च करना रहा हो आदि संसद के मानसून सत्र के ठीक पहले हुआ. मिलीभगत से चलने वाले आन्दोलन से राजनैतिक शून्यता की तरफ़ जाते नेताओं को संजीवनी मिली, एथेनॉल, मंदिर चढ़ावा चोरी से लोगों का ध्यान भटका, नेता जी और चढ़ावा चोरी अभियुक्त के बीच 900 से अधिक कॉल का मामला छिप गया, दल-बदल को लेकर किसी तरह का कोई मसला न रहा, हंगामे के बीच पेपर लीक और इस्तीफ़ा भी बौना नजर आने लगा.

 

हमारे व्यक्तिगत विचार में बहुत सी बातें हैं जिन पर यहाँ की बजाय अपने ब्लॉग पर लिखेंगे. अब ये मंच जोकरों का, बददिमाग़ों का, संकुचितों का अड्डा बनता जा रहा है, जहाँ सबके सब अपनी ही व्यक्तिगत कुंठित सोच के सहारे प्रत्येक परिदृश्य को देखने लगे हैं. यदि आप लोगों ने ग़ौर किया हो तो हंगामा करने वाले नेतागीरी करते हुए पुलिस बल पर हावी हुए और पिट गए वे मासूम बच्चे जो शिक्षा व्यवस्था को सुधारे जाने का ख्वाब लेकर आए थे. आंदोलनकारियों का एक मुखिया सेहत के नाम पर हॉस्पिटल में, एक बर्गर खाने के आरोप में बाहर, एक मंत्री से मिलने की बेताबी में अलग.

 

बात इतनी भी नहीं, यदि विपक्षी दल वाक़ई में कोई बदलाव चाहते तो एकजुट रहते मगर नहीं. सभी इस आन्दोलन का लाभ लेने की मंशा में एकदूसरे पर ही आरोप लगाने लगे. दो दलों ने तो इसे भाजपा-कांग्रेस की मिलीभगत बता दिया क्योंकि युवराज ने आकर सबको पीछे कर दिया. सोचिए आप लोग ख़ुद के व्यवहार पर. हम-आप इन राजनैतिक दलों की कठपुतली मात्र हैं. हमारी-आपकी सोच से कहीं आगे जाकर ये सोचते-काम करते हैं. ये सब एक हैं और यदि आपस में कोई दुश्मन है तो हम और आप ही.

 

विचार करियेगा.


26 मई 2026

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर शोर मचाने वालो

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर अनावश्यक शोर मचाने वालो, क्या तुमको याद है कि इससे पहले पेट्रोल-डीजल की कीमतें कब बढ़ाई गई थीं? नहीं पता होगा, क्योंकि तुम लोगों को शोर मचाने से मतलब है न कि कुछ तथ्यात्मक खोजबीन करने से.

 

6 अप्रैल 2022 को पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि हुई थी. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने की वजह से मार्च-अप्रैल 2022 में लगातार दाम बढ़ाए गए थे और 6 अप्रैल 2022 को इस वृद्धि का आखिरी दिन था. इसके बाद दैनिक कीमतों में बदलाव पर लंबी रोक लग गई थी.

 



मई 2022 में केन्द्र सरकार ने उत्पाद शुल्क को कम किया जिससे पेट्रोल आठ रुपये और डीजल छह रुपये प्रति लीटर सस्ता हुआ. (वैसे ये याद नहीं होगा चिल्ला-चोट मचाने वालों को.) मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले केन्द्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दामों में दो रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी. (ये याद है? नहीं न!) इसके बाद अब मई 2026 में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि हुई है. पिछले चार सालों में स्थिर कीमतों में तुम लोगों ने जरा भी साँस न ली. कुछ दिन अपनी साँस को उसी तरह स्थिर किये रहो, वैश्विक संकट दूर होते ही तुम लोग फिर से साँस लेने लगना.


09 मई 2026

महापुरुषों का सम्मान या फोटो खिंचवाने की चाहत?

यदि महाराणा प्रताप के चरणों में पुष्प अर्पित कर दिए जाते तो क्या ये उनके प्रति सम्मान न होता?

 

आजकल सम्मान का अर्थ महापुरुषों के बराबर खड़े होने से है, उनको माल्यार्पण करने से है. इसी सनक ने मूर्तियों/प्रतिमाओं की भव्यता को समाप्त कर दिया है. उरई शहर की लगभग सभी प्रतिमाओं/मूर्तियों में इस तरह की सीढ़ियाँ लगवा दी गई हैं. इससे नेताओं के, जनप्रतिनिधियों के कथित अहं को संतुष्टि भी मिल जाती है. जिला प्रशासन को, जिला जनप्रतिनिधियों को लगातार लिखित, मौखिक निवेदन करने के बाद भी किसी पर कोई असर नहीं हो रहा है. दिखावे का सम्मान महापुरुषों की दिव्यता-भव्यता पर हावी है.




05 मई 2026

जनादेश, व्यक्तिगत अहंकार और संविधान

भारतीय संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनादेश को मान्यता देती है तो जनप्रतिनिधियों से भी आदर्श स्थापन की अपेक्षा करती है. वर्तमान में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल विधानसभा चुनाव हार चुका है और भाजपा बड़े दल के रूप में सामने आई है. चुनाव परिणामों की इस स्थिति में सामान्य कदम सत्ताधारी दल के मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा देना होता है किन्तु पश्चिम बंगाल में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करना लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ संविधान से भी मजाक करने जैसा है. सामान्य रूप में इसे भले ही एक राजनीतिक संकट के रूप में देखा जा रहा हो किन्तु ऐसा नहीं है. भारतीय संविधान ऐसी स्थितियों में भी सशक्त प्रावधानों के साथ जनादेश के विरुद्ध सत्ता हथियाने के कुत्सित इरादों को रोकता है.

 

सबसे पहले यहाँ संविधान के अनुच्छेद 172(1) की उस शक्ति को समझना होगा, जिसके अनुसार राज्य की विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष के लिए होता है. इस पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् सम्बंधित विधानसभा का विघटन हो जाता है. यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को समाप्त हो रहा है. ऐसे में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भले ही इस्तीफ़ा न देने की जिद पर अड़ी हों मगर उनको ये समझना होगा कि वर्तमान विधानसभा के संवैधानिक रूप से अस्तित्वहीन हो जाने पर उनका अस्तित्व क्या होगा? विधानसभा के अस्तित्व में न रहने की स्थिति में उसके आधार पर नियुक्त मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद का कानूनी एवं संवैधानिक आधार स्वतः ही समाप्त हो जाएगा. सदन के अस्तित्व में न रहने पर किसी व्यक्ति का अपने पद का बने रहना संवैधानिक रूप से असंभव है.

 


इस संवैधानिक अनुच्छेद के होने के साथ-साथ विवाद की ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका प्रमुख हो जाती है. अनुच्छेद 164(1) के अन्तर्गत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री भी राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद पर कार्य करता है. सामान्य स्थितियों में मुख्यमंत्री का अपने पद पर बने रहना सदन में उसके प्रति बहुमत से निर्धारित होता है किन्तु चुनाव जैसी स्थितियों में इसका निर्धारण जनादेश के माध्यम से होता है. पश्चिम बंगाल में स्पष्ट है कि वर्तमान सत्ताधारी दल पराजित हो चुका है, ऐसे में वहाँ राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ सक्रिय हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने भी एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ तथा इसके बाद के अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर होना चाहिए लेकिन जब नई विधानसभा के चुनाव संपन्न हो चुके हों तो नया जनादेश पिछले किसी भी बहुमत पर भारी पड़ता है. सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 11 मार्च 1994 को यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था. यद्यपि इस मामले का मुख्य उद्देश्य अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग रोकना और सदन के पटल पर बहुमत परीक्षण को अनिवार्य बनाना था तथापि इसी निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनादेश ही सरकार की वैधता का अंतिम स्रोत है. जैसे ही नई विधानसभा के चुनाव होते हैं, पुरानी विधानसभा और उसके विश्वास का आधार समाप्त हो जाता है. स्पष्ट है कि ममता बनर्जी वर्तमान में अपने मुख्यमंत्रित्व के अस्तित्व में नहीं हैं. वैसे भी संवैधानिक रूप से चुनाव परिणामों के पश्चात निवर्तमान मुख्यमंत्री का इस्तीफा अनिवार्य कदम नहीं बल्कि यह एक लोकतांत्रिक शिष्टाचार और परम्परा है. इसके उल्लंघन होने पर राज्यपाल संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री को पदमुक्त करने का, बर्खास्त करने का आदेश भी जारी कर सकते हैं. ऐसा कदम पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ममता बनर्जी के सन्दर्भ में भी उठा सकते हैं क्योंकि ममता बनर्जी के पास अब न तो जनादेश है और न ही सदन का अस्तित्व.

 

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 73 के अन्तर्गत चुनाव आयोग नई विधानसभा के गठन के लिए विधिवत गठित अधिसूचना जारी करता है. अधिसूचना के जारी होते ही नई विधानसभा अस्तित्व में आ जाती है. अब चूँकि पश्चिम बंगाल में इसी 07 मई को पुरानी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और अगले दिन राज्य में वैध सरकार न होने की स्थिति में राज्यपाल ऐसा कदम उठाने के लिए स्वतन्त्र हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद चुनाव आयोग ने नई विधानसभा के गठन हेतु आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. यह अधिसूचना राज्यपाल को सौंपी जा चुकी है जिसके पश्चात नई सरकार के गठन तथा शपथ ग्रहण का मार्ग प्रशस्त हो गया है. ममता बनर्जी भले ही पद न छोड़ रही हों किन्तु अब राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार है कि वे चुनाव आयोग की अधिसूचना प्राप्त हो जाने के बाद भाजपा के विधायक दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं. राज्यपाल अनुच्छेद 163 और 164 के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए विजयी दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं. नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण लेते ही पूर्व मुख्यमंत्री का दावा कानूनी रूप से शून्य हो जाएगा. प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी राज्यपाल द्वारा नई सरकार के गठन का आदेश देते ही राज्य की सम्पूर्ण नौकरशाही नए मुख्यमंत्री के प्रति उत्तरदायी हो जाती है. निवर्तमान मुख्यमंत्री का कोई भी आदेश अवैध माना जाएगा. स्पष्ट है कि राज्यपाल का आदेश स्वतः ही ममता बनर्जी की जिद को अस्तित्वहीन कर देगी.

