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08 जनवरी 2021

ऐतिहासिक निकली हरे रंग की स्याही

कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कोई न कोई प्रतिभा होती है, उसे कोई न कोई शौक भी होता है। ये बात और है कि बहुत से लोगों को प्रतिभा निखारने का, उसे दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता, इसी तरह बहुत से लोग किसी न किसी कारण से अपने शौक भी पूरे नहीं कर पाते। ऐसी स्थितियों के लिए आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक आदि पक्ष भी जिम्मेवार होते हैं। इसके साथ-साथ व्यक्ति किस स्थान, किस शहर, किस परिस्थिति में रह रहा है, यह भी शौक एवं प्रतिभा के संदर्भ में महती भूमिका निभाते हैं। 

बचपन से ही फाउण्टेन पेन से लिखने की आदत बनी और कालांतर में यही आदत शौक के रूप में भी विकसित हो गई। आज भी मोबाइल, कम्प्यूटर के दौर में प्रतिदिन फाउण्टेन पेन से लिखना होता है। लिखने के शौक के साथ-साथ अलग-अलग रंग की स्याही का इस्तेमाल करना भी शौक जैसा ही है। लिखने के साथ-साथ फाउण्टेन पेन का प्रयोग स्केचिंग के काम में, कैलीग्राफ़ी में भी कर लिया जाता है। ऐसे में भी अलग-अलग रंग की स्याही की आवश्यकता होती है। 

ऐसे दौर में जबकि पेन का, विशेष रूप से फाउण्टेन पेन का इस्तेमाल कम से कम किया जा रहा हो, उरई जैसी छोटी जगह पर तो यह कमी और भी महसूस की जाती है। इस कमी के बीच फाउण्टेन पेन की स्याही की माँग करना एक तरह की ज्यादती ही कही जाएगी। काली, नीली स्याही की उपलब्धता तो फिर भी हो जाती है पर लाल, हरी स्याही की माँग करना आसमान के तारे माँगने जैसा हो जाता है। इसमें भी हरे रंग की स्याही तो उरई में नामुमकिन स्थिति को प्राप्त कर जाती है। कोरोनाकाल और लाॅकडाउन जैसी परिस्थिति के पहले तो उरई से बाहर कहीं बड़े शहर जाने पर स्याही ले आया करते थे। इस बार न हमारा जाना हो सका और अन्य किसी की सुलभता, सहजता न होने के कारण भी हरे रंग की स्याही उपलब्ध न हो सकी।



इधर हरे रंग की स्याही लगभग समाप्ति पर थी। पिछले दो महीने से उरई की दुकानों के चक्कर लगाए जा रहे थे पर हरी स्याही की उपलब्धता नहीं हो पा रही थी। बिक्री न होने के कारण दुकानदारों की अपनी मजबूरी थी। काफी भागदौड़ और लगभग रोज की पूछताछ के बाद आज अंततः एक दुकान से दो शीशियाँ प्राप्त हो ही गईं। यद्यपि दोनों शीशियों से कुछ स्याही बह भी चुकी है तथापि हाल-फिलहाल लिखने का, स्केचिंग का, कैलीग्राफ़ी का काम बाधित न होगा। समाप्ति की ओर बढ़ती जा रही हरी स्याही के कारण इन कामों को हरे रंग से करना रोकना, कम करना पड़ा था। 

आज हरी स्याही का मिलना खुशी दे गया तो उनकी पैकिंग तिथि ने आश्चर्यचकित कर दिया। मई 1997 की पैक ही हुई स्याही को सही ठिकाना मिला जनवरी 2021 में। इस स्याही को धैर्य के साथ इस्तेमाल किया जाएगा और सुरक्षित रख लिया जाएगा क्योंकि एक तरह से ये ऐतिहासिक हरी स्याही हो गई। हरी स्याही मिलने के बाद भी हरी स्याही की खोज जारी रहेगी। वैसे जल्द ही कहीं न कहीं सैर को निकला जाएगा और बोरा भरकर हरी स्याही खरीद ली जाएगी। 



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वंदेमातरम्

03 जनवरी 2021

स्याही की बूँदें और सजा

एक बच्चा फाउंटेन पेन से लिखा करता था. लिखने से ज्यादा वह अपने कपड़ों को, हाथों को रंग लेता था. कभी स्याही भरने के नाम पर, कभी पेन न चलने के नाम पर, कभी निब पर स्याही सूखने के नाम पर, कभी पेन को पकड़ने की स्टाइल के कारण उसके हाथ गंदे होते और हाथों के चलते कपड़े भी गंदे हो जाते. स्याही के निशान साफ़ करते-करते उसकी माँ भी परेशान रहती. परेशान वह इसलिए भी होती क्योंकि स्याही के वे निशान सिर्फ कपड़ों, हाथों पर ही रुक कर नहीं रहे बल्कि कभी-कभी वे घर के कपड़ों पर भी दिखाई दे जाते, कभी घर की दीवारों, सामानों पर भी दिख जाते.


