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08 जनवरी 2020

फिल्म नहीं उसके दर्द के एहसास ने लोगों को जोड़ा है


जिस जेएनयू मारपीट विवाद को सरकार, शासन, प्रशासन, मीडिया शांत नहीं कर पा रहे थे उसे एक झटके में फिल्म अभिनेत्री दीपिका ने खामोश कर दिया. जेएनयू में हुए मारपीट सम्बन्धी विवाद के बाद दीपिका कथित टुकड़े गैंग से मिलने विश्वविद्यालय पहुँच गईं. दीपिका का वहाँ पहुँचना हुआ नहीं कि एक ऐसे गुट द्वारा, जो टुकड़े गिरोह का विरोध करता रहा है, दीपिका की फिल्म छपाक का बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया. इस बहिष्कार की घोषणा सोशल मीडिया के द्वारा सबसे अधिक चर्चा में आ गई. दीपिका की तरफ से कुछ टिप्पणी आती उसके पहले ऐसे गुट के विचार सामने आने लगे जो किसी न किसी रूप में कथित गिरोह के पक्षधर बने हुए हैं. अचानक से इस गुट को समझ आने लगा कि यह फिल्म जागरूकता के लिए बनाई गई है. इसी गुट को अचानक से आभास हुआ कि इस फिल्म का मकसद एक एसिड अटैक पीड़ित के दर्द को, उसकी पीड़ा को दिखाना है.


दीपिका के इस कदम के क्या परिणाम होंगे, एक गुट द्वारा फिल्म बहिष्कार का क्या अंजाम होगा यह तो फिल्म रिलीज के बाद पता चलेगा. इसके बाद भी यदि संक्षेप में सारे घटनाक्रम का अवलोकन किया जाये तो साफ़ सी बात है कि फिल्म का निर्माण किसी भी रूप में सामाजिक जागरूकता के लिए, सामाजिक सन्देश देने के लिए, लक्ष्मी अग्रवाल की सहायता के लिए या फिर किसी अन्य एसिड अटैक पीड़ित की सहायता के लिए नहीं किया गया है. असल में छपाक लक्ष्मी अग्रवाल की कहानी है जो एसिड हमले का शिकार हुई थी. विगत कई वर्षों में उसने व्यक्तिगत रूप से अथक मेहनत की है, अपनी जिजीविषा को समाप्त न होने दिया है, अपने संघर्ष को न केवल जिंदा रखा है बल्कि उसे खुद में जिया भी है. लगभग दो वर्ष पहले एक दौर ऐसा भी आया था जबकि उसके सामने खुद के और अपने बेटी के भरण-पोषण की समस्या खड़ी हुई थी. जिस व्यक्ति के सहारे उसने अपनी ज़िन्दगी की जंग को आगे तक ले जाने का विचार बना रखा था वही उसे मझधार में छोड़कर आगे निकल गया था. यह वह दौर था जबकि लक्ष्मी अपने संघर्ष को सोशल मीडिया के द्वारा, अपने मित्रों के द्वारा लगातार चर्चा में बनाये हुए थी. स्टॉप सेल एसिड (#stopsaleacid) अभियान के सहारे उसने हजारों लोगों से खुद को जोड़ने का काम किया. हजारों लोग बिना किस फिल्म के द्वारा संवेदित हुए, खुद पर एसिड की तीव्रता का एहसास किये बिना ही अनेक लोग खुद लक्ष्मी के संपर्क में आये, उसके अभियान का हिस्सा बने. हम स्वयं भी उसके इस अभियान का हिस्सा बने. तब कहीं भी न फिल्म का विचार था और न ही किसी ऐसे माध्यम के द्वारा सामाजिक जागरूकता लाने का, सामाजिक सन्देश देने का विचार था. 