 

भारतीय लोकतंत्र में जनादेश सर्वोच्च है. यदि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं तो भी वे केवल एक कब्जेधारी की स्थिति में होंगी न कि संवैधानिक शासक की. संविधान ने राज्यपाल को अनेक विवेकाधीन अधिकार दिए हैं जिनके द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी व्यक्तिगत अड़ियल रुख को दूर किया जा सके. विधानसभा का पाँच वर्ष पूरा होना ममता बनर्जी के अड़ियलपन के ताबूत में अंतिम संवैधानिक कील होगा. इसके बाद भाजपा का सरकार बनाना न केवल राजनीतिक वास्तविकता होगी बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक कदम भी.


19 अप्रैल 2026

परिसीमन के जाल में उलझा महिला आरक्षण

लोकसभा में दो तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित न हो सका. केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन के उद्देश्य से इस विधेयक को लोकसभा में रखा गया था. इस विधेयक के द्वारा लोकसभा की सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करना था. देखा जाये तो इस विधेयक का उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को बदलना नहीं बल्कि लोकसभा की सीटों को अधिक करना था. ऐसा करने के पीछे का मंतव्य 2023 में पारित किये जा चुके नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने की अनिवार्य शर्त के रूप में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना था. 2023 में पारित इस अधिनियम के द्वारा महिलाओं को लोकसभा एवं राज्य की विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण प्रदान किया जाना है लेकिन इसके लागू होने के सन्दर्भ में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना अनिवार्य शर्त के रूप में है. लोकसभा में परिसीमन विधेयक के पारित न होने ने भारतीय संघवाद, क्षेत्रीय संतुलन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के आपसी संकटों को उजागर कर दिया है.

 

प्रथम दृष्टया देखा जाये तो इस विधेयक के पारित न हो पाने को लोकसभा सीटों के न बढ़ने के रूप में, देश पर आर्थिक बोझ न बढ़ने के रूप में देखा जा रहा है. इसके सापेक्ष यदि महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर विचार की दृष्टि से देखा जाये तो इस विधेयक का पारित न होना महिला आरक्षण के प्रति नकारात्मक भाव को उत्पन्न करता है. इस विधेयक के गिरने से 2029 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत भागीदारी मिलने की उम्मीदें लगभग समाप्त हो गई है. इसे एक तरह के संवैधानिक धोखे के रूप में देखा जाना चाहिए जो महिलाओं को राजनैतिक प्रतिनिधित्व देने का सपना दिखाता है किन्तु उसके क्रियान्वयन को परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रिया से आबद्ध कर देता है.

 

लोकसभा सीटों का परिसीमन सदैव से एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील संवैधानिक मुद्दा रहा है. यही कारण है कि वर्तमान समय में भी लोकसभा की सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बना हुआ है. 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के द्वारा लोकसभा सीटों के परिसीमन को 2000 तक के लिए रोक दिया गया था. कालांतर में इस रोक को 2001 में 84वें संविधान संशोधन के द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया था. ऐसा करते समय तर्क दिया गया था कि 2026 तक देश में जनसंख्या वृद्धि की दर स्थिर हो जाएगी जिससे सीटों के बँटवारे में किसी राज्य को अन्याय महसूस नहीं होगा. ऐसे में यदि संविधान संशोधन के द्वारा परिसीमन पर लगी रोक को आगे न बढ़ाया गया तो 2026 के बाद संवैधानिक रूप से परिसीमन करवाना होगा. सीटों के बँटवारे को लेकर अन्याय जैसा भाव उत्तर और दक्षिण राज्यों के मध्य सदैव से बना रहा है. उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच जनसंख्या वृद्धि का असंतुलन है. दक्षिण भारतीय राज्यों ने दशकों तक प्रभावी ढंग से परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को लागू किया जबकि उत्तर भारतीय राज्यों की जनसंख्या निरन्तर बढ़ती रही. वर्तमान परिसीमन विधेयक के आने पर दक्षिण राज्यों का यही कहना था कि यदि आज की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन लागू किया गया जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों की संसद में हिस्सेदारी कम हो जाएगी.

 

विधेयक के पारित न होने ने जहाँ महिला आरक्षण की गति को अवरोधित किया है वहीं निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन रुकना भी एक प्रकार के नुकसान के रूप में सामने आया है. कई शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व का अधिक होना, ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत छोटी सीटों का होना भी लोकतान्त्रिक प्रणाली में एक तरह की बाधा है. इससे एक वोट, एक मूल्य का लोकतांत्रिक सिद्धांत कमजोर प्रतीत हो रहा है. वर्तमान में एक-एक सांसद बहुत बड़ी संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो कई बार सांसदों की संसदीय जवाबदेही को कम करता है. इस दृष्टि से लोकसभा में सीटों की संख्या न बढ़ना एक प्रकार की प्रशासनिक हानि है क्योंकि लोकसभा सीट न बढ़ने की स्थिति में मतदाताओं और उनके प्रतिनिधि के बीच की दूरी को कम करने का एक अवसर हाल-फ़िलहाल कम हुआ है.

 

परिसीमन विधेयक के लोकसभा में पारित न होने ने महिलाओं के राजनैतिक अधिकारों की प्राप्ति की राह में एक अवरोध उत्पन्न किया है. यहाँ इस विफलता के पीछे से एक सवाल उपजता है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के पारित होने के समय लोकसभा सीट का परिसीमन होना अनिवार्य शर्त के रूप में परिलक्षित था तो अब परिसीमन विधेयक का विरोध क्यों? 2023 में महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक सभी संसद सदस्यों के पास पहुँचा होगा, उसी समय परिसीमन का विरोध न करके महिला आरक्षण सम्बन्धी विधेयक को पारित करवा देना अलग ही कहानी कहता है. बहरहाल, महिला आरक्षण के भविष्य और लोकसभा सीटों के परिसीमन पर लगी रोक की समय-सीमा को देखते हुए इतना ही कहा जा सकता है कि परिसीमन केवल सीटों का गणित न बनकर भारतीय संघ के सभी घटकों के बीच विश्वास का आधार बने. वर्तमान स्थिति में परिसीमन विधेयक के गिरने को तात्कालिक राजनीतिक लाभ के स्थान पर दीर्घकालिक संवैधानिक हितों के सन्दर्भ में देखने और सँवारने की आवश्यकता है.

29 मार्च 2026

समावेशी राष्ट्र हेतु समान नागरिक संहिता

गत माह गुजरात समान नागरिक संहिता को लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया. इससे पूर्व फरवरी 2024 में उत्तराखण्ड ने इसे लागू किया था. यह संहिता मुख्य रूप से विवाह, तलाक और विरासत जैसे व्यक्तिगत मामलों को सभी नागरिकों के लिए एकसमान रूप से प्रभावी करती है. यह किसी राजनैतिक दल विशेष की मानसिकता की उपज नहीं बल्कि देश की आज़ादी के तुरंत बाद ही व्यापक दृष्टिकोण से जन्मी अवधारणा है. नवम्बर 1948 में संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने पर लम्बी बहस चली. बहस में इस्लामिक चिन्तक मोहम्मद इस्माईल, जेड.एच. लारी, हुसैन इमाम, नजीरुद्दीन अहमद सहित अनेक मुस्लिम नेताओं ने अम्बेडकर का विरोध किया था. तब अम्बेडकर ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा था कि देश में एक आपराधिक विधि संहिता है, दंड विधान में एक विधि है, सम्पत्ति हस्तांतरण का एक विधान है. बहस के दौरान जबरदस्त विरोध के बीच मतदान करवाया गया, जिसमें अम्बेडकर के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया. समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले मुस्लिम सदस्यों के पराजित होने के पश्चात् संविधान के अनुच्छेद 44 में बहुमत से समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने सम्बन्धी विधान लाया गया. इस प्रस्ताव के लाये जाने के बाद भी समान नागरिक संहिता को लागू करने का विचार कुछ वर्षों के लिए इसलिए टाल दिया गया ताकि बँटवारे की त्रासदी झेल रहे मुसलमानों के प्रति सौहार्द्र दर्शाया जा सके. संविधान सभा द्वारा सौहार्द्र दर्शाने के बावजूद मुस्लिम कट्टरता बढ़ती गई, मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया और समान नागरिक संहिता की राह संकीर्ण होती गई. इसी विरोध और कट्टरता के चलते 1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जन्म हुआ. तबसे यह समान नागरिक संहिता का विरोध करते हुए शरीयत को संविधान और कानून से ऊपर बताता-मानता है.

