31 अगस्त 2026

लेखन को लेकर चलती उथल-पुथल

बहुत वर्षों से लेखन कार्य किया जा रहा है. सैकड़ों की संख्या में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक लेख प्रकाशित भी हुए. छोटे-बड़े समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं ने स्थान दिया. इसके साथ-साथ अनेक पुस्तकों का भी प्रकाशन हुआ. इनके द्वारा अपने जनपद में और जनपद से बाहर भी एक पहचान भी बनी. इन सबके बाद भी कई बार मन में उथल-पुथल सी मची रहती है. इसके चलते कई बार लेखन में नियमितता नहीं रह पाती है. कई मित्र समय से उनको लेख न भेज पाने के कारण टोकते भी हैं. यह हमारे लेखन के प्रति उत्प्रेरक का काम करता है. अनेक सुधिपाठक भी समय-समय पर लेखन में आये अवरोध के सम्बन्ध में जानकारी लेते रहते हैं, लिखने को प्रोत्साहित करते रहते हैं.

 

बावजूद इसके बहुत बार लगता है कि इस लेखन का अर्थ क्या है? इतने विषयों पर लिखे-प्रकाशित हो चुके लेखों का, पुस्तकों का अभीष्ट क्या है? हम अपने लेखन से लोगों को, समाज को क्या दे रहे हैं ये तो एक बात है ही, लोग, समाज हमारे लेखन से ले क्या रहा है, यह भी एक बात है. कई बार लगता है कि हमने लिखा, किसी ने प्रकाशित किया, कुछ लोगों ने पढ़ा और फिर वह लेख हमारे संग्रह का हिस्सा बन गया. खुद को अल्पकालिक ख़ुशी हुई और फिर आसपास ज्यों की त्यों स्थिति. किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं. किसी भी तरह का कोई प्रभाव नहीं. (हाँ, इक्का-दुक्का लोग ऐसे हैं जिन पर प्रभाव हुआ मगर वे कुल लेखन के अनुपात में नगण्य ही कहे जायेंगे.)

 

इधर सोशल मीडिया में, विशेष रूप से फेसबुक में लोगों की अतिशय निर्बाध सक्रियता ने सोच-समझ वाला बिन्दु ही मिटा दिया है. अब पूर्वाग्रहयुक्त मानसिकता से काम हो रहा है, उसी के अनुसार विचार बन रहे हैं, लोग प्रभावित हो रहे हैं. ऐसे समय में खुद को खुद में ही समेट लेने का मन करता है. सिर्फ स्वयं के लिए लिखना, जब मन करे तब लिखना, जो मन करे वो लिखना. न प्रकाशन का मोह, न लोगों तक पहुँचने की उत्कंठा. वैराग्य जैसा भाव समझ आता है कई बार हमें अपने भीतर.


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