असल में फिल्मकारों ने हालिया दौर में ऐसे मुद्दों पर फिल्म बनाना शुरू कर दिया है जो किसी न किसी रूप में जनता को आंदोलित किये हों. ऐसे किसी भी मुद्दे पर जिससे जनता, समाज सीधे तौर पर जुड़ता दिखा है, फिल्मकारों ने उस विषय पर तत्काल फिल्म बनाकर पेश कर दी. छपाक भी उसी रणनीति का एक हिस्सा मात्र है. यह विचार करने वाली बात है कि जिस लक्ष्मी अग्रवाल के साथ एसिड हमले की घटना वर्ष 2005 की है उसके लिए फिल्म इंडस्ट्री आज वर्ष 2019 में जाग रही है. आखिर ऐसा क्यों? ऐसी देरी क्यों? कहीं न कहीं इसके पीछे लक्ष्मी का वह संघर्ष का उत्कर्ष है जो विगत दो सालों में हुआ है. उसकी कहानी कोई छिपी कहानी नहीं थी जो एकाएक आज सामने आई. उसका संघर्ष कोई एक दिन का संघर्ष नहीं जो अचानक सामने आ गया. असल में स्टॉप सेल एसिड अभियान के द्वारा लक्ष्मी ने देशव्यापी सन्देश देने का काम किया. इस दौरान उसके संपर्क में अनेक लोग आये. अनेक स्थानों पर, शहरों में उसके समर्थन में छोटे-बड़े आयोजन हुए. उसकी इस प्रसिद्धि को फिल्म इंडस्ट्री ने तत्काल अपने पक्ष में भुनाने का विचार करके सम्बंधित कदम उठा डाला.

अब जबकि दीपिका के कदम से जेएनयू मारपीट विवाद शांत हो गया है और फिल्म के बहिष्कार का विवाद छिड़ गया है तब यह भी जानना आवश्यक हो जाता है कि क्या महज फिल्म ही अब सामाजिक सन्देश देने का काम करेंगी? आखिर जब फिल्म न बनी थी तब कैसे हजारों लोग लक्ष्मी के दर्द का एहसास करते हुए उसके साथ जुड़ गए थे? पूरी तरह से व्यावसायिक मुद्दे को महज व्यावसायिक रूप में ही देखा जाना चाहिए. एक पक्ष है जो किसी भी रूप में समाज में अपनी फिल्म की पब्लिसिटी चाहता है. एक पक्ष है जो कथित गैंग के चलते उस फिल्म का बहिष्कार कर रहा है. एक पक्ष है जो इस बहिष्कार का विरोध करके सरकार पर निशाना साधने का काम कर रहा है. इन सारे पक्षों के बीच लक्ष्मी को अकेले नहीं छोड़ना है क्योंकि उसके संघर्ष की अपनी ही कहानी है जो किसी भी फिल्म से अपना अंजाम नहीं पा सकती.

20 जून 2018

एक जंग तेजाब की खुली बिक्री के विरोध में

पिछले दिनों तेजाबी हमले की पीड़ित प्रियंका मिश्रा जिंदगी की लड़ाई हार गई. उस पर तेजाबी हमला किसी बाहरी ने नहीं बल्कि उसके पति ने उस समय किया जबकि वह सो रही थी. ऐसी एक-दो नहीं बल्कि अनेक घटनाएँ हमारे समाज में हैं जहाँ किसी महिला से, लड़की से बदला लेने की नीयत से उसके चेहरे पर तेजाब से हमला किया गया. कभी एकतरफा प्यार के इंकार के परिणामस्वरूप, कभी दो प्यार करने वालों से बदला लेने की मनोवृत्ति में, कभी किसी तरह की रंजिश के चलते इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है. एसिड अटैक एक तरह की वह मनोवृत्ति या कहें कि मानसिक क्रूरता है जो पीड़ित पक्ष को मानसिक और शारीरिक रूप से हताहत करना चाहती है. इधर देखने में आया है कि विगत कुछ समय से तेजाबी हमलों के बढ़ने का मुख्य कारण बाजार में खुलेआम बिक्री के लिए तेजाब की उपलब्धता है.