 



चूँकि समान नागरिक संहिता लागू किये जाने का बिन्दु भाजपा द्वारा उठाया जाता रहा है ऐसे में गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों द्वारा इसे राजनैतिक रंग देकर विवादित बना दिया गया है. इन राजनैतिक दलों का आरोप है कि भाजपा द्वारा ध्रुवीकरण के लिए इस विषय को उठाया जाता है. ऐसे आरोपों के बीच यह समझना होगा कि आज़ादी के तुरंत बाद तो भाजपा नहीं थीउस समय हिंदुत्व साम्प्रदायिकता जैसी कोई स्थिति भी नहीं थी तब उस समय संविधान सभा द्वारा समान नागरिक संहिता को लागू करने का विधान क्यों बनाया गया? तब भी मुस्लिम सदस्यों द्वारा इस संहिता का विरोध क्यों किया गयाआखिर सभी नागरिकों के एकसमान अधिकार होने का विरोध क्योंशरीयत की बात करने वाला कट्टरपंथी मुसलमान क्या सभी कार्य शरीयत के अनुसार ही करता हैकिसी मुसलमान द्वारा अपराध किये जाने पर शरीयत के अनुसार उसको कोड़े मारनाहाथ काटनापत्थर मारनाफाँसी पर लटकाना आदि जैसी सजाएँ दी जाती हैंकुरान में बाल विवाह प्रतिबंधित है. उसके अनुसार विवाह केवल बालिग स्त्री-पुरुष के बीच हो सकता है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार ख्याल-उल-बलूग अर्थात बाल विवाह का प्रावधान है. कुरान के अनुसार तलाक बिना अदालती हस्तक्षेप के सम्भव नहीं जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार मुस्लिम मर्द को अपनी मर्जी से तलाक लेने का अधिकार है. ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके आधार पर न ही शरीयत का सम्पूर्ण पालन होता दिखता है न ही कुरान और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में समन्वय दिखता है. ऐसे में आखिर शरीयत की दुहाई देते हुए समान नागरिक संहिता का विरोध क्यों किया जाता है

 

देखा जाये तो भारतीय लोकतंत्र के विकसित और सशक्त राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में समान नागरिक संहिता केवल राजनैतिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की अनिवार्यता है. भारतीय संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से जिस स्वप्न को नीति निदेशक तत्वों में संजोया था, उसे वर्तमान की कसौटी पर परखने का समय आ गया है. एक देश में नागरिक कानूनों की विविधता न केवल प्रशासनिक जटिलताएँ पैदा करती है, बल्कि यह उस संवैधानिक संकल्प के भी आड़े आती है जो हर नागरिक को कानून के समक्ष बराबरी का अधिकार देता है.

यहाँ समझना होगा की कानूनी समानता के लिए अस्तित्व में आने वाली समान नागरिक संहिता किसी धार्मिक आस्था पर चोट नहीं है, किसी भी व्यक्ति को उसके मजहबी आचरण से विलग करने की नीति नहीं है बल्कि इसके द्वारा मानवाधिकारों की सुरक्षा का, व्यक्तिगत पहचान को पुख्ता करने का कदम है. एक ऐसे देश में जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता है, वैचारिक स्वतंत्रता है वहाँ एक संहिता के द्वारा किसी को कैसे प्रतिबंधित किया जा सकता है? समान नागरिक संहिता एक नागरिक के प्रति उसके अधिकार और उसे मिलने वाले न्याय की प्रक्रिया को सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान करती है.

 

राष्ट्रीय एकता और अखंडता के दृष्टिकोण से भी कानूनों का यह सरलीकरण आवश्यक है. इससे न केवल नागरिकों के बीच एकसमान अवधारणा कार्य करेगी बल्कि न्यायपालिका के लिए भी वर्षों से लंबित पड़े पारिवारिक विवादों का निपटारा करने में सहजता होगी. बेशक, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सर्वसम्मति बनाना एक चुनौती है किन्तु यह समझना भी होगा कि सुधार कभी भी यथास्थितिवाद से नहीं आते. समान नागरिक संहिता वास्तव में आधुनिक और समतामूलक समाज की अवधारणा पुष्ट करती है. इसके लिए हमें संकीर्णता से ऊपर उठकर एक विधान के विचार को धरातल पर उतारना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियाँ संगठित और न्यायप्रिय भारत का निर्माण कर सकें.

 

17 मार्च 2026

बारूद के ढेर पर खड़ी दुनिया की ख़ामोशी

इस वर्ष का आरम्भ पश्चिम एशिया को एक ऐसे दोराहे पर ले आया है, जहाँ से वापसी का रास्ता हाल-फ़िलहाल युद्ध के मैदानों से गुजरता दिख रहा है. ईरान, इज़राइल-अमेरिका के बीच का छद्म युद्ध अब एक सीधे युद्ध में बदल चुका है. यह संघर्ष केवल तीन देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु अप्रसार और नई विश्व व्यवस्था के भविष्य को निर्धारित करने वाला है. इस युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल तीनों देशों- ईरान, इजरायल और अमेरिका के अपने-अपने निहितार्थ हैं. ईरान एक तरह से प्रतिरोधात्मक नेतृत्व का परिचायक बना हुआ है. वह इजरायल के खिलाफ कभी परदे के पीछे से लड़ता है तो कभी मिसाइलों के द्वारा सीधी चुनौती देता है. यह ईरान की बदलती सैन्य मानसिकता को दर्शाता है. यदि इस युद्ध को इजरायल के सन्दर्भ में देखा जाये तो उसके लिए यह युद्ध केवल सैन्य अभियान नहीं बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है. उसका रणनीतिक उद्देश्य अपनी सीमाओं की रक्षा करना मात्र नहीं है बल्कि ईरान के आतंकी ढाँचे- हमास, हिजबुल्लाह और हुथी को जड़ से मिटा देना है. यदि अमेरिका की बात करें तो वह इस त्रिकोण का सबसे जटिल सिरा है. अमेरिका एक तरफ इज़राइल को पूर्ण समर्थन देने की नीति अपनाना चाहता है साथ ही वह किसी भी तरह के पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध से बचना भी चाहता है. उसका उद्देश्य कतई यह नहीं कि वह ऐसे किसी युद्ध के द्वारा मध्य-पूर्व में लम्बे समय तक उलझा रहे.

 



इन तीनों देशों की स्थितियाँ कुछ भी क्यों न रही हों, वर्तमान में कुछ भी क्यों न बनी हो किन्तु सत्य तो यही है कि ये तीनों देश आज प्रत्यक्ष युद्ध में उतर चुके हैं. इस तरह की स्थितियों से साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि किसी समय विश्व पटल पर बनी एकध्रुवीय व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है. अब विश्व जहाँ बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात तो करता है साथ ही शांति के बजाय शक्ति प्रदर्शन को तैयार रहता है. एक अकेले इसी युद्ध की बात नहीं है, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर चल रहे अनेक युद्ध, संघर्ष इसी का परिचायक हैं. लम्बे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष ने साफ़ कर दिया है कि यूरोपीय सुरक्षा संरचना ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी है. ऐसा ही कुछ मध्य-पूर्व क्षेत्र में नजर आ रहा है. देखा जाये तो अब मध्य-पूर्व का यह तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, इस युद्ध ने खाड़ी देशों को भी अपनी चपेट में ले लिया है.

 

यहाँ सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि अब युद्ध केवल टैंकों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गए हैं. समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह युद्ध भी अब हाइब्रिड दौर में हैं. यहाँ सीधा हमला करने के बजाय साइबर हमला किया जा सकता है. साइबर हमला करके किसी भी देश की आंतरिक मूलभूत व्यवस्था को ध्वस्त किया जा सकता है, न केवल दैनिक जीवन वाले क्षेत्रों में सेंध लगाई जा सकती है बल्कि आर्थिक सञ्चालन को भी प्रभावित किया जा सकता है. युद्ध अब केवल दो देशों के मध्य ही नहीं लड़ा जाता है बल्कि सम्बंधित देशों से कहीं दूर जमीन पर भी यह युद्ध चलता दिखता है. यदि वर्तमान ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध की बात करें तो होर्मुज जलडमरूमध्य को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. ईरान के कब्जे में होने के कारण यहाँ से गुजरने वाले जहाजों को उसकी अनुमति की आवश्यकता है. ऐसा न होने की दशा में समूचे विश्व में तेल की, गैस की कमी दिख रही है. कहा जा सकता है कि अब युद्ध में केवल सैनिक नहीं मरते बल्कि आर्थिक मंदी और रसद की कमी के कारण दूर देशों के आम नागरिक भी इसकी कीमत चुकाते हैं. इसे ड्रोन, मिसाइल, बम आदि के साथ-साथ युद्ध में आर्थिक हथियार का प्रयोग करना कहा जा सकता है. होर्मुज से जहाजों का निकलना प्रतिबंधित करना, अन्य देशों पर अनेक तरह के प्रतिबंधों का लगाया जाना एक तरह का हथियार ही है, जिसमें उन देशों की आम जनता पिसती है जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के चलते भारत सहित अनेक देशों में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बाधित होने से परेशानी उत्पन्न हुई जबकि ऐसे देशों का इस युद्ध से कोई सीधे-सीधे सम्बन्ध नहीं है.

 

ऐसे समय में विश्व की महाशक्तियों को समझना होगा कि शेष विश्व के लिए क्या सही है? विश्व जनसमुदाय की अपेक्षाएँ क्या हैं? अपनी शक्ति के अनावश्यक प्रदर्शन के स्थान पर महाशक्तियों को समझना होगा कि उनकी श्रेष्ठता सैन्य शक्ति से ज्यादा शांति बनाए रखने की क्षमता से तय होगी. यदि समय रहते हथियारों की होड़ को न रोका गया, विकास की दौड़ में शामिल न हुआ गया तो आने वाली पीढ़ियाँ बारूद की राख के भीतर ही अपना अस्तित्व खोजती रहेगी. विश्व भर में चल रहे बड़े-छोटे युद्धों, संघर्षों के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा कि अब समय आ गया है कि विश्व समुदाय केवल सीमाओं की रक्षा न करे, केवल विस्तारवाद की नीति पर काम न करे बल्कि उस साझा मानवता की रक्षा करे जो युद्ध की भेंट चढ़ रही है. सत्यता यही है कि शांति कोई विकल्प नहीं बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है.


14 फ़रवरी 2026

देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?