एक दिन वह बच्चा घर पर बैठा अपना काम करने में लगा था. फाउंटेन पेन हमेशा की तरह उसके हाथ में था. स्याही की शीशी उसकी पहुँच में थी ही. उसकी मम्मी ने देखा तो उसे समझाया. अगले पल उसकी माँ के दिमाग में कुछ बात आई. उन्होंने उस बच्चे से कहा कि तुम हर जगह स्याही के निशान बना देते हो, हाथ गंदे कर लेते हो, कपड़े गंदे कर लेते हो. अब तुम्हारे हाथों पर लगी स्याही पर तो कुछ नहीं कहा जाएगा मगर यदि किसी कपड़े पर, सामान पर, दीवार पर स्याही के जितने निशान लगेंगे, उतने बार तुम्हारी पिटाई होगी. उतनी बार तुमको तमाचे पड़ेंगे.


अब बच्चा बड़ा सतर्क हो गया. बहुत सावधानी से काम करने लगा. काम करते-करते उसी समय उसके पेन ने चलना बंद कर दिया. कई बार की कोशिश के बाद भी निब ने स्याही से कुछ भी लिखने से मना कर दिया. बच्चे के मन में पिटाई को लेकर भी एक डर था, सो वह बहुत ही सावधानी से कोशिश कर रहा था पेन को चलाने की. कई बार के बाद भी जब उसका पेन न चला तो उसने फाउंटेन पेन को हाथ में पकड़ कर झटका दिया. अरे! यह क्या? वह जिस चादर को जमीन पर बिछा कर बैठा लिखने में लगा था उसमें एक तरफ स्याही के कई सारे धब्बे बन गए. (ऐसा आपके साथ भी तो हुआ होगा, जबकि फाउंटेन पेन चलाने के लिए आपने पेन को झटका दिया होगा और उसकी निब के रास्ते स्याही निकल कर कई-कई बूँदों में बिखर गई होगी.)


कुछ देर बाद उसी माँ आई और उसने चादर पर स्याही बिखरी देखकर उसे मात्र एक बार एक सजा दी. आपको आश्चर्य हुआ होगा कि कई-कई बूँदों के निशान हो जाने के बाद भी मात्र एक बार की सजा. अब इसे वही समझ सकेगा जिसने फाउंटेन पेन का प्रयोग किया हो.


अब बच्चे को सजा मात्र एक बार मिलने की बात का खुलासा. आखिर बच्चा भी समझदार था. उसने चादर पर कई निशान देखकर मिलने वाली सजा का अंदाजा लगा लिया था. बस, झटपट उसने दिमाग चलाते हुए स्याही की शीशी उठाकर उन सारी बूँदों के ऊपर बिखरा दी. नतीजा ये हुआ कि स्याही के कई-कई निशान बस एक निशान में बदल गए. कहिये, कैसी रही उस बच्चे की कारीगरी.


आज फाउंटेन पेन साफ़ करते समय जगह-जगह पड़े स्याही के निशान देखकर यह कहानी याद आ गई.




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वंदेमातरम्

29 जनवरी 2016

तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त

बचपन से साथ निभाती चली आई स्याही के कार्यों पर हमेशा से गर्व का अनुभव होता रहा है. उसके पीछे बहुत बड़ा कारण ये रहा कि हमने और लोगों की तरह स्याही के कार्य को महज लेखन से ही नहीं जोड़े रखा. स्याही जैसी बहुआयामी प्रतिभा को हमने न तो बचपन में नियंत्रित रखा और न ही कभी उसके बाद. कुछ लोगों का मानना है कि स्याही का काम सिर्फ और सिर्फ लेखन के लिए होता रहा है, अब वो भी गुजरे ज़माने की बात हो गई. हमने तो किसी एक पल को भी ऐसा विचार नहीं किया. बचपन से ही स्याही के बहुआयामी व्यक्तित्व को पहचान कर उसको विभिन्न तरीके से अपने उपयोग में लाते रहे थे, आज भी ला रहे हैं. ऐसे में कोई स्याही के बारे में अनर्गल कुछ भी कह दे, उसे आउटडेटेड बता दे, गुजरे ज़माने का बता दे तो सुनकर बहुत कोफ़्त होती है. इसके साथ-साथ एक अजब तरीके की समस्या से भी सामना करना पड़ जाता है. जब भी स्याही लेने के लिए बाज़ार जाओ या फिर नया फाउंटेनपेन माँगो तो दुकानदार चेहरे की अजब भाव-भंगिमा के साथ ऐसे देखता है जैसे किसी दूसरे ग्रह का प्राणी देख लिया हो. साथ में ऐसे दिखायेगा जैसे किसी आदिमानव से, आदिकालीन इन्सान से मुलाकात कर रहा हो जिसने ऐसी चीज माँग ली जो अब इस धरती पर ही उपलब्ध नहीं है. बनती-बिगड़ती सूरत तो ठीक ही है, मगर इसके साथ न जाने कितनी तरह के आदर्श वचन भी सुनाने लग जाता है वो भौचक्का दुकानदार. कई बार तो ऐसा देख-सुनकर अपराध-बोध जैसा, हीनता-बोध जैसा महसूस होने लगता है, मानो स्याही माँग कर खुद के पिछड़े होने का सबूत दे दिया हो.