बाजार में खुलेआम बिकता तेजाब और समाज में बदला लेने की नीयत से बढ़ती जा रही एसिड हमले की घटनाओं को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सार्थक निर्णय दिया गया. उच्चतम न्यायालय ने सन 2013 में एसिड अटैक को गंभीर अपराध मानते हुए सरकार, एसिड बेचनवाले दुकानदारों और एसिड अटैक पीड़ितों के लिए दिशा-निर्देश दिए थे. अदालत के अनुसार तेजाब केवल उन्हीं दुकानों पर बिक सकता है जिनको इसके लिए पंजीकृत किया गया हो. एसिड 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों द्वारा नहीं बेचा जाएगा और जो भी इसे खरीदने आएगा दुकानदार द्वारा उसके घर का पता, टेलीफोन नंबर तथा एसिड खरीदने का उद्देश्य सहित अन्य जानकारी लेनी होगी और इसका पूरा लेखा-जोखा लिखित में अपने पास रखना होगा. जो दुकानदार एसिड बेच रहे हैं उनके पास इसका कितना स्टॉक है इसकी जानकारी जिला प्रशासन को देनी होगी. अदालत ने यह भी प्रावधान किया है कि यदि किसी दुकानदार द्वारा इन नियमों की अनदेखी की जाती है तो पकड़ने जाने पर  उस पर पचास हजार रुपये जुर्माना लगाया जाएगा. ऐसी स्थिति के बाद भी तेजाब की बिक्री खुलेआम हो रही है.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी प्रशासन द्वारा सख्ती नहीं बरती जा रही है. आज भी कहीं घरों में प्रयोग करने के नाम पर, कहीं बैटरी में उपयोग के नाम पर कहीं अन्य छोटे उद्योगों में उपयोग के नाम पर तेजाब की खुलेआम बिक्री हो रही है. यह एक तरह से सिरफिरे और आपराधिक मानसिकता वालों को सहज हथियार उपलब्ध करवाने जैसा ही है. बाजार में खुलेआम तेजाब की बिक्री को रोकने और जन-जागरूकता लाने के लिए तेजाबी हमले की पीड़ित लक्ष्मी अग्रवाल द्वारा वर्तमान में ‘स्टॉप सेल एसिड’ अभियान को चलाया जा रहा है. लक्ष्मी अग्रवाल वर्ष 2005 में महज पंद्रह वर्ष की उम्र में एसिड अटैक का शिकार हुई थी. लम्बे और दर्दनाक समय में इलाज के बाद अपने आपको कमजोर न पड़ने देने वाली लक्ष्मी ने देश भर में एसिड अटैक के विरुद्ध आवाज़ उठानी शुरू की. वर्तमान में उनके द्वारा चलाये जा रहे अभियान का मूल उद्देश्य खुलेआम एसिड की बिक्री को रुकवाना है. ये हमारे समाज की विद्रूपता है कि इस तरह की कई-कई घटनाओं को देखने-सुनने के बाद भी जनसामान्य इस बारे में जागरूक या सचेत नहीं है.

यह सही है कि आज बहुतेरे काम ऐसे हैं जिसके लिए तेजाब की आवश्यकता होती है. ऐसे में तेजाब को हमेशा-हमेशा के लिए बिक्री से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है मगर इसके साथ एक पहलू ये भी है कि यह अत्यंत घातक पदार्थ है. जब उच्चतम न्यायालय द्वारा इसकी बिक्री के लिए नियम बना दिए गए हैं तो प्रशासन द्वारा उन्हें सख्ती से लागू करने के कदम क्यों नहीं उठाये जा रहे हैं? उपयोगी कार्यों के अलावा तमाम सिरफिरे हैं जो तेजाब का दुरुपयोग करते हुए हमारी-आपकी बेटियों के भविष्य से, उनकी जान से खिलवाड़ करते हैं. न केवल प्रशासन को बल्कि नागरिकों को भी इसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता है. हम लोग सजग हों और बिना ये सोचे कि इससे हमारा व्यक्तिगत क्या लेना-देना है हर उस व्यक्ति की, हर उस दुकानदार की शिकायत प्रशासन से करनी चाहिए जो खुलेआम तेजाब बेचने में लगा है. उन दुकानों को भी चिन्हित करने की आवश्यकता है जो गैर-पंजीकरण के तेजाब बेचने का काम कर रहे हैं.