देश के लोकतंत्र का एक दुर्भाग्य ये रहा कि इसे लोकतंत्र अचानक ही मिल गया, जिसके लिए वह कभी तैयार ही नहीं था. गौर करिए, देश अपनी आज़ादी के ठीक पहले अंग्रेजों का गुलाम था, उसके पहले मुगलों सहित अनेक आक्रमणकारियों, विदेशी आक्रान्ताओं की गुलामी को सहा है. इस स्थिति से पहले भी देश में रियासत, कबीलाई संस्कृति देखने को मिलती थी. लोकतान्त्रिक स्वरूप की अवधारणा आज़ादी से पहले देखने को नहीं मिलती है. (विभिन्न साम्राज्यों की जो भी स्थिति थी वो लोकतान्त्रिक नहीं थी) ऐसे में आज़ादी के बाद भी हम लोग दो मानसिकताओं में जीते रहे, एक मालिक वाली और दूसरी नौकर-दास वाली. ये स्थिति संसद से लेकर निम्न स्तर तक देखने को मिलती है.




संसद की तरफ देखें तो यहाँ भी यही स्थिति दिखाई देती है. किसी और की चर्चा न करते हुए नेता पक्ष नरेन्द्र मोदी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को ही देखें तो सब साफ़ हो जाता है. राहुल गांधी की पारिवारिक पृष्ठभूमि जिस तरह की रही है वे उसका दृश्य लगभग रोज ही संसद में प्रस्तुत कर देते हैं. सदन को वे अपने घर का आँगन ही समझते हैं. सदन की कार्यवाही के बीच में खड़े होकर चाय पीने लगना, प्रधानमंत्री के गले लग जाना, आन मारना, नॉनसेन्स जैसा शब्द बोलने के बाद भी मुकर जाना, तथ्यात्मक रूप से गलती करना, सदन के नियमों की अवहेलना करना इसका उदाहरण है. पीठासीन अधिकारी को वे अपने घर-परिवार का कोई कर्मी ही समझते हैं तभी आसन को अपने दल का पूर्व सदस्य बताने लगना, बार-बार टोकने के बाद भी विषय पर न बोलना दर्शाता है कि राहुल गांधी सदन को, पीठ को आज भी खुद से नीचे समझते हैं. इसके पीछे वही कबीलाई सोच कि वे किसी रियासत जैसे परिवार से आते हैं, उनके परिवार ने देश को प्रधानमंत्री दिए हैं.


यहाँ देश के प्रधानमंत्री, पक्ष के नेता नरेन्द्र मोदी को भी कटघरे में खड़े करने से मुक्त नहीं किया जा सकता है. जैसा कि पहले बताया कि मलिक और नौकर वाली मानसिकता ही आज भी काम करती है. यदि नेता प्रतिपक्ष मालिक वाली मानसिकता से अपने कृत्य करते हैं तो नेता पक्ष खुद को नौकर वाली स्थिति में दर्शाने से नहीं चूकते हैं. गाहे-बगाहे वे खुद को चाय बेचने वाला, गरीब माँ का बेटा, पिछड़े वर्ग का घोषित कर ही देते हैं. यहाँ सिर्फ एक बड़ा अंतर उनको राहुल गांधी से अलग करता है कि वे सदन का, लोकतंत्र का सम्मान करते हैं; सदन की गरिमा का ध्यान रखते हैं; अपने कृत्य से सदन का-पीठ का अपमान नहीं करते हैं.


बावजूद इसके, कहा जा सकता है कि देश संक्रमणकाल से गुजरने के साथ-साथ दुर्भाग्य के दौर से भी गुजर रहा है जहाँ इसके नागरिकों में समझ विकसित नहीं हो सकी है. आज भी वे सही और गलत का अंतर कर पाने समर्थ नहीं हो सके हैं. आज भी वे एक फोटो, एक वीडियो, एक फाइल के सहारे किसी और के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं.


पता नहीं देश का ये दुर्भाग्य कब समाप्त होगा?


24 जनवरी 2026

व्यावहारिक और दीर्घकालिक हो विदेश नीति

पिछले कुछ समय से देश की स्थिति को देखते हुए विपक्षियों द्वारा बार-बार विदेश नीति पर सवालिया निशान लगाये जा रहे थे. आलोचना के स्वरों में केन्द्र सरकार की विदेश नीति के असफल होने की बात उठाई जाने लगी. ऐसे विचारों को उस समय और बल मिला जबकि हमारे पड़ोसी देशों में हालात ख़राब रहे और उनके अंदरूनी हालातों का प्रभाव भारतीय परिप्रेक्ष्य में नजर आया. इसी तरह पहलगाम की घटना के बाद ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भी भारतीय पक्ष का अकेले खड़े दिखाई पड़ने से विरोधियों के आरोपों को बल मिला. विदेश नीति को लेकर लगातार आरोप लगाये जाते रहे कि वह अपने घोषित लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रही है. एक तरफ भले ही भारत की सक्रियता वैश्विक मंच पर बढ़ती जा रही मगर दूसरी तरफ पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ते सम्बन्धों, चीन के साथ सीमा विवाद, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर होते अत्याचारों तथा कुछ पश्चिमी देशों से उत्पन्न विवादों ने देश की वैश्विक छवि को धूमिल किया.

 

देखा जाये तो किसी भी देश की विदेश नीति का स्वरूप मूल रूप में दीर्घकालिक और बहुस्तरीय होता है, जिसे सफलता या असफलता के सम्बन्ध में एकाएक मापना न केवल कठिन होता है बल्कि उचित भी नहीं होता है. अनेक अवसर ऐसे होते हैं जबकि वैश्विक सम्बन्धों के चलते अनेकानेक नीतियों को, योजनाओं को रोकना पड़ता है. इसे भी ऑपरेशन सिन्दूर के रूप में देखा-समझा जा सकता है. पाकिस्तान पर कई गुना बेहतर स्थिति होने के बाद भी एकाएक देश को युद्ध विराम जैसी स्थिति को स्वीकारना पड़ा. इस निर्णय के बाद जहाँ केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने लगातार बयानबाजी करते हुए इसके लिए स्वयं को नेतृत्वकर्ता सिद्ध करना चाहा.

 



भारत की विदेश नीति के सन्दर्भ में एक तथ्य सदैव से प्रभावी रहा है कि देश ने स्वतंत्रता के बाद से ही स्वयं को गुटनिरपेक्ष नीति के समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया है. इसी कारण भारत वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलनकारी कूटनीतिज्ञ के रूप में दिखाई पड़ता है. रूस-यूक्रेन युद्ध को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जहाँ अमेरिका और यूरोपीय देशों के दबाव के बाद भी भारत ने रूस से तेल और रक्षा सहयोग जारी रखा. अपने चिर-परिचित, पुराने सम्बन्धों का निर्वहन करने के साथ-साथ भारत ने युद्ध के समाधान के लिए कूटनीति को भी प्रभावी बनाये रखा. युद्धकाल में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रूस और यूक्रेन की यात्राओं ने स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति भावनाओं नहीं हितों से संचालित होती है. यद्यपि देश की इस नीति का अनेक पश्चिमी देशों ने विरोध किया तथापि भारत ने अपनी नीति को नहीं त्यागा.

 

ऐसी मजबूत कूटनीतिज्ञ स्थिति के बाद भी भारत की विदेश नीति की सर्वाधिक आलोचना उसके पड़ोसी देशों के संदर्भ में होती है. पड़ोसी देशों के वर्तमान हालात और भारतीय हस्तक्षेप को लेकर दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति सहज नहीं रही है. नेपाल के साथ सीमा और नक्शे का विवाद, मालदीव में भारत-विरोधी राजनीतिक अभियान, श्रीलंका में चीन की सशक्त आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति, श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का चीन को दीर्घकालिक पट्टे पर दिया जाना, बांग्लादेश में भारतीय हितों, हिन्दुओं पर हमले, पाकिस्तान द्वारा भारतीय विरोध की नीति को खुलकर अपनाना आदि ने भारतीय विदेश नीति के पारम्परिक अस्तित्व को चुनौती दी है. इन घटनाओं को कहीं न कहीं भारत की असफल विदेश नीति के रूप में परिभाषित किया जाने लगा.  

 

यह सच है कि भारत के पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में वैसी मधुरता नहीं दिखाई पड़ती है, जैसी कि वर्तमान केन्द्र सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान देखने को मिली थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दक्षिण एशिया देशों के साथ मधुर, मजबूत सम्बन्धों की जैसी पहल की गई थी, उसके परिणाम वैसे नहीं निकले जैसी की कल्पना की गई थी. अपने पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों में आई गिरावट के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ भी सम्बन्धों में चुनौतियाँ दिख रही हैं. अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापारिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है; क्वाड जैसे मंच पर भारत की सक्रिय भागीदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक सफलता को दर्शाती है वहीं मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि को लेकर पश्चिमी देशों के रुख ने स्थितियों को असहज भी किया है. कनाडा, अमेरिका, ईरान, तालिबान, इजराइल आदि के साथ वर्तमान राजनयिक सम्बन्धों को इसी रूप में देखा जा सकता है.

 

वैश्विक मंचों पर और स्थानीय मुद्दों पर कूटनीतिज्ञ रूप से देखा जाये तो कहा जा सकता है कि भारत की विदेश नीति एक तरह के संक्रमणकाल से गुजर रही है. देश की अंदरूनी स्थिति, पड़ोसी देशों के साथ सम्बन्धों के रूप में देश से एक तरफ अपेक्षाएँ भी हैं और दूसरी तरफ चुनौतियाँ भी हैं. उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में, दक्षिण एशिया क्षेत्र में नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को स्थापित करने के उद्देश्य से भारत को जिम्मेदारियों और चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित करना है. विगत वर्षों की भारतीय क्षमता, नेतृत्व, वैश्विक छवि को देखते हुए विदेश नीति पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी ही कही जाएगी. विदेश नीति से सम्बंधित तमाम पक्षों पर विचार करते हुए उसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखना उचित होगा. वर्तमान सन्दर्भों में आवश्यकता इसकी है कि भारत अपनी कूटनीति को अधिक व्यावहारिक, दीर्घकालिक दृष्टि से सुदृढ़ करे. सत्ता पक्ष और विपक्ष को भी भारतीय सन्दर्भों में एकजुट होकर इसके लिए कार्य करने की आवश्यकता है ताकि वैश्विक मंच पर देश की बढ़ती भूमिका को, विदेश नीति को सशक्त रूप में परिभाषित किया जा सके.