बहरहाल, लोगों को स्याही पर कितना भी हीनता का बोध क्यों न आता रहा हो मगर हमें तो बचपन से उसके मल्टीडाइमेंशनल होने पर गर्व रहा है. बचपन में जब भी इच्छा होती उसी स्याही से चित्रकारी करने लग जाते. कभी कागज़ पर, कभी दीवार पर तो कभी कपड़ों पर. इसी तरह जब मन किया तो उसी स्याही से होली का आनंद उठा लिया. सोते में घर-परिवार में भाई-बहिनों की दाढ़ी-मूँछें उगानी हों तो स्याही को याद कर लिया जाता. इसके अलावा घर के कई-कई कामों में भी स्याही की प्रतिभा का उपयोग कर लिया जाता. कभी निशान लगाने के काम, कभी कांच के बर्तनों में भरकर शो-पीस बनाए जाने के काम तक स्याही के द्वारा ले लिए जाते. हालाँकि अब तो मॉडर्न तरीके के बॉलपेन, रीफिल आने से स्याही जैसे बहुआयामी पदार्थ की माँग में घनघोर गिरावट देखने को मिली है. अब तो बच्चे भी उस होली से वंचित रहने लगे हैं जो उस प्रिय स्याही के बाल पर कभी भी खेली जाने लगती थी.


इधर कुछ समय से दुकानदारों ने स्याही के स्वरूप को लेकर जिस तरह की भाव-भंगिमा बना-बनाकर मन में एक तरह का हीनता-भाव पैदा कर दिया था, उससे हमारी प्रिय स्याही के भविष्य पर, उसके बहुआयामी स्वरूप पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गए थे. वो तो भला हो नवोन्मेषी राजनैतिक परिवर्तकों का, जिन्होंने राजनीति के मैदान में उतर कर स्याही को निम्न स्तर की मानसिकता वालों की सोच को छिन्न-भिन्न कर दिया, स्याही-प्रेमियों के मन में उपजती हीनभावना को भी दूर कर दिया. अब तो जब मर्जी होती है, वे लोग भी हमारे बचपने की तरह होली खेलने में लग जाते हैं. ये और बात है कि इनकी होली में स्याही के रंग का उतना तीखापन नहीं दिखता है जैसा कि हमारे बचपने की होली में होता था किन्तु चेहरे पर, दाढ़ी पर, गाल पर, हाथ पर स्याही के चंद छींटे ही अपनी निशानी को पर्याप्त पुख्ता बनाते हैं. इनकी इस फेंकमफाकी राजनीति से बाज़ार में स्याही का रुतबा एकदम बुलंद हो गया. हमें अपनी स्याही पर गर्व हो रहा है कि भले ही कोई राजनैतिक कारण रहा हो मगर उसने बड़ों-बड़ों को भी उसका साथ लेने को मजबूर कर दिया. जिन चेहरों को अपनी कालिख छिपाने के लिए सफेदी का सहारा लेना होता था, अब वे इसी स्याही के चलते चेहरों को रंगीन करवा रहे हैं. गर्व इस कारण से भी हो रहा है कि अब स्याही मांगने पर दुकानदार हमें पिछड़ा नहीं कहेगा, हमें आदिकालीन सभ्यता का प्राणी नहीं समझेगा, हमारी बहुआयामी व्यक्तित्व स्याही को बिसरायेगा नहीं. उधर टीवी पर वे स्याही से रँगा चेहरा साफ़ करते दिखाए जा रहे हैं, इधर हमारा दिल स्याही के अनगिनत कार्यों को याद करते हुए मन ही मन गाना गुनगुनाने लगा कि तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त.