सन 2016 में मुम्बई के प्रीति राठी तेजाब कांड में अदालत ने उस मामले को रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मानते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी. यह अपने आपमें पहला मामला था जबकि एसिड अटैक मामले में किसी आरोपी को फाँसी की सजा सुनाई गई हो. इसके बाद भी एसिड हमलों में कमी आती नहीं दिखी है. देखा जाये तो महज सजा ही एकमात्र समाधान नहीं है. इससे बेहतर समाज को जागरूक होने की जरूरत है. दरअसल यह इंसानी दिमाग में कहीं गहरे बैठी पशुता, क्रूरता है, जो कब, किस रूप में सामने आये कहा नहीं जा सकता. किसी भी इन्सान की मूल प्रवृत्ति हिंसक ही होती है जो  अनेकानेक सोपान तय करने के बाद भी दूर नहीं हुई है न ही कम हुई है. यही कारण है कि आज भी उसे प्रेम, स्नेह, भाईचारे, शांति का पाठ नियमित रूप से पढ़ाया जाता है. उसकी मानसिक क्रूरता का ही दुष्परिणाम है कि समाज में रोज ही किसी न किसी तरह की आपराधिक घटनाएँ सुनाई देती हैं. तेजाबी हमले का शिकार सिर्फ और सिर्फ बेटियाँ हो रही हैं. किसी मनचले के एकतरफा प्रेम का इंकार और तेजाबी हमला, किसी अन्य इंकार के सुनाई देने पर महिला के चहरे पर एसिड अटैक कर देना. एक पल को सिर्फ विचार करने पर ही पूरा दिमाग झनझना जाता है कि कैसे कॉलेज में प्रैक्टिकल के दौरान दो-चार बूँद एसिड उँगलियों पर गिर जाने भर से घंटों जलन मचती रहती थी. किस तरह घर में, किसी व्यवसाय के दौरान एसिड से कार्य करने के दौरान असावधानीवश शरीर पर छिटक कर गिरा तेजाब कभी-कभी शरीर के उस हिस्से में खाल का, मांस को जला दिया करता है. घंटों, दिनों के हिसाब से न केवल जलन बल्कि अप्रत्याशित दर्द बना रहता है. जब दो-चार बूंदे पूरे दिल-दिमाग को हिलाकर रख देती हैं तो सोचिये क्या स्थिति होती होगी जबकि कोई दिमागी क्रूर इन्सान किसी के पूरे चेहरे पर तेजाब फेंक देता है.

हम सभी को आज ही सख्त कदम उठाने की जरूरत है. यह समय की माँग भी है और हमारी बेटियों के लिए सुरक्षात्मक भी है. आइये, हम सब एकजुट होकर तेजाब रुपी खतरनाक पदार्थ की खुलेआम बिक्री के खिलाफ खड़े हों. इसके साथ ही उस मानसिकता के खिलाफ भी खड़े हों जो महज अपनी पसंदगी के नकारने पर एसिड अटैक जैसे खतरनाक कदम उठाकर हमारी बेटियों की जान से, भविष्य से खेल रही है. आखिर किसी एक व्यक्ति की दिमागी क्रूरता का शिकार हम अपनी बच्चियों को कब तक होने देंगे? आज नहीं तो कल हमें जागना ही होगा, एकजुट होना ही होगा. और जब ऐसा करना ही है तो फिर कल का इंतजार क्यों?



उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, दिनांक 20-06-2018 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