16 नवंबर 2025

अराजकता पैदा करने का मंसूबा?

‘देश के युवा, देश के छात्र, देश के जेन-जी संविधान को बचाएँगे. लोकतंत्र की रक्षा करेंगे और वोट चोरी को रोकेंगे. मैं उनके साथ हमेशा खड़ा हूँ. जय हिन्द.’ सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर ये विचार पोस्ट करने वाला व्यक्ति कोई आम नागरिक नहीं बल्कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी हैं. 18 सितम्बर 2025 को पोस्ट इस विचार का उत्प्रेरक नेपाल की अराजकता के लिए जिम्मेदार जेन-जी पीढ़ी को माना जा रहा है. इस पोस्ट के माध्यम से उन्होंने न केवल देश के युवाओं को उकसाने का काम किया बल्कि वोट चोरी जैसे मुद्दे के द्वारा संवैधानिक संस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने का काम किया है.

 

ईवीएम का मुद्दा हो या अब वोट चोरी का, इनके द्वारा राहुल गांधी किसी तरह की सुधारवादी व्यवस्था का सहयोग नहीं करते बल्कि निर्वाचन आयोग पर सवालिया निशान लगाते हैं. भाजपा की जीत पर ईवीएम से छेड़छाड़ करने, उसे हैक कर लेने का आरोप लगा देना तथा विपक्षी दलों की जीत को लोकतंत्र की जीत बताने लगना आम बात हो गई है. ईवीएम से छेड़छाड़ किये जाने के आरोप भाजपा पर लगातार लगाते रहने के बाद भी विपक्षी दलों द्वारा उसे सही सिद्ध न कर पाने से मतदाताओं ने इसके पीछे की मंशा को भली-भांति समझ लिया. ये सहज रूप में समझ में आता है कि विपक्षी दलों द्वारा अपनी हार का ठीकरा ईवीएम और निर्वाचन आयोग के ऊपर फोड़कर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा करना रहा है. कुछ इसी तरह का काम अब राहुल गांधी करते नजर आ रहे हैं वोट चोरी के नाम पर.

 



बिहार में पहले चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस के द्वारा हरियाणा में वोट चोरी होने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि पिछले साल हरियाणा के विधानसभा चुनाव में 25 लाख फर्जी वोटों का इस्तेमाल किया गया जो कुल वोटों का लगभग 12.5 प्रतिशत है. निर्वाचन आयोग और भाजपा पर मिलीभगत का आरोप लगाने वाले राहुल का मानना है कि इसके चलते कांग्रेस हार गई. वोट चोरी के सन्दर्भ में उनके द्वारा एक महिला, जो ब्राजील की मॉडल निकली, की अनेकानेक फोटो के माध्यम से अपने आरोपों को सही साबित करने का भी प्रयास किया गया. यहाँ एक बात समझ से परे है कि यदि राहुल गांधी को लगता है कि भाजपा और निर्वाचन आयोग की मिलीभगत से वाकई वोट चोरी जैसा कदम उठाया जाता है तो इसके समाधान के लिए वे अदालत की मदद क्यों नहीं ले रहे? उनको कम से कम इसका भान तो होना ही चाहिए कि इसी देश में 12 जून 1975 को एक ऐतिहासिक फैसले में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने उनकी दादी इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी पाया था. जिसके चलते न्यायालय ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित करते हुए उन्हें छह साल तक अन्य दूसरा कोई भी चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया था. इस निर्णय के पश्चात् लागू आपातकाल 1977 में समाप्त होने पर चुनाव सम्पन्न हुए. इन चुनावों में मतदाताओं ने तानाशाही, चुनावी धाँधली के विरोध में न केवल कांग्रेस को बल्कि रायबरेली से इंदिरा गांधी को भी हराया. आज संभवतः अराजकता फ़ैलाने की मंशा रखने के कारण राहुल गांधी मतदाताओं की, न्यायालय की असल ताकत को स्वीकारना नहीं चाह रहे हैं.

 

दरअसल राहुल गांधी को वोट चोरी, निर्वाचन आयोग की मिलीभगत को लेकर न्यायालय जाने से ज्यादा आसान लगता है आरोप लगाना. इसमें न किसी तरह के सबूतों को न्यायालय में प्रस्तुत करना है और न ही किसी तरह के तथ्यों की पुष्टि करना है. विगत वर्षों में अनेक मामलों में न्यायालय की तरफ से उनको समझाए जाने के, सजा सुनाये जाने के दृष्टान्त भी सबके सामने हैं मगर ऐसा लगता है जैसे उन्होंने इनसे कोई सीख नहीं लेने का मन बना रखा है. इसके अलावा लगता है जैसे राहुल गांधी भारत में उसके पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि की तरह का अराजक माहौल देखने का मंसूबा रखते हैं. यही कारण है कि वे कभी यहाँ की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर, संवैधानिक संस्थाओं पर, संविधान पर आरोप लगाते हैं तो कभी इंडियन स्टेट के नाम पर, सेना के नाम पर, आतंकियों के नाम पर, वोट चोरी के आरोपों द्वारा, जेन-जी पीढ़ी की क्रांति के रूप में अनर्गल बयानबाजी करते नजर आते हैं.

 

बिहार चुनावों के परिणामों ने साबित किया है कि यहाँ के मतदाताओं ने न केवल विशेष गहन पुनरीक्षण को अपनी स्वीकार्यता प्रदान की है बल्कि राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोपों की भी हवा निकाल दी है. ईवीएम सम्बन्धी गड़बड़ियों में मुँह की खाने के बाद, अनेक चुनावों में लगातार हारने के बाद अब बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण और वोट चोरी आरोपों के नकारे जाने के बाद राहुल गांधी को स्वयं का विश्लेषण करने की आवश्यकता है. उनको अपने उन मार्गदर्शकों का आकलन करने की आवश्यकता है जो निरर्थक मुद्दों के द्वारा उनके प्रधानमंत्री बनने के सपने को हवा देते रहने के साथ-साथ देश को अराजकता की तरफ ले जाना चाहते हैं. उनको ऐसे बयानवीरों से दूर रहने की आवश्यकता है जो उनके कपोल-कल्पित बयानों को नाइट्रोजन बम, हाइड्रोजन बम साबित करने की कोशिश में राहुल गांधी को ही मजाकिया पात्र बना दे रहे हैं.

 

ये बात न केवल राहुल गांधी को ही बल्कि कांग्रेस पार्टी को भी समझनी होगी कि वे वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और उनके तमाम अनर्गल बयान न केवल उनकी छवि को धूमिल करते हैं बल्कि देश की राजनीति को भी विवादास्पद बनाने के साथ-साथ देश की संवैधानिक संस्थाओं को संशय के घेरे में खड़ा करते हैं. ऐसी राजनीति भले ही उनके सन्दर्भ में उचित हो मगर देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, संवैधानिक संस्थाओं के लिए कतई उचित नहीं है.


25 अक्टूबर 2025

हिंसात्मक गतिविधियों से भरा समाज

ये किसी तरह के समाज का निर्माण कर लिया हम लोगों ने? सुबह आँख खुलने से लेकर रात सोने तक कहीं न कहीं से हिंसात्मक खबरों का आना लगा ही रहता है. इन खबरों का केन्द्र देश ही नहीं रहता है बल्कि विश्व स्तर पर चारों तरफ से इसी तरह की खबरें सुनाई पड़ती हैं. कहीं दो व्यक्ति आपस में लड़ने में लगे हैं, कहीं दो परिवारों के बीच कलह मची हुई है, कहीं दो राज्यों के बीच विवाद की स्थिति है तो कहीं दो देशों में युद्ध चल रहा है. ऐसा लगता है जैसे समाज में चारों तरफ अशांति, हिंसा, वैमनष्यता, बैर आदि का समावेश बना हुआ है. सद्भाव, सहजता, शांति, धैर्य आदि को जैसे भुला ही दिया गया है. पारिवारिक सम्बन्धों में, रक्त-सम्बन्धियों में विभेद इस स्तर तक है कि एक-दूसरे की जान तक ले ली जा रही है. समाज की इकाई एक व्यक्ति के दायरे से बाहर निकल कर देखें तो एक देश के रूप में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. विस्तारवाद की नीति के चलते, अपने वर्चस्व को, प्रभुता को थोपने की नीयत के चलते जहाँ बड़े-बड़े देशों द्वारा छोटे-छोटे देशों को किसी न किसी रूप में अपने कब्जे में किये जाने की मानसिकता काम करती है, वहीं महाशक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे को नियंत्रित करने की नीतियाँ निर्धारित करती हैं.

 

समाज की वर्तमान स्थिति यह है कि यहाँ प्रेम, करुणा, शांति, अहिंसा से अधिक बैर, वैमनष्यता, हिंसा आदि दिखाई दे रही है. क्या कभी इस पर विचार किया गया कि आखिर ऐसा क्या है इंसानी स्वभाव के मूल में कि उसे सदियों से प्रेम, सौहार्द्र का पाठ पढ़ाना पड़ रहा है मगर वह सिर्फ और सिर्फ हिंसा की तरफ ही बढ़ता जा रहा है? आये दिन खबरें मिलती हैं मासूम बच्चियों के साथ दुराचार की, उनकी हत्या की. आये दिन देखने में आ रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले किये जा रहे हैं, उनकी जान ले ली जा रही है. लगभग नित्यप्रति की खबर बनी हुई है किसी की हत्या, कहीं लूट, कहीं अपहरण, कहीं मारपीट. इसे महज दो पक्षों के बीच की स्थिति कहकर विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए. गम्भीरता से विचार किया जाये तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि हिंसा, अत्याचार, क्रूरता इंसानी स्वभाव का मूल है. कोई व्यक्ति वह चाहे आम नागरिक हो या फिर अधिकार प्राप्त व्यक्ति, सभी के मन में कहीं न कहीं एक तरह का हिंसात्मक भाव-बोध छिपा होता है. आम नागरिक अपने इसी भाव-बोध के वशीभूत अपने आस-पड़ोस में हिंसात्मक गतिविधियाँ करता है तो वही किसी तानाशाही मानसिकता वाला राष्ट्राध्यक्ष विस्तारवादी मानसिकता के चलते अपने आसपास के देशों के प्रति नकारात्मक भाव रखता है.