17 जून 2018

अवैध तेजाब से लड़ने को एकजुट होना होगा #stopsaleacid


इंसानी दिमाग में कहीं गहरे बैठी पशुता, क्रूरता कब, किस रूप में सामने आये कहा नहीं जा सकता. उसकी मानसिक क्रूरता का ही दुष्परिणाम है कि समाज में रोज ही किसी न किसी तरह की आपराधिक घटनाएँ सुनाई देती हैं. इन्हीं आपराधिक घटनाओं में विगत कुछ वर्षों से एसिड अटैक (तेजाबी हमले) की घटनाओं में वृद्धि हुई है. तेजाबी हमले का शिकार सिर्फ और सिर्फ बेटियाँ हो रही हैं. किसी मनचले के एकतरफा प्रेम का इंकार और तेजाबी हमला, किसी अन्य इंकार के सुनाई देने पर महिला के चहरे पर एसिड अटैक कर देना. एक पल को सिर्फ विचार करने पर ही पूरा दिमाग झनझना जाता है कि कैसे कॉलेज में प्रैक्टिकल के दौरान दो-चार बूँद एसिड उँगलियों पर गिर जाने भर से घंटों जलन मचती रहती थी. किस तरह घर में, किसी व्यवसाय के दौरान एसिड से कार्य करने के दौरान असावधानीवश शरीर पर छिटक कर गिरा तेजाब कभी-कभी शरीर के उस हिस्से में खाल का, मांस को जला दिया करता है. घंटों, दिनों के हिसाब से न केवल जलन बल्कि अप्रत्याशित दर्द बना रहता है. जब दो-चार बूंदे पूरे दिल-दिमाग को हिलाकर रख देती हैं तो सोचिये क्या स्थिति होती होगी जबकि कोई दिमागी क्रूर इन्सान किसी के पूरे चेहरे पर तेजाब फेंक देता है.


ये हमारे समाज की विद्रूपता है कि इस तरह की कई-कई घटनाओं को देखने-सुनने के बाद भी जनसामान्य इस बारे में जागरूक या सचेत नहीं है. सन 2016 में मुम्बई के प्रीति राठी तेजाब कांड में अदालत ने मामले को रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मानते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी. यह अपने आपमें पहला मामला था जबकि एसिड अटैक मामले में किसी आरोपी को फाँसी की सजा सुनाई गई हो. देखा जाये तो महज सजा ही एकमात्र समाधान नहीं है. इससे बेहतर समाज को जागरूक होने की जरूरत है. उच्चतम न्यायालय ने सन 2013 में एसिड अटैक को गंभीर अपराध मानते हुए सरकार, एसिड बेचनवाले दुकानदारों और एसिड अटैक पीड़ितों के लिए दिशा-निर्देश दिए थे. अदालत के अनुसार तेजाब केवल उन्हीं दुकानों पर बिक सकता है जिनको इसके लिए पंजीकृत किया गया हो. एसिड 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों द्वारा नहीं बेचा जाएगा और जो भी इसे खरीदने आएगा दुकानदार द्वारा उसके घर का पता, टेलीफोन नंबर तथा एसिड खरीदने का उद्देश्य सहित अन्य जानकारी लेनी होगी और इसका पूरा लेखा-जोखा लिखित में अपने पास रखना होगा. जो दुकानदार एसिड बेच रहे हैं उनके पास इसका कितना स्टॉक है इसकी जानकारी जिला प्रशासन को देनी होगी. अदालत ने यह भी प्रावधान किया है कि यदि किसी दुकानदार द्वारा इन नियमों की अनदेखी की जाती है तो पकड़ने जाने पर  उस पर पचास हजार रुपये जुर्माना लगाया जाएगा. ऐसी स्थिति के बाद भी तेजाब की बिक्री खुलेआम हो रही है.


वर्ष 2005 में महज पंद्रह वर्ष की आयु में लक्ष्मी अग्रवाल एसिड अटैक का शिकार हुई. लम्बे और दर्दनाक समय में इलाज के बाद अपने आपको कमजोर न पड़ने देने वाली लक्ष्मी ने देश भर में एसिड अटैक के विरुद्ध आवाज़ उठानी शुरू की. वर्तमान में उनके द्वारा #stopsaleacid अभियान चलाया जा रहा है, जिसका मूल उद्देश्य खुलेआम एसिड की बिक्री को रुकवाना है. यह सही है कि आज बहुतेरे काम ऐसे हैं जिसके लिए तेजाब की आवश्यकता होती है. ऐसे में तेजाब को हमेशा-हमेशा के लिए बिक्री से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है मगर इसके साथ एक पहलू ये भी है कि यह अत्यंत घातक पदार्थ है. जब उच्चतम न्यायालय द्वारा इसकी बिक्री के लिए नियम बना दिए गए हैं तो प्रशासन द्वारा उन्हें सख्ती से लागू करने के कदम क्यों नहीं उठाये जा रहे हैं? उपयोगी कार्यों के अलावा तमाम सिरफिरे हैं जो तेजाब का दुरुपयोग करते हुए हमारी-आपकी बेटियों के भविष्य से, उनकी जान से खिलवाड़ करते हैं. न केवल प्रशासन को बल्कि नागरिकों को भी इसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता है. हम लोग सजग हों और बिना ये सोचे कि इससे हमारा व्यक्तिगत क्या लेना-देना है हर उस व्यक्ति की, हर उस दुकानदार की शिकायत प्रशासन से करनी चाहिए जो खुलेआम तेजाब बेचने में लगा है. उन दुकानों को भी चिन्हित करने की आवश्यकता है जो गैर-पंजीकरण के तेजाब बेचने का काम कर रहे हैं.


हम सभी को आज ही सख्त कदम उठाने की जरूरत है. यह समय की माँग भी है और हमारी बेटियों के लिए सुरक्षात्मक भी है. आइये, हम सब एकजुट होकर तेजाब रुपी खतरनाक पदार्थ की खुलेआम बिक्री के खिलाफ खड़े हों. इसके साथ ही उस मानसिकता के खिलाफ भी खड़े हों जो महज अपनी पसंदगी के नकारने पर एसिड अटैक जैसे खतरनाक कदम उठाकर हमारी बेटियों की जान से, भविष्य से खेल रही है. आखिर किसी एक व्यक्ति की दिमागी क्रूरता का शिकार हम अपनी बच्चियों को कब तक होने देंगे? आज नहीं तो कल हमें जागना ही होगा, एकजुट होना ही होगा. और जब ऐसा करना ही है तो फिर कल का इंतजार क्यों?




17 जुलाई 2013

पहचान-पत्र से 'एसिड अटैक' रोकने की कल्पना शेखचिल्लीपना




‘तेजाब खरीदने पर अब दिखाना होगा अपना पहचान-पत्र’ ये खबर भले ही राहत देती महसूस होती हो पर ऐसा वास्तविकता में है नहीं. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद सुसुप्तावस्था में पड़ी केंद्र सरकार ने फौरी तौर पर एक कदम उठाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली. बहुतायत में होते ‘एसिड अटैक’ में हर बार सरकार कड़े कदम उठाये जाने की बात कहती है किन्तु कोई भी कदम अभी तक नहीं उठाया गया था. वास्तविकता में देखा जाये तो तेजाबी हमले में हमलावर की, अपराधी की पहचान कर पाना उतना कठिन कार्य नहीं है, जितना कि पीड़िता को न्याय दिला पाना. ये बात सभी को भली-भांति मालूम है कि अधिसंख्यक तेजाबी हमलों में महिलाएं ही हमले का शिकार होती हैं और हमलावर उस पीड़िता का परिचित ही होता है. एकाधिक मामलों में ही ऐसा रहा होगा जबकि तेजाब से हमला करने वाला कोई किराये का व्यक्ति रहा हो, जिसकी पहचान पीड़िता या फिर उसके परिवारजनों द्वारा नहीं की जा सकी हो. ऐसे पहचानहीन मामलों में पहचान-पत्र अपराधी तक पहुँचने की कोई गारंटी नहीं देता बल्कि इस आदेश के बाद से एसिड बेचने वाले दुकानदार पुलिसिया उत्पीड़न का शिकार अवश्य होने लगेंगे. इसके उलट यदि हमलावर या अपराधी को पीड़िता या उसके परिवार के लोग पहचानते हैं तो फिर पहचान-पत्र के होने या न होने का क्या अर्थ निकलता है.