 

यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि आदिमानव से महामानव बनने की होड़ में लगे इंसान को लगातार प्रेम, दया, करुणा आदि का पाठ पढ़ाया जाता रहा है. उसे समझाया जाता रहा है कि हिंसा गलत है, वह चाहे जीव पर हो, निर्जीव पर हो, पेड़-पौधों पर हो. इंसान को कदम-कदम पर सीख दी गई कि उसे आपस में सद्भाव से रहना चाहिए. आपसी वैमनष्यता से उसे दूर रहना चाहिए. उसे कभी नहीं सिखाया गया कि कैसे हिंसा करनी है. उसे किसी ने नहीं सिखाया कि कैसे दूसरे से बैर भावना रखनी है. उसे किसी भी तरीके से नहीं बताया गया कि सामने वाले की हत्या कैसे करनी है. इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो पाठ उसे सदियों से पढ़ाया जाता रहा, शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जा रहा, परिवार द्वारा पढ़ाया जाता रहा, समाज द्वारा पढ़ाया जाता रहा इंसान उसी पाठ को कायदे से नहीं सीख पाया. इसके सापेक्ष जिस पाठ को किसी ने नहीं सिखाया, जिसे सिखाने के सम्बन्ध में कोई संस्थान नहीं है वे कार्य उसने न केवल भली-भांति सीख रखे हैं वरन वह उन्हें तीव्रता के साथ करने भी लगा है. ऐसा लगता है जैसे उसने अपने आसपास तनावपूर्ण माहौल वाली दुनिया बनाने का ही संकल्प ले रखा है.

 

इस तरह की दुनिया में जहाँ सब कुछ स्वार्थ पर आधारित होने लगा है; जहाँ व्यक्तियों की, देशों की प्रतिष्ठा का आधार अधिकार, उसका आर्थिक स्तर, शक्ति प्रदर्शन आदि होने लगा हो वहाँ आपस में खाई बनना स्वाभाविक है. वैश्विक परिदृश्य में दो देशों के बीच विगत कई वर्षों से चल रहे युद्ध, संघर्ष इसके सशक्त उदाहरण हैं. यदा-कदा संघर्ष विराम के नाम पर चंद दिनों की शांति भले ही देखने को मिल जाए, भले ही कोई अपनी पीठ स्वयं ही थपथपा ले किन्तु तनाव, संघर्ष, हमला आदि पुनः अपनी तीव्रता के साथ आरम्भ हो जाते हैं. नागरिकों के हितार्थ लिए जाने वाले निर्णय अचानक से भुला दिए जाते हैं. ऐसी स्थिति न केवल चिंतनीय है बल्कि भयावह भी है.

 

सामाजिक रूप से कितने भी प्रयास किये जाएँ किन्तु इंसानों का मूल स्वभाव बदले बिना शांति सम्भावना की स्थिति अब संभव नहीं लगती है. वर्तमान समाज इतने खाँचों में विभक्त हो चुका है कि उसे मानवीय समाज कहने के बजाय कबीलाई समाज कहना ज्यादा उचित होगा. प्रत्येक वर्ग के अपने सिद्धांत हैं, अपने आदर्श हैं, अपने विचार हैं, अपनी विचारधारा है. सबकी विचारधारा, सबके आदर्श दूसरे की विचारधारा, आदर्श से श्रेष्ठ हैं. ऐसे में श्रेष्ठता, हीनता का बोध भी इंसानी स्वभाव पर हावी हो रहा है. समझने वाली बात है जब आक्रोश की छिपी भावना के साथ-साथ स्वयं को श्रेष्ठ समझने और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ हीन समझने की खुली भावना समाज में विकसित हो रही हो तब हिंसात्मक गतिविधियों को देखने-सहने के अलावा और कोई विकल्प हाल-फ़िलहाल दिखाई नहीं देता है. सरकार, प्रशासन, समाज, व्यक्ति सबके सब असहाय बने खुद पर हमला होते देख रहे हैं.

 


21 अक्टूबर 2025

राजनीति में स्वच्छ छवि का स्वागत हो

चर्चित लोकगायिका मैथिली ठाकुर को भाजपा की सदस्यता लेने के अगले दिन ही बिहार विधानसभा चुनाव में अलीनगर सीट से प्रत्याशी बनाया गया. उनको प्रत्याशी बनाये जाने को लेकर अनेक तरह के तर्क-वितर्क शुरू हो गए. कोई उनकी उम्र को लेकर टिप्पणी कर रहा है, कोई राज्यसभा में भेजे जाने की बात कर रहा है. किसी के द्वारा उनके राजनैतिक अनुभवशून्यता का उदाहरण दिया जा रहा है तो किसी के द्वारा इसे कला के प्रति अन्याय बताया जा रहा है. सदस्यता लेने के अगले दिन ही प्रत्याशी बनाये जाने को जहाँ पैराशूट प्रत्याशी से तुलना की जा रही है वहीं स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ पक्षपात करना बताया जा रहा है. इन तमाम सारी चर्चाओं के बीच मैथिली ठाकुर के चरित्र हनन करने सम्बन्धी तमाम मीम्स, चुटकुले सोशल मीडिया कुत्सित मानसिकता वालों द्वारा फैलाये जाने लगे.

 

इन चर्चाओं के सापेक्ष कुछ बातों पर ध्यान देना ही होगा. किसी व्यक्ति के राजनैतिक रूप से अनुभवहीन होने के तात्पर्य यह तो कतई नहीं है कि वह राजनीति में असफल हो जायेगा. वह समाजहित में, जनहित में कार्य नहीं कर सकेगा. देखा जाये तो ये सारी बातें मैथिली की उम्र, कला, अनुभवहीनता आदि के कारण नहीं उपजी हैं बल्कि इनके पीछे भाजपा द्वारा स्थानीय कार्यकर्ताओं को, जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करना है. यह सही हो सकता है कि किसी नए व्यक्ति को पार्टी का सदस्य बनने के अगले दिन ही प्रत्याशी बनाकर उन तमाम पुराने कार्यकर्ताओं, नेताओं की उपेक्षा ही है जो विगत लम्बे समय से अपनी प्रत्याशिता की राह बना रहे थे.

 



एकबारगी मान भी लिया जाये कि यह भाजपा का गलत कदम है कि एकदम नए व्यक्ति को पुराने कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों पर प्रभावी बना दिया गया तो क्या इस बात पर ही किसी भले व्यक्ति को, कलाकार को सक्रिय राजनीति में नहीं उतरने दिया जाना चाहिए? राजनैतिक क्षेत्र को लेकर समाज की विडम्बना यही हो गई है कि एक तरफ लोग राजनीति के गन्दी होने की चर्चा अनेकानेक मंचों से करते हैं मगर उसी के सापेक्ष भले, योग्य व्यक्तियों को सक्रिय राजनीति में देखना भी नहीं चाहते. राजनीति गन्दी है, संसद डाकुओं-लुटेरों से भर गई है, संविधान में हमारा विश्वास नहीं जैसे जुमले आये दिन सुनने को मिल जाते हैं. कविता का मंच होसाहित्य-विमर्श हो या धारावाहिक-फ़िल्मी कार्यक्रम हो सभी में राजनीति को बेकार बताया जाता है. आज राजनीति को गाली देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाता हैखुद को जागरूक बुद्धिजीवी समझना होता है.

 

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वर्तमान में बहुतायत जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों से मुकरते जा रहे हैं. राजनीति में पदार्पण करने वाला अत्यंत अल्पसमय में ही बलशाली होकर सामने आ जाता है. कई-कई अपराधों में लिप्त लोग भी माननीय की श्रेणी में शामिल होकर जनता के समक्ष रोब झाड़ते दिखाई देते हैं. राजनीति की वर्तमान व्यवस्था को दोष देने के पूर्व यदि हम अपने क्रियाकलापोंअपनी जागरूकता पर निगाह डालें तो हम ही सबसे बड़े दोषी नजर आयेंगे. हमारे देश की संसद और तमाम विधानसभाओं में एक निश्चित समयान्तराल के बाद चुनाव होता है. चुनाव का निर्धारित समय किसी लिहाज से टाला नहीं जा सकता है और सदन की निर्धारित सीटों को अपने निश्चित समय पर भरा ही जाना है. ऐसे में यदि अच्छे लोग उन्हें भरने को आगे नहीं आयेंगे तो जो भी सामने आयेगा वही आने वाले निर्धारित समय के लिए सदन का निर्वाचित सदस्य होगा. ऐसी स्थिति में दोष हमारा ही है कि हमने स्वयं अपने को अच्छा माना भी है और राजनीति से पीछे खींचा भी है. 