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बहुतायत मामलों में देखने में आया है कि हमले के बाद पीड़िता जहाँ जीवन-मृत्यु से जूझ रही होती है, उसके परिवार के लोग उसके इलाज, पुलिस के सवालों, अदालती मामलों से दो-चार हो रहे होते हैं वहीं हमलावर अपने वकील की तिकड़मी चालों की मदद से जमानत लेकर खुली हवा में स्वच्छंदता से विचरण कर रहा होता है. इस हृदयविदारक पीढ़ा को एक तरफ वो महिला सहती है तो दूसरी तरफ उसके परिवारीजन सम्बंधित अपराधी के कैद से बाहर निकल आने पर हताशा का अनुभव करते हैं. यदि दुर्भाग्य से हमलावर रसूखदार परिवार से या प्रभावशाली संपर्क से सम्बंधित होता है तो पीड़िता के परिवारीजन पीढ़ा के साथ-साथ भय का भी शिकार हो जाते हैं. कहीं न कहीं उन पर अपराधी पक्ष की तरफ से सम्बंधित मामले को वापस लेने, समझौता करने, कुछ ले-देकर मामला रफा-दफा करने का अनावश्यक दबाव डाला जाने लगता है. समझने की बात है कि एक तरफ पीड़िता और उसका परिवार कष्टों से लड़ रहा होता है और दूसरी तरफ अपराधी अपने कुकृत्यों के बाद भी सीनाजोरी दिखाने पर आमादा रहता है.

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इस तरह की विषम परिस्थितियों के बाद भी यदि पीड़िता और उसका परिवार अपराधी के सामने झुकता नहीं है तो भी उनके सामने नए सिरे से नई जिंदगी की शुरुआत करने की चुनौती खड़ी दिखती है. विकृत मानसिकता के किसी इन्सान के कुकृत्य का शिकार महिला अपने भविष्य को सजाने-सँवारने से अधिक अपने आत्मविश्वास को जुटाने के लिए संघर्ष करती दिखती है. अपने आपको एक-एक पल में उस घातक हमले की विभीषिका से मुक्त कर पाने की, खुद को पहले की भांति सक्रिय करने की, खुशनुमा जीवन को पुनः प्राप्त करने की जद्दोजहद करती है.

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इन विषम स्थितियों, हालातों का अनुभव करके विचार किया जाए तो पहचान-पत्र जैसा आदेश निरर्थक ही प्रतीत होता है. आज के विज्ञान अध्ययन के दौर में तेजाब मिलने की एकमात्र जगह दुकान ही नहीं है. शैक्षणिक संस्थानों की रसायन विज्ञान प्रयोगशालाओं में ‘एसिड’ भरपूर मात्रा में उपलब्ध होता है, जहाँ से उद्दण्ड लड़कों द्वारा इसे प्राप्त कर लेना कदापि मुश्किल कार्य नहीं है. इसके अलावा हमारे समाज में जिस तरह से बड़े-बड़े काम धन-बल की मदद से आसानी से निपटा लिए जा रहे हैं; जुगाड़ तकनीक के सहारे हर बंधन की काट खोज ली जाती है; अपने रसूख, बाहुबल, शस्त्रबल के आतंक के सहारे शासन-प्रशासन तक को निम्न-कोटि का साबित कर दिया जाता है वहां ये कल्पना करना मुश्किल प्रतीत हो रहा है कि एक ‘बेचारा’ दुकानदार किसी को भी बिना पहचान-पत्र के ‘एसिड’ नहीं दे रहा होगा?

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सरकार और सरकार के पिछलग्गू अंग इस आदेश के बाद भले ही अपनी पीठ थपथपाने का काम करने लगें पर इस आदेश से ‘एसिड अटैक’ के मामलों में रत्ती भर भी गिरावट आएगी, ऐसा सोचना शेखचिल्लीपन ही होगा. सरकार ऐसे कानून बनाये कि किसी भी हालत में अपराधी को जमानत न मिल सके, नाबालिग-अर्धविक्षिप्त-मानसिक रोगी-नशेबाज़ जैसे कानूनी दांव-पेंचों को कतई तवज्जो न दी जाये, फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट के द्वारा जल्द से जल्द उसको सजा मिल सके, कठोर से कठोर दंड का प्रावधान हो, सजा ऐसी हो कि कोई भी व्यक्ति ‘एसिड अटैक’ करने के पहले हजार बार सोचे तब शायद इन हमलों को रोका या कम किया जा सकता है. अन्यथा की स्थिति में हालात सुधरने वाले नहीं, नियंत्रण में आने वाले नहीं.

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