 

देश, प्रदेश को संचालित करने वाली सबसे अहम् प्रक्रिया को, सबसे महत्त्वपूर्ण कदम राजनीति को आज उससे दूर होते जा रहे प्रबुद्ध वर्ग ने नाकारा साबित करवा दिया है. राजनीति को सबसे निकृष्ट कोटि का काम सिद्ध करवा दिया है. इसी कारण गली-चौराहे-नुक्कड़ पर खड़े लोग राजनीतिक चर्चा में तो संलिप्त दिखाई पड़ जाते हैं, उसकी अच्छाइयों से ज्यादा उसमें बुराइयों को खोजने का काम करते हैं, उसमें सक्रिय ईमानदार लोगों से अधिक उसमें सक्रिय भ्रष्ट-माफिया लोगों की अधिक चर्चा करते हैं. इसका दुष्परिणाम ये होता है कि राजनीति के नकारात्मक प्रचार का एक से बढ़ते हुए अनेक तक चला जाता है और समाज की एक सोच ये बनती चली जाती है कि वर्तमान में राजनीति से अधिक घटिया, अधिक बुरी कोई चीज नहीं. राजनीति से प्रबुद्धजनों के मोह-भंग ने, राजनीति के प्रति होते नकारात्मक प्रचार ने, राजनीति के प्रति अपनी भावी पीढ़ी को प्रेरित न कर पाने ने राजनीति के विरुद्ध नकारात्मक माहौल बना दिया है.

 

आज प्रत्येक मतदाता राजनीति पर बड़ी लम्बी-लम्बी चर्चा करने का दम रखता है मगर अपनी संतानों को राजनीति में आने को प्रेरित नहीं करता. उसके द्वारा राजनीति में आती गिरावट पर चिंता व्यक्त की जाती है मगर उसके उसमें सुधार के लिए भावी पीढ़ी को आगे नहीं किया जाता. ऐसे लोगों की बातों में राजनीति की गिरावट दिखती है मगर इनके मन में बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के लुभावने पैकेज के सपने सजे होते हैं. इस तरह की चर्चाओं के चलते ही अच्छे लोग न राजनीति में आते हैं न ही चुनावों में उतरते हैं. इस तरह की स्थिति के धीरे-धीरे बढ़ने से भले लोग राजनीति से, चुनावी मैदान से बाहर हैं और अपराधी किस्म के लोग राजनीति में प्रवेश करते जा रहे हैं. राजनीति में आती जा रही गंदगी सिर्फ बातें करने से, अनावश्यक बहस करने से दूर नहीं होने वाली. यदि इसे साफ़ करना है, राजनीतिक गंदगी को मिटाना है तो राजनीति की बातें नहीं वरन राजनीति करनी होगी. आज के लिए न सहीकल के लिए; अपने लिए न सहीअपनी भावी पीढ़ी के लिए लोगों को जागना होगा.

 

हाँ, मैथिली ठाकुर जैसे लोगों का राजनीति में, चुनावों में उतरना सुखद संकेत है लेकिन ऐसे व्यक्तियों को और राजनैतिक दलों को इस बात का ध्यान देना चाहिए कि ऐसे भले लोग, स्वच्छ छवि के लोग, कलाकार आदि पहले कुछ वर्ष जनता के बीच गुजारें, जनहित के कार्यों में अपना समय दें. इससे जहाँ नागरिकों के बीच उनकी छवि पुष्ट तो होगी ही, अपने दल में भी उनके प्रति एक विश्वास पैदा होगा.


15 अक्टूबर 2025

शांति की राह पर इजराइल हमास?

अंततः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सकारात्मक हस्तक्षेप के पश्चात् इजरायल-हमास के बीच संघर्ष विराम हो ही गया. अमेरिकी राष्ट्रपति की बीस सूत्री शांति योजना के रूप में इजरायल और हमास शांति बनाये जाने पर सहमत होने के साथ एक-दूसरे के बंधकों को छोड़े जाने पर भी सहमत हो गए. विगत दो वर्षों से चले आ रहे इस युद्ध से अब गाजा में फिलिस्तीनियों को राहत मिलेगी. हमास के आतंकी हमले के विरोध में जवाबी कार्यवाही करते हुए इजराइल ने अक्टूबर 2023 को युद्ध शुरू किया था. इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू हमेशा से ही अपनी पूर्ण विजय प्राप्त करने की नीति के लिए वैश्विक स्तर पर जाने जाते रहे हैं. अपनी इसी छवि के चलते उन्होंने युद्ध जैसी कार्यवाही शुरू करने के साथ ही इस्लामी आतंकवादी संगठन हमास को नेस्तनाबूद करने का संकल्प लिया था. उनके इस संकल्प के चलते ही विगत दो वर्षों में गाजा एक तरह के मलबे में बदल चुका है. हमास द्वारा किये गए हमले में एक हजार से अधिक इजराइली नागरिक मारे गए थे और लगभग ढाई सौ के आसपास नागरिकों को बंधक बना लिया गया था. तबसे चली इजराइली जवाबी कार्यवाही में लगभग सत्तर हजार फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं.

 

शांति का नोबेल पुरस्कार पाने की जबरदस्त आकांक्षा रखने और आखिर में निराशा हाथ आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने इजराइल-हमास संघर्ष विराम के द्वारा खुद को सफल साबित करने का प्रयास किया. चूँकि इजराइल शुरूआती दौर से ही अमेरिका प्रभावित रहा है और यह भी माना जा रहा था कि विगत कुछ समय से अमेरिकी राष्ट्रपति इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू से इस युद्ध को लेकर नाराज से चल रहे थे. इसके पीछे का कारण इजराइल द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति के शांति प्रयासों को कमजोर करना बताया जा रहा था. इजराइल और हमास में संघर्ष विराम की स्थिति बनने के पश्चात् इधर हमास द्वारा इजराइल के बीस बंधकों को रिहा भी कर दिया गया है उधर इजराइली सैनिकों ने दक्षिण में राफा से लेकर उत्तर में सीमावर्ती गाजा शहर तक प्रारम्भिक वापसी रेखा की ओर हटना शुरू कर दिया है. इजराइल की तरफ से भी लगभग दो हजार फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा करने का विश्वास व्यक्त किया गया है.

 

निश्चित रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प इस संघर्ष विराम के मुख्य सूत्रधार रहे हैं. यहाँ एक बात को ध्यान में रखना होगा कि हमास आरम्भ से ही एक अनसुलझी समस्या बना रहा है. ऐसे में इस संघर्ष विराम की अवधि कितनी लम्बी हो सकेगी इस पर संशय के बादल समझौते के तत्काल बाद से नजर आने लगे हैं. इजराइल और हमास के बीच समझौता भले हो चुका को किन्तु हमास के निरस्त्रीकरण, गाजा के शासन और फिलिस्तीन को राष्ट्र के रूप में मान्यता देने जैसे जटिल मुद्दे अभी भी ज्यों के त्यों बने हुए हैं. हमास के निरस्त्रीकरण को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उसे चेतावनी देते हुए कहा है कि उन्हें अपने हथियार छोड़ने होंगे. अगर हमास ऐसा नहीं करता है तो अमेरिका कार्यवाही करेगा.

 

देखा जाये तो यह संघर्ष विराम फिलिस्तीनियों, बंधकों और उनके परिवारों के लिए एक बड़ी राहत है. बावजूद इसके गाजा में स्थायी शांति की स्थापना अभी भी बहुत बड़ा सवाल बना हुआ है. हाल-फिलहाल यह संघर्ष विराम डोनाल्ड ट्रम्प की योजना का आरम्भिक चरण मात्र है, जिसमें गाजा को एक अंतरराष्ट्रीय शासन निकाय के अधीन रखने और उसकी सुरक्षा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय बल की तैनाती का भी प्रावधान किया गया है. इसे लेकर हमास ने बीस बंधकों को तो रिहा कर दिया है किन्तु अन्य शर्तों पर कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है. गाजा में स्थायी शांति स्थापना में एक बहुत बड़ा अवरोध गाजा में इजराइली रक्षा बलों (आईडीएफ) की लगातार, नियमित रूप से बनी रहने वाली उपस्थिति भी है. संघर्ष विराम समझौते के अनुसार होने वाली सैन्य वापसी के बाद भी गाजा का पचास प्रतिशत से अधिक भाग आईडीएफ के नियंत्रण में रहेगा.

 

इजराइल-हमास संघर्ष विराम निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय फलक पर एक सकारात्मक घटनाक्रम है लेकिन क्या यह संघर्ष विराम इजराइल और फिलिस्तीन के बीच की खाई को पाटकर स्थायी शांति बना सकेगा? इजराइल का कहना है कि हमास अपने हथियार छोड़े. जब तक उसकी सैन्य शक्ति खत्म नहीं होगी तब तक इस अभियान को पूरा नहीं माना जाएगा. इसके उलट हमास सशस्त्र प्रतिरोध को अपना अधिकार बताता है. इसकी सम्भावना भी नगण्य है कि हमास खुद को समाप्त किये जाने की माँग को स्वीकार करेगा. सम्भव है कि उसके ऊपर यह दबाव बनाया जाये कि वह गाजा में अपनी सत्ता छोड़कर अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों द्वारा समर्थित फिलिस्तीनी प्राधिकरण को सत्ता सौंप दे. इस पर इजराइल ने पश्चिमी तट की फिलिस्तीनी प्राधिकरण को किसी भी तरह की भूमिका देने से इंकार करने के साथ-साथ फिलिस्तीनी राज्य की सम्भावना को भी सिरे से नकार दिया है.

 

ऐसी असमंजस भरी स्थितियों के बीच अमेरिका, कतर, मिस्र, तुर्की सहित अन्य सहमत देशों के प्रतिनिधियों का एक संयुक्त निगरानी दल बनाये जाने का प्रस्ताव है जो संघर्ष विराम, कैदियों की रिहाई सहित हर प्रक्रिया पर नजर रखेगा. यह दल सुनिश्चित करेगा कि दोनों पक्ष अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करें. दो सौ से अधिक अमेरिकी सैनिक इजरायल पहुँच कर वहाँ की शांति प्रक्रिया पर नजर रखने के साथ-साथ यह भी देखेंगे कि कोई भी पक्ष समझौता न तोड़े. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की नोबेल शांति पुरस्कार की चाह में इजराइल-हमास संघर्ष विराम को उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया जाएगा, जिससे उनको नोबेल पुरस्कार का प्रबल उम्मीदवार बनाया जा सके. ऐसे में अब ट्रम्प को स्थायी शांति के लिए प्रयास करना चाहिए. उनको किसी एक देश के पक्ष में खड़े होने के स्थान पर एक स्वतंत्र मध्यस्थ के रूप में कार्य करना चाहिए.


26 जुलाई 2025

ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा की जिद

संसद की कार्यवाही और ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा की जिद.

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संसद में लगातार बहस मची हुई है ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा किये जाने की. इस ऑपरेशन के बारे में सबकुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है, उसके लिए बहस-चर्चा करने वाले विपक्ष ने कभी भी कुछ विषयों पर खुली बहस-चर्चा करने की हिम्मत नहीं जुटाई. ऐसे विषयों की सूची लम्बी हो सकती है किन्तु संक्षेप में इसे निम्न बिन्दुओं के सापेक्ष समझा जा सकता है. काश! सदन के अन्दर बैठे जनप्रतिनिधियों ने कभी इन विषयों पर भी चर्चा करने पर विचार किया होता.

 

==>> नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से सम्बंधित कई-कई आयोगों के बनाये जाने के बाद भी आज के विपक्ष ने संसद में इसकी चर्चा करवाने की हिम्मत न जुटाई.

 

==>> देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विदेश में मृत्यु होना आज तक संदेहास्पद है मगर इस पर संसद में चर्चा करवाने के लिए आज के विपक्ष ने कभी जोर न लगाया.

 

==>> देश की एक और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही आवास पर, उनके ही सुरक्षा गार्डों द्वारा कर दी गई. सुरक्षा की दृष्टि से आजतक की सबसे बड़ी चूक पर कांग्रेस ने, आज के विपक्ष ने कभी संसद में बहस करवाने के बारे में विचार नहीं किया.

 

==>> देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या होना भी सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी चूक कही जाएगी मगर इस पर कांग्रेस या आज के विपक्ष ने कभी संसद में चर्चा करवाए जाने पर संसद की कार्यवाही को बाधित नहीं किया.

 

क्या कभी इन घटनाओं पर विचार किया जायेगा? क्या इनके लिए संसद में बहस की कोई गुंजाइश नहीं? क्या आज के विपक्ष की जिम्मेवारी नहीं बनती कि वो इन घटनाओं की सत्यता को देश की जनता के सामने संसद के माध्यम से लायेआज का विपक्ष भी कभी सरकार में था. इन घटनाओं से मुँह मोड़ लेने से और सिर्फ शोर मचाने की मानसिकता से संसद की कार्यवाही को बाधित कर देने से वे लोग अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते.

20 मई 2025

सकारात्मक माहौल में नकारात्मक राजनीति

किसी भी देश के राजनैतिक विकास के लिए उसके सत्ता पक्ष और विपक्ष का समन्वित स्वरूप महत्त्वपूर्ण होता है. यह तब और भी विशेष हो जाती है जबकि देश में कोई संकट की स्थिति हो. आवश्यक नहीं कि संकट सीमा-पार से ही उत्पन्न हो, देश की आंतरिक स्थिति, प्राकृतिक स्थिति के कारण भी संकट का सामना करना पड़ता है. ऐसी किसी भी स्थिति में, आपातकाल में यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष में समन्वय रहता है, उनमें सामंजस्य की भावना हो तो समाधान सहजता से हो जाता है. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में चारों तरफ शांतिपूर्ण माहौल के बाद भी अशांति लगती है. प्रशासनिक सजगता के बाद भी अराजक तत्त्वों की हलचल दिखती है.

 

विगत दिनों देश का सामना एक असामान्य घटना से हुआ. घटना की प्रतिक्रिया में सरकार ने भी कदम उठाया. आतंकी घटना और उसके बाद ऑपरेशन सिन्दूर की समयावधि में ऐसा लगा जैसे सत्ता पक्ष और विपक्ष में तालमेल बना है. एकाधिक बयानबाजियों को छोड़ दें तो प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की तरफ से भी आतंकियों के विरुद्ध कार्यवाही की खुली छूट, सरकार को पूर्ण समर्थन जैसे सहयोगात्मक बयानों का आना हुआ. ऑपरेशन सिन्दूर सफलतापूर्वक अपनी पूर्णता को प्राप्त होता उसके पहले ही युद्ध-विराम को अपनाना पड़ा. यह निर्णय देशवासियों को किसी भी कीमत पर पसंद नहीं आया. पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने की कार्यवाही का नागरिकों ने जितने खुले दिल से समर्थन किया, युद्द-विराम पर उतने खुले रूप में सरकार का विरोध किया.

 

यहीं देश के सत्ता-पक्ष और विपक्ष का चेहरा देखने का अवसर भी मिला. केन्द्र सरकार को किन कारणों, किन कूटनीतिक स्थितियों के चलते युद्ध-विराम पर सहमत होना पड़ा, ये अलग विषय है किन्तु इसके बाद भी सरकार के अडिग नजरिये में, कठोर निर्णयों में कोई परिवर्तन नहीं आया. प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पाकिस्तान सहित सकल विश्व को स्पष्ट रूप से सन्देश दिया गया कि पाकिस्तान की परमाणु ब्लैकमेलिंग को सहन नहीं किया जायेगा. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी कठोर लहजे में कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर तो ट्रेलर था, पिक्चर अभी बाकी है. वैचारिक रूप से अपनी मनोवैज्ञानिक बढ़त के साथ सत्ता पक्ष कूटनीतिक, रणनीतिक रूप से तत्पर था किन्तु विपक्ष अपने पुराने रंग-ढंग में आने लगा.

 



पहलगाम आतंकी हमले के पहले भी कई बार देश ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के दंश को सहा है. हर बार देशवासियों की माँग होती कि पाकिस्तान पर हमला कर वहाँ के आतंकी ठिकाने ध्वस्त कर दिए जायें. पाकिस्तान के साथ कई बार युद्ध होने, संघर्ष की स्थिति होने पर देश में उपद्रव होने की आशंका रहती. आतंकी स्लीपर सेल द्वारा गृह-युद्ध जैसे हालात पैदा किए जाने का भय रहता. ऑपरेशन सिन्दूर के बाद सरकार ने पूरी सजगता दिखाई. युद्ध-विराम पर सहमति के बाद भी कार्यवाही को विराम नहीं दिया. उसके द्वारा कूटनीति को धार देते हुए न केवल देश में बल्कि बाहर भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया. वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान के नापाक इरादे बताने के लिए, ऑपरेशन सिन्दूर की आवश्यकता के बारे में तथा आतंकवाद के विरुद्ध भारत के ठोस और कठोर नजरिये के बारे में सरकार द्वारा अभूतपूर्व कूटनीति तैयार की गई. केन्द्र सरकार ने आक्रामक कूटनीतिक पहल करते हुए सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल बनाये जो आगामी कुछ सप्ताहों में अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र, यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों का भ्रमण करेंगे. इसका उद्देश्य सहयोगी देशों के साथ सामंजस्य स्थापित करना, पाकिस्तान की आतंकवाद में भूमिका को वैश्विक मंच पर उजागर करना है.

 

एक तरफ सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की जानकारी देने वैश्विक यात्रा की तैयारी में है, तब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा विदेशमंत्री एस. जयशंकर पर ऑपरेशन सिन्दूर की जानकारी पाकिस्तान को पहले से देने का आरोप तथा वायुसेना के नष्ट हुए विमानों की संख्या माँगना समझ से परे है. राहुल गांधी के इस बयान को पाकिस्तान में भारत विरोधी वातावरण बनाने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा है. यदि राहुल गांधी का केन्द्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति नजरिये का, बयानों का इतिहास देखें तो यह पहली घटना नहीं है जबकि उनके नकारात्मक विचार सार्वजनिक हुए हैं. उनके द्वारा ऐसा किया जाना आम बात है, बिना यह विचारे कि देश-हित में इन बयानों का क्या प्रभाव पड़ेगा. देखा जाये तो राहुल गांधी का यह बयान देश-विरोधी ताकतों के लिए उत्प्रेरक का कार्य करेगा. संवेदनशील समय में ऐसा बयान देने का कारण तो वही बता सकेंगे किन्तु निश्चित ही ऐसे बयान देश की छवि को नुकसान पहुँचाते हैं. प्रतिनिधिमंडल के लिए कांग्रेस प्रस्तावित चार नामों से इतर शशि थरूर का नाम केन्द्र सरकार द्वारा न केवल प्रतिनिधिमंडल में शामिल करना बल्कि एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व देना कांग्रेस को कतई पसंद नहीं आया. ऑपरेशन सिन्दूर पर केन्द्र सरकार की प्रशंसा करने के लिए कांग्रेस उनसे नाराज चल रही है. ऐसा समझा जा रहा है कि राहुल गांधी का हालिया आरोप इसी की परिणति है.

 

कुछ भी हो मगर ऐसे समय में जबकि पूरा देश आतंकियों के सफाए के लिए एकजुट है; केन्द्र सरकार द्वारा न केवल आंतरिक रूप से बल्कि सीमा पार भी राजनैतिक-कूटनीतिक रूप से सशक्त और सकारात्मक कदम उठा रखे हैं; पड़ोस की भू-राजनीतिक स्थितियों में उथल-पुथल होने के बाद भी देश में स्थिरता वाले माहौल में ऐसे बयान नकारात्मकता पैदा करते हैं. वैश्विक रूप से अपनी सैन्य शक्ति की सशक्तता, निर्णयों की गम्भीरता, कूटनीति की सक्षमता की विकास-यात्रा में यही नकारात्मकता अवरोधक का कार्य करती है. निश्चित रूप से ऐसे बयान न तो परिपक्वता की पहचान कराते हैं और न ही गम्भीरता की.